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Monday, February 9, 2009

मेरी आवाज ही पहचान है : पंचम दा पर विशेष, (दूसरा भाग)


सत्तर के दशक के बारे में कहते हैं, लोग चार लोगों के दीवाने थे : सुनील गावस्कर,अमिताभ बच्चन, किशोर कुमार और आर डी बर्मन | गावस्कर का खेल के मैदान में जाना, अमिताभ का परदे पर आना और किशोर कुमार का गाना सबके लिए उतना ही मायने रखता था जितना आर डी का संगीत | भारत में लोग संगीत के साथ जीते हैं,आखिरी दम तक संगीत किसी न किसी तरह से हमसे जुड़ा होता है और इस लिहाज से आर डी बर्मन ने हमारे जीवन को कभी न कभी, किसी न किसी तरह छुआ जरुर है | यह अपने आप में आर डी के संगीत की सादगी और श्रेष्ठता दोनों का परिचायक है |
किशोर, आर डी और अमिताभ ने क्या खूब रंग जमाया था फ़िल्म "सत्ते पे सत्ता" के सदाबहार गाने में, सुनिए और याद कीजिये -


उनके गाने अब तक कितनी बार रिमिक्स,'इंस्पिरेशन' आदि आदि के नाम पर बने हैं, इसके आंकड़े भी मिलना मुश्किल है |आख़िर उनका संगीत पुराना होकर भी उतना ही नया कैसे लगता है, इस बात पर भी गौर करना जरुरी है |आर डी ने कभी भी प्रयोग करने में हिचकिचाहट नहीं दिखाई |वह हमेशा नौजवानों को दिमाग में रख कर धुनें तैयार करते थे, और एक एक धुन पर काफ़ी कड़ी मेहनत करते थे| जब भी उचित लगा, उन्होंने शास्त्रीय संगीत के साथ पाश्चात्य संगीत को मिश्रित करने में संकोच नहीं किया | मसलन,'कतरा कतरा मिलती है' में ट्विन ट्रैक, 'चुरा लिया है तुमने' में ग्लास की आवाज (जिसका जिक्र पहले भी कर चुका हूँ ), किताब के गाने 'मास्टर जी की चिठ्ठी' में स्कूल की बेंच को ला कर उसको वाद्य यंत्र के रूप में इस्तेमाल करना, बांस की सीटी में गुब्बारा बाँध कर उसकी आवाज (अब्दुल्ला ), खूशबू के गाने 'ओ मांझी रे' में बोतलों में पानी भरकर उनकी आवाज, जैसे अद्भुत और सफल प्रयोग पंचम के संगीत को नई ऊंचाई देते थे |आर डी ने भारतीय संगीत में इलेक्ट्रानिक उपकरणों का इस्तेमाल बहुत अच्छी तरह से किया | धुन तैयार करते समय हमेशा पंचम के दिमाग में हीरो की शक्ल होती थी, कलाकारों पर उनकी धुनें इतनी फिट कैसे बैठती थीं इसका शायद यह भी कारण था | कभी कभी कार में ही धुनें तैयार कर लेते, और अगर किसी धुन के बारे में विशेष रूप से उत्साहित होते,तो खुशी से चीख पड़ते| इस से जाहिर होता है कि इन जादुई धुनों के पीछे कड़ी मेहनत और श्रेष्ठ रचनात्मकता का कितना बड़ा हाथ था |
आगे बढ़ने से पहले, बचपन की मस्ती में शरारत के रंग भरता फ़िल्म "किताब" का ये नटखट सा गीत सुनते चलें-



पंचम दा के गानों में संगीत के साथ साथ एक और खास बात थी, वह थी गीत के बोलों में छुपे भावों को सफलता से प्रकट करना | किसी भी संगीतकार के लिए यह एक चुनौती होती है कि वह कहानी और गीतकार दोनों के भाव सुनने वाले के जेहन में उत्पन्न कर दे | अगर आप पंचम दा के गानों को महसूस कर पाते हैं, तो स्वयं अंदाजा लगा सकते हैं कि वे कितने सफल थे | पंचम ने कई गीतकारों के साथ काम किया लेकिन गुलज़ार, गुलशन आदि से काफ़ी करीब थे | गुलजार चुटकी लेते हुए कहते हैं : "मेरे गीतों से उसे काफ़ी परेशानी हुआ करती थी,एक तो बेचारे कि हिन्दी कमजोर थी,और ऊपर से मेरी पोएट्री | जब मैंने उसे 'मेरा कुछ सामान' गाना लिखकर दिया तो उसने कागज़ फेंक दिया, और कहा 'अगले दिन आप मुझे टाईम्स ऑफ़ इंडिया का मुखपृष्ठ देकर कहोगे कि इसपर धुन बनाओ'!"
पर जब वो गीत बना तो क्या बना ये तो सभी जानते हैं, इस गीत के लिए आशा और गुलज़ार दोनों को राष्ट्रीय सम्मान मिला, पर हक़दार तो पंचम दा भी थे, नही मानते तो गीत सुनिए, मान जायेंगें -


पंचम बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे | उन्होंने एकाध बार ऐक्टिंग में भी हाथ आजमाए | महमूद की फ़िल्म "भूत बंगला" में उन्होंने पहली बार अदाकारी की और बाद में फ़िल्म "प्यार का मौसम" में पोपट लाल के चरित्र में भी सबको लुभाया | कई गानों में उन्होंने ख़ुद माउथ ओरगन बजाया,और एकाध बार लक्ष्मीकांत प्यारेलाल (याद कीजिये दोस्ती के गीत) और कल्यानजी -आनंदजी के लिए भी बजाया | और गायक के रूप में तो हम उनको उतना ही प्यार करते हैं जितना कि संगीतकार के रूप में |फ़िल्म शोले का गीत 'महबूबा महबूबा' हो या फ़िर 'पिया तू अब तो आजा';पंचम दा के सारे गाये गीत अनूठे हैं |मजरूह सुलतानपुरी के अनुसार "आर डी बर्मन एक युग था, अपने आप में एक स्कूल था,जो उसने ख़ुद शुरू किया,और उसने इसे जिस स्तर पर रखा, वह स्तर अपने साथ ही लेकर गया, और वह स्तर मेरे ख्याल में दुबारा आना आसान नहीं है" |
पंचम की आवाज़ में सुनिए और डूब जाईये -"धन्नो की आँखों में..."-

पंचम पर और बातें, अगली बार....

प्रस्तुति - अलोक शंकर


Friday, February 6, 2009

इस मोड़ से जाते हैं, कुछ सुस्त कदम रस्ते,: पंचम दा पर विशेष

हिन्दी फ़िल्म संगीत के इतिहास में अगर किसी संगीत निर्देशक को सबसे ज्यादा प्यार मिला, तो वह निस्संदेह आर डी वर्मन,या पंचम दा हैं |सचिन देव वर्मन जैसे बड़े और महान निर्देशक के पुत्र होने के बावजूद पंचम दा ने अपनी अलग और अमिट पहचान बनाई |कहते हैं न,पूत के पाँव पालने में ही दिख जाते हैं,जब इनका जन्म हुआ था,तब अभिनेता स्व अशोक कुमार ने देखा कि नवजात आर डी बार बार पाँचवा स्वर "पा" दुहरा रहे हैं,तभी उन्होने इनका नाम रख दिया "पंचम "|आज भी वे बहुत सारे लोगों के लिये सिर्फ़ पंचम दा हैं| सिर्फ़ नौ बरस की उम्र में उन्होंने अपना पहला गीत "ऐ मेरी टोपी पलट के" बना लिया था,जिसे उनके पिता ने "फ़ंटूश" मे लिया भी था| काफ़ी कम उम्र में पंचम दा ने "सर जो तेरा चकराये …" की धुन तैयार कर ली जिसे गुरुदत्त की फ़िल्म "प्यासा" मे लिया गया | आगे जाकर जब आर डी संगीत बनाने लगे,तो उनकी शैली अपने पिता से काफ़ी अलग थी, और इस बात को लेकर दोनों का नजरिया अलग था । आर डी हिन्दुस्तानी के साथ पाश्चात्य संगीत का भी मिश्रण करते थे,जो सचिन देव वर्मन साहब को रास नहीं आता था, इस बात पर एक बार मशहूर गीतकार मजरुह सुल्तानपुरी साहब ने इन्हें समझाया तो पंचम बोले : "देखिये अंकल,बाबा बहुत बड़े म्यूजिक डायरेक्टर हैं,उनसे मैने बहुत कुछ सीखा है और सीखूँगा,लेकिन मैं उनकी राह पर नहीं चलूँगा । मैं अपना रास्ता कुछ अलग निकालूंगा ।" और पंचम दा ने अपनी बात सच साबित कर दिखाई ।

सुनिए उनके शुरूआती दौर की फ़िल्म "भूत बंगला" के ये मस्ती भरा गीत -


संगीत में किसी की सफ़लता का एक पैमाना यह भी होता है कि आप अपने समकालीन कलाकारों से कितनी इज्जत पाते हैं और आपका काम कितना लोकप्रिय होता है । लेकिन आर डी वर्मन की बात करें तो उनके लिये तात्कालिक सफ़लता से ज्यादा यह बात मायने रखती थी कि आपके गाने कितने दिनों तक याद किये जायेंगें,शायद यही कारण भी है कि उनके गाने आज भी हमारे काफ़ीं करीब हैं । मिसाल के तौर पर फ़िल्म परिचय से 'बीती ना बिताई रैना' ,या फ़िर आँधी फ़िल्म मे 'इस मोड़ से जाते हैं,कुछ सुस्त कदम रस्ते' जैसे गीत आज भी काफ़ी पसंद किये जाते हैं और पंचम दा की श्रेष्ठता के परिचायक हैं ।

एक ऐसा ही राग आधारित गीत है फ़िल्म किनारा का "मीठे बोल बोले...", सुनिए -


विशेषज्ञों के अनुसार,आर डी अपने समकालीन निर्देशकों से सालों आगे थे और संगीत की उनकी समझ अन्य की तुलना में कहीं बेहतर थी । वे भारतीय तथा पाश्चात्य संगीत के मिश्रित प्रयोग से संगीत में जादू भर देते । संगीत फ़िल्म की सिचुएशन मे सही हो इसके लिये वह काफ़ी मेहनत करते थे, और कई बार तो धुन बनाते समय फ़िल्म के हीरो का चेहरा दिमाग में रखते थे ताकि धुन बिलकुल सही बैठे । संगीत कभी भी गायक की आवाज पर भारी नहीं पड़ना चाहिये, ऐसा पंचम दा का मानना था, और शायद इसी कारण उनके गाने जादू भरे होते थे, क्योंकि उनमें बेहतरीन सगीत और गीत के साथ सादगी भी होती थी । भारतीय शास्त्रीय संगीत के साथ पाश्चात्य संगीत का मिश्रण कब और कैसे करना है, यह पंचम दा को खूब आता था ; फ़िल्म अमर प्रेम के गाने 'कुछ तो लोग कहेंगें' को ही ले लें जिसमें राग खमाज और राग कलावती के साथ पाश्चात्य संगीत का अद्भुत मिश्रण है । यही नहीं, इनकी रचनात्मकता सिर्फ़ गाने बनाने तक सीमित नहीं थी । नई तकनीकि का इस्तेमाल, रेकार्डिग, बिना तबले के गाने की रेकार्डिग, और विशेष प्रभाव के लिये नये वाद्यों का ईजाद आर डी की विविधता के परिचायक हैं । यहां तक कि सुपरहिट गीत 'चुरा लिया है तुमने जो दिल को' में ग्लास पर चम्मच टकराने की आवाज का इस्तेमाल भी पचम दा ने किया था ।

"चुरा लिया है..." आशा की जादूभरी आवाज़ में -


कई सफ़ल नामों,मसलन गुलजार,आशा भोंसले,किशोर कुमार आदि के सफ़र में पंचम दा की अहम भूमिका रही है । गुलजार साहब,जो कि पंचम दा के बहुत करीब के लोगों में से एक थे,पंचम दा के बारे में कहते हैं "संगीत के तो सिर्फ़ सात ही सुर हैं,पर पंचम की शख्सियत में बेपनाह सुर थे"। आशा जी की आवाज को जिस तरह आर डी वर्मन साहब ने इस्तेमाल किया,वैसा शायद किसी ने नही (ओ पी नैयर अपवाद हैं) किया । इस महान शख्सियत के कुछ पहलुओं को आज हमने छुआ,अगली बार और कई बातों के साथ मिलेंगें आज बस इतना ही । चलते चलते आपको वह गीत सुनवाते हैं जिसने लता जी और भूपेन्द्र जी दोनों को श्रेष्ठ गायक का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार दिलाया ।

"बीते न बितायी रैना..." फ़िल्म परिचय से -


प्रस्तुति - आलोक शंकर


Friday, July 11, 2008

आज के हिंद के युवा का, नया मन्त्र है - " बढ़े चलो ", WORLD WIDE OPENING OF THE SONG # 02 "BADHE CHALO"

जुलाई माह का दूसरा शुक्रवार, और हम लेकर हाज़िर हैं सत्र का दूसरा गीत. पिछले सप्ताह आपने सुना, युग्म के साथ सबसे नए जुड़े संगीतकार निखिल वर्गीस का गीत "संगीत दिलों का उत्सव है", और आज उसके ठीक विपरीत, हम लाये हैं युग्म के सबसे वरिष्ठ संगीतकार ऋषि एस का स्वरबद्ध किया, नया गीत, अब तक ऋषि, युग्म को अपने तीन बेहद खूबसूरत गीतों से नवाज़ चुके हैं, पर उनका यह गीत उन सब गीतों से कई मायनों में अलग है, मूड, रंग और वाद्य-संयोजन के आलावा इसमें, उन्हें पहले से कहीं अधिक लोगों की टीम के साथ काम करना पड़ा, तीन गीतकारों, और दो गायकों के साथ समन्वय बिठाने के साथ साथ उन्होंने इस गीत में बतौर गायक अपनी आवाज़ भी दी है, शायद तभी इस गीत को मुक्कमल होने में लगभग ६ महीने का समय लगा है.
गीत का मूल उद्देश्य, हिंद युग्म की विस्तृत सोच को आज के युवा वर्ग से जोड़ कर उन्हें एक नया मन्त्र देने का है - "बढ़े चलो" के रूप में. गीत के दोनों अंतरे युग्म के स्थायी कवि अलोक शंकर द्वारा लिखी एक कविता, जिसे युग्म का काव्यात्मक परिचय भी माना जाता है , से लिए गए हैं. ”बढ़े चलो” का नारा कवि अवनीश गौतम ने दिया है, और मुखड़े का स्वरुप गीतकार सजीव सारथी ने रचा है, दो नए गायकों को हिंद युग्म इस गीत के माध्यम से एक मंच दे रहा है,दोनों में ही गजब की संभावनाएं नज़र आती हैं, जयेश शिम्पी (पुणे),युग्म पर छपे "गायक बनिए" इश्तेहार के माध्यम से चुन कर आए तो मानसी पिम्पले,को युग्म से जोड़ने का श्रेय जाता है कवियित्री सुनीता यादव को. हिंद युग्म उम्मीद करता है कि पूरी तरह से इंटरनेटिया प्रयास से तैयार, इस प्रेरणात्मक गीत में आपको, आज के हिंद का युवा नज़र आएगा....

Rishi S is not a new name for Hind Yugm listeners, already 3 compositions old this highly talented upcoming composer, here bringing for you, a new song which is completely different from his earlier compositions in many ways.

(Rishi S along with Mansi and Jayesh, the singers)
Almost 6 people are involved in this song and the jamming was completely through the internet, none of them ever meet each other, in person. This song, is actually meant for the sharp thinking, youth of new India, who don’t want to wait for others to make an initiative, they believe in themselves and proudly accept their own bhasha and culture, India is the youngest country in the world (having maximum youth population ) and the new mantra of success for this youthful India is "badhe chalo”. Penned by Alok Shankar, Sajeev Sarathie and Avanish Gautam, and sung by all debutant singers in Jayesh Shimpi, Manasi Pimpley, and Rishi S, this song will surely make you think twice before passing a judgment on today’s young generation. So guys, CHARGED UP, AND CHEER FOR THIS NEW INDIA.

CLICK ON THE PLAYER TO HEAR THE SONG " BADHE CHALO "

गीत के बोल -

मैं आज के हिंद का युवा हूँ,
मुझे आज के हिंद पे नाज़ है,
हिन्दी है मेरे हिंद की धड़कन,
हिन्दी मेरी आवाज़ है..

बदल रहा है हिंद, बदल रहे हैं हम,
बदल रहे हैं हम, बदल रहा है हिंद,
बढे चलो .... बढे चलो.... -2
हम आज फ़लक पर बिछी हुई
काई पिघलाने आए हैं
भारत की बरसों से सोई
आवाज़ जगाने आये हैं


तुम देख तिमिर मत घबराओ
हम दीप जलाने वाले हैं
बस साथ हमारे हो लो, हम
सूरज पिघलाने वाले हैं

मैं युग्म, तुम्हारी भाषा का,
हिन्दी की धूमिल आशा का ;
मैं युग्म , एकता की संभव
हर ताकत की परिभाषा का

मैं युग्म, आदमी की सुन्दर
भावना जगाने आया हूँ
मैं युग्म, हिन्द का मस्तक
कुछ और सजाने आया हूँ ।

हममें है हिम्मत बढ़ने की
तूफ़ान चीरकर चलने की
चट्टानों से टकराने की
गिरने पर फ़िर उठ जाने की

बदल रहा है हिंद, बदल रहे हैं हम,
बदल रहे हैं हम, बदल रहा है हिंद,
बढे चलो .... बढे चलो.... -2



( Team of the Lyricists )

यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंकों से डाऊनलोड कर लें (ऑडियो फ़ाइल तीन अलग-अलग फ़ॉरमेट में है, अपनी सुविधानुसार कोई एक फ़ॉरमेट चुनें)

You can choose any format to download from here -





VBR MP364Kbps MP3Ogg Vorbis


SONG #02 , SEASON 2008, " BADHE CHALO " MUSIC @ HINDYUGM, Where Music Is a Passion

Monday, June 2, 2008

आलोक शंकर का रेडियो काव्यपाठ

भारतीय समयानुसार २ जून २००८ की सुबह ८ बजे डैलास, अमेरिका के हिन्दी एफ॰एम॰ रेडियो सलाम नमस्ते पर हिन्द-युग्म के प्रथम यूनिकवि आलोक शंकर का काव्यपाठ और बातचीत प्रसारित किए गये। हमने रिकॉर्ड करने की कोशिश की। हम इस भ्रम में रहे कि पूरा कवितांजलि कार्यक्रम रिकॉर्ड हो रहा है, परंतु तकनीकी असावधानियों के कारण ठीक से रिकॉर्ड नहीं कर सके। हिन्द-युग्म की स्थाई पाठिका रचना श्रीवास्तव ने आलोक शंकर का हौसला बढ़ाने के लिए फोन भी किया, मगर वो भी रिकॉर्ड न हो सका। जितना हो पाया है, आपके समक्ष प्रस्तुत है, ज़रूर बताये कैसा लगा?



प्लेयर से न सुन पा रहे हों तो यहाँ से डाऊनलोड कर लें।

Kavya-path of Alok Shankar on Radio Salaam Namaste

The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



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