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Friday, March 27, 2009

आयो कहाँ से घनश्याम...रैना बितायी किस धाम...

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 35

शास्त्रिया संगीत के जानकारों को ठुमरी की विशेषताओं के बारे में पता होगा. ठुमरी उपशास्त्रिया संगीत की एक लोकप्रिय शैली है जो मुख्यतः राधा और कृष्ण का प्रेमगीत है. ठुमरी केवल गायिकाएँ ही गाती हैं और इस पर कथक शैली में नृत्य किया जा सकता है. श्रृंगार रस, यानी कि प्रेम रस की एक महत्वपूर्ण मिसाल है ठुमरी. ठुमरी को कई रागों में गाया जा सकता है. राग खमाज में एक बेहद मशहूर ठुमरी है "कौन गली गयो श्याम". समय समय पर इसे बहुत से शास्त्रिया गायिकाओं ने गाया है. फिल्म में भी इसे जगह मिली है. जैसे कि कमाल अमरोही ने अपनी महत्वकांक्षी फिल्म "पाकीजा" में परवीन सुल्ताना से यह ठुमरी गवायी थी. हालाँकि इस फिल्म के संगीतकार थे गुलाम मोहम्मद, लेकिन उनकी मृत्यु हो जाने के कारण नौशाद साहब ने 'पार्श्वसंगीत' के रूप में इस ठुमरी को पेश किया था. दोस्तों, आज 'ओल्ड इस गोल्ड' में हम "पाकीजा" फिल्म की यह ठुमरी नहीं पेश कर रहे हैं, बल्कि इसी ठुमरी से प्रेरित एक लोकप्रिय फिल्मी गीत सुनवा रहे हैं फिल्म "बुड्डा मिल गया" से.

1971 में बनी फिल्म "बुद्धा मिल गया" में राहुल देव बर्मन का संगीत था. इस फिल्म में "रात कली एक ख्वाब में आई" और "भली भली सी एक सूरत" जैसे गाने बेहद मशहूर हुए थे. लेकिन इसमें मन्ना डे और अर्चना का गाया शास्त्रिया रंग में ढाला हुआ "आयो कहाँ से घनश्याम, रैना बिताई किस धाम" भी काफ़ी चर्चित हुया था. शास्त्रिया संगीत पर आधारित गीत को आम लोगों में लोकप्रिय बनाने में जिन संगीतकारों को महारत हासिल थी उनमें से एक पंचम भी थे. यूँ तो राग खमाज पर कई लोकप्रिय गीत बने हैं जैसे कि "अमर प्रेम" फिल्म का "बडा नट्खट है रे कृष्ण कन्हैया", इसी फिल्म से "कुछ तो लोग कहेंगे", "काला पानी" फिल्म का "नज़र लागी राजा तोरे बंगले पर", और फिर वो प्रसिद्ध भजन "वैष्णवा जन तो तेने कहिए", और भी कई गीत हैं, लेकिन "बुद्धा मिल गया" फिल्म का यह गीत भी अपने आप में अनूठा है, बेजोड है. यूँ तो पूरे गीत में मन्ना डे की आवाज़ है, बस आखिर में अर्चना, जो की इस फिल्म की अभिनेत्री भी हैं, एक 'लाइन' गाती हैं और गीत समाप्त हो जाता है. तो लीजिए पेश है "आयो कहाँ से घनश्याम".



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाईये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. १९६६ में आई इस फिल्म में थे धर्मेन्द्र और शर्मीला टैगोर.
२. मगर ये गीत आशा की आवाज़ में शशिकला पर फिल्माया गया है.
३. मुखड़े में शब्द है -"खुश्बू".

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
नीरज जी, मनु जी आप दोनों के लिए वाकई ये आसान रहा होगा. लगता है अब पहेली कुछ मुश्किल करनी पड़ेगी...नीलम जी ने भी सही चुटकी ली है :)

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवायेंगे, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.




Tuesday, October 7, 2008

जानिए ज़ोरबा के माने पेरुब से

सूफी रॉक संगीत के नए पहरुए हैं लुधिआना के पेरुब और उनके जोडीदार जोगी सुरेंदर और अमन दीप कौशल. "ज़ोरबा" ग्रुप के इन पंजाबी मुंडों का नया गीत "डरना झुकना" इन दिनों आवाज़ पर धूम मचा रहा है. आवाज़ के लिए अर्चना शर्मा ने की उनसे एक ख़ास मुलकात. पेश है उसी संवाद के ये अंश -



पेरुब, संगीत को जीवन मार्ग बनाने की प्रेरणा किससे मिली आपको ?

संगीत की प्रेरणा मुझे मेरी माता जी ने और मेरे बड़े भाइयों ने दी ......

कितना समय हो गया आपको संगीत को अपना कैरियर बनाये हुए ?

इस क्षेत्र मैं मुझे तकरीबन आठ साल से जयादा हो गए हैं ...........

आपके गुरु कौन रहे ? मतलब संगीत की तालीम आपने किससे ली ?

गुरु तो बहुत हैं संगीत के .... मगर संगीत की सही शिक्षा मैंने प्रोफ. मनमोहन सिंह जी से ...प्रोफ. श्री. शान्ति लाल जी से और संत मोहन सिंह, सुखदेव सिंह नामधारी जी से प्राप्त की .....

ज़ोरबा का क्या अर्थ है पेरुब ?

ज़ोरबा का अर्थ है जो नाच सके बिना ताल के, जो गा सके बिना साज़ के, जो संसार के हर रंग में रहते हुए, संसार से, जिसको अलग हो जाना है बिना कुछ किए....हर आदमी ज़ोरबा ही है " who is going to be buddha, is zorba " इस से जयादा कहना मुश्किल होगा .....वैसे ज़ोरबा हम ने आपने बैंड ग्रुप का नाम रखा है ...जोगी और मैं दोनों एक साथ स्कूल मैं ही पड़ते थे .जोगी पहले से ही गाता था. जोगी अमन और मैं एक ही गुरुजनों से सीखे हुए हैं . यूँ कहें की हम गुरुभाई है . जोगी अमन और मैं बचपन के ही दोस्त हैं और हम तीनो को बचपन से ही संगीत मैं रुची थी और अब यही profession बन गया है हम सबका.

आपने अब तक के सफर के बारे में एक संक्षित सा ब्यौरा दीजिये पेरुब ?

मेरा जन्म १९८१ मैं लुधिअना हुआ और बचपन की शिक्षा आपने माता पिता से दादी से और शहर के स्कूल से ही प्राप्त की, बाद मैं प्राइवेट कॉलेज मैं बी.बी.ए. से ड्राप आउट हूँ :-).........स्कूल मैं रहते ही संगीत से बहुत लगाव था...संगीत का सफर भी स्कूल से शुरू हो गया था .......पिता जी के देहान्त के बाद काफी कुछ बदल गया और फिर मुझे आपने पैरों पर जल्दी ही खड़ा होना था..........सो तब से लेकर आज तक struggle चल रही है.......

आपका झुकाव सूफियाना संगीत की तरफ ज्यादा है, कोई ख़ास वजह ?

वैसे तो हर किस्म का संगीत सुनना पसंद करता हूँ : जहाँ तक सूफी म्यूजिक का सवाल है, इस का कारण बताना मुश्किल है : बस यही कहूँगा की मेरे दिल को जल्दी छू लेता है...............

पहला सुर से पहले क्या आपकी कोई और भी एल्बम आयी है ?

पहला सुर एल्बम से पहले मैंने ९ धार्मिक एल्बमस (हिन्दी,पंजाबी दोनों) और २ documentries फिल्मों (जैन धरम पर आधारित) और ११ पंजाबी गानों में संगीत दिया ..........

कैसा रहा हिंद युग्म के साथ काम करने का अनुभव ?

हिन्दयुग्म के साथ काम करके मुझे बहुत अच्छा लगा, मैं चाहता हूँ की जो भी वह सब प्रयास कर रहे है, उसमे वह सफल हों

भविष्य की योजनायें क्या है ?

आने वाले सालों मैं मेरी यही कोशिश है की अच्छा संगीत लोगो तक पंहुचा सकूँ जो दिल को सुकून दे सके .............


संगीत के अलाव और क्या क्या करना पसंद है ?

संगीत के अलावा मुझे घूमने और नई जगहों पर जाना पसंद है , हाँ कुछ पुस्तकें पढने का भी शौंक है..........

अपने श्रोताओं और चाहने वालों के नाम कोई संदेश ?

बस यही कहूँगा की अच्छा सुने अच्छा गायें और अच्छा सुनायें ..

पेरुब और उनकी टीम को हिंद युग्म की तरफ़ से भी बहुत सी शुभकामनायें. आईये एक बार फ़िर से आनंद लें उनके इस नये गीत "डरना झुकना छोड़ दे" का (गीत को सुनने के लिए नीचे के पोस्टर पर क्लिक करें)
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