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Saturday, April 16, 2011

ओल्ड इस गोल्ड - शनिवार विशेष - जब गुड्डो दादी नें बताया पंडित बागा राम व पंडित हुस्नलाल के परिवार के साथ उनके पारिवारिक संबंध के बारे में

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों नमस्कार! फ़िल्म संगीत के सुनहरे दौर के गानें रेकॉर्ड/ कैसेट्स/ सीडी'ज़ के ज़रिये अनंतकाल तक सुरक्षित रहेंगे, इसमें कोई शक़ नहीं है, और इसमें भी कोई संदेह नहीं कि सुनहरे दौर के फ़नकार भी अमर रहेंगे। लेकिन जब हम इन अमर फ़नकारों के बारे में आज जानना चाहते हैं तो कुछ किताबों, पत्र-पत्रिकाओं और विविध भारती के संग्रहालय में उपलब्ध कुछ साक्षात्कारों के अलावा कोई और ज़रिया नहीं है। इन कलाकारों के परिवार वालों से भी जानकारी मिल सकती है लेकिन उन तक पहुँचना हमेशा संभव नहीं होता। ऐसे में अगर हमें कोई मिल जाये जिन्होंने उस ज़माने के कलाकार को या उनके परिवार को करीब से देखा है, जाना है, तो उनसे बातचीत करनें में भी एक अलग ही रोमांच हो आता है। यह हमारा सौभाग्य है कि 'हिंद-युग्म आवाज़' परिवार के श्रोता-पाठकों में भी कई मित्र ऐसे हैं जिन्होंने न केवल उस ज़माने से ताल्लुख़ रखते हैं बल्कि स्वर्णिम युग के कुछ कलाकारों के संस्पर्श में भी आने का उन्हें सौभाग्य प्राप्त हुआ है। ऐसी ही एक शख़्स हैं हमारी गुड्डो दादी।

अभी हाल ही में जब मुझे सजीव जी से पता चला कि गुड्डो दादी बहुत साल पहले पंडित हुस्नलाल के घर गई थीं, मुझे रोमांच हो आया, और मैंने दादी से गुज़ारिश की अपनी यादों के उजालों को 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में बिखेरने की। बड़े ही उत्साह के साथ दादी नें न केवल उस अनुभव के बारे में हमें लिख भेजा, बल्कि अमरीका से ख़ुद मुझे टेलीफ़ोन भी किया। ७२ वर्ष की उम्र में भी टेलीफ़ोन पर उनकी आवाज़ में जिस तरह का उत्साह मुझे मेहसूस हुआ, उससे हम नौजवान बहुत कुछ सीख सकते हैं। बहुत साल पहले की बात होने की वजह से दादी को बहुत ज़्यादा तो याद नहीं, लेकिन जितना भी याद है, वो हमारे लिये कुछ कम नहीं है। तो आइए रोशन करते हैं आज की यह महफ़िल गुड्डो दादी की सुनहरी यादों के उजाले से।

सुजॉय - गुड्डो दादी, एक बार फिर स्वागत है आपका 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में। यकीन मानिए, आप जैसी वरिष्ठ मित्रों के संस्पर्श में आकर हमें बहुत अच्छा लगता है, और एक रोमांच भी हो आता है यह जानकर कि आप सहगल साहब, पं. हुस्नलाल-भगतराम, और सुरिंदर कौर जैसी कलाकारों से मिली हैं, या उन्हें सामने से देखा है। आज हम आपसे जानना चाहेंगे पं. हुसनाल-भगतराम के बारे में। मैंने सुना है कि आपके परिवार का संबंध है उनके परिवार के साथ?

गुड्डो दादी - जी हाँ! पंडित बागा राम जी के साथ हमारा पारिवारिक सम्बन्ध है। मेरे पैदा होने से भी पहले हमारे परिवार का काफी आना जाना था।

सुजॉय - ये पंडित बागा राम जी कौन हैं?

गुड्डो दादी - पं. बागा राम जी हुस्नलाल जी के ससुर थे। और वो ख़ुद भी संगीतकार थे। मेरे ख़याल में उन्होंने कुछ फ़िल्मों में भी संगीत दिया है। और हुस्नलाल भगतराम को भी बहुत कुछ सिखाया है। पंडित बागा राम जी बहुत सीधे सादे किस्म के इंसान थे, बढ़ी सफ़ेद दाढ़ी, खुली कंधे पर लाल कपडे का अंगोछा डाले रखते थे।

सुजॉय - अच्छा!! क्या आप बता सकती हैं कि बागा राम जी नें किन फ़िल्मों में संगीत दिया था?

गुड्डो दादी - पंडित बागा राम जी ने कौन सी फिल्म में संगीत दिया या लिखा मुझे जानकारी नहीं हैं, क्योंकि उन दिनों हमें दूर ही रखा जाता था गीत आदि से, और दूर संचार के साधन भी कम थे। रेडियो तो १९४७ तक किसी किसी के घर में ही होता था।

सुजॉय - मैंने इंटरनेट पर काफ़ी ढूंढा पर बागा राम जी के बारे मे कोई जानकारी प्राप्त नहीं कर सका, और न ही उनके किसी फ़िल्म या गीत की। ऐसे में आप से उनके बारे में सुन कर बहुत ही अच्छा लग रहा है। दादी, मैंने सुना है कि आप हुस्नलाल जी के घर गई थीं। कहाँ पे था उनका घर?

गुड्डो दादी - मुझे जितना याद है या पता है, वह बागा राम जी का घर था। हुस्नलाल जी का वहाँ ख़ूब आना जाना था। उनका घर था दिल्ली के पहाड़गंज में इम्पीरियल सिनेमा के पीछे। एक पारिवारिक वातावरण था, सबसे मिलते थे आदर के साथ, हंस मुख भी थे। हुस्नलाल-भगतराम जी नया गीत अपने मित्र मंडली के साथ तैयार करते थे, जिसमे पंडित बागा राम जी बहुत सहायता करते थे। बहुत से गीत और धुनें दुसरे संगीतकारों ने चोरी कर अपनी फिल्मो में शामिल कर लिया, नाम तो नहीं लिखूँगी। हम भी दिल्ली में रहते थे। बेटी और पति के साथ बहुत बार गई उनके घर। वहाँ एक कमरा वाद्यों से सुज्जित रहता था जिसमें सितार, हारमोनियम, घड़ा, तबला शामिल थे। मसंद गोल तकिये, उन पर सफ़ेद कवर, ज़मीन पर कालीन और कालीन पर सफ़ेद चादर भी बिछी होती थी। उनके घर हमनें खाना भी खाया, बहिन के हाथों बना चाय भी पी, बड़ी बहिन ने खाने पर आमन्त्रण दिया था। बहिन, यानी हुसनाल जी की पत्नी, जिनको मैं बड़ी बहन बोलती हूँ सम्मान के साथ, उन्होंने भी फ़िल्म में गीत गाया है। मुझे जितना याद है फ़िल्म 'चाकलेट' में उन्होंने गीत गाया था।

सुजॉय - अच्छा! हुस्नलाल जी की पत्नी, यानी कि बागा राम जी की बेटी! यह जो फ़िल्म 'चाकलेट' की बात बतायी आपने, इस फ़िल्म में संगीत था मोहन शर्मा का और गीतकार थे सी. एम. कश्यप। यह १९५० की फ़िल्म थी। अच्छा दादी, गायिकाओं की बात करें तो सुरैया जी के साथ हुस्नलाल-भगतराम के सब से ज़्यादा लोकप्रिय गीत हुए। इस बारे में कुछ कहना चाहेंगी?

गुड्डो दादी - गायिका सुरैया की बहुत इज्ज़त करते थे दोनों। एक दूसरी मशहूर गायिका नें जब अपनी गीतों की 'श्रद्धांजली' सी.डी. बनायी तो उन्होंने हुस्न लाल जी के गीत एक भी नहीं शामिल किये। और आप यकीन नहीं करेंगे कई गायक गायिकाओं नें भी उनकी धुनें चुराकर दूसरे संगीतकारों को दी। गायक महेंदर कपूर जी ने भी गायन की शिक्षा हुसनलाल जी से ली थी।

सुजॉय - अच्छा दादी, आप तो उनके परिवार के करीब थीं, आप बता सकती हैं कि हुस्नलाल जी के निकट के मित्रों में कौन कौन से कलाकार हुआ करते थे?

गुड्डो दादी - गीतकार पंडित सुदर्शन जी, अभिनेता सोहराब मोदी, जयराज सहगल जी, जिल्लो बाई, जुबैदा, बोराल जी, डी एन मधोक, वाई बी चोहान, कारदार साहब, हरबंस, डायरेक्टर मुकंद लाल और बहुत से फिल्म के लोग थे उनकी मित्र मंडली में। एक साल पहले तलत अज़ीज़ से फोन पर बात हुई थी हुस्नलाल जी के विषय में, उनके मुख से यही निकला कि चित्रमय संसार में हम उन्हें बहुत याद करते हैं, और बहुत नाम है उनका | कभी कहते भी थे आपके बनाये हुए गीत फलाना फिल्म में बज रहे है, तो उनके मुख से यही निकलता था बजने दो मेरे मन को बहुत शान्ति मिलती है, यहीं सभी कुछ छोड़ जाना है, सभी कुछ!

सुजॉय - हुस्नलाल जी के अंतिम दिनों के बारे में आप कुछ बता सकती हैं?

गुड्डो दादी - उनके अंतिम दिन बहुत ही खराब व दयनीय दशा में निकले। आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। लेकिन किसी के आगे अपना हाथ नहीं फैलाया। कुछ भी हो सुबह के वक़्त सैर अवश्य करने जाते थे। और एक दिन सुबह दिल्ली के ताल कटोरा बाग में दिल की धडकन रूकने से वहीं उनका देहांत हो गया। धुन बनाने वाले, चुराने वाले, गाने वाले, कोई भी कुछ नहीं ले गया, सब कुछ यहीं रह गया, फिल्म 'मेला' का गीत "ये जिंदगी के मेले" दरअसल फिल्म 'मोती महल' का गीत था "जाएगा जब यहाँ से कुछ भी ना साथ होगा"।

सुजॉय - वाक़ई दिल उदास जाता है ऐसे शब्द सुन कर। अच्छा दादी, चलते चलते आप अपनी पसंद का कोई गीत पंडित हुस्नलाल-भगतराम जी का सुनवाना चाहेंगे हमारे श्रोताओं को?

गुड्डो दादी - "वो पास रहे या दूर रहे नज़रों में समाये रहते हैं"

सुजॉय - वाह! आइए सुना जाये यह गीत सुरैया की आवाज़ में, फ़िल्म 'बड़ी बहन' का यह गीत है, क़मर जलालाबादी के बोल और यह वर्ष १९४९ की तस्वीर है।

गीत - वो पास रहे या दूर रहे (बड़ी बहन)


सुजॉय - दादी, आपका बहुत बहुत शुक्रिया, बागा राम जी और हुस्नलाल जी के जीवन और संगीत सफ़र के बारे में युं तो किताबों और पत्रिकाओं से जानकारी प्राप्त की जा सकती है, लेकिन आपनें जो बातें हमें बताईं, वो सब कहीं और से प्राप्त नहीं हो सकती थी। यह हमारा सौभाग्य है आप से बातचीत करना। आगे भी हम आप से सम्पर्क बनाये रखेंगे, आप भी 'आवाज़' पर हाज़िरी लगाते रहिएगा, बहुत बहुत शुक्रिया, नमस्कार!

गुड्डो दादी - मेरी तरफ़ से आप को बहुत बहुत आशिर्वाद और धन्यवाद!

Saturday, September 25, 2010

ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने - लता विशेषांक

'ओल्ड इज़ गोल्ड' शनिवार विशेष में आप सभी का हार्दिक स्वागत है। इन दिनों इस साप्ताहिक स्तंभ में हम लेकर आ रहे हैं आप ही के ईमेलों पर आधारित 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने'। जैसा कि आप सब जानते ही हैं कि २८ सितंबर को सुर कोकिला लता मंगेशकर का जन्मदिन है। लता जी को जनमदिन की बधाई और शुभकामना स्वरूप आज के इस अंक के लिए हम लेकर आये हैं एक विशेष प्रस्तुति जिसे हमने तैयार किया है हमारे दो साथियों के ईमेलों के आधार पर। और ये दो साथी हैं हमारी प्यारी गुड्डो दादी, और हमारी एक नई दोस्त अनीता निहालानी, जो ईमेल के माध्यम से कुछ ही दिन पहले हमसे जुड़ी हैं।

तो आइए सब से पहले पढ़ें कि गुड्डो दादी का क्या कहना है लता जी के बारे में।

सुजॉय बेटा

चिरंजीव भवः

सुर-साम्राज्ञी, भारत की बगिया की कोकिला, लता जी को जन्मदिवस की शुभ मंगल कामनाएँ। १९४७ में संगीतकार पंडित हुस्नलाल जी के घर मिली थी परिवार के साथ। फिर लता जी को शायद १९९० में शिकागो में मिली थी, दो मिनट ही बात हो सकी। सफ़ेद साड़ी लाल बोर्डर के सादे परिधान में बहुत ही सुंदर लग रही थी। स्वर साधना की देवी से मैंने यही पूछा की आप जूते पहन के स्टेज पर क्यों नहीं जातीं, तो यही बोली कि संगीत को नमस्कार मान सम्मान है और मेरे मुख से यही निकला की आपके गीतों का जादू सर पर चढ़ कर गूंजता है, बोलता है, तो मुस्करा दीं। दादी को इतना ही याद है। लता जी का एक गीत फ़िल्म 'महल' का "आएगा आनेवाला" प्रतिदिन सुनती हूँ।

आशीर्वाद के साथ
आपकी गुड्डोदादी
चिकागो से

तो दादी, क्योंकि फ़िल्म 'महल' का यह गीत अभी तक हमने 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर शामिल नहीं किया है, तो आइए आज आप की इस मनपसंद गीत को यहाँ सुना जाए। जे. नक्शब के बोल और खेमचंद प्रकाश का संगीत।

गीत - आयेगा आनेवाला (महल)


और अब हम आते हैं अनीता निहालानी जी के ईमेलों पर। जी हाँ, इनके दो ईमेल हमें मिले हैं। एक में इन्होंने लता जी पर एक बहुत ही सुंदर कविता लिख कर भेजी हैं, और दूसरे में लता जी के गाये एक गीत से जुड़ी अपनी यादों को लिख भेज है। तो आइए पहले अनीता जी की लिखी कविता का आनंद लिया जाए।


अनीता जी के साथ साथ हम सभी लता जी को जनमदिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ देते हैं। और आइए अब पढ़ें अनीता जी का दूसरा ईमेल।

सुजोय जी,

लता जी के गीत सुनकर हम बड़े हुए, उन दिनों रेडियो पर दिन-रात उनके गीत बजा करते थे, उन्हें जन्म दिन पर बधाई दे सकूं यह मेरे लिये सौभाग्य की बात है। २५ सितम्बर का मुझे इंतजार रहेगा।

अब रही यादों की बात....तो बात लगभग २६-२७ साल पुरानी है। उस दिन आकाश में मेघ छाए थे, अत्यंत शीतल पवन बह रहा था। मेरे विवाह की बात चल रही थी, खबर आयी भावी पतिदेव को एक साल की ट्रेनिंग के लिये असम जाना है, उससे पहले वे लोग मंगनी की रस्म कर लेना चाहते हैं। जुलाई का महीना था, उन्हें सुबह किसी वक्त पहुंचना था, मैंने हल्के पीले रंग की साड़ी पहनी थी, घर के बांयी और छोटी सी बगीची थी, पुष्प सज्जा के लिये फूल लेने गयीं तभी हवा और तेज हो गयीं, साड़ी का आंचल लहराता हुआ पेड़ की टहनी में अटक गया, हाथ में एक बांस की टोकरी थी, नीचे पानी था, वर्षा बस थमी भर थी। मन में उत्सुकता थी, सब का असर यह हुआ की मैं गिरने ही वाली थी, यह सब कुछ ही पलों में घटा था, तभी भीतर ट्रांजिस्टर पर यह गीत बज उठा "पल भर में यह क्या हो गया...", मैं खुद को सम्भालूँ, इसके पूर्व ही देखा कि मेरे भावी पतिदेव अपने माता-पिता के साथ प्रवेश कर रहे हैं, मैंने घबराते हुए साड़ी का पल्लू छुडाने का प्रयास किया कि टोकरी से फूल नीचे गिर गए, तभी उन्होंने आकर फूल उठाये और मुझे अंदर ले गए, गीत बज रहा था... मैं वह गयीं वह दिल गया....प्यार से तुम बुलाना....आज इतने वर्षों बाद भी जब यह गीत बजता है वह बारिश, हवा और फूल मुझे सिहरा जाते हैं...

अनिता


वाह अनीता जी, सचमुच कुछ गीत हमारे जीवन के साथ ऐसे जुड़ जाते हैं कि फिर जब भी ये गीत कहीं से सुनाई दे जाए तो जैसे एक सिहरन सी दौड़ जाती है तन मन में। आइए आप के इस पसंदीदा गीत का आनंद लें लता जी की आवाज़ में, फ़िल्म 'स्वामी', गीतकार अमित खन्ना और संगीतकार राजेश रोशन।

गीत - पल भर में यह क्या हो गया (स्वामी)


तो ये था इस सप्ताह का 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने' जिसे हमने प्रस्तुत किया लता जी को उनके जनमदिन की बधाई स्वरूप। इस अंक के लिए हम ख़ास तौर से गुड्डो दादी और अनीता निहालानी जी का तहे दिल से शुक्रिया अदा करते हैं जिन्होंने िस अंक के लिए हमें अपना सहयोग दिया। तो अब आज के लिए इजाज़त दीजिए, कल फिर मुलाक़ात होगी 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नियमीत अंक में। ज़रूर पधारिएगा, नमस्कार!

Saturday, July 31, 2010

'ओल्ड इज़ गोल्ड' - ई-मेल के बहाने यादों के ख़ज़ानें - ०१

नमस्कार दोस्तों! आज आप मुझे यहाँ 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के स्तंभ में देख कर हैरान ज़रूर हो रहे होंगे कि भई शनिवार को तो 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की महफ़िल नहीं सजती है, तो फिर यह व्यतिक्रम कैसा! है न? दरअसल बात कुछ ऐसी है कि जब से हमने 'ओल इज़ गोल्ड' को दैनिक स्तंभ से बदल कर सप्ताह में पाँच दिन कर दिए हैं, हम से कई लोगों ने समय समय पर इसे फिर से दैनिक कर देने का अनुरोध किया है। हमारे लिए यह आसान तो नहीं था, क्योंकि अपनी रोज़-मर्रा की व्यस्त ज़िंदगी से समय निकाल कर ऐसा करना ज़रा मुश्किल सा हो रहा था, लेकिन आप सब के आग्रह और 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में आपकी दिलचस्पी को हम नज़रंदाज़ भी तो नहीं कर सकते थे। इसलिए हमें एक नई बात सूझी। और वह यह कि कम से कम शनिवार को हम 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की महफ़िल सजाएँगे ज़रूर, लेकिन उस स्वरूप में नहीं जिस स्वरूप में रविवार से गुरुवार तक सजाते हैं। बल्कि क्यों ना कुछ अलग हट के किया जाए इसमें। नतीजा यह निकला कि आज से सम्भवत: हर शनिवार की शाम यह ख़ास महफ़िल सजेगी, जो कहलाएगी 'ओल्ड इज़ गोल्ड - ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ानें'।

'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने' एक तरह से 'ओल्ड इज़ गोल्ड' का साप्ताहिक विशेषांक होगा जिसमें बातें होंगी आपकी, आपके मनपसंद गीतों की, उनसे जुड़ी हुई आपकी यादों की। इसके अलावा आप पुराने फ़िल्मों और फ़िल्मी गीतों के बारे में जो भी विचार रखना चाहें इस विशेषांक के लिए भेज सकते हैं। इस स्तंभ में आगे चलकर हम पुराने फ़िल्मी गीतों से जुड़े पहलुयों पर बहस भी करेंगे जैसे कि डिबेट में होता है, और भी कई नई चीज़ें शामिल होंगी इन विशेषांकों में। तो आपको बस इतना करना होगा कि अपने विचार, अपने पसंद के गानें और उनसे जुड़ी बातें और यादें, या फिर फ़िल्म-संगीत से जुड़ी आपका कोई भी अनुभव या संस्मरण या फ़ोटो हमारे ईमेल पते oig@hindyugm.com पर लिख भेजना होगा, और हम उन्हे पेश करेंगे 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के इस ख़ास अलबेले, सजीले, सुरीले विशेषांक में जिसका नाम है 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ानें'।

यह तो थी इस विशेषांक के स्वरूप और नियमों की जानकारी। तो आइए अब शुरु किया जाए 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने' की पहली कड़ी। आज का यह अंक रोशन है हमारे 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के एक वरिष्ठ श्रोता व पाठिका की यादों के उजालों से। आप हैं हम सब की प्यारी गुड्डो दादी, जो रहती हैं अमरीका के शिकागो शहर में। गुड्डो दादी ने समय समय पर हमें टेलीफ़ोन कर और ईमेल के ज़रिए हमारा हौसला बढ़ाया है, हमारी तारीफ़ें की हैं, और अपनी स्नेहाशीष दी है। दादी से हमें पता चला कि गुज़रे ज़माने के कई फ़िल्मी कलाकारों से उनके परिवार का संबंध रहा है। उनके और उनके परिवार की कई तस्वीरें भी हैं जिनमें फ़िल्म जगत के नामचीन हस्तियों के चेहरे नज़र आ जाते हैं। ऐसी ही एक तस्वीर उन्होने हमें भेजी हैं जिसमें वो नज़र आ रही हैं गायिका सुरिंदर कौर के एक कार्यक्रम का आनंद उठाते हुए.


दरअसल हुआ युं था कि जब हमने 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में 'दुर्लभ दस' के अंतर्गत सुरिंदर कौर का गाया फ़िल्म 'नदिया के पार' का गीत सुनवाया था "अखियाँ मिलाके अखियाँ", उसे सुन कर दादी की उस ज़माने की यादें ताज़ा हो गईं, और ईमेल के माध्यम से उन्होने अपने विचार कुछ इस तरह से व्यक्त किये - "आपके पास तो कुबेर का ख़ज़ाना है। सुरिंदर कौर जी का गीत सुनवाकर कहाँ पहुँचा दिया सितारों से आगे! सुरिंदर कौर जी का शो १९६७ में दिल्ली के रिज़र्व बैंक के आगे जिसका चित्र भी भेज रही हूँ। १९५२ से जानती हूँ सुरिंदर कौर जी को और उनकी बहन प्रकाश कौर जी को। इस चित्र में साथ में बेटी है और दूसरी ओर मुंह किये बेटा बैठा है।" दोस्तों, क्योंकि यह अंक यादों के ख़ज़ाने को और ज़्यादा समृद्ध करने का है, और गुड्डो दादी की यादें हम अनुभव कर रहे हैं जो रहती हैं अमरीका में, तो क्यों ना सुरिंदर कौर के गानें किस तरह से 'वॊयस ऒफ़ अमेरिका' पर बजाया गया था ३१ दिसंबर १९९२ को, उसका एक ज़िक्र यहाँ पेश किया जाए। यह जानकारी हमने प्राप्त की है 'लिस्नर्स बुलेटिन' के अंक-९१ से जो प्रकाशित हुआ था मार्च १९९३ में। रेडियो सीलोन पर १५-१६ वर्षों तक कार्य करने के बाद १९८४-८५ से Voice of America (VOA), वाशिंगटन में कार्यरत श्रीमती विजयलक्ष्मी डिसेरम एक अनोखी उद्‍घोषिका हैं। वे 'मनोरंजन' एवं 'संगीतकार' कार्यक्रमों में अक्सर हिंदी फ़िल्मों के गायकों, संगीतकारों, निर्माता-निर्देशकों, आदि पर प्रोग्राम पेश करती आईं हैं। ३१ दिसंबर १९९२ को इन्होंने गायिका सुरिंदर कौर के गाए हमेशा जवान गीतों को लेकर एक आकर्षक कार्यक्रम पेश किया था। गायिका के बारे में उन्होंने संगीतकार एस. मोहिंदर तथा 'हिंदी फ़िल्म गीत कोश' के संकलक हर मंदिर सिंह 'हमराज़' के विचार प्रस्तुत कर प्रोग्राम में चार चांद लगा दिए। गायिका सुरिंदर कौर के बारे में नई जानकारी देते हुए 'हमराज़' साहब ने बताया कि उनका गाया प्रथम गीत "इतने दूर है हुज़ूर, कैसे मुलाक़ात हो" (फ़िल्म- प्यार की जीत, '४९) था, न कि "बदनाम ना हो जाए मोहब्बत का फ़साना" (फ़िल्म- शहीद, '४९)। दरअसल 'प्यार की जीत' के लिए ही उन्होंने सब से पहले गीत गाए थे लेकिन उसी वर्ष निर्मित 'शहीद' (जिसमें उन्होंने बाद में गीत गाए) पहले रिलीज़ हो जाने के कारण यह भान्ति पैदा हो गई थी। तो दोस्तों, आइए आज के इस विशेषांक में सुना जाए सुरिंदर कौर की आवाज़ में फ़िल्म 'शहीद' के उसी हिट गीत को जिसके बोल हैं "बदनाम ना हो जाए मोहब्बत का फ़साना"।



तो ये था आज का 'ओल्ड इज़ गोल्ड - ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने' जिसमें हमने गुड्डो दादी की यादों का सहारा लेकर गायिका सुरिंदर कौर को याद किया।

और अब एक सूचना: १४ अगस्त शनिवार को स्वतंत्रता दिवस की पूर्वसंध्या पर 'ओल्ड इज़ गोल्ड - ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ानें' में हम चढ़ाएँगे देश भक्ति रंग। आपको इतना करना है कि इस ख़ास दिन से जुड़ी अपने बचपन की यादों को हमारे साथ बांटिए। कैसे मनाया करते थे इस पर्व को? बचपन में कौन कौन सी देश भक्ति और बच्चों की फ़िल्में देखी है आपने? कौन सा देश भक्ति गीत आपको सब से ज़्यादा पसंद है? देश भक्ति और देश भक्ति फ़िल्मों और गीतों से जुड़ी कोई भी याद, कोई भी संस्मरण आप हमें oig@hindyugm.com के पते पर लिख भेजिए अगले ७ दिनों के अंदर। आपकी यादों को हम पूरी दुनिया के साथ बांटेंगे १४ अगस्त की शाम।

अब आज के लिए इजाज़त दीजिए, कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नियमित अंक के साथ पुन: हाज़िर होंगे। मोहम्मद रफ़ी साहब को उनकी पुण्यतिथि पर श्रद्धा सुमन अर्पित हुए और यह भी बताते हुए कि कल के अंक में आप रफ़ी साहब की ही आवाज़ सुनेंगे, आपसे आज विदा ले रहे हैं, नमस्कार!



प्रस्तुति: सुजॊय चटर्जी

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