शनिवार, 7 अक्तूबर 2017

चित्रकथा - 39: शकीला पर फ़िल्माए हुए दस सदाबहार गीत

अंक - 39

अभिनेत्री शकीला को श्रद्धांजलि


शकीला पर फ़िल्माए हुए दस सदाबहार गीत 




20 सितंबर 2017 को गुज़रे ज़माने की सुप्रसिद्ध अभिनेत्री शकीला का 82 वर्ष की आयु में निधन हो गया। 1 जनवरी 1936 को जन्मीं शकीला के पूर्वज अफ़गानिस्तान और ईरान के शाही खानदान से ताल्लुक रखते थे। राजगद्दी पर कब्ज़े के खानदानी झगड़ों में शकीला के दादा-दादी और माँ मारे गए थे। शकीला तीन बहनों में सबसे बड़ी थी और तीनों बच्चियों को साथ लेकर उनके पिता और बुआ जान बचाकर मुम्बई भाग आए थे। शकीला की उम्र उस वक़्त क़रीब 4 साल की थी। शकीला के पिता भी बहुत जल्द गुज़र गए। उनकी बुआ फ़िरोज़ा बेगम ज़िंदगी भर अविवाहित रह कर तीनों अनाथ भतीजियों का पालन पोषण किया। ए. आर. कारदार और महबूब ख़ान जैसे फ़िल्मकारों के साथ पारिवारिक सम्बन्ध होने की वजह से एक बार कारदार ने ही शकीला को फ़िल्म ‘दास्तान’ में एक 13-14 साल की लड़की का रोल करने को कहा था और इस तरह साल 1950 में प्रदर्शित हुई फिल्म ‘दास्तान’ से शकीला का अभिनय सफ़र शुरू हो गया। और बहुत जल्द एक सशक्त अभिनेत्री के रूप में वो उभर कर सामने आयीं। आइए आज ’चित्रकथा’ के इस श्रद्धांजलि अंक में शकीला जी पर फ़िल्माए गए दस सदाबहार फ़िल्मी गीतों की बातें करे। आज का यह अंक समर्पित है शकीला जी की पुण्य स्मृति को।

शकीला
(1 जनवरी 1936 - 20 सितंबर 2017)



गीत-1: बाबूजी धीरे चलना, प्यार में ज़रा संभलना

1954 की फ़िल्म ’आर पार’ के इसी कामोत्तेजक गीत ने शकीला को रातों रात स्टार बना दिया था। ओ. पी. नय्यर का दिलकश संगीत और गीता दत्त की नशीली गायकी, और उस पर शकीला के मनमोहक अभिनय ने इस गीत को अमर बना दिया और आज 60 बरस बाद भी यह गीत उसी चाव से सुना जाता है जैसा उस ज़माने में सुना जाता था। मज़े की बात यह है कि इस गीत का संगीत नय्यर साहब की मूल रचना नहीं है, बल्कि एक पाश्चात्य धुन पर आधारित है जिसे समय समय पर अलग अलग बोलों के साथ गाया गया है। उदाहरत: डॉरिस डे ने इसे “perhaps perhaps” गाया था और नैट कोल ने इसे “quizas quizas quizas” गाया था। नय्यर साहब ने इस धुन का ऐसा भारतीय फ़िल्मीकरण किया कि हर किसी ने इसे हाथों हाथ ग्रहण किया। ’आर पार’ गुरु दत्त की हल्के-फुल्के चरित्र वाले फ़िल्मों में से एक है। इसमें दो अभिनेत्रियाँ थीं - श्यामा और शकीला, और जैसा कि हमने उपर बताया है कि यह गीत शकीला पर फ़िल्माया गया है जिन्होंने उस फ़िल्म में दूसरी नायिका का किरदार निभाया जो आंशिक रूप से खलनायिका भी हैं।


गीत-2: हूँ अभी मैं जवान ऐ दिल

फ़िल्म ’आर पार’ में ही शकीला पर फ़िल्माया एक और सेन्सुअस गीत है "हूँ अभी मैं जवान ऐ दिल, ख़ामोश हूँ बिन पीये, कल का है ग़म किसलिए"। अगर हमारी ऐसी धारणा है कि फ़िल्मों में किसी नारी चरित्र द्वारा मद्यपान का दृश्य 60 के दशक से शुरू हुआ था तो यह ग़लत धारणा है। 50 के दशक से ही इसका चलन शुरू हो चुका था। यह गीत इसका प्रमाण है। मदिरा के नशे में धुत शकीला और चेन स्मोकर गुरु दत्त इस गीत में नज़र आते हैं। उस ज़माने में सिगरेट के दृश्यों को फ़ैशनेबल माना जाता था, इसलिए कई क्लब गीतों में सिगरेट के धुएँ के दृश्य रखे जाते थे। इन दोनो ही गीतों में शायर मजरूह सुल्तानपुरी ने एक सिड्युसिव क्लब डान्सर के जज़बात को बख़ूबी उजागर किया है। सबसे ख़ास बात यह है कि ये गीत कामोत्तेजक, कामुक, आकर्षण-युक्त होते हुए भी अश्लील बिल्कुल नहीं है। और यही बात इन गीतों को अमर बनाता है। क्या सुन्दर अदाकारी है शकीला की इस गीत में। इसमें कोई संदेह नहीं है कि इस गीत के पीछे मजरूह, नय्यर और गीता दत्त का जितना योगदान है, परदे पर इसे सजीव करने में शकीला का भी उतना ही योगदान है।


गीत-3: आँखों ही आँखों में इशारा हो गया

फ़िल्म ’आर पार’ की सफलता के बाद जैसे मजरूह, नय्यर, गीता दत्त और गुरु दत्त की एक टीम ही बन गई थी। दो साल बाद 1956 में आई अगली हिट फ़िल्म ’सी. आइ. डी’ जिसके गीत-संगीत ने एक बार फिर से तहल्का मचा दिया। इस बार फ़िल्म के नायक गुरु दत्त नहीं बल्कि देव आनन्द थे और शकीला ही एकमात्र नायिका थीं। यूं तो इस फ़िल्म के सभी गीत सुपरहिट हैं, देव आनन्द और शकीला पर फ़िल्माया गया युगल गीत "आँखों ही आँखों में इशारा हो गया" एक ख़ास मुकाम रखता है। यह गीत इसलिए भी ख़ास है क्योंकि यह इस फ़िल्म का एकमात्र ऐसा गीत है जो फ़िल्म के नायक और नायिका, दोनों पर फ़िल्माया गया है। नय्यर और गीता दत्त की जोड़ी का वह सुनहरा दौर था और दोनों मिल के एक के बाद एक हिट गीत देते चले जा रहे थे। रफ़ी तो थे ही कैम्प में। और हाँ, एक और ख़ास बात इस गीत से जुड़ी, वह यह कि इस फ़िल्म के सभी गीत मजरूह ने लिखे थे सिवाय इस गीत के जिसे लिखा था जाँ निसार अख़्तर ने। एक हल्का-फुल्का चुलबुला सा गीत, लेकिन बहुत ही असरदार और सदाबहार! देव आनन्द और शकीला की अदाकारी ने इस गीत का मुकाम और बुलन्द कर दिया।


गीत-4: बार बार देखो हज़ार बार देखो

गुरु दत्त और देव आनन्द के बाद अब एक ऐसा गीत जिसमें शकीला के नायक हैं शम्मी कपूर। यह तो सर्वविदित है कि शम्मी कपूर के हर फ़िल्म के गाने सुपरहिट हुआ करते थे और वो ख़ुद फ़िल्म के निर्माण के दौरान फ़िल्म के गीतों पर कड़ी नज़र रखते थे। 1962 की फ़िल्म ’चाइना टाउन’ में शम्मी कपूर पर फ़िल्माया गीत "बार बार देखो हज़ार बार देखो" एक सदाबहार नग़मा है जिसकी चमक आज तक कम नहीं हो पायी है। और इस गीत में बार बार, हज़ार बार जिस चेहरे को देखने को कहा जा रहा है, वह चेहरा है शकीला का। जी हाँ, शम्मी कपूर की नायिका शकीला इस गीत में पार्टी में नज़र आती हैं और शम्मी कपूर पार्टी की मध्यमणि के रूप में डान्स करते हुए, झूमते हुए यह गीत गा रहे हैं। शकीला उनके इस अंदाज़ से शर्मा रही है, अजीब महसूस कर रही है। शक्ति सामन्त की इस फ़िल्म में संगीतकार हे रवि और इस फ़िल्म में कुल दस गीत थे लेकिन इस गीत को जितनी शोहरत हासिल हुई, वह शोहरत फ़िल्म के अन्य गीतों को नहीं मिली।


गीत-5: नींद ना मुझको आए, दिल मेरा घबराए

1958 की फ़िल्म ’पोस्ट बॉक्स 999' में कई बेहद ख़ूबसूरत गीत हुए। इनमें से एक गीत है हेमन्त कुमार और लता मंगेशकर का गाया - "नींद ना मुझको आए, दिल मेरा घबराए, चुपके चुपके कोई आके सोया प्यार जगाए..."। दिल को सुकून से भर देने वाला यह गीत फ़िल्माया गया था शकीला और सुनिल दत्त पर। प्यारेलाल संतोषी के बोलों को सुरीली धुनों से सजाया था संगीतकार जोड़ी कल्याणजी-आनन्दजी ने जो उन दिनों इंडस्ट्री में नए नए स्वतंत्र संगीतकार बने थे। गीत का सिचुएशन कुछ ऐसा है कि नायक और नायिका एक दूसरे से जुदा हैं और रात को दोनों को ही नींद नहीं आ रही है एक दूसरे की याद में। बिस्तर पर लेटी शकीला की क्या ख़ूबसूरत मासूम अदाएँ हैं इस गीत में| फ़िल्म संगीत के इतिहास की यह कालजयी रचना ’विविध भारती’ पर अक्सर आज भी सुनने को मिल जाती है। और क्यों ना मिले, एक एवरग्रीन रोमान्टिक डुएट जो ठहरी!


गीत-6: सौ बार जनम लेंगे, सौ बार फ़ना होंगे

शकीला ने अपने ज़माने के सभी छोटे-बड़े नायकों के साथ काम किया है। गुरु दत्त, देव आनन्द, शम्मी कपूर और सुनिल दत्त की बात हम कर चुके हैं। 1963 की फ़िल्म ’उस्तादों के उस्ताद’ में शकीला अभिनेता प्रदीप कुमार की नायिका बनीं। हिन्दी फ़िल्मों के इतिहास में कई हौन्टिंग् गीत ऐसे बने हैं जो फ़िल्माया गया है नायक के उपर, लेकिन पार्श्व में एक महिला कंठ का गीत बज रहा होता है जैसे कि ’गुमनाम’, ’बीस साल बाद’, ’कोहरा’ आदि फ़िल्मों में हमने देखा है। लेकिन इस गीत में मामला उल्टा है। गीत रफ़ी साहब की आवाज़ में है लेकिन फ़िल्माया गया है शकीला पर जो इस गीत में एक जलप्रपात के पास टहलती हुईं दिखती हैं। सस्पेन्स थ्रिलर फ़िल्मों के थीम सॉंग् ही की तरह यह गीत है जो मर कर भी जुदा ना होने की बात कहता है। एक अजीब से हलचल, रहस्य और दर्द पैदा करता है यह गीत। असद भोपाली की गीत रचना और रवि का संगीत, निस्सन्देह यह रफ़ी साहब के गाए अमर गीतों में से एक है।


गीत-7: लागी छूटे ना अब तो सनम चाहे जाए जिया तेरी क़सम

1959 की फ़िल्म ’काली टोपी लाल रूमाल’ में शकीला के नायक बने चन्द्रशेखर। फ़िल्म में कुमकुम ने भी अभिनय किया।फ़िल्म कम बजट की थी, लेकिन मजरूह के गीतों और चित्रगुप्त के संगीत से सजे फ़िल्म के गीतों से फ़िल्म को अमर बना दिया। "दगा दगा वई वई वई" के अलावा एक लता-रफ़ी डुएट "लागी छूटे ना अब तो सनम चाहे जाए जिया तेरी क़सम..." ख़ासा लोकप्रिय हुआ जो शकीला-चन्द्रशेखर पर फ़िल्माया गया था। यहाँ फ़िल्म की अन्य अभिनेत्री कुमकुम का भी उल्लेख करना ज़रूरी है क्योंकि उनका शकीला के साथ एक समानता रही है और वह यह कि 1954 की फ़िल्म ’आर पार’ में ही गुरु दत्त ने शकीला के साथ साथ कुमकुम को भी उनका पहला बड़ा ब्रेक दिया था और फ़िल्म का लोकप्रिय गीत "कभी आर कभी पार लागा तीर-ए-नज़र" उन पर फ़िल्माया गया। कुमकुम और शकीला 1956 की फ़िल्म ’सी.आइ.डी’ में भी साथ-साथ नज़र आयीं।


गीत-8: ऐ मेरे दिल-ए-नादाँ, तू ग़म से ना घबराना

1962 की फ़िल्म ’टावर हाउस’ एक सस्पेन्स थ्रिलर फ़िल्म थी। ’उस्तादों के उस्ताद’ फ़िल्म की तरह इस फ़िल्म में शकीला नायिका थीं, गीतकार थे असद भोपाली और संगीतकार रवि। उस ज़माने में इस तरह की फ़िल्मों में लता मंगेशकर का गाया एक हौन्टिंग् गीत ज़रूर होता था जैसे कि "कहीं दीप जले कहीं दिल", "गुमनाम है कोई", "नैना बरसे रिमझिम रिमझिम", "आएगा आनेवाला", "झूम झूम ढलती रात" वगेरह। इस तरह के गीतों में दर्द, जुदाई और इन्तज़ार के अंडरकरण्ट बहती हैं। इसी बात को ध्यान में रखते हुए असद भोपाली ने इस फ़िल्म के लिए लिखा "ऐ मेरे दिल-ए-नादाँ, तू ग़म से ना घबराना, एक दिन तो समझ लेगी दुनिया तेरा अफ़साना"। हालाँकि इस गीत को उस वर्ष के ’बिनाका गीतमाला’ में कोई स्थान नहीं मिला था, लेकिन अच्छे संगीत के रसिक आज भी इस गीत को बहुत सम्मान के साथ सुनते हैं। यह फ़िल्म असफल सिद्ध हुई, लेकिन आज अगर इस फ़िल्म को लोगों ने याद रखा है तो सिर्फ़ और सिर्फ़ इस एक गीत की वजह से।


गीत-9: दिल को लाख सम्भाला जी, फिर भी दिल मतवाला जी

1959 की फ़िल्म ’गेस्ट हाउस’ में अजीत और शकीला मुख्य कलाकार थे। प्रेम धवन के गीत और चित्रगुप्त के संगीत ने आज तक इस असफल फ़िल्म को ज़िन्दा रखे हुए हैं। फ़िल्म इंडस्ट्री में कोई भी कलाकार बहुत जल्दी टाइपकास्ट हो जाता है और शकीला के साथ भी यही हो रहा था। एक के बाद एक सस्पेन्स और मिस्ट्री वाली फ़िल्मों में उन्हें काम मिल रहा था। ’गेस्ट हाउस’ भी ऐसी ही एक फ़िल्म थी। इस फ़िल्म के बाक़ी के गीत लोकप्रिय नहीं हुए पर फ़िल्म का एक गीत आज तक ज़िन्दा है - "दिल को लाख सम्भाला जी, फिर भी दिल मतवाला जी, कल तक मेरा था अज वो तेरा हो गया"। पहले पहले प्यार की अनुभूति से सजा यह गीत जब भी सुने दिल को प्रसन्न कर जाता है।


गीत-10: ज़ुल्फ़ों की घटा लेकर सावन की परी आई

’काली टोपी लाल रूमाल’ के बाद ’रेशमी रूमाल’ नामक फ़िल्म भी जल्द ही बन गई। साल था 1961। अब की बार शकीला के हीरो बने मनोज कुमार। शराब के बुरे असर की सबक पर आधारित यह फ़िल्म व्यावसायिक रूप से ख़ास नहीं चली थी पर संगीतकार बाबुल और गीतकार योगेश की जोड़ी ने इस फ़िल्म में कुछ बेहद कर्णप्रिय रचनाएँ हमें दी। उनमें से एक है मन्ना डे और आशा भोसले का गाया "ज़ुल्फ़ों की घटा लेकर साव की परी आई" जो शकीला और मनोज कुमार पर ही फ़िल्माया गया। एक तरफ़ नवोदित मनोज कुमार की ख़ूबसूरती और पौरुष और दूसरी तरफ़ शकीला की मनमोहक अदाएँ और अंदाज़, बड़ा ही मसूम और सुन्दर अभिव्यक्ति दोनों अदाकारों की इस गीत में। यह सच है कि बतौर नायिका शकीला की अधिकतर फ़िल्में ही बॉक्स ऑफ़िस पर पिट गईं, लेकिन उन फ़िल्मों में कुछ गीत ऐसे आए जो इतने कामयाब रहे कि उन्हीं की वजह से आज तक लोगों ने उन फ़िल्मों को याद रखा है। ऐसी ही दस सदाबहार नग़मों को और थोड़ा करीब से हमने जाना जिनका फ़िल्मांकन शकीला पर हुआ था। ’रेडियो प्लेबैक इंडिया’ की ओर से स्वर्गीया शकीला जी को विनम्र नमन!


आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!




शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

सोमवार, 2 अक्तूबर 2017

फिल्मी चक्र समीर गोस्वामी के साथ || एपिसोड 08 || मजरूह सुल्तानपुरी

Filmy Chakra

With Sameer Goswami 
Episode 08
Majrooh Sultanpuri

फ़िल्मी चक्र कार्यक्रम में आप सुनते हैं मशहूर फिल्म और संगीत से जुडी शख्सियतों के जीवन और फ़िल्मी सफ़र से जुडी दिलचस्प कहानियां समीर गोस्वामी के साथ, लीजिये आज इस कार्यक्रम के आठवें एपिसोड में सुनिए कहानी शब्दों के जादूगर मजरूह सुल्तानपुरी की...प्ले पर क्लिक करें और सुनें....

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फिल्मी चक्र में सुनिए इन महान कलाकारों के सफ़र की कहानियां भी -
किशोर कुमार
शैलेन्द्र 
संजीव कुमार 
आनंद बक्षी
सलिल चौधरी 
नूतन 
हृषिकेश मुख़र्जी 

रविवार, 1 अक्तूबर 2017

ठुमरी खमाज और पहाड़ी : SWARGOSHTHI – 337 : THUMARI KHAMAJ & PAHADI




स्वरगोष्ठी – 337 में आज

फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी – 4 : ठुमरी खमाज और पहाड़ी

“कौन गली गयो श्याम...” - श्रृंगार और भक्ति का अनूठा समागम है इस ठुमरी में





डॉ. प्रभा  अत्रे
परवीन सुल्ताना
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी श्रृंखला “फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी” की इस चौथी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र अपनी सहयोगी संज्ञा टण्डन के साथ आप सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। पिछली श्रृंखला की भाँति इस श्रृंखला में भी हम एक नया प्रयोग कर रहे हैं। गीतों का परिचयात्मक आलेख हम अपने सम्पादक-मण्डल की सदस्य संज्ञा टण्डन की रिकार्ड किये आवाज़ में प्रस्तुत कर रहे हैं। आपको हमारा यह प्रयोग कैसा लगा, अवश्य सूचित कीजिएगा। दरअसल यह श्रृंखला पूर्व में प्रकाशित / प्रसारित की गई थी। हमारे पाठकों / श्रोताओं को यह श्रृंखला सम्भवतः कुछ अधिक रुचिकर प्रतीत हुई थी। अनेक संगीत-प्रेमियों ने इसके पुनर्प्रसारण का आग्रह किया है। सभी सम्मानित पाठकों / श्रोताओं के अनुरोध का सम्मान करते हुए और पूर्वप्रकाशित श्रृंखला में थोड़ा परिमार्जन करते हुए यह श्रृंखला हम पुनः प्रस्तुत कर रहे हैं। आज से शुरू हो रही हमारी नई लघु श्रृंखला “फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी” के शीर्षक से ही यह अनुमान हो गया होगा कि इस श्रृंखला का विषय फिल्मों में शामिल की गई उपशास्त्रीय गायन शैली ठुमरी है। सवाक फिल्मों के प्रारम्भिक दौर से फ़िल्मी गीतों के रूप में तत्कालीन प्रचलित पारसी रंगमंच के संगीत और पारम्परिक ठुमरियों के सरलीकृत रूप का प्रयोग आरम्भ हो गया था। विशेष रूप से फिल्मों के गायक-सितारे कुन्दनलाल सहगल ने अपने कई गीतों को ठुमरी अंग में गाकर फिल्मों में ठुमरी शैली की आवश्यकता की पूर्ति की थी। चौथे दशक के मध्य से लेकर आठवें दशक के अन्त तक की फिल्मों में सैकड़ों ठुमरियों का प्रयोग हुआ है। इनमे से अधिकतर ठुमरियाँ ऐसी हैं जो फ़िल्मी गीत के रूप में लिखी गईं और संगीतकार ने गीत को ठुमरी अंग में संगीतबद्ध किया। कुछ फिल्मों में संगीतकारों ने परम्परागत ठुमरियों का भी प्रयोग किया है। इस श्रृंखला में हम आपसे ऐसी ही कुछ चर्चित-अचर्चित फ़िल्मी ठुमरियों पर बात करेंगे। आज के अंक में हम हम प्रस्तुत करने जा रहे हैं, खमाज की एक बेहद लोकप्रिय ठुमरी- ‘कौन गली गयो श्याम...’। इस ठुमरी को कई गायक-गायिकाओं ने गाया है। इनमें विदुषी रसूलन बाई, डॉ. प्रभा अत्रे, पण्डित छन्नूलाल मिश्र, विदुषी परवीन सुलताना आदि की प्रस्तुतियाँ रेखांकित की जा सकती है। आज हम आपको पहले यह पारम्परिक ठुमरी डॉ. प्रभा अत्रे द्वारा राग मिश्र खमाज के स्वरों में प्रस्तुत करेंगे। इसके बाद यही ठुमरी बेगम परवीन सुलताना द्वारा राग पहाड़ी के स्वरों में सुनवाएँगे, जिसे उन्होने फिल्म ‘पाकीज़ा’ के लिए गाया था।



ठुमरी मिश्र खमाज : ‘कौन गली गयो श्याम...’ : विदुषी डॉ. प्रभा अत्रे
ठुमरी पहाड़ी : ‘कौन गली गयो श्याम...’ : विदुषी परवीन सुलताना : फिल्म – पाकीज़ा





संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 337वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक फिल्मी ठुमरी गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। संगीत के इस अंश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक ही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 340वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के चौथे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा।





1 – इस ठुमरी रचना का अंश सुन कर बताइए कि आपको किस राग का अनुभव हो रहा है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – यह किस विख्यात पार्श्वगायिका की आवाज़ है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार 7 अक्टूबर, 2017 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 339वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 335वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको 1964 में प्रदर्शित फिल्म – “दूज का चाँद” से ली गई ठुमरी का अंश सुनवा कर हमने आपसे तीन में से दो प्रश्नों का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है, राग भैरवी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है, ताल – कहरवा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है, स्वर – पार्श्वगायक – मन्ना डे

इस अंक की पहेली प्रतियोगिता में प्रश्नों के सही उत्तर देने वाले हमारे नियमित प्रतिभागी हैं चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, जबलपुर मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। आशा है कि हमारे अन्य पाठक / श्रोता भी नियमित रूप से साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ का अवलोकन करते रहेंगे और पहेली प्रतियोगिता में भाग लेंगे। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी श्रृंखला “फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी” की इस तीसरी कड़ी में आपने राग एक ही ठुमरी का राग मिश्र खमाज और पहाड़ी में रसास्वादन किया। आपके अनुरोध पर पुनर्प्रसारित इस श्रृंखला के अगले अंक में हम आपको एक और पारम्परिक ठुमरी और उसके फिल्मी रूप पर चर्चा करेंगे और शास्त्रीय और उपशास्त्रीय संगीत और रागों पर चर्चा करेंगे और सम्बन्धित रागों तथा संगीत शैली में निबद्ध कुछ रचनाएँ भी प्रस्तुत करेंगे। हमारी आगामी श्रृंखलाओं के लिए विषय, राग, रचना और कलाकार के बारे में यदि आपकी कोई फरमाइश हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 8 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


वाचक स्वर : संज्ञा टण्डन   
आलेख व प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र   



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

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