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Wednesday, April 22, 2009

एक मुलकात यूफोरिया के पलाश सेन से

हिंद युग्म की सबसे बड़ी सफलता रही है कि जब से ये सफ़र शुरू हुआ है, इसके बहाव में नयी प्रतिभाएं जुड़ती चली जा रही हैं, और हर आती हुई लहर बहाव को एक नए रंग से भर जाती है. हिंद युग्म के इस रंगीन परिवार में दो नए नाम और जुड़ गए हैं. दरअसल ये दो होते हुए भी एक हैं, एक सी कद काठी, चेहरा मोहरा, और व्यवसाय भी एक है इन जुड़वां भाईयों का. जामिया स्नातक अकबर और आज़म कादरी के रूप में हिंद युग्म को मिले हैं दो नए युवा निर्देशक. जालौन, बुदेलखंड जैसे छोटे क़स्बे में उनका बचपन बीता. बारहवीं पास कर, आँखों में आसमान छूने के सपने लेकर दोनों भाई दिल्ली आये. बचपन से ही थिएटर से जुडाव तो था ही, जामिया में मॉस मीडिया की पढाई के दौरान ये शौक और परवान चढा. २००५ में इनके द्वारा निर्देशित एक लघु फिल्म आई "मैसेल्फ़ संदीप" जिसमें संगीत था रॉक बैंड यूफोरिया का. किसानों की आत्महत्या विषय पर एक नाटक लिखा जिसका शीर्षक दिया गया "मौसम को जाने क्या हो गया है". जब इस नाटक का मंचन हुआ तो दर्शकों में शामिल थे ओक्सफेम इंडिया के कुछ सदस्य. चूँकि ओक्सफेम भारत में गरीबी उन्मूलन और जलवायु परिवर्तन जैसे संवेदनशील मुद्दों पर पिछले कई सालों से कार्यरत है उन्हें अकबर और आज़म संभावनाएं नज़र आई.
पलाश के साथ अकबर कादरी और आज़म कादरी
अकबर और आज़म ने ने ओक्सफाम में एक प्रोजेक्ट पेश किया, आईडिया ये था कि किसी लोकप्रिय माध्यम से पर्यावरण सम्बंधित समस्याओं, खतरों और उनके निवारण में जन भागीदारी के सन्देश को आम से आम आदमी तक प्रेषित किया जाए. ताकि ये वातानुकूलित कमरों की चर्चा बन कर ही न रह जाए. जाहिर है संगीत से अधिक लोकप्रिय और सरल माध्यम और क्या हो सकता था, तो इस तरह शुरआत हुई एक सार्थक संगीत प्रोजेक्ट की. यूफोरिया के पलाश सेन आगे आये, और गीत बना "ज़मीन" (पायेंगें ऐसा जहाँ...), जिसे मुक्तलिफ़ लोकेशनों पर शूट किया अकबर और आज़म ने. ओक्सफेम ने निर्माण का जिम्मा उठाया और निर्मित हुआ एक सशक्त गीत और एक बेहद उत्कृष्ट विडियो, जो ५.३० मिनट की छोटी अवधि में वो सब कह देता है, जो कहा तो पिछले कई सालों से जा रहा है पर शायद अभी भी जन साधारण समस्या की गंभीरता से वाकिफ नहीं हो पाया है. मुझे लगता है कि ये प्रयास तो बस एक शुरुआत भर है, इस तरह के और भी आयोजन होने चाहिए और ओक्सफेम और उन जैसी अन्य संस्थाओं को जनप्रिय माध्यमों का सहारा लेकर अपने सन्देश लोगों तक पहुचने का बीडा उठाना चाहिए. बहरहाल हम बात कर रहे थे अकबर और आज़म की. "ज़मीन" गीत और उसके विडियो को ओक्सफेम एक भव्य समारोह में लॉन्च करने जा रहा था. इसी समारोह का निमत्रण लेकर अकबर और आज़म मेरे कार्यालय में आकर मुझसे मिले. उनसे मिलकर और उनके विचार जानकर मुझे लगा कि आने वाले समय में मीडिया जगत इस युवा लेखक-निर्देशक जोड़ी से बहुत सी उम्मीदें कर सकता है. हम अकबर और आज़म के बारे में आपको और जानकारी देंगें उनको आपके रूबरू भी लेकर आयेंगे बहुत जल्दी, साथ ही दिखायेंगे उनका नया विडियो भी. ओक्सफेम और उनके उद्देश्यों के बारे में भी विस्तार से चर्चा करेंगें, पर आज बात करते हैं उस "लौन्चिंग" समारोह की, पलाश की और यूफोरिया की.

शुक्रवार १७ अप्रैल दिल्ली के फिक्की सभगार में होना था ये कॉन्सर्ट. निखिल आनंद गिरी चुनावी व्यस्तताओं के चलते आने में असमर्थ थे (हालाँकि अकबर और आज़म को हिंद युग्म का परिचय इन्होने ही दिया था), तो मैं, शैलेश भारतवासी और छायाकार कवि (मैं इन्हें इसी तरह संबोधित करना पसंद करता हूँ) मनुज मेहता पहुंचे समारोह का आनंद लेने. इरादा ये भी था कि लगे हाथों पलाश से कुछ सवाल भी पूछ लिए जाएँ. मनुज ने कुछ सवाल तैयार कर रखे थे, आपसी सलाह से उसमें कुछ नए सवाल जोड़ दिए गए और कुछ हटा दिए गए और करीब १० सवालों की एक सूची तैयार हो गयी. हॉल लगभग पूरा भर चूका था, और जैसा कि उम्मीद थी युवाओं की संख्या इनमें ज्यादा थी. ओक्सफेम जिन ग्रामीण इलाकों में कार्यरत है वहां से भी कुछ किसान प्रतिनिधि आये थे जिन्होंने अपनी समस्याओं को रखा और उनके निवारण के लिए ओक्फेम द्वारा किये जा रहे प्रयत्नों का भी उन्होंने जिक्र किया. उसके बाद मंच पर आये ओक्सफेम के एम्बेसडर अभिनेता राहुल बोस. राहुल बोस की छवि एक बुद्धिजीवी ऐक्टर की है, और उन्होंने अपने छोटे मगर बेहद प्रभावशाली संवाद में चेताया कि जिस जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिन्ग का असर देश के ७० प्रतिशत लोगों पर होगा उससे बचे हुए ३० प्रतिशत भी भी अछूते नहीं रह पायेंगें. उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि अब समय महज बातों का नहीं काम का है और हम सब को वो सब कुछ करना चाहिए जो हम कर सकते हैं, जैसे उर्जा की खपत कम करना, छोटी दूरी के सफ़र के लिए पेट्रोल युक्त वाहन की उपेक्षा करना, पर्यावरण सहयोगी थैलों का इस्तेमाल करना, बारिश के पानी को सहेजना आदि.

राहुल बोस ने इस विषय पर एक हस्ताक्षर आन्दोलन का भी शुभारम्भ किया, जिसमें स्वस्थ मंत्री डाक्टर किरण वालिया ने भी अपने हस्ताक्षर कर मुद्दे की गंभीरता पर अपनी चिंता की मोहर लगायी. उसके बाद लोकार्पण हुआ उस शानदार विडियो का जिसका जिक्र हमने उपर किया. विडियो को जम कर सराहना मिली और तालियों की गडगडाहट के बीच मंच पर उतरे यूफोरिया के संगीत कर्मी. "वक्र्तुंडा महाकाय सूर्याकोटि समप्रभा.." की ध्वनि से सभागार गूँज उठा और अवतरित हुए पलाश सेन. उनके आते ही जैसे समां बदल गया, और अपने पहले ही गाने "रोक सको तो रोक लो" से ही उन्होंने श्रोताओं से खुद को जोड़ लिया, फिर "धूम पिचक" ने तो धूम ही मचा दी. आज लगभग १० साल बाद इस गाने की चमक फीकी नहीं हुई है. उसके बाद कुछ धीमे गीतों से दर्शकों का उत्साह कुछ ठंडा देखा तो पलाश ने फैका अपने तुरुप का इक्का- "मायी री.." इस गीत के बाद जो तूफ़ान उठा वो फिर थमा ही नहीं...एक के बाद एक फरमाईशें और उन फरमाईशों को पूरा करते उर्जा से भरे पलाश. बीच बीच में अपना जौहर दिखा रहे थे उनके बैंड के अन्य सितारे भी पर बागडोर पूरी तरह से पलाश के हाथों में ही थी.

१९९८ से अपना कारवाँ लेकर चले पेशे से डॉक्टर पलाश सेन ने यूफोरिया में बहुत कुछ बदलते देखा है, पर कुछ है जो नहीं बदला, वो था यूफोरिया का मूल मन्त्र -समय के साथ बदलकर कुछ अच्छा और नया करने की चाहत. यूफोरिया को हिदुस्तान में रॉक बैंड का अगुवा माना जा सकता है. दस साल तक कवर वर्ज़न करने के बाद पलाश ने महसूस किया कि जब तक हिंदुस्तान में रॉक को हिद्नुस्तानी भाषा में प्रस्तुत नहीं किया जायेगा तब तक कुछ भी विशेष हासिल नहीं किया जा सकेगा. और यूँ खुला रास्ता "धूम" का. धूम की धूम ने इंडी रॉक संगीत को एक नयी पहचान दी. हाल ही में आई फरहान अख्तर की "रॉक ऑन" की कमियाबी ने साबित कर दिया है कि अच्छे संगीत को हिन्दुस्तानी श्रोता सर आँखों पर बिठाएंगे ही. वैसे हिंदुस्तान के मुकाबले पाकिस्तान जैसे छोटे देश में रॉक बैंड अधिक है और उन्हें यहाँ भी खूब सराहा जाता है. दरअसल यूफोरिया वाला फार्मूला अभी यहाँ के अन्य रॉक बैंड शायद समझ नहीं पाए हैं. वापस आते हैं कॉन्सर्ट पर जहाँ पलाश जब अपने सभी हिट गीत गा चुके तो कुछ फ़िल्मी और कवर वर्ज़न भी सुनाने लगे थे, मुझे व्यक्तिगत तौर पर लगता है कि अब पलाश और उनकी टीम को हर कॉन्सर्ट में केवल अपने ही गाने गाने चाहिए. खैर आयोजन का अंतिम गीत था -"ज़मीन". यूफोरिया के इस सबसे नए गाने को बहुत खूब लिखा और संगीत से संवारा गया है. इस इस गाने के बाद पलाश ने ओक्सफेम की सहयोगी टीम और विडियो निर्देशक अकबर-आज़म का मंच पर आमंत्रित किया साथ ही परिचय करवाया अपने उन साथियों का भी जिनसे मिलकर बनता है -"यूफोरिया".

शो के समापन के बाद बधाईयों का सिलसिला शुरू हुआ, मैंने भी अकबर को गले लग कर बधाई दी, तो अकबर ने हिंद युग्म की टीम को ग्रीन रूम का दरवाज़ा दिखला दिया, जहाँ अपने "अति-उर्जामय" प्रदर्शन के बाद कुछ पल चैन की साँस ले रहे थे पलाश और यूफोरिया के अन्य सदस्य. शैलेश रिकॉर्डर साथ लाये ही थे, मनुज ने संभाला जिम्मा सवाल दागने का. तो लीजिये आप भी सुनिए, उस छोटी सी मुलाकात की ये रिकॉर्डिंग-




देखिए 17 अप्रैल 2009 को फिक्की सभागार में हुए यूफोरिया के जीवंत प्रदर्शन की स्लाइडशो




Sunday, November 23, 2008

संगीत जगत की नई सुर्खियाँ

भारत-पाक रॉक बैंड समागम

हिंदुस्तान के हिन्दी रॉक बैंड "यूफोरिया" (धूम पिचक और माये री से मशहूर) ने पाकिस्तानी बैंड स्ट्रिंग्स के साथ जोड़ बनाने के बाद अब एक और पाकिस्तानी बैंड "नूरी" के साथ अपने नए एल्बम पर काम शुरू कर दिया है. पाकिस्तान में हुए एक सम्मान समारोह में यूफोरिया के सदस्य नूरी के अली नूर और अली हमजा बंधुओं से मिले थे. अगस्त में नूरी की टीम भारत दौरे पर भी आई थी. पाकिस्तान के इस बेहद मशहूर बैंड के साथ काम कर यूफोरिया के सदस्य काफ़ी उत्साहित हैं. एक गीत "वो क़समें" है जो आधा भारत और आधा पाकिस्तान में फिल्माया जाएगा. पहली बार पाकिस्तान की किसी बड़ी कंपनी द्वारा किसी हिन्दुस्तानी रॉक बैंड का एल्बम निकला जा रहा है, जो कि निश्चित ही एक अच्छी शुरुआत है.


जेथ्रो तुल और अनुष्का की बेजोड़ जुगलबंदी

मशहूर ब्रिटिश रॉक समूह जेथ्रो तुल अपने एक सप्ताह के भारत दौरे पर हैं, ३० नवम्बर को दिल्ली के प्रगति मैदान में सितार वादिका अनुष्का शर्मा के साथ जुगलबंदी के बाद ये ६ सदस्यया समूह कोलकत्ता, मुंबई, बंगलोरु और हैदराबाद की यात्रा करेगा. १९६७-६८ में गठित हुए इस समूह की खासियत इनके गायन के अंदाज़ के साथ साथ टीम प्रमुख इआन एंडरसन का बांसुरी वादन भी है. हालाँकि एंडरसन का ये पांचवां भारत दौरा है पर ये पहली बार है जब वो पंडित रवि शंकर की सुपुत्री के साथ ताल मिला रहे हैं. इससे पहले वो पंडित हरी प्रसाद चौरसिया जी के साथ भी मंच बाँट चुके हैं. यदि आप उपरोक्त शहरों में हैं तो इस अवसर को जाया मत होने दें.


बॉलीवुड अभिनेत्रियों की नई आवाज़

बॉलीवुड के ताज़ा हिट्स "ठा करके" (गोलमाल रिटर्न), "मेरी एक अदा शोला सी" (किड्नाप) और जोनी गद्दार और वेल्कम के शीर्षक गीत को अपनी आवाज़ देने वाली पार्श्व गायन् की दुनिया की नई सनसनी हैं आकृति ककर. टेलीविजन के एक टेलेंट प्रतियोगिता में जीतने के बाद भी आकृति के लिए बॉलीवुड के दरवाज़े नही खुले, पर परिवार का सहयोग निरंतर बना रहा. दीपल शाह पर फिल्माए गए "रंगीला रे" के रीमिक्स ने आकृति को थोडी बहुत पहचान जरूर दी पर वो ख़ुद मानती हैं कि रीमिक्स गाकर कोई भी अपने हुनर को भरपूर तरीके से पेश नही कर सकता. शंकर एहसान और लोय के लिए गाये गीत "छम से " ने उन्हें सही मौका मिला. कैटरिना कैफ के लिए आदर्श आवाज़ मानी जा रही आकृति अपनी इस शुरूआती सफलता से बेहद खुश है, आने वाली बिल्लू बार्बर, तो बात पक्की और लव हुआ जैसी फिल्मों में हम आकृति की आवाज़ का लुत्फ़ उठा सकेंगें, साथ ही आकृति शंकर महादेवन के साथ एक एल्बम पर भी काम कर रही है. ख़ुद अपने दम पर इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनाने में जुटी आकृति को हिंद युग्म आवाज़ की शुभकामनायें.


भव्य है युवराज का संगीत भी

देश भर में चुनावों की सरगर्मियाँ जोर पकड़ रही हैं. युवाओं को वोट डालने के लिए प्रेरित करने के लिए इन दिनों ए आर रहमान के मशहूर गीत "पप्पू कांट डांस" की तर्ज पर एक पैरोडी गीत बना कर हर जगह बजाया जा रहा है, साथ ही चुनाव आयोग ए आर को व्यक्तिगत तौर पर भी आकर इस मुहीम में शामिल होने की फरमाइश कर चुका है. यूँ भी इन दिनों ए आर की नई फ़िल्म युवराज का संगीत, संगीत प्रेमियों पर जादू चला रहा है. शो-मैन सुभाष घई की इस फ़िल्म का आधार ही संगीत है.फ़िल्म के सभी प्रमुख किरदार किसी न किसी रूप में संगीत से जुड़े हुए दिखाए गए हैं और रहमान ने अपने संगीत से इन सभी किरदारों को अलग अलग रंग दिए हैं. दिल से और साथिया जैसी फिल्मों के बाद गुलज़ार -रहमान एक बार फ़िर अपनी सफलता को दोहराने में कामियाब हुए हैं. अपनी भव्यता और संगीत की मधुरता के लिए ये फ़िल्म देखी जा सकती है.

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