Skip to main content

"ये गलियाँ ये चौबारा, यहाँ आना ना दोबारा....", जानिए इस गीत के बनने की कहानी


एक गीत सौ कहानियाँ - 75
 

'ये गलियाँ ये चौबारा, यहाँ आना ना दोबारा...' 



रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'।इसकी 75-वीं कड़ी में आज जानिए 1982 की फ़िल्म ’प्रेम रोग’ के मशहूर गीत "ये गलियाँ ये चौबारा, यहाँ आना ना दोबारा..." के बारे में जिसे लता मंगेशकर ने गाया था। बोल संतोष आनन्द के और संगीत लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल का। 

इस लेख के लिए तथ्य संग्रहित कर हमें लिख भेजा है लखनऊ के हमारे पुराने श्रोता-पाठक श्री चन्द्रकान्त दीक्षित ने। दीक्षित जी के हम मन से आभारी हैं।

संतोष आनंद
अस्सी के दशक के शुरुआत की बात है। राजकपूर एक फिल्म बना रहे थे। उनके पूर्व की समस्त फ़िल्मों की तरह इस फ़िल्म का संगीत पक्ष भी सशक्त होना था। ’सत्यम शिवम् सुन्दरम’ फ़िल्म के गीत-संगीत की अपार सफलता के बाद राज कपूर ने इस अगली महत्वाकांक्षी फ़िल्म के लिए भी संगीतकार लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल को ही चुनने का फ़ैसला लिया। ’सत्यम् शिवम् सुन्दरम्’ में तीन गीतकारों - पंडित नरेन्द्र शर्मा (4), आनन्द बक्शी (3) और विट्ठलभाई पटेल (1) ने गीत लिखे थे। अगली फ़िल्म के लिए राज कपूर पंडित नरेन्द्र शर्मा से गीत लिखवाना चाहते थे। शर्मा जी के साथ राज साहब जब फ़िल्म की कहानी और गीतों के सिचुएशनों से संबंधित बातचीत कर रहे थे, तब फ़िल्म में कहानी का एक मोड़ ऐसा था कि नायिका की शादी नायक से नहीं बल्कि किसी और से हो रही है। और तो और नायिका भोली है और वो नहीं जानती कि नायक उसे चाहता है। इस सिचुएशन के लिए राज कपूर चाहते थे कि एक गीत नायिका शादी के पहले दिन गा रही है, यानि कि उन्हें एक ऐसा शादी गीत चाहिए था जिसमें इन सभी पहलुओं का सार समाहित हो। पंडित जी ने जब यह सिचुएशन सुना तो उन्होंने राजकपूर को गीतकार संतोष आनंद का नाम सुझाया और कहा कि इस गीत के लिए संतोष आनन्द बेहतर सिद्ध होंगे। उनके इस बात को सुन कर राज कपूर हैरान रह गए क्योंकि पंडित जी की भी तीन बेटियाँ हैं, इस तरह से एक बेटी के विचारों को वो ख़ुद भी अच्छी तरीके से बयान कर सकते थे। ख़ैर, राज कपूर ने संतोष आनन्द को न्योता देकर बुलाया।

अंगूठा
संतोष आनन्द के साथ उस मीटिंग में राज कपूर ने सबसे पहले उनको सिचुएशन बताई कि नायिका इस गीत में अपनी सखियों, अपनी माँ और नायक को संबोधित कर रही है, और कुल मिला कर तीन तरह के भाव गीत में चाहिए। यहाँ एक और रोचक बात जानने लायक है, राजकपूर जब युवा थे तो उनकी शादी की बात एक लड़की से चल रही थी। राज कपूर जब उसके घर गए तो उसने उनको अंगूठा दिखा कर चिढाया था (बचपने में)। यह बात राजकपूर की स्मृति में थी और इसे भी वो अपने इस गीत में इस्तेमाल करना चाहते थे। उन्हें गीत में कुछ शब्द ऐसे चाहिए थे जो नायिका अंगूठा दिखाते हुए गा सके। फिल्म ’बाबी” में डिम्पल का बेसन सने हाथों से दरवाजा खोलने वाला सीन भी राजकपूर के एक व्यक्तिगत अनुभव पर आधारित था’। ख़ैर, सारी बात समझने के बाद संतोष आनंद ने विदा ली और इस पर दिमाग लगाने लगे। अचानक उन्होंने दिल्ली की फ्लाइट पकड़ी और अपने परिवार के पास आ गए। रात्रि के भोजन के बाद उन्होंने अपनी छोटी सी बिटिया को गोद में लिटाया और साथ ही कागज़ पर कलम भी चलने लगी। एक बार वो अपनी नन्ही परी की तरफ़ देखते और अगले पल कागज़ पर कुछ लिखते। आँखें भरी हुईं थीं। अपनी बेटी की विदाई के बारे में सोचते हुए गीत लिखते चले जा रहे थे और उनकी आँखों से आँसू टपकते चले जा रहे थे। रात कब ख़त्म हुई पता भी नहीं चला। सुबह हुई, उन्होंने फिल्म के संगीतकार लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल को फोन करके कहा कि मैं आ रहा हूँ, गीत तैयार है।

तीन अलग संबोधन
मुबई में सब लोग बैठे, संतोष आनंद ने गीत सुनाना शुरू किया। जैसे ही उन्होंने अंगूठा हिलाते हुए गाया "कि तेरा यहाँ कोई नहीं...", राज कपूर ख़ुशी से झूम उठे और संतोष आनंद का हाथ चूम लिया। लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल ने शानदार धुन तैयार की और लता जी ने गाकर इस गीत को अमर कर दिया। राज कपूर के बताए हुए सिचुएशन और चरित्रों को ध्यान में रख कर संतोष आनन्द ने इस गीत के लिए तीन अन्तरे लिखे और तीनों में अलग अलग संबोधन है। पहला अन्तरा नायिका संबोशित करती है अपनी सहेलियों को, दूसरा अपनी माँ को, और तीसरा नायक को (जो नायिका के मन में सिर्फ़ एक दोस्त की तरह है, ना कि प्रेमी की तरह)। जी हाँ, यह है फ़िल्म ’प्रेम रोग’ का सदाबहार गीत "ये गलियाँ ये चौबारा, यहाँ आना ना दोबारा, अब हम तो भए परदेसी, कि तेरा यहाँ कोई नहीं..."। अपने उत्कृष्ट बोलों की वजह से यह गीत एक बेहद पसन्दीदा विदाई गीत बन गया है। इस गीत के लिए संतोष आनन्द को कोई पुरस्कार तो नहीं मिला, पर इसी फ़िल्म के लिए उनके लिखे एक अन्य गीत "मोहब्बत है क्या चीज़..." के लिए उन्हें फ़िल्मफ़ेयर के सर्वश्रेष्ठ गीतकार का पुरस्कार मिला था। इस पुरस्कार की दौड़ में इसी फ़िल्म का अन्य गीत "मेरी क़िस्मत में तू नहीं शायद..." शामिल था जिसके गीतकार थे आमरी क़ज़लबश। इसके अलावा ’नमक हलाल’ और ’निकाह’ जैसी फ़िल्मों के गीत भी नामांकित हुए थे। "ये गलियाँ ये चौबारा..." गीत को कोई पुरस्कार भले ना मिला हो, पर इस गीत में जो भाव समाहित है, गीत को जितनी बार सुनो, हर बार दिल को छू जाता है, दिल भर आता है, मन उदास हो जाता है। बस इतनी सी थी इस गीत के बनने की कहानी। लीजिए, अब आप इस गीत का वीडियो देखिए। 


फिल्म प्रेमरोग : "ये गलियाँ ये चौबारा...." : लता मंगेशकर : लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल : सन्तोष आनंद



अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें soojoi_india@yahoo.co.in के पते पर। 


खोज: चन्द्रकान्त दीक्षित  
आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 




Comments

Sajeev said…
what a song sujoy... no one can compose a song like this except LP. and yes santosh anand is really never got what he deserve

Popular posts from this blog

भला हुआ मेरी मटकी फूटी.. ज़िन्दगी से छूटने की ख़ुशी मना रहे हैं कबीर... साथ हैं गुलज़ार और आबिदा

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #११३ सू फ़ियों-संतों के यहां मौत का तसव्वुर बडे खूबसूरत रूप लेता है| कभी नैहर छूट जाता है, कभी चोला बदल लेता है| जो मरता है ऊंचा ही उठता है, तरह तरह से अंत-आनन्द की बात करते हैं| कबीर के यहां, ये खयाल कुछ और करवटें भी लेता है, एक बे-तकल्लुफ़ी है मौत से, जो जिन्दगी से कहीं भी नहीं| माटी कहे कुम्हार से, तू क्या रोंदे मोहे । एक दिन ऐसा आयेगा, मैं रोदुंगी तोहे ॥ माटी का शरीर, माटी का बर्तन, नेकी कर भला कर, भर बरतन मे पाप पुण्य और सर पे ले| आईये हम भी साथ-साथ गुनगुनाएँ "भला हुआ मेरी मटकी फूटी रे"..: भला हुआ मेरी मटकी फूटी रे । मैं तो पनिया भरन से छूटी रे ॥ बुरा जो देखन मैं चला, बुरा ना मिलिया कोय । जो दिल खोजा आपणा, तो मुझसा बुरा ना कोय ॥ ये तो घर है प्रेम का, खाला का घर नांहि । सीस उतारे भुँई धरे, तब बैठे घर मांहि ॥ हमन है इश्क़ मस्ताना, हमन को हुशारी क्या । रहे आज़ाद या जग से, हमन दुनिया से यारी क्या ॥ कहना था सो कह दिया, अब कछु कहा ना जाये । एक गया सो जा रहा, दरिया लहर समाये ॥ लाली मेरे लाल की, जित देखूं तित लाल । लाली देखन मैं गयी, मैं भी हो गयी लाल ॥ हँस हँस कु...

‘बरसन लागी बदरिया रूमझूम के...’ : SWARGOSHTHI – 180 : KAJARI

स्वरगोष्ठी – 180 में आज वर्षा ऋतु के राग और रंग – 6 : कजरी गीतों का उपशास्त्रीय रूप   उपशास्त्रीय रंग में रँगी कजरी - ‘घिर आई है कारी बदरिया, राधे बिन लागे न मोरा जिया...’ ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी लघु श्रृंखला ‘वर्षा ऋतु के राग और रंग’ की छठी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र एक बार पुनः आप सभी संगीतानुरागियों का हार्दिक स्वागत और अभिनन्दन करता हूँ। इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम वर्षा ऋतु के राग, रस और गन्ध से पगे गीत-संगीत का आनन्द प्राप्त कर रहे हैं। हम आपसे वर्षा ऋतु में गाये-बजाए जाने वाले गीत, संगीत, रागों और उनमें निबद्ध कुछ चुनी हुई रचनाओं का रसास्वादन कर रहे हैं। इसके साथ ही सम्बन्धित राग और धुन के आधार पर रचे गए फिल्मी गीत भी सुन रहे हैं। पावस ऋतु के परिवेश की सार्थक अनुभूति कराने में जहाँ मल्हार अंग के राग समर्थ हैं, वहीं लोक संगीत की रसपूर्ण विधा कजरी अथवा कजली भी पूर्ण समर्थ होती है। इस श्रृंखला की पिछली कड़ियों में हम आपसे मल्हार अंग के कुछ रागों पर चर्चा कर चुके हैं। आज के अंक से हम वर्षा ऋतु...

"जाने कहाँ गए वो दिन...", कौन कौन से थे इस गीत के वो तीन अन्तरे जो जारी नहीं हुए?

एक गीत सौ कहानियाँ - 95 'जाने कहाँ गए वो दिन ...'   रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना  रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'।  इसकी 95-वीं कड़ी में आज जानिए 1970 की फ़िल्म ’मेरा नाम जोकर’ के मशहूर गीत "जाने कहाँ गए वो दिन..." के बारे में जिसे मुके...