शुक्रवार, 2 अक्तूबर 2020

फ़िल्मी प्रसंग - 2: "सपने ख़ुशी के सजाता चल..." - अलविदा अभिलाष जी!

  

फ़िल्मी प्रसंग - 2

अलविदा अभिलाष जी!

"सपने ख़ुशी के सजाता चल..." 



रेडियो प्लेबैक इंडिया’ के नए साप्ताहिक स्तंभ ’फ़िल्मी प्रसंग’ में आप सभी का स्वागत है।  फ़िल्म एवम् फ़िल्म-संगीत निर्माण प्रक्रिया के दौरान घटने वाली रोचक घटनाओं व अन्य पहलुओं से सम्बन्धित दिलचस्प प्रसंग जिनके बारे में जान कर आश्चर्य भी होता है और रोमांच भी। फ़िल्म इतिहासकारों, रेडियो व टेलीविज़न कार्यक्रमों, कलाकारों व कलाकारों के परिवारजनों के सोशल मीडिया पोस्ट्स व उनसे साक्षात्कारों, विभिन्न फ़िल्मी पत्र-पत्रिकाओं जैसे विश्वसनीय माध्यमों से संकलित जानकारियों से सुसज्जित प्रसंग - फ़िल्मी प्रसंग!

28 सितम्बर 2020 को गीतकार अभिलाष का निधन हो गया। उनके गुज़र जाने के बाद लोगों ने सोशल मीडिया पर उन्हें जितना याद किया, काश उनके जीवित रहते समय किया होता तो शायद वे इस दुनिया को थोड़े सुकून के साथ छोड़ पाते! गीतकार विजय अकेला ने अपनी दिल की भड़ास निकालते हुए अपने फ़ेसबूक पृष्ठ पर लिखा, "शायरी से दुनिया को जितनी महब्बत होती है, शायरों से उतनी ही चिढ़! दुनिया शायरों को सहानुभूति तो देती है, उनका हक़ नहीं ! उनकी royalties नहीं ! शायर जब इलाज के अभाव में मरता है तो सभी कहते हैं -’अच्छा शायर था !’ मगर जीते जी उसके कलाम की चोरी की जाती है! मुफ़्त ही उससे महफ़िलें सजायी जाती हैं। शायर एक रंगीन चश्मा भी लगा के शेर कहे तो रंगीन चश्मा लगा के घूमने वालों की ego उस शायर से इतनी hurt हो जाती है कि वे उसका बहिष्कार करना शुरू कर देते हैं ! बड़े हॉस्पिटल में उसका इलाज चले तो समाज के सीने पे कटारी चल जाती है! यही है वो समाज जिसमें हम रहते हैं! बढ़िए आगे अभिलाष जी! हम भी आ ही रहे हैं! अभिलाष जी ने लिखा था "इतनी शक्ति हमें देना दाता, मन का विश्वास कमज़ोर हो ना"। यह गीत प्रार्थना बना। सैंकड़ों स्कूलों में हर रोज़ गाया गया / जाता है! और तो और वर्तमान सरकार ने भी इस गीत को एक तरह से अपना Party Song बनाया, मगर royalties? कुछ भी नहीं! आज करोड़ों मोबाइल का caller tune है ये गीत! पर कितनों को पता होगा कि इसे अभिलाष जी ने लिखा है?"

अभिलाष जी को श्रद्धांजलि स्वरूप उनके लिखे "इतनी शक्ति हमें देना दाता" गीत के बजाय उनके किसी कमचर्चित या कमसुने-अनसुने गीत को चुनने का मन हो रहा है। हालांकि उनका लिखा मेरा अब तक का पसन्दीदा गीत फ़िल्म ’सावन को आने दो’ का "तेरे बिन सूना मोरे मन क मन्दिर आ रे आ रे आ" है, उनके लिखे गीतों पर नज़र डालते हुए एक ऐसा गीत हाथ लगा जिसे शायद बहुत कम ही लोगों ने सुना होगा और अब यही गीत सबसे अधिक दिल को छू रहा है। दिल को छूने का कारण शायद यह है कि इस गीत का एक एक शब्द जैसे अभिलाष जी के जीवन का उपहास कर रहा हो! "झूमता, मुस्कुराता चल, प्यार में गुनगुनाता चल, ओ मेरे मन, होके मगन, सपने ख़ुशी के सजाता चल"। यह 1970 के दशक में बनने वाली किसी अप्रदर्शित फ़िल्म का बताया जा रहा है। गीत गाया है मुकेश ने और संगीत दिया है असित गांगुली ने। गीत में मुकेश जी की आवाज़ और गीत के संगीत संयोजन को सुनते हुए यह 70 के दशक का ही गीत जान पड़ता है, पर एक आश्चर्य की बात है कि बहुत से जगहों पर इसे 1956 की फ़िल्म ’मौक़ा’ का बताया जा रहा है। पर अभिलाष जी की उम्र उस समय मात्र दस वर्ष की थी, इसलिए यह सम्भव नहीं कि उन्होंने यह गीत उस समय लिखा होगा। संयोग की बात यह है कि गीत में "मौक़ा" शब्द आता है, इसलिए संशय उत्पन्न हुआ कि क्या ’मौक़ा’ नामक किसी फ़िल्म के लिए ही यह गीत लिखा गया होगा! ख़ैर, जो भी है, इस गीत को आज सुनते हुए मन में जैसे अभिलाष जी के लिए एक दर्द सा महसूस होता है। पूरे गीत में आशाओं की धरती पर एक नई दुनिया बसाने, ख़ुशियों के सपने सजाने की बातें कही गई हैं, पर अभिलाष जी का अपना जीवन निराशाओं से ही घिरा रहा। तमाम निराशाओं के बीच उनके आशावादी गीतों का सफ़र जारी रहा। जिस तरह से इस अप्रदर्शित गीत में उन्होंने आशावादी विचारधारा रखी है, "इतनी शक्ति हमें देना दाता, मन का विश्वास कमज़ोर हो ना" में भी वही आशावाद दिखाई देता है।

झूमता मुस्कुराता चल
प्यार में गुनगुनाता चल
ओ मेरे मन, हो के मगन
सपने खुशी के सजाता चल

फूलों भरी ये डालियाँ
महकी महकी वादियाँ
कलियों का ये निखरा जोबन
नज़रों से तू चुराता चल
मौका मिला है सुनहरा
उठ गया ग़म का पहरा
आशाओं की धरती पर तू
दुनिया नई बसाता चल





आपकी राय

’फ़िल्मी प्रसंग’ स्तंभ का आज का यह अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। 


शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

मंगलवार, 29 सितंबर 2020

ऑडियो: पूजाघर (कन्हैयालाल पाण्डेय)

'बोलती कहानियाँ' स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछली बार आपने कन्हैयालाल पाण्डेय के स्वर में उन्हीं की कहानी माँ का पॉडकास्ट सुना था। आवाज़ की ओर से आज हम लेकर आये हैं कन्हैयालाल पाण्डेय की लघुकथा "पूजाघर", जिसे स्वर दिया है, कन्हैयालाल पाण्डेय ने।

इस रचना का कुल प्रसारण समय 3 मिनट 51 सेकण्ड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानी, उपन्यास, नाटक, धारावाहिक, प्रहसन, झलकी, एकांकी, या लघुकथा को स्वर देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।

कन्हैयालाल पाण्डेय
4 नवम्बर, 1954 को हरदोई में जन्म। भारतीय रेल यातायात सेवा (सेवानिवृत्त)। हिन्दी में छह साहित्यिक तथा दो संगीत पुस्तकों का लेखन। साहित्य व संगीत के क्षेत्र में अनेक पुरस्कारों से सम्मानित

हर सप्ताह यहीं पर सुनिए एक नयी कहानी

"मैं आपकी स्थिति समझ रहा हूँ।"
(कन्हैयालाल पाण्डेय की "पूजाघर" से एक अंश)

नीचे के प्लेयर से सुनें.
(प्लेयर पर एक बार क्लिक करें, कंट्रोल सक्रिय करें फ़िर 'प्ले' पर क्लिक करें।)


यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाउनलोड कर लें:
पूजाघर mp3

#Ninteenth Story: Pujaghar; Author: Kanhayalal Pandey; Voice: Kanhayalal Pandey; Hindi Audio Book/2020/19.

रविवार, 27 सितंबर 2020

राग जौनपुरी : SWARGOSHTHI – 481 : RAG JAUNPURI





स्वरगोष्ठी – 481 में आज 

आसावरी थाट के राग – 3 : राग जौनपुरी

विदुषी कौशिकी चक्रवर्ती से राग जौनपुरी में खयाल-रचना और आशा भोसले से फिल्मी गीत सुनिए 





आशा भोसले 


कौशिकी चक्रवर्ती 

“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “आसावरी थाट के राग” की तीसरी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट व्यवस्था है। भारतीय संगीत में सात शुद्ध, चार कोमल और एक तीव्र अर्थात कुल बारह स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए इन बारह स्वरों में से कम से कम पाँच स्वरों का होना आवश्यक होता है। संगीत में थाट रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के बारह में से मुख्य सात स्वरों के क्रमानुसार समुदाय को थाट कहते हैं, जिससे राग उत्पन्न होते हों। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये दस थाट हैं; कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। सभी प्रचलित और अप्रचलित रागों को इन्हीं दस थाट के अन्तर्गत सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट, स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 'राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत 'ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी में थाट के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का प्रयोग लगभग तीन सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट में से आठवाँ थाट आसावरी है। इस श्रृंखला में हम आसावरी थाट के रागों पर क्रमशः चर्चा कर रहे हैं। प्रत्येक थाट का एक आश्रय अथवा जनक राग होता है और शेष जन्य राग कहलाते हैं। आपके लिए इस श्रृंखला में हम आसावरी थाट के जनक और जन्य रागों पर चर्चा कर रहे हैं। श्रृंखला की तीसरी कड़ी में आज हमने आसावरी थाट के जन्य राग जौनपुरी का चयन किया है। श्रृंखला की इस कड़ी में आज हम आपके लिए षाड़व-सम्पूर्ण जाति के राग जौनपुरी का परिचय प्रस्तुत करेंगे। इसके साथ ही पटियाला गायकी में दक्ष सुविख्यात संगीत विदुषी कौशिकी चक्रवर्ती के स्वरों में राग जौनपुरी में निबद्ध एक शास्त्रीय रचना का वीडियो प्रस्तुत कर रहे हैं। इस राग के स्वरों का कई फिल्मी गीतों में उपयोग किया गया है। राग अड़ाना के स्वरों पर आधारित एक फिल्मी गीत का भी हमने चयन किया है। आज की कड़ी में हम आपको 1968 में प्रदर्शित फिल्म "दो कलियाँ" से साहिर लुधियानवी का लिखा और रवि का स्वरबद्ध किया नृत्य-गीत "चितनन्दन आगे नाचूँगी..." सुनवा रहे हैं, जिसे सुप्रसिद्ध पार्श्वगायिका आशा भोसले ने स्वर दिया है। 



राग जौनपुरी आसावरी थाट का जन्य राग माना जाता है। इस राग में गान्धार, धैवत और निषाद स्वर कोमल लगाए जाते हैं। आरोह में गान्धार वर्जित होता है और अवरोह में सभी सात स्वर प्रयोग किये जाते हैं। इसीलिए राग जौनपुरी की जाति षाड़व-सम्पूर्ण होती है। इस राग का वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर गान्धार होता है। राग जौनपुरी के गायन अथवा वादन का सर्वाधिक उपयुक्त समय दिन का दूसरा प्रहर माना जाता है। इस राग के आरोह में कभी-कभी कुछ विद्वान शुद्ध निषाद का प्रयोग करते हैं। परन्तु प्रचार में कोमल निषाद ही है। आरोह में कोमल निषाद के प्रयोग के कारण राग जौनपुरी, राग आसावरी से भिन्न हो जाता है। राग आसावरी से बचाने के लिए ऋषभ, मध्यम और पंचम स्वरों का प्रयोग बार-बार किया जाता है। यह उत्तरांगवादी राग है। अतः इसका चलन अधिकतर सप्तक के उत्तर अंग में और तार सप्तक में होती है। राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए अब हम आपको विदुषी कौशिकी चक्रवर्ती के स्वर में एक खयाल रचना सुनवा रहे हैं, जिसके बोल हैं; "प्रभु मोहें भरोसा एक तिहारो..."। 

राग जौनपुरी : "प्रभु मोहें भरोसा एक तिहारो..." : विदुषी कौशिकी चक्रवर्ती 



राग जौनपुरी के बारे में कुछ विद्वानों की धारणा है कि उत्तर प्रदेश के जौनपुर जनपद के सुल्तान हुसैन शर्क़ी ने राग की रचना की थी। इसीलिए राग का नामकरण जौनपुरी हुआ। राग जौनपुरी का समप्रकृति राग आसावरी होता है। इसीलिए कभी-कभी दोनों रागों को पहचानने में भ्रम हो जाता है। दोनों रागों में गान्धार, धैवत और निषाद स्वर कोमल लगते हैं, दोनों रागों में वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर गान्धार होता है और दोनों रागों को दिन के दूसरे प्रहर में गाया या बजाया जाता है। अन्तर इन रागों की जाति में होता है। राग जौनपुरी षाड़व-सम्पूर्ण जाति का होता है, जबकि राग आसावरी औड़व-सम्पूर्ण जाति का होता है। कई फिल्मी गीत राग जौनपुरी पर आधारित रचे गए हैं। राग जौनपुरी पर आधारित इन गीतों में से एक गीत हमने चुना है। यह गीत 1968 में प्रदर्शित फिल्म "दो कलियाँ" से है। गीतकार साहिर लुधियानवी और संगीतकार रवि हैं। दरअसल यह गीत एक नृत्य-गीत है, जिसे तीनताल और कहरवाताल में निबद्ध किया गया है और इसे आशा भोसले ने स्वर दिया है। आप यह गीत सुनिए और हमें आज की इस कड़ी को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए और पहेली प्रतियोगिता में भाग लेना न भूलिए। 

राग जौनपुरी : "चितनन्दन आगे नाचूँगी..." : आशा भोसले : फिल्म - दो कलियाँ 




संगीत पहेली

"स्वरगोष्ठी" के 481वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1968 में प्रदर्शित एक फिल्म के राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देना आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। श्रृंखला के चौथे सत्र अर्थात अंक संख्या 490 की पहेली का उत्तर प्राप्त होने के बाद तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे उन्हें इस वर्ष के चतुर्थ सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा। 





1 - इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का आधार है? 

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए। 

3 – इस गीत में किस पार्श्वगायक के स्वर है? 

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia9@gmail.com पर ही शनिवार 3 अक्तूबर, 2020 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। फेसबुक पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेताओं के नाम हम उनके शहर/ग्राम, प्रदेश और देश के नाम के साथ “स्वरगोष्ठी” के अंक संख्या 483 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत, संगीत या कलाकार के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं। 


पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

“स्वरगोष्ठी” के 479 वें अंक में हमने आपको 1955 में प्रदर्शित फिल्म "झनक झनक पायल बाजे" के एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से कम से कम दो सही उत्तरों की अपेक्षा की गई थी। इस गीत के आधार राग को पहचानने में हमारे अधिकतर प्रतिभागी सफल रहे। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग - अड़ाना, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – तीनताल तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – उस्ताद अमीर खाँ। 

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, अहमदाबाद, गुजरात से मुकेश लाडिया, चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और शारीरिक अस्वस्थता के बावजूद हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों में से प्रत्येक को दो-दो अंक मिलते हैं। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से आप सभी को हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ईमेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नए प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं। 


संवाद

मित्रों, इन दिनों हम सब भारतवासी, प्रत्येक नागरिक को कोरोना वायरस से मुक्त करने के लिए प्रयत्नशील हैं। अब तक हम काफी हद तक हम सफल भी हुए हैं। संक्रमित होने वालों के स्वस्थ होने का प्रतिशत निरन्तर बढ़ रहा है। परन्तु अभी भी हमें पर्याप्त सतर्कता बरतनी है। विश्वास कीजिए, हमारे इस सतर्कता अभियान से कोरोना वायरस पराजित होगा। आप सब से अनुरोध है कि प्रत्येक स्थिति में चिकित्सकीय और शासकीय निर्देशों का पालन करें और अपने घर में सुरक्षित रहें। इस बीच शास्त्रीय संगीत का श्रवण करें और अनेक प्रकार के मानसिक और शारीरिक व्याधियों से स्वयं को मुक्त रखें। विद्वानों ने इसे “नाद योग पद्धति” कहा है। “स्वरगोष्ठी” की नई-पुरानी श्रृंखलाएँ सुने और पढ़ें। साथ ही अपनी प्रतिक्रिया से हमें अवगत भी कराएँ। 


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी श्रृंखला “आसावरी थाट के राग” की तीसरी कड़ी में आज आपने आसावरी थाट के जन्य राग जौनपुरी का परिचय प्राप्त किया। राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए हमने विदुषी कौशिकी चक्रवर्ती के स्वरों में राग जौनपुरी की एक रागदारी रचना प्रस्तुत की। इसके साथ ही “स्वरगोष्ठी” की परम्परा के अनुसार आज की कड़ी में हमने आपको 1968 में प्रदर्शित फिल्म "दो कलियाँ" से आशा भोसले के स्वर में रवि का संगीतबद्ध किया और साहिर लुधियानवी का लिखा एक गीत "चितनन्दन आगे नाचूँगी..." प्रस्तुत किया। 

कुछ तकनीकी समस्या के कारण हम अपने फेसबुक के मित्र समूह पर “स्वरगोष्ठी” का लिंक साझा नहीं कर पा रहे हैं। सभी संगीत अनुरागियों से अनुरोध है कि हमारी वेबसाइट http://radioplaybackindia.com अथवा http://radioplaybackindia.blogspot.com पर क्लिक करके हमारे सभी साप्ताहिक स्तम्भों का अवलोकन करते रहें। “स्वरगोष्ठी” के वेब पेज के दाहिनी ओर निर्धारित स्थान पर अपना ई-मेल आईडी अंकित कर आप हमारे सभी पोस्ट के लिंक को नियमित रूप से अपने ई-मेल पर प्राप्त कर सकते है। “स्वरगोष्ठी” की पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेंगे। आज के इस अंक अथवा श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः सात बजे “स्वरगोष्ठी” के इसी मंच पर हम एक बार फिर संगीत के सभी अनुरागियों का स्वागत करेंगे। 


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

रेडियो प्लेबैक इण्डिया
 राग जौनपुरी : SWARGOSHTHI – 481 : RAG JAUNPURI : 27 सितम्बर, 2020 




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