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लफ़्ज़ों की गुज़ारिश को परवान देता एक गीतकार


राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित गीतकार प्रसून जोशी एक सफल स्क्रीन लेखक और मशहूर कॉपीराईटर भी हैं. दिल से कवि, प्रसून ने अपनी कलम के जादू से इंडस्ट्री में आज अपना एक खास मुकाम बना लिया है. प्रसून पर सुनील चिपडे की विशेष प्रस्तुति आज सुनें सिर्फ और सिर्फ रेडियो प्लेबैक इंडिया पर 


  

Comments

pcpatnaik said…
CONGRATS....
Sajeev said…
Sabr Reet Jabalpuri सुनी यह प्रस्तुति...बहुत ही गहन और विस्तृत शोध व संकलन शब्दों और विचारों के महामहिम पर..साथ ही उनके गीतों की महकती श्रंखला, धाराप्रवाह सुनने की सुविधा भी सुखकर है. बहुत बहुत बधाई और सराहना, सुनील जी और समस्त RPI कर्णधारों को!
Unknown said…
Behtarin prastuti sunil ji ko dher sari badhai

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महफ़िल-ए-ग़ज़ल #११३ सू फ़ियों-संतों के यहां मौत का तसव्वुर बडे खूबसूरत रूप लेता है| कभी नैहर छूट जाता है, कभी चोला बदल लेता है| जो मरता है ऊंचा ही उठता है, तरह तरह से अंत-आनन्द की बात करते हैं| कबीर के यहां, ये खयाल कुछ और करवटें भी लेता है, एक बे-तकल्लुफ़ी है मौत से, जो जिन्दगी से कहीं भी नहीं| माटी कहे कुम्हार से, तू क्या रोंदे मोहे । एक दिन ऐसा आयेगा, मैं रोदुंगी तोहे ॥ माटी का शरीर, माटी का बर्तन, नेकी कर भला कर, भर बरतन मे पाप पुण्य और सर पे ले| आईये हम भी साथ-साथ गुनगुनाएँ "भला हुआ मेरी मटकी फूटी रे"..: भला हुआ मेरी मटकी फूटी रे । मैं तो पनिया भरन से छूटी रे ॥ बुरा जो देखन मैं चला, बुरा ना मिलिया कोय । जो दिल खोजा आपणा, तो मुझसा बुरा ना कोय ॥ ये तो घर है प्रेम का, खाला का घर नांहि । सीस उतारे भुँई धरे, तब बैठे घर मांहि ॥ हमन है इश्क़ मस्ताना, हमन को हुशारी क्या । रहे आज़ाद या जग से, हमन दुनिया से यारी क्या ॥ कहना था सो कह दिया, अब कछु कहा ना जाये । एक गया सो जा रहा, दरिया लहर समाये ॥ लाली मेरे लाल की, जित देखूं तित लाल । लाली देखन मैं गयी, मैं भी हो गयी लाल ॥ हँस हँस कु...

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