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Sunday, April 22, 2012

हिन्दी फिल्मी गीतों में रवीद्र संगीत - एक शोध

स्वरगोष्ठी – ६७ में आज
रवीन्द्र-सार्द्धशती वर्ष में विशेष

‘पुरानो शेइ दिनेर कथा...’


हाँ एक ओर फ़िल्म-संगीत का अपना अलग अस्तित्व है, वहीं दूसरी ओर फ़िल्म-संगीत अन्य कई तरह के संगीत पर भी आधारित रही है। शास्त्रीय, लोक और पाश्चात्य संगीत का प्रभाव फ़िल्म-संगीत पर हमेशा रहा है और आज भी है। उधर बंगाल की संस्कृति में रवीन्द्र संगीत एक मुख्य धारा है, जिसके बिना बांग्ला संगीत, नृत्य और साहित्य अधूरा है। समय-समय पर हिन्दी सिने-संगीत-जगत के कलाकारों ने रवीन्द्र-संगीत को भी फ़िल्मी गीतों का आधार बनाया है। इस वर्ष पूरे देश मेँ रवीन्द्रनाथ ठाकुर की १५०वीं जयन्ती मनायी जा रही है। इस उपलक्ष्य मेँ हम भी उन्हें श्रद्धापूर्वक स्मरण करते हैं।

‘स्वरगोष्ठी’ के सभी संगीत रसिकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! इस स्तम्भ के वाहक कृष्णमोहन जी की पारिवारिक व्यस्तता के कारण आज का यह अंक मैं सुजॉय चटर्जी प्रस्तुत कर रहा हूँ। कविगुरु रवीन्द्रनाथ ठाकुर के लिखे गीतों का, जिन्हें हम "रवीन्द्र-संगीत" के नाम से जानते हैं, बंगाल के साहित्य, कला और संगीत पर जो प्रभाव पड़ा है, वैसा प्रभाव शायद शेक्सपीयर का अंग्रेज़ी जगत में भी नहीं पड़ा होगा। ऐसा कहा जाता है कि टैगोर के गीत दरअसल बंगाल के ५०० वर्ष के साहित्यिक और सांस्कृतिक मंथन का निचोड़ है। धनगोपाल मुखर्जी ने अपनी किताब 'Caste and Outcaste' में लिखा है कि रवीन्द्र-संगीत मानव-मन के हर भाव को प्रकट करने में सक्षम हैं। कविगुरु में छोटे से बड़ा, गरीब से धनी, हर किसी के मनोभाव को, हर किसी की जीवन-शैली को आवाज़ प्रदान की है। गंगा में विचरण करते गरीब से गरीब नाविक से लेकर अर्थवान ज़मिंदारों तक, हर किसी को जगह मिली है रवीन्द्र-संगीत में। समय के साथ-साथ रवीन्द्र-संगीत एक म्युज़िक स्कूल के रूप में उभरकर सामने आता है। रवीन्द्र-संगीत को एक तरह से हम उपशास्त्रीय संगीत की श्रेणी में डाल सकते हैं। अपने लिखे गीतों को स्वरबद्ध करते समय कविगुरु ने शास्त्रीय संगीत, बांग्ला लोक-संगीत और कभी-कभी तो पाश्चात्य संगीत का भी सहारा लिया है।

पंकज मलिक 
रवीन्द्र-संगीत पर रवीन्द्रनाथ ठाकुर द्वारा स्थापित "विश्वभारती विश्वविद्यालय" का नियंत्रण था। इस विश्वविद्यालय की अनुमति के बिना कोई रवीन्द्र-संगीत का गायन अथवा अन्य रूप में इस्तेमाल नहीं कर सकता था। फ़िल्मों में रवीन्द्र-संगीत की धारा को लाने में पहला क़दम उठाया था संगीतकार-गायक पंकज मल्लिक ने। १९३७ की फ़िल्म 'मुक्ति' के बांग्ला संस्करण में मल्लिक बाबू नें कविगुरु की रचनाओं का बृहद्‍ स्तर पर इस्तेमाल किया। अधिकांश धुनें कविगुरु की थीं, पर सर्वाधिक लोकप्रिय गीत "दिनेर शेषे घूमेर देशे..." की धुन मल्लिक बाबू नें ख़ुद बनाई थी। इस फ़िल्म के बाद भी पंकज मल्लिक रवीन्द्र-संगीत का इस्तेमाल व्यापक रूप से करते रहे और कविगुरु की रचनाओं को बंगाल के बाहर पहुँचाया। 'मुक्ति' के हिन्दी संस्करण में कानन देवी के स्वर में "साँवरिया मन भाया रे..." गीत रवीन्द्र-संगीत की छाया लिए हुए था जो न केवल बहुत लोकप्रिय हुआ बल्कि कानन देवी के गाये अति लोकप्रिय गीतों में से एक है। १९४८ की फ़िल्म 'अंजानगढ़' में पंकज मल्लिक और उत्पला सेन का गाया एक गीत था "संसार के आधार पर दया हम पे दिखाओ..." जो रवीन्द्रनाथ रचित "सर्बा खर्बा तार दाहे..." गीत पर आधारित था। यूँ तो इस फ़िल्म के संगीतकार थे रायचन्द बोराल, पर इस गीत का संगीत-संयोजन पंकज मल्लिक ने किया था। फ़िल्म के बांग्ला संस्करण में इस गीत को हेमन्त मुखर्जी और उत्पला सेन नें गाया है। रायचन्द बोराल ने १९४५ की फ़िल्म 'हमराही' (जो विमल राय निर्देशित प्रथम हिन्दी फ़िल्म थी) में रवीन्द्रनाथ रचित " मधुगन्धे भरा मधु स्निग्ध छाया..." को उसके मूल बांग्ला रूप में प्रस्तुत कर सुनने वालों को चमत्कृत कर दिया था।

फिल्म – हमराही : "मधुगन्धे भरा मधु स्निग्ध छाया..." : स्वर - हेमन्त मुखर्जी, बिनोता राय


अनिल विश्वास
न्यू थिएटर्स के संगीतकार पंकज मल्लिक और रायचन्द बोराल की जब बात चल ही रही है, तो वहाँ के तीसरे संगीतकार अर्थात्‍ तिमिर बरन का उल्लेख भी आवश्यक हो जाता है। पंकज बाबू की तरह तिमिर बरन ने संगीत का प्रयोग ज़्यादा तो नहीं किया पर १९५४ की 'बादबान' (एस.के. पाल के साथ) फ़िल्म में "कैसे कोई जिए, ज़हर है ज़िन्दगी आया तूफ़ान" (हेमन्त कुमार-गीता दत्त) को रवीन्द्र-संगीत ("तारे ना जानी...") पर आधारित कर ऐसा कम्पोज़ किया कि जिसे ख़ूब सराहना मिली। रबीन्द्र-संगीत का इस्तेमाल करने वाले न्यू थिएटर्स के बाहर के संगीतकारों में पहला नाम है अनिल बिस्वास का। बिस्वास ने मूल गीत के शब्दों को नहीं, बल्कि उनकी धुनों का प्रयोग किया। और उनके बाद भी तमाम संगीतकारों ने केवल रबीन्द्र-संगीत के धुनों का ही सहारा लिया। उपर्युक्त "मधुगंधे भरा..." गीत की धुन का प्रयोग अनिल बिस्वास ने अपनी १९६० की फ़िल्म 'अंगुलिमाल' में किया था, मीना कपूर और साथियों के गाये "मेरे चंचल नैना मधुरस के भरे..." गीत में। अनिल बिस्वास द्वारा स्वरबद्ध रवीन्द्र-संगीत पर आधारित सबसे लोकप्रिय रचना है, १९५४ की फ़िल्म 'वारिस' का "राही मतवाले, तू छेड़ एक बार मन का सितार..." गीत। तलत महमूद और सुरैया की आवाज़ों में यह गीत बहुत ज़्यादा लोकप्रिय तो हुआ पर बंगाल के बाहर जनसाधारण को यह पता भी नहीं चला कि दरसल इस गीत की धुन कविगुरु रचित "ओ रे गृहबाशी..." पर आधारित थी जो एक होली गीत है। यहाँ यह कहना ज़रूरी है कि कविगुरु होली के त्योहार को एक विशेष उत्सव की तरह गीत-संगीत-नृत्य के माध्यमों से मनाते थे और आज भी यह परम्परा विश्वभारती में कायम है।

रवीन्द्र-गीत : "ओ रे गृहबाशी..." : स्वर – श्रावणी सेन



संगीतकार सचिनदेव बर्मन ने रवीन्द्र-संगीत का हू-ब-हू प्रयोग ज़्यादा गीतों में नहीं किया। यह ज़रूर है कि उनके द्वारा स्वरबद्ध कई गीतों में रवीन्द्र-संगीत की छाया मिलती है। रवीन्द्र-संगीत पर आधारित दादा बर्मन का सर्वाधिक लोकप्रिय गीत है १९७३ की फ़िल्म 'अभिमान' का "तेरे मेरे मिलन की यह रैना..." जो रवीन्द्रनाथ रचित "जोदी तारे नाइ चिनी गो..." गीत पर आधारित है। इसे सुनिए और याद कीजिए "तेरे मेरे मिलन की यह रैना..." गीत को।

रवीन्द्र-गीत : "जोदी तारे नाइ चिनी गो..." : स्वर – राघव चट्टोपाध्याय



१९५० की देव आनन्द-सुरैया अभिनीत फ़िल्म 'अफ़सर' में सुरैया का गाया लोकप्रिय गीत "नैन दीवाने एक नहीं माने..." भी एक रवीन्द्र-रचना "शेदिन दुजोने दुलेछिलो बोने..." पर आधारित है। रवीन्द्र-संगीत की छाया लिये दादा बर्मन द्वारा स्वरबद्ध कुछ और गीत हैं "जायें तो जायें कहाँ..." (टैक्सी ड्राइवर), "मेरा सुन्दर सपना बीत गया..." (दो भाई), "मेघा छाये आधी रात..." (शर्मीली)। सचिन दा के बेटे राहुलदेव बर्मन ने बंगाल और नेपाल के लोक-संगीत का ख़ूब प्रयोग किया है, अपने गीतों में, पर एक-आध बार रवीन्द्र-संगीत की तरफ़ भी झुके हैं। फ़िल्म 'जुर्माना' में लता के गाये "छोटी सी एक कली खिली थी एक दिन बाग़ में..." गीत के लिए पंचम ने जिस रवीन्द्र-रचना को आधार बनाया, उसके बोल हैं "बसन्ते फूल गान्थलो आमार जयेर माला..."। इस मूल रवीन्द्र-रचना को १९४४ की बांग्ला फ़िल्म 'उदयेर पथे' में शामिल किया गया था। 'उदयेर पथे' दरसल बांग्ला-हिन्दी द्विभाषी फ़िल्म थी, जिसका हिन्दी में 'हमराही' के नाम से निर्माण हुआ था। इस फ़िल्म के एक गीत की चर्चा हम उपर कर चुके हैं।

राहुलदेव बर्मन ने १९८२ की फ़िल्म 'शौकीन' में आशा-किशोर से "जब भी कोई कंगना बोले..." गीत गवाया था जो रवीन्द्रनाथ रचित "ग्राम छाड़ा ओइ रांगा माटीर पथ..." की धुन पर आधारित था। '१९४२ ए लव स्टोरी' में कविता कृष्णमूर्ति का गाया "क्यों नए लग रहे हैं ये धरती गगन..." को भी रवीन्द्र-संगीत से प्रेरित पंचम ने ही एक साक्षात्कार में बताया था पर मूल रवीन्द्र-रचना की पहचान नहीं हो पायी है। इसी अंश का प्रयोग पंचम ने बरसों पहले 'हीरा-पन्ना' के शीर्षक गीत "पन्ना की तमन्ना..." के अन्तरे की पंक्ति "हीरा तो पहले ही किसी और का हो गया..." में किया था।

हेमन्त कुमार 
हेमन्त कुमार की आवाज़ में एक अत्यन्त लोकप्रिय रवीन्द्र-रचना है "मोन मोर मेघेरो शोंगी उड़े चोले दिग दिगन्तेरो पाने..."। हेमन्त कुमार ने ही इस गीत की धुन पर १९६४ की हिन्दी फ़िल्म 'माँ बेटा' में एक गीत कम्पोज़ किया था "मन मेरा उड़ता जाए बादल के संग दूर गगन में, आज नशे में गाता गीत मिलन के रे, रिमझिम रिमझिम रिमझिम..."। लता मंगेशकर का गाया यह गीत ज़्यादा सुनाई तो नहीं दिया पर इसे सुनने का अनुभव एक बहुत ही सुकूनदायक अनुभव है। इस गीत के फ़िल्मांकन में निरुपा रॉय सितार हाथ में लिए गीत गाती हैं और एक नर्तकी इस पर नृत्य कर रही हैं। इस बात का उल्लेख हम इसलिए कर रहे हैं क्योंकि इस नृत्य शैली को "रबीन्द्र-नृत्य" के नाम से जाना जाता है।

रवीन्द्र-गीत : "मोन मोर मेघेरो शोंगी..." : स्वर – हेमन्त मुखोपाध्याय


फिल्म – माँ बेटा : "मन मेरा उड़ता जाये...” : स्वर – लता मंगेशकर



बंगाल से ताल्लुक रखने वाले संगीतकारों में एक नाम बप्पी लाहिड़ी का भी है। यूँ तो बप्पी दा 'डिस्को किंग' के नाम से जाने जाते हैं, पर उन्होंने भी कई शास्त्रीय और लोक संगीत पर आधारित गीत रचे हैं। रवीन्द्र-संगीत का प्रयोग उन्होंने कम से कम दो बार किया है। १९८५ की फ़िल्म 'झूठी' में उन्होंने "चन्दा देखे चन्दा तो वो चन्दा शर्माये..." को उसी "जोदी तारे नाइ गो चीनी..." पर आधारित किया जिस पर सचिन दा ने "तेरे मेरे मिलन की यह रैना..." को कम्पोज़ किया था। दोनों ही गीत लता-किशोर के गाए हुए हैं, और दोनों ही फ़िल्मों के निर्देशक हैं ऋषिकेश मुखर्जी। क्या पता वो 'झूठी' के गीत में 'अभिमान' के उस गीत को पुनर्जीवित करना चाहते होंगे! १९८४ की फ़िल्म 'हम रहे न हम' में बप्पी दा ने एक अत्यन्त लोकप्रिय रवीन्द्र-रचना "पुरानो शेइ दिनेर कथा भूलबो की रे..." के शुरुआती अंश का प्रयोग कर एक सुन्दर गीत कम्पोज़ किया "रोशन रोशन रातें अपनी, दिन भी रोशन, जब से जीवन में तुम आये, तब से ऐसा जीवन..."। आशा-किशोर की युगल आवाज़ों में यह गीत था। वैसे यह भी एक रोचक तथ्य है कि मूल रवीन्द्रनाथ रचित "पुरानो शेइ दिनेर कथा..." की संगीत-रचना स्कॉटलैण्ड की एक धुन ‘Auld Lang Syne’ से मिलती-जुलती है। यह शोध का विषय होगा कि इन दोनों में से किस रचना ने पहले जन्म लिया।

मूल स्कॉटीश गीत : ‘Auld Lang Syne’



रबीन्द्रनाथ रचित "पुरानो शेइ दिनेर कथा" –



फ़िल्म - हम रहे न हम : "रोशन रोशन रातें अपनी...” : संगीत - बप्पी लाहिड़ी



बप्पी लाहिड़ी के संगीत में १९८६ की फ़िल्म 'अधिकार' में किशोर कुमार का गाया "मैं दिल तू धड़कन, तुझसे मेरा जीवन..." गीत भी रवीन्द्र-संगीत शैली में ही स्वरबद्ध एक रचना थी। दोस्तों, अब तक हिन्दी फ़िल्म-संगीत में रवीन्द्र-संगीत के प्रयोग की जितनी चर्चा हमने की है, उसमें जितने भी संगीतकारों का नाम आया है, वो सब बंगाल से ताल्लुक रखने वाले थे। बंगाल के बाहर केवल राजेश रोशन ही एक ऐसे संगीतकार हुए जिन्होंने रवीन्द्र-संगीत का प्रयोग कई बार अपने गीतों में किया। वैसे राजेश रोशन का बंगाल से रिश्ता तो ज़रूर है। उनकी माँ इरा रोशन बंगाली थीं। १९८१ की फ़िल्म 'याराना' में राजेश रोशन द्वारा स्वरबद्ध गीत "छू कर मेरे मन को, किया तूने क्या इशारा..." का मुखड़ा रवीन्द्रनाथ रचित "तोमार होलो शुरू, आमार होलो शाड़ा..." से प्रेरित था। यूँ तो इस रवीन्द्र-रचना को कई गायकों ने गाया, पर किशोर कुमार का गाया संस्करण सर्वाधिक लोकप्रिय हुआ था, और राजेश रोशन ने भी अपने गीत को किशोर दा से ही गवाया। भले राजेश रोशन ने केवल मुखड़े की धुन को ही प्रयोग किया था, पर कलकत्ते की जनता को क्रोधित करने में यही काफ़ी था। दरअसल राजेश रोशन ने इस धुन के इस्तेमाल के लिए विश्वभारती से अनुमति नहीं ली थी, जिस वजह से बंगाल में यह हंगामा हुआ। पर बंगाल के बाहर इस गीत ने इतनी लोकप्रियता हासिल की कि राजेश रोशन को कोई फ़र्क नहीं पड़ा। इतना ही नहीं, उन्होंने १९८४ की फ़िल्म 'इन्तहा' में फिर एक बार इसी धुन की छाया तले कम्पोज़ किया एक और गीत "तू ही मेरा सपना, तू ही मेरी मंज़िल...", और इसे भी किशोर कुमार से ही गवाया। १९९७ की फ़िल्म 'युगपुरूष' में राजेश रोशन ने दो गीतों में रवीन्द्र-संगीत की छटा बिखेरी। इनमें एक था आशा भोसले का गाया "कोई जैसे मेरे दिल का दर खटकाए..." (मूल रवीन्द्र रचना - "तुमि केमोन कोरे गान कोरो हे गुणी...") और दूसरा गीत था प्रीति उत्तम का गाया "बन्धन खुला पंछी उड़ा..." (मूल रवीन्द्र-रचना - "पागला हावा बादल दिने पागोल आमार मोन नेचे ओठे...")। "पगला हावार..." एक अत्यन्त लोकप्रिय रवीन्द्र-रचना है और बंगाल के बहुत सारे कलाकारों ने समय-समय पर इसे गाया है।

रवीन्द्र संगीत : "पागला हावार बादल दिने..." : स्वर - किशोर कुमार



फिल्म – युगपुरुष : "बन्धन खुला पंछी उड़ा..." : स्वर – प्रीति उत्तम


कहते हैं कि नौशाद द्वारा स्वरबद्ध लता-शमशाद का गाया "बचपन के दिन भुला न देना..." भी किसी रवीन्द्र-संगीत से प्रेरित है, ऐसा विश्वभारती का दावा है, पर वह कौन सा गीत है इसकी पुष्टि नहीं हो पायी है। ऐसे कई गानें हैं जिन्हें रवीन्द्र-संगीत शैली में कम्पोज़ किया गया है, पर सही-सही कहा नहीं जा सकता कि मूल रचना कौन सी है। फ़िल्म 'सुजाता' का "जलते हैं जिसके लिए, मेरी आँखों के दिये..." को भी रवीन्द्र-संगीत पर आधारित होने का दावा विश्वभारती ने किया है। इस तरह से हमने देखा कि हिन्दी फ़िल्मी गीतों में रवीन्द्र-संगीत की महक हमें कई बार मिली हैं। इसके लिए हिन्दी के संगीतकारों को श्रेय तो नहीं मिला, पर इस बात से कोई भी इंकार नहीं कर सकता कि जब-जब रवीन्द्र-संगीत हिन्दी फ़िल्मी गीतों में सुनाई दिया है, वो सभी गीत बेहद मधुर व कर्णप्रिय बने हैं। रवीन्द्र-संगीत इस देश की अनमोल धरोहर है जिसे हमें सहेज कर रखना है। जिन-जिन संगीतकारों ने रवीन्द्र-संगीत का प्रयोग अपने गीतों में किया है, और इस तरह से इसे बंगाल के बाहर पहुँचाने में योगदान दिया है, उन्हें हमारा सलाम।

आज की पहेली

आज की ‘संगीत-पहेली’ में हम आपको सुनवा रहे हैं, १९५९ की एक हिन्दी फिल्म के गीत का अंश। इस अंश को सुन कर आपको हमारे दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ७०वें अंक तक सर्वाधिक अंक अर्जित करने वाले पाठक-श्रोता हमारी दूसरी श्रृंखला के ‘विजेता’ होंगे।


१ – यह गीत किस राग पर आधारित है? आपको राग का नाम बताना है।

२ – गीत का ताल पहचानिए और हमें ताल का नाम भी बताइए।


आप अपने उत्तर हमें तत्काल swargoshthi@gmail.com पर भेजें। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के ६९वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं। हमसे सीधे सम्पर्क के लिए swargoshthi@gmail.com अथवा admin@radioplaybackindia.com पर भी अपना सन्देश भेज सकते हैं।

आपकी बात

‘स्वरगोष्ठी’ के ६५वें अंक में हमने आपको १९६६ मेँ प्रदर्शित फिल्म ‘साज और आवाज़’ के एक गीत का अंश सुनवाकर दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग मारवा और दूसरे का उत्तर है- संगीतकार नौशाद। इस बार दोनों प्रश्नों के सही उत्तर हमारे तीन नियमित पाठकों- पटना की अर्चना टण्डन, इंदौर की क्षिति तिवारी और मीरजापुर (उ.प्र.) के डा. पी.के. त्रिपाठी ने दिया है। इनके अलावा हमारे एक और नियमित पाठक बैंगलुरु के पंकज मुकेश ने संगीतकार को तो सही पहचाना किन्तु राग पहचानने में भूल कर दी। इन सभी प्रतिभागियों को रेडियो प्लेबैक इण्डिया की ओर हार्दिक बधाई। इनके साथ ही उन सभी संगीत-प्रेमियों का हम आभार व्यक्त करते हैं, जिन्होने ‘स्वरगोष्ठी’ के इस अंक को पसन्द किया।

झरोखा अगले अंक का

मित्रों, आगामी १ मई को हिन्दी, बांग्ला सहित अनेक भारतीय भाषाओं और बोलियों के पार्श्वगायक मन्ना डे का ९४वाँ जन्मदिवस है। उन्होने हिन्दी फिल्मों में सर्वाधिक राग-आधारित गीत गाये हैं। उनके जन्मदिवस के उपलक्ष्य में आगामी रविवार की सुबह ९-३० बजे आप और हम ‘स्वरगोष्ठी’ के अगले अंक में पुनः मिलेंगे और मन्ना डे के व्यक्तित्व और कृतित्व पर चर्चा करेंगे। तब तक के लिए हमें विराम लेने की अनुमति दीजिए।

सुजॉय चटर्जी

Tuesday, October 12, 2010

कैलाश खेर की सूफियाना आवाज़ है "अ फ़्लैट" मे तो वहीं ज़िंदगी से भरे कुछ गीत हैं "लाइफ़ एक्सप्रेस" में

ताज़ा सुर ताल ३९/२०१०


विश्व दीपक - 'ताज़ा सुर ताल' के सभी श्रोताओं व पाठकों को मेरा नमस्कार और सुजॊय जी, आपको भी!

सुजॊय - नमस्कार! विश्व दीपक जी, आज भी हम पिछले हफ़्ते की तरह दो फ़िल्में लेकर हाज़िर हुए हैं। साल के इन अंतिम महीनो में बहुत सी फ़िल्में प्रदर्शित होती हैं, और इसीलिए बहुत से नए फ़िल्मों के गानें इन दिनों जारी हो रहे हैं। ऐसे में ज़रूरी हो गया है कि जहाँ तक सभव हो हम दो दो फ़िल्मों के गानें इकट्ठे सुनवाएँ। आज के लिए जिन दो फ़िल्मों को हमने चुना है, उनमें एक है ख़ौफ़ और मौत के करीब एक कहानी, और दूसरी है ज़िंदगी से लवरेज़। अच्छा विश्व दीपक जी, क्या आप भूत प्रेत पर यकीन रखते हैं?

विश्व दीपक - देखिए, यह एक ऐसा विषय है कि जिस पर घण्टों तक बहस की जा सकती है। बस इतना कह सकता हूँ कि गीता में यही कहा गया है कि आत्मा अजर और अमर है, वह केवल शरीर बदलता रहता है। वैज्ञानिक दृष्टि से इसका क्या एक्स्प्लेनेशन है, यह तो विज्ञान ही बता सकता है।

सुजॊय - चलिए इतन बताइए कि फ़िल्मी आत्माओं के बारे में आपके क्या विचार हैं?

विश्व दीपक - हाँ, यह एक मज़ेदार सवाल आपने पूछा है। एक पुरानी हवेली, धुंद, पूनम का पूरा चाँद, पेड़ों पर सूखी टहनियाँ, सूखे पत्तों की सरसराहट, एक बूढ़ा चौकीदार जिसकी उम्र का अंदाज़ा लगा पाना किसी के बस की बात नहीं, ये सब हॊरर फ़िल्मों की बेसिक ज़रूरतें हैं। फ़िल्मी आत्माएँ रात के ठीक १२ बजे वाक पर निकलती हैं। वैसे आजकल उन्हें बहुत से टी.वी चैनलों पर रोज़ देखा जा सकता है और उन्हें भरपूर काम मिलने लगा है। फ़िल्मी आत्माओं को अपने बालों को बांधना गवारा नहीं होता, उन्हें खुला छोड़ना ही ज़्यादा पसंद है। एक और ख़ास बात यह कि फ़िल्मी आत्माओं को गीत संगीत में ज़बरदस्त रुचि होती है। बड़े ही सुर में गाती हैं, दिन भर घंटों रियाज़ करने के बाद रात १२ बजे ओपन एयर में अपनी गायकी के जल्वे प्रस्तुत करने निकल पड़ती हैं।

सुजॊय - वाह, क्या सही पहचाना है आपने! मैं भी कुछ जोड़ दूँ इसमें? फ़िल्मी और तेलीविज़न आत्माओं का पसंदीदा रंग होता है सफ़ीद। जॊरजेट उनकी पसंदीदा साड़ी है और एक नहीं बहुत सी होती हैं। तभी तो बरसों बरस भटकने के बावजूद हर रोज़ उनकी साड़ी उतनी ही सफ़ेद दिखाई देती है कि जैसे किसी डिटरजेण्ट का ऐड कर रही हों। मोमबत्ती का बड़ा योगदान है इन आत्माओं के जीवन में। आधुनिक रोशनी के सरंजाम उन्हें पसंद ही नहीं है।

विश्व दीपक - सुजॊय, फ़िल्मी आत्माओं की हमने बहुत खिंचाई कर ली, अब इस मज़ाक को विराम देते हुए सीरियस हो जाते हैं और अपने पाठकों को बता देते हैं कि आज की पहली फ़िल्म है 'अ फ़्लैट'। यह लेटेस्ट हॊरर फ़िल्म है अंजुम रिज़्वी की, जिसे निर्देशित किया है हेमन्त मधुकर ने। जिम्मी शेरगिल, संजय सुरी, हज़ेल, कावेरी झा और सचिन खेड़ेकर। बप्पी लाहिड़ी के सुपुत्र बप्पा लाहिड़ी का संगीत है इस फ़िल्म में, और फ़िल्म में गानें लिखे हैं विराग मिश्र ने। तो आइए पहला गाना सुनते हैं कैलाश खेर और सुज़ेन डी'मेलो की आवाज़ों में।

गीत - मीठा सा इश्क़ लगे, कड़वी जुदाई


सुजॊय - "मीठा सा इश्क़ लगे, कड़वी जुदाई, यार मेरा सच्चा लागे, झूठी ख़ुदाई, चांदनी ने तन पे मेरे चादर बिचाई, ओढ़ा जो तूने मुझको सांस लौट आई", विराग मिश्र के ये बोलों में वाक़ई जान है। विराग मिश्र क नाम सुनते ही मुझे यकायक कवि वीरेन्द्र मिश्र की याद आ गई। कहीं ये उनके सुपुत्र तो नहीं! ख़ैर, इन दिनों राहत फ़तेह अली ख़ान की आवाज़ ही ज़्यादा सुनाई दे रही थी, कैलाश खेर कहीं दूर से हो गए थे। बहुत दिनों के बाद इनकी आवाज़ सुन कर अच्चा लगा। कैलाश की आवाज़ में कुछ ऐसी बात है कि सीधे दिल पर असर करती है।

विश्व दीपक - गीत के ओपेनिंग म्युज़िक में सस्पेन्स झलकता है। यानी कि जिसे हम हौंटिंग नोट कहते हैं। सुज़ेन की आवाज़ भी इस गीत के फ़्युज़न मूड के साथ चलती है, और एक सस्पेन्स और हॊरर का अंदाज़ भी उसमें महसूस किया जा सकता है। इस गीत के दो रीमिक्स वर्ज़न भी है, 'अनप्लग्ड' और 'पार्टीमैप मिक्स'।

सुजॊय - आइए अब फ़िल्म का दूसरा गाना सुना जाए जिसे सोनू निगम, तुल्सी कुमार, राजा हसन और अदिती सिंह शर्मा ने गाया है। बोल हैं "दिल कशी"।

गीत - दिल कशी


विश्व दीपक - सोनू निगम का नाम किसी भी ऐल्बम पर देख कर दिल को चैन मिलता है कि चलो कम से कम एक गाना तो इस ऐल्बम में ज़रूर सुनने लायक होगा। और सोनू हर बार सब की उम्मीदों पर खरे उतरते हैं। कशिश भरे गीतों को वो बड़ा ख़ूबसूरत अंजाम देते हैं। और आजकल तो वो चुनिंदे गीत ही गा रहे हैं, इसलिए सुनने वालों की उम्मीदें उन पर लगी रहती हैं और इंतज़ार भी रहता है उनके गीतों का। तुलसी कुमार, जिनसे हिमेश रेशम्मिया ने बहुत से गानें गवाये हैं, उन्हें इस गीत में सोनू के साथ गाने का मौका मिला और उनका पोरशन भी कम नहीं है इस गीत में।

सुजॊय - लेकिन राजा हसन और अदिती सिंह शर्मा को गीत के शुरुआत में ही सुना जा सकता है। गीत की बात करें तो यह पूरी तरह से सोनू का गीत है और उनका जो एक स्टाइल है टिपिकल नशीले अंदाज़ में गाने का, इस गीत में भी वही अंदाज़-ए-बयाँ है। सोनू के इस जौनर के गानें अगर आपको पसंद आते हैं तो यह गीत भी ज़रूर पसंद आयेगा।

विश्व दीपक - फ़िल्म का तीसरा गाना है सुनिधि चौहान, राजा हसन, और बप्पा लाहिड़ी की आवाज़ों में, "चल हल्के हल्के"।

गीत - चल हल्के हल्के


सुजॊय - पूर्णत: सुनिधि चौहान का यह गीत है, राजा और बप्पा ने तो बस सहगायकों की भूमिका निभाई है। एक मस्त गाना जो एक जवान चुलबुली लड़की गाती है जो अपने मन के साथ चलती है और बाहरी दुनिया के किसी चीज़ के बारे में नहीं सोचती। ठीक ठाक गाना है, कोई नयी या ख़ास बात नज़र नहीं आई।

विश्व दीपक - अब तक तीन गानें हमने सुनें, लेकिन कोई भी गाना ऐसा नहीं महसूस हुआ जो एक लम्बी रेस का घोड़ा साबित हो सके। सभी गानें अच्छे हैं, लेकिन वह बात नहीं जिसे सुनने वाले कैच कर ले और गाने को कामयाबी की बुलंदी तक पहुँचाए। लेकिन यह याद रखते हुए कि बप्पा ने अभी अपना करीयर शुरु ही किया है, तो चलिए उन्हें यह मौका तो दे ही दिया जा सकता है। फ़िल्म का अंतिम गीत अब सुनने जा रहे हैं श्रेया घोषाल की आवाज़ में।

सुजॊय - "प्यार इतना ना कर" भी एक प्रेडिक्टेबल ट्रैक है। "ज़रा ज़रा बहकता है" जौनर का गाना है और श्रेया तो ऐसे गानें गाती ही रहती हैं, शायद इसीलिए मैंने "प्रेडिक्टेबल" शब्द का इस्तेमाल किया। चलिए आप ख़ुद ही सुनिए और अपनी राय दीजिए।

गीत - प्यार इतना ना कर


विश्व दीपक - एक बात आपने नोटिस की सुजॊय, कि 'अ फ़्लैट' एक हॊरर फ़िल्म है, लेकिन इसमें कोई भी गीत उस तरह का नहीं है। अब तक जितने भी इस तरह की फ़िल्में बनी हैं, सब में कम से कम एक गीत तो ऐसा ज़रूर होता है जो फ़िल्म के शीर्षक के साथ चलता है। ख़ैर, हॊरर, ख़ौफ़, और मौत के चंगुल से बाहर निकलकर आइए अब हम बैठते हैं 'लाइफ़ एक्स्प्रेस' में।

सुजॊय - 'लाइफ़ एक्स्प्रेस' एक कम बजट फ़िल्म है जिसमें संगीत है रूप कुमार राठौड़ का। इसलिए इस ऐल्बम से कुछ सुरीलेपन की उम्मीद ज़रूर की जा सकती है। संजय कलाटे निर्मित इस फ़िल्म के निर्देशक हैं अनूप दास और गीतकार हैं शक़ील आज़्मी। फ़िल्म के मुख्य कलाकार हैं रितुपर्णा सेनगुप्ता, दिव्या दत्ता, किरण जंगियानी, यशपाल शर्मा। फ़िल्म का पहला गाना सुनते हैं उदित नारायण और श्रेया घोषाल की आवाज़ों में।

गीत - फीकी फीकी सी लगे ज़िंदगी


विश्व दीपक - सुंदर कम्पोज़िशन और एक टिपिकल उदित - अल्का डुएट। माफ़ कीजिएगा, अल्का नहीं, बल्कि अब श्रेया आ गई हैं।

सुजॊय - वैसे श्रेया को पूरा सम्मान देते हुए मैं यह कहना चाहूँगा कि इस गीत में उदित जी के साथ अल्का याज्ञ्निक की आवाज़ ज़्यादा मेल खाती, और जैसे ९० का वह ज़माना भी याद आ जाता!

विश्व दीपक - गीत के बारे में यही कह सकता हूँ कि एक आम रोमांटिक डुएट है, स्वीट ऐण्ड सिम्पल, लेकिन इस तरह के गानें पहले भी बहुत बने हैं। कुछ कुछ 'कोई मिल गया' के शीर्षक गीत की तरह प्रतीत होता है।

सुजॊय - फ़िल्म का दूसरा गीत है स्वयं रूप कुमार राठौड़ की आवाज़ में।

गीत - थोड़ी सी कमी रह जाती है


विश्व दीपक - बहुत ही सुंदर कम्पोज़िशन, दर्द भी है, दर्शन भी है, रोमांस भी है, गीत के बोल ज़रूर "थोड़ी सी कमी रह जाती है" है, लेकिन गीत में कोई भी कमी नज़र नहीं आई।

सुजॊय - वाह, क्या बात कही है आपने! सही में मैं भी रूप कुमार राठौड़ से कुछ इसी तरह के एक गीत की उम्मीद कर रहा था इस ऐल्बम में। संगीत के साथ साथ उन्होंने अपनी आवाज़ से इस गीत को पूर्णता को पहुँचाया है। शायद इसीलिए उन्होंने इसे गाया होगा ताक़ि वो जिस तरह से चाहते थे, उसी तरह का अंजाम इस गीत को मिले।

विश्व दीपक - रूप साहब एक अच्छे गायक तो हैं ही, उन्होंने कुछ फ़िल्मों में इससे पहले भी संगीत दे चुके हैं, जिनमें शामिल हैं - 'वो तेरा नाम था' (२००४), 'मधोशी' (२००४), और 'ज़हर' (२००५)। आइए अब आगे बढ़ा जाए और सुनते हैं जगजीत सिंह की आवाज़ में एक प्रार्थना, "फूल खिला दे शाख़ों पर"।

गीत - फूल खिला दे शाख़ों पर


सुजॊय - बहुत ही गहराई और गंभीर सुनाई दी जगजीत साहब की आवाज़, और इस गीत को ऐसी ही आवाज़ की ज़रूरत थी इसमें कोई शक़ नहीं है। इस गीत के लिए जगजीत सिंह को चुनने के लिए रूप कुमार राठौड़ को दाद देनी ही पड़ेगी। कम से कम साज़ों के इस्तेमाल से इस गीत में और ज़्यादा असर पैदा हो गई है। इस गीत में वायलिन पर जो पीस बार बार आता है, उसी धुन का इस्तेमाल पहले किसी गीत में हो चुका है, लेकिन मुझे बिल्कुल याद नहीं आ रहा कि कौन सा गाना है। शायद अल्का याज्ञ्निक का गाया कोई गाना है।

विश्व दीपक - बोल भी बहुत अच्छे लिखे हैं शक़ील साहब ने। "वक़्त बड़ा दुखदायक है, पापी है संसार बहुत, निर्धन को धनवान बना, निर्बल को बल दे मालिक, कोहरा कोहरा सर्दी है काँप रहा है पूरा गाँव, दिन को तपता सूरज दे रात को कम्बल दे मालिक, बैलों को एक गठरी गाँस इंसानों को दो रोटी, खेतों को भर दे गेहूँ से, काँधों को हल दे मालिक, हाथ सभी के काले हैं, नज़रें सब की पीली हैं, सीना ढाम्प दुपट्टे से सर को आँचल दे मालिक"। ज़िंदगी की बेसिक ज़रूरतों की याचना मालिक से किया जा रहा है इस गीत में। बहुत सुंदर!!!

सुजॊय - और अब आज की प्रस्तुति का अंतिम गीत समूह स्वरों में। यह एक लोरी है, लेकिन कुछ अलग क़िस्म का है। आम तौर पर लोरी में कम से कम साज़ों का इस्तेमाल होता है क्योंकि निंदिया रानी को दावत दी जा रही होती है। लेकिन इस समूह लोरी में रीदम का भी इस्तेमाल किया गया है। सुंदर कम्पोज़िशन है।

विश्व दीपक - "झूले झूले पालना, बन्नी झूले पालना, उड़ ना जाए उड़न खटोला, धीरे से उछालना"। सुनते हैं....

गीत - झूले झूले पालना


सुजॊय - 'अ फ़्लैट' और 'लाइफ़ एक्स्प्रेस' के गानें हमने सुनें। 'अ फ़्लैट' की बात करें, तो एक ही गीत जो मुझे अच्छा लगा वह है कैलाश खेर का गाया "मीठा सा इश्क़ लगे"। और जहाँ तक 'लाइफ़ एक्स्प्रेस' की बात है, इस फ़िल्म के सभी गानें जो हमने सुनें, मुझे अच्छे लगे हैं। जैसा कि आपने कहा था पिछले हफ़्ते, हम रेटिंग का सिल्सिला भी समाप्त करते हैं। लेकिन हम अपने सभी श्रोता व पाठकों से निवेदन कर रहे हैं कि इन नये गीतों को भी सुनें और टिप्पणी में अपनी राय लिखें।

विश्व दीपक - सुजॉय जी, मैंने रेटिंग का सिलसिला समाप्त करने की मांग एक खास वज़ह से की थी। अक्सर ऐसा होता है कि अगर किसी एलबम का एक हीं गाना अच्छा हो तो पूरे एलबम की रेटिंग बहुत नीचे चली जाती है और उस स्थिति में पाठक/श्रोता की नज़र में एलबम का मोल बड़ा हीं कम हो जाता है। अब चूँकि हमारी रेटिंग ३ से ४.५ के बीच हीं होती थी तो जिस एलबम को ३ मिले, वह एलबम बाकियों से निस्संदेह कमजोर होगा। और हम तो कई सारे एलबमों को ३ की रेटिंग दिया करते थे, यानि सब के सब कमजोर। अब कमजोर एलबम पर कौन-सा श्रोता अपना समय नष्ट करना चाहेगा। फिर तो हमारी सारी की सारी मेहनत मिट्टी में हीं मिल गई। हम चाहते थे कि श्रोता अपने विचार रखे, लेकिन विचार तो तब हीं आएँगे ना, जब कोई उन गानों को सुनेगा। बस यही सोचकर मैंने आपसे, सजीव जी से और सभी श्रोताओं से रेटिंग हटाने/हटवाने की दरख्वास्त की थी। आप से और सजीव जी से हरी झंडी पाकर मुझे बहुत खुशी हो रही है। जब मैंने सजीव जी से इस बात का ज़िक्र किया तो उन्होंने मेरी मांग पर मुहर लगाने के साथ-साथ एक सलाह भी दी। उनका कहना था कि अगर हम श्रोताओं को इतना बता दें कि कौन-सा गीत सबसे अच्छा है और कौन-सा सबसे कमजोर तो श्रोताओं को एक सिलसिलेवार ढंग से गीत सुनने में सहूलियत होगी। श्रोता सबसे अच्छा गीत सबसे पहले सुनकर अपने दिन की बड़ी हीं खूबसूरत शुरूआत कर सकता है। मुझे उनका ख्याल बड़ा हीं नेक लगा। और इसी कारण से मैं आज के उन दो गीतों को "चुस्त-दुरुस्त गीत" और "लुंज-पुंज गीत" के तमगों से नवाज़ते हुए नीचे पेश कर रहा हूँ। यह निर्णय मैंने बड़ी जल्दी में ले लिया है, इसलिए सुजॉय जी आपसे और सभी श्रोताओं से मेरा यह आग्रह है कि यह जरूर बताएँ कि रेटिंग हटाकर "आवाज़ की राय में" शुरू करने का निर्णय कितना सही है और कितना गलत। चलिए तो इन्हीं बातों के साथ मैं आज़ की समीक्षा के समाप्त होने की विधिवत घोषणा करता हूँ। अगली कड़ी में फिर से मुलाकात होगी।

आवाज़ की राय में

चुस्त-दुरुस्त गीत: फूल खिला दे शाखों पर

लुंज-पुंज गीत: चल हल्के हल्के

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