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Monday, May 6, 2013

'पाकीज़ा' गीतों में पाश्चात्य स्वरों के मेल भी और देसी मिटटी की महक भी


प्लेबैक वाणी -44 - संगीत समीक्षा - पाकीजा (जुबीन गर्ग)


जोहाट, आसाम से निकली इस बेमिसाल आवाज़ ने देश भर के संगीत प्रेमियों पर अपना जादू चलाया है. बेहद प्रतिभाशाली जुबीन गर्ग ढोल, गिटार, मेंडोलिन जैसे ढेरों साजों पर भी अपनी पकड़ रखते हैं. हिंदी फ़िल्मी गीतों के शौकीनों ने उन्हें सुना था फिल्म कांटे के दमदार जाने क्या होगा रामा रे में, मगर गैंगस्टर के या अली के बाद तो वो घर घर पहचाने जाने लगे थे. ये खुशी की बात है कि आज के दौर में जब सोलो एलबम्स के लिए बाजार में बहुत अधिक संभावनाएं नज़र नहीं आती, टाईम्स संगीत जैसी बड़ी कंपनी जुबीन की गैर फ़िल्मी एल्बम को ज़ारी करने का साहस करती है. संगीत प्रेमियों के लिए बाजारू चलन से हट कर कुछ सुनने की तड़प और जुबीन का आवाज़ की कशिश ही है ये जो इस तरह के प्रयोगों को ज़मीन देती है.


एल्बम का शीर्षक गीत बहुत ही जबरदस्त है, संगीत संयोजन कुछ हैरत करने वाला है. पर शब्द, धुन और जुबीन की आवाज़ का नशा गीत को एक अलग ही आसमाँ दे देता है. एक रोक्क् सोलिड गीत जो संगीत प्रेमियों जम कर रास आएगा. मीना कुमारी अभिनीत क्लास्सिक फिल्म पाकीज़ा जो कि जुबीन की सबसे पसंदीदा फिल्म भी है, वही इस गीत की प्रेरणा है   


अगला गीत न बीते न को सुनते हुए आप एक अलग ही दुनिया में पहुँच जाते हैं. शब्दों का खेल सुरीला है, गीत के थीम अनुरूप जुबीन की आवाज़ का समर्पण एकदम सटीक सुनाई देता है. यहाँ संगीत संयोजन भी अपेक्षानुरूप है.


मुझमें तू ही तू, मुझमें मैं नहीं....सुनने में एक प्रेम गीत बेशक लगता है पर वास्तव में ये एक सूफी रोक्क् गीत अधिक है जहाँ अंग्रेजी शब्दों का भी सुन्दर इस्तेमाल किया है जुबीन ने.


बाँसुरी की मधुर तान से उठता है काफूर. रिदम परफेक्ट है. काफूर शब्द का पहली बार किसी गीत के मुखड़े में इस तरह प्रयोग हुआ होगा. मधुरता, अपनापन, सादगी और बेफिक्री की लाजवाब लयकारी है ये गीत. अंतरे की धुन बेहद प्यारी सुनाई देती है..शब्द भी बढ़िया हैं, बस व्याकरण में कहीं कहीं हल्की कमी महसूस होती है.


असामी लोक संगीत की झलक यूँ तो लगभग हर गीत में ही है, कहकशा में इसका मिलन है अरेबिक रिदम के साथ. एक सुन्दर तजुर्बा, एक बार फिर जुबीन यहाँ या अली वाले फ्लेवर में मिलेगें श्रोताओं से.


अगला गीत पिया मोरे कुछ दर्द भरा है, जुबीन की आवाज़ में दर्द की एक टीस यूँ भी महसूस की जा सकती है. धुन बेहद डूबो देने वाली है, और संयोजन में गजब की विविधता भरी है, एक एक स्वर एक नई अनुभूति है. एक और सुरीला गीत.


पाश्चात्य ताल पर भी जुबीन के गीतों में मिटटी की मदभरी महक है. और अगले गीत चलते चलो रे एक क्लास्सिक मांझी गीत जैसा लगता है. जीवन को एक नई दृष्टि से सराबोर करते शब्द गीत की जान हैं.


अंतिम गीत रामा रामा एक मुक्तलिफ़ फ्लेवर का गीत है. ये गायक के सामाजिक दायित्व का निर्वाह भी करता है. देश में इन दिनों जो हालात हैं उस पर एक तीखी टिपण्णी है ये गीत जो हमारी दोहरी मानसिकता की पोल खोल के रख देता है. जुबीन के ये स्वर नितांत ही अनसुना है. शब्द रचेता को विशेष बधाई.


एल्बम के इस ढलते दौर में जुबीन का ये एल्बम एक नई उम्मीद जगाता है. संगीत प्रेमियों को ये अनूठा प्रयोग यक़ीनन पसंद आना चाहिए. रेडियो प्लेबैक दे रहा है इसे ४.३ की रेटिंग. अवश्य सुनें.

संगीत समीक्षा
 - सजीव सारथी
आवाज़ - अमित तिवारी
यदि आप इस समीक्षा को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें:
 


     

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