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Tuesday, July 13, 2010

पाँव की बेड़ियों से आज़ादी लेकर संगीत के नाव के सहारे एक लंबी "उड़ान" भरी है अमित और अमिताभ ने

ताज़ा सुर ताल २६/२०१०

सुजॊय - 'ताज़ा सुर ताल' मे सभी श्रोताओं व पाठकों को मेरा नमस्कार, और विश्व दीपक जी आपको भी।

विश्व दीपक - सभी को मेरा भी नमस्कार, और सुजॊय जी आपको भी।

सुजॊय - फ़िल्मी गीत फ़िल्म की कहानी, किरदार, और सिचुएशन के मुताबिक ही बनाने पड़ते हैं। यानी कि फ़िल्मी गीतों के कलाकारों को एक दायरे में बंधकर ही अपने कला के जोहर दिखाने पड़ते हैं। और अगर फ़िल्म की कहानी ऐसी हो कि जो फ़ॊरमुला फ़िल्मों की कहानी से बिल्कुल हट के हो, अगर उसमें हीरो-हीरोइन वा्ला कॊनसेप्ट ही ना हो, और फ़िल्म के निर्देशक और संगीतकार प्रयोगधर्मी हों, तब ऐसे फ़िल्म के संगीत से हम कुछ ग़ैर पारम्परिक उम्मीदें ही कर सकते हैं। है ना विश्व दीपक जी?

विश्व दीपक - सही कहा, और आज हम ऐसी ही एक लीक से बाहर की फ़िल्म 'उड़ान' के गीतों को लेकर उपस्थित हुए हैं। यह फ़िल्म अनुराग कश्यप की है, जिसे निर्देशित किया है विक्रमादित्य मोटवाणी ने। ये वही विक्रमादित्य हैं जिन्होंने "देव-डी" की कहानी लिखी थी। अनुराग की पिछली फ़िल्मों की तरफ़ अगर एक नज़र दौड़ा ली जाए तो 'देव-डी', 'ब्लैक फ़्राइडे' और 'गुलाल' के प्रयोगधर्मी संगीत की तरह 'उड़ान' के संगीत से भी हम कुछ नए की उम्मीदें लगा ही सकते हैं। आज इस स्तंभ में बजने वाले गीतों को सुनने के बाद हम सभी ये अंदाजा लगा पाएँगे कि संगीतकार अमित त्रिवेदी और गीतकार अमिताभ भट्टाचार्य वाक़ई लोगों की उम्मीदों पर खरे उतरे हैं या नही।

सुजॊय - तो चलिए गीतों का सिलसिला शुरु किया जाए, सुनते हैं पहला गीत।

गीत: आँखों के परदों पे


विश्व दीपक - जॉय बरुआ और नोमान पिंटो का गाया हुआ यह गाना था। "आँखों के परदों पे प्यारा सा जो था वो नज़ारा, धुआँ सा बन कर उड़ गया अब न रहा, बैठे थे हम तो ख़्वाबों की छाँव तले, छोड़ के उनको जाने कहाँ को चले, कहानी ख़त्म है या शुरुआत होने को है, सुबह है ये नई या फिर रात होने को है"। इन बोलों को सुन कर मतलब साफ़ है कि फ़िल्म के दो नायक अपने भविष्य को लेकर कुछ संशय में हैं। उन्हे यह नहीं पता कि जो हो रहा है वो अच्छे के लिए या ग़लत हो रहा है। दर-असल इन बोलों के साथ आज का हर युवा अपने आप को कनेक्ट कर सकेगा। अक्सर ऐसा होता है आजकल कि बच्चा कुछ बनने का सपना देखता है, जिसमें उसकी रूचि है, लेकिन कभी हालात की वजह से, कभी माँ-बाप के सपनों की वजह से, या फिर किसी और वजह से उसे ज़बरदस्ती ऐसे क्षेत्र में करीयर बनाना पड़ता है जिसमें उसे सफलता तो मिलती है लेकिन उसमें उसकी रूचि नहीं है। यह गीत उन सभी युवाओं के दिल को छू जाएगा ऐसा मेरा विचार है।

सुजॊय - आपने कहा कि फ़िल्म के दो नायकों के मन में संशय है, तो यहाँ पर इस फ़िल्म की कहानी की थोड़ी सी भूमिका मैं देना चाहूँगा। यह विक्रमादित्य मोटवाणे निर्देशित फ़िल्म है जिसकी कहानी एक युवक के सपनों की कहानी है, सपनों को पूरा करने की कहानी है। और इस युवक की भूमिका अदा की है रजत बरमेचा ने। साथ में हैं रोनित रॉय, आयान बोराडिआ, राम कपूर, मनजोत सिंह, आनंद तिवारी, सुमन मस्तकर और राजा हुड्डा। 'उड़ान' ६३-वीं कान फ़िल्म फ़ेस्टिवल में भारत की एकमात्र एंट्री है। और शायद इसी वजह से इस फ़िल्म की तरफ़ सब की निगाहें टिकी हुई हैं।

विश्व दीपक - इस गीत का जहाँ तक सवाल है, गीत केवल साढ़े तीन मिनट अवधि की है, और उसमें भी शुरुआती १:२० मिनट प्रील्युड म्युज़िक है जिसमें गीटार का सुंदर इस्तेमाल है। मुखड़े के दूसरे हिस्से से गीत में सॊफ़्ट रॊक शैली समा जाती है। गीत भले ही छोटा है लेकिन इसकी छाप गहरी पड़ने वाली है। और अब आगे बढ़ते हैं दूसरे गीत की तरफ़।

गीत: गीत में ढलते लफ़्ज़ों में .... कुछ नया तो ज़रूर है


सुजॊय - अमित त्रिवेदी और अमिताभ भट्टाचार्य की आवाज़ें थी इस गीत में। और बड़ी दिलचस्प बात है कि इस गीत को गीतकार-संगीतकार जोड़ी ने गाया है। मुझे नहीं लगता पहले कभी ऐसा हुआ है कि कोई युगल गीत हो और उसमें दो आवाज़ें उसी फ़िल्म के गीतकार और संगीतकार की हो। वाक़ई कुछ नया तो ज़रूर है! गीत के रीदम को सुनते हुए 'देव-डी' के "एक हलचल सी" की याद आ ही जाती है।

विश्व दीपक - और साथ ही बोलों को सुनते हुए फ़िल्म 'इक़बाल' का "आशाएँ खिले दिल की" गीत की भी याद आती है। जो पहला गीत था उसमें संशय था आशा और निराशा का, लेकिन इस गीत में आशावादी भाव ही उभर कर सामने आया है। और धुन भी अमित ने ऐसा बनाया है कि जल्दी ही दिल को छू लेता है। सॊफ़्ट रॊक शैली का इस्तेमाल इसमें भी हुआ है और ७० के दशक का टीपिकल रीदम जिसमें ईलेक्ट्रिक गीटार, किक ड्रमिंग और परक्युशन्स का इस्तेमाल हुआ है।

सुजॊय - अब अगला गीत लोक संगीत और पश्चिमी ऒरकेस्ट्रेशन का फ़्युज़न है। अगर आपको 'देव-डी' का "ढोल यारा" याद है तो आपको यह भी याद होगा कि इस गीत को कितनी सरहना मिली थी उस प्रयोग के लिए। अब 'उड़ान' में ऐसा ही गीत है "नाव - चढ़ती लहरें लांघ ना पाए"। आवाज़ गायक मोहन की है। इस गीत के लिए जिस तरह की रस्टीक वॊयस की ज़रूरत थी, मोहन ने वैसे ही इसे गाया है। मोहन के बारे में जिन लोगों को जानकारी नहीं है, उन्हें बता दें कि ये वही गायक हैं जिन्होंने "लंदन ड्रीम्स" का "खानाबदोश" गाया था। मोहन "अग्नि" बैंड से ताल्लुक रखते हैं। जहाँ तक इस गाने की बात है तो "नाव" कैलाश खेर वाले अंदाज़ का गाना है जिसको मोहन ने अच्छा अंजाम दिया है। तो आइए सुनते हैं यह गाना:

गीत: नाव


विश्व दीपक - वाक़ई कैलाश खेर की याद आ गई! और अब 'उड़ान' के शीर्षक गीत की बारी। इस फ़िल्म के लगभग सभी गीत प्रेरणादायक हैं, इंसपिरेशनल हैं। पता नहीं क्यों, बार बार फ़िल्म 'इक़बाल' की याद आ रही है! "नदी में तलब है कहीं जो अगर, समंदर कहाँ दूर है,... एक उड़ान कब तलक युं क़ैद रहेगी, रोको न छोड़ दो इसे" - एक और आशावादी और प्रेरणादायक गीत, और इस बार आवाज़ें अमित त्रिवेदी, जॉय बरुआ और नोमान पिंटो की। संगीत में वही रॉक अंदाज़। गीत का रीदम धीरे धीरे तेज़ होता जाता है जिससे जोश बढ़ता जाता है जो गीत के भाव को और ज़्यादा पुख़्ता करता जाता है।

सुजॊय - इस गीत का संगीत संयोजन लगभग पहले के तीन गीतों जैसा ही है, लेकिन इन सभी गीतों को सुनते हुए ऐसा लगता है कि जैसे एक सामंजस्य है, एक सूत्र है जो इन सभी गीतों को आपस में जोड़े रखता है, संगीत के लिहाज़ से भी, और शब्दों के लिहाज़ से भी। हमने आपने तो यह गीत सुन लिया है, आइए अब हम अपने श्रोताओं को भी यह गीत सुनवाएँ।

विश्व दीपक - जी क्यों नहीं!

गीत: एक उड़ान कब तलक क़ैद रहेगी


विश्व दीपक - और अब आज की इस प्रस्तुति का अंतिम गीत। एक और आशावादी गीत - "पैरों की बेड़ियाँ ख़्वाबों को बांधे नहीं रे, कभी नहीं रे, मिट्टी की परतों को नन्हे से अंकुर भी चीरें, धीरे धीरे , इरादे हरे हरे जिनके सीनों में घर करे, वो दिल की सुने, करे, ना डरे"। अमित त्रिवेदी, नोमान पिंटो, निखिल डी'सूज़ा और अमिताभ भट्टाचार्य की समूह स्वरों में यह सॉफ़्ट नंबर एक बार फिर से कुछ नया कर दिखाने का जुनून लिए हुए है। गीत का शीर्षक रखा गया है "आज़ादियाँ", जो गीत शुरु होने के २:५० मिनट बाद गीत में आता है। और इस गीत को उसी अंदाज़ में बनाया गया है जैसा कि पहला गीत "आँखों के परदों पे" को बनाया गया है। इन सभी गीतों का इस्तेमाल थीम सॉँग के हैसीयत से फ़िल्म में किया गया होगा!

सुजॊय - सितार की ध्वनियाँ गीत के एक इंटरल्युड में सुनाई देती है और एक सुकून सा दे जाती है। वैसे गीत का जो मूड है, जो म्युज़िक अरेंजमेण्ट है, वह किसी रॊक कॊनसर्ट के लिए परफ़ेक्ट है। इतने सारे गायकों के आवाज़ों के संगम की वजह से इस गीत में एक कॊलेज कैम्पस जैसा फ़ील आया है। एक बात जो इस फ़िल्म के गीतों में कोई भी गायिका की आवाज़ मौजूद नहीं है। यह पूरी तरह से मेल डॊमिनेटेड ऐल्बम है। आइए आज का यह आख़िरी गीत सुन लेते हैं।

गीत: आज़ादियाँ


"उड़ान" के संगीत को आवाज़ रेटिंग ****

सुजॊय - हाँ, तो इन तमाम गीतों को सुनने के बाद मेरी व्यक्तिगत राय यही है कि अमित त्रिवेदी और अमिताभ भट्टाचार्य ने जो उड़ान भरी है, वह सुरक्षित लैण्ड करेगी श्रोताओं के दिलों में। हालाँकि इस ऐल्बम वह वैरायटी नहीं है जो 'देव-डी' में थी, हो सकता है कि इसका कारण फ़िल्म की स्टोरी-लाइन हो, जो भी है, हम इस फ़िल्म की पूरी टीम को अपनी शुभकामनाएँ देते हैं। अमित त्रिवेदी ने 'आमिर', 'देव-डी' और 'वेक अप सिड' के लिए जो तारीफ़ें बटोरी थी, उससे भी ज़्यादा मक़बूलियत इस फ़िल्म से वो हासिल करें। और आख़िर में अमिताभ भट्टाचार्य को भी सलाम करता हूँ इतने अच्छे बोल इन धुनों में पिरोने के लिए। पिछले कुछ हफ़्तों से 'ताज़ा सुर ताल' प्रस्तुत करते हुए मुझे ऐसा लगने लगा है कि अच्छे बोल, स्तरीय बोल, एक बार फिर से फ़िल्मी गीतों में धीरे धीरे वापस आ रही है।

विश्व दीपक - अमित त्रिवेदी से मेरी उम्मीदें हमेशा हीं खास रहती हैं और अच्छी बात है कि वे कभी भी निराश नहीं करते। आपने "आमिर" ,"देव-डी" और "वेक अप सिड" का ज़िक्र किया, ये सारी बड़ी और नामी-गिरामी फिल्में थी, लेकिन अमित ने तो "एडमिशन्स ओपन" जो कि कुछ भी नाम न कर सकी में भी ऐसा बढिया संगीत दिया था, जिसका एक-दहाईं संगीत भी बड़े-बड़े संगीतकार बड़ी-बड़ी फिल्मों में नहीं दे पाते। अमित रहमान को अपना आदर्श मानते हैं लेकिन दूसरे भक्तों की तरह ये रहमान की नकल नही करते.. यह अमित की सबसे बड़ी खासियत है। अमित और अमिताभ की जोड़ी अभी तक कमाल करती आई है और इस जोड़ी ने हमेशा हीं अलग तरह का माहौल तैयार किया है अपने गानों से। इस फिल्म के गानों में भी वही बात है इसलिए पसंद न करने का कोई सवाल हीं नहीं उठता। चलिए तो इस तरह आज की समीक्षा समाप्त हुई। हाँ, यह भी बताते चलें कि अगली बार हमारे साथ होगी "आयशा" और उसे भी संजाने-संवारने का काम "अमित" ने हीं किया है। तो अगली कड़ी में हम फिर से साथ होंगे अमित के। तब तक के लिए "खुदा हाफ़िज़"!

और अब आज के ३ सवाल

TST ट्रिविया # ७६- 'उड़ान' शीर्षक से किसी ज़माने में दूरदर्शन पर एक लोकप्रिय धारावाहिक हुआ करता था जो एक लड़की के अपने सपनों को पूरा करने की कहानी थी। बताइए उस लड़की का चरित्र किस कलाकार ने निभाया था?

TST ट्रिविया # ७७- गायक जॉय बरुआ ने साल २००६ की एक फ़िल्म में भी गीत गाया था, बताइए फ़िल्म का नाम।

TST ट्रिविया # ७८- फ़िल्म 'देव-डी' का मशहूर गीत "इमोसनल अत्याचार" गाया था बैण्ड मास्टर्स रंगीला और रसीला ने (क्रेडिट्स के अनुसार)। लेकिन यह हक़ीक़त नहीं है। क्या आप बता सकते हैं कि इस गीत को किन दो गायकों ने गाया था जिनका नाम क्रेडिट्स पर नहीं आया?


TST ट्रिविया में अब तक -
पिछले हफ़्ते के सवालों के जवाब:

१. "साथिया" का "चोरी पे चोरी"
२. "आई ऐम इन लव" यह पंकित तीनों फिल्मों के किसी न किसी गाने में थी
३. "द किलर" का "फिरता रहूँ दर-ब-दर"

सीमा जी आपने तीनों सवालों के सही जवाब दिए। बधाई स्वीकारें!

Friday, March 20, 2009

अलहदा है पियूष का अंदाज़, तो अलहदा क्यों न हो "गुलाल" का संगीत


वाकई पियूष भाई एक हरफनमौला हैं, क्या नहीं करते वो. एक समय था जब हमारी शामें दिल्ली के मंडी हाउस में बीता करती थी. और जिस भी दिन पियूष भाई का शो होता जिस भी ऑडिटोरियम में वहां हमारा होना भी लाजमी होता. मुझे उनके वो नाटक अधिक पसंद थे जिसे वो अकेले सँभालते थे, यानी अभिनय से लेकर उस नाटक के सभी कला पक्ष. सोचिये एक अकेले अभिनेता द्वारा करीब २ घंटे तक मंच संभालना और दर्शकों को मंत्रमुग्ध करके रखना कितना मुश्किल होता होगा, पर पियूष भाई के लिए ये सब बाएं हाथ का काम होता था. उनके संवाद गहरे असर करते थे, बीच बीच में गीत भी होते थे अक्सर लोक धुनों पर, जिसे वो खुद गाते थे. तो जहाँ तक उनके अभिनेता, निर्देशक, पठकथा संवाद लेखक, और गीतकार होने की बात है, यहाँ तक तो हम पियूष भाई की प्रतिभा से बखूबी परिचित थे, पर हालिया प्रर्दशित अनुराग कश्यप की "गुलाल" में उनका नाम बतौर संगीतकार देखा तो चौंकना स्वाभाविक ही था. गाने सुने तो उनकी इस नयी विधा के कायल हुए बिना नहीं रह सका. तभी तो कहा - हरफनमौला. लीजिये इस फिल्म का ये गीत आप भी सुनें -



उनका बचपन ग्वालियर में बीता, दिल्ली के एन एस डी से उत्तीर्ण होने के बाद ६ साल तक वो एक्ट वन से जुड़े रहे उसके बाद अस्मिता थियटर ग्रुप के सदस्य बन गए. यहाँ रंजित कपूर और अरविन्द गौड़ जैसे निर्देशकों के साथ उन्होंने काम किया. श्रीराम सेंटर के लिए उन्होंने पहला नाटक निर्देशित किया. मणि रत्नम की "दिल से" में पहली बार वो बड़े परदे पर नज़र आये. हालाँकि छोटे परदे के लिए वो "राजधानी" धारावाहिक में एक सशक्त भूमिका निभा चुके थे. राज कुमार संतोषी की "लीजेंड ऑफ़ भगत सिंह" के संवाद लिखने के बाद पियूष भाई मुंबई शिफ्ट हो गए. २००३ में आई विशाल भारद्वाज की "मकबूल" में उनका किरदार यादगार रहा. "मात्त्रृभूमि", "१९७१", और "झूम बराबर झूम" में भी बतौर एक्टर उन्होंने अपनी छाप छोडी. "१९७१" के लिए उन्होंने स्क्रीन प्ले और "यहाँ" के लिए स्क्रीनप्ले और संवाद भी लिखे.

इस बीच पियूष भाई ने अपनी पहचान बनायीं, एक गीतकार के तौर पर भी. 'दिल पे मत ले यार" और "ब्लैक फ्राईडे" जैसी लीक से हटकर बनी फिल्मों के लिए उन्होंने उपयुक्त गीत लिखे तो "टशन" जैसी व्यवसायिक फिल्म के लिए चालू गीत भी खूब लिखे. माधुरी दीक्षित की वापसी वाली फिल्म "आजा नचले" के शीर्षक गीत को लिखकर बेबात के विवाद में भी फंस गए, पर मुंबई में अब उनके इस बहुआयामी प्रतिभा पर हर निर्माता निर्देशक की नज़र हो चुकी थी. अनुराग ने गुलाल में पियूष को अपनी कला का भरपूर जौहर दिखने का मौका दिया. और परिणाम - एक बहतरीन एल्बम जो कई मायनों में आम एल्बमों से से बहुत अलग है. पर यही "अलग" पन ही तो पियूष मिश्रा की खासियत है. सुनिए एक और गीत इसी फिल्म से -



"गुलाल" चुनाव का सामना करने जा रही आज की पीढी के लिए सही समय पर प्रर्दशित फिल्म है. मूल रूप से फिल्म गीतकार शायर "साहिर लुधियानवीं" को समर्पित है या यूँ कहें उनके मशहूर "ये दुनिया अगर मिल भी जाए..." गीत को समर्पित है. ये कहानी अनुराग ने तब बुनी थी जब उनके संघर्ष के दिन थे, उनकी फिल्म सेंसर में अटकी थी और कैरियर अधर में. निश्चित रूप से ये उनकी बेहतरीन फिल्मों में से एक है. देखिये किस खूबी से पियूष भाई ने इस गीत को समर्पित किया है फिल्म "प्यासा" के उस यादगार गीत के नाम -



बहुत कम फिल्मों में गीत संगीत इतना मुखर होकर आया है जैसा कि गुलाल में, वैसे जिस किसी ने भी पियूष भाई को उनके "नाटकों" में सुना है उनके लिए ये पियूष भाई के विशाल संग्रह का एक छोटा सा हिस्सा भर है, पर यकीनन जब बातें एक फिल्म के माध्यम से कही जाएँ तो उसका असर जबरदस्त होना ही है. यदि आप चालू संगीत से कुछ अलग सुनना पसंद करते हैं, और शुद्ध कविता से बहते गीत जो भीतर तक आपके भेद जाये, और ऐसी आवाजें जिसमें जोश की बहुतायत हो तो एल्बम "गुलाल" अवश्य सुनिए. हम आपको बताते चले कि इन गीतों को खुद पियूष भाई के साथ स्वानंद किरकिरे और राहुल राम ने आवाजें दी हैं. अनुराग कश्यप को भी सलाम है जिन्होंने पियूष की प्रतिभा को खुल कर बिखरने की आजादी दी. यदि ऐसे प्रयोग सफल हुए तो हम यकीनन भारतीय सिनेमा को एक नए आयाम पर विचरता पायेंगें. पियूष भाई की प्रतिभा को नमन करते हुए सुनिए इस फिल्म से मेरा सबसे पसंदीदा गीत. इसके शब्दों पर गौर कीजियेगा -




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