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Saturday, June 27, 2009

घर आजा घिर आयी बदरा सांवरिया...पंचम दा की ७० वीं जयंती पर ओल्ड इस गोल्ड का विशेष अंक

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 124

"१९५७की बात मैं कर रहा हूँ, जब मैं पहली बार इस फ़िल्मी दुनिया में बतौर संगीतकार क़दम रखा। महमूद साहब थे मेरे जिगरी दोस्त, उन्होने मुझे एक पिक्चर दिया जिसका नाम था 'छोटे नवाब'। वह मेरी पहली पिक्चर थी। तो हम लोग जिस तरीके से सिचुयशन डिसकस करते हैं, वो हम लोगों ने किया, फिर एक गाना बनाया, दूसरा गाना बनाया, फिर तीसरा गाना बनाया, लेकिन मुझे बहुत एक तर्ज़ पसंद आ रही थी, जो उन्होने भी पसंद किया था, महमूद साहब ने, उस गाने की रिकॉर्डिंग के लिए हम तैयार हो गये, और उसकी रिकॉर्डिंग की डेट भी नज़दीक आ गयी। तो उन्होने (महमूद) कहा कि 'तीन चार दिन के अंदर गाना कर के दीजिये।' मैं उनको डरते डरते कहा कि 'देखिये, आप तो इस वक़्त बहुत बड़े नामी प्रोड्युसर नहीं हैं, लेकिन फिर भी मैं चाहूँगा कि यह गाना बहुत बढ़िया एक सिंगर गाये तो अच्छा है।' उन्होने पूछा, 'कौन?' तो मेरे मन में ज़ाहिर है यही आया कि 'लता दीदी अगर गायें तो अच्छा रहेगा।' लेकिन लता दी एक महीने तक तो बुकिंग में रहती थीं, हर रोज़ दो या तीन गाना गाती थीं। तो मैं डरते डरते एक दिन महबूब स्टुडियो में गया, उनसे मिला और कहा कि 'नमस्कार'। उन्होने कहा कि 'हाँ, कोई काम के लिये ज़रूर आये होगे!' मैने कहा 'आप के लिये बहुत छोटा सा काम है, लेकिन मेरे लिये बहुत बड़ा काम हो जायेगा अगर आप यह गाना कर दें तो!' उन्होने कहा कि 'हाँ, मुझे पता चला है कि तुम्हे एक पिक्चर मिली है, नाम क्या रखा है?' मैने कहा कि 'छोटे नवाब'। 'नाम तो बहुत अच्छा है, मुझे क्या करना है, गाना गाना है?' मैनें कहा 'जी, एक गाना तो आप को गाना पड़ेगा, मैं चाहता हूँ कि मेरी ज़िंदगी का पहला गाना जो है वह आप ही गायें।' तो उन्होने कहा 'कब करना है?' मैने कहा कि 'तीन चार दिन के अंदर अगर आप कर दें तो बहुत अच्छी बात है।' तो उन्होने कहा कि 'तीन चार दिन में थोड़े डेट है मेरे पास! कम से कम डेढ़ महीने तक बुकिंग है मेरी।' मैने कहा डरते डरते कि 'हाँ, मुझे मालूम है, फिर भी आप कुछ कोशिश करें तो हो जायेगा।' तो उन्होने कुछ दो तीन जगहों पर फ़ोन किये, करने के बाद उन्होने कहा कि 'चलो, तुम्हारे पहले गाने के लिये मैं तीन दिन के अंदर डेट देती हूँ, और वह गाना मुझे बता दो।' मैने उनको सुनाया, गाना सुनते ही मुझे बहुत आशिर्वाद किया।"

तो दोस्तों, इतना पढ़ने के बाद तो आप समझ ही गये होंगे कि ये बातें कौन कह रहे थे और किस गीत के बारे में कह रहे थे! जी हाँ, बिल्कुल ठीक समझे, विविध भारती के विशेष जयमाला कार्यक्रम में करीब करीब तीन दशक पहले ये बातें कही थी राहुल देव बर्मन साहब ने, अपने पहले गीत "घर आजा घिर आये बदरा साँवरिया" के बारे में। और यही गीत आज सुनिये 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में छोटे बर्मन साहब की ७० वीं जयंती पर. 'छोटे नवाब' फ़िल्म आयी थी सन् १९६३में जिसका निर्माण उस्मान अली ने किया था, निर्देशन किया एस. ए. अकबर ने और फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे महमूद, अमीता, मीनू मुमताज़, और अल्ताफ़। फ़िल्म तो बहुत ज़्यादा नहीं चली, लेकिन फ़िल्म अमर हो गयी केवल इस बात के लिये कि यह पंचम की पहली फ़िल्म थी। शैलेन्द्र के लिखे प्रस्तुत गीत को सुनवाने से पहले एक और रेडियो कार्यक्रम का एक अंश आप के साथ बाँटना चाहूँगा। एक बार विविध भारती के 'संगीत सरिता' कार्यक्रम में आशा भोंसले, राहुल देव बर्मन और गुलज़ार साहब ने शिरकत की थी और बातों बातों में बात छिड़ी थी लताजी और सचिन देव बर्मन के बीच चली ग़लतफ़हमी की। किस तरह से राहुल देव बर्मन के इसी गाने के ज़रिये उस बरसों पुरानी ग़लतफ़हमी का अंत हुआ था, पढ़िये निम्नलिखित अंश में -

पंचम: फ़िल्म 'छोटे नवाब' में मेरा पहला गाना रिकार्ड हुआ लताजी की आवाज़ में। इससे जुड़ी एक दिलचस्प कहानी है। एक कहावत है न कि पुराने चावल घमंडी होते हैं, तो मेरे पिताजी भी घमंडी थे, उनका दीदी के साथ कुछ अन-बन हो गयी थी। उन्होने कह दिया था कि 'मैं किसी और से गानें गवाउँगा।' तो वह क्या हुआ कि वह मेरा पहला पिक्चर था, मैं दीदी के पास गया और कहा कि 'आप को मेरे लिये गाना पड़ेगा।' उन्होने कहा कि 'क्यों नहीं गाऊँगी, ज़रूर गाऊँगी।' उन दिनों रिहर्सल हुआ करते थे। तो वो आयीं हमारे घर में रिहर्सल करने के लिये और रिहर्सल में गाना सुनके बहुत आशिर्वाद दिया, और उन्होने कहा कि 'पिताजी से नहीं मिलाओंगे?' मैने कहा कि 'वो दरवाज़े पे ख़ड़े हैं, दूसरे कमरे में, वो आने की सोच ही रहे हैं। उन्होने (लता) आवाज़ दी कि 'दादा, अंदर आइये।'

गुलज़ार: अच्छा, रूठे हुए थे!

पंचम: अंदर आ के बोले, 'लता, कितने डेट्स दे सकती हो मुझे?' वो ऐसे ही बात करते थे। बोलीं, 'आप को जितने चाहिये, एक महीने का चाहिये?' फिर उसके बाद पिताजी के साथ लताजी का अच्छा हो गया एक बार फिर।

आशा: एक बात पूछूँ? सच बतायेंगे? उस दिन आप अंदर से काँप रहे थे न?

पंचम: बिल्कुल! मैने पहली बार उन्हे १९५१ में "ठंडी हवायें लहराके आये" गाते हुए देखा था, 'she is so simple', लगता ही नहीं था कि इतनी बड़ी गायिका हैं।


तो दोस्तों, देखा आप ने कि किस तरह से पंचम के इस पहले पहले गीत ने बर्मन दादा और लता जी के बीच करीब ६ साल की अन-बन (१९५७ से १९६३ तक) को ख़त्म कर दिया, जिस वजह से फ़िल्म सगीत को एक बार फिर से लता और दादा के संगम से बनने वाले एक से एक नायाब गाने मिल सके। लेकिन आज ज़िक्र दादा बर्मन का नहीं बल्कि छोटे नवाब की चल रही है, तो आइये सुनते हैं राग मालगुंजी पर आधारित यह यादगार गीत।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें २ अंक और २५ सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के ५ गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा पहला "गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. बिमल रॉय की फिल्म में तलत साहब का गाया गीत.
२. हालाँकि बर्मन दा संगीतकार थे पर तलत को गायक लेने का सुझाव उनके सहायक जयदेव ने दिया था.
३. एक अंतरे की दूसरी पंक्ति इस शब्द से शुरू होती है -"गीत".

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
कल की पहेली में तो हमारे दिग्गज भी परेशान दिखे. पर स्वप्न मंजूषा जी आखिरकार बाज़ी मार ही गयी. आप शरद जी के स्कोर के करीब पहुँचने की सबसे सशक्त दावेदार हैं २० अंकों के लिए बधाई. दिशा जी ने हाथ आया मौका गँवा दिया. पराग जी सही जवाब पर आप फिर लेट हो गए. विनोद जी लक्ष्मी प्यारे की पहली फिल्म "पारसमणी" थी, न कि "धरती कहे पुकार के" जिसके गीत का आपने जिक्र किया, सुमित जी खुलासे के लिए धन्यवाद.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

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