रविवार, 5 फ़रवरी 2017

राग मारवा और मारूबिहाग : SWARGOSHTHI – 304 : RAG MARAVA & MARUBIHAG







स्वरगोष्ठी – 304 में आज

राग और गाने-बजाने का समय – 4 : दिन के चौथे प्रहर के राग

राग मारवा की बन्दिश - ‘गुरु बिन ज्ञान नाहीं पावे...’




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर हमारी श्रृंखला- “राग और गाने-बजाने का समय” की चौथी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। है। उत्तर भारतीय रागदारी संगीत की अनेक विशेषताओं में से एक विशेषता यह भी है कि संगीत के प्रचलित राग परम्परागत रूप से ऋतु प्रधान हैं या प्रहर प्रधान। अर्थात संगीत के प्रायः सभी राग या तो अवसर विशेष या फिर समय विशेष पर ही प्रस्तुत किये जाने की परम्परा है। बसन्त ऋतु में राग बसन्त और बहार तथा वर्षा ऋतु में मल्हार अंग के रागों के गाने-बजाने की परम्परा है। इसी प्रकार अधिकतर रागों को गाने-बजाने की एक निर्धारित समयावधि होती है। उस विशेष समय पर ही राग को सुनने पर आनन्द प्राप्त होता है। भारतीय कालगणना के सिद्धान्तों का प्रतिपादन करने वाले प्राचीन मनीषियों ने दिन और रात के चौबीस घण्टों को आठ प्रहर में बाँटा है। सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक के चार प्रहर को दिन के और सूर्यास्त से लेकर अगले सूर्योदय से पहले के चार प्रहर को रात्रि के प्रहर कहे जाते हैं। उत्तर भारतीय संगीत के साधक कई शताब्दियों से विविध प्रहर में अलग-अलग रागों का परम्परागत रूप से प्रयोग करते रहे हैं। रागों का यह समय-सिद्धान्त हमारे परम्परागत संस्कारों से उपजा है। विभिन्न रागों का वर्गीकरण अलग-अलग प्रहर के अनुसार करते हुए आज भी संगीतज्ञ व्यवहार करते हैं। राग भैरव का गायन-वादन प्रातःकाल और मालकौंस मध्यरात्रि में ही किया जाता है। कुछ राग ऋतु-प्रधान माने जाते हैं और विभिन्न ऋतुओं में ही उनका गायन-वादन किया जाता है। इस श्रृंखला में हम विभिन्न प्रहरों में बाँटे गए रागों की चर्चा कर रहे हैं। श्रृंखला की आज की कड़ी में आज हम आपसे दिन के चौथे प्रहर के रागों पर चर्चा करेंगे और इस प्रहर के एक प्रमुख राग मारवा की बन्दिश सुविख्यात गायक उस्ताद राशिद खाँ के स्वरों में प्रस्तुत करेंगे। इसके साथ ही फिल्म संगीतकार रामलाल का स्वरबद्ध किया राग मारूबिहाग पर आधारित, फिल्म ‘सेहरा’ का एक गीत मोहम्मद रफी और लता मंगेशकर की आवाज़ में सुनवा रहे हैं।




भारतीय संगीत में रागों के गायन-वादन का समय निर्धारण करने के लिए शास्त्रकारों ने अनेक सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया है। पिछले अंकों में हमने अध्वदर्शक स्वर और वादी-संवादी स्वर के आधार पर रागों के समय निर्धारण की प्रक्रिया पर चर्चा की थी। आज हम आपसे दिन के चौथे प्रहर के रागों पर चर्चा कर रहे हैं। इस प्रहर के अन्त में ही सायंकालीन सन्धिप्रकाश रागों का समय आता है। अध्वदर्शक स्वर सिद्धान्त के अनुसार मध्यम स्वर के प्रकार से सन्धिप्रकाश रागों का निर्धारण भी किया जा सकता है। सन्धिप्रकाश काल उस समय को कहा जाता है, जब अन्धकार और प्रकाश का मिलन होता है। यह स्थिति चौबीस घण्टे की अवधि में दो बार उत्पन्न होती है। प्रातःकालीन सन्धिप्रकाश और सायंकालीन सन्धिप्रकाश जिसे गोधूलि बेला भी कहते हैं। प्रातःकालीन सन्धिप्रकाश रागों में शुद्ध मध्यम स्वर की तथा सायंकालीन सन्धिप्रकाश रागों में रागों में तीव्र मध्यम की प्रधानता होती है। भैरव, कलिंगड़ा, जोगिया आदि प्रातःकालीन सन्धिप्रकाश रागों में शुद्ध मध्यम और मारवा, श्री, पूरिया आदि सायंकालीन सन्धिप्रकाश रागों में तीव्र मध्यम स्वर का प्रयोग होता है।

उस्ताद राशिद  खाँ
दिन के चौथे प्रहर में गाने-बजाने वाले रागों में तीव्र मध्यम स्वर की प्रधानता होती है। इस प्रहर के दो ऐसे ही राग का उदाहरण आज के अंक में हम प्रस्तुत कर रहे हैं। इस प्रहर का एक प्रमुख राग ‘मारवा’ है। यह मारवा थाट का आश्रय राग है। इसकी जाति षाडव-षाडव होती है, अर्थात इस राग के आरोह और अवरोह में 6-6 स्वरों का प्रयोग होता है। राग मारवा में पंचम स्वर वर्जित होता है। ऋषभ स्वर कोमल, मध्यम स्वर तीव्र और शेष स्वर शुद्ध प्रयोग किये जाते हैं। इस राग का वादी स्वर ऋषभ और संवादी स्वर धैवत होता है। अन्य रागों की तुलना में राग मारवा शुष्क और चंचल प्रकृति का राग है। इस राग में विलम्बित खयाल और मसीतखानी गते कम प्रचलित हैं। इस राग का प्रयोग करते समय तानपूरे का प्रथम तार मन्द्र निषाद में मिलाया जाता है, क्योंकि इस राग में शुद्ध मध्यम और पंचम दोनों स्वर वर्जित होते हैं। आपको हम इस राग का तीनताल में निबद्ध एक खयाल सुनवाते हैं। इसे प्रस्तुत कर रहे हैं, रामपुर सहसवान घराने की गायकी के संवाहक उस्ताद राशिद खाँ।

राग मारवा : “गुरु बिन ज्ञान नाहीं पावे...” : उस्ताद राशिद खाँ


मुहम्मद रफी  और लता  मंगेशकर
राग मारवा के अलावा दिन के चौथे प्रहर के कुछ अन्य प्रमुख राग हैं- मुल्तानी, पटदीप, कोलहास, रत्नदीप, श्रीवन्ती, धौलश्री, मयूर बसन्त, पूर्वी, मारूबिहाग आदि। अब हम आपको एक फिल्मी गीत सुनवाते हैं जो राग मारूबिहाग पर आधारित है। अभी आपने मारवा थाट का राग मारवा सुना जिसे, परमेल प्रवेशक राग भी कहा जाता है, क्योंकि इसके बाद कल्याण थाट के राग गाये जाते हैं। राग मारूबिहाग कल्याण थाट राग है। इसे सन्धिप्रकाश राग भी कहा जाता है। यह राग औडव-सम्पूर्ण जाति का है, अर्थात आरोह में पाँच और अवरोह में सात स्वर प्रयोग किये जाते हैं। आरोह में ऋषभ और धैवत स्वरों का प्रयोग नहीं होता। राग में तीव्र मध्यम स्वर का प्रयोग मुख्यतः किया जाता है। शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग होते हैं। राग का वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर निषाद होता है। राग मारूबिहाग में कल्याण और बिहाग रागों का मिश्रण होता है। इस राग में तीव्र मध्यम के साथ शुद्ध मध्यम का प्रयोग भी होता है। तीव्र मध्यम आरोह और अवरोह दोनों में किया जाता है, जबकि शुद्ध मध्यम केवल आरोह में षडज के साथ प्रयोग होता है। इस राग का चलन तीनों सप्तकों में समान रूप से होता है। 1963 में वी. शान्ताराम के निर्देशन में फिल्म ‘सेहरा’ का निर्माण और प्रदर्शन हुआ था। इस फिल्म के संगीतकार वाराणसी के कुशल शहनाई-वादक रामलाल ने कई गीत रागों में बाँधे थे। राग मारूबिहाग पर आधारित यह गीत भी इस फिल्म में शामिल था। गीत में लता मंगेशकर और मुहम्मद रफी ने युगल-स्वर दिया था। राग मारूबिहाग की स्पष्ट छाया इस गीत में मिलती है। आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग मारूबिहाग : “तुम तो प्यार हो सजना...” : लता मंगेशकर और मुहम्मद रफी : फिल्म – सेहरा



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 304थे अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक राग आधारित फिल्मी गीत का अंश सुनवा रहे हैं। इस गीतांश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली क्रमांक 310 के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के पहले सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा।






1 – गीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि इस गीतांश में किस राग की छाया है?

2 – प्रस्तुत रचना किस ताल में निबद्ध है? ताल का नाम बताइए।

3 – आप गायक और गायिका की आवाज़ को पहचान कर उनके नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 11 फरवरी, 2017 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 306ठें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत किये गए गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस मंच पर स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के 302सरे अंक की संगीत पहेली में हमने आपको 1952 में प्रदर्शित फिल्म ‘नौबहार’ के एक गीत का अंश सुनवाया था और आपसे तीन में से किसी दो प्रश्न का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – भीमपलासी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – कहरवा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायिका – लता मंगेशकर

इस बार की पहेली में तीनों प्रश्नों के सही उत्तर देने वाली हमारी नियमित प्रतिभागी हैं, चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी, वोरहीज़, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया और जबलपुर से क्षिति तिवारी। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर हमारी लघु श्रृंखला “राग और गाने-बजाने का समय” अगले अंक में हम रात्रि के प्रथम प्रहर के कुछ रागों पर चर्चा करेंगे और आपको कुछ रागबद्ध रचनाएँ भी सुनवाएँगे। इस श्रृंखला के लिए आप अपनी पसन्द के गीत, संगीत और राग की फरमाइश कर सकते हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के विभिन्न अंकों के बारे में हमें पाठकों, श्रोताओं और पहेली के प्रतिभागियों की अनेक प्रतिक्रियाएँ और सुझाव मिलते हैं। प्राप्त सुझाव और फरमार्इशों के अनुसार ही हम अपनी आगामी प्रस्तुतियों का निर्धारण करते हैं। आप भी यदि कोई सुझाव देना चाहते हैं तो आपका स्वागत है। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के नये अंक के साथ हम उपस्थित होंगे। हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 




शनिवार, 4 फ़रवरी 2017

चित्रकथा - 5: गुलज़ार के गीतों में विरोधाभास


अंक - 5

गुलज़ार के गीतों में विरोधाभास

“एक पल रात भर नहीं गुज़रा...”



'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। समूचे विश्व में मनोरंजन का सर्वाधिक लोकप्रिय माध्यम सिनेमा रहा है और भारत कोई व्यतिक्रम नहीं है। बीसवीं सदी के चौथे दशक से सवाक् फ़िल्मों की जो परम्परा शुरु हुई थी, वह आज तक जारी है और इसकी लोकप्रियता निरन्तर बढ़ती ही चली जा रही है। और हमारे यहाँ सिनेमा के साथ-साथ सिने-संगीत भी ताल से ताल मिला कर फलती-फूलती चली आई है। सिनेमा और सिने-संगीत, दोनो ही आज हमारी ज़िन्दगी के अभिन्न अंग बन चुके हैं। हमारी दिलचस्पी का आलम ऐसा है कि हम केवल फ़िल्में देख कर या गाने सुनने तक ही अपने आप को सीमित नहीं रखते, बल्कि फ़िल्म संबंधित हर तरह की जानकारियाँ बटोरने का प्रयत्न करते रहते हैं। इसी दिशा में आपके हमसफ़र बन कर हम आ रहे हैं हर शनिवार ’चित्रकथा’ लेकर। ’चित्रकथा’ एक ऐसा स्तंभ है जिसमें बातें होंगी चित्रपट की और चित्रपट-संगीत की। फ़िल्म और फ़िल्म-संगीत से जुड़े विषयों से सुसज्जित इस पाठ्य स्तंभ के पहले अंक में आपका हार्दिक स्वागत है। 

गुलज़ार एक ऐसे गीतकार हैं जिन्होंने अपने गीतों में हिन्दी व्याकरण के अलंकारों का बहुतायात में प्रयोग किया है। रूपक और उपमा के के प्रयोगों से उन्होंने हमेशा अपने श्रोताओं को चमत्कृत तो किया ही है, कई बार उन्होंने ’विरोधाभास’ का भी प्रयोग अपने गीतों में किया है। आइए आज ’चित्रशाला’ में गुलज़ार के लिखे उन गीतों की चर्चा करें जिनमें विरोधाभास की झलक मिलती है।




 जिस तरह से अलंकार नारी की शोभा और गरिमा को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, उसी
तरह से हिन्दी काव्य और साहित्य में भी कुछ अलंकार चिन्हित हैं जिनसे भाषा और अभिव्यक्ति की शोभा बढ़ती है। अनुप्रास, उपमा, रूपक, यमक, श्लेष, उत्प्रेक्षा, अन्योक्ति, अतिशयोक्ति, संदेह, उभय और दृष्टान्त हिन्दी व्याकरण के प्रमुख अलंकार हैं। एक और अलंकार है जिसे कई बार अलंकारों की श्रेणी में शामिल किया जाता है और वह है विरोधाभास अलंकार, यानी कि विरोध का आभास कराने वाला। विरोधाभास जिसे अंग्रेज़ी में contradiction या contradictory कह सकते हैं। तो इस विरोधाभास से भी भाषा को अलंकृत किया जा सकता है। जब किसी काव्य या गद्य में कही गई दो बातें आपस में प्रतिवाद करे या एक दूसरे का विरोध करे, एक दूसरे को contradict करे, उसे विरोधाभास अलंकार कहा जाता है। दूसरे शब्दों में, साहित्य में एक विरोधमूलक अर्थालंकार जिसमें वस्तुतः विरोध का वर्णन न होने पर भी विरोध का आभास होता है, उसे विरोधाभास कहते हैं। उदाहरण के रूप में, "या अनुरागी चित्त की गति समझें नहीं कोइ, ज्यों-ज्यों बूडै स्याम रंग त्यों-त्यों उज्ज्वल होइ।", यहाँ स्याम रंग (काले रंग) में डूबने पर भी उज्ज्वल (सफ़ेद) होने की बात कही गई है, इसलिए इसमें विरोधाभास है।

गीतकार गुलज़ार के अनेक गीतों में विरोधाभास के उदाहरण सुने जा सकते हैं। कुछ विरोधाभास तो ऐसे हैं जिनका उन्होंने एकाधिक बार प्रयोग किया है। इनमें से एक है "ख़ामोशियों की गूंज"। ख़ामोशी यानी चुप्पी, यानी जिसकी कोई आवाज़ नहीं, भला ख़ामोशी कैसे पुकार सकती है, ख़ामोशी कैसे गूंज सकती है, ख़ामोशी कैसे गुनगुना सकती है? इस विरोधाभास का प्रयोग गुलज़ार साहब ने पहली बार सम्भवत: 1969 की फ़िल्म ’ख़ामोशी’ के ही गीत में किया था। "हमने देखी है उन आँखों की महकती ख़ुशबू" गीत के अन्तरे में वो लिखते हैं "प्यार कोई बोल नहीं, प्यार आवाज़ नहीं, एक ख़ामोशी है सुनती है कहा करती है"। ख़ामोशी कह रही है, इसमें विरोधाभास है। इसके बाद 1975 की फ़िल्म ’मौसम’ के गीत "दिल ढूंढ़ता है" के अन्तरे में उन्होंने कहा "वादी में गूंजती हुई ख़ामोशियाँ सुने"। यहाँ गूंजती हुई ख़ामोशियाँ में विरोधाभास है। 1978 की फ़िल्म ’घर’ के गीत "आपकी आँखों में कुछ" में एक जगह वो कहते हैं "आपकी ख़ामोशियाँ भी आपकी आवाज़ है"। ख़ामोशियों की आवाज़ में विरोधाभास है। गुलज़ार के इस विरोधाभास का प्रयोग गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी ने कई साल बाद 2001 में आई फ़िल्म 'वन टू का फ़ोर’ के गीत "ख़ामोशियाँ गुनगुनाने लगी, तन्हाइयाँ मुसुकुराने लगी" के शुरु में किया था। इसमें तो दो दो विरोधाभास हैं - ख़ामोशियाँ के गुनगुनाने में और तन्हाइयों के मुस्कुराने में। तन्हाई दर्द का प्रतीक है, ये मुस्कुरा कैसे सकती है भला!! तन्हाई से संबंधित एक और विरोधाभास गुलज़ार ने दिया 1980 की फ़िल्म ’सितारा’ के गीत "ये साये हैं ये दुनिया है" में जब वो कहते हैं कि "भरी भीड़ में ख़ाली तन्हाइयों की" और फिर "बड़ी नीची राहें हैं ऊँचाइयों की"। 

गुलज़ार के गीतों में विरोधाभास का बहुत ही सुन्दर प्रयोग देखने/सुनने को मिलता है। एक और विरोधाभास जिसका उन्होंने एकाधिक बार प्रयोग किया है, वह है पल, समय, वक़्त को लेकर। "जाने क्या सोच कर नहीं गुज़रा, एक पल रात भर नहीं गुज़रा" (’किनारा’, 1977- इसमें विरोधाभास को किस ख़ूबसूरती से दर्शाया गया है ज़रा महसूस कीजिए। एक पल जो एक ही पल में गुज़र जाना चाहिए, उसे गुलज़ार साहब रात भर रोके रखते हैं। 1996 की फ़िल्म ’माचिस’ के मशहूर गीत "छोड़ आए हम वो गलियाँ" में गुलज़ार लिखते हैं "इक छोटा सा लम्हा है जो ख़त्म नहीं होता"। ’किनारा’ और ’माचिस’ के इन दो उदाहरणों में समानता स्पष्ट है। ये तो रही पल या लम्हे के ना गुज़रने का विरोधाभास। इसी संदर्भ में रात के ना गुज़रने को भी कई बार दर्शाया है उन्होंने। "दो नैनों में आँसू भरे हैं, निन्दिया कैसे समाये" गीत में एक पंक्ति है "ज़िन्दगी तो काटी ये रात कट जाए"। फ़िल्म ’आंधी’ के मशहूर गीत "तुम आ गए हो नूर आ गया है" में पंक्ति है "दिन डूबा नहीं रात डूबी नहीं जाने कैसा है सफ़र"; इसी फ़िल्म के अन्य गीत "तेरे बिना ज़िन्दगी से कोई" में पंक्ति है "तुम जो कहदो तो आज की रात चाँद डूबेगा नहीं, चाँद को रोक लो"। इन सभी उदाहरणों में विरोधाभास का एक वलय इन्हें घेर रखा है। फ़िल्मा ’लिबास’ के "सिलि हवा छू गई" में "जितने भी तय करते गए, बढ़ते गए ये फ़ासले" में भी कुछ कुछ इसी तरह का विरोध है; तय करने पर फ़ासला कम होना चाहिए, ना कि बढ़ना चाहिए!

गुलज़ार के गीतों में विरोधाभास की फ़ेहरिस्त इतनी लम्बी है कि सबका ज़िक्र करने लगे तो पूरी की पूरी किताब बन जाएगी। फ़िल्म ’गृहप्रवेश’ के गीत "पहचान तो थी पहचाना नहीं" में तीन विरोधाभास के उदाहरण मिलते हैं। मुखड़ा ही विरोधाभास से भरा हुआ है -"पहचान तो थी पहचाना नहीं, मैं अपने आप को जाना नहीं"। पहचान होते हुए भी ना पहचानना और अपने आप को ही नहीं जानना विरोध का आभास कराता है। पहले अन्तरे की पहली पंक्ति है "जब धूप बरसती है सर पे"। बरसने का अर्थ आम तौर पर बारिश होता है। धूप जो बारिश के बिलकुल विपरीत है, वह भला कैसे बरस सकती है? बारिश से याद आया फ़िल्म ’उसकी कहानी’ के गीत "मेरी जाँ मुझे जाँ ना कहो मेरी जाँ" में एक पंक्ति है "सूखे सावन बरस गए, इतनी बार आँखों से"। यहाँ एक ही उदाहरण में दो दो विरोधाभास है। पहला यह कि सावन सूखा कैसे हो सकता है? और दूसरा यह कि अगर सावन सूखा है तो बरस कैसे सकता है? वापस आते हैं ’गृह प्रवेश’ के गीत पर। इसके दूसरे अन्तरे में कहा गया - "मैं जागी रही कुछ सपनों में, और जागी हुई भी सोई रही"। विरोधाभास से कैसा सुन्दर बन पड़ा है यह अभिव्यक्ति!

1959 की फ़िल्म ’कागज़ के फूल’ में कैफ़ी आज़मी ने लिखा था "वक़्त ने किया क्या हसीं सितम"। "हसीं सितम" के इस विरोधाभास का गुलज़ार ने भी प्रयोग किया था फ़िल्म ’किनारा’ के ही एक अन्य गीत में। "नाम गुम जाएगा, चेहरा यह बदल जाएगा" में वो कहते हैं कि "वक़्त के सितम कम हसीं नहीं"। सितम के बाद आते हैं बेवफ़ाई पर। 1980 में जब इसमाइल श्रॉफ़ की फ़िल्म ’थोड़ी सी बेवफ़ाई’ में गीत लिखने का मौक़ा गुलज़ार को मिला, तो उन्होंने इस फ़िल्म के शीर्षक गीत के रूप में एक ऐसे गीत की रचना कर डाली जो फ़िल्म की पूरी कहानी का निचोड़ बन कर रह गया। और बोल भी ऐसे चुने कि सुनने वाला वाह किए बिना न रह सके! "हज़ार राहें मुड़ के देखीं कहीं से कोई सदा न आई, बड़ी वफ़ा से निभाई तुमने हमारी थोड़ी सी बेवफ़ाई"। बरसों पहले राजेन्द्र कृष्ण ने लिखा था "हमसे आया ना गया, तुमसे बुलाया ना गया, फ़ासला प्यार में दोनों से मिटाया ना गया"। कुछ कुछ इसी तरह का भाव था ’थोड़ी से बेवफ़ाई’ के गीत में भी, पर बोल और भी ज़्यादा असरदार। "वफ़ा" और "बेवफ़ा" एक दूसरे के विपरीत शब्द हैं। तो फिर बड़ी वफ़ा से बेवफ़ाई को निभाना आख़िर विरोधाभास नहीं तो और क्या है!

गुलज़ार के गीतों में पैरों के नीचे कभी ज़मीन बहने लगती है तो कभी सर से आसमान उड़ जाता है। चाहे कितना भी विरोधाभास क्यों न हो, कितनी ही असंगति क्यों न हो, हर बार गुलज़ार अपने श्रोताओं को चमत्कृत कर देते हैं ऐसे ऐसे विरोधाभास देकर कि जिसकी कल्पना इससे पहले किसी ने नहीं की होगी। ’नमकीन’ फ़िल्म के गीत "राह पे रहते हैं, यादों पे बसर करते हैं" में वो लिखते हैं "उड़ते पैरों के तले जब बहती है ज़मीं"। इससे उनका इशारा है कि एक ट्रक ड्राइवर जो अपनी ट्रक दौड़ाए जा रहा है, पाँव उसका ज़मीन पर नहीं है (ट्रक पर है), मतलब वो ज़मीन से उपर है या उड़ रहा है, और चलते हुए ट्रक से नीचे देखा जाए तो प्रतीत होता है कि ज़मीं पीछे सरक रही है। भावार्थ में चाहे विरोधाभास ना हो पर शाब्दिक अर्थ को देखा जाए तो इस पंक्ति में विरोध का आभास ज़रूर है। ’बण्टी और बबली’ का गीत "चुप चुपे के" तो विरोधाभास और रूपक से भरा हुआ है। "देखना मेरे सर से आसमाँ उड़ गया है", "देखना आसमाँ के सिरे खुल गए हैं ज़मीं से", "देखना क्या हुआ है, ये ज़मीं बह रही है", "पाँव रुकने लगे, राह चलने लगी", "देखना आसमाँ ही बरसने लगे ना ज़मीं पे" - इन सभी में कहीं न कहीं विरोधाभास है।

गुलज़ार के विरोधाभास से सजे कुछ और गीत गिनवाए जाएँ। "तुम पुकार लो, तुम्हारा इन्तज़ार है" में पंक्ति है "रात ये क़रार की बेक़रार है"; ’माचिस’ के गीत "भेजे कहार" में "ठंडी नमी जलती रही"; "दो दीवाने शहर में" के गीत में "जब तारे ज़मीं पर चलते हैं, आकाश ज़मीं हो जाता है"; ’रुदाली’ के गीत "समय ओ धीरे चलो" में साँस जो जीवन का आधार है उसे ही ज़हर करार देते हुए गुलज़ार लिखते हैं "ज़हर ये साँस का पीया ना पीया"। इसी तरह से "यारा सीली सीली" में पंक्ति है "पैरों में ना साया कोई सर पे ना साईं रे, मेरे साथ जाए ना मेरी परछाईं रे"। परछाई का साथ में न जाना एक विरोधाभास है। इस तरह से ध्यानपूर्वक गुलज़ार के गीतों को सुनने पर और भी बहुत से विरोधाभास के उदाहरण मिल जाएँगे इसमें कोई संदेह नहीं है। जिस ख़ूबसूरती से गुलज़ार ने विरोधाभास से अपने गीतों को सजाया है, शायद ही किसी अन्य गीतकार ने ऐसा किया हो। और यही वजह है कि गुलज़ार के गीतों से सिर्फ़ मनोरंजन ही नहीं होता, भाषा और साहित्य का अध्ययन भी होता है।

आपकी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!


शोध, आलेख, प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र 


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

बुधवार, 1 फ़रवरी 2017

"नवलेखन ज्ञानपीठ पुरस्कार मिलना मेरे लेखन यात्रा का टर्निंग पॉइंट रहा" - पंकज सुबीर II एक मुलाकात ज़रूरी है

एक मुलाकात ज़रूरी है 
एपिसोड - 48



निर्देशक कृष्ण कान्त पंडया की आने वाली फिल्म "बियांबान - the curse of women" आधारित है जाने माने साहित्यकार पंकज सुबीर की कहानी 'दो एकांत' पर. इस कहानी और इस फिल्म की मेकिंग पर बातचीत करने के लिए आज हमारे साथ है पंकज सुबीर. प्ले का बट्टन दबाएँ और सुनें इस दिलचस्प बातचीत को....



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एक मुलाकात ज़रूरी है इस एपिसोड को आप यहाँ से डाउनलोड करके भी सुन सकते हैं, लिंक पर राईट क्लीक करें और सेव एस का विकल्प चुनें


मिलिए इन जबरदस्त कलाकारों से भी -
राशिद खान, दिग्विजय सिंह परियारराकेश चतुर्वेदी ओम, अनवर सागरसंजीवन लालकुणाल वर्माआदित्य शर्मानिखिल कामथमंजीरा गांगुली, रितेश शाह, वरदान सिंह, यतीन्द्र मिश्र, विपिन पटवा, श्रेया शालीन, साकेत सिंह, विजय अकेला, अज़ीम शिराज़ी, संजोय चौधरी, अरविन्द तिवारी, भारती विश्वनाथन, अविषेक मजुमदर, शुभा मुदगल, अल्ताफ सय्यद, अभिजित घोषाल, साशा तिरुपति, मोनीश रजा, अमित खन्ना (पार्ट ०१), अमित खन्ना (पार्ट २), श्रध्दा भिलावे, सलीम दीवान, सिद्धार्थ बसरूर, बबली हक, आश्विन भंडारे , आर्व, रोहित शर्मा, अमानो मनीष, मनोज यादव, इब्राहीम अश्क, हेमा सरदेसाई, बिस्वजीत भट्टाचार्जी (बिबो), हर्षवर्धन ओझा, रफीक शेख, अनुराग गोडबोले, रत्न नौटियाल, डाक्टर सागर

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