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Friday, May 8, 2009

गुमसुम सा ये जहाँ....ये रात ये समां...गीतकार राजेंद्र कृष्ण ने रचा था ये प्रेम गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 74

फ़िल्म जगत के इतिहास में बहुत सारी फ़िल्में ऐसी हैं जो अगर आज याद की जाती हैं तो सिर्फ़ और सिर्फ़ उनके गीत संगीत की वजह से। और इनमें से कुछ फ़िल्में तो ऐसी भी हैं कि जिनका केवल एक गीत ही काफ़ी था फ़िल्म को यादगार बनाने के लिए। एक ऐसी ही फ़िल्म थी 'दुनिया झुकती है' जिसके केवल एक मशहूर गीत की वजह से इस फ़िल्म को आज भी सुमधुर संगीत के सुधी श्रोता बड़े प्यार से याद करते हैं। हेमन्त कुमार और गीता दत्त की युगल आवाज़ों में यह गीत है "गुमसुम सा ये जहाँ, ये रात ये हवा, एक साथ आज दो दिल धड़केंगे दिलरुबा"। रात का समा, चाँद और चाँदनी, ठंडी हवायें, सुहाना मौसम, प्रेमी-प्रेमिका का साथ, इन सब को लेकर फ़िल्मों में गाने तो बेशुमार बने हैं। लेकिन प्रस्तुत गीत अपनी नाज़ुकी अंदाज़, ग़ज़ब की 'मेलडी', रुमानीयत से भरपूर बोल, और गायक गायिका की बेहतरीन अदायिगी की वजह से भीड़ से जैसे कुछ अलग से लगते है। तभी तो आज तक यह गीत अपनी एक अलग पहचान बनाये हुए है। चाँद का बदली की ओट में छुपना, नील गगन का प्यार के आगे झुकना, दो प्रेमियों का दुनिया से दूर होकर अपनी प्यार की मंज़िल के पास आ जाना, यही सब तो है इस गीत में।

'दुनिया झुकती है' फ़िल्म आयी थी सन् १९६० में और इसमें मुख्य कलाकार थे सुनिल दत्त, कुमकुम और श्यामा। हेमन्त कुमार का संगीत था और गीतकार थे राजेन्द्र कृष्ण। दोस्तों, मुझे हमेशा से ही ऐसा लगता है कि गीतकार राजेन्द्र कृष्ण को इस इंडस्ट्री ने वो सम्मान नहीं दिया जितने के वो हक़दार थे। इसमें कोई दोराय नहीं है कि उन्होने कई दशकों तक फ़िल्मों में अनगिनत 'हिट' गीत दिये हैं। लेकिन बावजूद इसके जब भी कभी सुनहरे दौर के गीतकारों का नाम लिया जाता है, तो उनका नाम साहिर, शैलेन्द्र, हसरत, मजरूह, शक़ील जैसे नामों के तले दब कर रह जाता है। मेरे कहने का अर्थ यही है कि राजेन्द्र कृष्ण को इस इंडस्ट्री ने थोड़ा सा 'अंडर-रेट' किया है। हो सकता है कि उनकी जो घोड़ों की रेस में बाज़ी लगाने की आदत थी वो उनके लिए नकारात्मक रूप से काम करता रहा हो! कहा जाता है कि एक बार उन्होने ४६ लाख रूपए का 'जैक-पॊट' जीता भी था। हेमन्त कुमार और राजेन्द्र कृष्ण का साथ फ़िल्म संगीत के लिए बड़ा ज़बरदस्त साथ रहा। नागिन, मिस् मैरी, चम्पाकली, लगन, पायल, दुर्गेश-नन्दिनी और भी न जाने कितनी ऐसी फ़िल्में थीं जिनमें इन दोनो ने साथ साथ काम किया और हमें दिए एक से एक नायाब नग्में। राजेन्द्रजी ने अपने फ़िल्मी सफ़र में लगभग ३०० फ़िल्मों में गीत लिखे और इनमें से करीब १०० फ़िल्मों में उन्ही का स्क्रीनप्ले भी था। १९८८ में उनके निधन के बाद एच.एम.वी ने उनके सम्मान में १२ गीतों का एक एल.पी. रिकार्ड जारी किया था। तो दोस्तों, आज हमने राजेन्द्र कृष्ण साहब की कुछ बातें करी, और अब आप सुनिये आज का यह गीत।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. साहिर - रवि की जोड़ी का गीत.
२. सुनील दत्त फिल्माया गया गीत.
३. बात हो रही कुछ याद आने की, मुखड़े में शब्द है -"नाशाद".

कुछ याद आया...?

पिछली पहली का परिणाम -
पराग जी लगातार चौकों पे चौके मार रहे हैं, नीरज जी और मनु जी तो तगड़ा मुकाबला मिल रहा है, हमारे शरद तैलंग और भरत पांडया जी निरंतर दस्तक नहीं देते हैं, वरना वो भी जबरदस्त पारखी हैं पुराने गीतों के. इस बार रचना जी ने भी सही गीत पकडा. नीलम जी आज का गीत कैसा लगा आपको, शन्नो जी धन्येवाद, अनाम जी (किश) आपने बहुत सही गलती पकड़ी है....भई बहुत बहुत आभार, सुधार कर लिया गया है.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.


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