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Sunday, March 23, 2014

फिल्मों के राग आधारित होली गीत


स्वरगोष्ठी – 160 में आज

रागों के रस-रंग से अभिसिंचित फिल्मों में राधाकृष्ण की होली


‘बिरज में होली खेलत नन्दलाल...’





‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के मंच पर ‘स्वरगोष्ठी’ के एक नए अंक के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, एक बार पुनः आप सब संगीतानुरागियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मित्रों, पिछली कड़ी में अबीर-गुलाल के उड़ते सतरंगी बादलों के बीच सप्तस्वरों के माध्यम से सजाई गई महफिल में आपने धमार के माध्यम से होली के मदमाते परिवेश की सार्थक अनुभूति की है। हम यह चर्चा पहले भी कर चुके हैं कि भारतीय संगीत की सभी शैलियों- शास्त्रीय, उपशास्त्रीय, सुगम, लोक और फिल्म संगीत में फाल्गुनी रस-रंग में पगी रचनाएँ मौजूद हैं, जो हमारा मन मोह लेती हैं। इस श्रृंखला में अब तक हमने फिल्म संगीत के अलावा संगीत की इन सभी शैलियों में से रचनाएँ चुनी हैं। आज के अंक में हम विभिन्न रागों पर आधारित कुछ फिल्मी होली गीत लेकर आपके बीच उपस्थित हुए हैं। आज हम आपको राग काफी, पीलू और भैरवी पर आधारित फिल्मी होली गीत सुनवा रहे हैं। 



सांस्कृतिक दृष्टि से ब्रज की होली और इस अवसर के संगीत-नृत्य की परम्परा विख्यात है। फिल्मों में भी ब्रज की होली के प्रसंग खूब चित्रित हुए हैं। आज के अंक में प्रस्तुत किये जाने वाले तीनों गीत राधाकृष्ण की होली से जुड़े हुए हैं। हमारे संगीत का एक अत्यन्त मनमोहक राग काफी है। इस राग में होली विषयक रचनाएँ खूब मुखर हो जाती हैं। राग काफी पर आधारित एक बेहद आकर्षक गीत 1963 में प्रदर्शित फिल्म ‘गोदान’ से हमने लिया है। यह फिल्म उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचन्द की कालजयी कृति ‘गोदान’ पर आधारित थी। फिल्म के संगीतकार विश्वविख्यात सितार-वादक पण्डित रविशंकर थे। फिल्म के प्रायः सभी गीत रागों और विभिन्न लोक संगीत की शैलियों पर आधारित थे। इन्हीं में एक होली गीत भी था, जिसे गीतकार अनजान ने लिखा और मोहम्मद रफी और साथियों ने स्वर दिया था। यह होली गीत फिल्म में गोबर की भूमिका निभाने वाले अभिनेता महमूद और उनके साथियों पर फिल्माया गया था। इस गीत के माध्यम से परदे पर ग्रामीण होली का परिवेश साकार हुआ था। लोकगीत के स्वरूप में होते हुए भी राग काफी के स्वर-समूह स्पष्ट रूप से परिलक्षित होते हैं। इस श्रृंखला के पिछले अंकों में हम राग काफी के स्वरूप पर विस्तार से चर्चा कर चुके हैं। आइए, हम सब आनन्द लेते है, फिल्म ‘गोदान’ के इस होली गीत का।


फिल्म – गोदान : ‘होली खेलत नन्दलाल बिरज में...’ : संगीत – पं. रविशंकर : मोहम्मद रफी और साथी



यूँ तो राग काफी में होली की रचनाएँ खूब मुखर होती हैं, परन्तु कुछ अन्य राग भी हैं जिनमें रंगों के इस पर्व के परिवेश का अनूठा चित्रण मिलता है। उपशास्त्रीय रचनाओं में प्रायः होली का चित्रण राग देस, खमाज, तिलंग, पीलू आदि में भी मिलता है। 1996 में एक संगीतप्रधान फिल्म ‘सरदारी बेगम’ का प्रदर्शन हुआ था। इस फिल्म में ठुमरी अंग का एक अत्यन्त मोहक गीत शामिल था। संगीतकार वनराज भाटिया ने गीतकार जावेद अख्तर के शब्दों को राग पीलू के स्वरों की चाशनी में डुबो कर और ठुमरी अंग से अलंकृत कर फिल्म में प्रस्तुत किया था। इस गीत में होली के उमंग और उल्लास के साथ-साथ सौम्य भाव भी परिलक्षित होता है। फिल्म में यह गीत आशा भोसले और आरती अंकलीकर की आवाज़ में दो अलग-अलग प्रसंगों में फिल्माया गया है। उपशास्त्रीय गायिका आरती अंकलीकर के स्वरों में आप यह फिल्मी ठुमरी सुनिए और अनुभव कीजिये कि राग पीलू में भी होली के रंग किस खूबी से निखरता हैं।


फिल्म – सरदारी बेगम : ‘मोरे कान्हा जो आए पलट के...’ : संगीत – वनराज भाटिया : आरती अंकलीकर



रंग-रंगीली होली के समापन पर्व पर ‘स्वरगोष्ठी’ की इस विशेष श्रृंखला का समापन हम संगीत के मंचों की परम्परा के अनुसार राग भैरवी की एक ऐतिहासिक महत्त्व की रचना से करेंगे। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम दो दशकों में दिल्ली में ठुमरी के कई गायक और रचनाकार हुए, जिन्होंने इस शैली को समृद्धि प्रदान की। इन्हीं में एक थे गोस्वामी श्रीलाल, जिन्होंने ‘पछाही ठुमरी’ (पश्चिमी ठुमरी) को विकसित किया था। इनका जन्म 1860 में दिल्ली के एक संगीतज्ञ परिवार में हुआ था। संगीत की शिक्षा इन्हें अपने पिता गोस्वामी कीर्तिलाल से प्राप्त हुई थी। ये सितारवादन में भी प्रवीण थे। ‘कुँवरश्याम’ उपनाम से उन्होने अनेक ध्रुवपद, धमार, ख़याल, ठुमरी आदि की रचनाएँ की। इनका संगीत स्वान्तःसुखाय और अपने आराध्य भगवान् श्रीकृष्ण को सुनाने के लिए ही था। जीवन भर इन्होने किशोरीरमण मन्दिर से बाहर कहीं भी अपने संगीत का प्रदर्शन नहीं किया। इनकी ठुमरी रचनाएँ कृष्णलीला प्रधान तथा स्वर, ताल और साहित्य की दृष्टि से अति उत्तम है। राग भैरवी की ठुमरी- ‘बाट चलत नई चुनरी रंग डारी श्याम...’, कुँवरश्याम जी की सुप्रसिद्ध रचना है। उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में भी देवालय संगीत की परम्परा कहीं-कहीं दीख पड़ती थी। संगीतज्ञ कुँवरश्याम इसी परम्परा के संवाहक और पोषक थे। आज हम यही पसिद्ध ठुमरी आपको सुनवाएँगे। राधाकृष्ण की होली के रंगों से सराबोर इस ठुमरी अनेक सुप्रसिद्ध गायकों ने स्वर दिया है। 1953 में प्रदर्शित फिल्म ‘लड़की’ में गायिका गीता दत्त ने और 1957 की फिल्म ‘रानी रूपमती’ में कृष्णराव चोनकर और मुहम्मद रफी ने भी इस ठुमरी को अपना स्वर दिया था। राग भैरवी के स्वरों पर आधारित यह ठुमरी अब हम प्रस्तुत कर रहे है। पार्श्वगायिका गीता दत्त की आवाज़ में फिल्म ‘लड़की’ के इस गीत का संगीत धनीराम और आर. सुदर्शनम् ने दिया था। आप राग भैरवी के स्वरों में राधाकृष्ण की होली का आनन्द लीजिए और मुझे इस अंक और इस लघु श्रृंखला को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


फिल्म – लड़की : ‘बाट चालत नई चुनरी रंग डारी श्याम...’ : संगीत – धनीराम और आर. सुदर्शनम् : गीता दत्त





आज की पहेली 


‘स्वरगोष्ठी’ के 160वें अंक की पहेली में आज हम आपको एक फिल्म संगीत की एक रचना का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। इस अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।




1 – गीत के इस अंश को सुन कर बताइए कि यह गीत किस राग पर आधारित है?

2 – यह गीत किस ताल में निबद्ध है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 162वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता 


‘स्वरगोष्ठी’ की 158वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको पण्डित आशीष सांकृत्यायन के स्वरों में एक धमार रचना का अंश प्रस्तुत कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- धमार और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- राग खमाज। इस अंक के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी और जबलपुर से क्षिति तिवारी ने दिया है। चण्डीगढ़ के हरकीरत सिंह ने दूसरे प्रश्न में राग पहचानने में भूल की है। अतः उन्हें इस पहेली में केवल एक अंक ही मिलेगा। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात 


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ में बसन्तोत्सव पर केन्द्रित लघु श्रृंखला जारी है। अभी तक आपने फाल्गुनी रस-रंग में पगी रचनाओं का आनन्द लिया। अगले अंक में हम एक और ऋतु आधारित संगीत शैली पर आपसे चर्चा करेंगे। आप अपनी पसन्द के गीत-संगीत की फरमाइश हमे भेज सकते हैं। हमारी अगली श्रृंखलाओं के लिए आप किसी नए विषय का सुझाव भी दे सकते हैं। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे एक नए अंक के साथ हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 

Sunday, March 24, 2013

विविध संगीत शैलियों में राग-रस-रंग से परिपूर्ण होली



स्वरगोष्ठी – 113 में आज 
होली अंक
‘चोरी चोरी मारत हो कुमकुम...’ : संगीत की विविध शैलियों में होली


भारतीय पर्वों में होली एक ऐसा पर्व है, जिसमें संगीत-नृत्य की प्रमुख भूमिका होती है। जनसामान्य अपने उल्लास की अभिव्यक्ति के लिए मुख्य रूप से देशज संगीत का सहारा लेता है। इस अवसर पर विविध संगीत शैलियों के माध्यम से भी होली की उमंग को प्रस्तुत करने की परम्परा है। इन सभी भारतीय संगीत शैलियों में होली की रचनाएँ प्रमुख रूप से उपलब्ध हैं। आज के अंक में हम आपके लिए कुछ संगीत शैलियों में रंगोत्सव के कुछ चुने हुए गीतों पर चर्चा करेंगे। 


न्द्रधनुषी रंगों में भींगे तन-मन लिये ‘स्वरगोष्ठी’ के अपने समस्त पाठकों-श्रोताओं का, मैं कृष्णमोहन मिश्र एक बार पुनः अबीर-गुलाल के साथ स्वागत और अभिनन्दन करता हूँ। होली, उल्लास, उत्साह और मस्ती का प्रतीक-पर्व होता है। इस अनूठे परिवेश का चित्रण भारतीय संगीत की सभी शैलियों में मिलता है। रंगोत्सव के उल्लासपूर्ण परिवेश में आज हम आपसे ध्रुवपद संगीत शैली के अभिन्न अंग ‘धमार’ की चर्चा करेंगे। इसके साथ ही खयाल शैली के अन्तर्गत राग काफी की ठुमरी शैली के अन्तर्गत होरी की और होली के रस-रंगों से भीगी फिल्मी ठुमरी पर भी चर्चा करेंगे।

भारतीय संगीत की प्राचीन और शास्त्र-सम्मत शैली है- ध्रुवपद। इस शैली के अन्तर्गत धमार गायकी तो पूरी तरह रंगों के पर्व होली पर ही केन्द्रित रहती है। धमार एक प्रकार की गायकी भी है और एक ताल विशेष का नाम भी है। यह पखावज पर बजने वाला 14 मात्रा का ताल है, जिसकी संगति धमार गायन में होती है। धमार की रचनाओं में अधिकतर राधा-कृष्ण की होली का वर्णन मिलता है। कुछ धमार रचनाओं में फाल्गुनी परिवेश का चित्रण भी होता है। गम्भीर प्रवृत्ति के रागों की अपेक्षा चंचल प्रवृत्ति के रागों में धमार की प्रस्तुतियाँ मन को अधिक लुभातीं हैं। आज हम आपको धमार गायकी के माध्यम से रंगोत्सव का एक अलग रंग दिखाने का प्रयास करेंगे। ध्रुवपद-धमार गायकी के एक विख्यात युगल गायक हैं- गुंडेचा बन्धु (रमाकान्त और उमाकान्त गुंडेचा), जिन्हें देश-विदेश में भरपूर यश प्राप्त हुआ है। इनकी संगीत-शिक्षा उस्ताद जिया फरीदउद्दीन डागर और विख्यात रुद्रवीणा वादक उस्ताद जिया मोहिउद्दीन डागर द्वारा हुई है। ध्रुवपद के ‘डागुरवाणी’ गायन में दीक्षित इन कलासाधकों से ‘स्वरगोष्ठी’ के होली अंक के लिए हमने एक धमार अपने पाठकों-श्रोताओं को सुनवाने का अनुरोध किया था। हमारे अनुरोध का मान रखते हुए रमाकान्त गुंडेचा ने हमें तत्काल राग केदार का यह मनमोहक धमार, आपको सुनवाने के लिए उपलब्ध कराया। गुंडेचा बन्धु के प्रति आभार व्यक्त करते हुए, राग केदार का यह धमार पस्तुत है, जिसके बोल हैं- 'चोरी चोरी मारत हो कुमकुम, सम्मुख हो क्यों न खेलो होरी...'। 

धमार- राग केदार : ‘चोरी चोरी मारत हो कुमकुम...’ : स्वर – गुंडेचा बन्धु 


हमारे संगीत का एक अत्यन्त मनमोहक राग है- काफी। इस राग में होली विषयक रचनाएँ खूब मुखर हो जाती हैं। आइए, अब थोड़ी चर्चा राग काफी की संरचना पर करते हैं। राग काफी, काफी थाट का आश्रय राग है और इसकी जाति है सम्पूर्ण-सम्पूर्ण, अर्थात आरोह-अवरोह में सात-सात स्वर प्रयोग किए जाते हैं। आरोह में सा रे ग(कोमल) म प ध नि(कोमल) सां तथा अवरोह में सां नि(कोमल) ध प म ग(कोमल) रे सा स्वरों का प्रयोग किया जाता है। इस राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर षडज होता है। कभी-कभी वादी कोमल गान्धार और संवादी कोमल निषाद का प्रयोग भी मिलता है। दक्षिण भारतीय संगीत का राग खरहरप्रिय राग काफी के समतुल्य राग है। ग्वालियर परम्परा की गायकी में दक्ष, युवा गायिका विदुषी मीता पण्डित ने राग काफी में एक होरी रचना का बड़ा ही मनमोहक गायन प्रस्तुत किया है। इस रचना में राम और सीता के होली खेलने का प्रसंग है। आम तौर पर विभिन्न संगीत शैलियों में राधा-कृष्ण की होली का उल्लेख मिलता है, किन्तु इस प्रस्तुति में राम-सीता की होली का प्रसंग है। विदुषी मीता पण्डित के स्वरों में सुनिए, राग काफी की यह होरी।

राग काफी होरी : ‘राम-सिया फाग मचावत...’ : विदुषी मीता पण्डित 


राग काफी, ध्रुवपद और खयाल की अपेक्षा उपशास्त्रीय संगीत में अधिक प्रयोग किया जाता है। ठुमरियों में प्रायः दोनों गान्धार और दोनों धैवत का प्रयोग भी मिलता है। टप्पा गायन में शुद्ध गान्धार और शुद्ध निषाद का प्रयोग वक्र गति से किया जाता है। इस राग का गायन-वादन रात्रि के दूसरे प्रहर में किए जाने की परम्परा है, किन्तु फाल्गुन मास में इसे किसी भी समय गाया-बजाया जा सकता है। उपशास्त्रीय संगीत में होली गीतों का सौन्दर्य खूब निखरता है। ठुमरी-दादरा, विशेष रूप से पूरब अंग की ठुमरियों में होली का मोहक चित्रण मिलता है। उपशास्त्रीय संगीत की वरिष्ठ गायिका विदुषी गिरिजा देवी की गायी अनेक होरी हैं, जिनमे राग काफी के साथ-साथ होली के परिवेश का आनन्द भी प्राप्त होता है। बोल-बनाव से गिरिजा देवी जी गीत के शब्दों में अनूठा भाव भर देतीं हैं। आम तौर पर होली गीतों में ब्रज की होली का जीवन्त चित्रण होता है। अब हम आपको विदुषी गिरिजा देवी के स्वरों में जो काफी होरी सुनवा रहे हैं, उसमें ब्रज की होली का अत्यन्त भावपूर्ण चित्रण है। लीजिए, आप भी सुनिए, यह मनमोहक काफी होरी-

राग मिश्र काफी होरी : ‘तुम तो करत बरजोरी...’ : विदुषी गिरिजा देवी


यूँतो राग काफी में होली की रचनाएँ खूब मुखर होती हैं, परन्तु कुछ अन्य राग भी हैं जिनमें रंगों के इस पर्व के परिवेश का अनूठा चित्रण मिलता है। उप-शास्त्रीय रचनाओं में प्रायः होली का चित्रण राग देस, खमाज, तिलंग, पीलू आदि में भी मिलता है। आज की इस सतरंगी गोष्ठी का समापन हम एक फिल्मी ठुमरी गीत से करेंगे। 1996 में एक संगीतप्रधान फिल्म, ‘सरदारी बेगम’ का प्रदर्शन हुआ था। इस फिल्म में ठुमरी अंग में कई गीत शामिल थे। इन्हीं में से एक ठुमरी गीत में होली के परिवेश को चित्रित करता एक अत्यन्त मोहक गीत भी था। संगीतकार वनराज भाटिया ने गीतकार जावेद अख्तर के शब्दों को राग पीलू के स्वरों की चाशनी में डुबो कर और ठुमरी अंग से अलंकृत कर फिल्म में प्रस्तुत किया था। इस गीत में होली के उमंग और उल्लास के साथ-साथ सौम्य भाव भी परिलक्षित होता है। गायिका आशा भोसले के स्वरों में आप यह फिल्मी ठुमरी गीत सुनिए और अनुभव कीजिये कि राग पीलू में भी होली के रंग किस प्रकार निखरते है? 


राग पीलू : फिल्म – सरदारी बेगम : ‘मोरे कान्हा जो आए पलट के...’ : आशा भोसले



आज की पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ की 113वीं संगीत पहेली में हम आपको एक राग-संगीत का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 120वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 - संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह रचना किस राग पर आधारित है?

2 – गायक की आवाज़ को पहचानिए और उनका नाम बताइए।

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 115वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के 111वें अंक में हमने आपको फिल्म ‘गूँज उठी शहनाई’ से उस्ताद अमीर खाँ के गायन और उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ के शहनाईवादन की जुगलबन्दी से युक्त रागमाला गीत का आरम्भिक भाग सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग भटियार और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- शहनाई। दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर की क्षिति तिवारी और जौनपुर के डॉ. पी.के. त्रिपाठी ने दिया है। दोनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक शुभकामनाएँ।


झरोखा अगले अंक का


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की इस वर्ष की समय-सारिणी के अनुसार माह के पाँचवें रविवार की ‘स्वरगोष्ठी’ का अंक हमारे किसी अतिथि लेखक द्वारा प्रस्तुत किया जाना निश्चित किया गया था। अगला रविवार मार्च माह का पाँचवाँ रविवार है। इस अंक को प्रस्तुत करने के लिए हमने वरिष्ठ संगीतज्ञ पण्डित श्रीकुमार मिश्र से अनुरोध किया था, जिसे उन्होने स्वीकार कर लिया है। अगले अंक में मिश्र जी एक ही स्वर से निर्मित विविध रागों पर चर्चा करेंगे। आप भी हमारे आगामी अंकों के लिए भारतीय शास्त्रीय संगीत से जुड़े नये विषयों, रागों और अपनी प्रिय रचनाओं की फरमाइश कर सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों को पूरा सम्मान देंगे। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9-30 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सभी संगीत-रसिकों की हमें प्रतीक्षा रहेगी। 


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 


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