शनिवार, 9 जून 2018

चित्रकथा - 72: गीतकार आनन्द बक्शी के सुपुत्र राकेश बक्शी से बातचीत (भाग-1)

अंक - 72

गीतकार आनन्द बक्शी के सुपुत्र राकेश बक्शी से बातचीत (भाग-1)


"ज़िंदगी के सफ़र में..." 




रेडियो प्लेबैक इंडिया’ के साप्ताहिक स्तंभ ’चित्रकथा’ में आप सभी का स्वागत है। आज इस स्तंभ के माध्यम से हम आपसे मिलवाने जा रहे हैं हिन्दी सिने-संगीत जगत के सुप्रसिद्ध और लोकप्रियतम गीतकारों में से एक, आनद बक्शी के सुपुत्र राकेश बक्शी से। राकेश आनन्द बक्शी के नाम से अपना परिचय देने वाले राकेश जी बहुत ही उदारता का परिचय देते हुए ’रेडियो प्लेबैक इंडिया’ की इस प्रस्तुति के लिए आपके इस दोस्त से लम्बी बातचीत की थी वर्ष 2011 में। ’ओल्ड इज़ गोल्ड - शनिवार विशेष’ और ’बातों बातों में’ स्तंभों में पूर्वप्रकाशित यह साक्षात्कार हम आपके लिए फिर एक बार प्रस्तुत कर रहे हैं इस उद्येश्य से कि हमारे बहुत से पाठक जो हाल के वर्षों में हमसे जुड़े हैं, वो इस साक्षात्कार का आनन्द उठा सके। तो आइए प्रस्तुत है बक्शी साहब के बेटे राकेश बक्शी से सुजॉय चटर्जी की लम्बी बातचीत के संपादित अंश। आज पेश है इस बातचीत का पहला भाग।




राकेश जी, 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' की तरफ़ से, हमारे तमाम पाठकों की तरफ़ से, और मैं अपनी तरफ़ से आपका हमारे इस मंच पर हार्दिक स्वागत करता हूँ, नमस्कार! यह हमारी ख़ुशनसीबी है कि आपसे मिलने और बातचीत करने का मौका मिला।

नमस्कार! मुझे भी यहाँ आकर बहुत अच्छा लग रहा है।

सच पूछिये तो हम अभिभूत हैं आपको हमारे बीच में पाकर। फ़िल्म संगीत के सफलतम गीतकारों में से एक थे आनंद बक्शी जी, और आज उनके बेटे से बातचीत करने का सौभाग्य हमें प्राप्त हुआ है, जिसके लिए आपको हम जितना भी धन्यवाद दें, कम होगी।

बहुत बहुत धन्यवाद!

राकेश जी, वैसे तो बक्शी साहब के बारे में, उनकी फ़िल्मोग्राफ़ी के बारे में, उनके करीयर के बारे में हम कई जगहों से जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। इसलिए इस बातचीत में हम उस तरफ़ न जाकर उनकी ज़िंदगी के कुछ ऐसे पहलुयों के बारे में आपसे जानना चाहेंगे जो शायद पाठकों को मालूम न होगी। और इसीलिए बातचीत के इस सिलसिले का नाम हमने रखा है 'बेटे राकेश बक्शी की नज़रों में गीतकार आनंद बक्शी'।

जी ज़रूर!

कैसा लगता है 'राकेश आनंद बक्शी' होना? मान लीजिए आप कहीं जा रहे हैं, और अचानक कहीं से बक्शी साहब का लिखा गीत बज उठता है, किसी पान की दुकान पे रेडियो पर, कैसा महसूस होता है आपको?

उनके लिखे सभी गीत मुझे नॉस्टल्जिक बना देता है। उनके लिखे न जाने कितने गीतों के साथ कितनी हसीन यादें जुड़ी हुईं हैं, या फिर कोई पर्सनल ईक्वेशन। कहीं से उनका लिखा गीत मेरे कानों में पड़ जाये तो मैं उन्हें और भी ज़्यादा मिस करने लगता हूँ।

अच्छा राकेश जी, किस उम्र में आपको पहली बार यह अहसास हुआ था कि आप 'आनंद बक्शी' के बेटे हैं? उस आनंद बक्शी के, जो कि फ़िल्म जगत के सबसे लोकप्रिय गीतकारों में से एक हैं? अपने बालपन में शायद आपको अंदाज़ा नहीं होगा कि बक्शी साहब की क्या जगह है लोगों के दिलों में, लेकिन जैसे जैसे आप बड़े होते गये, आपको अहसास हुआ होगा कि वो किस स्तर के गीतकार हैं और इंडस्ट्री में उनकी क्या जगह है। तो कौन सा था वह पड़ाव आपकी ज़िंदगी का जिसमें आपको इस बात का अहसास हुआ था?

यह अहसास एक पल में नहीं हुआ, बल्कि कई सालों में हुआ। इसकी शुरुआत उस समय हुई जब मैं स्कूल में पढ़ता था। मेरे कुछ टीचर मेरी तरफ़ ज़्यादा ध्यान दिया करते। या डॉक्टर के क्लिनिक में, या फिर बाल कटवाने के सलून में, कहीं पर भी मुझे लाइन में खड़ा नहीं होना पड़ता। बड़ा होने पर मैंने देखा कि पुलिस कमिशनर और इन्कम टैक्स ऑफ़िसर, जिनसे लोग परहेज़ ही किया करते हैं, ये मेरे पिताजी के लगभग चरणों में बैठे हैं, और उनसे अनुरोध कर रहे हैं उनके लिखे किसी नये गीत या किसी पुराने हिट गीत को सुनवाने की। 

वाक़ई मज़ेदार बात है!

जब मैं पहली बार विदेश गया और वहाँ पर जब NRI लोगों को यह बताया गया कि मैं बक्शी जी का बेटा हूँ, तो वो लोग जैसे पागल हो गये, और मुझे उस दिन इस बात का अहसास हुआ कि कभी विदेश न जाने के बावजूद मेरे पिताजी ने कितना लम्बा सफ़र तय कर लिया है। और यह सफ़र है असंख्य लोगों के दिलों तक का। मैं आपको यह बता दूँ कि उनका पासपोर्ट बना ज़रूर था, लेकिन वो कभी भी विदेश नहीं गये क्योंकि उन्हें हवाईजहाज़ में उड़ने का आतंक था, जिसे आप फ़्लाइंग-फ़ोबिआ कह सकते हैं। लेकिन यहाँ पर यह भी कहना ज़रूरी है कि सेना में रहते समय वो पैराट्रूपिंग्‍ किया करते थे अपनी तंख्वा में बोनस पाने के लिए।

इस तरह के और भी अगर संस्मरण है तो बताइए ना!

जब हम अपने रिश्तेदारों के घर दूसरे शहरों में जाते, तो वहाँ हमारे ठहरने का सब से अच्छा इंतज़ाम किया करते, या सब से जो अच्छा कमरा होता था घर में, वह हमें देते। एक वाक़या बताता हूँ, एक बार मैंने कुछ सामान इम्पोर्ट करवाया और उसके लिए एक इम्पोर्ट लाइसेन्स का इस्तमाल किया जिसमें कोई तकनीकी गड़बड़ी (technical flaw) थी। कम ही सही, लेकिन यह एक ग़ैर-कानूनी काम था जो सज़ा के काबिल था। और उस ऑफ़िसर ने मुझसे भारी जुर्माना वसूल करने की धमकी दी। लेकिन जाँच-पड़ताल के वक़्त जब उनको पता चला कि मैं किनका बेटा हूँ, तो वो बोले कि पिताजी के गीतों के वो ज़बरदस्त फ़ैन हैं। उन्होंने फिर मुझे पहली बार बैठने को कहा, मुझे चाय-पानी के लिए पूछा, जुर्माने का रकम भी कम कर दिया, और मुझे सलाह दी कि भविष्य में मैं इन बातों का ख़याल रखूँ और सही कस्टम एजेण्ट्स को ही सम्पर्क करूँ ताकि इस तरह के धोखा धड़ी से बच सकूँ। उन्होंने यह भी कहा कि अगर मैं पुलिस या कस्टम्स में पकड़ा जाऊँगा तो इससे मेरे पिताजी का ही नाम खराब होगा। उस दिन से मैंने अपना इम्पोर्ट बिज़नेस बंद कर दिया। इन सब सालों में और आज भी मैं बहुत से लोगों का विश्वास और प्यार अर्जित करता हूँ, जिनसे मैं कभी नहीं मिला, जो मेरे लिए बिल्कुल अजनबी हैं। यही है बक्शी जी का परिचय, उनकी क्षमता, उनका पावर। और मैंने भी हमेशा इस बात का ख़याल रखा कि मैं कभी कोई ऐसा काम न करूँ जिससे कि उनके नाम को कोई आँच आये, क्योंकि मेरे जीवन में उनका नाम मेरे नाम से बढ़कर है, और मुझे उनके नाम को इसी तरह से बरकरार रखना है।

वाह! क्या बात है! अच्छा, आपने ज़िक्र किया कि स्कूल में आपको स्पेशल अटेंशन मिलता था बक्शी साहब का बेटा होने के नाते।

जी!

तो क्या आपको ख़ुशी होती थी, गर्व होता था, या फिर थोड़ा एम्बरेसिंग्‍ होता था, यानी शर्म आती थी?

मैं आज भी बहुत ही शाई फ़ील करता हूँ जब भी इस तरह का अटेंशन मुझे मिलता है, हालाँकि मुझे उन पर बहुत बहुत गर्व है। अगर मैं ऐसे किसी व्यक्ति से मिलता हूँ जो स्टेटस में मुझसे नीचे है, तो मैं अपना सेलफ़ोन या घड़ी छुपा लेता हूँ या उन्हें नहीं जानने देता कि मैं किस गाड़ी में सफ़र करता हूँ। मुझे ऐसा लगता है कि मैं उनके साथ घुलमिल जाऊँ और उनसे सहजता से पेश आ आऊँ और वो भी मेरे साथ सहजता अनुभव करें।

बहुत ही अच्छी बात है यह, और कहावत भी है कि फलदार पेड़ हमेशा झुके हुए होते हैं। आनंद बक्शी साहब भी इतने बड़े गीतकार होते हुए भी बहुत सादे सरल थे, और शायद यही बात आप में भी है। अच्छा, यह बताइए कि एक पिता के रूप में बक्शी साहब कैसे थे? किस तरह का रिश्ता था आप दोनों में?

वो एक सख़्त पिता थे। सेना में एक सिपाही और रॉयल इण्डियन नेवी के कडेट होने की वजह से उन्होंने हमें भी अनुशासन, पंक्चुअलिटी और अपने पैरों पर खड़े होने की शिक्षा दी। वो मुझे लेकर पैदल स्कूल तक ले जाते थे जब कि घर में गाड़ियाँ और ड्राइवर्स मौजूद थे। कॉलेज में पढ़ते वक़्त भी मैं बस और ट्रेन में सफ़र किया करता था। जब मैं काम करने लगा, तब भी मैं घर की गाड़ी और ड्राइवर को केवल रात की पार्टी में जाने के लिए ही इस्तमाल किया करता। पिताजी कभी भी सिनेमा घरों के मैनेजरों या मालिकों को फ़िल्म की टिकट भिजवाने के लिए नहीं कहते थे, क्योंकि उन्हें मालूम था कि वो पैसे नहीं लेंगे। इसलिए हम भी सिनेमाघरों के बाहर लाइन में खड़े होकर टिकट खरीदते। सिर्फ़ प्रीमियर या ट्रायल शो के लिए हमें टिकट नहीं लेना पड़ता और वो परिवार के सभी लोगों को साथ में लेकर जाते थे। 

वाह! बहुत मज़ा आता होगा उन दिनों!

जी हाँ! रात को जब वो घर वापस आते और हमें सोये हुए पाते, तो हमारे सर पर हाथ फिराते। वो चाहते थे कि हम इंजिनीयर या डॉक्टर बने। वो नहीं चाहते थे कि हम फ़िल्म-लाइन में आये।

राकेश जी, आप किस लाइन में गये, उसके बार में भी हम आगे चलकर बातचीत करेंगे, लेकिन इस वक़्त हम और जानना चाहेंगे कि बक्शी साहब किस तरह के पिता थे?

दिन के वक़्त, जब उनके लिखने का समय होता था, तब वो बहुत ही कम शब्दों के पिता बन जाते थे, लेकिन रात को खाना खाने से पहले वो हमें अपने बचपन और जीवन के अनुभवों की कहानियाँ सुनाया करते। उन्हें किताब पढ़ने का शौक था और ख़ुद पढ़ने के बाद अगर उन्हें अच्छा लगता तो हमें भी पढ़ने के लिए देते थे; ख़ास कर मासिक 'रीडर्स डाइजेस्ट'। हम देर रात तक घर से बाहर रहे, यह उन्हें पसंद नहीं था। जब हम स्कूल में थे, तब रात को खाने के वक़्त से पहले हमारा घर के अंदर होना ज़रूरी था। खेलकूद के लिए वो हमें प्रोत्साहित किया करते थे। हम पढ़ाई या करीयर के लिए कौन सा विषय चुनेगे, इस पर उनकी कोई पाबंदी नहीं थी, उनका बस यह विचार था कि हम पढ़ाई को जारी रखें और पोस्ट-ग्रैजुएशन करें। उनको उच्च शिक्षा का मोल पता था और वो कहते थे कि यह उनका दुर्भाग्य है कि वो सातवीं कक्षा के बाद पढ़ाई जारी नहीं रख सके, देश के बँटवारे की वजह से। उनका इस बात पर हमेशा ध्यान रहता था कि हम अपनी माँ की सब से ज़्यादा इज़्ज़त करें क्योंकि उन्होंने अपनी माँ को बहुत ही कम उम्र में खो दी थी। जिन्हें माँ का प्यार मिलता है, वो बड़े ख़ुशनसीब होते हैं, ऐसा उनका मानना था।

राकेश जी, आपने बताया कि किस तरह से बक्शी साहब ने आप सब को माँ की अहमीयत बतायी। किसी की सफलता के पीछे उसके जीवन-संगिनी का बड़ा हाथ होता है। तो बताइए बक्शी साहब की जीवन-संगिनी, यानी आपकी माताजी के बारे में।

शादी के बाद पिताजी की आमदनी इतनी नहीं थी कि बम्बई में घर किराये पर लेते। इसलिए शादी के बाद भी कुछ सालों तक मेरी माँ उनके माता-पिता के घर में ही रहती थीं, लखनऊ में। वो महिलाओं के कपड़े सीती थीं ताकि अपने पिता, जो एक रिटायर्ड आर्मी मैन थे, को कुछ आर्थिक मदद कर सके। एक दिन जब मैं मेरी माताजी के साथ गुस्से से पेश आया, तब पिताजी ने मुझे बताया कि बचपन में मेरी माँ अण्डे इसलिए नहीं खाती थीं ताकि हम बच्चों को अण्डे खाने के मौके मिले। उन दिनों हमारी आर्थिक स्थिति इतनी अच्छी नहीं थी कि अच्छा नाश्ता कर पाते। इसलिए मेरी माताजी ने काफ़ी त्याग और समर्पण किये अपने चार बच्चों को बड़ा करने के लिए। और पिताजी ने उस दिन हम बच्चों को आगाह किया और चेतावनी भी दी कि हम कभी भी अपनी माँ के साथ बदतमीज़ी से पेश न आये।

सही बात है! अच्छा राकेश जी, ये तो थी उन दिनों की बातें जब आपकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। जब बक्शी साहब को दौलत और शोहरत हासिल हुई, उस वक़्त आपकी माताजी के व्यवहार में किसी तरह का परिवर्तन आया?

पिताजी के स्थापित होने के बाद और अमीर बनने के बाद भी माँ अपनी पुरानी साड़ियों और पुराने कपड़ों को पहनना नहीं छोड़ीं, क्योंकि वो जानती थी कि पिताजी जो कमाते थे, उसकी कीमत क्या थी। उसका मूल्य उन्हें मालूम था, और कितनी मेहनत से यह धन आता था, वह भी वो ख़ूब समझती थी। इसलिए कभी अपव्यय नहीं की। उन्होंने अपने जीवन में कभी भी पिताजी से किसी चीज़ की फ़रमाइश नहीं की। बल्कि पिताजी को ज़बरदस्ती से उन्हें कुछ अपने लिए दिलाना पड़ता था। बस एक बार मेरी माँ ने कुछ खरीदना चाहा था। यह बात थी उस वक़्त की जब पिताजी गुज़र गये थे और उन्हें हमारे रिश्तेदारों की Toyota Innova में बैठना पड़ा था, उस वक़्त उन्होंने कहा था कि हमें भी ऐसी एक गाड़ी खरीदनी चाहिये ताकि वो उसमें बैठकर हमारे पंचगनी के घर में जा सके। 

बक्शी साहब जब गीत लेखन के कार्य में बाहर जाते थे, या कभी दूसरे शहर में, या फिर कहीं हिल-स्टेशन में, तो क्या आपकी माताजी भी साथ जाया करतीं?

ज़्यादातर समय पिताजी अपने बेड-रूम में बैठ कर ही गीत लिखते थे, और कभी लिविंग्‍-रूम में बैठ कर। उनके 99% गीत उन्होंने घर में बैठ कर ही लिखे हैं, न कि किसी पर्वत, वादी या नदी या झील के किनारे बैठ के, जैसा कि कुछ फ़िल्मों में दिखाया जाता है। इस वजह से माँ ने अपना सोशल-लाइफ़ भी बहुत सीमित कर लिया था ताकि घर में रह कर पिताजी की ज़रूरतों की तरफ़ ध्यान दे सके, ताकि गीत-लेखन कार्य में उन्हें कोई कठिनाई न हो।

यही बात मैं कह रहा था कि जीवन-संगिनी का उसकी सफलता के पीछे बहुत बड़ा हाथ होता है। अच्छा इसका मतलब यह हुआ कि आपके माताजी की सखी-सहेलियों का दायरा बहुत ही छोटा होगा?

उनकी बस एक सहेली थी और दो तीन रिश्तेदार थे जिनके वो करीब थीं। वो इनके घर महीने दो महीने में एक बार जाती थीं। पिताजी के गुज़र जाने के बाद उन्होंने एक महाशून्य महसूस किया अपनी ज़िंदगी में।

और मेरे ख़याल से यह एक ऐसा शून्य है जिसकी भरपाई कोई नहीं कर सकता, अपने बच्चे भी नहीं।

बिलकुल सही! और पिताजी फ़िल्म जगत से जुड़े लोगों से ज़रा दूर दूर ही रहा करते थे, इसलिए कम्पोज़र, प्रोड्युसर और डिरेक्टर्स के परिवार वालों से हमारा ज़्यादा मेल-मिलाप नहीं हुआ। और इसलिए माँ भी फ़िल्मी पार्टियों में और अवार्ड फ़ंक्शन में नहीं जाती थीं। पिताजी की मृत्यु के बाद जब प्रेस वाले अपने न्युज़ कैमेरों से हमारे घर के अंदर शूट करना चाह रहे थे और पिताजी की पार्थिव शरीर को हमारे लिविंग्‍-रूम में रखा गया था, हमने उनसे पूछा कि क्या हमें प्रेस को अंदर कैमरों से शूट करने की अनुमति देनी चाहिये, तब उन्होंने कहा कि पिताजी अपनी पूरी ज़िंदगी प्रेस और पब्लिसिटी से दूर ही रहे ताकि उनका ध्यान लेखन से न हट जाये, और अब जब वो घर आना चाह रहे हैं, यह तुम्हारे पिताजी की उपलब्धि है, और यह उनका हक़ भी है, इसलिए उन्हें आने दो।

राकेश जी, आपकी स्मृतियों में आनन्द बक्शी साहब राज करते होंगे। उनमें से कुछ के बारे में बताइए न!

एक नहीं हज़ार हैं स्मृतियाँ, कौन कौन सा बताऊँ। हाँ, एक जो मैं बताना चाहूँगा, वह यह कि जब वो कभी रात को देर से घर लौटते थे और हमें सोया पाते थे, तो वो हमारे बगल में बैठ जाते और हमारे सर पे अपना हाथ फेरते। कभी कभी मैं जगा ही रहता था जब वो हाथ फेरते, लेकिन मैं सोने का नाटक करता था ताकि उनके हाथ फेरने का आनन्द लेता रहूँ।

वाह! वाक़ई अपने माता-पिता के छुवन से मुलायम दुनिया की और कोई चीज़ नहीं हो सकती। अच्छा राकेश जी, आप सब मिल कर, पूरा परिवार, कभी छुट्टी मनाने जाते थे? जैसे मान लीजिये कि किसी पर्वतीय स्थल पर गये हों, और वहाँ पर बक्शी जी को यकायक किसी गीत की प्रेरणा मिल गयी हो? इस तरह का वाकया कभी हुआ है?

हम हर साल महाबलेश्वर और पंचगनी जाते थे। हम अपनी गाड़ी लेकर जाते थे। उन सर्पीले रास्तों पर चढ़ाई करते हुए उनका जो फ़ेवरीट गाना था, वह था "Walk Don't Run, 64", यह 'The Ventures' का गाना है। वो अक्सर अपने फ़ेवरीट सिगरेट 555 के पैकिट के उपर झट से कोई भाव लिख लिया करते थे। ऐसा इसलिए कि भले ही वो अपना नोट-बूक भूल जायें साथ लेना, लेकिन 555 का पैकिट कभी नहीं भूलते थे। लगभग ५ से १० गीत ऐसे होंगे जो उन्होंने हिल-स्टेशन में लिखे होंगे। जैसा कि मैंने बताया था कि वो अधिकतर गीत बेडरूम और लिविंग्‍-रूम में बैठ कर ही लिखे हैं, और कभी कभी म्युज़िक डिरेक्टर्स के सिटिंग्‍ रूम में। और यह बात भी है कि छुट्टी में जाकर वो कभी नहीं लिखते थे। वो लिखते वक़्त कभी शराब नहीं पीते थे क्योंकि वो इसे माँ सरस्वती का अपमान मानते थे।

वो घर पर शराब पीते थे?

अगर कभी पीते भी थे तो रात के ९ बजे के बाद पीते थे, लेकिन डिनर के बाद कभी नहीं। यहाँ पर ऐसी मान्यता है कि शायर को लिखने के लिए पीना ज़रूरी होता है। लेकिन देखिये, पिताजी ने लिखते वक़्त शराब का कभी सहारा नहीं लिया। वो सिगरेट ज़रूर पीते थे या पान चबाते थे लिखते वक़्त। लिखते वक़्त वो व्हिसल भी बजाते थे। और मेरा ख़याल है कि कभी कभी वो ख़ुद धुन भी बनाने की कोशिश करते होंगे या व्हिसलिंग्‍ के माध्यम से मीटर पर लिखने की कोशिश करते होंगे। म्युज़िक डिरेक्टर्स भी कई बार उन्हें धुन बता देते थे, इसलिए भी वो उस धुन को व्हिसल कर उसपे बोल बिठाते। लेकिन बहुत बार उन्हें संगीतकार ने धुन नहीं भी दी। तब वो ख़ुद ही अपने बोलों को ख़ुद धुन पर बिठाते होंगे व्हिसलिंग्‍ के ज़रिये।

ऐसा कोई गीत आपको पता है जिसकी धुन बक्शी साहब ने ख़ुद बनायी या सुझायी होगी?

कुछ संगीतकारों ने ख़ुद मुझे यह बात बतायी है कि किस तरह से पिताजी उनका काम आसान बना देते थे। लेकिन मैं न उन संगीतकारों के नाम लूँगा और न ही उन गीतों के बारे में कुछ कहना चाहूँगा जिनकी धुने पिताजी ने बनाये थे। यह हक़ केवल पिताजी को था और उन्होंने कभी यह बात किसी को नहीं बतायी। इसलिए बेहतर यही होगा कि यह राज़ दुनिया के लिए राज़ ही बना रहे।

हम भी सम्मान करते हैं आपके इस फ़ैसले का। और बहुत सही किया है आपने। 

पिताजी उन्हें गीतों के साथ साथ धुने भी दे दिया करते, लेकिन कभी भी निर्माता से धुनों के लिए क्रेडिट या पब्लिसिटी की माँग नहीं की। और यही कारण है कि वो लोग उन्हें दूसरे गीतकारों की तुलना में इतना ज़्यादा सम्मान क्यों करते थे! मुझे उन संगीतकारों से ही पता चला कि पिताजी कभी कभी एक ही गीत के लिए १० से २० अंतरे लिख डालते थे, जब कि उनसे माँग दो या तीन की ही होती थी। यह उनकी प्रतिभा की मिसाल है। निर्माता और निर्देशक द्वंद में पड़ जाते थे कि उन १०-२० अंतरों में से किन तीन अंतरों को चुनना है क्योंकि सभी के सभी अंतरे एक से बढ़कर एक होते थे और उनमें से श्रेष्ठ तीन चुनना आसान काम नहीं होता था। यहाँ तक कि कई बार तो रेकॉर्डिंग्‍ के दिन तक यह फ़ैसला नहीं हो पाता था कि कौन कौन से अंतरे फ़ाइनल हुए हैं। उन्हें ऐसा लगता कि जिन अंतरों को वो नहीं ले रहे हैं, उनके साथ अन्याय हो रहा है। आज भी जब वो पुराने लोग मुझे मिलते हैं तो इस बात का ज़िक्र करते हैं।


समापन अगले सप्ताह...

आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!




शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

रविवार, 3 जून 2018

राग भैरव : SWARGOSHTHI – 372 : RAG BHAIRAV







स्वरगोष्ठी – 372 में आज

राग से रोगोपचार – 1 : सुबह का राग भैरव

उच्च रक्तचाप, सिरदर्द, चक्कर, ज्वर आदि रोगों के निदान में राग भैरव के स्वर उपयोगी





उस्ताद सइदुद्दीन डागर
पं. श्रीकुमार मिश्र
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर आज से आरम्भ हो रही हमारी नई श्रृंखला “राग से रोगोपचार” की पहली कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, इस श्रृंखला के लेखक, संगीतज्ञ और इसराज व मयूर वीणा के यशस्वी वादक पण्डित श्रीकुमार मिश्र के साथ आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मानव का शरीर प्रकृत की अनुपम देन है। बाहरी वातावरण के प्रतिकूल प्रभाव से मानव के तन और मन में प्रायः कुछ विकृतियाँ उत्पन्न हो जाती हैं। इन विकृतियों को दूर करने के लिए हम विभिन्न चिकित्सा पद्धतियों की शरण में जाते हैं। पूरे विश्व में रोगोपचार की अनेक पद्धतियाँ प्रचलित है। भारत में हजारों वर्षों से योग से रोगोपचार की परम्परा जारी है। प्राणायाम का तो पूरा आधार ही श्वसन क्रिया पर केन्द्रित होता है। संगीत में स्वरोच्चार भी श्वसन क्रिया पर केन्द्रित होता है। भारतीय संगीत में 7 शुद्ध, 4 कोमल और 1 तीव्र, अर्थात कुल 12 स्वरों का प्रयोग होता है। इन्हीं स्वरों के संयोजन से राग की उत्पत्ति होती है। स्वर-योग या श्रव्य माध्यम से गायन या वादन के सुरीले, भावप्रधान और प्रभावकारी नाद अर्थात संगीत हमारे मस्तिष्क के संवेदनशील भागों में प्रवेश करता है। मस्तिष्क में नाद के प्रभाव का विश्लेषण होता है। ग्राह्य और उपयोगी नाद को मस्तिष्क सुरक्षित कर लेता है जहाँ नाद की परमाणु ऊर्जा के प्रभाव से सशक्त और उत्तम कोटि के हारमोन्स का सृजन होता है। यह हारमोन्स शरीर की समस्त कोशिकाओं में व्याप्त हो जाता है। इसकी ऊर्जा से अनेक मानसिक और मनोदैहिक समस्याओं का उपचार सम्भव हो सकता है। इसके साथ ही चिकित्सक के सुझावानुसार औषधियों का सेवन भी आवश्यक हो सकता है। मन की शान्ति, सकारात्मक तथा मृदु संवेदना और भक्ति में एकाग्रता के लिए राग भैरवी के कोमल स्वर प्रभावकारी सिद्ध होते हैं। इसी प्रकार विविध रागों के गातन-वादन के माध्यम से प्रातःकाल से रात्रिकालीन परिवेश में प्रभावकारी होता है। अलग-अलग स्वर-भावों और गीत के साहित्य के रसों के अनुसार उत्पन्न सशक्त भाव-प्रवाह के द्वारा डिप्रेशन, तनाव, चिन्ता, विकृति आदि मानसिक समस्याओं का उपचार सम्भव है। इस श्रृंखला में हम विभिन्न रागो के स्वरो से उत्पन्न प्रभावों का क्रमशः विवेचन करेंगे। श्रृंखला के पहले अंक में आज हम राग भैरव के स्वरो से विभिन्न रोगों के उपचार पर चर्चा करेंगे और आपको राग भैरव में निबद्ध एक ध्रुपद सुनवाएँगे जिसे उस्ताद सइदुद्दीन डागर ने प्रस्तुत किया है। इसके साथ ही “स्वरगोष्ठी” की परम्परा के अनुसार लता मंगेशकर के स्वर में राग भैरव पर आधारित फिल्म – “जागते रहो” का एक गीत भी प्रस्तुत करेंगे।



राग भैरव भारतीय संगीत का एक प्राचीन राग है। इस राग के गायन, वादन अथवा श्रवण से कई शारीरिक और मानसिक रोगों से मुक्ति मिल सकती है। राग भैरव के आरोह के स्वर हैं; सा, रे(कोमल), ग, म, प, (कोमल), नि, सां तथा अवरोह के स्वर हैं; सां, नि, (कोमल), प, म, ग, रे(कोमल), सा। इसके मुख्य स्वर हैं; ग, म, (कोमल), प, म, प, ग, म, रे(कोमल), सा, ग, म, (कोमल) स्वरावलियों के द्वारा प्रिय के निधन से हुए मानसिक आघात एवं प्रबल शोक-भाव के कारण उत्पन्न आवेगयुक्त प्रबल पुकार का भाव महसूस होता है। उक्त भाव में आंशिक स्थिरता का अनुभव पंचम स्वर पर आने से होता है। ग, म, रे(कोमल), सा, स्वरों के माध्यम से उक्त शोक-भाव में आंशिक शान्ति का अनुभव होता है। ग, म, (कोमल), नि, - सां, रें, सां, - नि, (कोमल), प, के द्वारा शोक-भाव में तीव्रता तथा अवरोहात्मक प्रक्रिया में शान्तिपूर्ण स्थिरता का भाव महसूस होता है। इस राग के स्वरों को स्वरयोग विधि से गायन अथवा इस राग के गायन या वादन का श्रवण करने से मानसिक आघात, विषाद के साथ-साथ उक्त मानसिक समस्याओं के कारण उत्पन्न उच्च रक्तचाप, सिरदर्द, चक्कर, ज्वर, स्वांस फूलना आदि विकारों से मुक्ति मिल सकती है। लीजिए, अब आप राग भैरव में निबद्ध भारतीय संगीत की एक प्राचीन शैली, ध्रुपद अथवा ध्रुवपद की एक रचना सुनिए। इसे सुप्रसिद्ध गायक उस्ताद सइदुद्दीन डागर ने स्वर दिया है।

राग भैरव : ध्रुपद : “आदि मध्य अन्त शिव आली...” : उस्ताद सइदुद्दीन डागर


आज का प्रातःकालीन राग भैरव इसी नाम से प्रचलित भैरव थाट का आश्रय राग है। इस राग का गायन अथवा वादन प्रातःकालीन सन्धिप्रकाश काल में किया जाता है। राग भैरव सम्पूर्ण जाति का राग है किन्तु इसमें ऋषभ और धैवत स्वर कोमल प्रयोग होता है। इसका वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर ऋषभ होता है। ऋषभ और धैवत स्वर पर आन्दोलन किया जाता है। यह गम्भीर प्रकृति का राग है, जिसमें ध्रुपद, विलम्बित व द्रुत खयाल और तराना गाया-बजाया जाता है। इस राग में ठुमरी नाही गायी जाती। राग भैरव पर आधारित फिल्मी गीतों में से एक अत्यन्त मनमोहक गीत आज हमने चुना है। 1956 में विख्यात फ़िल्मकार राज कपूर ने महत्वाकांक्षी फिल्म ‘जागते रहो’ का निर्माण किया था। इस फिल्म के संगीतकार सलिल चौधरी का चुनाव स्वयं राज कपूर ने ही किया था, जबकि उस समय तक शंकर-जयकिशन उनकी फिल्मों के स्थायी संगीतकार बन चुके थे। फिल्म ‘जागते रहो’ बाँग्ला फिल्म ‘एक दिन रात्रे’ का हिन्दी संस्करण था और बाँग्ला संस्करण के संगीतकार सलिल चौधरी को ही हिन्दी संस्करण के संगीत निर्देशन का दायित्व दिया गया था। सलिल चौधरी ने इस फिल्म के गीतों में पर्याप्त विविधता रखी। इस फिल्म में उन्होने एक गीत ‘जागो मोहन प्यारे, जागो...’ की संगीत रचना भैरव राग के स्वरों पर आधारित की थी। राग भैरव की एक पारम्परिक रचना की स्थायी की पंक्तियाँ बरकरार रखते हुए शैलेन्द्र ने गीत के अन्तरे को लिखा। यह गीत जब लता मंगेशकर के स्वरों में ढला, तब यह गीत हिन्दी फिल्म संगीत का मीलस्तम्भ बन गया। आइए, आज हम राग ‘भैरव’ पर आधारित, फिल्म ‘जागते रहो’ का यह गीत सुनते हैं। आप इस गीत का रसास्वादन करें और हमें श्रृंखला की पहली कड़ी को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग भैरव : ‘जागो मोहन प्यारे...’ : लता मंगेशकर और साथी : फिल्म - जागते रहो




संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 372वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको आठवें दशक की एक फिल्म से रागबद्ध गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के उत्तर देने आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। 380वें अंक की ‘स्वरगोष्ठी’ तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2018 के तीसरे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का स्पर्श है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस गायिका के स्वर है।?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 9 जून, 2018 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। “फेसबुक” पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 374वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 370वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको वर्ष 1985 में प्रदर्शित फिल्म ‘सुर संगम” के एक रागबद्ध गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से किसी दो प्रश्न के उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – मालकौंस, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल - तीनताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; गायक – पण्डित राजन मिश्र

“स्वरगोष्ठी” की इस पहेली प्रतियोगिता में तीनों अथवा तीन में से दो प्रश्नो के सही उत्तर देकर विजेता बने हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, मुम्बई, महाराष्ट्र से शुभा खाण्डेकर, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर आज से आरम्भ हमारी महत्त्वाकांक्षी श्रृंखला “राग से रोगोपचार” की पहली कड़ी में आपने कुछ शारीरिक और मनोशारीरिक रोगों के उपचार में सहयोगी राग भैरव का परिचय प्राप्त किया और इस राग में पिरोया एक ध्रुपद रचना का उस्ताद सइदुद्दीन डागर के स्वर में रसास्वादन किया। इसके साथ ही इसी राग पर आधारित फिल्म “जागते रहो” का एक फिल्मी गीत कोकिलकण्ठी लता मंगेशकर के स्वर में सुना। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। हमारी वर्तमान अथवा अगली श्रृंखला के लिए यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


शोध व आलेख : पं. श्रीकुमार मिश्र   
सम्पादन व प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र   

रेडियो प्लेबैक इण्डिया 
राग भैरव : SWARGOSHTHI – 372 : RAG BHAIRAV : 3 जून, 2018

शनिवार, 2 जून 2018

चित्रकथा - 71: हिन्दी फ़िल्मों में नाग-नागिन (भाग - 2)

अंक - 71

हिन्दी फ़िल्मों में नाग-नागिन (भाग - 2)

"मैं नागन तू सपेरा..." 




रेडियो प्लेबैक इंडिया’ के साप्ताहिक स्तंभ ’चित्रकथा’ में आप सभी का स्वागत है। भारतीय फ़िल्मों में नाग-नागिन शुरू से ही एक आकर्षक शैली (genre) रही है। सांपों को आधार बना कर लगभग सभी भारतीय भाषाओं में फ़िल्में बनी हैं। सिर्फ़ भारतीय ही क्यों, विदेशों में भी सांपों पर बनने वाली फ़िल्मों की संख्या कम नहीं है। जहाँ एक तरफ़ सांपों पर बनने वाली विदेशी फ़िल्मों को हॉरर श्रेणी में डाल दिया गया है, वहीं भारतीय फ़िल्मों में नाग-नागिन को कभी पौराणिक कहानियों के रूप में, कभी सस्पेन्स युक्त नाटकीय शैली में, तो कभी नागिन के बदले की भावना वाली कहानियों के रूप में प्रस्तुत किया गया है जिन्हें जनता ने ख़ूब पसन्द किया। हिन्दी फ़िल्मों के इतिहास के पहले दौर से ही इस शैली की शुरुआत हो गई थी। तब से लेकर पिछले दशक तक लगातार नाग-नागिन पर फ़िल्में बनती चली आई हैं। ’चित्रकथा’ के पिछले अंक में नाग-नागिन की कहानियों, पार्श्व या संदर्भ पर बनने वाली फ़िल्मों पर नज़र डालते हुए हम पहुँच गए थे 60 के दशक के अन्त तक। आइए आज 70 के दशक से इस सफ़र को आगे बढ़ाते हैं। प्रस्तुत है इस लेख की दूसरी व अन्तिम कड़ी।



वाक् फ़िल्म निर्माण के शुरुआती चार दशकों में नाग-नागिन के विषय पर बनने वाली फ़िल्मों में नज़र दौड़ाते हुए यह महसूस किया जा सकता है कि जहाँ 50 के दशक तक इस तरह के विषयवस्तु की पौराणिक या स्टण्ट फ़िल्में दर्शकों में बेहद लोकप्रिय हो जाया करती थीं, वहाँ 60 के दशक में ऐसी बहुत सी फ़िल्में फ़्लॉप होने लगी। दर्शकों की रुचि में बदलाव, बदलता दौर और बदलती पीढ़ी का असर नाग-नागिन के विषय पर बनने वाली पौराणिक और फ़ैन्टसी फ़िल्मों में पड़ने लगी। 70 के दशक में पहली फ़िल्म बनी 1971 में ’नाग पूजा’ शीर्षक से। 1962 में ’नाग देवता’ और 1966 में ’नाग मन्दिर’ निर्देशित करने का अनुभव रखने वाले निर्देशक शान्तिलाल सोनी को ’नाग पूजा’ निर्देशित करने का मौका दिया गया। उधर अभिनेत्री इंदिरा भी सांपों की फ़िल्मों में काफ़ी काम कर चुकी थीं। इस फ़िल्म में उनके साथ पी. जयराज, सुजीत कुमार, संजना, मोहन चोटी आदि कलाकार थे। फ़िल्म के निर्माता को बदलते दौर और दर्शकों के मिज़ाज का अंदाज़ा नहीं था और यह फ़िल्म बुरी तरह पिट गई। फ़िल्म के गीत-संगीत ने भी कोई कमाल नहीं दिखा सका। उषा खन्ना के संगीत में भरत व्यास और इरशाद के लिखे अधिकतर भक्ति रचनाओं की तरफ़ श्रोताओं ने ध्यान नहीं दिया। जिस फ़िल्म से सही मायने में नाग-नागिन की परम्परा हिन्दी फ़िल्मों में शुरू हुई, वह थी 1953 की फ़िल्म ’नाग पंचमी’। निरुपा रॉय अभिनीत यह फ़िल्म ख़ूब चली थी। इसके लगभग 20 साल बाद, 1972 में दोबारा इसी शीर्षक से निर्माता एन. डी. कोठारी ने एक पौराणिक फ़िल्म बनाने का निश्चय किया। निर्देशक के रूप में पौराणिक फ़िल्मों के जानेमाने निर्देशक बाबूभाई मिस्त्री को चुना गया। फ़िल्म में मुख्य भूमिकाएँ निभाईं श्री भगवान, मन्हर देसाई, वत्सला देशमुख, उमा दत्त, जयश्री गडकर, पृथ्वीराज कपूर, शशिकला, आशिष कुमार, जयश्री टी आदि ने। फ़िल्म की कहानी राजकुमारी बेहुला और महादेवी मनसा की पौराणिक कथा पर आधारित थी। नागलोक पर राज करने वाली महादेवी मनसा को पता चलता है कि वो भगवान शिव जी और माता पार्वती की पुत्री हैं। वो उनसे मिलने जाती हैं और उन्हें पता चलता है कि पूरी मानव जाति शिव जी के पूरे परिवार की पूजा करती है। जब महादेवी मनसा ने भी शिव जी से यह इच्छा जतायी कि उनकी भी पूजा हो, तब शिव जी ने उनसे कहा कि इसके लिए वो पहले महाराज चन्द्रधर से आज्ञा ले आए। महादेवी मनसा महाराज चन्द्रधर के पास जाती हैं लेकिन उन्हें पूजे जाने की आज्ञा नहीं ले पातीं। ग़ुस्से में आकर वो चन्द्रधर के सभी पुत्रों का वध कर देती हैं। होश आने पर वो चन्द्रधर को एक पुत्र (लक्ष्मेन्द्र) का पिता बनने का मौका देती हैं, और यह उम्मीद भी करती हैं कि लक्ष्मेन्द्र चन्द्रधर का मन-परिवर्तन करने में सक्षम होगा और महाराज चन्द्रधर उसे पूजने लगेंगे। लक्ष्मेन्द्र बड़ा होता है और उसका विवाह राजकुमारी बेहुला से होता है। अब भी चन्द्रधर मनसा की पूजा करने से मना कर देते हैं जिसकी वजह से ग़ुस्से में आकर मनसा लक्ष्मेन्द्र का वध कर देती हैं। अपने मृत पति को पुनर्जीवित करने के लिए बेहुला चार धामों (जगन्नाथ पुरी, रामेश्वरम, द्वारकाधीश, बद्रीनाथ) की यात्रा करती हैं, लेकिन मनसा उसे अंधा कर देती हैं और उसका मानसिक संतुलन बिगाड़ देती हैं ताकि वो अपने निर्जीव पति को कभी जीवित ना कर सके। 70 के दशक में इस रंगीन पौराणिक फ़िल्म की चर्चा ज़रूर हुई थी लेकिन फ़िल्म ज़्यादा चली नहीं। संगीतकार रवि और गीतकार इंदीवर ने गीत-संगीत के पक्ष पर अच्छा काम ज़रूर किया था। लता मंगेशकर की आवाज़ में "ऐ नागिन जा बस अपने द्वारे, मेरे पिया मेरे प्राणों से प्यारे..." फ़िल्म के उस मोड़ पर आती है जब लक्ष्मेन्द्र (आशिष कुमार) और बेहुला (जयश्री गडकर) के सुहाग-रात के कमरे में नागकन्या नैनत्री (जयश्री टी) आकर अपने नाग-पति के मृत्यु का बदला लेने की धमकी देती है, जिसके नाग-पति को लक्ष्मेन्द्र की रथ के पहिए के नीचे कूचल कर मृत्यु प्राप्त हुआ था। बेहुला इस गीत के माध्यम से नैनत्री से क्षमा की भीख माँग रही है। 1973 में फिर एक बार शान्तिलाल सोनी निर्देशित फ़िल्म आई ’नाग मेरे साथी’। सुजीत कुमार - संजना अभिनीत इस फ़िल्म का शीर्षक 1971 की फ़िल्म ’हाथी मेरे साथी’ से प्रेरित लगता है। संगीतकार एस. एन. त्रिपाठी 70 के दशक के आते आते प्रतियोगिता में पिछड़ चुके थे। भरत व्यास के शुद्ध हिन्दी आधारित गीतों की क़द्र करने वाले लोग फ़िल्म जगत में कम ही रह गए थे। इस फ़िल्म के गीतों में भरत व्यास और एस. एन. त्रिपाठी ख़ास कमाल नहीं दिखा सके, और यह उनकी नाग-नागिन की अन्तिम फ़िल्म सिद्ध हुई।

1954 की फ़िल्म ’नागिन’ के बाद अगर किसी नाग-नागिन की फ़िल्म को ब्लॉकबस्टर का दर्जा प्राप्त हुआ, तो वह थी 1976 की इसी शीर्षक से बनने वाली फ़िल्म। निर्माता-निर्देशक राजकुमार कोहली ने नाग-नागिन को पौराणिक कथाओं से निकाल कर एक रहस्य और रोमांच से भरपूर थ्रिलर फ़िल्म में ले आए। अपने ज़माने के एक से एक बड़े अभिनेताओं को लेकर 1976 की यह फ़िल्म ’नागिन’ ज़बरदस्त कामयाब फ़िल्म साबित हुई, जिसने नाग-नागिन पर बनने वाले फ़िल्मों की धारा को एक नया मोड़, एक नया आयाम दे दिया। जीतेन्द्र और रीना रॉय इस फ़िल्म में इच्छाधारी नाग और नागिन की भूमिकाओं में नज़र आए, और इस मल्टी-स्टारर फ़िल्म में उनके साथ थे सुनील दत्त, फ़िरोज़ ख़ान, संजय ख़ान, विनोद मेहरा, रेखा, मुमताज़, योगिता बाली, कबीर बेदी, अनिल धवन, रणजीत, प्रेमा नारायण, प्रेम नाथ और अरुणा इरानी प्रमुख। ’नागिन’ की कहानी दिलचस्प थी। इच्छाधारी नाग-नागिन की जोड़ी मानव रूप में प्रेमालाप कर रहे हैं। जैसे ही नाग फिर से नाग रूप में परिवर्तित हो जाता है, शिकारियों के दल का एक सदस्य उसे गोली मार देता है यह सोच कर कि वो उन्हें काटने जा रहा है। इसके बाद नागिन (रीना रॉय) कैसे अपने नाग की मृत्यु का बदला लेती है, यही है इस फ़िल्म की कहानी। कहानी के अन्त में केवल विजय (सुनील दत्त) को नागिन ज़िन्दा छोड़ती है और नागिन को अहसास होता है कि वो ग़लत थी और उसके बदले की भावना ने बहुत सी ज़िन्दगियों को बरबाद कर दिया, ठीक वैसे जैसे उसकी ज़िन्दगी बरबाद हुई है। अन्त में नागिन मर जाती है और स्वर्ग में पहुँच कर वो अपने नाग से मिल जाती है। फ़िल्म ’नागिन’ के गीत संगीत ने भी ख़ूब धूम मचाई। वर्मा मलिक के लिखे गीत और लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल का संगीत ज़ररदस्त हिट रहा। लता और महेन्द्र कपूर का गाया "तेरे संग प्यार मैं नहीं तोड़ना, चाहे तेरे पीछे जग पड़े छोड़ना" फ़िल्म का थीम-सॉंग् है जिस पर इच्छाधारी नाग-नागिन गाते, नृत्य करते, प्रेमालाप करते नज़र आते हैं। फ़िल्म के अन्य गीत भी मशहूर रहे, पर वो नाग-नागिन पर नहीं फ़िल्माये गए। 1979 में ’नागिन और सुहागन’ शीर्षक से एक फ़िल्म आई थी जिसकी तरफ़ किसी का ख़ास ध्यान नहीं गया। फिर एक बार यह शान्तिलाल सोनी निर्मित व निर्देशित फ़िल्म थी जिसमें विजय अरोड़ा और रीता भादुड़ी नायक-नायिका की भूमिकाओं में नज़र आए। इस फ़िल्म की कहानी भी लगभग उन्हीं पौराणिक फ़िल्मों की कहानियों जैसी ही है जिनमें नागकन्या के पति की मृत्यु फ़िल्म के नायक के हाथों ग़लतीवश हो जाती है और फिर नागिन बदला लेना चाहती है। ’नागिन’ की तरह यह फ़िल्म बड़ी बजट की फ़िल्म नहीं थी, और यह फ़िल्म नहीं चली। उषा खन्ना के संगीत में कवि प्रदीप का लिखा आरती मुखर्जी का गाया एक गीत है "ओ पाताल के राजा, मेरा दुखड़ा सुन लो राजा..."। इस गीत में पाताल के राजा नागराज से विनती और शिकायत की जा रही है - "मुझ पर है नसीबा रूठा, मुझ पर दुख पर्वत टूटा, मेरे बसे बसाये घर को एक नाग लुटेरे ने लूटा"।

80 के दशक के प्रथमार्ध में नाग-नागिन पर कोई फ़िल्म नहीं बनी। फ़िल्म निर्माताओं को लगा होगा कि यह शैली अब पुरानी हो चुकी है जो दर्शकों को अपनी ओर आकृष्ट कर पाने में असमर्थ है। 1976 में ’नागिन’ के सुपरहिट होने के बावजूद जब 1979 में ’नागिन और सुहागन’ पिट गई, तब फ़िल्मकारों ने इस विषय से दूर रहने में ही भलाई समझी। बार बार एक ही तरह की वही नागिन का अपने मरे हुए नाग की मृत्यु का इन्तकाम जैसी कहानियों की फ़िल्मों से एकरसता आ गई थी। लेकिन 1986 में इस शैली में फिर एक बड़ा मोड़ आया जब निर्माता-निर्देशक हरमेश मल्होत्रा श्रीदेवी को लेकर आए ’नगीना’ में। फ़िल्म की नायिका रजनी, एक इच्छाधारी नागिन है, जो कुछ दुष्ट सपेरों से अपने प्रेमी की मृत्यु का बदला लेने के लिए एक साधारण नागरिक से शादी करती है। यह फ़िल्म उस वर्ष की सफलतम फ़िल्मों में से एक थी जिसने दुनियाभर में 130 मिलियन रुपये का कारोबार किया, और 1986 की दूसरी बड़ी फ़िल्म सिद्ध हुई (पहली फ़िल्म थी अमिताभ बच्चन की ’आख़िरी रास्ता’)। 1983-84 में श्रीदेवी तेज़ी से स्टारडम की सीढ़ियाँ चढ़ती जा रही थीं। ’नगीना’ ने उन्हें पहली फ़ीमेल सुपरस्टार बना दिया और आज भी इस फ़िल्म में उनके अभिनय को उनकी श्रेष्ठ फ़िल्मों में गिना जाता है। इस फ़िल्म में हर कलाकार ने अपने अपने चरित्र को बख़ूबी निभाया। फ़िल्म के नायक राजीव (ॠषि कपूर) और उनकी माँ (सुषमा सेठ) अपने महल समान घर में रहते हैं। राजीव और रजनी (श्रीदेवी) एक दूसरे से प्यार करते हैं और शादी कर लेते हैं, लेकिन जल्द ही बिजली टूट पड़ती है जब सपेरों का मुखिया भैरो (अमरीश पुरी) उनके घर आकर राजीव की माँ को ख़बर देते हैं कि रजनी दरसल एक नागिन है। बीन बजा कर भैरो रजनी को सम्मोहित कर सबके सामने नाचने पर मजबूर कर देता है और यह सिद्ध हो जाता है कि वो नागिन है। रजनी घर से भाग निकलती है पर भैरो उसे पकड़ लेता है। भैरो को रजनी से उस मणि का पता लगवाना है जिसके मिलने पर वो दुनिया को अपनी मुट्ठी में कर सकता है। राजीव की मदद से रजनी भैरो ने चुंगल से बच निकलती है और सांपों के काटने से भैरो का अन्त होता है। राजीव और रजनी फिर ख़ुशी-ख़ुशी अपना जीवन व्यतीत करते हैं। आनन्द बक्शी के गीत और लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल का संगीत ज़बरदस्त हिट रहा। फ़िल्म के सभी पाँच गीत सुपरहिट। लेकिन सर्वाधिक लोकप्रिय गीत बना लता मंगेशकर का गाया "मैं तेरी दुश्मन, दुश्मन तू मेरा, मैं नागन तू सपेरा" जो फ़िल्म के क्लाइमैक्स का हिस्सा था। इस गीत और नृत्य को बॉलीवूड के श्रेष्ठ ’स्नेक डान्स नंबर’ में गिना जाता है। इस गीत का शुरुआती बीन संगीत भी यादगार रहा है। श्रीदेवी के नृत्य गीतों में यह शीर्ष पर विराजमान है और iDiva ने इसे "the stuff of movie legends" कह कर सम्मानित किया है। इस गीत से जुड़ा एक विवाद भी है। शुरू में इस गीत को अनुराधा पौडवाल की आवाज़ में रिकॉर्ड किया गया था, लेकिन फ़िल्म के रिलीज़ से पहले इसे लता मंगेशकर से गवाया गया जो अनुराधा पौडवाल को "unethical" लगा। ख़ैर, हक़ीक़त यही है कि आज तक ’नगीना’ सांपों पर बनने वाली फ़िल्मों में एक बहुत ऊंचा मकाम रखती है। 2013 में श्रीदेवी को फ़िल्मफ़ेअर पुरस्कार के तहत उनके ’नगीना’ और ’मिस्टर इंडिया’ में शानदार अभिनय के लिए एक विशेष पुरस्कार से सम्मानित किया गया। यह शायद इसलिए दिया गया क्योंकि 1987 और 1988 में फ़िल्मफ़ेअर पुरस्कार का आयोजन नहीं हुआ, जिस वजह से इन दोनों सालों की फ़िल्मों को पुरस्कृत नहीं किया जा सका था। अगर किया गया होता तो ’नगीना’ के लिए श्रीदेवी सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के पुरस्कार के बहुत क़रीब होतीं। 1989 में ’नगीना’ की सीकुइल फ़िल्म बनी ’निगाहें’ जिसमें राजीव और रजनी की बेटी के रूप में फिर एक बार श्रीदेवी ही नज़र आईं और उनके नायक बने सनी देओल। यह हिन्दी फ़िल्म इतिहास की पहली सीकुइल फ़िल्म थी। हालांकि यह फ़िल्म बॉक्स ऑफ़िस पर नाकामयाब रही, पर फ़िल्म के गीत-संगीत ख़ासा लोकप्रिय रहा। एक बार फिर आनन्द बक्शी और लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल के गीत सर चढ़ कर बोले। और ख़ास बात यह कि इस फ़िल्म में दो गीत सांपों की पार्श्व पर बने - अनुराधा पौडवाल का गाया "किसे ढूंढ़ता है पागल सपेरे, मैं तो सामने खड़ी हूँ तेरे" और कविता कृष्णमूर्ति का गाया "खेल वही फिर आज तू खेला, पहले गुरु आया अब चेला", जो ’नगीना’ के "मैं तेरी दुश्मन..." का ही विस्तार है। गीत अन्तरे से ही शुरू होता है और मुखड़े पर आकर "मैं नागन तू सपेरा" से ख़त्म होता है। इस गीत और इस गीत पर श्रीदेवी के नृत्य को वह लोकप्रियता नहीं मिली जो "मैं तेरी दुश्मन" को मिली थी। समालोचक इसके दो कारण बताते हैं - पहला कारण, इस गीत को लता मंगेशकर से गवाया जाना चाहिए था, दूसरा कारण, इस गीत की कोरियोग्राफ़ी ’नगीना’ के कोरियोग्राफ़ी से कमज़ोर थी। 

’नगीना’ के बाद फिर एक बार फ़िल्मकारों में नाग-नागिन पर फ़िल्में बनाने की होड़ सी लग गई। 1988 में ’नागिन के दो दुश्मन’ शीर्षक से एक सी-ग्रेड फ़िल्म आई थी जिसमें जयश्री टी. ने अभिनय किया था। लक्ष्मी किरण फ़िल्म की संगीतकार थीं। 1989 में वी. मेनन निर्देशित फ़िल्म बनी ’तू नागन मैं सपेरा’ जो ’नगीना’ के गीत के मुखड़े से प्रेरित था। सोनिका गिल, सुमीत सहगल, श्रीप्रदा अभिनीत इस फ़िल्म की कहानी भी ’नगीना’ की कहानी के इर्द-गिर्द घूमती ही महसूस हुई। अनवर उसमान का संगीत और महेन्द्र दहल्वी के गीत लोकप्रिय नहीं हुए। अनुराधा पौडवाल की आवाज़ में "ओ सपेरे मेरे दुश्मन, तेरी दुश्मन हूँ मैं नागन, तूने मारा है मेरा साजन, तुझको मारेगी अब ये नागन" गीत कोई कमाल नहीं दिखा सकी। 1990 में कुल पाँच फ़िल्में बनीं नाग-नागिन पर।  श्रीदेवी को नागिन के रूप में देखने के बाद कई बड़े फ़िल्मकार और अभिनेत्रियों के मन में भी इस शैली की फ़िल्में बनाने और उनमें काम करने का विचार आया। सदाबहार अभिनेतेरी रेखा को लेकर फ़िल्म बनी ’शेषनाग’। फ़िल्म बड़ी बजट की थी और रेखा के अलावा इस फ़िल्म में जीतेन्द्र, ॠषि कपूर, मंदाकिनी, माधवी जैसे कलाकार थे। अमरीश पुरी की जगह दुष्ट सपेरे का किरदार इस फ़िल्म में डैनी ने निभाया। कहानी ’नगीना’ से अलग ज़रूर थी, लेकिन यह फ़िल्म ’नगीना’ जैसा कमाल नहीं दिखा पाया। आनन्द बक्शी - लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल के गीतों में भी "छेड़ मिलन के गीत रे मितवा" (अनुराधा - सुरेश) के अलावा कोई भी गीत लोकप्रिय नहीं हुआ। रेखा के बाद उस दौर की एक और जानीमानी अभिनेत्री मीनाक्षी शेशाद्री ने भी नागिन की भूमिका निभाई ’नाचे नागिन गली गली’ फ़िल्म में। बी. के. जैसवाल के इस फ़िल्म में नायक बने नितिश भारद्वाज (जिन्होंने दूरदर्शन के ’महाभारत’ में श्रीकृष्ण का चरित्र निभाया था)। यह फ़िल्म भी ’नगीना’ के आगे टिक नहीं सकी। अनजान के गीत और कल्याणजी-आनन्दजी के संगीत में फ़िल्म का एक ही गीत कुछ समय तक रेडियो पर गूंजता सुनाई दिया - "नाचे नागिन गली गली, तेरी याद में सजना गली गली" (साधना सरगम)। लेकिन फ़िल्म में दम नहीं था और लोगों ने बहुत जल्द इस फ़िल्म को भुला दिया। ’शेषनाग’ की सह-अभिनेत्री मंदाकिनी को मुख्य नागिन की भूमिका में भी उतारा गया था इसी साल। फ़िल्म ’राम तेरी गंगा मैली’ के स्टार कास्ट (राजीव कपूर, मंदाकिनी, रज़ा मुराद और विजेता पंडित) को लेकर रामकुमार बोहरा ने ’नाग नागिन’ बनाई, लेकिन फ़िल्म बुरी तरह असफल रही और साल की सबसे बड़ी फ़्लॉप फ़िल्म सिद्ध हुई। संगीतकार लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल और गीतकार संतोष आनन्द भी फ़िल्म को बचा नहीं सके। फ़िल्म का कविता कृष्णमूर्ति - नितिन मुकेश का गाया "मैं नाग तू नागिन, नहीं जीना तेरे बिन" में कोई नई बात नहीं थी और बीन संगीत भी वही जाना पहचाना ’नगीना’ शैली का। 80 के दशक तक नाग-नागिन पर बनने वाली फ़िल्मों के शीर्षक में भी नाग-नागिन-नगीना का उल्लेख होता था। लेकिन 90 के दशक के आते-आते इस तरह के शीर्षक इतने ज़्यादा बार प्रयोग हो चुके थे कि अब फ़िल्मकार नाग-नागिन-सपेरे की कहानियों के शीर्षक साधारण फ़िल्मों के शीर्षक जैसे रखने लगे। 1990 में आमिर ख़ान - जुही चावला अभिनीत फ़िल्म आई ’तुम मेरे हो’। ’क़यामत से क़यामत तक’ के बाद आमिर-जुही की जोड़ी सर चढ़ कर बोल रही थी उन दिनों। ताहिर हुसैन (आमिर ख़ान के पिता) ने इस फ़िल्म को निर्देशित किया, लेकिन बॉक्स ऑफ़िस पर फ़िल्म असफल रही। सिर्फ़ कामयाब जोड़ी अगली फ़िल्म को भी कामयाब बना दे यह ज़रूरी नहीं। इस फ़िल्म में आमिर ख़ान शिवा नामक सपेरा है जिसे सांपों को वश में करने के जादूई शक्ति प्राप्त है। वो और पारो (जुही चावला) एक दूसरे से प्यार करते हैं दोनों के प्रभावशाली पिताओं की मर्ज़ी के ख़िलाफ़। उधर शिवा के पिता ने शिवा के बालपन में एक इच्छाधारी नागिन की हत्या कर दी थी जिस वजह से नागिन की माँ ने उससे बदला लेने का वचन लिया था। क्या नागिन शिवा को मार कर अपना वचन निभा पाती है, यही थी ’तुम मेरे हो की कहानी’। फ़िल्म फ़्लॉप होने के बावजूद ’क़यामत से क़यामत तक’ के गीतकार-संगीतकार जोड़ी मजरूह - आनन्द-मिलिंद ने सुरीले गीत रचे और फ़िल्म के गीत हिट हुए। हालांकि इसमें सांपों पर कोई गीत नहीं था, लेकिन "जब से देखा तुमको यारा" (उदित-अनुपमा), "जतन चाहे जो करले" (उदित-साधना), "शीशा चाहे टूट भी जाए" (उदित), "आसमां से गिरे खजूर पे अटके" (अनुराधा) जैसे गीत उस ज़माने में ख़ूब चले थे। 

1990 की एक और फ़िल्म थी ’दूध का कर्ज़’। सलीम अख़्तर की इस फ़िल्म में जैकी श्रॉफ़ और नीलम थे मुख्य भूमिकाओं में। फ़िल्म की कहानी नाग-नागिन की कहानी तो नहीं थी, लेकिन सांपों के पार्श्व पर ज़रूर थी। सपेरन पार्वती (अरुणा इरानी) अपने नवजात पुत्र सूरज (जैकी श्रॉफ़)के साथ अपने पति को तीन दरिंदों द्वारा चोरी के झूठे इलज़ाम पर पीट पीट कर मारते हुए देखा। पार्वती अपने पति की चिता की अग्नि को छू कर शपथ लेती है उन दरिंदों को उचित सज़ा दिलवाने की। वो सूरज और एक सांप को पालती है। धर्मा लोहार इसमें उनकी मदद करता है। बड़ा होने पर सूरज को रेशमा (नीलम) से प्यार हो जाता है जिसे वो एक सांप के काटने पर उसके ज़हर से बचाता है। जब पार्वती अपने पति के क़ातिल गंगु को मार कर अपना बदला पूरा करने का सोचती हैं, तब उसे पता चलता है कि सूरज की प्रेमिका रेशमा दरसल गंगु की ही बेटी है। आनन्द बक्शी और अनु मलिक की जोड़ी के रचे गीतों ने धूम मचा दी। हालांकि मोहम्मद अज़ीज़ और अनुराधा पौडवाल के गाए "तुम्हें दिल से कैसे जुदा हम करेंगे" और "शुरू हो रही है प्रेम कहानी" फ़िल्म के लोकप्रियतम गीत रहे, सांप और सपेरे पर भी दो गीत थे - "बीन बजाता जा सपेरे बीन बजाता जा, छम छम नाचती जाऊं मैं, तू मुझे नचाता जा" (अनुराधा) और "बीन बजाऊँ तुझे बुलाऊँ, तेरे बदले मैं मर जाऊँ"। 1989 में वी. मेनन ने ’तू नागन मैं सपेरा’ निर्देशित किया था जिसमें सुमीत सहगल नायक थे और सोनिका गिल व श्रीप्रदा नायिकाएँ थीं। 1991 में वी. मेनन ने सुमीत सहगल को ही नायक लेकर बनाई म्युज़िकल फ़िल्म ’नाग मणि’। नायिका के रूप में दिखीं शिखा स्वरूप। दुष्ट सपेरे और नाग मणि की तलाश के बीच नायक-नायिका की मधुर प्रेम कहानी वाली यह फ़िल्म कामयाब रही। फ़िल्म का सर्वाधिक शक्तिशाली पक्ष था इसका गीत-संगीत। अनु मलिक के संगीत में संतोष आनन्द के लिखे गीत बेहद लोकप्रिय हुए। टी-सीरीज़ और अनुराधा पौडवाल उन दिनों मेलडियस गीतों का पर्याय बन गए थे। यह फ़िल्म भी उन्हीं टी-सीरीज़ म्युज़िकल फ़िल्मों में से एक थी। बस अफ़सोस एक ही बात का है कि इस फ़िल्म में नाग-नागिन-सपेरे का कोई गीत नहीं था। 1991 में सलिल परिदा निर्मित व जग मुंध्रा निर्देशित फ़िल्म आई थी ’विषकन्या’ जो पूजा बेदी के बोल्ड दृश्यों की वजह से विवादों में घिर गई थी। यह फ़िल्म भी बदले की कहानी है। निशा (पूजा बेदी) अपने माता-पिता (कबीर बेदी - मुनमुन सेन) की मौत का बदला लेने के लिए एक तांत्रिक से सांप का ज़हर युक्त गोली खा कर विष कन्या बन जाती है। चर्चा में रहने के बावजूद दर्शकों के दिल को छू नहीं सकी यह फ़िल्म और बप्पी लाहिड़ी का संगीत और सैयद गुलरेज़ के गीत कोई कमाल नहीं दिखा सके। पाँच वर्षों के बाद 1996 में गौतम भाटिया निर्मित व निर्देशित कम बजट की फ़िल्म ’हसीना और नगीना’ आई जिसमें किरण कुमार और एकता सोहिनी मुख्य कलाकार थे। फ़िल्म कब आई कब गई पता भी नहीं चला। दिलीप सेन - समीर सेन के संगीत में शोभा जोशी और कविता कृष्णमूर्ति का गाया "मैं हूँ एक हसीना मैं हूँ एक नगीना" में पंक्ति है "नागिन सी बलखाके लहराऊंगी, छेड़ेगा मुझको तो डस जाऊंगी, मैं मार दूंगी या मर जाऊंगी, मैं आज हद से गुज़र जाऊंगी"।

21-वीं सदी आ गई। हालांकि इस नए दौर में नाग-नागिन पर बनने वाली फ़िल्मों की संख्या कम होती जा रही थी, सिलसिला पूरी तरह से ख़त्म नहीं हुई। वर्ष 2000 में दक्षिण की एक डब की हुई फ़िल्म हिन्दी में प्रदर्शित हुई ’एक वरदान नगीना’ शीर्षक से। साई किरण, प्रभाकर, प्रेमा और मल्लिकार्जुन राव अभिनीत यह फ़िल्म थी। 2002 की फ़िल्म ’जानी दुश्मन’ एक डार्क फ़ैन्टसी ऐक्शन फ़िल्म थी। इस मल्टी-स्टारर फ़िल्म में अक्षय कुमार, अरमान कोहली, मनीषा कोयराल, सनी देओल, सुनील शेट्टी, आफ़ताब शिवदासानी, शरद कपूर, सोनू निगम और अरशद वारसी जैसे कलाकार थे। जहाँ तक सांपों की बात है, फ़िल्म की एक नायिका दिव्या (मनीषा कोयराला) को पिछले जनम की बातें याद आती हैं कि उस जनम में वो कपिल (अरमान कोहली) नामक इच्छाधारी नाग से प्यार करती थी। जब इस जनम में दिव्या का कुछ लोग बलात्कार करते हैं जिस वजह से वो आत्महत्या कर लेती है, तब कपिल पुनर्जीवित हो उठता है और इच्छाधारी नाग के शक्तियों से बदला लेता है। 2004 में एक फ़िल्म प्रद्रशित हुई थी ’हत्या’ जिसमें अक्षय कुमार थे। दरसल यह फ़िल्म बहुत पहले की बनी हुई थी, जिसे बरसों बाद 2004 में रिलीज़ कर दिया गया। इस फ़िल्म में अक्षय कुमार को एक इच्छाधारी नाग में परिणत होते हुए दिखाया गया। फ़िल्म में नायिका थीं वर्षा उसगाँवकर और संगीतकार थे नदीम-श्रवण। 2008 में ’Heaven on Earth' शीर्षक से दीपा मेहता की एक कनाडियन फ़िल्म आई थी जिसे भारत में ’विदेश’ शीर्षक से प्रदर्शित की गई थी। प्रीति ज़िंटा और वंश भारद्वाज अभिनीत इस फ़िल्म की कहानी सीधे सीधे सांप की कहानी तो नहीं है, लेकिन नायिका, जिसने बचपन में नाग-नागिन की एक लोकगाथा सुन रखी होती है, उसे शादी के बाद ससुराल में अत्याचारी पति के दुर्व्यवहार की वजह से बार बार बचपन में सुनी हुई वह सांप की लोक-कथा याद आती रहती है, जो उसके जीवन को प्रभावित करती है। हिन्दी फ़िल्मों में सांपों पर बनने वाली फ़िल्मों की श्रॄंखला 2010 में जा कर ख़त्म हो जाती है फ़िल्म ’हिस्स्स’ से। यह एक ऐडवेंचर-हॉरर फ़िल्म थी जिसका निर्देशन किया था Jennifer Chambers Lynch ने। वही जानी-पहचानी इच्छाधारी नागिन की कहानी, लेकिन इस बार एक नए आधुनिक अंदाज़ में पेश की गई जिसमें मुख्य किरदार मल्लिका शेरावत ने निभाई। फ़िल्मों के तकनीकी विकास के साथ-साथ कई असंभव दृश्यों को दिखाना अब आसान काम हो गया था। इस फ़िल्म में मल्लिका शेरावत के इंसान से नागिन बनने का दृश्य बड़ा डरावना दिखाई देता है। अनु मलिक के संगीत निर्देशन में इस फ़िल्म के गीत भी आधुनिक शैली के रहे। "मैं नागिन तू सपेरा" में ना उलझ कर अबकि बार है "I got that poison" (श्वेता पंडित) और "I have been here before" (श्रुति हासन) जैसे गीत।

वर्तमान दशक में अभी तक बॉलीवूड में कोई भी फ़िल्म सांपों के पार्श्व पर नहीं बनी है। इस तरह से 1933 में ’ज़हरी सांप’ से जो सिलसिला शुरू हुआ था, वह 2010 में ’हिस्स्स’ तक आकर रुक गया। लेकिन जब जब इस तरह की फ़िल्मों की बात चलेगी, तब जो तीन फ़िल्में सबसे पहले याद आएंगी, वो हैं ’नागिन’ (1954), 'नागिन’ (1976), और 'नगीना’ (1986)।


आख़िरी बात

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शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 



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