Skip to main content

छोड़ गए बालम मुझे हाय अकेला छोड़ गए....एक टीस सी छोड़ जाता है "बरसात" का ये गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 101

दोस्तों, कल हमने 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की हीरक जयंती मनायी। और उससे एक दिन पहले यानी कि २ जून को फ़िल्म जगत के सुप्रसिद्ध फ़िल्मकार राज कपूर साहब की पुण्यतिथि भी थी। 'शोमैन औफ़ दि मिलेनियम' राज कपूर को हम श्रद्धांजली अर्पित कर रहे हैं हिंद युग्म के इसी 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के माध्यम से। आज से लेकर अगले सात दिनों तक यह शृंखला समर्पित रहेगी राज कपूर की पुण्य स्मृति को। अर्थात, अगले सात अंकों में आप सुनने जा रहे हैं राज साहब की फ़िल्मों के सदाबहार गानें। राज कपूर की हर एक फ़िल्म अमर हो गयी है अपने सुमधुर गीत संगीत की वजह से। उनकी कोई भी फ़िल्म चाहे बौक्स औफ़िस पर चले या ना चले, लेकिन उनके हर फ़िल्म का संगीत राज करता है लोगों के दिलों में आज तक। और यही कारण है कि हम 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में एक पूरा का पूरा हफ़्ता मनाने वाले हैं 'राज कपूर विशेष'। गाने सुनवाने के साथ साथ हम आपको राज साहब से जुड़ी कई बातें भी बताएँगे, और अगर आपको भी उनके बारे मे कोई दिलचस्प बात का पता हो तो हमारे साथ ज़रूर बाँटें।

१४ दिसम्बर १९२४ को पेशावर मे जन्मे राज कपूर का पूरा नाम था रणबीर राज कपूर। पिता पृथ्वीराज कपूर और माँ रमा देवी के चार संतानों में राज सबसे बड़े थे। शम्मी कपूर और शशी कपूर उनके दो भाई थे और उनकी एक बहन थीं उर्मिला सियाल। पिता थियटर और फ़िल्मों से जुड़े हुए ही थे, और शायद इसी वजह से राज मे भी फ़िल्मों के प्रति लगाव पनपा। उन्होने अपना फ़िल्मी कैरियर 'क्लैपिंग बॉय' की हैसीयत से शुरु किया फ़िल्मकार किदार शर्मा के पास। ११ वर्ष की आयु मे वो पहली बार किसी फ़िल्म के परदे पर नज़र आये, फ़िल्म थी 'इन्कलाब', साल था १९३५। अगले १२ साल तक कई फ़िल्मों में छोटे मोटे रोल करने के बाद राज कपूर को नायक के रूप मे अपना पहला ब्रेक मिला किदार शर्मा की ही फ़िल्म 'नील कमल' मे जो बनी थी १९४७ मे। इस फ़िल्म में मधुबाला उनकी 'हीरोइन' बनीं। इसके बाद अगले ही साल, यानी १९४८ मे राज कपूर ने इतिहास रचा अपने समय का सबसे कम उम्र का फ़िल्म निर्माता व निर्देशक बनकर। जी हाँ, १९४८ मे राज कपूर ने स्थापना की 'आर.के. फ़िल्म्स' की और बना डाली फ़िल्म 'आग' जिसमे वो पहली बार नरगिस के साथ नज़र आये थे। इस जोड़ी का ज़िक्र हम अगले अंक मे भी करेंगे। 'आग' तो ज़्यादा नहीं चली, लेकिन 'आर.के' बैनर की गाड़ी ज़रूर चल पड़ी। 'आग' के पिट जाने के बाद राज कपूर ने अपनी पूरी की पूरी टीम ही बदल डाली। संगीतकार राम गांगुली के जगह आ गये शंकर-जयकिशन, गीतकार के रूप मे लिया गया शैलेन्द्र और हसरत जयपुरी को, और मुकेश और लता मंगेशकर बने 'आर.के. फ़िल्म्स' के मुख्य गायक और गायिका। इस नयी टीम को लेकर १९४९ मे राज कपूर ने बनायी 'बरसात'। नायिका के रूप मे राज कपूर ने लौन्च किया वहीदन बाई की बेटी निम्मी को। यह फ़िल्म इतनी कामयाब रही कि इस फ़िल्म से जुड़े हर कलाकार के लिए यह फ़िल्म मील का पत्थर साबित हुआ। शंकर जयकिशन और शैलेन्द्र - हसरत की यह पहली फ़िल्म थी और पहली ही फ़िल्म मे इन्होनें ऐसे गानें बनाये कि हर गली, हर चौराहे, और हर घर में बस इसी फ़िल्म के गीतों की गूँज सुनायी देने लगी। भले ही लताजी का पहला हिट गीत फ़िल्म 'महल' मे आ चुका था, लेकिन 'बरसात' मे उनके गाये तमाम गीतों की लोकप्रियता ने उन्हे शीर्ष पर पहुँचा दिया। तो आइए 'राज कपूर विशेष' के अंतर्गत आज का गीत सुनते हैं इसी फ़िल्म 'बरसात' से जिसे मुकेश और लता ने गाया है, "छोड़ गये बालम, मुझे हाये अकेला छोड़ गये"। गीत राग भैरवी पर आधारित है, आपको शायद पता हो कि यह राग शंकर जयकिशन का सबसे चहेता राग रहा है, इतना ज़्यादा कि जयकिशन ने अपनी बेटी का नाम भी भैरवी रखा है। गीत को ग़ौर से सुनिएगा दोस्तों क्यूंकि इस गीत के इंटरलिउड़ म्युज़िक आपको राज कपूर की एक अन्य फ़िल्म 'श्री ४२०' के "प्यार हुआ इक़रार हुआ" मे भी सुनायी देता है।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें २ अंक और २५ सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के ५ गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा पहला "गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. राज कपूर की एक और बेहद सफल फिल्म का गीत.
२. राग भैरवी पर ही आधारित इस गीत में स्वर है मुकेश का.
३. पहले अंतरे की दूसरी पंक्ति में शब्द है -"इकरार".

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
हमने पहेली को थोड़ा मुश्किल किया लेकिन शरद तैलंग जी ने फिर भी बाजी मार ली। इन्हें मिलते हैं 2 अंक। बिलकुल सही जवाब। शामिख फ़राज़ और निर्मला कपिला जैसे कुछ नये श्रोता भी दिख रहे हैं। लग रहा है आगे का मुक़ाबला और भी दिलचस्प होने वाला है।

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.


Comments

गीत : आवारा हूँ आवारा हूँ
फ़िल्म : आवारा
घरवार नहीं संसार नहीं मुझसे किसी को प्यार नहीं
उस पार किसी से मिलने का इक़रार नही ...
neelam said…
शरद जी ,
प्रणाम
आवारा हूँ ,या गर्दिश में भी आसमान का तारा हूँ
गर्दिश में भी आसमान का तारा हूँ
गर्दिश में भी आसमान का तारा हूँ
बेहद खूबसूरत बात जो आप ने नहीं बताई ,
सुजोय दा,सजीव जी शरद जी को पूरे प्राप्तांक न दिए जाएँ |
rachana said…
शरद जी आप की दाद देती हूँ क्या ही खूब पहचाना है मेरे ख्याल से भी यही है .
सादर
रचना
manu said…
या गर्दिश में हूँ आसमान का तारा हूँ,,,
सही गीत...
Shamikh Faraz said…
आवारा हूँ या गर्दिश में आसमान का तारा हूँ.
आवारा हूँ या गर्दिश में आसमान का तारा हूँ.
घरबार नहीं संसार नहीं मुझसे किसी को प्यार नहीं.

Popular posts from this blog

भला हुआ मेरी मटकी फूटी.. ज़िन्दगी से छूटने की ख़ुशी मना रहे हैं कबीर... साथ हैं गुलज़ार और आबिदा

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #११३ सू फ़ियों-संतों के यहां मौत का तसव्वुर बडे खूबसूरत रूप लेता है| कभी नैहर छूट जाता है, कभी चोला बदल लेता है| जो मरता है ऊंचा ही उठता है, तरह तरह से अंत-आनन्द की बात करते हैं| कबीर के यहां, ये खयाल कुछ और करवटें भी लेता है, एक बे-तकल्लुफ़ी है मौत से, जो जिन्दगी से कहीं भी नहीं| माटी कहे कुम्हार से, तू क्या रोंदे मोहे । एक दिन ऐसा आयेगा, मैं रोदुंगी तोहे ॥ माटी का शरीर, माटी का बर्तन, नेकी कर भला कर, भर बरतन मे पाप पुण्य और सर पे ले| आईये हम भी साथ-साथ गुनगुनाएँ "भला हुआ मेरी मटकी फूटी रे"..: भला हुआ मेरी मटकी फूटी रे । मैं तो पनिया भरन से छूटी रे ॥ बुरा जो देखन मैं चला, बुरा ना मिलिया कोय । जो दिल खोजा आपणा, तो मुझसा बुरा ना कोय ॥ ये तो घर है प्रेम का, खाला का घर नांहि । सीस उतारे भुँई धरे, तब बैठे घर मांहि ॥ हमन है इश्क़ मस्ताना, हमन को हुशारी क्या । रहे आज़ाद या जग से, हमन दुनिया से यारी क्या ॥ कहना था सो कह दिया, अब कछु कहा ना जाये । एक गया सो जा रहा, दरिया लहर समाये ॥ लाली मेरे लाल की, जित देखूं तित लाल । लाली देखन मैं गयी, मैं भी हो गयी लाल ॥ हँस हँस कु...

‘बरसन लागी बदरिया रूमझूम के...’ : SWARGOSHTHI – 180 : KAJARI

स्वरगोष्ठी – 180 में आज वर्षा ऋतु के राग और रंग – 6 : कजरी गीतों का उपशास्त्रीय रूप   उपशास्त्रीय रंग में रँगी कजरी - ‘घिर आई है कारी बदरिया, राधे बिन लागे न मोरा जिया...’ ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी लघु श्रृंखला ‘वर्षा ऋतु के राग और रंग’ की छठी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र एक बार पुनः आप सभी संगीतानुरागियों का हार्दिक स्वागत और अभिनन्दन करता हूँ। इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम वर्षा ऋतु के राग, रस और गन्ध से पगे गीत-संगीत का आनन्द प्राप्त कर रहे हैं। हम आपसे वर्षा ऋतु में गाये-बजाए जाने वाले गीत, संगीत, रागों और उनमें निबद्ध कुछ चुनी हुई रचनाओं का रसास्वादन कर रहे हैं। इसके साथ ही सम्बन्धित राग और धुन के आधार पर रचे गए फिल्मी गीत भी सुन रहे हैं। पावस ऋतु के परिवेश की सार्थक अनुभूति कराने में जहाँ मल्हार अंग के राग समर्थ हैं, वहीं लोक संगीत की रसपूर्ण विधा कजरी अथवा कजली भी पूर्ण समर्थ होती है। इस श्रृंखला की पिछली कड़ियों में हम आपसे मल्हार अंग के कुछ रागों पर चर्चा कर चुके हैं। आज के अंक से हम वर्षा ऋतु...

"जाने कहाँ गए वो दिन...", कौन कौन से थे इस गीत के वो तीन अन्तरे जो जारी नहीं हुए?

एक गीत सौ कहानियाँ - 95 'जाने कहाँ गए वो दिन ...'   रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना  रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'।  इसकी 95-वीं कड़ी में आज जानिए 1970 की फ़िल्म ’मेरा नाम जोकर’ के मशहूर गीत "जाने कहाँ गए वो दिन..." के बारे में जिसे मुके...