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Friday, September 17, 2010

भर के गागर कलियों से, ज्यों ढलके हों मोगरे....ब्रिज भाषा की मिठास और क्लास्सिकल पाश्चात्य संगीत का माधुर्य जब मिले

Season 3 of new Music, Song # 20

दोस्तों आज का हमारा नया गीत एकदम खास है, क्योंकि इसमें पहली बार ब्रिज भाषा की मिठास घुल रही है. नए प्रयोगों के लिए जाने जाने वाले हमारे इन हॉउस गीतकार विश्व दीपक लाए है एक बहुत मधुर गीत जिसे एक बेहद मीठी सी धुन देकर संवारा है सतीश वम्मी ने जो इससे पहले इसी सत्र में "जीनत" देकर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर चुके हैं. गायिका हैं "बुलबुला" में जिंदगी का फलसफा देने वाली आवाज़ की शान गायिका ह्रिचा देबराज नील मुखर्जी. तो दोस्तों अब और अधिक भूमिका में आपको न उलझाते हुए सीधे गीत की तरफ़ बढते हैं. ऑंखें मूँद के सुनिए और खो जाईये, इस ताज़ा तरीन गीत की रुमानियत में....और हाँ हमारे युवा संगीतकार सतीश जी को विवाह की बधाईयां भी अवश्य दीजियेगा, क्योंकि कहीं न कहीं उनके जीवन में आये इस नए प्रेम का भी तो योगदान है इस गीत में. हैं न ?

गीत के बोल -


ढाई आखर अंखियों से
जब झलके हैं तो मोहे
मिल जावे चैना.... मोरे सांवरे!!

भर के गागर कलियों से
ज्यों ढलके हों मोगरे
बिछ जावें भौंरे..... होके बावरे!!

तोसे पुछूँ
तू नैनन से
यूँ पल-पल छल कर... लूटे है मोहे..
कि पक्की है... ये प्रीत रे!!!

ढाई आखर अंखियों से
जब झलके हैं तो मोहे
मिल जावे चैना.... मोरे सांवरे!!

भर के गागर कलियों से
ज्यों ढलके हों मोगरे
बिछ जावें भौंरे..... होके बावरे!!

काहे तू
हौले-हौले
कनखियों से खोले है घूँघट मोरी लाज-शरम के..

अब ना संभले मोसे,
सजना बीरहा तोसे,
धर ले सीने में तू,
मोहे टुकड़े कर के.....

ढाई आखर अंखियों से
जब झलके हैं तो मोहे
मिल जावे चैना.... मोरे सांवरे!!

भर के गागर कलियों से
ज्यों ढलके हों मोगरे
बिछ जावें भौंरे..... होके बावरे!!




मेकिंग ऑफ़ "ढाई आखर" - गीत की टीम द्वारा

सतीश वम्मी: "ढाई आखर" हिन्द-युग्म पर मेरा दूसरा गाना है और ह्रिचा देबराज के साथ पहला। ह्रिचा के बारे में मुझे जानकारी मुज़िबु से हासिल हुई थी। उनके साथ काम करने का मेरा अनुभव बड़ा हीं सुखद रहा। सच कहूँ तो अंतर्जाल के माध्यम से किसी गाने पर काम करना आसान नहीं होता क्योंकि उसमें आप खुलकर यह बता नहीं पाते कि आपको गीतकार या गायक/गायिका से कैसी अपेक्षाएँ हैं, लेकिन ह्रिचा के साथ बात कुछ अलग थी। उन्हें जैसे पहले से पता था कि गाना कैसा बनना है और इस कारण मेरा काम आसान हो गया। ह्रिचा ने गाने में एक नई जान डाल दी और इसके लिए मैं उनका शुक्रगुजार हूँ। विश्व भाई तो मेरे लिए फुल-टाईम गीतकार हो चुके हैं.. उनके साथ पहले "ज़ीनत" आई और अब "ढाई आखर"। अभी भी इनके लिखे ४ गाने मेरे पास पड़े हैं, जिन्हें मैं जल्द हीं खत्म करने की उम्मीद करता हूँ। "ढाई आखर" दर-असल एक मेल-सॉंग (निगाहें, जिसे बाद में "झीनी झालर" नाम दिया गया) होना था, लेकिन हमें लगा कि इस धुन पर फीमेल आवाज़ ज्यादा सुट करेगी। ऐसे में नए बोलों के साथ यह गाना "ढाई आखर" बन गया। बोल और धुन तैयार हो जाने के बाद मैंने ह्रिचा से बात की और अच्छी बात यह है कि उन्होंने पल में हीं हामी भर दी। अब चूँकि मैं कोई गायक नहीं, इसलिए डेमो तैयार करना मेरे लिए संभव न था। मैंने ह्रिचा के पास धुन और बोल भेजकर उनसे खुद हीं धुन पर बोल बैठाने का आग्रह किया। मेरी खुशी का ठिकाना तब न रहा जब मैंने ह्रिचा की आवाज़ में पहला ड्राफ्ट सुना। मुझे वह ड्राफ़्ट इतना पसंद आया कि अभी फाईनल प्रोडक्ट में भी मैने पहले ड्राफ्ट का हीं मुखरा हू-ब-हू रखा है। हाँ, अंतरा में बदलाव हुए क्योंकि हमें कई सारे हार्मोनिज़ एवं लेयर्स के साथ प्रयोग करने पड़े थे। अभी आप जो गीत सुन रहे हैं, उसमें एक हीं लिरिक़्स को छह अलग-अलग वोकल ट्रैक्स पर अलग-अलग धुनों पर गाया गया है। इस गाने की धुन रचने में मुझे ५ मिनट से भी कम का समय लगा था... मुझे उस वक़्त जो भी ध्यान में आया, मैंने उसे गाने का हिस्सा बना डाला। इससे मेरा काम तो आसान हो गया, लेकिन विश्व के लिए मुश्किलें बढ गईं। कई जगहॊं पर धुन ऐसी थी, जहाँ शब्द सही से नहीं समा रहे थे और मैं धुन बदलने को राज़ी नहीं था। हालांकि, विश्व ने मुझे बाद में बताया कि ऐसी स्थिति से उनका हीं फायदा होता है क्योंकि उन्हें नई सोच और नए शब्द ढूँढने होते हैं। गाना बनकर तैयार होने में ४-५ महिनों का वक़्त लग गया और इसमें सारा दोष मेरा है, क्योंकि मैं कुछ व्यक्तिगत मामलों में उलझ गया था। दर-असल, इसी बीच मेरी शादी हुई थी :) शुक्रिया.. बधाईयों के लिए शुक्रिया। यह गाना हमारा संयुक्त प्रयास है और हमने यथासंभव इसमें रूह डालने की कोशिश की है। आशा करता हूँ कि आपको हमारी यह छोटी पेशकश पसंद आएगी। आपकी टिप्पणियों का इंतज़ार रहेगा।

ह्रिचा देबराज नील मुखर्जी: गीत "ढाई आखर अंखियों से" बड़ा हीं प्रयोगात्मक गीत है.. शुरूआत में यह नज़्म सतीश की कल्पना-मात्र थी। उन्होंने ऐसे हीं पियानो पर एक टीज़र बना कर मुझे यह धुन भेजी और मुझे इस गीत में हिस्सा बनने के लिए पूछा, जिसके लिए मैने तुरंत हामी भर दी। लेकिन कहीं मैं इस सोच में थी कि यह धुन गीत से अधिक एक अच्छी खासी थीम म्युज़िक साउंड कर रही है, क्या इसकी रचना ठीक ढंग से हो भी पाएगी या नहीं.. इस के लिए विश्व जी की जितनी तारीफ़ की जाए कम है क्योंकि जिस तरह से सतीश ने इस गीत में पाश्चात्य बैले संगीत और कर्नाटिक अंग के साथ प्रयोग किया है उसी तरह विश्व जी ने शुद्ध हिन्दी के शब्दों में गीत के बोलों की रचना कर इसे और खूबसूरत बनाने में अपना सफल योगदान दिया है। आशा करती हूँ कि यह गीत सभी को पसंद आएगा।

विश्व दीपक: इस गीत के पीछे के कहानी बताते वक़्त सतीश जी ने "निगाहें" और "झीनी झालर" का ज़िक्र किया, लेकिन वो उससे भी पहले की एक चीज बताना भूल गए। जैसा कि ह्रिचा ने कहा कि यह धुन वास्तव में एक थीम म्युज़िक या इन्स्ट्रुमेन्टल जैसी प्रतीत हो रही थी तो असलियत भी यही है। लगभग चार महिने पहले सतीश जी ने इसे "क्लोज़ योर आईज़" नाम से मुज़िबु पर पोस्ट किया था और श्रोताओं की राय जाननी चाही थी कि क्या इसे गाने के रूप में विस्तार दिया जा सकता है। फिर मेरी सतीश जी से बात हुई और हमने यह निर्णय लिया कि इसे एक मेल सॉंग बनाते हैं। मेल सॉंग बनकर तैयार भी हो गया, लेकिन गायक की गैर-मौजूदगी के कारण इस गाने को पेंडिंग में डालना पड़ा। दर-असल सतीश जी चाहते थे कि यह गाना जॉर्ज गाएँ, लेकिन उसी दौरान जॉर्ज की कुछ जाती दिक्कतें निकल आईं, जिस कारण वे दो-तीन महिनों तक गायन से दूर हीं रहें। हमें लगने लगा था कि यह गीत अब बन नहीं पाएगा, लेकिन हम इस धुन को गंवाना नहीं चाहते थे। तभी सतीश जी ने यह सुझाया कि क्यों न इसे किसी गायिका से गवाया जाए, लेकिन उसके लिए बोलों में बदलाव जरूरी था। अमूमन मैं एक धुन पर एक से ज्यादा बार लिखना पसंद नहीं करता, क्योंकि उसमें आप न चाहते हुए भी कई सारे शब्द या पंक्तियाँ दुहरा देते हैं, जिससे उस गीत में नयापन जाता रहता है। लेकिन यहाँ कोई और उपाय न होने के कारण मुझे फिर से कलम उठानी पड़ी। कलम उठ गई तो कुछ अलग लिखने की जिद्द भी साथ आ गई और देखते-देखते मैने अपनी सबसे प्रिय भाषा "ब्रिज भाषा" (इसमें कितना सफल हुआ हूँ.. पता नहीं, लेकिन कोशिश यही थी कि उर्दू के शब्द न आएँ और जितना हो सके उतना ब्रिज भाषा के करीब रहूँ) में "ढाई आखर" लिख डाला। कहते हैं कि गीत तब तक मुकम्मल नहीं होता जब तक उसे आवाज़ की खनक नहीं पहनाई जाती, इसलिए मैं तो इतना हीं कहूँगा कि सतीश जी और मैने "ढाई आखर" के शरीर का निर्माण किया था, इसमें रूह तो ह्रिचा जी ने डाली है। कुहू जी के बाद मैं इनकी भी आवाज़ का मुरीद हो चुका हूँ। उम्मीद करता हूँ कि ह्रिचा जी की आवाज़ में आपको यह गीत पसंद आएगा।

सतीश वम्मी
सतीश वम्मी मूलत: विशाखापत्तनम से हैं और इन दिनों कैलिफ़ोर्निया में रहते हैं। बिजनेस एवं बायोसाइंस से ड्युअल मास्टर्स करने के लिए इनका अमेरिका जाना हुआ। 2008 में डिग्री हासिल करने के बाद से ये एक बहुराष्ट्रीय बायोटेक कम्पनी में काम कर रहे हैं। ये अपना परिचय एक संगीतकार के रूप में देना ज्यादा पसंद करते हैं लेकिन इनका मानना है कि अभी इन्होंने संगीत के सफ़र की शुरूआत हीं की है.. अभी बहुत आगे जाना है। शुरू-शुरू में संगीत इनके लिए एक शौक-मात्र था, जो धीरे-धीरे इनकी ज़िंदगी का एक अहम हिस्सा बनता जा रहा है। इन्होंने अपनी पढाई के दिनों में कई सारे गाने बनाए जो मुख्यत: अंग्रेजी या फिर तेलगु में थे। कई दिनों से ये हिन्दी में किसी गाने की रचना करना चाहते थे, जो अंतत: "ज़ीनत" के रूप में हम सबों के सामने है। सतीश की हमेशा यही कोशिश रहती है कि इनके गाने न सिर्फ़ औरों से बल्कि इनके पिछले गानों से भी अलहदा हों और इस प्रयास में वो अमूमन सफ़ल हीं होते हैं। इनके लिए किसी गीत की रचना करना एक नई दुनिया की खोज करने जैसा है, जिसमें आपको यह न पता हो कि अंत में हमें क्या हासिल होने वाला है, लेकिन रास्ते का अनुभव अद्भुत होता है।

ह्रिचा देबराज नील मुखर्जी
२००२ में ह्रिचा लगातार ७ बार जी के सारेगामापा कार्यक्रम में विजेता रही है, जो अब तक भी किसी भी महिला प्रतिभागी की तरफ़ से एक रिकॉर्ड है. स्वर्गीय मास्टर मदन की याद में संगम कला ग्रुप द्वारा आयोजित हीरो होंडा नेशनल टेलंट हंट में ह्रिचा विजेता रही. और भी ढेरों प्रतियोगिताओं में प्रथम रही ह्रिचा ने सहारा इंडिया के अन्तराष्ट्रीय आयोजन "भारती" में ३ सालों तक परफोर्म किया और देश विदेश में ढेरों शोस् किये. फ़्रांस, जर्मनी, पोलेंड, बेल्जियम, इस्राईल जैसे अनेक देशों में बहुत से अन्तराष्ट्रीय कलाकारों के साथ एक मंच पर कार्यक्रम देने का सौभाग्य इन्हें मिला और साथ ही बहुत से यूरोपियन टीवी कार्यक्रमों में भी शिरकत की. अनेकों रेडियो, टी वी धारावाहिकों, लोक अल्बम्स, और जिंगल्स में अपनी आवाज़ दे चुकी ह्रिचा, बौलीवुड की क्रोस ओवर फिल्म "भैरवी" और बहुत सी राजस्थानी फ़िल्में जैसे "दादोसा क्यों परणाई", "ताबीज", "मारी तीतरी" जैसी फिल्मों में पार्श्वगायन कर चुकी हैं.

विश्व दीपक
विश्व दीपक हिन्द-युग्म की शुरूआत से ही हिन्द-युग्म से जुड़े हैं। आई आई टी, खड़गपुर से कम्प्यूटर साइंस में बी॰टेक॰ विश्व दीपक इन दिनों पुणे स्थित एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी में बतौर सॉफ्टवेयर इंजीनियर अपनी सेवाएँ दे रहे हैं। अपनी विशेष कहन शैली के लिए हिन्द-युग्म के कविताप्रेमियों के बीच लोकप्रिय विश्व दीपक आवाज़ का चर्चित स्तम्भ 'महफिल-ए-ग़ज़ल' के स्तम्भकार हैं। विश्व दीपक ने दूसरे संगीतबद्ध सत्र में दो गीतों की रचना की। इसके अलावा दुनिया भर की माँओं के लिए एक गीत को लिखा जो काफी पसंद किया गया।
Song - Dhaayi Aakhar
Vocals - Hricha Debraj
Music - Satish Vammi
Lyrics - Vishwa Deepak "Tanha"
Graphics - Prashen's media


Song # 19, Season # 03, All rights reserved with the artists and Hind Yugm

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Friday, April 30, 2010

किस अदा से ज़ीनत का दूँ हर शै को पता- पाँचवा ताज़ा गीत

Season 3 of new Music, Song # 05

आवाज़ के लिए शुक्रवार का मतलब होता है बिलकुल ताज़ा। खुद के लिए और श्रोताओं के लिए ताज़े संगीत से सजे एक गीत को प्रस्तुत करना। संगीतबद्ध गीतों का तीसरा सत्र जो हमारे बिना किसी प्रयास के नये संगीतकारों-गायकों-लेखकों में आवाज़ महोत्सव 2010 के रूप में जाना जाने लगा है, में अब तक 4 नये गीत रीलिज हो चुके हैं। पाँचवें गीत के माध्यम से हम एक बिल्कुल नया संगीतकार सतीश वम्मी आवाज़ की दुनिया को दे रहे हैं। इस गीत के रचयिता आवाज़ के जाने-माने स्तम्भकार हैं जो किसी एक ग़ज़ल पर इतनी चर्चा करते हैं कि इंटरनेट पर कहीं एक जगह इतना-कुछ मिलना लगभग असम्भव है। गीत की आत्मा यानी गायिका कुहू गुप्ता 'जो तुम आ जाते एक बार' और 'प्रभु जी' से श्रोताओं के दिल में निवास करने लगी हैं।

गीत के बोल -

मुखड़ा :

होठों को खोलूँ न खोलूँ, बता,
आँखों से बोलूँ न बोलूँ, बता,
साँसों की भीनी-सी खुशबू को मैं,
बातों में घोलूँ न घोलूँ, बता..

तू बता मैं किस अदा से
ज़ीनत का दूँ हर शै को पता..
तू बता जो इस फ़िज़ा को
ज़ीनत सौंपूँ तो होगी ख़ता?

होठों को खोलूँ न खोलूँ, बता,
आँखों से बोलूँ न बोलूँ, बता,
साँसों की भीनी-सी खुशबू को मैं,
बातों में घोलूँ न घोलूँ, बता..

अंतरा 1:

है ये मेरे तक हीं,
ज़ीनत है ये किसकी
आखिर तेरा है जादू छुपा...

मैं तो मानूँ मन की
ज़ीनत जो है चमकी
आखिर तेरी हीं है ये ज़िया...

तू जाने कि तूने हीं दी है मुझे,
ये ज़ीनत कि जिससे मेरा जी सजे,
तो क्यों ना मेरा जी गुमां से भरे?
तो क्यों ना मैं जी लूँ उड़ा के मज़े?

हाँ तो मैं हँस लूँ न हँस लूँ, बता,
फूलों का मस्स लूँ न मस्स लूँ, बता,
धीरे से छूकर कलियाँ सभी,
बागों से जश लूँ न जश लूँ बता..

अंतरा 2:

यूँ तो फूलों पर भी,
ज़ीनत की लौ सुलगी,
लेकिन जी की सी ज़ीनत कहाँ?

जैसे हीं रूत बदली,
रूठी ज़ीनत उनकी,
लेकिन जी की है ज़ीनत जवाँ..

जो फूलों से बढके मिली है मुझे,
ये ज़ीनत जो आँखों में जी में दिखे,
तो क्यों ना मैं बाँटूँ जुबाँ से इसे?
तो क्यों ना इसी की हवा हीं चले?

हाँ तो मैं हँस लूँ न हँस लूँ, बता,
फूलों का मस्स लूँ न मस्स लूँ, बता,
धीरे से छूकर कलियाँ सभी,
बागों से जश लूँ न जश लूँ बता..

तू बता मैं गुलसितां से
ज़ीनत माँगूँ या कर दूँ अता....



मेकिंग ऑफ़ "ज़ीनत" - गीत की टीम द्वारा

सतीश वम्मी: "ज़ीनत" इंटरनेट की जुगलबंदी से बनाया मेरा पहला गाना है। इस गाने से न सिर्फ़ हम तीन लोग जुड़े हैं बल्कि तीन और लोगों का इसमें बहुत महत्वपूर्ण हाथ है: के के (गिटार, विशाखापत्तनम), श्रीकांत (बांसुरी, चेन्नई), शंपक (मिक्सिंग इंजीनियर, कोलकाता)। मैंने इन तीनों का साथ की-बोर्ड पर दिया है। बदकिस्मती है कि मैं अपनी टीम में से किसी से नहीं मिला हूँ, लेकिन आने वाले समय में इनसे जरूर मिलना चाहूँगा। मुझे याद है कि मैंने पहला डेमो जब विश्व को भेजा था तो उसमें अंतरा नहीं था। हमने सोचा कि हम पूरे गाने में केवल मुखड़े के ट्युन को नए शब्दों के साथ दुहराते रहेंगे। लेकिन जब विश्व ने मुझे इस गाने का मूल-भाव (थीम) बताया (ज़ीनत = आंतरिक और बाह्य... दोनों तरह की सुंदरता) तो मुझे लगा कि इस गाने को और भी खूबसूरत बनाया जा सकता है और फिर हमने इसमें दो अंतरे जोड़े। विश्व को धुन(गाने की ट्युन) की बारीकियों की अच्छी खासी समझ है और वे हर बार ऐसे शब्द इस्तेमाल करते हैं जो धुन पर पूरी तरह से फिट आते हैं। कुहू की गायकी का मैं पहले से हीं कायल रहा हूँ, मैंने उनके गाने मुज़िबू पर सुने थे, लेकिन कभी उनसे बात नहीं हुई थी। मुझे आज भी याद है कि जब मैंने और विश्व ने ये निर्णय लिया था कि यह गाना कुहू हीं गाएँगी तो मैं उनकी हाँ सुनने का बेसब्री से इंतज़ार कर रहा था। मैं इससे ज्यादा क्या कहूँ कि कुहू ने इस गाने को एक नई ऊँचाई दी है। मुझे उम्मीद है कि आप सबों को हमारा यह प्रयास पसंद आएगा।

कुहू गुप्ता: सतीश के साथ ये मेरा पहला गाना है और हमेशा याद रहेगा. इनका परिचय मुझे विश्व ने करवाया जब सतीश उनके फीमेल सोलो गाने के लिए आवाज़ तलाश रहे थे. विश्व के साथ में पहले बहुत गाने कर चुकी हूँ लेकिन इस बार टीम में सतीश नए थे. हमेशा की तरह शुरू में उनसे बातचीत बहुत ही औपचारिक तौर पर हुई लेकिन जल्दी ही गाने पर साथ काम करते हुए हमें मज़ा आने लगा. जीनत एक बहुत ही सुन्दर रचना है जिसे आँखें बंद करके सुना जाए तो मन को शान्ति का अनुभव होता है. इस सुन्दर रचना को और मज़बूत बनाने के लिए विश्व की कलम ने बखूबी साथ दिया. इस गाने के शब्द मुश्किल ज़रूर हैं लेकिन जैसा कि गाने का नाम है जीनत यानी खूबसूरती, एक एक शब्द बहुत ही खूबसूरती से चुना गया है. अभी तक जितनी भी मूल रचनाएँ मैंने कि हैं उसमे से ये गाना मुझे इसलिए ख़ास याद रहेगा क्योकि ये पहला ऐसा गाना था जिसका अरेंजमेंट मेरे गाना गाने के बाद पूरा हुआ, जिसे मैं मज़ाक में रहमान स्टाइल कहती हूँ. अरेंजमेंट और गायन दोनों ही साथ साथ विकसित हुए जो मेरे लिए एक नया अनुभव था. इस गीत में हमेशा की तरह प्रयोग किये जाने वाले synthesizer के अलावा लाइव बांसुरी और गिटार का भी प्रयोग किया गया है जो गीत की खूबसूरती को और निखारता है।

विश्व दीपक: भले हीं यह लगे कि सतीश जी के साथ "ज़ीनत" मेरा पहला गाना है। लेकिन सच्चाई तो यह है कि किसी और गाने के बीच में "ज़ीनत" की धुन निकल आई थी। दर-असल सतीश जी के पास बरसों से एक ट्युन पड़ी थी जिसे उन्होंने "डियर लिरिसिस्ट" नाम दिया था। उन्हें इस ट्युन के लिए किसी हिन्दी-गीतकार की ज़रूरत थी। सतीश जी ने मुझे मुज़िबू पे ढूँढा और मैंने उनकी यह धुन ढूँढ ली। मैंने कहा कि हाँ मैं लिखूँगा। फिर इस तरह से हमारा "बेशक" (अगला गाना जो इस गाने के बाद रीलिज होने वाला है) बनके तैयार हुआ। तब तक हमने यह सोचा नहीं था कि यह गाना किसे देना है , उसी बीच सतीश जी "ज़ीनत" की ट्युन लेकर हाज़िर हुएँ और हम "बेशक" को रोक कर "ज़ीनत" में जुड़ गए। गाना जब आधा हुआ तभी सतीश जी ने पूछा कि आपके लिए "मन बता" जिन्होंने गाया है वो हमारा यह गाना गाएँगी। मैंने कहा कि मैं उनसे बात कर लेता हूँ और मुझे पक्का यकीन है कि वो ना नहीं कहेंगीं। फिर मैंने कुहू जी से बात की और कुहू जी ने लिरिक्स पढने और ट्युन सुनने के बाद हामी भर दी। फिर क्या था गाने पर काम शुरू हो गया और महज़ ७ या फिर १० दिनों में गाना बनकर तैयार भी हो गया। यह होली के आस-पास की घटना है। अब आप सोचेंगे कि गाना जब तभी हो गया था तो इतनी देर कहाँ लगी तो इसमें सारा दोष सतीश जी का(कुछ हद तक शंपक का भी, जो गाने की मिक्सिंग को परफ़ेक्ट करने में लगे थे) है :) वे अपने गाने से संतुष्ट हीं नही होते और इस गाने को अंतिम रूप देने में उन्होंने डेढ महीना लगा दिया। खैर कोई बात नहीं... वो कहते हैं ना कि इंतज़ार का फल मीठा होता है तो हमें इसी मीठे फल का इंतज़ार है। उम्मीद करता हूँ कि "न हम आपको निराश करेंगे और न आप हीं हमें निराश करेंगे।"

सतीश वम्मी
सतीश वम्मी मूलत: विशाखापत्तनम से हैं और इन दिनों कैलिफ़ोर्निया में रहते हैं। बिजनेस एवं बायोसाइंस से ड्युअल मास्टर्स करने के लिए इनका अमेरिका जाना हुआ। 2008 में डिग्री हासिल करने के बाद से ये एक बहुराष्ट्रीय बायोटेक कम्पनी में काम कर रहे हैं। ये अपना परिचय एक संगीतकार के रूप में देना ज्यादा पसंद करते हैं लेकिन इनका मानना है कि अभी इन्होंने संगीत के सफ़र की शुरूआत हीं की है.. अभी बहुत आगे जाना है। शुरू-शुरू में संगीत इनके लिए एक शौक-मात्र था, जो धीरे-धीरे इनकी ज़िंदगी का एक अहम हिस्सा बनता जा रहा है। इन्होंने अपनी पढाई के दिनों में कई सारे गाने बनाए जो मुख्यत: अंग्रेजी या फिर तेलगु में थे। कई दिनों से ये हिन्दी में किसी गाने की रचना करना चाहते थे, जो अंतत: "ज़ीनत" के रूप में हम सबों के सामने है। सतीश की हमेशा यही कोशिश रहती है कि इनके गाने न सिर्फ़ औरों से बल्कि इनके पिछले गानों से भी अलहदा हों और इस प्रयास में वो अमूमन सफ़ल हीं होते हैं। इनके लिए किसी गीत की रचना करना एक नई दुनिया की खोज करने जैसा है, जिसमें आपको यह न पता हो कि अंत में हमें क्या हासिल होने वाला है, लेकिन रास्ते का अनुभव अद्भुत होता है।


कुहू गुप्ता
पुणे में रहने वाली कुहू गुप्ता पेशे से सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं। गायकी इनका जज्बा है। ये पिछले 6 वर्षों से हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ले रही हैं। इन्होंने राष्ट्रीय स्तर की कई गायन प्रतिस्पर्धाओं में भाग लिया है और इनाम जीते हैं। इन्होंने ज़ी टीवी के प्रचलित कार्यक्रम 'सारेगामा' में भी 2 बार भाग लिया है। जहाँ तक गायकी का सवाल है तो इन्होंने कुछ व्यवसायिक प्रोजेक्ट भी किये हैं। वैसे ये अपनी संतुष्टि के लिए गाना ही अधिक पसंद करती हैं। इंटरनेट पर नये संगीत में रुचि रखने वाले श्रोताओं के बीच कुहू काफी चर्चित हैं। कुहू ने हिन्द-युग्म ताजातरीन एल्बम 'काव्यनाद' में महादेवी वर्मा की कविता 'जो तुम आ जाते एक बार' को गाया है, जो इस एल्बम का सबसे अधिक सराहा गया गीत है। इस संगीत के सत्र में भी यह इनका तीसरा गीत है।

विश्व दीपक 'तन्हा'
विश्व दीपक हिन्द-युग्म की शुरूआत से ही हिन्द-युग्म से जुड़े हैं। आई आई टी, खड़गपुर से कम्प्यूटर साइंस में बी॰टेक॰ विश्व दीपक इन दिनों पुणे स्थित एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी में बतौर सॉफ्टवेयर इंजीनियर अपनी सेवाएँ दे रहे हैं। अपनी विशेष कहन शैली के लिए हिन्द-युग्म के कविताप्रेमियों के बीच लोकप्रिय विश्व दीपक आवाज़ का चर्चित स्तम्भ 'महफिल-ए-ग़ज़ल' के स्तम्भकार हैं। विश्व दीपक ने दूसरे संगीतबद्ध सत्र में दो गीतों की रचना की। इसके अलावा दुनिया भर की माँओं के लिए एक गीत को लिखा जो काफी पसंद किया गया।
Song - Zeenat
Voices - Kuhoo Gupta
Music - Satish Vammi
Lyrics - Vishwa Deepak
Graphics - Samarth Garg


Song # 05, Season # 03, All rights reserved with the artists and Hind Yugm

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