Skip to main content

प्लेबैक इंडिया वाणी (9) क्या सुपर कूल हैं हम और आपकी बात

संगीत समीक्षा - क्या सुपर कूल हैं हम



छोटे परदे की बेहद सफल निर्मात्री एकता कपूर ने जब फ़िल्मी दुनिया में कदम रखा तो वहाँ भी सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित किये, बहुत ही अलग अलग अंदाज़ की फ़िल्में वो दर्शकों के लिए लेकर आयीं हैं, जिनमें हास्य, सस्पेंस, ड्रामा सभी तरह के जोनर शामिल हैं. 

अपने भाई तुषार कपूर को लेकर उन्होंने क्या कूल हैं हम बनायीं थी जिसने दर्शकों को भरपूर हँसाया, इसी कड़ी को आगे बढ़ाते हुए वो लायीं है अब क्या सुपर कूल हैं हम जिसमें तुषार कपूर के साथ है रितेश देशमुख. फिल्म हंसी का पिटारा है या नहीं ये तो दर्शकों को फिल्म देखने के बाद ही पता लग पायेगा, पर आईये हम जान लेते हैं कि फिल्म का संगीत कैसा है.

उभरते हुए संगीतकार जोड़ी सचिन जिगर के टेक्नो रिदम से लहराके उठता है दिल गार्डन गार्डन गीत. मयूर पूरी के बे सर पैर सरीखे शब्द गीत को एक अलग ही तडका देते हैं. जहाँ रिदम गीत की जान है वहीँ विशाल ददलानी की उर्जात्मक आवाज़ जोश से भरपूर है. गीत को सुनते हुए न सिर्फ आपके कदम थिरकेंगें बल्कि शब्दों की उटपटांग हरकतें आपके चेहरे पर एक मुस्कान भी ले आएगी...अगर आपने गीत का फिल्मांकन देखा होगा तो गौर किया होगा, सेट से लेकर पहनावे तक हर चीज को एक रेट्रो लुक से सराबोर किया हुआ है जो बेहद लुभावना लगता है, यक़ीनन ये गीत आप आने वाले समय में बहुत बहुत बार सुनने वाले हैं

इस तरह की फिल्म जिसमें कोमेडी का होना पागलपन की हद तक सुनिश्चित हो वहाँ कोई मेलोडिअस गीत की उम्मीद शायद ही कोई करेगा. पर इस अलबम में श्रोताओं के लिए एक बेहद ही मीठा सरप्रयिस है. गीत शर्ट का बट्टन दो अलग अलग संस्करणों में है, जहाँ सोनू की सुरीली आवाज़ में ये एक आउट एंड आउट रोमांटिक गीत बनकर उभरता है वहीँ कैलाश खेर और साथियों वाला संस्करण सूफी रोमंसिसिम को हलके फुल्के अंदाज़ में समेटता है. दोनों गीतों के बोल और धुन एक होने के बावजूद भी संगीत संयोजन और आवाजों के मुक्तलिफ़ अंदाजों के चलते दो अलग अलग गीत से सुनाई पड़ते हैं, और दोनों ही आपके दिल को छू जाते हैं, काफी समय से एक अच्छे ब्रेक की तलाश में चल रहे गीतकार कुमार के लिए इससे बेहतर प्लेटफोर्म नहीं हो सकता था और उन्होंने चालू शायरी के पुट में यक़ीनन अच्छी खासी गरिमा भरी है, दोस्तों यकीन मानिये इस तरफ के गीत लिखने में एक गीतकार को खासी मेहनत करनी पड़ती है. आधुनिक नारी के श्रृंगार प्रसाधनों को एक तार में पिरोता ये गीत बेहद ही खूबसूरत है. और साल के बेहतरीन गीतों में एक है. संगीतकार मीत ब्रोस अनजान और गीतकार कुमार को खासी बधाई. कहने की जरुरत नहीं कि सोनू की ठहराव से भरी गायिकी और कैलाश का लोक अंदाज़ गीत का बोनस है.

कई साल पहले आई फिल्म शूल के लिए शंकर एहसान लॉय ने एक आइटम गीत रचा यु पी बिहार लूटने जो शिल्प शेट्टी पर फिल्माया गया था, उसी धमाकेदार गीत को मीत ब्रोस ने एक बार फिर एक नए अंदाज़ में उभारा है और इसे किसी अभिनेत्री पर नहीं बल्कि फिल्म के दो नायकों पर फिल्माया गया है. जहाँ सुखविंदर और दलेर प्राजी की दमदार आवाज़ के साथ महरास्त्रियन लावनी का फ्लेवर जमाया खुद रितेश देशमुख ने अपनी आवाज़ के जरिये. ये मस्त मस्त गीत खुल कर नाचने के लिए है बस.

अल्बम का अंतिम गीत वोल्यूम हाई करले बहुत मजेदार नहीं बन पाया है, और अल्बम के अन्य गीतों के मुकाबले कम इन्नोवेटिव भी है...पर फिर भी दिल गार्डन शर्ट का बट्टन और केपेचिनो गीत काफी है इस अल्बम को ४.१ की रेटिंग देने के लिए. एक बार शर्ट का बट्टन के लिए बधाई जो शायद इस फिल्म का सबसे बड़ा आकर्षण होने वाला है.   

 
और अंत में आपकी बात- अमित तिवारी के साथ

Comments

Anonymous said…
wow, this one is good, gonna use for another sport but i think it'll be just as good, BIG thanks :)

Popular posts from this blog

भला हुआ मेरी मटकी फूटी.. ज़िन्दगी से छूटने की ख़ुशी मना रहे हैं कबीर... साथ हैं गुलज़ार और आबिदा

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #११३ सू फ़ियों-संतों के यहां मौत का तसव्वुर बडे खूबसूरत रूप लेता है| कभी नैहर छूट जाता है, कभी चोला बदल लेता है| जो मरता है ऊंचा ही उठता है, तरह तरह से अंत-आनन्द की बात करते हैं| कबीर के यहां, ये खयाल कुछ और करवटें भी लेता है, एक बे-तकल्लुफ़ी है मौत से, जो जिन्दगी से कहीं भी नहीं| माटी कहे कुम्हार से, तू क्या रोंदे मोहे । एक दिन ऐसा आयेगा, मैं रोदुंगी तोहे ॥ माटी का शरीर, माटी का बर्तन, नेकी कर भला कर, भर बरतन मे पाप पुण्य और सर पे ले| आईये हम भी साथ-साथ गुनगुनाएँ "भला हुआ मेरी मटकी फूटी रे"..: भला हुआ मेरी मटकी फूटी रे । मैं तो पनिया भरन से छूटी रे ॥ बुरा जो देखन मैं चला, बुरा ना मिलिया कोय । जो दिल खोजा आपणा, तो मुझसा बुरा ना कोय ॥ ये तो घर है प्रेम का, खाला का घर नांहि । सीस उतारे भुँई धरे, तब बैठे घर मांहि ॥ हमन है इश्क़ मस्ताना, हमन को हुशारी क्या । रहे आज़ाद या जग से, हमन दुनिया से यारी क्या ॥ कहना था सो कह दिया, अब कछु कहा ना जाये । एक गया सो जा रहा, दरिया लहर समाये ॥ लाली मेरे लाल की, जित देखूं तित लाल । लाली देखन मैं गयी, मैं भी हो गयी लाल ॥ हँस हँस कु...

‘बरसन लागी बदरिया रूमझूम के...’ : SWARGOSHTHI – 180 : KAJARI

स्वरगोष्ठी – 180 में आज वर्षा ऋतु के राग और रंग – 6 : कजरी गीतों का उपशास्त्रीय रूप   उपशास्त्रीय रंग में रँगी कजरी - ‘घिर आई है कारी बदरिया, राधे बिन लागे न मोरा जिया...’ ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी लघु श्रृंखला ‘वर्षा ऋतु के राग और रंग’ की छठी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र एक बार पुनः आप सभी संगीतानुरागियों का हार्दिक स्वागत और अभिनन्दन करता हूँ। इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम वर्षा ऋतु के राग, रस और गन्ध से पगे गीत-संगीत का आनन्द प्राप्त कर रहे हैं। हम आपसे वर्षा ऋतु में गाये-बजाए जाने वाले गीत, संगीत, रागों और उनमें निबद्ध कुछ चुनी हुई रचनाओं का रसास्वादन कर रहे हैं। इसके साथ ही सम्बन्धित राग और धुन के आधार पर रचे गए फिल्मी गीत भी सुन रहे हैं। पावस ऋतु के परिवेश की सार्थक अनुभूति कराने में जहाँ मल्हार अंग के राग समर्थ हैं, वहीं लोक संगीत की रसपूर्ण विधा कजरी अथवा कजली भी पूर्ण समर्थ होती है। इस श्रृंखला की पिछली कड़ियों में हम आपसे मल्हार अंग के कुछ रागों पर चर्चा कर चुके हैं। आज के अंक से हम वर्षा ऋतु...

राग चन्द्रकौंस : SWARGOSHTHI – 358 : RAG CHANDRAKAUNS

स्वरगोष्ठी – 358 में आज पाँच स्वर के राग – 6 : “सन सनन सनन जा री ओ पवन…” प्रभा अत्रे से राग चन्द्रकौंस की बन्दिश और लता मंगेशकर से फिल्म का गीत सुनिए डॉ. प्रभा अत्रे लता मंगेशकर ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला – “पाँच स्वर के राग” की छठी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। इस श्रृंखला में हम आपसे भारतीय संगीत के कुछ ऐसे रागों पर चर्चा कर रहे हैं, जिनमें केवल पाँच स्वरों का प्रयोग होता है। भारतीय संगीत में रागों के गायन अथवा वादन की प्राचीन परम्परा है। संगीत के सिद्धान्तों के अनुसार राग की रचना स्वरों पर आधारित होती है। विद्वानों ने बाईस श्रुतियों में से सात शुद्ध अथवा प्राकृत स्वर, चार कोमल स्वर और एक तीव्र स्वर; अर्थात कुल बारह स्वरो में से कुछ स्वरों को संयोजित कर रागों की रचना की है। सात शुद्ध स्वर हैं; षडज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पंचम, धैवत और निषाद। इन स्वरों में से षडज और पंचम अचल स्वर माने जाते हैं। शेष में से ऋषभ, गान्धार, धैवत और निषाद स...