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Wednesday, March 10, 2010

ख़ाक हो जायेंगे हम तुम को ख़बर होने तक.. उस्ताद बरकत अली खान की आवाज़ में इश्क की इन्तहा बताई ग़ालिब ने

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #७४

क्कीस बरस गुज़रे आज़ादी-ए-कामिल को,
तब जाके कहीं हम को ग़ालिब का ख़्याल आया ।
तुर्बत है कहाँ उसकी, मसकन था कहाँ उसका,
अब अपने सुख़न परवर ज़हनों में सवाल आया ।

सौ साल से जो तुर्बत चादर को तरसती थी,
अब उस पे अक़ीदत के फूलों की नुमाइश है ।
उर्दू के ताल्लुक से कुछ भेद नहीं खुलता,
यह जश्न, यह हंगामा, ख़िदमत है कि साज़िश है ।

जिन शहरों में गुज़री थी, ग़ालिब की नवा बरसों,
उन शहरों में अब उर्दू बे नाम-ओ-निशां ठहरी ।
आज़ादी-ए-कामिल का ऎलान हुआ जिस दिन,
मातूब जुबां ठहरी, गद्दार जुबां ठहरी ।

जिस अहद-ए-सियासत ने यह ज़िन्दा जुबां कुचली,
उस अहद-ए-सियासत को मरहूमों का ग़म क्यों है ।
ग़ालिब जिसे कहते हैं उर्दू ही का शायर था,
उर्दू पे सितम ढा कर ग़ालिब पे करम क्यों है ।

ये जश्न ये हंगामे, दिलचस्प खिलौने हैं,
कुछ लोगों की कोशिश है, कुछ लोग बहल जाएँ ।
जो वादा-ए-फ़रदा, पर अब टल नहीं सकते हैं,
मुमकिन है कि कुछ अर्सा, इस जश्न पर टल जाएँ ।

यह जश्न मुबारक हो, पर यह भी सदाकत है,
हम लोग हक़ीकत के अहसास से आरी हैं ।
गांधी हो कि ग़ालिब हो, इन्साफ़ की नज़रों में,
हम दोनों के क़ातिल हैं, दोनों के पुजारी हैं ।

"जश्न-ए-ग़ालिब" नाम की यह नज़्म उर्दू के जानेमाने शायर "साहिर लुधियानवी" की है। यह नज़्म उन्होंने १९६८ में लिखी थी। गौरतलब है कि १९६८ में हीं तत्कालीन राष्ट्रपति ज़ाकिर हुसैन की देखरेख में एक समिति बनाई गई थी, जिसने यह निर्णय लिया था कि ग़ालिब की मृत्यु के सौ साल होने के उपलक्ष्य में अगले साल यानि कि १९६९ में एक ग़ालिब मेमोरियल की स्थापना की जाए। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी को उस समिति की अध्यक्षा और फ़खरूद्दीन अली अहमद (जो कि १९७४ में देश के राष्ट्रपति बने) को उस समिति का सेक्रेटरी नियुक्त किया गया। समिति के प्रयासों के बाद १९६९ में तो नहीं लेकिन १९७१ में ग़ालिब इन्स्टीच्युट (ऐवान-ए-ग़ालिब) की स्थापना की गई जिसका उद्धाटन श्रीमती इंदिरा गाँधी ने किया था। इन्स्टीच्युट बन तो गया लेकिन लोगों को इसकी याद साल में एक या दो बार हीं आती है। बशीर बद्र साहब लिखते हैं कि यह इन्स्टीच्युट जिस उद्देश्य से बनाया गया था, वह उद्देश्य कहीं भी फ़लित होता नहीं दीखता... हाँ कभी-कभार मुशायरों का आयोजन हो जाता है, लेकिन उन मुशायरों का रंग शायराना होने से ज़्यादा बेमतलब के चमक-धमक से पुता दिखता है। "साहिर" साहब को इसी बात का अंदेशा था। तभी तो वो कहते हैं कि अगर ग़ालिब को याद करना हीं था तो इसमें २१ साल क्यों लगे। २१ साल तक किसी को यह याद नहीं रहा कि ग़ालिब उर्दू के सर्वश्रेष्ठ (अगर मीर को ध्यान में न रखा जाए क्योंकि ग़ालिब खुद को मीर से बहुत नीचे मानते थे) थे, हैं और रहेंगे, फिर उन्हें नवाज़नें में इतनी देर क्यों। यह महज़ एक खानापूर्ति तो नहीं। तभी तो वो कहते हैं कि पहले जिन गलियों में ग़ालिब बसते थे, वहाँ अब उर्दू कहाँ और फिर उर्दू को मारकर उर्दू के शायर को पहचानना कहाँ की समझदारी है, कहाँ का इंसाफ़ है। कहीं यह मुस्लिम कौम को खुश करने की एक सियासती चाल तो नहीं। साहिर का यह गुस्सा कितना जायज है, यह तो वही जानते हैं (या शायद हम भी जानते हैं, लेकिन खुलकर सामने आना नहीं चाहते), लेकिन इतना तो सच है हीं कि "ग़ालिब हो या गाँधी, इन्हें मारने वाले भी हम हीं हैं और पूजने वाले भी हम हीं हैं।"

साहिर ने तो बस उर्दू की बात की है, लेकिन आज जो हालात हैं उसमें हिन्दी की दुर्दशा भी कुछ कम नहीं। आज की अवाम अगर उर्दू के किसी शब्द का अर्थ न जाने तो यह कहा जा सकता है कि उर्दू अब स्कूलों में उतनी पढाई नहीं जाती, जितनी आजादी के वक्त या पहले पढी-पढाई जाती थी, लेकिन अगर किसी को हिन्दी का कोई शब्द मालूम न हो तो इसे आप क्या कहिएगा। कहने को हिन्दी हमारी राष्ट्रभाषा है(वैसे कई लोग यह बात नहीं मानते, लेकिन दिल में सभी जानते हैं) लेकिन ऐसे कई सारे लोग हैं जो हिन्दी को रोमन लिपि में हीं पढ पाते है, देवनागरी पढने में उन्हें अपनी पिछली सात पुश्तें याद आ जाती हैं। तो कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि आज इस देश में इसी देश की भाषाएँ (हिन्दी, उर्दू...) नकारी जाने लगी हैं, जो किसी भी भाषा के साहित्य और साहित्यकारों के लिए एक शाप के समान है। चलिए ग़ालिब और साहिर के बहाने हमने कई घावों को कुरेदा, कई ज़ख्मों को महसूस किया.. अब हम ज़रा ग़ालिब के इजारबंद की बात कर लें वो भी उर्दू के जानेमाने शायर निदा फ़ाज़ली के शब्दों में।

ग़ालिब म्यूज़ियम से निकलकर पुरानी दिल्ली की टेढ़ी-मेढ़ी गलियों से गुज़रकर मैं बल्लीमारान में सहमी सिमटी उस हवेली में पहुँच गया जहाँ ग़ालिब आते हुए बुढ़ापे में गई हुई जवानी का मातम कर रहे थे. इस हवेली के बाहर अंग्रेज़ दिल्ली के गली-कूचों में १८५७ का खूनी रंग भर रहे थे. ग़ालिब का शेर है -

हम कहाँ के दाना थे किस हुनर में यकता थे
बेसबब हुआ ‘ग़ालिब’ दुश्मन आसमाँ अपना


हवेली के बाहर के फाटक पर लगी लोहे की बड़ी सी कुंडी खड़खड़ाती है. ग़ालिब अंदर से बाहर आते हैं तो सामने अंग्रेज़ सिपाहियों की एक टोली नज़र आती है. ग़ालिब के सिर पर अनोखी सी टोपी, बदन पर कढ़ा हुआ चोगा और इसमें से झूलते हुए ख़ूबसूरत इज़ारबंद
को देखकर टोली के सरदार ने टूटी फूटी हिंदुस्तानी में पूछा, “तुमका नाम क्या होता?”
ग़ालिब - “मिर्जा असदुल्ला खाँ ग़ालिब उर्फ़ नौश.”
अंग्रेज़ -“तुम लाल किला में जाता होता था?”
ग़ालिब-“जाता था मगर-जब बुलाया जाता था.”
अंग्रेज़-“क्यों जाता होता था?”
ग़ालिब- “अपनी शायरी सुनाने- उनकी गज़ल बनाने.”
अंग्रेज़- “यू मीन तुम पोएट होता है?”
ग़ालिब- “होता नहीं, हूँ भी.”
अंग्रेज़- “तुम का रिलीजन कौन सा होता है?”
ग़ालिब- “आधा मुसलमान.”
अंग्रेज़- “व्हाट! आधा मुसलमान क्या होता है?”
ग़ालिब- “जो शराब पीता है लेकिन सुअर नहीं खाता.”
ग़ालिब की मज़ाकिया आदत ने उन्हें बचा लिया.

मैंने देखा उस रात सोने से पहले उन्होंने अपने इज़ारबंद में कई गाठें लगाई थीं. ग़ालिब की आदत थी जब रात को शेर सोचते थे तो लिखते नहीं थे. जब शेर मुकम्मल हो जाता था तो इज़ारबंद में एक गाँठ लगा देते थे. सुबह जाग कर इन गाठों को खोलते जाते थे और इस तरह याद करके शेरों को डायरी में लिखते जाते थे.

इज़ारबंद से ग़ालिब का रिश्ता अजीब शायराना था. इज़ारबंद दो फारसी शब्दों से बना हुआ एक लफ्ज़ है. इसमें इज़ार का अर्थ जामा होता है और बंद यानी बाँधने वाली रस्सी. औरतों के लिए इज़ारबंद में चाँदी के छोटे छोटे घुँघरु भी होते थे और इनमें सच्चे मोती भी टाँके जाते थे. लखनऊ की चिकन, अलीगढ़ की शेरवानी, भोपाल के बटुवों और राजस्थान की चुनरी की तरह ये इज़ारबंद भी बड़े कलात्मक होते थे। ये इज़ारबंद आज की तरह अंदर उड़स कर छुपाए नहीं जाते थे. ये छुपाने के लिए नहीं होते थे. पुरुषों के कुर्तों या महिलाओं के ग़रारों से बाहर लटकाकर दिखाने के लिए होते थे. पुरानी शायरी में ख़ासतौर से नवाबी लखनऊ में प्रेमिकाओं की लाल चूड़ियाँ, पायल, नथनी और बुंदों की तरह इज़ारबंद भी सौंदर्य के बयान में शामिल होता था। ग़ालिब तो रात के सोचे हुए शेरों को दूसरे दिन याद करने के लिए इज़ारबंद में गिरहें लगाते थे और उन्हीं के युग में एक अनामी शायर नज़ीर अकबराबादी इसी इज़ारबंद के सौंदर्य को काव्य विषय बनाते थे।

ग़ालिब की बात हो गई और ग़ालिब के इज़ारबंद की भी। अब हम ग़ालिब के चंद शेरों पर नज़र दौड़ा लेते हैं:

आ कि मेरी जान को क़रार नहीं है
ताक़त-ए-बेदाद-ए-इन्तज़ार नहीं है

तू ने क़सम मयकशी की खाई है "ग़ालिब"
तेरी क़सम का कुछ ऐतबार नहीं है


ग़ालिब के इन शेरों के बाद अब वक्त है आज की गज़ल से रूबरू होने का। इस गज़ल को उस्ताद बड़े गुलाम अली खां साहब के छोटे भाई और आज के दौर के महान फ़नकार गुलाम अली के गुरू उस्ताद बरकत अली खां साहब ने गाया है। बरकत अली साहब का जन्म १९०७ में हुआ था और १९६३ में जहां-ए-फ़ानी से उनकी रूख्सती हुई। उन्होंने ग़ालिब को बहुत गाया है। आज की यह गज़ल उनकी इसी बेमिसाल गायकी का एक प्रमाण है। बरकत साहब के बारे में फिर कभी विस्तार से चर्चा करेंगे। अभी तो मुहूर्त है ग़ालिब के शब्दों और बरकत साहब की आवाज़ में गोते लगाने का। तो तैयार हैं ना आप? :

आह को चाहिये इक उम्र असर होने तक
कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक

आशिक़ी सब्र-तलब और तमन्ना बेताब
दिल का क्या रंग करूँ ख़ून-ए-जिगर होने तक

हम ने माना के तग़ाफ़ुल न करोगे लेकिन
ख़ाक हो जायेंगे हम तुम को ख़बर होने तक

पर्तौ-ए-खुर से है शबनम को फ़ना की ____
मैं भी हूँ एक इनायत की नज़र होने तक

ग़मे-हस्ती का 'असद' किस से हो जुज़ मर्ग इलाज
शम्म'अ हर रंग में जलती है सहर होने तक




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफ़िल में मैं गैर-हाज़िर था और सजीव जी आवाज़ के हीं दूसरे कामों में व्यस्त थे, इसलिए महफ़िल में नियमानुसार पिछली महफ़िल के साथी पेश नहीं हो सका। इसके लिए हम क्षमाप्रार्थी हैं। इस महफ़िल से मैं वापस आ चुका हूँ और इस कारण हर चीज ढर्रे पर वापस आ गई है। तो लुत्फ़ लें पिछली महफ़िल की टिप्पणियों का।

पिछली महफिल का सही शब्द था "आस्ताँ" और शेर कुछ यूँ था-

दैर नहीं हरम नहीं दर नहीं आस्ताँ नहीं
बैठे हैं रहगुज़र पे हम ग़ैर हमें उठाये क्यूँ

इस शब्द की सबसे पहले पहचान की सीमा जी ने। सीमा जी आपने ये सारे बेश-कीमती शेर पेश किए:

हर आस्ताँ पे अपनी जबीने-वफ़ा न रख
दिल एक आईना है इसे जा-ब-जा न रख (लाल चंद प्रार्थी 'चाँद' कुल्लुवी )

वफ़ा कैसी कहाँ का इश्क़ जब सर फोड़ना ठहरा
तो फिर ऐ संग-ए-दिल तेरा ही संग-ए-आस्ताँ क्यों हो (ग़ालिब)

कोई जबीं न तेरे संग-ए-आस्ताँ पे झुके
कि जिंस-ए-इज्ज़-ओ-अक़ीदत से तुझ को शाद करे
फ़रेब-ए-वादा-ए-फ़र्द पे अएतमाद् करे
ख़ुदा वो वक़्त न लाये कि तुझ को याद आये (फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ )

शरद जी, आपके ये दोनों शेर कमाल के हैं। ख्वातीन-ओ-हज़रात गौर फ़रमाएँगे:

शऊरे सजदा नहीं है मुझको तो मेरे सजदों की लाज रखना ।
ये सर तेरे आस्ताँ से पहले किसी के आगे झुका नहीं है । (शायर पता नहीं)

मै तेरे आस्ताँ के सामने से क्यों गुज़रूँ
जब नहीं सीढियाँ , तू छत पे कैसे आएगी।

निर्मला जी, दिनेश जी, सतीश जी, अरविंद जी... आप सभी का इस महफ़िल में तह-ए-दिल से स्वागत है। उम्मीद करता हूँ कि आपको हमारी महफ़िल पसंद आई होगी इसलिए इल्तज़ा करता हूँ कि आगे भी अपनी उपस्थिति बनाए रखिएगा। एक बात और.. हमारी महफ़िल में खाली हाथ नहीं आते.... मतलब कि एकाध शेर की नवाजिश तो करनी हीं होगी। क्या कहते हैं आप? :)

शन्नो जी.. सुमित जी और नीलम जी आपके जिम्मा हैं। इनमें से कोई भी गैर-हाज़िर रहा तो आपकी हीं खबर ली जाएगी :) चलिए इस बार सुमित जी आ गए हैं, अब दूसरे यानि कि नीलम जी की फ़िक्र कीजिए। बातों-बातों में आपकी पंक्तियाँ तो भूल हीं गया:

ना वो हर चमन का फूल थी
ना वो किसी रास्ते का धूल थी
ना थी वीराने में कोई आस्ताँ
वो थी गुजर गयी एक दास्ताँ। (स्वरचित.. मैने कुछ बदलाव किए हैं, जो मुझे सही लगे :) )

शामिख जी, आखिरकार आप को हमारी महफ़िल की याद आ हीं गई। चलिए कोई बात नहीं.. देर आयद दुरूस्त आयद। ये रहे आपके शेर:

ता अर्ज़-ए-शौक़ में न रहे बन्दगी की लाग
इक सज्दा चाहता हूँ तेरी आस्तां से दूर (फ़ानी बदायूँनी)

शाख़ पर खून-ऐ-गुल रवाँ है वही,
शोखी-ऐ-रंग-गुलिस्तान है वही,
सर वही है तो आस्तां है वही (अनाम)

सुमित जी, महफ़िल में आते रहिएगा नहीं तो शन्नो जी की छड़ी चल जाएगी.. हा हा हा। यह रहा आपका शेर:

फिर क्यूँ तलाश करे कोई और आस्ताँ,
वो खुशनसीब जिसको तेरा आस्ताँ मिले। (अनाम)

अवनींद्र जी, हमें पता नहीं था कि आप इस कदर कमाल लिखते हैं। आपके ये दोनों दो-शेर (चार पंक्तियाँ) खुद हीं इस बात के गवाह हैं:

मेरे कांधे से अपना हाथ उठा ले ऐ दोस्त
इतना टूटा हूँ कि छूने से बिखर जाऊंगा ......!!
मेरी आस्तां से तुम चुप चाप गुजर जाना
हाल जो पूछ लिया मेरा तो मर जाऊंगा ( स्वरचित )

रूह से लिपटे हुए सितम उठ्ठे
आँखों में लिए जलन उठ्ठे
ओढ़ के आबरू पे कफ़न उठ्ठे
यूँ तेरी आस्तां से हम उठ्ठे (स्वरचित )

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Tuesday, August 11, 2009

खुदाया तूने कैसे ये जहां सारा बना डाला.....गुलाम अली की मार्फ़त पूछ रहे हैं आनंद बख्शी

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #३७

दिशा जी की पसंद की दूसरी गज़ल लेकर आज हाज़िर हैं हम। आज के अंक में जो गज़ल हम आप सबको सुनवाने जा रहे हैं वह वास्तव में तो एक फिल्म से ली हुई है लेकिन हमारे आज के फ़नकार ने इस गज़ल को मंच से इतनी बार पेश किया है कि लोग अब इसे गैर-फ़िल्मी गज़ल मानने लगे हैं। इस गज़ल की गुत्थी इतनी उलझी हुई है कि एकबारगी तो हमें भरोसा हीं नहीं हुआ कि इसे माननीय अनु मलिक साहब ने संगीतबद्ध किया होगा। फिर हमने अंतर्जाल की खाक छान दी ताकि हमें वास्तविक संगीतकार की जानकारी मिल जाए। ज्यादातर जगहों पर अनु मलिक का हीं नाम था ,लेकिन कुछ लोग अब भी यह दावा करते हैं कि इसे गुलाम अली(हमारे आज के फ़नकार) ने खुद हीं संगीतबद्ध किया है। वैसे हमारी खोज को तब विराम मिला जब गुलाम अली साहब का एक साक्षात्कार हमारे हाथ लगा। उन्होंने उस साक्षात्कार में स्वीकार किया है कि इस गज़ल में संगीत अनु मलिक का हीं है। स्क्रीन इंडिया के एक इंटरव्यू में उनसे जब यह पूछा गया कि अनु मलिक का कहना है कि महेश भट्ट की फ़िल्म "आवारगी" की एक गज़ल "चमकते चाँद को टूटा हुआ तारा बना बैठा" को उन्होंने हीं कम्पोज़ किया है। क्या आप भी यह मानते हैं? तो इस पर गुलाम अली साहब ने दो टूक शब्दों में यह जवाब दिया कि "हाँ यह उनकी हीं ओरिजिनल कम्पोजिशन थी। मैने बस उनके लिए हीं नहीं बल्कि नदीम-श्रवण के लिए भी बेवफ़ा फ़िल्म की एक गज़ल को अपनी आवाज़ दी है। ये उनकी अपनी धुने हैं। दिल मानता तो नहीं, लेकिन जब गुलाम अली साहब ने खुद हीं ऐसा कहा है तो सारी अटकलें यहीं समाप्त हो जाती हैं। तो आप सब अब तक यह समझ हीं गए होंगे कि हमारी आज की गज़ल कौन-सी है और इसे किसने अपनी आवाज़ से सजाया है। इस गज़ल के साथ एक और शख्स का नाम जुड़ा है। वैसे तो हिंदी फ़िल्मों में इनसे बड़ा गीतकार आज तक कोई नहीं हुआ लेकिन गज़लों के मामले में इनका हाथ कुछ तंग है। इस हाल में अगर आपको यह पता चले कि आज की गज़ल इन्हीं की लिखी हुई है तो एक सुखद आश्चर्य होता है। तो चलिए जानकारियों का सफ़र शुरू करते हैं गुलाम अली के साथ।

यह तो सबको पता है कि गुलाम अली साहब ने अपने शुरूआती दिनों में रेडियो लाहौर में गायकी की थी। उन्हीं पुराने दिनों को याद करते हुए बीबीसी हिंदी सेवा के विशेष कार्यक्रम "एक मुलाकात" में गुलाम अली साहब कहते हैं: असल में वही दिन थे, जिन्होंने मुझे यहाँ तक पहुँचाया. अब से तकरीबन 50 साल पहले की बात थी, तब मैं 14 साल का था. मैं रेडियो में ऑडीशन देने गया था. वहाँ निदेशक आगा बशीर साहब थे और उनके बगल में अय्यूब रमानी साहब थे. ऑडीशन के दौरान जब लाल बत्ती जली तो मैं घबरा सा गया था. हालाँकि रियाज़ करते रहने के कारण गाने में मुझे झिझक नहीं थी. मैने आ..आ.. ही कहा था उन्होंने कहा कि बस, बस......मुझे बहुत दुख हुआ कि मैं तो इन्हें सुनाने आया था और इन्होंने सुना ही नहीं. बाद में अय्यूब साहब ने मुझसे पूछा कि तुम उदास क्यों हो. मैंने कहा कि आपने तो मुझे सुना ही नहीं. उन्होंने क़ाग़ज दिखाते हुए कहा कि घबराते क्यों हो, बशीर साहब ने 'गुड' नहीं 'एक्सीलेंट' लिखा है. पाँच महीने में ही मेरा नाम लोगों की ज़ुबान पर चढ़ गया. पाकिस्तान में ही नहीं हिंदुस्तान में भी मुझे लोग सुनते थे. इसके अलावा उनसे जब पूछा गया कि क्या बड़े गुलाम अली खां साहब ने भी यह कहा था कि तुम मेरा नाम रौशन करोगे तो उनका जवाब कुछ यूँ था: जब मेरे वालिद ने बड़े ग़ुलाम अली साहब से मुझे सिखाने की गुजारिश की तो उन्होंने कहा कि मेरी शागिर्दी क्यों करते हो, मैं तो यहाँ रहता नहीं. फिर मेरे वालिद ने बड़े ग़ुलाम अली के दोस्तों बग़ैरह से सिफ़ारिशें करवाईं और जोर देकर कहा कि आप ही इसे सिखाएं. उन्होंने मुझे कुछ सुनाने के लिए कहा. मैने उन्हीं की ठुमरी 'सैंया बोलो तनिक मुँह से रहियो न जाए....' वो हंसने लगे. उन्होंने मुझे अपने पास बुलाया और प्यार किया और कहा कि कल आपकी शागिर्दी होगी. सच्ची बात ये है कि ऐसे उस्ताद की शागिर्दी होना मुक़द्दर की बात है. गुलाम अली साहब के अनुसार उनके जीवन और गाने में कोई फ़र्क नहीं है। वे अपने जीवन को अपनी गायकी से अलग करके नहीं देख सकते। उन्हीं के शब्दों में: मेरा तो जीवन और गाना एक ही है. यानी गाना जीवन है और जीवन गाना. मेरे लिए ये आपस में जुड़े हैं. मैं ख़ाली भी होता हूँ तो दिमाग़ में हर समय संगीत ही चलता रहता है. बस मेरा ज़ोर क्लासिकल पर रहता है. जिसे शास्त्रीय संगीत की जानकारी नहीं होगी वो आगे नहीं बढ़ सकता. मेरा तो ये कहना है कि जब भी गाया जाए कुछ हटकर गाया जाए. बस इसी तरह लफ़्जों को सोचते रहते हैं. गुलाम अली से जुड़ी और भी कई सारी मज़ेदार बातें हैं,लेकिन वे सब फिर कभी। अभी आनंद बख्शी साहब (जी हाँ यह गज़ल उन्हीं की लिखी हुई है...चौंक गए ना!) की ओर रूख करते हैं।

आनंद बख्शी साहब एक ऐसे शख्स हैं, जिनके गीतों को सुनकर न जाने कितनी पीढियाँ (हमारी पीढी और हमसे एक सोपान पहले की पीढी तो निस्संदेह)जवान हुई हैं। भले हीं इस दौरान हम में से कई लोगों ने उन्हें भुला दिया हो लेकिन उनके गीतों को भुलाना आसान नहीं। हम जैसे भूले-भटकों को राह दिखाने के लिए हीं "विनय प्रजापति" जी आनंद बख्शी साहब पर एक ब्लाग चला रहे हैं। मौका मिले तो एक बार आप भी चक्कर लगा के आ जाईयेगा। वैसे आनंद बख्शी के जीवन के बारे में कई लोगों ने बहुत कुछ लिखा है, लेकिन चूँकि हमें कुछ अलग करने की आदत है, इसलिए हम उनके सुपुत्र "राकेश आनंद बख्शी" की कही कुछ बातें लेकर यहाँ हाज़िर हुए हैं। ये बातें उन्होंने "सुपर मैग्जीन" के साथ इंटरव्यू में कहीं थी। मेरे पिताजी ने १९५७ से २००२ के बीच ८०० से भी ज्यादा फिल्मों के लिए ३५०० से भी ज्यादा गाने लिखे हैं। इतना होने के बावजूद जब भी वो कोई नया गाना लिखने बैठते तो उन्हें हर बार यह लगता था कि कहीं इस बार वे असफ़ल न हो जाएँ। इस डर के बावजूद वे सफ़ल हुए और इसका एकमात्र कारण यह था कि हर बार वे ग्राउंड ज़ीरो से शुरूआत करते थे। उन्हें अपनी सफ़लता पर तनिक भी दंभ न था। उन्होंने मुझे सिखाया कि "खुद पर संदेह होना या फिर आत्म-विश्वास की कमी आम चीजें हैं। इनसे कभी भी विचलित नहीं होना चाहिए, बल्कि ये सारी चीजें हीं हमें ताकत देती हैं।" उनका मानना था कि "हिट फ़िल्म बनाना या हिट स्क्रिप्ट लिखना बड़ी बात नहीं है। हिट और फ्लाप तो आते जाते रहते हैं, हमें इन पर ज्यादा सोच-विचार नहीं करना चाहिए। जो चीज मायने रखती है वह यह है कि इनके बाद या इनके दौरान आपका औरों के साथ कैसा बर्ताव रहा है, आप खुद किस तरह के इंसान बन गए हैं या बन रहे हैं और आपने कैसे दोस्त बनाए हैं।" मेरे पिताजी ने अपने डर पर काबू पाने के लिए कुछ पंक्तियाँ लिखीं थीं जिनका इस्तेमाल सुभाष घई साहब ने अपनी एक फ़िल्म में भी किया है। उस कविता या कहिए उस गीत का मुखड़ा इस तरह था:

मैं कोई बर्फ़ नहीं जो पिघल जाऊँगा,
मैं कोई हर्फ़ नहीं जो बदल जाऊँगा,
मैं तो जादू हूँ, मैं जादू हूँ, चल जाऊँगा।


कहते हैं कि आनंद बख्शी ने जब "आपकी कसम" के लिए "ज़िंदगी के सफ़र में गुजर जाते हैं जो मकाम वो फिर नहीं आते" लिखा था तो जावेद अख्तर साहब उनके घर तक चले गए थे और उनसे उनकी कलम की माँग कर दी थी। आनंद बख्शी साहब ने कहा कि आपको अपनी कलम देकर यूँ तो मैं बहुत खुश होऊँगा लेकिन क्या करूँ मुझे यह कलम किशोर कुमार ने गिफ़्ट में दी है। आनंद बख्शी साहब नए फ़नकारों को बहुत प्रोत्साहित करते थे। सुखविंदर सिंह उन्हें याद करते हुए कहते हैं कि "चूँकि मैं खुद एक संगीतकार हूँ इसलिए जब मैं दूसरों के लिए गाता हूँ तो अपना इनपुट दिए बिना रहा नहीं जाता और इसलिए गाना दिल से नहीं कर पाता। बख्शी साहब ने एक बार मुझे कहा था कि जब तुम स्टुडियो में एक गायक की हैसियत से आओ तो अपने अंदर बैठे संगीतकार को घर छोड़कर हीं आना और तब से मैं उनकी इस बात को फौलो कर रहा हूँ। और अब मुझे कोई दिक्कत नहीं आती।" तो ऐसे गुणी थे हमारे आनंद बख्शी साहब। उन्हें याद करते हुए चलिए हम अब सुनते हैं आज की गज़ल। मुलाहजा फ़रमाईयेगा:

चमकते चाँद को टूटा हुआ तारा बना डाला
मेरी आवारगी ने मुझको आवारा बना डाला

बड़ा दिलकश बड़ा रंगीन है ये शहर कहते हैं
यहाँ पर हैं हजारों घर घरों में लोग रहते हैं
मुझे इस शहर ने गलियों का बंजारा बना डाला

चमकते चाँद को…

मैं इस दुनिया को अक्सर देखकर हैरान होता हूँ
न मुझसे बन सका छोटा सा घर दिन रात रोता हूँ
ख़ुदाया तूने कैसे ये जहां सारा बना डाला

चमकते चाँद को…

मेरे मालिक मेरा दिल क्यों तड़पता है सुलगता है
तेरी मर्ज़ी तेरी मर्ज़ी पे किसका ज़ोर चलता है
किसी को गुल किसी को तूने अंगारा बना डाला

चमकते चाँद को…

यही आग़ाज़ था मेरा यही अंजाम होना था
मुझे बरबाद होना था मुझे नाकाम होना था
मुझे तक़दीर ने तक़दीर का मारा बना डाला




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक शब्द गायब होगा जिसके नीचे एक रिक्त स्थान बना होगा. हम आपको चार विकल्प देंगे आपने बताना है कि उन चारों में से सही शब्द कौन सा है. साथ ही पेश करना होगा एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली -

मुद्दत के बाद उस ने जो की ___ की निगाह,
जी खुश तो हो गया मगर आंसू निकल पड़े..


आपके विकल्प हैं -
a) करम, b) लुत्फ़, c) मेहर, d) ख़ुशी

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -
पिछली महफिल का सही शब्द था "ज़ब्त" और शेर कुछ यूं था -

ज़ब्त लाजिम है मगर दुःख है क़यामत का फ़राज़,
जालिम अब के भी न रोयेगा तू तो मर जायेगा...

फ़राज़ साहब के इस शेर को सबसे पहले पकड़ा कुलदीप जी ने। उन्होंने इस शब्द पर दो शेर भी पेश किए जिनके शायर के बारे में उन्हें जानकारी नही थी। ये रहे दो शेर:

मुझे अपने ज़ब्त पे नाज़ था सरे बज्म ये क्या हुआ
मेरी आंख कैसे छलक गयी मुझे रंज है ये बुरा हुआ

जनून को ज़ब्त सीखा लूं तो फिर चले जाना
में अपनेआप को संभाल लूं तो फिर चले जाना

इन दो शेरों के साथ-साथ उन्होंने परवीन शाकिर, हफ़िज जौनपुरी, मोहसिन नकवी,शकील बदायूंनी, फ़ैज़ अहमद फ़ैज़, शेरो भोपाली, शहजाद अहमद और इब्राहीम जौक़ के भी शेर पेश किए। अब चूँकि सारे शेर यहाँ हाज़िर नहीं किए जा सकते, इसलिए ज़ौक साहब के इस शेर के साथ कुलदीप जी की टिप्पणियों को इज़्ज़त बख्शते हैं। वैसे भी कुलदीप जी ने इस बार वही शेर पेश किए जिसमें "ज़ब्त" शब्द की आमद थी। बहादुर शाह ज़फ़र के दरबार की शोभा बढाने वाले ज़ौक साहब का शेर कुछ यूँ है:

ना करता ज़ब्त मैं गिरिया तो ऐ "जौक" इक घडी भर में
कटोरे की तरह घड़ियाल के गर्क आसमान होता

शामिख साहब कोई बात नहीं...देर आयद दुरूस्त आयद। जनाब असदुल्लाह खान ग़ालिब के इस शेर के साथ आपने जबरदस्त वापसी की है:

ऐ दिले-ना-आकिबतअंदेश ज़ब्त-ए-शौक़ कर
कौन ला सकता है ताबे-जल्वा-ए-दीदार-ए-दोस्त

फ़िराक़ साहब की पूरी गज़ल वैसे तो हमें खूब भायी लेकिन क्या करें पूरी गज़ल यहाँ पेश नहीं कर सकते इसलिए इसी शेर के साथ काम चला लेते हैं:

ख़बर है तुझको ऐ ज़ब्त-ए-मुहब्बत
तेरे हाथों में लुटता जा रहा हूँ

रचना जी, यह क्या, क्या कह रही हैं आप। हमारी इस महफ़िल में आने वाला कोई भी शख्स बड़ा या छोटा नहीं है। हम सब तो गज़लों के मुरीद हैं और इस नाते गज़ल-भाई या गज़ल-बहन हुए। तो फिर भाई-बहनों में क्या ऊँच-नीच। आप इसी तरह अपने शेरों के साथ हमारी महफ़िल की शोभा बढाते रहिए:

सारे गम जब्त करलूं एक सहारा तो दिया होता
चल पड़ता तेरी रह में एक इशारा तो दिया होता

दर्पण जी, अब क्या कहें हम.....चूँकि आप गुलज़ार साहब के बहुत बड़े फ़ैन हैं इसलिए इस नाते तो हमारे दोस्त हुए। फिर आपको चैलेंज क्यों देना। हम तो यह चाहेंगे कि आप गुलज़ार साहब के बारे में अपना कुछ अनुभव लिख कर आवाज़ को hindyugm@gmail.com पर मेल कर दें। वह क्या है कि इस रविवार को हम गुलज़ार साहब पर एक आलेख पेश करने वाले हैं, उनका जन्मदिन जो आ रहा है। आशा करते हैं कि आपकी इंट्री ज़रूर आएगी।

मनु जी, यह क्या.. आप आएँ और दर्पण जी को पहचान कर चल दिए। आपके शेर कहाँ गए?

मंजु जी, आपकी पंक्तियाँ भी खूबसूरत हैं:

दिल की बज्म में तेरी वफा का राज था .
जब्त कर लिया राज तूने
दिया बेवफा का साथ था

सुमित जी, आप देर हो गए, कोई बात नहीं, आए तो सही। यह रहा आपका शेर:

कमाल ऐ जब्त ऐ मोहब्बत इसी को कहते है,
तमाम उम्र जबान पर न उनका नाम आये।

हमारे कुछ उस्ताद महफ़िल में दिखे हीं नहीं जैसे अदा जी, दिशा जी, पूजा जी, नीलम जी। वहीं शरद जी आए तो लेकिन उन्होंने कोई शेर पेश नहीं किया। आखिर ऐसी नाराज़गी क्यों। उम्मीद करते हैं कि इस बार आप सब टिप्पणी करने में कोई कोताही नहीं बरतेंगे।

चलिए इतनी सारी बातों के बाद आप लोगों को अलविदा कहने का वक्त आ गया है। अगली महफ़िल तक के लिए खुदा हाफ़िज़!
प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा



ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर मंगलवार और शुक्रवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Thursday, September 18, 2008

स्वर और सुर की देवी - एम एस सुब्बलक्ष्मी



"जब एक बार हम अपनी कला और भक्ति से भीतर की दिव्यता से सामंजस्य बिठा लेते हैं, तब हम इस शरीर के बाहर भी प्रेम और करुणा का वही रूप देख पाते हैं...कोई भी भक्त जब इस अवस्था को पा लेता है सेवा और प्रेम उसका जीवन मार्ग बन जाना स्वाभाविक ही है."

ये कथन थे स्वरों की देवी एम् एस सुब्बलक्ष्मी के जिन्हें लता मंगेशकर ने तपस्विनी कहा तो उस्ताद बड़े गुलाम अली खान साहब ने उन्हें नाम दिया सुस्वरलक्ष्मी का, किशोरी अमोनकर ने उन्हें सातों सुरों से उपर बिठा दिया और नाम दिया - आठवाँ सुर. पर हर उपमा जैसे छोटी पड़ जाती है देश के सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से सम्मानित पहली संगीत से जुड़ी हस्ती के सामने. संगीत जोगन एम् एस सुब्बलक्ष्मी पद्मा भूषण, संगीत नाटक अकेडमी सम्मान, कालिदास सम्मान जैसे जाने कितने पुरस्कार पाये जीवन में पर प्राप्त सभी सम्मान राशिः को कभी अपने पास नही रखा, सामाजिक सेवाओं से जुड़े कामो के दान कर दिया.शायद उनके लिए संगीत से बढ़कर कुछ भी नही था. united nation में हुआ उनका कंसर्ट एक यादगार संगीत आयोजन माना जाता है. १६ सितम्बर १९१६ में जन्मीं सुब्बलक्ष्मी जी का बचपन भी संगीतमय रहा. मदुरै (तमिल नाडू ) के एक संगीत परिवार में जन्मी (उनके पिता सुब्रमनिया आइयर और माता वीणा विदुषी शंमुखादेवु प्रसिद्ध गायक और वीणा वादक थे) सुब्बलक्ष्मी ने ३ साल की उम्र से कर्णाटक संगीत सीखना शुरू कर दिया था और ८ वर्ष की उम्र में कुम्बकोनाम में महामहम उत्सव के दौरान अपना पहला गायन दुनिया के सामने रखा, और ये सफर १९८२ में रोयल अलबर्ट हाल तक पहुँचा. सुब्बलक्ष्मी जी इस सदी की मीरा थी, मीरा नाम से बनी तमिल फ़िल्म में उन्होंने अभिनय भी किया, पर जैसे उन के लिए वो अभिनय कम और ख़ुद को जीना ज्यादा था. यह फ़िल्म बाद में हिन्दी में भी बनी (१९४७) में, जिसमें उन्होंने दिलीप कुमार राय के संगीत निर्देशन में जो मीरा भजन गाये, वो अमर हो गये. फ़िल्म की कमियाबी के बाद उन्होंने अभिनय से नाता तोड़ अपने आप को संगीत और गायन के लिए पूरी तरह समर्पित कर दिया. १९४० में उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े टी सदासिवम से विवाह किया पर निसंतान रही. अपने पति के पुर्वविवाह से हुए दो बच्चियों को उन्होंने माँ का प्यार दिया. दोनों राधा और विजया भी संगीत से जुड़ी हैं आज.



भारत कोकिला सरोजिनी नायडू ने एक बार एम् एस के लिए इस तरह अपने उदगार व्यक्त किए थे -

"भारत का हर बच्चा बच्चा एम् एस सुब्बलक्ष्मी की आवाज़ से वाकिफ है न सिर्फ़ उनकी आवाज़ बल्कि उनका जादूई व्यक्तित्व और प्रेम भरा दिल करोड़ों भारतीयों के लिए एक प्रेरणा है..मैं चाहती हूँ की मेरा ये संदेश दुनिया के कोने कोने तक पहुंचे ताकि सब जानें की हिंदुस्तान की धरती पर एक ऐसी गायिका रहती है जिसकी आवाज़ में ईश्वर का वास है."

महात्मा गाँधी और एम् एस जब भी कभी एक शहर में होते, जरूर मिलते. गाँधी जी एम् एस के जादुई गायन के मुरीद थे. १९४७ में उन्होंने अपने ७८ जन्मदिन पर सुब्बलक्ष्मी जी आग्रह किया कि वो उनकी आवाज़ में हरी तुम हरो भजन सुनना चाहते हैं. चूँकि वो इस भजन से परिचित नही थी उन्होंने किसी और गायिका की सिफारिश की, पर गाँधी जी बोले "किसी और के गाने से बेहतर ये होगा कि आप अपनी आवाज़ में बस ये बोल दें". गाँधी जी के इन शब्दों को सुनने के बाद एम् एस के पास कोई रास्ता नही बचा था. उन्होंने भजन सीखा और ३० सितम्बर रात ३ बजे इसे अपनी आवाज़ में रिकॉर्ड किया, चूँकि वो ख़ुद उस दिन दिल्ली में उपस्थित नही हो सकती थी, आल इंडिया रेडियो ने उनकी रेकॉर्डेड सी डी को हवाई रस्ते से दिल्ली पहुँचने की व्यवस्था करवाई. वो महात्मा का आखिरी जन्मदिन था जब उन्होंने एक एस के मधुर स्वर में 'हरी तुम हरो' सुना.

१९९७ में अपने पति की मृत्यु के बाद उन्होंने public performance करना बंद कर दिया. ११ दिसम्बर २००४ को इस दिव्य गायिका ने संसार से सदा के लिए आंख मूँद ली.

तो आईये सुनते हैं, वही भजन उसी अलौकिक आवाज़ में आज एक बार फ़िर -

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आप दक्षिण भारत में कहीं भी चले जायँ, मंदिरों में सुबह की शुरूआत सुब्बलक्ष्मी द्वारा गाये गये भजन 'सुप्रभातम्' से ही होती है। सुनिए 'सुप्रभातम्' भजन के दो वर्जन-

१॰ श्री काशी विश्वनाथ सुप्रभातम्



२॰ रामेश्वरम् सुप्रभातम्



जानकारी सोत्र - इन्टरनेट
संकलन - सजीव सारथी


वाह उस्ताद वाह ( अंक २ )

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