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Sunday, October 7, 2018

राग पहाड़ी : SWARGOSHTHI – 388 : RAG PAHADI






स्वरगोष्ठी – 388 में आज

पूर्वांग और उत्तरांग राग – 3 : राग पहाड़ी

मदन मोहन की पहली फिल्म का गीत मीना कपूर से और विदुषी परवीन सुल्ताना से राग पहाड़ी सुनिए





परवीन सुल्ताना
मीना कपूर
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी नई श्रृंखला “पूर्वांग और उत्तरांग राग” की तीसरी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। रागों को पूर्वांग और उत्तरांग में विभाजित करने के लिए सप्तक के सात स्वरों के साथ तार सप्तक के षडज स्वर को मिला कर आठ स्वरों के संयोजन को दो भागों में बाँट दिया जाता है। प्रथम भाग षडज से मध्यम तक पूर्वांग और दूसरे भाग पंचम से तार षडज तक उत्तरांग कहा जाता है। इसी प्रकार जो राग दिन के पहले भाग (पूर्वार्द्ध) अर्थात दिन के 12 बजे से रात्रि के 12 बजे के बीच में गाया-बजाया जाता हो उन्हें पूर्व राग और जो राग दिन के दूसरे भाग (उत्तरार्द्ध) अर्थात रात्रि 12 बजे से दिन के 12 बजे के बीच गाया-बजाया जाता हो उन्हें उत्तर राग कहा जाता है। भारतीय संगीत का यह नियम है कि जिन रागों में वादी स्वर सप्तक के पूर्वांग में हो तो उन्हें दिन के पूर्वार्द्ध में और जिन रागों को वादी स्वर सप्तक उत्तरांग में हो उन्हे दिन के उत्तरार्द्ध में गाया-बजाया जाना चाहिए। राग का वादी स्वर यदि सप्तक के प्रथम भाग में है संवादी स्वर निश्चित रूप से सप्तक के दूसरे भाग में होगा। इसी प्रकार यदि वादी स्वर सप्तक के दूसरे भाग में हो तो संवादी स्वर सप्तक के पूर्व में होगा। वादी और संवादी स्वरों में सदैव तीन अथवा चार स्वरों का अन्तर होता है। इसलिए यदि वादी स्वर ऋषभ है तो संवादी स्वर पंचम या धैवत होगा। इसी प्रकार यदि वादी स्वर धैवत हो तो संवादी स्वर गान्धार अथवा ऋषभ होगा। भीमपलासी, बसन्त और भैरवी जैसे कुछ राग इस नियम के अपवाद होते हैं। इस कठनाई को दूर करने के लिए सप्तक के पूर्वांग और उत्तरांग का क्षेत्र बढ़ा दिया जाता है। पूर्वांग का क्षेत्र षडज से पंचम तक और उत्तरांग का क्षेत्र मध्यम से तार सप्तक के षडज तक माना जाता है। इस प्रकार वादी-संवादी में से यदि एक स्वर पूर्वांग में हो तो दूसरा स्वर उत्तरांग में हो जाता है। इस श्रृंखला में हम आपसे कुछ पूर्वांग और उत्तरांग प्रधान रागों पर चर्चा करेंगे। इस श्रृंखला के लिए चुने गए रागों में वादी स्वर षडज अथवा ऋषभ होता है और संवादी स्वर पंचम अथवा मध्यम होता है। श्रृंखला की तीसरी कड़ी में आज हमने राग पहाड़ी चुना है। श्रृंखला की दूसरी कड़ी में आज हम गायिका मीना कपूर के स्वर में 1950 में प्रदर्शित फिल्म “आँखें” से राग पहाड़ी पर आधारित एक गीत प्रस्तुत कर रहे हैं। इसके साथ ही राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए सुप्रसिद्ध गायिका विदुषी परवीन सुल्ताना के स्वर में राग पहाड़ी की एक खयाल रचना भी प्रस्तुत कर रहे हैं।



आज हम राग “पहाड़ी” पर चर्चा करने जा रहे हैं। इस राग पर आधारित एक फिल्मी गीत पहले आप सुनिए। फ़िल्म ’आँखें’ के गीतों के लिए मदन मोहन को भले मुकेश और मोहम्मद रफ़ी जैसे गायक मिले, पर उनकी तीव्र इच्छा थी कि लता मंगेशकर भी उनकी फ़िल्म में गाए। यही इच्छा लेकर मदन मोहन पहुँचे लता जी के घर। जैसा कि हम चर्चा कर चुके हैं कि मदन मोहन और लता का इससे पहले सामना हो चुका है फ़िल्म ’शहीद’ के गीत की रेकॉर्डिंग पर। इन तीन सालों में लता काफ़ी उपर जा चुकी थीं। मदन मोहन बताते हैं, "जब ’आँखें’ निर्माणाधीन थी, तब हर किसी ने उन्हें हतोत्साहित किया, स्टुडियो स्टाफ़ और इसी फ़िल्म के लिए काम कर रहे टेक्निशियन्स आदि ने भी। जब वो लता जी के पास पहुँचे तो लता जी ने मेरे लिए गाने से मना कर दिया। कुछ ऐसा हुआ था कि कुछ लोगों ने उनके कान भर दिए थे कि मैं ना तो कोई अच्छा संगीतकार हूँ और फ़िल्म भी बेकार है, इसलिए उन्हें इस फ़िल्म में नहीं गाना चाहिए।" मदन मोहन उस दिन लता जी को राज़ी करवाने में असमर्थ रहे। लेकिन जैसे ही इस फ़िल्म के गाने रेडियो पर बजने लगे, लता जी को यह अहसास हो गया कि वो ग़लत थीं। मदन मोहन की दूसरी फ़िल्म ’मदहोश’ से ही लता और उनका ऐसा रिश्ता जमा कि बाकी इतिहास है। ’मदहोश’ के गानें हिट होने के बाद लता जी ने मदन मोहन को ना सिर्फ़ बधाई दी बल्कि उनसे माफ़ी भी माँगी। और दोनों ने एक दूसरे से यह वादा किया कि हमेशा उनकी यह भाई-बहन की जोड़ी कायम रहेगी। ख़ैर, फ़िल्म ’आँखें’ के गीतों के लिए शमशाद बेगम का नाम चुना गया। पर एक गीत ऐसा था जिसमें राग पहाड़ी की छाया थी। इस गीत के लिए गायिका मीना कपूर को चुना गया जो उन दिनों कई फ़िल्मों में गीत गा रही थीं। इस तरह से फ़िल्म ’आँखें’ का यह गीत रेकॉर्ड हुआ। आगे चलकर मदन मोहन ने राग पहाड़ी पर कई गीत रचे, जैसे कि फ़िल्म ’हीर-राँझा’ का "दो दिल टूटे, दो दिल हारे..." या ’वो कौन थी’ का मशहूर गीत "लग जा गले कि फिर यह हसीं रात हो ना हो..."। पर फ़िल्म ’आँखें’ का यह गीत उनके लिए बहुत ख़ास रहा क्योंकि यह उनकी पहली फ़िल्म की पहली राग आधारित रचना थी।

राग पहाड़ी : ‘मोरी अटरिया पे कागा बोले...’ : मीना कपूर : फिल्म – आँखें


यह मान्यता है की प्रकृतिजनित, नैसर्गिक रूप से लोक कलाएँ पहले उपजीं, परम्परागत रूप में उनका क्रमिक विकास हुआ और अपनी उच्चतम गुणवत्ता के कारण ये शास्त्रीय रूप में ढल गईं। प्रदर्शनकारी कलाओं पर भरतमुनि प्रवर्तित ग्रन्थ 'नाट्यशास्त्र' को पंचमवेद माना जाता है। नाट्यशास्त्र के प्रथम भाग, पंचम अध्याय के श्लोक संख्या 57 में ग्रन्थकार ने स्वीकार किया है कि लोक जीवन में उपस्थित तत्वों को नियमों में बाँध कर ही शास्त्र प्रवर्तित होता है। श्लोक का अर्थ है कि इस चर-अचर में उपस्थित जो भी दृश्य-अदृश्य विधाएँ, शिल्प, गतियाँ और चेष्टाएँ हैं, वह सब शास्त्र रचना के मूल तत्त्व हैं। भारतीय संगीत के कई रागों का उद्गम लोक संगीत से हुआ है। इन्हीं में से एक है, राग पहाड़ी, जिसकी उत्पत्ति भारत के पर्वतीय अंचल में प्रचलित लोक संगीत से हुई है। यह राग बिलावल थाट के अन्तर्गत माना जाता है। राग पहाड़ी में मध्यम और निषाद स्वर बहुत अल्प प्रयोग किया जाता है। इसीलिए राग की जाति का निर्धारण करने में इन स्वरों की गणना नहीं की जाती और इसीलिए इस राग को औड़व-औड़व जाति का मान लिया जाता है। राग का वादी स्वर षडज और संवादी स्वर पंचम होता है। इसका चलन चंचल है और इसे क्षुद्र प्रकृति का राग माना जाता है। इस राग में ठुमरी, दादरा, गीत, ग़ज़ल आदि रचनाएँ खूब मिलती हैं। आम तौर पर गायक या वादक इस राग को निभाते समय रचना का सौन्दर्य बढ़ाने के लिए विवादी स्वरों का उपयोग भी कर लेते हैं। मध्यम और निषाद स्वर रहित राग भूपाली से बचाने के लिए राग पहाड़ी के अवरोह में शुद्ध मध्यम स्वर का प्रयोग किया जाता है। मन्द्र धैवत पर न्यास करने से राग पहाड़ी स्पष्ट होता है। इस राग के गाने-बजाने का सर्वाधिक उपयुक्त समय रात्रि का पहला प्रहर माना जाता है। राग पहाड़ी के स्वरूप को स्पष्ट रूप से अनुभव करने के लिए अब आप इसी राग में सुनिए, कण्ठ संगीत की एक आकर्षक रचना। इसे प्रस्तुत कर रही हैं, सुप्रसिद्ध गायिका विदुषी बेगम परवीन सुल्ताना। आप राग पहाड़ी की यह ठुमरी अंग की रचना सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग पहाड़ी : ‘जा जा रे कगवा मोरा सन्देशवा पिया पास ले जा...’ : विदुषी परवीन सुल्ताना



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 388वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1942 में प्रदर्शित एक पुरानी फिल्म से रागबद्ध गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के उत्तर देने आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। 390वें अंक की ‘स्वरगोष्ठी’ तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2018 के चौथे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग की झलक है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस अभिनेत्री-गायिका के स्वर हैं?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 13 अक्तूबर, 2018 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। “फेसबुक” पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 390वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 386वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको वर्ष 1966 में प्रदर्शित फिल्म “मेरा साया” के एक रागबद्ध गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से किसी दो प्रश्न के उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – नन्द अथवा आनन्दी कल्याण, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – कहरवा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – लता मंगेशकर

“स्वरगोष्ठी” की इस पहेली प्रतियोगिता में तीनों अथवा तीन में से दो प्रश्नो के सही उत्तर देकर विजेता बने हैं; कोटा, राजस्थान से तुलसीराम वर्मा, कल्याण, महाराष्ट्र से शुभा खाण्डेकर, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, मैरिलैण्ड, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, फीनिक्स, अमेरिका से मुकेश लाडिया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक भी उत्तर ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी श्रृंखला “पूर्वांग और उत्तरांग राग” की तीसरी कड़ी में आपने राग पहाड़ी का परिचय प्राप्त किया। इस राग में आपने विदुषी परवीन सुल्ताना के स्वर में एक उपशास्त्रीय रचना का रसास्वादन किया। साथ ही आपने इस राग में पिरोया संगीतकार मदन मोहन की एक शुरुआती फिल्म “आँखें” का गीत मीना कपूर से सुना। इस अंक के फिल्मी गीत का परिचय देने के लिए हमने अपने सहयोगी सम्पादक सुजॉय चटर्जी के आलेख अंश का उल्लेख किया है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक और श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। हमारी वर्तमान अथवा अगली श्रृंखला के लिए यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

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