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Saturday, August 23, 2014

मुकेश का अन्तिम दिन बेटे नितिन मुकेश की स्मृतियों में...



स्मृतियों के स्वर - 08

"फिर जाए जो उस पार कभी लौट के न आए..."


मुकेश का अन्तिम दिन बेटे नितिन मुकेश की स्मृतियों में





'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! दोस्तों, एक ज़माना था जब घर बैठे प्राप्त होने वाले मनोरंजन का एकमात्र साधन रेडियो हुआ करता था। गीत-संगीत सुनने के साथ-साथ बहुत से कार्यक्रम ऐसे हुआ करते थे जिनमें कलाकारों से साक्षात्कार करवाये जाते थे और जिनके ज़रिये फ़िल्म और संगीत जगत के इन हस्तियों की ज़िन्दगी से जुड़ी बहुत सी बातें जानने को मिलती थी। गुज़रे ज़माने के इन अमर फ़नकारों की आवाज़ें आज केवल आकाशवाणी और दूरदर्शन के संग्रहालय में ही सुरक्षित हैं। मैं ख़ुशक़िस्मत हूँ कि शौकिया तौर पर मैंने पिछले बीस वर्षों में बहुत से ऐसे कार्यक्रमों को लिपिबद्ध कर अपने पास एक ख़ज़ाने के रूप में समेट रखा है। 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' पर, महीने के हर दूसरे और चौथे शनिवार को इसी ख़ज़ाने में से मैं निकाल लाता हूँ कुछ अनमोल मोतियाँ हमारे इस स्तम्भ में, जिसका शीर्षक है- स्मृतियों के स्वर। इस स्तम्भ में हम और आप साथ मिल कर गुज़रते हैं स्मृतियों के इन हसीन गलियारों से। आज प्रस्तुत है 27 अगस्त 1976 की उस दुखद घटना का ब्योरा जब हमारे प्रिय गायक मुकेश इस दुनिया को छोड़ गये थे। अपने पिता के अन्तिम दिन की दास्तान बता रहे हैं नितिन मुकेश।



सूत्र : अमीन सायानी द्वारा प्रस्तुत 'सरगम के सितारों की महफ़िल' कार्यक्रम



"मैं जानता हूँ कि आप सब मेरे पापा को इतना प्यार करते हैं, इसलिए मैं कुछ ऐसी बातें कहना चाहता हूँ उन दिनों की जो उनकी ज़िंदगी के आ़ख़िरी दिन थे। 27 जुलाई की रात मैं और पापा रवाना हुए न्यूयार्क के लिए। न्यूयार्क से फिर हम कनाडा गये, वैन्कोवर। वहाँ हमें दीदी मिलने वाली थीं। दीदी हैं लता मंगेशकर जी, दुनिया की, हमारे देश की महान कलाकार, मगर हमारे लिए तो बहन, दीदी, बहुत प्यारी हैं। वो हमें वैन्कोवर में मिलीं। फिर शोज़ शुरु हुए, पहली अगस्त को पहला शो आरम्भ हुआ। और उसके बाद 10 शोज़ और होने थे। एक के बाद एक शो बहुत बढ़िया हुए, लोगों को बहुत पसंद आए। लोगों ने बहुत प्यार बरसाया, ऐसा लगा कि शोहरत के शिखर पर पहुँच गए हैं दोनों। दीदी तो बहुत महान कलाकार हैं, मगर उनके साथ जा के, उनके साथ एक मंच पर गा के पापा को भी बहुत इज़्ज़त मिली और बहुत शोहरत मिली। इसी तरह से 6 शोज़ बहुत अच्छी तरह हो गए। फिर सातवाँ शो था मोनट्रीयल में। वहाँ एक ऐसी घटना घटी, जिससे पापा बहुत ख़ुश हुए मगर मैं ज़रा घबरा गया। वहाँ उन दो महान कलाकारों के साथ मुझे भी गाने को कहा गया, और आप यकीन मानिए, मेरे में हिम्मत बिल्कुल नहीं थी मगर दीदी ने मुझे बहुत साहस दिया, बहुत हिम्मत दी, और इस वजह से मैं स्टेज पर आया। मेरा गाना सुन के, दीदी के साथ खड़ा हो के मैं गा रहा हूँ, यह देख के पापा बहुत ख़ुश हुए, बहुत ज़्यादा ख़ुश हुए, और मुझे बहुत प्यार किया, बहुत आशिर्वाद दिए।


फिर वह दिन आया, 27 अगस्त,  उस दिन शाम को डेट्रायट में शो था। उस दिन मुझे इतना प्यार किया, इतना छेड़ा, इतना लाड़ किया कि जब मैं आज सोचता हूँ कि 26 साल की उम्र में शायद कभी इतना प्यार नहीं किया होगा। 4-30 बजे दोपहर को कहने लगे कि 'हारमोनियम मँगवायो बेटे, मैं ज़रा रियाज़ करूँगा', मैने हारमोनियम निकाल के उनके सामने रखा, वो रियाज़ करने लगे। मुझे ऐसा लग रहा था कि आवाज़ बहुत ख़ूबसूरत लग रही थी, और बहुत ही मग्न हो गए थे अपने ही संगीत में। जब रियाज़ कर चुके तो मुझसे बोले कि 'एक प्याला चाय मँगवा, मैं आज एक दम फ़िट हूँ', और हँसने लगे। कहने लगे कि 'जल्दी जल्दी तैयार हो जाओ, कहीं देर न हो जाए शो के लिए'। कह कर वो स्नान करने चले गए। मुझे ज़रा भी शक़ नहीं था कि कुछ होने वाला है, इसलिए मैं ख़ुद रियाज़ करने बैठ गया। कुछ देर के बाद बाथरूम का दरवाज़ा खुला तो मैने देखा कि पापा वहाँ हाँफ़ रहे थे, उनका साँस फूल रहा था, मैं एकदम घबरा गया, और घबरा के होटल के औपरेटर से कहा कि डाक्टर को जल्दी भेजो। फिर मैने दीदी (लता) को फ़ोन करने लगा तो बहुत प्यार से धुतकारने लगे, कहने लगे कि 'दीदी को परेशान मत करो, मैं इंजेक्शन ले लूँगा, ठीक हो जाउँगा, फिर शाम की शो में हम चलेंगे'। पर मैं उनकी नहीं सुनने वाला था, मैने दीदी को जल्दी बुला लिया, और 5-7 मिनट में दीदी भी आ गयीं, डाक्टर भी आ गए, और ऐम्बुलैन्स में ले जाने लगे। तब मैने उनके जीवन की जो सब से प्यारी चीज़ थी, उनके पास रखी, तुल्सी रामायण। उसके बाद हम ऐम्बुलैन्स में बैठ के अस्पताल की ओर चले। अब वो मेरा हौसला बढ़ाने लगे, 'बेटा, मुझे कुछ नहीं होगा, मैं बिल्कुल ठीक हूँ, मैं बिल्कुल ठीक हो जाउँगा', ये सब कहते हुए अस्पताल पहुँचे। पहुँचने के बाद जब उन्हे पता चला कि उन्हे 'आइ.सी.यू' में ले जाया जा रहा है, जितना प्यार, जितनी जान बाक़ी थी, मेरी तरफ़ देख के मुस्कुराये, और बहुत प्यार से, अपना हाथ उठा के मुझे 'बाइ बाइ' किया। इसके बाद उन्हे अंदर ले गए, और इसके बाद मैं उन्हे कभी नहीं देख सका।"



लता मंगेशकर, जो अपने मुकेश भइया के उस अंतिम घड़ी में उनके साथ थीं, उनके गुज़र जाने के बाद अपने शोक संदेश में कहा था:


"मुकेश, जो आप सब के प्रिय गायक थे, उनमें बड़ी विनय थी। मुकेश के स्वर्गवास पे दुनिया के कोने कोने में संगीत के लाखों प्रेमियों के आँखों से आँसू बहे। मेरी आँखों ने उन्हे अमरीका में दम तोड़ते हुए देखा। आँसू भरी आँखों से मैने मुकेश भइया के पार्थिव शरीर को अमरीका से विदा होते देखा। मुकेश भइया को श्रद्धांजली देने के लिए तीन शब्द हैं, जिनमें एक उनकी भावना कह सकते हैं कि जिसमें एक कलाकार दूसरे कलाकार की महान कला की प्रशंसा करते हैं। उनकी मधुर आवाज़ ने कितने लोगों का मनोरंजन किया, जिसकी गिनती करते करते न जाने कितने वर्ष बीत जाएँगे। जब जब पुरानी बातें याद आती हैं तो आँखें भर जाती हैं।"



"दे दे के ये आवाज़ कोई हर घड़ी बुलाए,

फिर जाए जो उस पार कभी लौट के न आए,

है भेद ये कैसा कोई कुछ तो बताना,

ओ जानेवाले हो सके तो लौट के आना।" 

लीजिए, अब आप यही गीत सुनिए-

फिल्म - बंदिनी : 'ओ जाने वाले हो सके तो लौट के आना...' : मुकेश : संगीत - सचिनदेव बर्मन : गीतकार - शैलेन्द्र




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ज़रूरी सूचना:: उपर्युक्त लेख 'SARGAM KE SITAARON KI MEHFIL' कार्यक्रम का अंश है। इसके सभी अधिकार AMEEN SAYANI के पास सुरक्षित हैं। किसी भी व्यक्ति या संस्था द्वारा इस प्रस्तुति का इस्तमाल व्यावसायिक रूप में करना कॉपीराइट कानून के ख़िलाफ़ होगा, जिसके लिए 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' ज़िम्मेदार नहीं होगा।



तो दोस्तों, आज बस इतना ही। आशा है आपको यह प्रस्तुति पसन्द आयी होगी। अगली बार ऐसे ही किसी स्मृतियों की गलियारों से आपको लिए चलेंगे उस स्वर्णिम युग में। तब तक के लिए अपने इस दोस्त, सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिये, नमस्कार! इस स्तम्भ के लिए आप अपने विचार और प्रतिक्रिया नीचे टिप्पणी में व्यक्त कर सकते हैं, हमें अत्यन्त ख़ुशी होगी।



प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

Saturday, July 5, 2014

"मोरा गोरा अंग ल‍इ ले..." - जानिये किन मुश्किलों से गुज़रते हुए बना था यह गीत


एक गीत सौ कहानियाँ - 35
 

मोरा गोरा अंग ल‍इ ले...’



'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्युटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारी ज़िन्दगियों से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़ी दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 35-वीं कड़ी में आज जानिये फ़िल्म 'बन्दिनी' के गीत "मोरा गोरा अंग ल‍इ ले..." के बारे में। 




गुलज़ार
फ़िल्म 'बन्दिनी' का निर्माण चल रहा था, जिसके निर्देशक थे बिमल राय, संगीतकार थे सचिनदेव बर्मन और बतौर गीतकार शैलेन्द्र फ़िल्म के गाने लिखने वाले थे। अब हुआ यूँ कि दादा बर्मन और शैलेन्द्र के बीच किसी वजह से मनमुटाव हो गया और ग़ुस्से में आकर सचिन दा ने कह दिया कि वो शैलेन्द्र के साथ काम नहीं करेंगे। इसी समय बिमल दा के लिए इस फ़िल्म का पहला गीत शूट करना बेहद ज़रूरी हो गया था। वो मुश्किल में पड़ गये; लाख समझाने पर भी सचिन दा शैलेन्द्र जी के साथ काम करने के लिए तैयार नहीं हुए। जब बिमल दा ने यह बात शैलेन्द्र को बताई तो शैलेन्द्र जी सोच में पड़ गये कि बिमल दा को इस मुश्किल से कैसे निकाला जाये। उन्हीं दिनों शैलेन्द्र Bombay Youth Choir के सदस्य हुआ करते थे जिसके गुलज़ार भी सदस्य थे। यह कॉयर किशोर कुमार की पत्नी रूमा देवी चलाती थीं। गुलज़ार उन दिनों एक गराज में गाड़ियों को रंगने का काम किया करते थे और एक लेखक बनने का ख़्वाब देखा करते। क्योंकि शैलेन्द्र को गुलज़ार के इस लेखन-रुचि का पता था, उन्होंने गुलज़ार से कहा कि जाकर बिमल दा से मिले और बताया कि बिमल दा के लिए एक गीत लिखना है। क्योंकि गुलज़ार को गीत लेखन में कोई रुचि नहीं थी और न ही वो फ़िल्मों के लिए कुछ लिखना चाहते थे, इसलिए उन्होंने शैलेन्द्र जी को मना कर दिया। पर शैलेन्द्र जी कहाँ मानने वाले थे। आख़िरकार शैलेन्द्र की ज़िद के आगे गुलज़ार को झुकना पड़ा। गुलज़ार अपने एक दोस्त देबू के साथ, जो उन दिनों बिमल दा के सहायक थे, पहुँच गये बिमल राय के डेरे पर। बिमल दा ने गुलज़ार को उपर से नीचे तक देखा और देबू की तरफ़ मुड़ कर बांगला में बोले, "भद्रलोक कि बैष्णब कोबिता जाने?" (क्या इस महाशय को वैष्णव कविता पता है?) जब देबू ने बिमल दा को बताया कि गुलज़ार को बांगला समझ आती है, तो बिमल दा को शर्म आ गई। ख़ैर, बिमल दा ने गुलज़ार को सिचुएशन समझाया और सचिन दा के पास भेज दिया धुन सुनने के लिए। दादा बर्मन से धुन लेकर गुलज़ार चले गये घर और एक सप्ताह बाद गीत लेकर वापस पहुँच गये सचिन दा के पास। सचिन को जब गीत सुनाया तो उन्हें पसन्द आया। गुलज़ार ने पूछा कि क्या मैं बिमल दा को जा कर गीत सुना दूँ? सचिन ने पूछा कि क्या तुम्हे गाना आता है? गुलज़ार के ना कहने पर सचिन ने उन्हें बिमल दा को गीत सुनाने से मना करते हुए कहा, "अरे तुम कैसा भी सुनायेगा और हमारा ट्युन रीजेक्ट हो जायेगा"। ख़ैर, बिमल राय को गीत और धुन, दोनों बहुत पसन्द आया और गायिका के रूप में लता मंगेशकर का नाम चुन लिया गया। गुलज़ार को ये सब कुछ सपना जैसा लग रहा था। एक सप्ताह पहले वो एक गराज में मकेनिक थे और एक सप्ताह बाद उनके लिखे पहले फ़िल्मी गीत के साथ सचिनदेव बर्मन और लता मंगेशकर का नाम जुड़ रहा था। वाकई यह किसी सपने से कम नहीं था।

बिमल राय
"मोरा गोरा अंग लै ले" की सिचुएशन कुछ ऐसी थी कि नूतन, यानी कल्याणी, मन ही मन बिकाश, यानी अशोक कुमार को चाहने लगी है। एक रात चुल्हा-चौका समेट कर गुनगुनाती हुई बाहर निकल रही है। इस सिचुएशन पर यह गीत आता है। गीत बनने के बाद बिमल राय और सचिन देव बर्मन के बीच एक और विवाद खड़ा हो गया। बिमल दा चाहते थे कि गीत घर के अन्दर फ़िल्माया जाये, जबकि सचिन देव बर्मन आउटडोर के लिए इन्टरल्युड बना चुके थे। बिमल राय ने तर्क दिया, यह कहते हुए कि ऐसा करेक्टर घर से बाहर जाकर नहीं गा सकती। सचिन दा ने कहा कि बाहर नहीं जायेगी तो बाप के सामने गायेगी कैसे? दादा बर्मन के सवाल पर बिमल राय ने दलील दी कि बाप से हमेशा वैष्णव कवितायें सुना करती हैं तो गा क्यों नहीं सकती? सचिन दा बोले, "यह कविता पाठ नहीं है दादा, यह गाना है"। इस बात पर बिमल दा बोले कि तो फिर कविता लिखो, वो कविता गायेगी। अब सचिन देव बर्मन को झल्लाहट होने लगी। फिर भी उन्होंने अपनी दलील दी कि गाना घर में घुट जायेगा। उनके इस बात पर बिमल दा ने कहा कि तो फिर आंगन में ले जाओ, लेकिन बाहर नहीं जायेगी। सचिन देव अब इस बात पर अड़ गये कि अगर वो बाहर नहीं जायेगी तो हम भी गाना नहीं बनायेगा। इस तरह थोड़ी देर बहस चलती रही। और बाद में दोनों ने डिसाइड किया कि चलो कल्याणी यानी नूतन को घर के आंगन में ले जाते हैं और तय हो गया कि यह गाना कल्याणी आंगन में ही गायेगी। बिमल राय और दादा बर्मन ने अब गुलज़ार से बोला कि अब तुम इस गाने को आंगन का गाना बनाओ। गुलज़ार फिर देबू के पास गये। उससे वैष्णव कवितायें ली, जो कल्याणी अपने पिता से सुना करती थी। बिमल दा ने गुलज़ार से कहा कि सिचुएशन कुछ ऐसी होगी कि रात का वक़्त है, कल्याणी को यह डर है कि चाँदनी रात में उसे कोई देख न ले। इसलिए वो घर से बाहर नहीं जा रही है। वो आंगन से आगे नहीं जा पाती। इस पर सचिन देव बर्मन ने भी अपनी बात ऐड कर दी, चांदनी रात में भी वो डरती तो है, मगर बाहर चली आयी है। अब मुड़-मुड़ कर आंगन की तरफ़ देखती है, ऐसा कुछ भी होगा, इस पर भी कुछ लिखो। तो गुलज़ार साहब ने बिमल राय और सचिन देव बर्मन, दोनों की बातों को मिला कर, कल्याणी की हालत समझ कर जो गीत लिखा, वह गीत था "मोरा गोरा अंग लै ले, मोहे श्याम रंग दै दे"। क्या मास्टरपीस गीत लिखा गुलज़ार ने। इस गीत को सुनने के बाद शैलेन्द्र ने भी स्वीकार किया कि इतना अच्छा शायद वो भी नहीं लिख पाते इस सिचुएशन पर। बिमल दा और शैलेन्द्र, दोनो यह चाहते थे कि 'बन्दिनी' के बाकी के गीत भी गुलज़ार ही लिखे। पर सचिन देव बर्मन ने गुलज़ार जैसे नये गीतकार के साथ काम करने से मना कर दिया। जल्द ही उनकी शैलेन्द्र से दोस्ती हो गई और उन्होंने ऐलान किया कि इस फ़िल्म के बाकी गीत शैलेन्द्र ही लिखेंगे। सचिन दा का मिज़ाज कुछ ऐसा हुआ करता था कि उनकी बात को टालना किसी के बस की बात नहीं होती। इस बात पर बिमल दा और शैलेन्द्र, दोनों को गुलज़ार के लिए बुरा लगा, पर गुलज़ार ने कुछ भी नहीं कहा और शैलेन्द्र जी को उनकी कुर्सी वापस देते हुए कहा कि यह आप ही की कुर्सी है, आप ही सम्भालिये। बस, इतनी सी है इस गीत के पीछे की कहानी। लीजिए, अब आप भी उस गीत को सुनिए।

फिल्म - बंदिनी : 'मोरा गोरा अंग लइले मोहे श्याम रंग दइदे...' : लता मंगेशकर : संगीत - सचिनदेव बर्मन : गीत - गुलजार 




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खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

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