रविवार, 3 सितंबर 2017

कजरी गीत : SWARGOSHTHI – 333 : KAJARI SONGS



स्वरगोष्ठी – 333 में आज


पावस ऋतु के राग – 8 : कजरी गीतों के विविध प्रयोग


“कइसे खेले जइबू सावन में कजरिया बदरिया घेरि आइल ननदी...”





उस्ताद बिस्मिल्लाह  खाँ
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला – “पावस ऋतु के राग” की आठवीं और समापन कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र अपनी सहयोगी संज्ञा टण्डन के साथ आप सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला में हम एक नया प्रयोग कर रहे हैं। गीतों का परिचयात्मक आलेख हम अपने सम्पादक-मण्डल की सदस्य संज्ञा टण्डन की रिकार्ड किये आवाज़ में प्रस्तुत कर रहे हैं। आपको हमारा यह प्रयोग कैसा लगा, अवश्य सूचित कीजिएगा। आपको स्वरों के माध्यम से बादलों की उमड़-घुमड़, बिजली की कड़क और रिमझिम फुहारों में भींगने के लिए आमंत्रित करता हूँ। यह श्रृंखला, वर्षा ऋतु के रस और गन्ध से पगे गीत-संगीत पर केन्द्रित है। इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम आपसे वर्षा ऋतु में गाये-बजाए जाने वाले रागों और उनमें निबद्ध कुछ चुनी हुई रचनाओं पर चर्चा करेंगे। इसके साथ ही सम्बन्धित राग के आधार पर रचे गए फिल्मी गीत भी प्रस्तुत करेंगे। भारतीय संगीत के अन्तर्गत मल्हार अंग के सभी राग पावस ऋतु के परिवेश की सार्थक अनुभूति कराने में समर्थ हैं। आम तौर पर इन रागों का गायन-वादन वर्षा ऋतु में अधिक किया जाता है। इसके साथ ही कुछ ऐसे सार्वकालिक राग भी हैं जो स्वतंत्र रूप से अथवा मल्हार अंग के मेल से भी वर्षा ऋतु के अनुकूल परिवेश रचने में सक्षम होते हैं। इस श्रृंखला की आठवीं और समापन कड़ी में आज हम आपसे कजरी गायन शैली के विविध स्वरूप पर चर्चा करेंगे। कजरी अथवा कजली मूलतः लोक संगीत की विधा है, किन्तु इसके कुछ विशेष गुणों के कारण यह उपशास्त्रीय संगीत के मंचों पर भी यह प्रतिष्ठित हुई। आज के अंक में हम कजरी गीतों के उपशास्त्रीय, लोक और फिल्मी स्वरूप की चर्चा करेंगे। आज के अंक में सबसे पहले हम आपको उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ की शहनाई पर बनारसी कजरी गीत की धुन सुनवाएँगे। इसके बाद हम आपको कजरी के लोक स्वरूप का परिचय देने के लिए आपको एक प्रसिद्ध मीरजापुरी कजरी गायिका तृप्ति शाक्य के स्वर में तथा कजरी के फिल्मी उपयोग को प्रदर्शित करने के लिए सात दशक से अधिक पूर्व की भोजपुरी फिल्म “बिदेशिया” में शामिल एक कजरी गीत प्रस्तुत करेंगे। 
(बाएँ से) तृप्ति शाक्य, कौमुदी मजूमदार और गीता दत्त
कजरी : शहनाई पर दादरा और कहरवा ताल में निबद्ध कजरी : उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ और साथी
कजरी : ‘कैसे खेले जइबू सावन में कजरिया...’ : तृप्ति शाक्य और साथी
कजरी  : ‘नीक सइयाँ बिन भवनवा...’ : गीता दत्त और कौमुदी मजुमदार : फिल्म बिदेशिया



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 333वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको तीसरे और चौथे दशक के सुविख्यात उस्ताद गायक के स्वर में गायकी का एक अंश सुनवा रहे हैं। संगीत के इस अंश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। यदि आपको तीन में से एक ही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 340वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने के बाद जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के चौथे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा।




1 – संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह कौन सा राग है?

2 – संगीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – यह तीसरे और चौथे दशक के किस उस्ताद गायक की आवाज़ है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार 9 सितम्बर, 2017 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 335वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 331वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको विदुषी गिरिजा देवी के स्वरों में बड़े रामदास जी द्वारा रचित कजरी का एक अंश प्रस्तुत कर आपसे तीन में से दो प्रश्नों का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है, शैली – कजरी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है, ताल – मध्यलय दादरा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है, स्वर – विदुषी गिरिजा देवी

इस अंक की पहेली प्रतियोगिता में प्रश्नों के सही उत्तर देने वाले हमारे नियमित प्रतिभागी हैं - चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और जबलपुर मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी। आशा है कि हमारे अन्य पाठक / श्रोता भी नियमित रूप से साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ का अवलोकन करते रहेंगे और पहेली प्रतियोगिता में भाग लेंगे। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर हमारी श्रृंखला “पावस ऋतु के राग” की यह समापन कड़ी थी। इस श्रृंखला में हमने आपके लिए ऋतु प्रधान गीतो को प्रस्तुत किया। आज की कड़ी में हमने आपके लिए कजरी गीत का वाद्य संगीत के रूप में, पारम्परिक लोक संगीत के स्वरूप का और फिल्म में प्रयोग की गई कजरी का एक उदाहरण प्रस्तुत किया। आगामी अंक से हम एक नई श्रृंखला की शुरुआत करेंगे और शास्त्रीय और उपशास्त्रीय संगीत और रागों पर चर्चा करेंगे और सम्बन्धित रागों तथा संगीत शैली में निबद्ध कुछ रचनाएँ भी प्रस्तुत करेंगे। हमारी आगामी श्रृंखलाओं के लिए विषय, राग, रचना और कलाकार के बारे में यदि आपकी कोई फरमाइश हो तो हमें  swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 8 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


वाचक स्वर : संज्ञा टण्डन   
आलेख व प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र   





रेडियो प्लेबैक इण्डिया 


शनिवार, 2 सितंबर 2017

चित्रकथा - 34: इस दशक के नवोदित नायक (भाग - 5)

अंक - 34

इस दशक के नवोदित नायक (भाग - 5)


"तू मेरा हीरो नंबर वन.." 



’रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। समूचे विश्व में मनोरंजन का सर्वाधिक लोकप्रिय माध्यम सिनेमा रहा है और भारत कोई व्यतिक्रम नहीं। बीसवीं सदी के चौथे दशक से सवाक् फ़िल्मों की जो परम्परा शुरु हुई थी, वह आज तक जारी है और इसकी लोकप्रियता निरन्तर बढ़ती ही चली जा रही है। और हमारे यहाँ सिनेमा के साथ-साथ सिने-संगीत भी ताल से ताल मिला कर फलती-फूलती चली आई है। सिनेमा और सिने-संगीत, दोनो ही आज हमारी ज़िन्दगी के अभिन्न अंग बन चुके हैं। ’चित्रकथा’ एक ऐसा स्तंभ है जिसमें बातें होंगी चित्रपट की और चित्रपट-संगीत की। फ़िल्म और फ़िल्म-संगीत से जुड़े विषयों से सुसज्जित इस पाठ्य स्तंभ में आपका हार्दिक स्वागत है। 



हर रोज़ देश के कोने कोने से न जाने कितने युवक युवतियाँ आँखों में सपने लिए माया नगरी मुंबई के रेल्वे स्टेशन पर उतरते हैं। फ़िल्मी दुनिया की चमक-दमक से प्रभावित होकर स्टार बनने का सपना लिए छोटे बड़े शहरों, कसबों और गाँवों से मुंबई की धरती पर क़दम रखते हैं। और फिर शुरु होता है संघर्ष। मेहनत, बुद्धि, प्रतिभा और क़िस्मत, इन सभी के सही मेल-जोल से इन लाखों युवक युवतियों में से कुछ गिने चुने लोग ही ग्लैमर की इस दुनिया में मुकाम बना पाते हैं। और कुछ फ़िल्मी घरानों से ताल्लुख रखते हैं जिनके लिए फ़िल्मों में क़दम रखना तो कुछ आसान होता है लेकिन आगे वही बढ़ता है जिसमें कुछ बात होती है। हर दशक की तरह वर्तमान दशक में भी ऐसे कई युवक फ़िल्मी दुनिया में क़दम जमाए हैं जिनमें से कुछ बेहद कामयाब हुए तो कुछ कामयाबी की दिशा में अग्रसर हो रहे हैं। कुल मिला कर फ़िल्मी दुनिया में आने के बाद भी उनका संघर्ष जारी है यहाँ टिके रहने के लिए। ’चित्रकथा’ में आज से हम शुरु कर रहे हैं इस दशक के नवोदित नायकों पर केन्द्रित एक लघु श्रॄंखला जिसमें हम बातें करेंगे वर्तमान दशक में अपना करीअर शुरु करने वाले शताधिक नायकों की। प्रस्तुत है ’इस दशक के नवोदित नायक’ श्रॄंखला की पाँचवीं  कड़ी।



आयुष्मान खुराना, दिलजीत दोसंझ
स दशक के नवोदित नायकों की बातें इन दिनों हम आपको बता रहे हैं। आज शुरु करते हैं दो पंजाबी मुंडों से। आयुष्मान खुराना का जन्म चंडीगढ़ में हुआ था और वहीं से स्कूल और कॉलेज की पढ़ाई पूरी की। पंजाब यूनिवर्सिटी से मास कम्युनिकेशन में मास्टर डिग्री लेने के बाद उन्होंने पाँच साल तक थिएटर की। अपने DAV College, जहाँ से उन्होंने पढ़ाई की थी, वहाँ के दो थिएटर ग्रूप ’आग़ाज़’ और ’मंचतन्त्र’ की उन्होंने स्थापना की थी जो अब तक सक्रीय हैं। कई राष्ट्रीय स्तर के कॉलेजों, जैसे कि IIT Bombay, Birla Institute of Technology और St. Bedes Simla, के थिएटर प्रतियोगिताओं में उन्होंने समय समय पर हिस्सा लिया और इनाम भी जीते। धरमवीर भारती के ’अंध युग’ में अश्वत्थामा का चरित्र निभा कर उन्हें ’बेस्ट ऐक्टर अवार्ड’ भी मिला था। 2002 में 17 वर्ष की आयु में आयुष्मान टीवी पर नज़र आए थे जब Channel V Popstars में उन्होंने हिस्सा लिया। उस शो के वो सबसे कम उम्र के प्रतियोगियों में से एक थे। इसके दो साल बाद उन्होंने MTV Roadies 2 में हिस्सा लिया और विजेता बन कर निकले। 19 साल की उम्र में इस तरह से वो देश भर में मशहूर हो गए थे। पढ़ाई पूरी कर उन्होंने दिल्ली में Big FM में RJ की नौकरी कर ली जहाँ उन्होंने ’बिग चाय’ और ’मान ना मान, मैं तेरा आयुष्मान’ जैसे शोज़ होस्ट किए। नई दिल्ली के ’भारत निर्माण पुरस्कार’ के वो सबसे कम उम्र के प्रापक बने। RJ से आयुष्मान बन गए VJ और MTV Wassup - The Voice of Youngistaan में शो होस्ट करते हुए दिखाई दिए। फिर इसके बाद आयुष्मान कई टीवी शोज़ होस्ट करते हुए नज़र आए और एक सफल और लोकप्रिय ऐंकर के रूप में वो उभरे। 2012 में आयुष्मान को छोटे परदे से बड़े परदे में उतरने का सुनहरा मौक़ा मिला जब उन्हें शूजित सरकार निर्देशित ’विक्की डोनर’ फ़िल्म में नायक की भूमिका करने का न्योता मिला। यामी गौतम और अन्नु कपूर के साथ उनकी यह फ़िल्म बेहद कामयाब रही। इसी फ़िल्म से जॉन एब्रहम एक निर्माता बने थे। एक कम बजट की फ़िल्म होते हुए भी इसने व्यावसायिक कामयाबी के झंडे गाढ़ दिए। इस फ़िल्म में आयुष्मान ने अपनी आवाज़ में एक गीत "पानी दा रंग" भी गाया जिसकी भी भूरी भूरी प्रशंसा हुई। इस फ़िल्म के लिए उन्हें एक नहीं बल्कि दो दो फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार मिले - ’बेस्ट मेल डेब्यु’ और ’बेस्ट प्लेबैक सिंगर - मेल’। अन्य कई पुरस्कारों में भी वो बेस्ट डेब्यु का पुरस्कार जीते। पहली ही फ़िल्म में अपार सफलता प्राप्त करने के बावजूद आयुष्मान खुराना ने टेलीविज़न नहीं छोड़ी और एक के बाद एक शोज़ होस्ट करते नज़र आए। 2013 की रोहन सिप्पी की फ़िल्म ’नौटंकी साला’ में उन्होंने एक बार फिर दर्शकों को गुदगुदाया। 2014 की यश राज की फ़िल्म ’बेवकूफ़ियाँ’ में सोनम कपूर और ॠषी कपूर के साथ आयुष्मान ख़ूब जँचे और इसी फ़िल्म में फिर एक बार उन्होंने एक गीत गाया "ख़ामख़ा"। यह फ़िल्म ख़ास नहीं चली, लेकिन आयुष्मान की लोकप्रियता बरक़रार रही। 2015 में वो दो फ़िल्मों में नज़र आए - ’हवाज़ादा’ और ’दम लगा के हाइशा’, और इन दोनों में आयुष्मान का अभिनय सर चढ़ कर बोला। 2017 में उनकी तीन फ़िल्में आ रही हैं - ’बरेली की बरफ़ी’, ’शुभ मंगल सावधान’ और ’मनमर्ज़ियाँ’। और अब ज़िक्र दूसरे पंजाबी मुंडे का। दिलजीत दोसंझ आजकल युवा वर्ग में बेहद लोकप्रिय हैं। जिस तरह आयुष्मान अभिनेता होने के साथ-साथ गायक भी हैं, वैसे ही दिलजीत एक गायक होने के साथ-साथ एक अभिनेता भी हैं। दिलजीत का जन्म जलंधर के दोसंझ कलाँ गाँव में एक सिख परिवार में हुआ था।पिता पंजाब रोडवेज़ के कर्मचारी और माँ एक गृहवधु, ऐसे सादे परिवार से ताल्लुख़ है दिलजीत का। लुधियाना से हाइ स्कूल डिप्लोमा की पढ़ाई के दौरान ही वो गुरुद्वाराओं में शबद-कीर्तन गाया करते थे। यह तो सभी जानते हैं कि पंजाब में आज भी पंजाबी गीतों के ऐल्बम्स का काफ़ी चलन है। दिलजीत ने भी 2004 में अपनी पहली ऐल्बम ’इश्क़ का उड़ा अदा’ बनाई जिसे लोगों ने पसन्द किया। नतीजा यह हुआ कि उनके अगले ऐल्बम की डिमांड आ गई। अगले छह सालों तक एक के बाद एक ऐल्बम बनाने के बाद 2011 में दिलजीत पंजाबी फ़िल्मों में उतरे। उनकी पहली दो पंजाबी फ़िल्में असफल रही। इसी दौरान दिलजीत ने यो यो हनी सिंह के साथ भी कुछ गीत रेकॉर्ड किए। बॉलीवूड में दिलजीत की एन्ट्री हुई 2012 की फ़िल्म ’तेरे नाल लव हो गया’ में एक गीत गा कर। इसी साल उनकी अगली पंजाबी फ़िल्म ’जट ऐण्ड जुलियट’ सुपरहिट हुई और दिलजीत दोसंझ रातों रात पंजाबी के सुपरस्टार बन गए। इस फ़िल्म के लिए उन्हें कई बड़े पुरस्कार मिले और फिर इसके बाद उनकी पंजाबी फ़िल्मों और ऐल्बमों की कतार लग गई। बॉलीवूड में बतौर अभिनेता उनकी पहली फ़िल्म थी 2016 की ’उड़ता पंजाब’ जो विवादों से घिर गई थी। इस फ़िल्म में उनके अभिनय से ज़्यादा तारीफ़ हुई उनके गाए गीत "इक कुड़ी जिदा नाम मोहब्बत" के लिए। 2017 में दिलजीत की दूसरी हिन्दी फ़िल्म आई ’फिल्लौरी’ जिसमें उनके साथ अनुष्का शर्मा और सूरज शर्मा ने अभिनय किया। इस फ़िल्म को मिली-जुली प्रतिक्रिया मिली। देखते हैं आने वाले समय में दिलजीत दोसंझ हिन्दी फ़िल्म जगत में कौन सा मुकाम हासिल करते हैं!


रणवीर सिंह, सिद्धार्थ मल्होत्रा
रणवीर सिंह का स्थान इस दशक के सफलतम नवोदित नायकों में बहुत सम्मान के साथ लिया जाता है। मुंबई के एक सिंधी भवनानी परिवार में 1985 में जन्में रणवीर के दादा-दादी देश विभाजन के समय अपने परिवार के साथ कराची से मुंबई स्थानान्तरित हो गए थे। नायक के इमेज को ठेस ना लगे, इसलिए उन्होंने अपने नाम से ’भवनानी’ हटा दिया। स्कूल के दिनों से ही रणवीर एक अभिनेता बनना चाहते थे और स्कूल के ड्रामा/नाटकों में हिस्सा लिया करते। जब वो मात्र छह साल के थे, एक जन्मदिन की पार्टी में जब उनसे मेहमानों का मनोरंजन करने को कहा गया तो उन्होंने ’हम’ फ़िल्म के "चुम्मा चुम्मा" गीत पर डान्स करके सबका मनोरंजन किया था। तभी से उनके अन्दर लोगों का मनोरंजन करने की प्रवृत्ति जाग उठी थी। लेकिन जैसे जैसे वो बड़े हुए, उन्हें अहसास होने लगा कि फ़िल्मी घराने से ना होने की वजह से उनका इस क्षेत्र में बड़ा ब्रेक मिल पाना बहुत मुश्किल है। इस बात को ध्यान में रखते हुए उन्होंने अपना रुझान क्रिएटिव राइटिंग् की ओर मोड़ा और अमरीका जा कर इन्डियाना यूनिवर्सिटी से BA की डिग्री हासिल की। उसी में अभिनय को भी एक विकल्प विषय के रूप में चुना। पढ़ाई पूरी कर रणवीर मुंबई लौटे 2007 में और एक विज्ञापन कंपनी में एक कॉपीराइटर के रूप में नौकरी करने लगे। एक सहायक निर्देशक के रूप में भी उन्हे एक मौका मिला था लेकिन अभिनय की तरफ़ आकर्षण के चलते उन्होंने यह मौका ठुकरा दिया और तमाम निर्देशकों को अपना पोर्टफ़ोलियो भेजने लगे। एक के बाद एक ऑडिशन्स दिए लेकिन कोई बात नहीं बनी सिवाय छोटे-मोटे रोल्स के। एक समय तो वो उम्मीदें छोड़ चुके थे और उन्हें ऐसा लगने लगा कि शायद वो ग़लत जगह क़िस्मत आज़मा रहे हैं। लेकिन 2010 का नया साल उनके लिए अच्छी ख़बर लेकर आया। ’यश राज फ़िल्म्स’ के कास्टिंग् डिरेक्टर शानू शर्मा ने उन्हें ऑडिशन के लिए बुलाया। ’बैण्ड बाजा बारात’ फ़िल्म के लिए उन्हें एक नए हीरो की तलाश थी। ऑडिशन्स के कई कड़े राउन्ड्स होने के बाद सर्वसम्मति से रणवीर सिंह को चुन लिया गया। ऐन्ड रेस्ट इस हिस्ट्री। ’बैण्ड बाजा बारात’ कामयाब फ़िल्म रही और इसमें रणवीर का अभिनय कैसा था इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्हें इस फ़िल्म के लिए फ़िल्मफ़ेयर का ’बेस्ट मेल डेब्यु’ का पुरस्कार मिला। इस फ़िल्म की कामयाबी के बाद रणवीर को एक के बाद एक फ़िल्म मिलते चलते गए। 2011 में ’लेडीज़ वर्सस रिक्की बह्ल’ और 2013 में ’बॉम्बे टॉकीज़’ और ’लूटेरा’ उनकी पहली फ़िल्म की तरह कामयाब तो नहीं रही, लेकिन रणवीर को दर्शकों ने अपना लिया था। 2013 में ही रणवीर सिंह रातों रात पहली श्रेणी के स्टार बन गए जब संजय लीला भंसाली ने उन्हें अपनी महत्वाकांक्षी फ़िल्म ’गोलियों की रासलीला राम-लीला’ के नायक के रूप में चुन लिया। फ़िल्म के रिलीज़ होते ही संजय लीला भंसाली को अहसास हो गया कि उनका निर्णय ग़लत नहीं था। रणवीर के दमदार अभिनय और स्टाइल ने दर्शकों का दिल जीत लिया और उस साल फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार के तहत ’सर्वश्रेष्ठ अभिनेता’ के लिए उन्हें नामांकन मिला। 2014 भी उनके लिए अच्छी रही और ’गुंडे’ फ़िल्म सुपरहिट हुई। अर्जुन कपूर, इर्फ़ान ख़ान और प्रियंका चोपड़ा के साथ रणवीर का स्क्रीन प्रेज़ेन्स भी कमाल का था। लेकिन इसी साल ’किल बिल’ फ़िल्म फ़्लॉप रही। ’फ़ाइंडिंग् फ़ैनी’ फ़िल्म में रणवीर एक अतिथि कलाकार के रूप में नज़र आए। संजय लीला भंसाली ने एक बार फिर रणवीर कपूर और दीपिका पडुकोणे को लेकर 2015 में बनाई ’बाजीराव मस्तानी’ जिसने ’गोलियों की रासलीला राम-लीला’ के सारे रेकॉर्ड्स तोड़ दिए। इतना ही नहीं, इस बार रणवीर को फ़िल्मफ़ेयर का ’सर्वश्रेष्ठ अभिनेता’ का पुरस्कार भी मिला। 2015 की उनकी दो और फ़िल्में थीं ’हे ब्रो’ और ’दिल धड़कने दो’ जिन्होंने ठीक-ठाक व्यापार किया। 2016 में वाणी कपूर के साथ रणवीर एक बिल्कुल ही नए अवतार में नज़र आए आदित्य चोपड़ा की कॉमेडी-रोमान्स फ़िल्म ’बेफ़िक्रे’ में। यह फ़िल्म भी ठीक-ठाक चली और इसमें रणवीर के अंडर-वियर पहन कर पार्टी में जाने वाली सीन भी काफ़ी चर्चित रही और उनके साहस को दाद मिली। 2017 में एक बार फिर भंसाली साहब रणवीर, शाहिद कपूर और दीपिका को लेकर बना रहे हैं ’पद्मावती’। हम सभी को इस फ़िल्म का बेसबरी से इन्तज़ार है। 1985 में ही एक और सितारे का जन्म हुआ था, और इस सितारे ने भी रणवीर सिंह की तरह 2010 में फ़िल्मों में पदार्पण किया था, और एक सफल नायक के रूप में उन्होंने अपनी जगह इस इंडस्ट्री में पक्की कर ली है। आप हैं सिद्धार्थ मल्होत्रा। दिल्ली के एक पंजाबी परिवार में जन्में सिद्धार्थ के पिता मर्चैण्ट नेवी के पूर्व कप्तान रहे हैं। उन्होंने दिल्ली के ही डॉन बॉस्को स्कूल, बिरला विद्या निकेतन और शहीद भगत सिंह कॉलेज से उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी की। 16 वर्ष की आयु से सिद्धार्थ ने अपनी शरीर-चर्चा शुरु कर दी थी और 18 वर्ष के होते ही उन्होंने मॉडेलिंग् करना शुरु कर दिया। लेकिन चार साल में ही वो इस जगत से तंग आ गए और उनका मन अभिनय जगत की तरफ़ सम्मोहित होने लगा।अनुभव सिंहा की एक फ़िल्म के लिए ऑडिशन दिया और वो चुन भी लिए गए लेकिन दुर्भाग्यवश वह फ़िल्म बन नहीं सकी। लेकिन तब तक उन्हें फ़िल्मी दुनिया के कुछ लोग जानने लगे थे और करण जोहर की फ़िल्म ’माइ नेम इज़ ख़ान’ में वरुण धवन की तरह उन्हें भी सहायक निर्देशक के रूप में ले लिया गया। यह 2010 की बात थी। सिद्धार्थ के फ़्रेश फ़ेस वैल्यु, स्टाइलिश लूक्स और अच्छे कदकाठी को ध्यान में रखते हुए करण जोहर ने अपनी अगली फ़िल्म ’स्टुडेण्ट ऑफ़ दि यीअर’ में वरुण धवन के साथ-साथ सिद्धार्थ मल्होत्रा को भी चुन लिया। वरुण और सिद्धार्थ ने एक दूसरे को कांटे की टक्कर दी और दोनों ही कामयाब बन कर निकले। वरुण की तरह सिद्धार्थ को भी इस फ़िल्म की कामयाबी से फ़ायदा हुआ और फ़िल्मों की लड़ी लग गई। 2014 में उनकी दूसरी फ़िल्म ’हँसी तो फ़सी’ आई जिसने ठीक-ठाक कारोबार किया, लेकिन सिद्धार्थ के अभिनय की भूरी-भूरी प्रशंसा हुई। इसी वर्ष उनकी तीसरी फ़िल्म ’एक विलेन’ में वो एक खलनायक रूपी भूमिका में नज़र आए जिसे उन्होंने बख़ूबी निभाया और अपने वर्सेटाइलिटी का सबूत दिया। एक कोरियन फ़िल्म की कॉपी होने की वजह से यह फ़िल्म विवादित भी रही लेकिन व्यावसायिक रूप से फ़िल्म बेहद कामयाब रही। इस फ़िल्म ने सिद्धार्थ मल्होत्रा के जड़ों को और भी मज़बूत कर दिया। 2015 में उनकी एक ही फ़िल्म आई ’ब्रदर्स’ जो नाकामयाब रही। लेकिन अगले ही साल 2016 में ’कपूर ऐण्ड सन्स’ में ॠषी कपूर, रत्ना पाठक, रजत कपूर, फ़वाद ख़ान और आलिया भट्ट जैसे कलाकारों के साथ-साथ उनकी अदाकारी को भी ख़ूब सराहा गया। इसी साल ’बार बार देखो’ फ़िल्म में सिद्धार्थ एक गणितज्ञ की भूमिका में नज़र आए; व्यावसायिक रूप से फ़िल्म असफल होने के बावजूद इस फ़िल्म ने सिद्धार्थ के वर्सेटाइलिटी पर एक और मोहर लगा दिया। उनकी आने वाली फ़िल्में हैं ’ए जेन्टलमैन’, ’इत्तेफ़ाक़’ और ’अय्यारी’। अभिनय के अलावा सिद्धार्थ एक समाज सेवक के रूप में भी कई अच्छी काम किए हैं जैसे कि चैरिटी शोज़ करना, जानवरों के लिए PETA में काम करना इत्यादी।


साक़िब सलीम, जैकी भगनानी
अब ज़िक्र दो ऐसे अभिनेताओं का जिन्होंने बतौर नायक बहुत बड़ी कामयाबी तो हासिल नहीं की, लेकिन उनका स्क्रीन प्रेज़ेन्स ऐसा रहा है कि लोग उनके अभिनय से मुतासिर हुए हैं। इनमें पहले नौजवान हैं साक़िब सलीम, जिनके वालिद का दिल्ली में दस रेस्तोरान हैं। साक़िब की एक बड़ी बहन हुमा क़ुरेशी भी अभिनेत्री हैं। अपने कॉलेज के दिनों में साक़िब ने अपने वालिद का हाथ बँटाया लेकिन उन्हें होटलों का यह काम रास नहीं आया। जिम जा कर अपने शरीर को सुडौल बनाया और मॉडलिंग् करने लग गए। दिल्ली में थोड़ी बहुत मॉडेलिंग् करते ही वो मुंबई का ख़्वाब देखने लगे। वालिद चाहते थे कि वो दिल्ली में ही रह कर MBA की पढ़ाई करे, लेकिन साक़िब ने उनकी नहीं सुनी और मुंबई चले गए। मुंबई जाकर वो मॉडेलिंग् से अपना सफ़र शुरु किया और कई अव्वल दर्जे के ब्रैण्ड्स के विज्ञापनों में अभिनय का मौक़ा उन्हें मिला जिससे साक़िब घर-घर में नज़र आने लगे टीवी के ज़रिए। इसी दौरान साक़िब फ़िल्मों के लिए ऑडिशन्स देने लगे और आठ महीनों के संघर्ष के बाद उन्हें ’यश राज फ़िल्म्स’ की 2011 की फ़िल्म ’मुझसे फ़्राण्डशिप करोगे’ के लिए चुन लिया गया। युवाओं के विषयों को ध्यान में रखती हुई यह फ़िल्म युवाओं में ख़ूब सफ़ल रही और बिल्कुल नए चेहरों वाली इस फ़िल्म को समीक्षकों की अच्छी प्रतिक्रिया मिली। व्यावसायिक तौर पे भी इस फ़िल्म ने अच्छी कमाई की और साक़िब सलीम के अभिनय की भी तारीफ़ें हुईं और उस वर्ष के फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड्स के तहत ’बेस्ट डेब्यु - मेल’ के लिए उनका नामांकन हुआ। इस फ़िल्म के एक साल बाद साकिब नज़र आए ’मेरे डैड की मारुति’ में जो पंजाबी शादी के पार्श्व पर बनने वाली फ़िल्म थी। इस फ़िल्म में भी साक़िब आधुनिक नौजवान के किरदार में तारीफ़ें बटोरी। रणवीर सिंह की तरह साक़िब भी 2013 की फ़िल्म ’बॉलीवूड टॉकीज़’ ऐन्थोलोजी फ़िल्म में करण जोहर के सेगमेण्ट ’अजीब दासताँ है ये’ में एक समलैंगिक लड़के के किरदार में नज़र आए जो अपने कलीग रानी मुखर्जी के पति रणदीप हूडा के तरफ़ आकर्षित हैं। अपने करीयर के गठन के दिनों में ऐसे बोल्ड किरदार निभाने से साक़िब नहीं डरे जो एक सच्चे अभिनेता की निशानी है। 2014 में साक़िब अनमोल गुप्ते निर्देशित फ़िल्म ’हवा हवाई’ में अभिनय किया और इस फ़िल्म ने क्रिटिक व कमर्शियल सफ़लता हासिल की। वरिष्ठ फ़िल्म पत्रकार सुभाष के. झा ने साक़िब की तारीफ़ करते हुए लिखा था, "Saqib is very cinematic, we witness the full force of Saqib's virtuosity." 2016 में साजिद नडियडवाला की ऐक्शन फ़िल्म ’डिशूम’ में जॉन एब्रहम और वरुण धवन के साथ साक़िब नज़र आए। 2017 के जून में साक़िब की लेटेस्ट फ़िल्म आई है ’दोबारा: सी यू ईविल’। इस फ़िल्म में उनकी बड़ी बहन हुमा क़ुरेशी भी हैं। साक़िब की आने वली फ़िल्म है ’साइड हीरो’ जो वासन बाला की फ़िल्म है। साक़िब सलीम की अच्छी बात यह है कि वो लो प्रोफ़ाइल रख कर एक के बाद एक फ़िल्म में अच्छा अभिनय करते चले जा रहे हैं। उनसे उनकी आने वाली फ़िल्मों से भी हमें उम्मीदें हैं। फ़िल्म निर्माता वाशु भगनानी के बेटे जैकी भगनानी का जन्म कोलकाता में हुआ था। रणवीर कपूर की तरह वो भी एक सिंधी परिवार से ताल्लुख़ रखते हैं। कोलकाता के Welham Boys School और St.Teresa's High School से स्कूल की पढ़ाई पूरी कर वो मुंबई चले गए और H.R. College of Commerce and Economics में B.Com डिग्री की पढ़ाई पूरी की। साथ ही उनके पिता ने उन्हें अमरीका के न्यु यॉर्क में भेजा Lee Strasberg Theatre and Film Institute से अभिनय का एक कोर्स करने के लिए। वहाँ से वापस आने के बाद जैकी के पिता ने उन्हें लौंद करने के लिए ’कल किसने देखा’ फ़िल्म की योजना बनाई। 2009 में यह फ़िल्म बन कर पूरी हुई, प्रदर्शित भी हुई, लेकिन फ़िल्म बुरी तरह से पिट गई। फ़िल्म क्रिटिक्स ने फ़िल्म की असफलता के लिए फ़िल्म की कहानी को दोषी ठहराया। फ़िल्म के ना चलने से जैकी की तरफ़ भी लोगों ने ज़्यादा ध्यान नहीं दिया। इसके दो साल बाद 2011 में उनकी दूसरी फ़िल्म आई ’फ़ाल्तु’। इसे भी उनके पिता ने ही प्रोड्युस किया। यह फ़िल्म पहली फ़िल्म से बेहतर रही और मिली-जुली प्रतिक्रियाओं के बीच फ़िल्म ने ठीक-ठाक कारोबार किया। इस फ़िल्म से जैकी भगनानी को लोगों ने पहचाना। लेकिन जिस सफलता की उन्हें तलाश थी, वह उन्हें नहीं मिली। अपने बेटे को फ़िल्म जगत में स्थापित करने के लिए वाशु भगनानी ने हाल नहीं छोड़ा और 2012 में एक और फ़िल्म ’अजब ग़ज़ब लव’ बना डाली। लेकिन बदक़िस्मती से यह फ़िल्म भी बुरी तरह असफल रही। तीन बार मिली असफलता से ना बाप घबराए ना ही बेटा। और 2013 में फिर एक बार बाप-बेटे की जोड़ी लेकर आए ’रंगरेज़’। भले इस फ़िल्म को व्यावसायिक सफलता नहीं मिली, लेकिन समीक्षकों ने बहुत अच्छी प्रतिक्रियाएँ इस फ़िल्म के लिए दी और जैकी भगनानी के अभिनय की भी तारीफ़ें हुईं और उनसे लोगों की उम्मीदें जागने लगी। लेकिन 2014 की फ़िल्म ’यंगिस्तान’ की भयानक असफलता से ये उम्मीदें कम होने लगी। यह फ़िल्म विवादों से भी घिर गई जब सभी को यह पता चला कि इस फ़िल्म को भारत की तरफ़ से ऑस्कर के लिए भेजा जा रहा है। इसका घोर विरोध ही नहीं हुआ बल्कि लोग जैकी भगनानी का भी सोशल मीडिया पर मज़ाक उड़ाने लगे। वाशु भगनानी ने फिर भी हार नहीं मानी और अपने बेटे को लेकर 2015 में एक और फ़िल्म बनाई ’वेल्कम टू कराची’। कहने की आवश्यक्ता नहीं, यह फ़िल्म कब आई कब गई किसी को कानो-कान ख़बर तक नहीं हुई। इस साल यानी 2017 में जैकी भगनानी एक तमिल फ़िल्म में नज़र आने जा रहे हैं। वाशु भगनानी निर्मित ’मोहिनी’ नामक इस फ़िल्म पर जैकी के फ़िल्मी करीयर का फ़ैसला हो जाएगा। सही मायने में यह उनके लिए आर या पार होगा। जैकी भगनानी को कई पुरस्कार भी मिले हैं। उनकी पहली फ़िल्म ’कल किसने देखा’ के लिए उन्हें ’बेस्ट डेब्यु - मेल’ का IIFA Award, Apsara Award और Star Guild Award मिला। ’फ़ाल्तु’ के लिए उन्हें Star Guild Awards के तहत Superstar Of Tomorrow - Male का पुरस्कार मिला था। ’यंगिस्तान’ में उनके अभिनय के लिए BIG Star Entertainment Awards के तहत BIG Star Most Entertaining Actor in a Social Role - Male का पुरस्कार उन्हें दिया गया था। अब देखना यह है कि क्या जैकी भगनानी इन तमाम पुरस्कारों का मूल्य चुका सकते हैं इस इंडस्ट्री में अपने लिए एक बुलन्द मुक़ाम बना कर!


आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!





शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

शुक्रवार, 1 सितंबर 2017

गीत अतीत 28 || हर गीत की एक कहानी होती है || बखेड़ा / हंस मत पगली || विक्की प्रसाद || सिद्धार्थ गरिमा || सुखविंदर सिंह || सुनिधि चौहान || अक्षय कुमार

Geet Ateet 28
Har Geet Kii Ek Kahaani Hoti Hai...
Bakheda
Toilet Ek Prem Katha 
Vickey Prasad
Also featuring Sidharth-Garima, Sukhvinder Singh & Sunidhi Chauhan


"जब मैंने अपनी नानी को देखा कि पिछले तीन चार साल में वो कुछ और बूढी हो गयीं है, तब मैंने अपने आप से पुछा कि अब नहीं तो कब ?... " -    विक्की प्रसाद 

टॉयलेट एक प्रेम कथा के माध्यम से एक ज़रूरी सन्देश दर्शकों तक पहुँचाने की कोशिश की गयी है, फिल्म की सफलता में फिल्म के मधुर संगीत का भी बड़ा योगदान है. युवा संगीतकार विक्की प्रसाद ने आजकल के चालू ट्रेंड से हटकर फिल्म की पृठभूमि के अनुसार इसके गीतों को रचा है, सुनते हैं विक्की प्रसाद से इसी फिल्म के दो सबसे लोकप्रिय गीत "बखेड़ा" और "हंस मत पगली" के बनने की कहानी. प्ले पर क्लिक करें और सुने अपने दोस्त अपने साथी सजीव सारथी के साथ आज का एपिसोड.



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हौले हौले (गैर फ़िल्मी सिंगल)
कागज़ सी है ज़िन्दगी (जीना इसी का नाम है) 
बेखुद (गैर फ़िल्मी सिंगल)
इतना तुम्हें (मशीन) 
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पूरी कायनात (पूर्णा)
दम दम (फिल्लौरी)
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रेज़ा रेज़ा (सलाम मुंबई)

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