रविवार, 10 जनवरी 2021

राग आसावरी : SWARGOSHTHI – 496 : RAG ASAVARI

 




स्वरगोष्ठी – 496 में आज 

देशभक्ति गीतों में शास्त्रीय राग – 1 

जब सी. रामचन्द्र ने "ऐ मेरे वतन के लोगों" के लिए चुना राग आसावरी को 




कवि प्रदीप, लता मंगेशकर, सी. रामचन्द्र
“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ "स्वरगोष्ठी" के मंच पर मैं सुजॉय चटर्जी, आप सब संगीत प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। आज मुझे यह अंक लिखते हुए प्रसन्नता कम और दु:ख अधिक हो रहा है। हम सब के चहेते कृष्णमोहन जी के अचानक चले जाने के बाद जैसे ’स्वरगोष्ठी’ का स्वर ही मूक हो गया है। समूचे हिन्दी ब्लॉग जगत में कृष्णमोहन मिश्र जी जैसा शास्त्रीय, उपशास्त्रीय और लोक संगीत विषयों पर नियमित स्तम्भ लिखने वाला और कोई दूसरा मौजूद नहीं रहा। उनकी इसी बेजोड़ प्रतिभा, नियमितता, लगन और अनुशासन की वजह से ’स्वरगोष्ठी’ का स्तर दिन प्रतिदिन ऊँचा उठता चला गया। आज उनके जाने के बाद यहाँ कोई नहीं जो उनके जैसे स्तर का लेख लिख सके। इसी कारण से ’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की टीम ने यह निर्णय लिया था कि कृष्णमोहन जी के साथ ’स्वरगोष्ठी’ का सफ़र भी समाप्त कर दिया जाए। पर हमें बार-बार कृष्णमोहन जी के साथ वह अन्तिम टेलीफ़ोनिक बातचीत याद आ रही थी जिसमें वे ’स्वरगोष्ठी’ के दस वर्ष और 500 अंक पूरे होने पर बहुत उत्साहित सुनाई दे रहे थे। ऐसे में 495-वे अंक पर इस श्रृंखला को समाप्त करके उनके 500 अंक पूर्ति के सपने को तोड़ देना हमें अनुचित लगा। यही नहीं, जिस श्रृंखला को वे 31-वें अंक से लगातार, बिना किसी रुकावट के, 495 अंक तक लेकर आए, उनके प्रति हमारा यह कर्तव्य बन जाता है कि किसी रिले-रेस की तरह, बैटन को उनके हाथ से अपने हाथ में लेकर उनकी दौड़ को आगे बढ़ाएँ। और तो और, कृष्णमोहन जी ने ’स्वरगोष्ठी’ की अपनी अन्तिम कड़ी (अंक-495) में इस श्रृंखला की दस वर्ष पूर्ति के उपलक्ष्य पर इसका जो इतिहास बयाँ किया है, उसमें उन्होंने मेरा नाम कम से कम  छ: बार लिया है। उनके इस अत्यन्त विनयी आचरण की उपेक्षा करना असम्भव है। 
कृष्णमोहन जी जैसा शास्त्रीय संगीत और लेखन शैली व भाषा पर दखल हमारा नहीं है और ना ही हम उनके जैसा लिख सकते हैं। उनकी अनुपस्थिति में 500-वें अंक तक ’स्वरगोष्ठी’ के सफ़र को जारी रखने का हमारा उद्देश्य केवल उन्हें श्रद्धांजलि देना है। हम आशा करते हैं कि हमारे इस उद्देश्य को सफल बनाने में आप सभी श्रोता-पाठकों का भरपूर साथ व सहयोग हमें मिलेगा, और कृष्णमोहन जी की छत्रछाया के अभाव में हमसे जो भूल-चूक हो जाए, उन्हें आप क्षमा कर देंगे। इसी उम्म्मीद के साथ आइए जारी रखें ’स्वरगोष्ठी’ का सफ़र।

मित्रों, जनवरी का महीना कई कारणों से महत्वपूर्ण है। यह कई त्योहारों का महीना है। मकर संक्रान्ति, माघ बिहु, लोहड़ी, पोंगल, गंगा सागर जैसे त्योहार तो हैं ही, साथ ही हमारा राष्ट्रीय पर्व ’गणतंत्र दिवस’ भी इसी महीने आता है। तो क्यों ना इसी को ध्यान में रखते हुए देशभक्ति गीतों पर एक श्रृंखला प्रस्तुत की जाए जिसमें कुछ अत्यन्त लोकप्रिय देशभक्ति गीतों में प्रयुक्त रागों पर नज़र डाले जाएँ! तो आइए शुरू करते हैं ’स्वरगोष्ठी’ पर आज से एक नई श्रृंखला - ’देशभक्ति गीतों में शास्त्रीय राग’। आज इसकी पहली कड़ी में प्रस्तुत है कालजयी देशभक्ति रचना "ऐ मेरे वतन के लोगों" से जुड़ी कुछ रोचक बातें और इस गीत में प्रयोग होने वाले राग आसावरी से सम्बन्धित संक्षिप्त जानकारी।


27 जनवरी 1963, नेशनल स्टेडियम, नई दिल्ली - पंडित नेहरु के साथ लता मंगेशकर
’स्वरगोष्ठी’ की नई श्रृंखला
 “देशभक्ति गीतों में शास्त्रीय राग” की पहली कड़ी में सुजॉय चटर्जी और “रेडियो प्लेबैक इ
ण्डिया” परिवार की ओर से आपका हार्दिक स्वागत है। इस श्रृंखला में हम आने वाले सप्ताहों में कुछ ऐसे लोकप्रिय देशभक्ति गीतों की चर्चा करेंगे जो किसी न किसी शास्त्रीय राग पर आधारित हैं। आज इसकी पहली कड़ी के लिए हमने जो गीत चुना है, वह किसी तार्रुफ़ का मोहताज नहीं। कवि प्रदीप का लिखा, सी. रामचन्द्र का संगीतबद्ध किया हुआ और लता मंगेशकर द्वारा 27 जनवरी 1963 को पहली बार नई दिल्ली के नेशनल स्टेडियम में गाया हुआ यह गीत है "ऐ मेरे वतन के लोगों, ज़रा आँख में भर लो पानी, जो शहीद हुए हैं उनकी, ज़रा याद करो क़ुर्बानी"। यह गीत और इस गीत से जुड़ी तमाम बातें आज इतिहास बन चुकी हैं जो सभी जानते हैं। इसलिए हम इस गीत से जुड़ी बस दो-चार तथ्य आपके साथ साझा करने जा रहे हैं, हो सकता है कि ये बातें आपको मालूम ना हो। भारत-चीन युद्ध में चीन से परास्त होना किसी भी भारतीय के गले नहीं उतर रहा था और इनमें राष्ट्रवादी कवि प्रदीप भी शामिल थे। इसी बात से विक्षुब्ध होकर 1962 के दिसम्बर की एक शाम कवि प्रदीप बम्बई के माहिम की सड़कों पर टहल रहे थे। उन्होंने इधर-उधर देखा, वे कुछ लिखना चाह रहे थे पर उनके पास का न काग़ज़ था ना कलम। जब वहाँ से गुज़रने वाले किसी भी व्यक्ति से उन्हें कागज़ नसीब नहीं हुई, तब आख़िरकार उन्होंने एक पान बेचने वाले से सिगरेट की ख़ाली पैकिट ली और पास खड़े एक आदमी से कलम लेकर और सिगरेट की उस ख़ाली पैकिट को खोल कर उस पर लिख डाला बस एक पंक्ति - "जो शहीद हुए हैं उनकी ज़रा याद करो क़ुर्बानी"। फिर घर वापस आकर देर रात तक उन्होंने पूरा गीत लिख डाला। "ऐ मेरे वतन के लोगों" का संगीतकार सी. रामचन्द्र द्वारा संगीतबद्ध होना, लता जी के साथ उनके अन-बन के बावजूद कवि प्रदीप द्वारा दोनों में सुलह होना, आशा भोसले का गीत में शुरू-शुरू में शामिल होना और फिर बाद में रिहर्सल के दौरान निकल भी जाना, ऐसी कई बातें सुनने को मिलती हैं जिनकी ठीक-ठीक पुष्टि हो पाना सम्भव नहीं। पर हाल ही में पार्श्वगायिका उषा तिमोथी ने एक बहुत बड़ा ख़ुलासा किया है जिसे नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता। उन्होंने सोशल मीडिया पर यह लिखा है कि "ऐ मेरे वतन के लोगों" गीत के तैयार होने के बाद और लता जी द्वारा नई दिल्ली में 27 जनवरी 1963 के दिन गाये जाने से पहले उन्होंने स्वयम् महेन्द्र कपूर के साथ मिल कर इस गीत को गुजरात के एक स्टेज शो में संगीतकार सी. रामचन्द्र के निर्देशन में गाया था। इस तरह से यह अत्यन्त महत्वपूर्ण तथ्य है कि इस कालजयी रचना को मंच पर पहली बार लता मंगेशकर ने नहीं बल्कि उषा तिमोथी ने गाया था। उषा जी ने उस जलसे का चित्र भी अपने फ़ेसबूक पृष्ठ पर साझा किया है।

लता और सी. रामचन्द्र
अब आते हैं "ऐ मेरे वतन के लोगों" गीत की संगीत संरचना पर। इस गीत के संगीत को तैयार करते हुए सी. रामचन्द्र ने इसमें देशभक्ति की कोई कोमल छटा नहीं बिखेरी, बल्कि इस गीत को राग आसावरी के सशक्त सुरों में पिरो कर ऐसी दिल छू लेने वाली धुनें तैयार की हैं कि जिन्हें जब भी हम सुनते हैं, रोंगटे तो खड़े होते ही हैं, आँखें भी नम हुए बिना नहीं रह पातीं। राग आसावरी में निबद्ध इस गीत का संगीत संयोजन बिलकुल सरल और सीधा है। इसमें शास्त्रीय संगीत गायन की कठिन हरकतें नहीं है, बल्कि हर अन्तरे के लिए राग की एक अलग प्रगति होती चली जाती है, और यही इस गीत की ख़ासियत है जो इसके साथ सुनने वाले को बह जाने और गीत समाप्त होने तक इसकी तरफ़ खींचे रखने पर मजबूर करती है। इस गीत के अन्तरों को ध्यानपूर्वक सुनने पर इसके chord progression का आभास होता है। कुछ एक अपवादों को छोड़ कर, आम तौर पर किसी गीत के सभी अन्तरों के उतार-चढ़ाव एक जैसे ही होते हैं, पर इस गीत के चार अन्तरों को चार अलग तरीके से आसावरी के सुरों में ढाला गया है। 
"जब घायल हुआ हिमालय, ख़तरे में पड़ी आज़ादी" से शुरू होकर "जब देश में थी दीवाली, वो खेल रहे थे होली", फिर उसके बाद "कोई सिख कोई जाट मराठा, कोई गुर्खा कोई मद्रासी" और अन्त में "थी ख़ून से लथपथ काया, फिर भी बन्दूक उठा के", हर एक अन्तरे की पंक्तियों का उतार-चढ़ाव और गायन शैली उन पंक्तियों के भाव के अनुसार रखा गया है। जब लता जी ऊँची पट्टी पर गाती हैं "ख़ुश रहना देश के प्यारों, अब हम तो सफ़र करते हैं", यह जैसे कलेजा चीर कर रख देती है। कवि प्रदीप के इन अनमोल बोलों को सी. रामचन्द्र की धुनों ने उचित सम्मान दिया है। शब्द और धुन जैसे आपस में मिल कर एकाकार हो गए हों, और उस पर लता जी का मनमोहक गायन इस गीत को पूर्णता प्रदान करती है। राग आसावरी पर आधारित कुछ अन्य प्रचलित हिन्दी फ़िल्मी गीत हैं "चले जाना नहीं नैना मिलाके हाय संइया बेदर्दी" (बड़ी बहन, 1949), "जादू तेरी नज़र, ख़ुशबू तेरा बदन" (डर, 1993), "लो आ गई उनकी याद, वो नहीं आए" (दो बदन, 1966), "मुझे गले से लगा लो बहुत उदास हूँ मैं" (आज और कल, 1963) और "पिया ते कहाँ", (तूफ़ान और दीया, 1956)। फ़िल्हाल आइए लता मंगेशकर की आवाज़ में सुनते हैं "ऐ मेरे वतन के लोगों"। 



गीत : “ऐ मेरे वतन के लोगों...” : गायिका : लता मंगेशकर


आसावरी राग भी है और थाट भी। इस थाट के स्वर होते हैं- सा, रे, ग॒(कोमल), म, प ध॒,(कोमल), नि॒(कोमल) अर्थात आसावरी थाट में गान्धार, धैवत और निषाद स्वर कोमल तथा शेष स्वर शुद्ध प्रयोग किये जाते हैं। आसावरी थाट का जनक अथवा आश्रय राग आसावरी ही कहलाता है। राग आसावरी के आरोह में पाँच स्वर और अवरोह में सात स्वरों का उपयोग किया जाता है। अर्थात यह औडव-सम्पूर्ण जाति का राग है। इस राग के आरोह में सा, रे, म, प, ध(कोमल), सां तथा अवरोह में; सां,नि(कोमल),ध(कोमल),म, प, ध(कोमल), म, प, ग(कोमल), रे, सा, स्वरों का प्रयोग किया जाता है। अर्थात आरोह में गान्धार और निषाद स्वर वर्जित होता है। इस राग का वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर गान्धार होता है। दिन के दूसरे प्रहर में इस राग का गायन-वादन सार्थक अनुभूति कराता है। परम्परागत रूप से सूर्योदय के बाद गाये-बजाए जाने वाले इस राग में तीन कोमल स्वर, गान्धार, धैवत और निषाद का प्रयोग किया जाता है। शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग होते हैं। जब कोई संगीतज्ञ इस राग में शुद्ध ऋषभ के स्थान पर कोमल ऋषभ प्रयोग करते हैं तो इसे राग कोमल ऋषभ आसावरी कहा जाता है। लीजिए बांसुरी पर सुनिए पंडित हरि प्रसाद चौरसिया द्वारा बजाया हुआ राग कोमल ऋषभ आसावरी, जिसे हमने चुना है ’The Raaga Guide' ऐल्बम से। आप यह सुमधुर रचना सुनिए और हमें आज की इस कड़ी को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए। 




राग  कोमल ऋषभ आसावरी : बांसुरी : पंडित हरि प्रसाद चौरसिया


संगीत पहेली के महाविजेताओं से क्षमा याचना

"स्वरगोष्ठी" के 495 और 496 वें अंक में वर्ष 2020 के महाविजेताओं के नामों की घोषणा के साथ-साथ महाविजेताओं की प्रस्तुतियाँ सम्मिलित की जानी थीं। अंक 495 में चौथे और पाँचवें महाविजेताओं की घोषणा भी हो चुकी थी। परन्तु कृष्णमोहन मिश्र जी के अचानक निधन की वजह से पहले, दूसरे और तीसरे महाविजेताओं के नाम अज्ञात् ही रह गए। पूरे वर्ष में पूछी गईं पहेलियों के सही उत्तर देने वाले प्रतिभागियों की तालिका और आंकड़ें कृष्णमोहन जी के कम्प्युटर पर होने की वजह से ’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ टीम इन्हें प्राप्त नहीं कर पायी है। अत: हमें खेद है कि हम वर्ष 2020 के प्रथम तीन महाविजेताओं के नामों की घोषणा कर पाने में असमर्थ हैं। आशा है आप सभी हमारी विवशता को समझेंगे और हमें इस बात के लिए क्षमा करेंगे। 


संवाद

मित्रों, इन दिनों हम सब भारतवासी, प्रत्येक नागरिक को कोरोना वायरस से मुक्त करने के लिए प्रयत्नशील हैं। देश के कुछ स्थानों पर अचानक इस वायरस का प्रकोप इन दिनों बढ़ गया है। अप सब सतर्कता बरतें। संक्रमित होने वालों के स्वस्थ होने का प्रतिशत निरन्तर बढ़ रहा है। परन्तु अभी भी हमें पर्याप्त सतर्कता बरतनी है। विश्वास कीजिए, हमारे इस सतर्कता अभियान से कोरोना वायरस पराजित होगा। आप सब से अनुरोध है कि प्रत्येक स्थिति में चिकित्सकीय और शासकीय निर्देशों का पालन करें और अपने घर में सुरक्षित रहें। इस बीच शास्त्रीय संगीत का श्रवण करें और अनेक प्रकार के मानसिक और शारीरिक व्याधियों से स्वयं को मुक्त रखें। विद्वानों ने इसे “नाद योग पद्धति” कहा है। “स्वरगोष्ठी” की नई-पुरानी श्रृंखलाएँ सुने और पढ़ें। साथ ही अपनी प्रतिक्रिया से हमें अवगत भी कराएँ। 


अपनी बात

कुछ तकनीकी समस्या के कारण हम अपने फेसबुक के मित्र समूह के साथ “स्वरगोष्ठी” का लिंक साझा नहीं कर पा रहे हैं। सभी संगीत अनुरागियों से अनुरोध है कि हमारी वेबसाइट http://radioplaybackindia.com अथवा http://radioplaybackindia.blogspot.com पर क्लिक करके हमारे सभी साप्ताहिक स्तम्भों का अवलोकन करते रहें। “स्वरगोष्ठी” के वेब पेज के दाहिनी ओर निर्धारित स्थान पर अपना ई-मेल आईडी अंकित कर आप हमारे सभी पोस्ट के लिंक को नियमित रूप से अपने ई-मेल पर प्राप्त कर सकते है। “स्वरगोष्ठी” की पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेंगे। आज के इस अंक अथवा श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें soojoi_india@yahoo.co.in अथवा sajeevsarathie@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः सात बजे “स्वरगोष्ठी” के इसी मंच पर हम एक बार फिर संगीत के सभी अनुरागियों का स्वागत करेंगे। 


कृष्णमोहन मिश्र जी की पुण्य स्मृति को समर्पित
प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी   

रेडियो प्लेबैक इण्डिया 
राग आसावरी : SWARGOSHTHI – 496 : RAG ASAVARI : 10 जनवरी, 2021 



रविवार, 3 जनवरी 2021

कृष्णमोहन जी द्वारा लिखा अन्तिम ब्लॉगपोस्ट - "सभी पाठकों और श्रोताओं का नववर्ष 2021 के प्रथम अंक में अभिनन्दन महाविजेताओं की प्रस्तुतियों के साथ"

 

ख़ामोश हुआ ’स्वरगोष्ठी’ का स्वर, नहीं रहे कृष्णमोहन मिश्र जी

अत्यन्त दु:ख और भारी मन के साथ हम ’स्वरगोष्ठी’ के श्रोता-पाठकों को यह सूचित कर रहे हैं कि हम सब के अत्यन्त प्रिय साथी और ’स्वरगोष्ठी’ के वाहक कृष्णमोहन मिश्र जी अब हमारे बीच नहीं रहे। गत 31 दिसम्बर की रात 9 बजे दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया है। रेडियो प्लेबैक इण्डिया के लिए कृष्णमोहन जी का योगदान अत्यन्त सराहनीय और अद्वितीय रहा है। उनके इस तरह अचानक चले जाने से हम सभी को गहरा सदमा पहुँचा है। शास्त्रीय संगीत पर आधारित इस एकमात्र स्तम्भ के वाहक के रूप में उनकी जगह कोई नहीं ले सकता। हम ईश्वर से कृष्णमोहन जी की आत्मा-शान्ति की प्रार्थना करते हैं।



’रेडियो प्लेबैक इन्डिया’ के संस्थापक सदस्य, श्री कृष्णमोहन मिश्र जी को श्रद्धांजलि स्वरूप, सहयोगी सदस्य रीतेश खरे ’सब्र’ की क़लम से निकले चन्द अलफ़ाज़:


हम में से हर कोई, कल दूर हो जायेगा

कोई फ़लक का तारा बन, मशहूर हो जायेगा


एक दूसरे से दिल, इतना भी न तुम लगाओ

कल तड़प उठोगे जब कोई बड़ी दूर हो जायेगा


हर ख़्वाब तो, कहते हैं, होता नहीं मुक़म्मल

पर एक तो सच, हक़ीक़त ज़रूर हो जायेगा


आज जब हमने रेडियो प्लेबैक इण्डिया का ब्लॉग ओपन किया तो यह देख कर चकित रह गए कि कृष्णमोहन जी ने आज के लिए लिखा ’स्वरगोष्ठी’ का पोस्ट ड्राफ़्ट में सेव करके रखा हुआ है। और संयोग देखिए कि आज ही ’स्वरगोष्ठी’ अपने दस वर्ष पूरे कर रहा है। तो लीजिए, प्रस्तुत है कृष्णमोहन मिश्र जी का ’स्वरगोष्ठी’ के लिए लिखा हुआ उनका यह अन्तिम पोस्ट।





स्वरगोष्ठी 495 में आज 

महाविजेताओं की प्रस्तुतियाँ – 1 

पाँचवें और चौथे महाविजेता मुकेश लाडिया और प्रफुल्ल पटेल के सम्मान में उनकी प्रस्तुतियाँ 





प्रफुल्ल पटेल 

मुकेश लाडिया 
“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ “स्वरगोष्ठी” के मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का नववर्ष के पहले अंक में हार्दिक अभिनन्दन है। इसी अंक से आपका प्रिय स्तम्भ “स्वरगोष्ठी” अपने ग्यारहवें वर्ष में प्रवेश कर रहा है। विगत दस वर्षों से असंख्य पाठकों, श्रोताओं, संगीत शिक्षकों और वरिष्ठ संगीतज्ञों का प्यार, दुलार और मार्गदर्शन इस स्तम्भ को मिलता रहा है। इन्टरनेट पर शास्त्रीय, उपशास्त्रीय, लोक, सुगम और फिल्म संगीत विषयक चर्चा का सम्भवतः यह एकमात्र नियमित साप्ताहिक स्तम्भ है, जो विगत दस वर्षों से निरन्तरता बनाए हुए है। इस पुनीत अवसर पर मैं कृष्णमोहन मिश्र, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सम्पादक और संचालक मण्डल के सभी सदस्यों; सजीव सारथी, सुजॉय चटर्जी, अमित तिवारी, अनुराग शर्मा, विश्वदीपक, संज्ञा टण्डन, पूजा अनिल और रीतेश खरे के साथ अपने सभी पाठकों और श्रोताओं के प्रति आभार प्रकट करता हूँ। आज ग्यारहवें वर्ष के इस प्रवेशांक में हम “स्वरगोष्ठी” की संगीत पहेली के पाँचवें महाविजेता मुकेश लाडिया और चौथे महाविजेता प्रफुल्ल पटेल का परिचय प्रस्तुत करेंगे और उनकी प्रस्तुतियों का रसास्वादन कराएँगे। इसके अलावा नववर्ष के इस प्रवेशांक में मांगलिक अवसरों पर परम्परागत रूप से बजने वाले मंगलवाद्य शहनाई का वादन भी प्रस्तुत करेंगे। वादक हैं, भारतरत्न के सर्वोच्च अलंकरण से विभूषित उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ और राग है सर्वप्रिय भैरवी। 





उस्ताद बिसमिल्लह खाँ 
स्वरगोष्ठी’ का शुभारम्भ ठीक दस वर्ष पूर्व ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ संचालक और सम्पादक मण्डल के प्रमुख सदस्य सुजॉय चटर्जी ने रविवार, 2 जनवरी 2011 को किया था। आरम्भ में यह ‘हिन्दयुग्म’ के ‘आवाज़’ मंच पर हमारे अन्य नियमित स्तम्भों के साथ प्रकाशित हुआ करता था। उन दिनों इस स्तम्भ का शीर्षक ‘सुर संगम’ था। दिसम्बर 2011 से हमने ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ नाम से एक अपना नया सामूहिक मंच बनाया और पाठकों के अनुरोध पर जनवरी 2012 से इस स्तम्भ का शीर्षक ‘स्वरगोष्ठी’ कर दिया गया। तब से हम आपसे निरन्तर यहीं मिलते हैं। समय-समय पर आपसे मिले सुझावों के आधार पर हम अपने सभी स्तम्भों के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ में भी संशोधन करते रहते हैं। इस स्तम्भ के प्रवेशांक में सुजॉय जी ने इसके उद्देश्यों पर प्रकाश डाला था। उन्होने लिखा था; 

“नये साल के इस पहले रविवार की सुहानी सुबह में मैं सुजॉय चटर्जी, आप सभी का 'आवाज़' पर स्वागत करता हूँ। यूँ तो हमारी मुलाक़ात नियमित रूप से 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर होती रहती है, लेकिन अब से मैं 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के अलावा हर रविवार की सुबह भी आपसे मुख़ातिब रहूँगा इस नये स्तम्भ में जिसकी हम आज से शुरुआत कर रहे हैं। दोस्तों, प्राचीनतम संगीत की अगर हम बात करें तो वो है हमारा शास्त्रीय संगीत, जिसका उल्लेख हमें वेदों में मिलता है। चार वेदों में सामवेद में संगीत का व्यापक वर्णन मिलता है। इन वैदिक ऋचाओं को सामगान के रूप में गाया जाता था। फिर उससे 'जाति' बनी और फिर आगे चलकर 'राग' बनें। ऐसी मान्यता है कि ये विभिन्न राग हमारे कई चक्र का आधार बने। ये ऊर्जा के स्रोत राग, युगों से देश के सुरसाधक इस परम्परा को निरन्तर आगे बढ़ाते चले जा रहे हैं और हमारी संस्कृति को सहेजते हुए बढ़े जा रहे हैं। संगीत की तमाम धाराओं में सबसे महत्वपूर्ण धारा है शास्त्रीय अर्थात रागदारी संगीत। बाकी जितनी तरह का संगीत है, उन सबमें उच्च स्थान पर है अपना रागदारी संगीत। तभी तो संगीत की शिक्षा का अर्थ ही है शास्त्रीय संगीत की शिक्षा। अक्सर साक्षात्कारों में कलाकार इस बात का ज़िक्र करते हैं कि एक अच्छा गायक या संगीतकार बनने के लिए शास्त्रीय संगीत का सीखना बेहद ज़रूरी है। तो दोस्तों, आज से 'आवाज़' पर पहली बार एक ऐसा साप्ताहिक स्तम्भ शुरु हो रहा है जो समर्पित है, भारतीय परम्परागत शास्त्रीय संगीत को। गायन और वादन, यानी साज़ और आवाज़, दोनों को ही बारी बारी से इसमें शामिल किया जाएगा। भारतीय संगीत से इस स्तम्भ की हम शुरुआत कर रहे हैं, लेकिन आगे चलकर अन्य संगीत शैलियों को भी शामिल करने की उम्मीद रखते हैं।” तो यह सन्देश हमारे इस स्तम्भ के प्रवेशांक का था। ‘स्वरगोष्ठी’ की कुछ और पुरानी यादों को ताज़ा करने से पहले आज का चुना हुआ संगीत सुनते हैं। आज ‘स्वरगोष्ठी’ ग्यारहवें वर्ष में प्रवेश कर रहा है। हम इस पावन अवसर पर मंगलवाद्य शहनाई का वादन प्रस्तुत कर रहे हैं। इस अंक में हम देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारतरत्न’ से अलंकृत उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ की शहनाई पर बजाया राग भैरवी प्रस्तुत कर रहे हैं। 

मंगलध्वनि : शहनाई वादन : राग भैरवी : उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ और साथी 



हमारे दल के सर्वाधिक कर्मठ साथी सुजोय चटर्जी ने ‘स्वरगोष्ठी’ स्तम्भ की नीव रखी थी। उद्देश्य था, शास्त्रीय और उपशास्त्रीय संगीत प्रेमियों को एक ऐसा मंच देना, जहाँ किसी कलासाधक, प्रस्तुति अथवा शास्त्र विषयक विमर्श कायम कर सकें और आपसे विचारों का आदान प्रदान कर सकें। आज के 495वें अंक के माध्यम से हम कुछ पुरानी स्मृतियों को ताज़ा कर रहे हैं। जैसा कि पहले ही उल्लेख किया गया है कि इस स्तम्भ की बुनियाद सुजॉय चटर्जी ने रखी थी और आठवें अंक तक अपने आलेखों के माध्यम से अनेक संगीतज्ञों व्यक्तित्व और कृतित्व से हमें रससिक्त किया था। नौवें अंक से हमारे एक नये साथी सुमित चक्रवर्ती हमसे जुड़े और आपके अनुरोध पर उन्होने शास्त्रीय, उपशास्त्रीय संगीत के साथ लोक संगीत को भी ‘सुर संगम’ से जोड़ा। सुमित जी ने इस स्तम्भ के 30वें अंक तक आपके लिए बहुविध सामग्री प्रस्तुत की, जिसे आप सब पाठकों और श्रोताओं ने सराहा। इस बीच मुझ अकिंचन को भी कई विशेष अवसरों पर कुछ अंक प्रस्तुत करने का अवसर मिला। सुमित जी की व्यावसायिक और पारिवारिक व्यस्तता के कारण 31वें अंक से “सुर संगम” का पूर्ण दायित्व मेरे साथियों ने मुझे सौंपा। मुझ पर विश्वास करने के लिए अपने साथियों का मैं आभारी हूँ। साथ ही अपने पाठकों और श्रोताओं का अनमोल प्रोत्साहन भी मिलता रहा, जो आज भी जारी है। 

बीते वर्ष के अंकों में ‘स्वरगोष्ठी’ से असंख्य पाठक, श्रोता, समालोचक और संगीतकार जुड़े। हमें उनका प्यार, दुलार और मार्गदर्शन मिला। उन सभी का नामोल्लेख कर पाना सम्भव नहीं है। ‘स्वरगोष्ठी’ का सबसे रोचक भाग प्रत्येक अंक में प्रकाशित होने वाली ‘संगीत पहेली’ है। इस पहेली में बीते वर्ष के दौरान अनेक संगीत प्रेमियों ने सहभागिता की। इन सभी उत्तरदाताओं को उनके सही उत्तर पर प्रति सप्ताह अंक दिये गए। वर्ष के अन्त में सभी प्राप्तांकों की गणना की की गई। 494वें अंक तक की गणना की जा चुकी है। इनमें से सर्वाधिक अंक प्राप्त करने वाले पाँच महाविजेताओं का चयन कर लिया गया है। पाँच महाविजेताओं के अलावा इस वर्ष के हमारे अन्य प्रतिभागी है; रविचन्द्र जोशी, शुभा खाण्डेकर, अरविन्द मिश्र, लक्ष्मीनारायण सोनी और राजश्री श्रीवास्तव। परन्तु वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के पश्चात प्रथम पाँच में ये अपना स्थान नाही बना सके। आज के इस अंक में हम आपका परिचय पहेली के चौथे और पाँचवें महाविजेताओं से करा रहे हैं। पहले, दूसरे और तीसरे महाविजेताओं का परिचय हम अगले सप्ताह प्राप्त करेंगे। 

पहेली प्रतियोगिता में महाविजेता के पाँचवें स्थान को सुशोभित करने वाले अहमदाबाद, गुजरात निवासी मुकेश लाडिया हैं। मुकेश जी “स्वरगोष्ठी” के 378वें अंक से अर्थात पिछले तीन वर्षों से हमारे नियमित पाठक हैं। विगत तीन वर्षों से वह निरन्तर पहेली प्रतियोगिता में भाग ले रहे हैं। मूलतः अहमदाबाद, गुजरात निवासी मुकेश जी बीच बीच में फीनिक्स, अमेरिका में भी प्रवास करते रहे हैं। वह चाहे भारत में रहें या अमेरिका में “स्वरगोष्ठी” पढ़ना और सुनना तथा पहेली प्रतियोगिता में भाग लेना नहीं भूलते। मुकेश जी शास्त्रीय संगीत के विधिवत कलाकार अथवा शिक्षक नहीं है, किन्तु संगीत-प्रेमी अवश्य हैं। पिछले पाँच दशकों में अहमदाबाद में आयोजित होने वाले सभी संगीत समारोहों और गोष्ठियों में शामिल होकर देश के लगभग सभी प्रतिष्ठित कलासाधकों की प्रस्तुतियों का रसास्वादन करते रहे हैं। उन्होने वायलिन वादन की प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त कर अखिल भारतीय संगीत विद्यालय की प्रवेशिका पूर्ण कक्षा की परीक्षा उत्तीर्ण की है। इसके बाद अनेक प्रतिष्ठित कलाकारों को अनेक माध्यमों से श्रवण कर अध्ययन किया। संगीत के प्रति अनुराग होने के साथ साथ मुकेश जी ने अपने पारिवारिक और व्यावसायिक दायित्वों के साथ उन्हें शास्त्रीय गायन के अभ्यास की ललक थी, परन्तु इच्छानुसार अधिक नहीं कर सके। वर्तमान में 68 वर्षीय मुकेश लाडिया प्रतिदिन रिकार्डेड अथवा सजीव माध्यम से प्रतिदिन संगीत श्रवण करते हैं। “स्वरगोष्ठी” की संगीत पहेली प्रतियोगिता 2020 में अपने संगीत ज्ञान और अनुराग के बल पर 58 अंक प्राप्त कर मुकेश जी ने महाविताओं की सूची में पाँचवाँ स्थान प्राप्त किया है। हम आज “रेडियो प्लेबैक इण्डिया”, इसके संचालक और सम्पादक मण्डल की ओर से हम उनका हार्दिक अभिनन्दन करते हैं और उनके सम्मान में उन्हीं के पसंदीदा वाद्य वायलिन पर गायकी अंग में राग झिंझोटी सुनवा रहे हैं। इसे विदुषी एन. राजम् प्रस्तुत कर रही हैं। 

राग झिंझोटी : वायलिन पर गायकी अंग में वादन : विदुषी एन. राजम् 



पहेली प्रतियोगिता में 81 अंक प्राप्त कर चौथे महाविजेता बने हैं, चेरीहिल, न्यूजर्सी के प्रफुल्ल पटेल। भारतीय शास्त्रीय संगीत में गहरी रुचि रखने वाले प्रफुल्ल पटेल न्यूजर्सी, अमेरिका में रहते हैं। साप्ताहिक स्तम्भ, ‘स्वरगोष्ठी’ को पसन्द करने वाले प्रफुल्ल जी शास्त्रीय संगीत के अलावा भारतीय लोकप्रिय संगीत भी रुचि के साथ सुनते हैं। इस प्रकार के संगीत से उन्हें गहरी रुचि है। परन्तु कहते हैं कि उन्हें पाश्चात्य संगीत ने कभी भी प्रभावित नहीं किया। पेशे से इंजीनियर, भारतीय मूल के प्रफुल्ल जी पिछले पचास वर्षों से अमेरिका में रह रहे हैं। प्रफुल्ल जी स्वान्तःसुखाय हारमोनियम बजाते हैं और स्वयं गाते भी है, किन्तु बताते हैं कि उनकी गायन और वादन का स्तर ‘स्वरगोष्ठी’ में प्रसारित गायन अथवा वादन जैसा नहीं है। जब हमने उनका गाया-बजाया अथवा उनकी पसन्द का आडियो या वीडियो क्लिप उनसे भेजने का अनुरोध किया तो पहले उन्होने संकोच के साथ टाल दिया। हमारे दोबारा आग्रह पर उन्होने अपनी आवाज़ में एक आकर्षक गैरफ़िल्मी गीत हमें भेज दिया। ‘स्वरगोष्ठी’ की पहेली में नियमित रूप से भाग लेने वाले प्रफुल्ल जी के संगीत ज्ञान का अनुमान इसी तथ्य से किया जा सकता है कि वर्ष 2020 की पहेली प्रतियोगिता में 79 अंक अर्जित कर प्रफुल्ल जी ने वार्षिक महाविजेताओ की सूची में चौथे महाविजेता का सम्मान प्राप्त किया है। श्री पटेल गायक सी.एच. आत्मा और जगमोहन आदि की गायकी के बहुत बड़े प्रसंशक हैं। “स्वरगोष्ठी” के आज के अंक के माध्यम से “रेडियो प्लेबैक इण्डिया” सभी संचालक और सम्पादक मण्डल के सदस्य प्रफुल्ल जी का महाविजेता के रूप में हार्दिक अभिनन्दन करते हैं और उनकी आवाज़ में एक गैरफ़िल्मी गीत “मुझे न सपनों से बहलाओ...” प्रस्तुत कर रहे हैं। मूल गीत सुप्रसिद्ध गायक सी.एच. आत्मा के एक प्राइवेट अलबम में शामिल है। इस गीत का उपयोग 1955 में प्रदर्शित फिल्म “मिस्टर ऐंड मिसेज 55” में संगीतकार ओ.पी. नैयर द्वारा गीता दत्त की आवाज़ में और 1982 में प्रदर्शित फिल्म “अंगूर” में संगीतकार राहुलदेव बर्मन द्वारा सपन चक्रवर्ती की आवाज़ में किया गया है। आप हमारे प्रतिभागी प्रफुल्ल पटेल की आवाज़ में इसी गीत का रसास्वादन कीजिए और हमे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए। आगामी अंक से हमारी पहेली प्रतियोगिता की पुनः शुरुआत हो रही है। आप सभी इसमें भाग लेना न भूलिए। 

गैरफ़िल्मी गीत : “प्रीतम आन मिलो...” : स्वर – प्रफुल्ल  पटेल : मूल गायक – सी.एच. आत्मा 

(हमें खेद है कि कृष्णमोहन जी के ना होने की वजह से प्रफुल्ल पटेल जी द्वारा गाया गीत हम इस समय सुनवा नहीं पा रहे हैं।)


पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

“स्वरगोष्ठी” के 493वें अंक में हमने आपको 1958 में प्रदर्शित फिल्म "फिर सुबह होगी” से लिये गए एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से कम से कम दो सही उत्तरों की अपेक्षा की गई थी। इस गीत के आधार राग को पहचानने में हमारे अधिकतर प्रतिभागियों को सफलता मिली। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – खमाज और बिलावल, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – दादरा तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – मुकेश और आशा भोसले।

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और शारीरिक अस्वस्थता के कारण स्वास्थ्यलाभ कर रहीं हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों में से प्रत्येक को दो-दो अंक मिलते हैं। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से आप सभी को हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नए प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।

मित्रों, इन दिनों हम सब भारतवासी, प्रत्येक नागरिक को कोरोना वायरस से मुक्त करने के लिए प्रयत्नशील हैं। देश के कुछ स्थानों पर अचानक इस वायरस का प्रकोप इन दिनों बढ़ गया है तो अधिकता स्थानों पर स्वस्थ होने वालों की संख्या भी बढ़ रही है। आप सब सतर्कता बरतें। संक्रमित होने वालों के स्वस्थ होने का प्रतिशत निरन्तर बढ़ रहा है। परन्तु अभी भी हमें पर्याप्त सतर्कता बरतनी है। विश्वास कीजिए, हमारे इस सतर्कता अभियान से कोरोना वायरस पराजित होगा। आप सब से अनुरोध है कि प्रत्येक स्थिति में चिकित्सकीय और शासकीय निर्देशों का पालन करें और अपने घर में सुरक्षित रहें। इस बीच शास्त्रीय संगीत का श्रवण करें और अनेक प्रकार के मानसिक और शारीरिक व्याधियों से स्वयं को मुक्त रखें। विद्वानों ने इसे “नाद योग पद्धति” कहा है। “स्वरगोष्ठी” की नई-पुरानी श्रृंखलाएँ सुने और पढ़ें। साथ ही अपनी प्रतिक्रिया से हमें अवगत भी कराएँ।

अपनी बात 

मित्रों, “रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ “स्वरगोष्ठी” पर इस अंक और अगले अंक में पहेली प्रतियोगिता के पाँच शीर्ष महाविजेताओं को सम्मानित करते हुए उन्हीं की प्रस्तुतियों पर आधारित रखा है। हमारे एक नियमित पाठक Dinesh Jois ने हमारी पिछली कड़ी पर टिप्पणी करते हुए लिखा है; One of the finest channel on music I visit without fail. 

कुछ तकनीकी समस्या के कारण हम अपने फेसबुक के मित्र समूह के साथ “स्वरगोष्ठी” का लिंक साझा नहीं कर पा रहे हैं। सभी संगीत अनुरागियों से अनुरोध है कि हमारी वेबसाइट http://radioplaybackindia.com अथवा http://radioplaybackindia.blogspot.com पर क्लिक करके हमारे सभी साप्ताहिक स्तम्भों का अवलोकन करते रहें। “स्वरगोष्ठी” के वेब पेज के दाहिनी ओर निर्धारित स्थान पर अपना ई-मेल आईडी अंकित कर आप हमारे सभी पोस्ट के लिंक को नियमित रूप से अपने ई-मेल पर प्राप्त कर सकते है। “स्वरगोष्ठी” की पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेंगे। आज के इस अंक अथवा श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः सात बजे “स्वरगोष्ठी” के इसी मंच पर हम एक बार फिर संगीत के सभी अनुरागियों का स्वागत करेंगे। 


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  



रविवार, 27 दिसंबर 2020

राग खमाज और बिलावल : SWARGOSHTHI – 494 : RAG KHAMAJ & BILAWAL





स्वरगोष्ठी – 494 में आज 

राज कपूर के विस्मृत संगीतकार – 10 : संगीतकार – खय्याम 

जब राज कपूर ने फिल्म “फिर सुबह होगी” के लिए स्वयं ही खय्याम का चुनाव किया 





पण्डित उल्हास कशालकर 

मुकेश और आशा भोसले 
“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ "स्वरगोष्ठी" के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “राज कपूर के विस्मृत संगीतकार" की दसवीं और समापन कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला में हमने फिल्म निर्माता, निर्देशक और अभिनेता राज कपूर के फिल्मी जीवन के पहले दशक के कुछ विस्मृत संगीतकारों की और उनकी कृतियों पर चर्चा की है। इन फिल्मों में से राज कपूर ने कुछ फिल्मों का निर्माण, कुछ का निर्देशन और कुछ फिल्मों में केवल अभिनय किया था। आरम्भ के पहले दशक अर्थात 1948 में प्रदर्शित फिल्म "आग" से लेकर 1958 में प्रदर्शित फिल्म "फिर सुबह होगी" तक की चर्चा इस श्रृंखला में की जा रही है। आमतौर पर राज कपूर की फिल्मों के अधिकतर संगीतकार शंकर जयकिशन ही रहे हैं। उन्होने राज कपूर की कुल 20 फिल्मों का संगीत निर्देशन किया है। इसके अलावा बाद की कुछ फिल्मों में लक्ष्मीकान्त, प्यारेलाल और रवीन्द्र जैन ने भी संगीत दिया है। राज कपूर की फिल्मों के प्रारम्भिक दशक के कुछ संगीतकार भुला दिये गए है, यद्यपि इन फिल्मों के गीत आज भी लोकप्रिय हैं। राज कपूर का जन्म 14 दिसम्बर, 1924 को पेशावर (अब पाकिस्तान) में जाने-माने अभिनेता पृथ्वीराज कपूर के घर हुआ था। श्रृंखला की कड़ियाँ राज कपूर के जन्म पखवारे तक और वर्ष 2020 के अन्तिम रविवार तक जारी रहेगी। उनकी 97वीं जयन्ती अवसर के लिए हमने राज कपूर और उनके कुछ विस्मृत संगीतकारों को स्मरण करने का निश्चय किया है। इस श्रृंखला के माध्यम से हम भारतीय सिनेमा के एक ऐसे स्वप्नदर्शी व्यक्तित्व राज कपूर पर चर्चा कर रहे हैं, जिन्होने देश की स्वतन्त्रता के पश्चात कई दशकों तक भारतीय जनमानस को प्रभावित किया। सिनेमा के माध्यम से समाज को सर्वाधिक प्रभावित करने वाले भारतीय सिनेमा के पाँच स्तम्भों; वी. शान्ताराम, विमल राय, महबूब खाँ और गुरुदत्त के साथ राज कपूर का नाम भी एक कल्पनाशील फ़िल्मकार के रूप में इतिहास में दर्ज़ हो चुका है। इस वर्ष 14 दिसम्बर को इस महान फ़िल्मकार की 97वीं जयन्ती थी। इस अवसर के लिए श्रृंखला प्रस्तुत करने की जब योजना बन रही थी तब अपने पाठकों और श्रोताओं के अनेकानेक सुझाव मिले कि इस श्रृंखला में राज कपूर की आरम्भिक फिल्मों के गीतों को एक नये कोण से टटोला जाए। जारी श्रृंखला “राज कपूर के विस्मृत संगीतकार" में हमने उनके लोकप्रिय संगीत निर्देशकों के अलावा दस ऐसे संगीतकारों के गीतों को चुना है, जिन्होने राज कपूर के आरम्भिक दशक की फिल्मों में उत्कृष्ट स्तर का संगीत दिया था। ये संगीतकार राज कपूर के व्यक्तित्व से और राज कपूर इनके संगीत से अत्यन्त प्रभावित हुए थे। इसके साथ ही इस श्रृंखला में प्रस्तुत किये जाने वाले गीतों के रागों का विश्लेषण भी करेंगे। इस कार्य में हमारा सहयोग "फिल्मी गीतों में राग" विषयक शोधकर्त्ता और "हिन्दी सिने राग इनसाइक्लोपीडिया" के लेखक के.एल. पाण्डेय और फिल्म संगीत के इतिहासकार सुजॉय चटर्जी ने किया है। इस श्रृंखला के माध्यम से हम स्वप्नदर्शी फ़िल्मकार राज कपूर और उनके प्रारम्भिक दौर के संगीतकारों की चर्चा कर रहे हैं। श्रृंखला की आज की दसवीं और समापन कड़ी में हम 1958 में राज कपूर द्वारा निर्मित फिल्म "फिर सुबह होगी” से राग खमाज और बिलावल पर आधारित एक गीत; "वो सुबह कभी तो आएगी...” सुनवा रहे हैं, जिसका संगीत खय्याम ने और स्वर; मुकेश और आशा भोसले ने दिया है। यह गीत साहिर लुधियानवी ने लिखा है और राग खमाज तथा बिलावल पर आधारित है। राग खमाज के शास्त्रीय स्वरूप का दिग्दर्शन कराने के उद्येश्य से हम इस राग में निबद्ध एक रसभरी ठुमरी; “कोयलिया कूक सुनावे...” सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ पण्डित उल्हास कशालकर के स्वर में प्रस्तुत कर रहे हैं। 




फिल्म "फिर सुबह होगी" में राज कपूर और माला सिन्हा 
जारी श्रृंखला “राज कपूर के विस्मृत संगीतकार” की समापन कड़ी में कृष्णमोहन मिश्र और “रेडियो प्लेबैक इण्डिया” परिवार की ओर से आपका हार्दिक स्वागत है। इस श्रृंखला में हमने आपके लिए राज कपूर द्वारा निर्मित तीन फिल्मों और केवल अभिनीत सात फिल्मों के ऐसे गीतों को चुना, जिन पर या तो राज कपूर का प्रभाव था या उन गीतों से वे स्वयं प्रभावित हुए थे। गीतों को चुनते समय हमने इस बात का ध्यान भी रखा कि ये फिल्में राज कपूर के प्रारम्भिक एक दशक की हो और उनके अधिकतर फिल्मों के संगीतकार शंकर जयकिशन के अलावा अन्य संगीतकारों की हो। आज श्रृंखला की समापन कड़ी में हम एक ऐसे गीत पर चर्चा करेंगे, जिस पर राज कपूर की समाजवादी विचारधारा का पूरा प्रभाव अंकित हुआ है। पिछले अंक में हमने देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और राज कपूर की समान विचारधारा पर चर्चा की थी। जिस प्रकार नेहरू जी तत्कालीन सोवियत रूस और चीन में लोकप्रिय थे, ठीक उसी प्रकार राज कपूर और उनकी फिल्में भी इन देशों में लोकप्रिय थीं 1958 में निर्माता और निर्देशक रमेश सहगल की फिल्म “फिर सुबह होगी” प्रदर्शित हुई थी। यह फिल्म रूसी उपन्यासकार फ़्योडोर दोस्तोएव्स्की की विश्वविख्यात कृति “क्राइम एण्ड पनिशमेंट” पर आधारित थी। रमेश सहगल इस फिल्म में नायक की भूमिका के लिए राज कपूर को और गीतकार के रूप में साहिर लुधियानवी को शामिल कर चुके थे। राज कपूर फिल्म के कथानक से अत्यन्त प्रभावित हुए थे। फिल्म के संगीतकार का चयन अभी बाकी था। साहिर लुधियानवी ने एक दिन रमेश सहगल को संगीतकार खय्याम का नाम सुझाया। रमेश सहगल को उम्मीद थी कि राज कपूर शंकर जयकिशन के नाम का सुझाव देंगे। परन्तु उन्होने ऐसा नहीं किया। रमेश सहगल ने राज कपूर और खय्याम की एक बैठक करा दी। 


संगीतकार ख़ैयाम  

लता मंगेशकर ने एक बार राज कपूर को एक तानपूरा भेंट किया था। खय्याम के साथ हुई बैठक में राज कपूर ने वही तानपूरा ख़ैयाम की ओर बढ़ाते हुए कुछ सुनाने का आग्रह किया। खय्याम ने उस नये तानपूरा के तारों को छेड़ते हुए राग पूरिया धनाश्री की एक बन्दिश सुनाई थी। राज कपूर खय्याम की गायकी से प्रभावित हुए और उन्हें फिल्म के शीर्षक गीत की धुन बनाने को कहा। खय्याम इस फिल्म का संगीत तैयार करने के लिए अत्यन्त उत्सुक थे। राज कपूर की सहमति मिल जाने के बाद उन्होने फिल्म के शीर्षक गीत की पाँच अलग अलग धुने बनाई। अगली बैठक में राज कपूर ने जब गीत पांचों धुने सुनी तो वे खय्याम की प्रतिभा से अत्यन्त प्रभावित हुए और फिल्म के सभी गीतों की धुनें बनाने की पूरी स्वतन्त्रता दे दी। इस प्रकार राज कपूर, खय्याम, साहिर लुधियानवी और रमेश सहगल के अनूठे समागम से फिल्म “फिर सुबह होगी” के सभी गीत बेहद लोकप्रिय हुए थे। फिल्म तो सफल नहीं हुई किन्तु श्रृंगार प्रधान गीतों के उस दौर में यथार्थवादी गीत एक नई ताजगी लेकर आए थे, अतः गीत खूब चले। राज कपूर और खय्याम के भेंट प्रसंग हमने पंकज राग की पुस्तक “धुनों की यात्रा” से साभार उद्धृत किया है। मेरे एक पत्रकार मित्र प्रेमेन्द्र श्रीवास्तव के अनुसार, एक मशहूर किस्सा संगीतकार खय्याम बताते हैं कि 1958 में रमेश सहगल एक फिल्म बना रहे थे “फिर सुबह होगी” फिल्म के हीरो राज कपूर थे और उन्हीं के पसन्द के संगीतकार शंकर जयकिशन थे। गीत लिखने की ज़िम्मेदारी साहिर के कंधों पर थी। उन्होने रमेश सहगल से पूछा कि संगीतकार कौन है, तो उन्होने सारे कहानी बता दी। इस पर वो बोले कि जिसने इस फिल्म के मूल लेखक दोस्तोवस्की के नावेल “क्राइम ऐंड पनिशमेंट” को न सिर्फ पढ़ा हो बल्कि समझा भी हो वही इस फिल्म का संगीत बनायेगा। उन्होंने कहा कि मैं तो ऐसे आदमी को जानता भी नहीं हूँ। तब साहिर ने कहा; मैं जानता हूँ, वो हैं खय्याम। इस पर रमेश सहगल ने कहा कि ठीक है मैं उन्हें राज साहब से मिलवा दूँगा अगर वे ओ.के. कर देंगे तो मुझे कोई एतराज नहीं। साहिर ने नज्म लिखी “वो सुबह कभी तो आयेगी...”। खय्याम ने इस नज़्म की पाँच धुने बनाईं। राज कपूर ने सुनीं और पांचों को पास कर दिया। फिल्म “फिर सुबह होगी” में खय्याम ने राज कपूर पर फिल्माए गए गीतों को मुकेश से गवाया था। मुख्य शीर्षक गीत; “वो सुबह कभी तो आएगी...” के दो संस्करण हैं, एक संस्करण में केवल मुकेश का और दूसरे में मुकेश के साथ आशा भोसले का स्वर है। मुकेश की आवाज़ में एक अन्य गीत; “आसमाँ पे है खुदा, और ज़मीं पे हम...” तत्कालीन फिल्मी गीतों की बनी छवि तोड़ने में सफल हुआ था। फिल्म प्रेमियों ने इस गीत और संगीत के नयेपन को खूब सराहा था। फिल्म के अन्य गीत; “चीन ओ अरब हमारा...”, “फिर ना कीजे मेरी गुस्ताख़ निगाहों का गिला...” आदि अपनी सहज धुनों के कारण खूब सराहे गए। आज की समापन कड़ी में हम आपको फिल्म के शीर्षक गीत का वही संस्करण सुनवाते हैं, जिसे मुकेश और आशा भोसले ने स्वर दिया था। लीजिए, साहिर लुधियानवी का गीत, खय्याम का संगीत, मुकेश और आशा भोसले के युगल स्वरों से युक्त फिल्म “फिर सुबह होगी” का यह गीत सुनिए। इस गीत के आरम्भ में राग खमाज का आधार है और बाद में राग बिलावल का स्पर्श भी है। फिल्म “फिर सुबह होगी” का यह गीत राज कपूर और माला सिन्हा पर फिल्माया गया है। इस दृश्य में माला सिन्हा राज कपूर की बाहों में हैं और गीत के आरम्भ से अन्त तक दोनों इसी मुद्रा में रहते हैं। 

राग खमाज व बिलावल : “वो सुबह कभी तो आएगी...” : मुकेश और आशा भोसले : संगीत – खय्याम 


खमाज थाट के स्वर होते हैं; सा, रे, ग, म, प, ध, नि॒(कोमल)। अर्थात इस थाट में निषाद स्वर कोमल और शेष सभी स्वर शुद्ध होते हैं। इस थाट का आश्रय राग “खमाज” कहलाता है। “खमाज” राग में थाट के अनुकूल निषाद कोमल और शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग होते हैं। यह षाड़व-सम्पूर्ण जाति का राग है। अर्थात राग के आरोह में छः स्वर और अवरोह में सात स्वर प्रयोग किये जाते हैं। राग खमाज के आरोह में सा, ग, म, प, ध, नि, सां और अवरोह में सां, नि, ध, प, म, ग, रे, सा स्वरों का प्रयोग होता है। आरोह में ऋषभ स्वर नहीं लगता। राग में दोनों निषाद का प्रयोग होता है। आरोह में शुद्ध निषाद और अवरोह में कोमल निषाद लगाया जाता है। वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर निषाद होता है। इस राग के गायन-वादन का समय रात्रि का दूसरा प्रहर होता है। यह चंचल प्रकृति का राग होता है, अतः इसमें द्रुत खयाल, ठुमरी, दादरा, टप्पा आदि गाया जाता है। इस राग में विलम्बित खयाल नहीं गाया जाता। यद्यपि आरोह में ऋषभ स्वर वर्जित होता है, किन्तु ठुमरी गाते समय कभी कभी आरोह में भी ऋषभ स्वर का प्रयोग किया जाता है। राग खमाज से मिलता जुलता राग तिलंग होता है। राग खमाज का उदाहरण प्रस्तुत करने के लिए हमने ग्वालियर घराने के सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ पण्डित उल्हास कशालकर के स्वर में एक रसभरी ठुमरी सुनवा रहे हैं। 

राग खमाज : “कोयलिया कूक सुनावे...” : ठुमरी : पण्डित उल्हास कशालकर 




संगीत पहेली

"स्वरगोष्ठी" के 495 और 496वें अंक में वर्ष 2020 के महाविजेताओं की प्रस्तुतियाँ सम्मिलित की जाएँगी, अतः इस अंक में हम कोई भी पहेली नहीं दे रहे हैं। 496वें अंक से संगीत पहेली का सिलसिला पुनः आरम्भ होगा। 

पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

“स्वरगोष्ठी” के 492वें अंक में हमने आपको 1957 में प्रदर्शित फिल्म "अब दिल्ली दूर नहीं” से लिये गए एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से कम से कम दो सही उत्तरों की अपेक्षा की गई थी। इस गीत के आधार राग को पहचानने में हमारे अधिकतर प्रतिभागियों को सफलता मिली। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग - मारू बिहाग और यमन कल्याण, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – दादरा एवं कहरवा का एक प्रकार तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – आशा भोसले, गीता दत्त और साथी 

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और शारीरिक अस्वस्थता के कारण स्वास्थ्यलाभ कर रहीं हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों में से प्रत्येक को दो-दो अंक मिलते हैं। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से आप सभी को हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नए प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं। 


संवाद

मित्रों, इन दिनों हम सब भारतवासी, प्रत्येक नागरिक को कोरोना वायरस से मुक्त करने के लिए प्रयत्नशील हैं। देश के कुछ स्थानों पर अचानक इस वायरस का प्रकोप इन दिनों बढ़ गया है। अप सब सतर्कता बरतें। संक्रमित होने वालों के स्वस्थ होने का प्रतिशत निरन्तर बढ़ रहा है। परन्तु अभी भी हमें पर्याप्त सतर्कता बरतनी है। विश्वास कीजिए, हमारे इस सतर्कता अभियान से कोरोना वायरस पराजित होगा। आप सब से अनुरोध है कि प्रत्येक स्थिति में चिकित्सकीय और शासकीय निर्देशों का पालन करें और अपने घर में सुरक्षित रहें। इस बीच शास्त्रीय संगीत का श्रवण करें और अनेक प्रकार के मानसिक और शारीरिक व्याधियों से स्वयं को मुक्त रखें। विद्वानों ने इसे “नाद योग पद्धति” कहा है। “स्वरगोष्ठी” की नई-पुरानी श्रृंखलाएँ सुने और पढ़ें। साथ ही अपनी प्रतिक्रिया से हमें अवगत भी कराएँ। 


अपनी बात

मित्रों, “रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ “स्वरगोष्ठी” पर जारी हमारी नई श्रृंखला “राज कपूर के विस्मृत संगीतकार" की दसवीं और समापन कड़ी में आज आपने राज कपूर व माला सिन्हा द्वारा अभिनीत फिल्म "फिर सुबह होगी” के एक गीत का रसास्वादन किया, फिल्म के गीतकार साहिर लुधियानवी तथा संगीतकार खय्याम का परिचय भी प्राप्त किया। यह गीत राग खमाज और बिलावल पर आधारित है। राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए हमने आपको सुविख्यात संगीतज्ञ पण्डित उल्हास कशालकर के स्वर में एक रसभरी ठुमरी का रसास्वादन कराया। 

कुछ तकनीकी समस्या के कारण हम अपने फेसबुक के मित्र समूह के साथ “स्वरगोष्ठी” का लिंक साझा नहीं कर पा रहे हैं। सभी संगीत अनुरागियों से अनुरोध है कि हमारी वेबसाइट http://radioplaybackindia.com अथवा http://radioplaybackindia.blogspot.com पर क्लिक करके हमारे सभी साप्ताहिक स्तम्भों का अवलोकन करते रहें। “स्वरगोष्ठी” के वेब पेज के दाहिनी ओर निर्धारित स्थान पर अपना ई-मेल आईडी अंकित कर आप हमारे सभी पोस्ट के लिंक को नियमित रूप से अपने ई-मेल पर प्राप्त कर सकते है। “स्वरगोष्ठी” की पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेंगे। आज के इस अंक अथवा श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः सात बजे “स्वरगोष्ठी” के इसी मंच पर हम एक बार फिर संगीत के सभी अनुरागियों का स्वागत करेंगे। 


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

रेडियो प्लेबैक इण्डिया 
राग खमाज और बिलावल : SWARGOSHTHI – 494 : RAG KHAMAJ & BILAWAL : 27 दिसम्बर, 2020 



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