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Saturday, April 8, 2017

चित्रकथा - 13: हिन्दी फ़िल्मों में किशोरी अमोनकर


अंक - 13

हिन्दी फ़िल्मों में किशोरी अमोनकर

"मेघा झर झर बरसत रे..." 



’रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। समूचे विश्व में मनोरंजन का सर्वाधिक लोकप्रिय माध्यम सिनेमा रहा है और भारत कोई व्यतिक्रम नहीं। बीसवीं सदी के चौथे दशक से सवाक् फ़िल्मों की जो परम्परा शुरु हुई थी, वह आज तक जारी है और इसकी लोकप्रियता निरन्तर बढ़ती ही चली जा रही है। और हमारे यहाँ सिनेमा के साथ-साथ सिने-संगीत भी ताल से ताल मिला कर फलती-फूलती चली आई है। सिनेमा और सिने-संगीत, दोनो ही आज हमारी ज़िन्दगी के अभिन्न अंग बन चुके हैं। ’चित्रकथा’ एक ऐसा स्तंभ है जिसमें बातें होंगी चित्रपट की और चित्रपट-संगीत की। फ़िल्म और फ़िल्म-संगीत से जुड़े विषयों से सुसज्जित इस पाठ्य स्तंभ में आपका हार्दिक स्वागत है। 


पिछले सोमवार दिनांक 3 अप्रैल 2017 को शास्त्रीय संगीत की सुप्रसिद्ध गायिका पद्मविभूशण किशोरी अमोनकर (आमोणकर) का 84 वर्ष की आयु में देहावसन हो जाने से हिन्दुस्तानी शास्त्रीय गायन जगत को गहरी हानी पहुँची है। शास्त्रीय संगीत जगत में किशोरी जी का जो स्थान रिक्त हुआ है, उसकी पूर्ति हो पाना असंभव है। संयोग से आगामी सोमवार 10 अप्रैल को किशोरी जी का जन्मदिवस है। आइए आज ’चित्रकथा’ में स्वर्गीया किशोरी अमोनकर जी को श्रद्धा-सुमन अर्पित करें उनकी गाई उन रचनाओं को याद करते हुए जिन्होंने फ़िल्म-संगीत के धरोहर को समृद्ध किया है।



किशोरी अमोनकर (10 अप्रैल 1932 - 3 अप्रैल 2017)

फ़िल्म-संगीत के धरोहर को समृद्ध करने में जितना योगदान फ़िल्मी गायक-गायिकाओं का है, उतना ही योगदान उन शास्त्रीय-संगीत जगत के गायक-गायिकाओं का भी है जिन्होंने अपनी गिनी-चुनी रचनाओं से ना केवल रसिकों के दिलों में रस घोला है बल्कि फ़िल्म-संगीत का स्तर बहुत ऊँचा कर दिया है। शास्त्रीय गायिकाओं में शोभा गुर्टू, बेगम परवीन सुल्ताना, लक्ष्मी शंकर, सरस्वती राणे, हीरा देवी मिश्र के साथ-साथ किशोरी अमोनकर का नाम सम्मान के साथ लिया जाता है। भले किशोरी जी ने केवल दो फ़िल्मों में अपनी आवाज़ दी है, लेकिन उनकी गाई हुई ये चन्द रचनाएँ किसी ख़ज़ाने से कम नहीं। इन फ़िल्मों के गीतों की चर्चा शुरु करने से पहले कुछ ग़लतफ़हमियों को दूर करना बहुत ज़रूरी है। जहाँ इन्टरनेट से हमें बहुत सी जानकारियाँ मिलती है, वहीं ग़लत जानकारियों का भण्डार भी है इन्टरनेट। कई जगहों पर यह लिखा हुआ मिलता है कि किशोरी अमोनकर ने पहली बार 1946 की फ़िल्म ’पृथ्वीराज संयोगिता’ में गीत गाए हैं जो कि ग़लत है। यह सच है कि 1933 की इसी शीर्षक से बनी फ़िल्म में "किशोरी" नामक गायिका के गाए कुछ गीत हैं, लेकिन ये किशोरी अमोनकर नहीं बल्कि किशोरी पाठक हैं। एक और ग़लत धारणा है कि 1952 की फ़िल्म ’सिस्कियाँ’ में भी किशोरी जी ने गीत गाए हैं। ये दरसल "किशोरी" नामक किसी अन्य गायिका की आवाज़ में हैं और यह फ़िल्म कभी प्रदर्शित नहीं हुई।

10 अप्रैल 1932 को बम्बई में जन्मीं किशोरी अमोनकर ने संगीत की पहली शिक्षा अपनी माँ मोगुबाई कुर्डिकर से ली जो जयपुर-अतरौली घराने की जानीमानी गायिका थीं। साथ ही भिंडीबाज़ार घराने के अंजनी मालपेकर से भी उन्होंने तालीम ली। पारम्परिक रागों में निबद्ध ख़याल गायकी में उन्होंने महरथ हासिल की। भजन और ठुमरी में भी किशोरी अमोनकर का कोई सानी नहीं। एक प्रसिद्ध शास्त्रीय गायिका के रूप में वो 60 के दशक के शुरु में प्रतिष्ठित हुईं। 1964 में वी. शान्ताराम एक नृत्यप्रधान फ़िल्म बना रहे थे ’गीत गाया पत्थरों ने’। अपनी पुत्री राजश्री और अभिनेत्र जीतेन्द्र को उन्होंने इस फ़िल्म में लौन्च किया। ’झनक झनक पायल बाजे’ में एक से बढ़ कर एक शास्त्रीय-संगीत जगत के फ़नकारों के द्वारा फ़िल्म के गीतों को सजाने के बाद ’गीत गाया पत्थरों ने’ के शीर्षक गीत के लिए उन्होंने किशोरी अमोनकर को चुना। उन दिनों फ़िल्म-संगीत अपने पूरे शबाब पर थी। हर गायिका की तरह किशोरी के मन में भी फ़िल्म में गाने की इच्छा जागृत हुई। उनकी माँ और गुरुजी ने उन्हें समझाया कि उनके परिवार के लिए गीत-संगीत व्यवसाय नहीं बल्कि साधना है और इसलिए उन्हें फ़िल्मी गायन से दूर रहना चाहिए। पर किशोरी की तीव्र इच्छा थी फ़िल्म में गाने की। इसलिए उन्होंने अपनी माँ और गुरुजी के सुझाव को नज़रंदाज़ कर वी. शान्ताराम की फ़िल्म में मिले मौके को हाथोंहाथ ग्रहण कर लिया। 

राजश्री का सुन्दर नृत्य और उस पर किशोरी अमोनकर की मनमोहक आवाज़, असर तो होना ही था। हसरत जयपुरी के लिखे और कमचर्चित संगीतकार रामलाल द्वारा स्वरबद्ध इस गीत के दो संस्करण थे। एक तो किशोरी जी का गाया एकल, और दूसरा संस्करण एक युगल गीत था आशा भोसले और महेन्द्र कपूर की आवाज़ों में। जब इन दो संस्करणों में त्लनात्मक समीक्षा हुई तब किशोरी अमोनकर के गाए संस्करण को दिग्गजों ने ऊँचा स्थान दिया। इस गीत में राग दुर्गा की छाया थी जिसमें किशोरी जी को अपनी स्वरभाषा के ज्ञान को शब्दभाषा में ढालना था। बेहद ख़ूबसूरती के साथ फ़िल्म का यह शीर्षक गीत "गीत गाया पत्थरों ने..." उन्होंने गाया जो 1965 के बिनाका गीतमाला के वार्षिक कार्यक्रम के दसवें पायदान का सर्वाधिक लोकप्रिय गीत बना। इस कामयाबी के बावजूद किशोरी अमोनकर ने फ़िल्म जगत से अपने सारे रिश्ते समाप्त करने का निर्णय लिया। इसके दो कारण थे। पहला कारण यह था कि जब ’गीत गाया पत्थरों ने’ गीत कामयाब हुई, तब उनकी माँ ने उन्हें चेतावनी दे दी कि अगर उसने फिर कभी किसी फ़िल्म के लिए गाया तो वो उसे अपने दो तानपुरों को छूने तक नहीं देंगी। किशोरी जी को अपनी ग़लती का अहसास हुआ। लेकिन सिर्फ़ यही एक कारण नहीं था फ़िल्म जगत से मुंह मोड़ने का। जैसा कि हम सभी जानते हैं उन दिनों फ़िल्म जगत में लौबी हुआ करती थी। जानेमाने संगीत इतिहासकार वामनराव हरि देशपाण्डे ने एक लेख में लिखा है कि किशोरी और उनकी माँ का इस फ़िल्म में गाने को लेकर कड़वा अनुभव रहा जब उन्होंने इस गीत के ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड्स को सभी दुकानों से यकायक ग़ायब होते हुए देखा। वैसे भी वो फ़िल्मी गायन के क्षेत्र में नहीं रहतीं, लेकिन कुछ प्रभावशाली लोगों द्वारा उन्हें अलग-थलग करने की साज़िश ने उनके दिल को बहुत ज़ोर का ठेस पहुँचाया। शक़ की उंगली लता मंगेशकर की तरफ़ उठी, पर सबूत के अभाव में इसकी पुष्टि कभी नहीं हो सकी। लेकिन ऐसा कई गायिकाओं के साथ हो चुका है। इस फ़िल्म के बाद किशोरी अमोनकर ने अपना पूरा ध्यान शास्त्रीय संगीत में लगा दिया और दिन दुगुनी रात चौगुनी उन्नति करती चली गईं। 

’गीत गाया पत्थरों ने’ बनने के 26 वर्ष बाद किशोरी अमोनकर फिर एक बार फ़िल्म जगत में क़दम रखे। इस बार फ़िल्मकार थे गोविन्द निहलानी। 1982 की अपनी फ़िल्म ’विजेता’ में शास्त्रीय संगीत का प्रयोग करने वाले गोविन्द निहलानी ने 1990 में अपनी फ़िल्म ’दृष्टि’ के लिए एक शास्त्रीय गायिका की आवाज़ लेने की सोच रहे थे। उन्हीं के शब्दों में यह फ़िल्म ग्यारह आंदोलनों में बनाया गया था और हर एक आन्दोलन के लिए एक सांकेतिक गीत था। इसके लिए उन्होंने किशोरी अमोनकर से गीत और आलाप गवाने का निर्णय लिया। लेकिन अमोनकर तो फ़िल्मों से दूर जा चुकी थीं। गोविन्द निहलानी ने जब उन्हें फ़िल्म की कहानी सुनाई और यह भी कहा कि वो अपने गीत ख़ुद कम्पोज़ कर सकती हैं, तब किशोरी अमोनकर को कहानी भी पसन्द आई और ख़ुद के रचे गीतों को गाने की बात से ख़ुश होकर फ़िल्म स्वीकार कर ली। फ़िल्म की कहानी में वैवाहिक विवाद और एक्स्ट्रामैरिटल अफ़ेअर्स के प्रसंगों को सुन कर अमोनकर ने निहलानी के सामने यह शर्त रख दी कि उनके किसी भी गीत को प्रेम-संपादन (lovemaking) दृश्य के पार्श्व में नहीं रखा जाएगा। उनकी सारी शर्तों तो निहलानी मान गए। अमोनकर जुट गईं फ़िल्म की धुनों को तैयार करने में। गीतों के लिए बोल थे वसन्त देव ने जिन्होंने ’उत्सव’ फ़िल्म में कई सुन्दर गीत लिखे थे। किशोरी अमोनकर के लिए इस फ़िल्म में संगीत देना एक बड़ी चुनौती थी। इसका मुख्य कारण था उनके जयपुर घराने के शैली का अनम्य या दृढ़ होना। ताल, अलंकार और स्वरूप, सभी बहुत दृढ़ होते हैं इस घराने के। ऐसे में एक फ़िल्मी संगीतकार न होते हुए अपने संगीत को फ़िल्म के संगीत के लिए ढाल पाना आसान काम नहीं था। और फिर समय की भी सीमा थी।

’दृष्टि’ फ़िल्म में तीन गीत और तीन आलाप थे। पहला गीत "मेघा झर झर बरसत रे..." को किशोरी अमोनकर ने राग मलहार की शैली में स्वरबद्ध किया है। गीत के बीच बीच में आलाप बेहद सुन्दर बन पड़े हैं। यूं तो इस फ़िल्म में कई आलाप उन्होंने गाए हैं जिनका प्रयोग पाश्वसंगीत के रूप में किया गया है, लेकिन इस गीत के भीतर गाए हुए आलाप बेहद सुन्दर हैं। ऐसे ही एक आलाप का प्रयोग गोविन्द निहलानी ने एक लम्बे प्रेम-संपादन वाले दृश्य के लिए कर लिया और किशोरी अमोनकर को दिए अपने वादे से मूकर गए। फ़िल्म के रिलीज़ होने के बाद जब किशोरी जी ने फ़िल्म देखी तो उन्हें ज़बरदस्त झटका लगा। उनकी माँ ग़ुस्से से आग-बबूला हो गईं। अमोनकर ने अन्तिम फ़ैसला ले लिया अब चाहे कुछ भी हो जाए, वो फ़िल्म जगत फिर कभी वापस नहीं आएँगी। फ़िल्म की दूसरी रचना थी रघुनन्दन पांशिकर के साथ गाया उनका युगल गीत "सावनिया संझा में अंबर झर आई, का चाल चलत काम राधा भरमाई"। यह भी वर्षा का गीत है। इस गीत को मुख्य रूप से रघुनन्दन जी ने ही गाया है जबकि किशोरी जी की आवाज़ आलापों में सुनाई देती है। रघुनन्दन मराठी मंच के प्रसिद्ध अभिनेता प्रभाकर पांशिकर के पुत्र हैं। 11 वर्ष की आयु में उन्होंने संगीत की विधिवत शिक्षा लेनी शुरु कर दी थी। पंडित वसन्तराव कुलकर्णी से शुरुआती तालीम लेने के बाद उन्होंने जयपुर-अतरौली घराने की विधिवत तालीम किशोरी अमोनकर से लेनी शुरु की। अगले 17 वर्षों तक वो किशोरी जी के शिष्य बने रहे और उन्हीं की निगरानी में संगीत की सेवा करते रहे। इस तरह से जब ’दृष्टि’ में एक शास्त्रीय युवा गायक (इरफ़ान ख़ान) के पार्श्वगायन के लिए एक पुरुष आवाज़ की ज़रूरत पड़ी तो किशोरी जी ने अपने शिष्य को गाने का मौक़ा दिया और इस तरह से गुरु-शिष्य की जोड़ी ने गीत-संगीत का ऐसा समा बाँधा कि यह गीत फ़िल्म-संगीत के ख़ज़ाने का एक अनमोल नगीना बन गया।

’दृष्टि’ फ़िल्म का समापन फ़िल्म के नायक निखिल (शेखर कपूर) और नायिका संध्या (डिम्पल कापड़िया) के समुन्दर के किनारे बैठे हुए एक दृश्य से होता है जिसमें निखिल संध्या से पूछ रहे हैं कि उनके रिश्ते में आख़िर दिक्कत क्या थी जो एक दूसरे से इतना दूर कर दिया। समुन्दर किनारे बैठे वो बारिश का आनन्द ले रहे हैं और पार्श्व में चार अन्तरों का एक गीत चल रहा है। गीत के बोल इशारा कर रहे हैं कि वो एक दूसरे के साथ पुनर्मिलन के लिए तैयार हैं। यह संवाद के माध्यम से बोला नहीं जाता, लेकिन समाप्ति का यह गीत इसी तरफ़ इशारा कर रहा है। इस अन्तिम गीत के बोल हैं "एक ही संग हुते जो हम और तुम काहे बिछुड़ा रे" जिसे सुनते हुए हमें "ज्योति कलश छलके" गीत की याद आ जाती है। वैसे "ज्योति कलश छलके" राग देशकर पर आधारित है। किशोरी जी की आवाज़ में चार अन्तरों का यह गीत राग भूपाली पर आधारित है। इस गीत को छोटा ख़याल (अविलम्बित ख़याल) भी कहा जा सकता है। फ़िल्म के मुख्य भाव को उजागर करता यह गीत किशोरी अमोनकर के दिलकश आलापों और संगीत के तालों से सुसज्जित होकर जैसे रसों और भावनाओं का संचार कर रहे हों। वसन्त देव के छोटे-छोटे बोल गीत की सुन्दरता पे चार चाँद लगाते हैं। इस गीत से फ़िल्म समाप्त होता है। वैसे इसी गीत का एक और संस्करण भी है जिसमें किसी साज़ का प्रयोग नहीं हुआ है। निखिल और संध्या के एक दूसरे से अलग होने वाले दृ्श्य के बाद यह संस्करण पार्श्व में बजता है। जैसा कि ’गीत गाया पत्थरों ने’ फ़िल्म के गीत के बाद किशोरी जी ने कहा कि उन्होंने अपने स्वरभाषा को शब्दभाषा के साथ मिलाया है, इस गीत में भी वही प्रयोग सुनाई देता है। गीत का करुण रस किशोरी अमोनकर के स्वरभाषा से पूर्णता को प्राप्त करता है।


किशोरी अमोनकर ने केवल दो फ़िल्मों में अपनी आवाज़ दी और एक फ़िल्म में संगीत दिया। हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के लौहस्तंभ किशोरी अमोनकर का इन दो फ़िल्मों में योगदान कला की दृष्टि से अद्वितीय है, अतुलनीय है। फ़िल्म जगत हमेशा ॠणी रहेगी उनकी जिन्होंने अपनी पारस प्रतिभा से इन दोनों फ़िल्मों के संगीत को स्वर्णिम बना दिया। किशोरी अमोनकर भले एक फ़िल्मी पार्श्वगायिका नहीं थीं, लेकिन बस इन चार गीतों के माध्यम से उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि उनका मुकाम फ़िल्मी पार्श्वगायिकाओं से बहुत उपर है।



आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!




शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Sunday, May 31, 2009

तेरे ख्यालों में हम...तेरी ही बाहों में हम... डुबो देती है आशा अपनी आवाज़ में इस गीत के सुननेवालों को

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 97

दोस्तों, अभी कुछ दिन पहले हमने आपको वी.शांताराम की फ़िल्म 'नवरंग' का गीत सुनवाया था "तू छूपी है कहाँ, मैं तड़पता यहाँ" और बताया था कि इस गीत को रामलाल चौधरी की शहनाई के लिए भी याद किया जाता है। आज का 'ओल्ड इज़ गोल्ड' भी रामलाल के संगीत से जुड़ा हुआ है मगर बतौर शहनाई वादक नहीं बल्कि बतौर संगीतकार। रामलाल भले ही साज़िंदे और सहायक के रूप में ज़्यादा जाने जाते हैं, उन्होने दो-चार फ़िल्मों में संगीत भी दिया है, और उन्ही में से एक मशहूर फ़िल्म का एक गीत लेकर हम आज उपस्थित हुए हैं। इससे पहले कि आपको उस फ़िल्म और उस गीत के बारे में बतायें, रामलाल से जुड़ी कुछ बातें आपको बताना चाहेंगे। बतौर स्वतंत्र संगीतकार रामलाल को पहला मौका दिया था फ़िल्मकार पी. एल. संतोषी ने। साल था १९५० और फ़िल्म थी 'तांगावाला'। राज कपूर और वैजयंतीमाला अभिनीत इस फ़िल्म के कुल ६ गानें रामलाल बना चुके थे लेकिन दुर्भाग्यवश फ़िल्म आगे बनी नहीं। और रामलाल एक बार फिर फ़िल्म संगीत जगत में बतौर साज़िंदे बाँसुरी और शहनाई बजाने लगे। इसके बाद सन् १९५२ मे उनके हाथ एक बार फिर संगीतकार बनने का मौका लगा और बाल हरदीप की फ़िल्म 'हुस्नबानो' मे उन्होने संगीत दिया। और फिर उसके बाद आयी वी. शांताराम की ऐसी दो फ़िल्में जिन्होने यह साबित किया कि लोकप्रिय गीत बनाने में रामलाल भी उस दौर के दूसरे सफल संगीतकारों से कुछ कम नहीं थे। पहली फ़िल्म थी 'सेहरा' और दूसरी फ़िल्म थी 'गीत गाया पत्थरों ने'। और इसी दूसरी फ़िल्म का एक गीत आज आपको सुनवाया जा रहा है।

'गीत गाया पत्थरों ने' फ़िल्म आयी थी सन् १९६४ मे। इसमे शांतारामजी ने अपनी बेटी राजश्री को लौन्च किया था नवोदित नायक जीतेन्द्र के साथ। आज यह फ़िल्म याद की जाती है तो इसके गीत संगीत की वजह से। मुख्य रूप से आशा भोंसले और महेन्द्र कपूर की आवाज़ें सुनाई दी इस फ़िल्म के गीतों में ठीक 'नवरंग' के गीतों की तरह, लेकिन दो ख़ास आवाज़ें भी थीं इस फ़िल्म में। एक तो था सुविख्यात शास्त्रीय गायिका किशोरी अमोनकर की आवाज़ में फ़िल्म का शीर्षक गीत, और दो गीत थे गायक सी. एच. आत्मा की आवाज़ में। बहुत सालों के बाद आत्माजी की आवाज़ एक बार फिर से सुनाई दी और उनकी आवाज़ को सुनकर ऐसा लगा कि जैसे सहगल साहब भी फिर से वापस आ गए हों। बहरहाल आज हम 'गीत गाया पत्थरों ने' फ़िल्म का जो गीत चुना है उसे आशा भोंसले ने गाया है। "तेरे ख़यालों में हम तेरी ही बाहों में हम" एक उत्कृष्ट रचना है फ़िल्म संगीत इतिहास का, इसका श्रेय संगीतकार रामलाल और गायिका आशा भोंसले के साथ साथ गीतकार हसरत जयपुरी को भी जाता है। अफ़सोस की बात यह है कि इस फ़िल्म की कामयाबी के बावजूद रामलाल को किसी ने अपनी फ़िल्म में ख़ास संगीत देने का मौका नहीं दिया। उनके संगीत से सजी दो और फ़िल्में आयीं - 'नक़ाब-पोश' और 'नागलोक' जो नहीं चलीं। इसके बाद रामलाल ने ख़ुद फ़िल्मे बनाने की सोची। 'पन्ना पिक्चर्स' के बैनर तले उन्होने अपने सहभागी के साथ मिलकर 'त्यागी' नामक फ़िल्म का निर्माण शुरु किया, लेकिन उनके सहभागी ने बीच में ही उनका साथ छोड़ दिया जिससे उनको भारी नुकसान उठाना पड़ा। और इसके बाद किसी ने उन्हे फिर फ़िल्म बनाने का मौका ही नहीं दिया। तो दोस्तों, संगीतकार रामलाल की याद में प्रस्तुत है आज का 'ओल्ड इज़ गोल्ड'।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. नूरजहाँ की नशीली आवाज़ का जादू है ये गीत.
२. नौशाद साहब का संगीत है.
३. मुखड़े में शब्द है -"तराना".

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
शरद जी के लिए वाकई ये काफी आसान रहा होगा. मनु जी, और अवनीश जी का भी आभार. स्वप्न मंजूषा जी शायद पहली बार शामिल हुई कल और उन्होंने जवाब भी पूरे विवरण के साथ दिया. स्वागत है मंजूषा जी.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.


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