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Tuesday, April 7, 2009

रात के हमसफ़र थक के घर को चले....

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 45

क्ति सामंता एक ऐसे फिल्मकार थे जिन्हे हमेशा यह मालूम होता था कि लोग किस तरह की फिल्म देखना पसंद करते हैं. और यही वजह थी कि उनकी ज़्यादातर फिल्में सफल रहीं. 1964 में शम्मी कपूर और शर्मिला टैगोर को लेकर "कश्मीर की कली" बनाने के बाद वो इन दोनो को लेकर एक ऐसी फिल्म का निर्माण करना चाहते थे जो किसी विदेशी शहर की पृष्ठभूमि पर आधारित हो. शक्ति बाबू ने पैरिस को चुना और अपने फिल्म का शीर्षक "अन इवनिंग इन पैरिस" रखने का निश्चय किया. एक मुलाक़ात में उन्होने कहा था कि इस फिल्म की कहानी में कोई ख़ास बात नहीं थी. लेकिन दोस्तों, किसी साधारण कहानी को लेकर ऐसी सफल फिल्म बनाना भी तो एक ख़ास बात ही है. फिल्म की कहानी के अनुसार इस फिल्म का संगीत भी पाश्चात्य रंग में रंगा हुआ होना था. और उस ज़माने में पाश्चात्य 'ऑर्केस्ट्रेशन' के लिए शंकर जयकिशन का नाम सबसे उपर आता था. बस, फिर क्या था! शक्ति सामंता ने इस फिल्म के संगीत के लिए शंकर जयकिशन को नियुक्त किया, और इस जोडी के साथ साथ गीतकार शैलेन्द्र और हसरत जयपुरी भी शामिल हो गये. यूँ तो इस फिल्म के ज़्यादातर गीत रफ़ी साहब ने अकेले ही गाए हैं जो बेहद मशहूर भी हुए हैं. लेकिन एक युगल गीत ऐसा है जो इन सब गीतों से बिल्कुल अलग है. शैलेंद्रा का लिखा और आशा भोसले और मोहम्मद रफ़ी का गाया हुआ यही युगल गीत आज 'ओल्ड इस गोल्ड' की शान है.

जब हम फिल्मी युगल गीतों की बात करते हैं तो आशा भोंसले और मोहम्मद रफ़ी की जोडी एक मशहूर जोडी रही है जिन्होंने असंख्य लाजवाब युगल गीत हमें दिए हैं. और "अन इवनिंग इन पैरिस" फिल्म का यह गीत भी इन्ही लाजवाब गीतों में शामिल है. रूमानियत और मादकता से भरपूर यह गीत किसी कविता से कम नहीं. शैलेंद्रा ने अपने ख्यालों को इस क़द्र शक्ल दिया है इस गाने में जो हमें किसी और ही दुनिया में ले जाती है. रात और सुबह का मानवीकरण बेहद सुंदर तरीके से किया गया है इस गीत में. और शंकर जयकिशन के संगीत के तो क्या कहने, जैसी ज़रूरत बिल्कुल वैसा ही संगीत उन्होने हमेशा दिया है. 'गिटार' का असरदार प्रयोग इस गीत में सुनने को मिलता है. अगर आपने इस गीत को पर्दे पर देखा है तो आपको याद होगा कि पूरे गीत के पार्श्व में रात का पॅरिस शहर नज़र आता है जिसमें जगमगाहट भी है लेकिन एक अकेलापन भी जो रूमानियत से भरे दो दिलों को और भी ज़्यादा जज़्बाती बना देते हैं. तो याद कीजिए पॅरिस की वो रंगीनियाँ और सुनिए यह खूबसूरत नग्मा.



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाईये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. मजरूह साहब का लिखा एक शानदार गीत, नौशाद का संगीत है.
२. यूँ तो पूरा गाना मुकेश ने गाया है पर शुरू में कुछ ऊंचे नोट्स महेंद्र कपूर से गवाए गए हैं.
३. मुखड़े में शब्द युग्म है - "तेरी सदा".

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
मनु जी राज की बात है आसान सिर्फ आपके लिए दी है हमने, ताकि काफी दिनों से आपका खोया हुआ "फॉर्म" लौट आये. खैर बधाई, अरे नीलम जी भी हैं और इस बार सौ फीसदी सही जवाब के साथ. आचार्य जी किशोर की आवाज़ में ये गीत वाकई बहुत मधुर है.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवायेंगे, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.




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