रविवार, 14 मार्च 2021

स्वरगोष्ठी – 505: "जननी जन्मभूमि स्वर्ग से महान है" : राग भूपाली :: SWARGOSHTHI – 505 : RAG BHUPALI

         



स्वरगोष्ठी – 505 में आज 

देशभक्ति गीतों में शास्त्रीय राग – 9 

"जननी जन्मभूमि स्वर्ग से महान है...", राग भूपाली में  स्वर्गतुल्य जन्मभूमि की वन्दना



“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ "स्वरगोष्ठी" के मंच पर मैं सुजॉय चटर्जी,  साथी सलाहकर शिलाद चटर्जी के साथ, आप सब संगीत प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ।उन्नीसवीं सदी में देशभक्ति गीतों के लिखने-गाने का रिवाज हमारे देश में काफ़ी ज़ोर पकड़ चुका था। पराधीनता की बेड़ियों में जकड़ा देश गीतों, कविताओं, लेखों के माध्यम से जनता में राष्ट्रीयता की भावना जगाने का काम करने लगा। जहाँ एक तरफ़ कवियों और शाइरों ने देशप्रेम की भावना से ओतप्रोत रचनाएँ लिखे, वहीं उन कविताओं और गीतों को अर्थपूर्ण संगीत में ढाल कर हमारे संगीतकारों ने उन्हें और भी अधिक प्रभावशाली बनाया। ये देशभक्ति की धुनें ऐसी हैं कि जो कभी हमें जोश से भर देती हैं तो कभी इनके करुण स्वर हमारी आँखें नम कर जाते हैं। कभी ये हमारा सर गर्व से ऊँचा कर देते हैं तो कभी इन्हें सुनते हुए हमारे रोंगटे खड़े हो जाते हैं। इन देशभक्ति की रचनाओं में बहुत सी रचनाएँ ऐसी हैं जो शास्त्रीय रागों पर आधारित हैं। और इन्हीं रागाधारित देशभक्ति रचनाओं से सुसज्जित है ’स्वरगोष्ठी’ की वर्तमान श्रृंखला ’देशभक्ति गीतों में शास्त्रीय राग’। अब तक प्रकाशित इस श्रृंखला की आठ कड़ियों में राग आसावरी, गुजरी तोड़ी, पहाड़ी, भैरवी, मियाँ की मल्हार, कल्याण (यमन), शुद्ध कल्याण, जोगिया और काफ़ी पर आधारित देशभक्ति गीतों की चर्चा की गई हैं। आज प्रस्तुत है इस श्रृंखला की नौवीं कड़ी में राग भूपाली पर आधारित एक फ़िल्मी रचना। और साथ में इसी राग में एक ख़याल रचना कुमार गंधर्व की आवाज़ में।


वसन्त देसाई, भरत व्यास (PC: hamaraphotos.com)
"जननी
 जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी",अर्थात् माता और मातृभूमि अथवा माता रूपी मातृभूमि का स्थान स्वर्ग से भी ऊपर होता है। यह वाल्मीकि रामायण के दो श्लोकों की द्वितीय पंक्ति है। पहला श्लोक है जिसमें भारद्वाज मुनि, श्री राम को सम्बोधित करते हुए कहते हैं:

मित्राणि धन धान्यानि प्रजानां सम्मतानिव ।
जननी जन्म भूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी ॥
(मित्र, धन्य, धान्य आदि का संसार में बहुत अधिक सम्मान है। (किन्तु) माता और मातृभूमि का स्थान स्वर्ग से भी ऊपर है।)

दूसरे श्लोक में राम, लक्ष्मण से कहते हैं-

अपि स्वर्णमयी लङ्का न मे लक्ष्मण रोचते ।
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी ॥
(लक्ष्मण! यद्यपि यह लंका सोने की बनी है, फिर भी इसमें मेरी कोई रुचि नहीं है। (क्योंकि) जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी महान हैं।)

हमारे देश की महान संस्कृति ने हमारी इस धरती को दिए हैं अनगिनत महामानव। इनमें से कुछ महात्मा हमें नेक राह पर चलने के लिए प्रेरित करते हैं तो कुछ अपने शौर्य और पराक्रम की गाथा से हमें अपने देश पर अपना सर्वस्व न्योछावर करने का पाठ पढ़ाते हैं। और ऐसे ही महामानवों की अमर गाथाओं को अपने गीत संगीत से ओजस्वी बना दिया है गीतकार भरत व्यास और संगीतकार वसन्त देसाई ने। सप्त सुरों के साधक थे वसन्त देसाई और अद्भुत शब्दों के जादूगर थे भरत व्यास, जिनके सुरीले गीत-संगीत से सजे कई धार्मिक, पौराणिक और ऐतिहासिक फ़िल्में। ’सम्राट पृथ्वीराज चौहान’ ऐसी ही एक फ़िल्म है। इस फ़िल्म में मन्ना डे और साथियों का गाया देशभक्ति गीत "जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी" श्लोकांश पर आधारित है। "जननी जन्मभूमि स्वर्ग से महान है, इसके वास्ते ये तन है, मन है और प्राण है..."। अन्तिम हिन्दू सम्राट, पृथ्वीराज चौहान की वीरता और अदम्य साहस का चित्रण इस फ़िल्म में किया गया है, और इस गीत के मुखड़े से पहले शुरुआती पंक्ति भी सम्राट पृथ्वीराज चौहान के बलिदान की ओर ही इशारा करती है - "मातृभूमि के लिए जो करता अपने रक्त का दान, उसका जीवन देवतुल्य है, उसका जन्म महान"।

"जननी जन्मभूमि स्वर्ग से महान है" गीत राग भूपाली पर आधारित है। राग भूपाली, कल्याण थाट का आश्रय राग माना जाता है। संगीत के ग्रन्थों में यह राग भूप या भोपाली नाम से भी सम्बोधित किया जाता है। राग भूपाली औड़व जाति का राग है, जिसमें मध्यम और निषाद स्वर का प्रयोग नहीं किया जाता। शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग किया जाता है। राग भूपाली का वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर धैवत होता है। रात्रि का पहला प्रहर इस राग के गायन-वादन का समय होता है। अब आप राग भूपाली में पिरोया यह मधुर फिल्मी गीत सुनिए जिसे सुनते हुए मन में देशभक्ति की लहरें उमड़ने लग जाती हैं। गीत के शुरुआती भाग में राजमहल में राजऋषि युद्ध पर जा रहे अपने राजा (सम्राट पृथ्वीराज चौहान) के मस्तक पर शुभकामनाओं और आशिर्वाद का तिलक लगाते हुए गीत को प्रार्थना के रूप में गा रहे हैं। कोरस में सम्राट (अभिनेता जयराज) और उनकी रानी (अनीता गुहा) उनकी पंक्तियों को दोहरा रहे हैं। दूसरे और तीसरे अन्तरों में सम्राट स्वयम् घोड़े पर युद्ध पर जाते हुए इस गीत को आगे बढ़ाते हैं।




गीत : “जननी जन्मभूमि स्वर्ग से महान है...” : फ़िल्म: सम्राट पृथ्वीराज चौहान , गायक: मन्ना डे, साथी


कुमार गंधर्व
रात्रि के प्रथम प्रहर में गाने-बजाने के लिए उपयुक्त राग भूपाली, कल्याण थाट का राग माना जाता है। इसके आरोह और अवरोह में मध्यम और निषाद स्वर वर्जित होता है। अर्थात यह औड़व-औड़व जाति का राग है। राग भूपाली का वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर धैवत होता है। यह राग पूर्वांग प्रधान है, अर्थात इसका चलन अधिकतर मन्द्र और मध्य सप्तकों के पहले भाग में होता है। इन्हीं स्वरों को यदि उत्तरांग प्रधान कर दिया जाय तो यह राग देशकार का स्वरूप बन जाता है। राग भूपाली और देशकार में एक सा ही स्वर प्रयोग किया जाता है, परन्तु वादी-संवादी स्वरों के बदल जाने से राग बदल जाता है। भूपाली में वादी-संवादी क्रमशः गान्धार और धैवत होता जबकि देशकार में धैवत और गान्धार हो जाता है। राग भूपाली में गान्धार और पंचम स्वर पर न्यास होता है, किन्तु धैवत पर कभी भी न्यास नहीं होता, जबकि राग देशकार में पंचम, धैवत और तार सप्तक के षडज पर न्यास होता है, किन्तु गान्धार स्वर पर कभी भी न्यास नहीं होता। दोनों रागों में समान स्वर लगने के बावजूद पूर्वांग और उत्तरांग प्रधान होने के कारण दोनों रागों में अन्तर हो जाता है। राग भूपाली के शास्त्रीय स्वरूप का अनुभव करने के लिए आइए, अब हम इस राग की एक बन्दिश सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ कुमार गंधर्व से सुनते हैं। तीनताल में निबद्ध इस खयाल रचना के बोल हैं, “मोरा ध्यान मन्दिल रा ...”। आप यह बन्दिश सुनिए और हमें आज के इस अंक को यहीं विराम लेने की अनुमति दीजिए।


गीत : ख़याल- “मोरा ध्यान मन्दिल रा...” : गायक: कुमार गंधर्व 



अपनी बात

कुछ तकनीकी समस्या के कारण हम अपने फेसबुक के मित्र समूह के साथ “स्वरगोष्ठी” का लिंक साझा नहीं कर पा रहे हैं। सभी संगीत अनुरागियों से अनुरोध है कि हमारी वेबसाइट http://radioplaybackindia.com अथवा http://radioplaybackindia.blogspot.com पर क्लिक करके हमारे सभी साप्ताहिक स्तम्भों का अवलोकन करते रहें। “स्वरगोष्ठी” के वेब पेज के दाहिनी ओर निर्धारित स्थान पर अपना ई-मेल आईडी अंकित कर आप हमारे सभी पोस्ट के लिंक को नियमित रूप से अपने ई-मेल पर प्राप्त कर सकते है। “स्वरगोष्ठी” की पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेंगे। आज के इस अंक अथवा श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें soojoi_india@yahoo.co.in अथवा sajeevsarathie@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः सात बजे “स्वरगोष्ठी” के इसी मंच पर हम एक बार फिर संगीत के सभी अनुरागियों का स्वागत करेंगे। 


कृष्णमोहन मिश्र जी की पुण्य स्मृति को समर्पित
विशेष सलाहकार : शिलाद चटर्जी
प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी   

रेडियो प्लेबैक इण्डिया 
"जननी जन्मभूमि स्वर्ग से महान है": राग भूपाली : स्वरगोष्ठी – 505 : SWARGOSHTHI – 505 : RAG BHUPALI: 14 मार्च, 2021



रविवार, 7 मार्च 2021

"आ अब लौट चलें": राग काफ़ी : स्वरगोष्ठी – 504 : SWARGOSHTHI – 504 : RAG KAFI

        



स्वरगोष्ठी – 504 में आज 

देशभक्ति गीतों में शास्त्रीय राग – 8 

"आ अब लौट चलें...", राग काफ़ी का वलय और मनमोहक ऑरकेस्ट्रेशन




“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ "स्वरगोष्ठी" के मंच पर मैं सुजॉय चटर्जी,  साथी सलाहकर शिलाद चटर्जी के साथ, आप सब संगीत प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ।उन्नीसवीं सदी में देशभक्ति गीतों के लिखने-गाने का रिवाज हमारे देश में काफ़ी ज़ोर पकड़ चुका था। पराधीनता की बेड़ियों में जकड़ा देश गीतों, कविताओं, लेखों के माध्यम से जनता में राष्ट्रीयता की भावना जगाने का काम करने लगा। जहाँ एक तरफ़ कवियों और शाइरों ने देशप्रेम की भावना से ओतप्रोत रचनाएँ लिखे, वहीं उन कविताओं और गीतों को अर्थपूर्ण संगीत में ढाल कर हमारे संगीतकारों ने उन्हें और भी अधिक प्रभावशाली बनाया। ये देशभक्ति की धुनें ऐसी हैं कि जो कभी हमें जोश से भर देती हैं तो कभी इनके करुण स्वर हमारी आँखें नम कर जाते हैं। कभी ये हमारा सर गर्व से ऊँचा कर देते हैं तो कभी इन्हें सुनते हुए हमारे रोंगटे खड़े हो जाते हैं। इन देशभक्ति की रचनाओं में बहुत सी रचनाएँ ऐसी हैं जो शास्त्रीय रागों पर आधारित हैं। और इन्हीं रागाधारित देशभक्ति रचनाओं से सुसज्जित है ’स्वरगोष्ठी’ की वर्तमान श्रृंखला ’देशभक्ति गीतों में शास्त्रीय राग’। अब तक प्रकाशित इस श्रृंखला की सात कड़ियों में राग आसावरी, गुजरी तोड़ी, पहाड़ी, भैरवी, मियाँ की मल्हार, कल्याण (यमन), शुद्ध कल्याण और जोगिया पर आधारित आठ देशभक्ति गीतों की चर्चा की गई हैं। आज प्रस्तुत है इस श्रृंखला की आठवीं कड़ी में राग काफ़ी पर आधारित एक फ़िल्मी रचना। और साथ में राग काफ़ी में एक ठुमरी ग़ुलाम अली की आवाज़ में।


मुकेश, लता, शैलेन्द्र, शंकर-जयकिशन (PC:hamaraphotos.com)
राज कपूर 
 की कालजयी फ़िल्म ’जिस देश में गंगा बहती है’। फ़िल्म की कहानी डाकुओं को समाज की मुख्य धारा में मिलाने के प्रयास की कहानी है। फ़िल्म के क्लाइमैक्स् में राजु (राज कपूर) डाकुओं को आत्मसमर्पण करने के लिए मनवा लेता है और इस दृश्य के लिए एक गीत का प्रयोग किया जाता है। ढलान के एक तरफ़ राजु डाकुओं के साथ चल रहा है, और दूसरी तरफ़ है फ़िल्म की नायिका (पद्मिनी) जो पुलिस लेकर आ रही है। इस सिचुएशन पर शैलेन्द्र और शंकर-जयकिशन ने एक ऐसे ज़बरदस्त गीत की रचना की कि वह उस समय तक के सर्वाधिक "महंगे" गीतों में से एक था। 100 से ऊपर वायलिन, विशाल कोरस और वाद्यवृन्द के साथ "आ अब लौट चलें, नैन बिछाये, बाहें पसारे, तुझको पुकारे देश तेरा" की रिहर्सल शुरू हुई। गीतकार शैलेन्द्र के पुत्र दिनेश शंकर शैलेन्द्र जी बताते हैं कि इतने सारे साज़िन्दों को बिठाने के लिए ’फ़ेमस तारदेव स्टुडियो’ में जगह नहीं होती थी, इसलिए कुछ साज़िन्दों के बैठने का इन्तज़ाम स्टुडियो के बाहर किया जाता था। इस गीत में प्रयुक्त शास्त्रीय राग पर हम थोड़ी देर में आते हैं, पहले उल्लेख इसके ऑरकेस्ट्रेशन का। गीत शुरू होता है वायलिन और ब्रास के टुकड़ों से, गीत की भूमिका बंधती है। शोर भरा संगीत अचानक पिज़िकातो की सुरीली धुनों में बदल जाता है। पिज़िकातो दर‍असल किसी तार वाद्य के तारों को बिना धनुष (bow) के छेड़ने को कहा जाता है। पिज़िकातो, मैन्डोलिन और गिटार के साथ मुकेश की सीधी सुरीली आवाज़ में गीत शुरू होता है "आ अब लौट चलें..."। मुखड़े के तुरन्त बाद बढ़ती हुई पुलिस फ़ौज के दृश्य के साथ पद्मिनी के गले से लता मंगेशकर की अद्भुत पुकार "आजा रे, आ जा रे, आ जा..."। और यही हिस्सा गीत को एक अलग ही मुकाम पर पहुँचा देता है। इस तरह का प्रयोग फिर कभी किसी ने शायद ही किया होगा। हर अन्तरे के बाद लता जी द्वारा ऊँची पट्टी पर "आ जा रे" इस गीत की सबसे विशिष्ट बात है, जिसे हम गीत का X-factor भी कह सकते हैं। कुल 6 मिनट 12 सेकण्ड की अवधि होने के बावजूद मुकेश के गाये शैलेन्द्र के सरल पर गहरे बोल, लता मंगेशकर का अनोखा ऊँचा आलाप, कोरस का निरन्तर गायन और आकर्षक ऑरकेस्ट्रेशन गीत में श्रोताओं का उत्साह अन्त तक बनाये रखता है। गीत के अन्तिम चरण में राज कपूर और पद्मिनी एक दूसरे को देख लेते हैं, पुलिस डाकुओं को निहत्था जान लेती है, और एक लम्बे संगीत के साथ गीत समाप्त हो जाता है। ’स्वरगोष्ठी’ के पिछले अंक में "जाने वाले सिपाही से पूछो" गीत की चर्चा करते समय कोरस द्वारा काउन्टर मेलडी गाने का उल्लेख किया गया था। कोरस गायन की लगभग वैसी ही शैली ’जिस देश में गंगा बहती है’ के इस गीत में भी सुनने को मिलता है।

अब आते हैं "आ अब लौट चलें" गीत के शास्त्रीय संगीत के पक्ष की ओर। पूरे गीत में राग काफ़ी का एक वलय महसूस किया जा सकता है। मुख्य रूप से "आ अब लौट चलें" पंक्ति में काफ़ी के गुण स्पष्ट रूप से अनुभव किए जा सकते है। इन्टरल्युड संगीत, कोरस वाले हिस्सों और लता मंगेशकर की ऊँची आलाप वाले हिस्सों को अगर अलग रखा जाए तो पूरा गीत ही काफ़ी की छाया लिए हुए है। हालांकि राग काफ़ी के स्वरों में ग कोमल होता है, जो मुकेश की गायी पंक्तियों में सुनी जा सकती है, लता जी के आलाप और कोरस वाले जगहों पर "ग" कहीं शुद्ध और कहीं कोमल सुनाई देता है, जिस वजह से ये हिस्से विशुद्ध काफ़ी नहीं है। सच्चाई यह है कि काफ़ी कई रूप में पाये जाते हैं। विवादी स्वरों से इस राग का दूषण होता चला आया है जो अब सामान्य बात हो गई है। इस तरह के दूषण की वजह से काफ़ी एक तरह से मिश्र काफ़ी बन गया है। काफ़ी का विशुद्ध रूप बहुत कम ही सुनाई देता है। "आ अब लौट चलें" पूरे गीत में कहरवा ताल का प्रयोग हुआ है। राग काफ़ी की चर्चा आगे बढ़ाने से पहले फ़िल्म ’जिस देश में गंगा बहती है’ का यह गीत सुन लिया जाए!



गीत : “आ अब लौट चलें...” : फ़िल्म: जिस देश में गंगा बहती है, गायक: मुकेश, लता मंगेशकर, साथी


ग़ुलाम अली
राग काफी, काफी थाट का आश्रय राग है और इसकी जाति है सम्पूर्ण-सम्पूर्ण, अर्थात इस राग के आरोह-अवरोह में सात-सात स्वर प्रयोग किए जाते हैं। आरोह में सा रे ग(कोमल) म प ध नि(कोमल) सां तथा अवरोह में सां नि(कोमल) ध प म ग(कोमल) रे सा स्वरों का प्रयोग किया जाता है। इस राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर षडज होता है। कभी-कभी वादी स्वर कोमल गान्धार और संवादी स्वर कोमल निषाद का प्रयोग भी मिलता है। दक्षिण भारतीय संगीत का राग खरहरप्रिय राग काफी के समतुल्य राग है। राग काफी, ध्रुवपद और खयाल की अपेक्षा उपशास्त्रीय संगीत में अधिक प्रयोग किया जाता है। ठुमरियों में प्रायः दोनों गान्धार और दोनों धैवत का प्रयोग भी मिलता है। टप्पा गायन में शुद्ध गान्धार और शुद्ध निषाद का प्रयोग वक्र गति से किया जाता है। इस राग का गायन-वादन रात्रि के दूसरे प्रहर में किए जाने की परम्परा है, किन्तु फाल्गुन मास में इसे किसी भी समय गाया-बजाया जा सकता है। आज हम आपको सुनवाने जा रहे हैं प्रसिद्ध ग़ज़ल गायक ग़ुलाम अली की गायी राग काफ़ी में एक ठुमरी, जिसके बोल हैं "लागे ना मोरा जिया..."। वैसे इस ठुमरी में राग भीम पलासी और बरवा का अनुभव भी किया जा सकता है। यह रचना निबद्ध है   ताल में।



गीत : ठुमरी - “लागे ना मोरा जिया...” : गायक:ग़ुलाम अली 



अपनी बात

कुछ तकनीकी समस्या के कारण हम अपने फेसबुक के मित्र समूह के साथ “स्वरगोष्ठी” का लिंक साझा नहीं कर पा रहे हैं। सभी संगीत अनुरागियों से अनुरोध है कि हमारी वेबसाइट http://radioplaybackindia.com अथवा http://radioplaybackindia.blogspot.com पर क्लिक करके हमारे सभी साप्ताहिक स्तम्भों का अवलोकन करते रहें। “स्वरगोष्ठी” के वेब पेज के दाहिनी ओर निर्धारित स्थान पर अपना ई-मेल आईडी अंकित कर आप हमारे सभी पोस्ट के लिंक को नियमित रूप से अपने ई-मेल पर प्राप्त कर सकते है। “स्वरगोष्ठी” की पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेंगे। आज के इस अंक अथवा श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें soojoi_india@yahoo.co.in अथवा sajeevsarathie@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः सात बजे “स्वरगोष्ठी” के इसी मंच पर हम एक बार फिर संगीत के सभी अनुरागियों का स्वागत करेंगे। 


कृष्णमोहन मिश्र जी की पुण्य स्मृति को समर्पित
विशेष सलाहकार : शिलाद चटर्जी
प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी   

रेडियो प्लेबैक इण्डिया 
"आ अब लौट चलें..." : राग काफ़ी : SWARGOSHTHI – 504 : RAG KAFI: 7 मार्च, 2021



रविवार, 28 फ़रवरी 2021

राग जोगिया : SWARGOSHTHI – 503 : RAG JOGIYA

       



स्वरगोष्ठी – 503 में आज 

देशभक्ति गीतों में शास्त्रीय राग – 7 

"जाने वाले सिपाही से पूछो, वो कहाँ जा रहा है...", राग जोगिया में सवाल सिपाहियों से




“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ "स्वरगोष्ठी" के मंच पर मैं सुजॉय चटर्जी, साथी साथी सलाहकर शिलाद चटर्जी के साथ, आप सब संगीत प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ।उन्नीसवीं सदी में देशभक्ति गीतों के लिखने-गाने का रिवाज हमारे देश में काफ़ी ज़ोर पकड़ चुका था। पराधीनता की बेड़ियों में जकड़ा देश गीतों, कविताओं, लेखों के माध्यम से जनता में राष्ट्रीयता की भावना जगाने का काम करने लगा। जहाँ एक तरफ़ कवियों और शाइरों ने देशप्रेम की भावना से ओतप्रोत रचनाएँ लिखे, वहीं उन कविताओं और गीतों को अर्थपूर्ण संगीत में ढाल कर हमारे संगीतकारों ने उन्हें और भी अधिक प्रभावशाली बनाया। ये देशभक्ति की धुनें ऐसी हैं कि जो कभी हमें जोश से भर देती हैं तो कभी इनके करुण स्वर हमारी आँखें नम कर जाते हैं। कभी ये हमारा सर गर्व से ऊँचा कर देते हैं तो कभी इन्हें सुनते हुए हमारे रोंगटे खड़े हो जाते हैं। इन देशभक्ति की रचनाओं में बहुत सी रचनाएँ ऐसी हैं जो शास्त्रीय रागों पर आधारित हैं। और इन्हीं रागाधारित देशभक्ति रचनाओं से सुसज्जित है ’स्वरगोष्ठी’ की वर्तमान श्रृंखला ’देशभक्ति गीतों में शास्त्रीय राग’। अब तक प्रकाशित इस श्रृंखला की अब तक प्रकाशित छः कड़ियों में हमने राग आसावरी, गुजरी तोड़ी, पहाड़ी, भैरवी, मियाँ की मल्हार, कल्याण (यमन) और शुद्ध कल्याण पर आधारित सात देशभक्ति गीतों की चर्चा की गई हैं। आज प्रस्तुत है इस श्रृंखला की सातवीं कड़ी में राग जोगिया पर आधारित एक फ़िल्मी रचना। और साथ में राग जोगिया में बड़ा ख़याल पंडित भीमसेन जोशी की आवाज़ में।


मन्ना डे और सलिल चौधरी (Courtesy: pinterest.com)
मख़दूम मोहिउद्दीन 
 केवल एक शाइर ही नहीं बल्कि एक क्रान्तिकारी भी थे जिन्होंने अपनी कलम से कुछ ऐसी रचनाएँ लिखीं जो शोले उगलते जान पड़ते थे। उनकी एक मशहूर नज़्म है "सिपाही" जिसकी रचना उन्होंने दूसरे विश्व युद्ध के दौरान हुई तबाही के मनज़र को देखते हुए की थी। उनकी इस नज़्म का प्रयोग बिमल रॉय पिक्चर्स के बैनर तले बनी 1961 की फ़िल्म ’उसने कहा था’ में किया गया था। मूलत: यह सिपाहियों का गीत है जो सवाल उठाता है युद्ध पर जाने की आवश्यकता को लेकर। सिपाही जंग लड़ने आख़िर क्यों जा रहे हैं? जंग की ज़रूरत क्यों है? क्यों नहीं दुनिया में अमन और चैन से रह सकते लोग? इन तमाम सवालों के जवाब ढूंढ़ते इस गीत का संगीत तैयार किया था सलिल चौधरी ने और इस गीत को गाया है मन्ना डे, सबिता चौधरी और साथियों ने। वैसे तो गीत में मुख्य रूप से मन्ना डे और साथियों की ही आवाज़ें हैं, लेकिन हर अन्तरे के बाद सबिता चौधरी मुखड़े को ऊँची पट्टी पर गाती हैं। ग़ौर तलब बात है कि इस गीत में मन्ना डे द्वारा गाया मुखड़ा अगर मेलडी है तो कोरस और सबिता चौधरी द्वारा गाया मुखड़ा काउण्टर मेलडी है। काउण्टर मेलडी का प्रयोग पाश्चात्य संगीत में अधिक होता है जो मेलडी के ऊपर से एक झोंके की तरह बह जाता है। इस गीत का संगीत संयोजन, कोरस की गायन शैली और सबिता चौधरी द्वारा केवल एक पंक्ति गाना हमें ’जिस देश में गंगा बहती है’ फ़िल्म के "आ अब लौट चलें" गीत की याद दिला जाता है।

’रेख़्ता’ में  उपलब्ध जानकारी के अनुसार मख़दूम मोहिउद्दीन को इस नज़्म ’सिपाही’ को लिखने की प्रेरणा लखनऊ में मुहर्रम के दौरान मिली थी। वह एक नौहा था - "क़ैदख़ाने में मादर पुकारीं, सुब्‍ह होती है जागो सकीना..."। यह नौहा राग जोगिया पर आधारित है जिसे सुबह-सुबह सुनने पर एक अलग ही अनुभूति होती है। इससे प्रभावित होकर मख़दूम ने अपनी नज़्म ’सिपाही’ लिखी और जब भी वो ’सिपाही’ पढ़ कर सुनाते थे, वो उसे उसी राग जोगिया वाली धुन पर भावुक अंदाज़ में गाया करते थे, जिसे सुन कर श्रोताओं के रोगटे खड़े हो जाते थे। जब सलिल चौधरी को इस नज़्म को संगीतबद्ध करने का मौक़ा फ़िल्म ’उसने कहा था’ में मिला, तब उन्होंने भी उसी मौलिक धुन को ही अपनाया। और साथ में पाश्चात्य ऑरकेस्ट्रेशन का प्रयोग करते हुए एक फ़्युज़न उत्पन्न किया। राग जोगिया की चर्चा करने से पहले आइए इस गीत को सुन लिया जाए!



गीत : “जाने वाले सिपाही से पूछो...” : फ़िल्म: उसने कहा था, गायक: मन्ना डे, सबिता चौधरी, साथी


पं भीमसेन जोशी (Courtesy:deccanherald.com)
इस गीत को सुनते हुए शास्त्रीय संगीत के जानकार इसमें राग जोगिया की छाया को महसूस कर पाए होंगे। 
राग जोगिया, भैरव थाट का जन्य राग माना जाता है। इसके आरोह में गान्धार तथा निषाद स्वर वर्जित तथा अवरोह में गान्धार स्वर वर्जित किया जाता है। अतः इस राग की जाति औड़व-षाड़व होती है। राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। अर्थात इसके आरोह में पाँच और अवरोह में छः स्वर प्रयोग किये जाते हैं। आरोह में गान्धार और निषाद तथा अवरोह में गान्धार स्वर वर्जित होता है। राग में कोमल ऋषभ और कोमल धैवत का प्रयोग किया जाता है। अन्य सभी शुद्ध स्वर प्रयोग होते हैं। आरोह के स्वर हैं- सा, रे(कोमल), म, प, ध(कोमल), सां और अवरोह के स्वर हैं- सां, नि, ध(कोमल), प, ध(कोमल), म, रे(कोमल), सा। राग जोगिया का गायन समय प्रातःकाल सन्धिप्रकाश के समय सर्वाधिक उपयुक्त माना जाता है। कुछ विद्वान राग जोगिया में तार षडज को वादी और मध्यम को संवादी मानते हैं। किन्तु दोनों दृष्टियों में यह उत्तरांग प्रधान राग है। राग जोगिया में बहुधा बड़ा खयाल नहीं गाया जाता। यह छोटा खयाल और ठुमरी के उपयुक्त राग माना जाता है। कभी-कभी राग के आकर्षण को बढ़ाने के लिए अवरोह में कोमल निषाद का अल्प प्रयोग कर लिया जाता है। आइए अब हम आपको राग जोगिया में निबद्ध एक ठुमरी सुनवाते हैं पंडित भीमसेन जोशी की आवाज़ में, जिसके बोल हैं "पिया के मिलन की आस"। तबले पर संगत की है महापुरुष मिश्र ने। यह पंडित जोशी द्वारा पश्चिम बंगाल के श्रीरामपुर में आयोजित एक कार्यक्रम में 21 दिसम्बर 1986 को प्रस्तुत किया गया था।



गीत : ठुमरी - “पिया के मिलन की आस...” : गायक: पंडित भीमसेन जोशी 



अपनी बात

कुछ तकनीकी समस्या के कारण हम अपने फेसबुक के मित्र समूह के साथ “स्वरगोष्ठी” का लिंक साझा नहीं कर पा रहे हैं। सभी संगीत अनुरागियों से अनुरोध है कि हमारी वेबसाइट http://radioplaybackindia.com अथवा http://radioplaybackindia.blogspot.com पर क्लिक करके हमारे सभी साप्ताहिक स्तम्भों का अवलोकन करते रहें। “स्वरगोष्ठी” के वेब पेज के दाहिनी ओर निर्धारित स्थान पर अपना ई-मेल आईडी अंकित कर आप हमारे सभी पोस्ट के लिंक को नियमित रूप से अपने ई-मेल पर प्राप्त कर सकते है। “स्वरगोष्ठी” की पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेंगे। आज के इस अंक अथवा श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें soojoi_india@yahoo.co.in अथवा sajeevsarathie@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः सात बजे “स्वरगोष्ठी” के इसी मंच पर हम एक बार फिर संगीत के सभी अनुरागियों का स्वागत करेंगे। 


कृष्णमोहन मिश्र जी की पुण्य स्मृति को समर्पित
विशेष सलाहकार : शिलाद चटर्जी
प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी   

रेडियो प्लेबैक इण्डिया 
राग जोगिया : SWARGOSHTHI – 503 : RAG JOGIYA: 28 फरवरी, 2021



The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



Popular Posts सर्वप्रिय रचनाएँ