Saturday, July 30, 2016

"तेरी ही लत लगी है आजकल" - क्या वाक़ई Singles की लत लगी है आजकल?

चित्रशाला - 09
Singles - ग़ैर फ़िल्म-संगीत की नई प्रवृत्ति





'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! प्रस्तुत है फ़िल्म और फ़िल्म-संगीत के विभिन्न पहलुओं से जुड़े विषयों पर आधारित शोधालेखों का स्तंभ ’चित्रशाला’। भले इस स्तंभ में हम फ़िल्म और फ़िल्म-संगीत संबंधित विषयों पर चर्चा करते हैं, आज हम नियम भंग करने की ग़ुस्ताख़ी कर रहे हैं, हालाँकि जिस विषय की हम चर्चा करने जा रहे हैं वह फ़िल्म जगत से बहुत ज़्यादा दूरी पर नहीं है। आज हम चर्चा करेंगे संगीत के एक नए झुकाव की, आज के दौर के संगीत की एक नई प्रवृत्ति जिसे हम ’Singles' का नाम देते हैं। 



भारत एक ऐसा देश है जहाँ 100 करोड़ लोगों की आबादी कुछ गिने चुने सितारों के ही दीवाने हैं, और जहाँ हिन्दी फ़िल्मों से बढ़ कर कोई ऐसी चीज़ नहीं है जो 100 करोड़ आबादी तक समान रूप से पहुँच सके। अतीत में यह बिल्कुल आश्चर्य की बात नहीं थी कि अगर आपको अपना गीत जन जन तक पहुँचाना हो तो उसे एक फ़िल्मी गीत ही होना पड़ता था। लेकिन आज समय बदल चुका है। एक नया ज़रिया, एक नया फ़ॉरमुला आ गया है जिसके ज़रिए कोई भी व्यक्ति अपने श्रोताओं और जन-साधारण तक बड़ी आसानी से पहुँच सकता है। और इस जादू की छड़ी का नाम है ’सिंगल्स’ (Singles)। जी हाँ, आप अपना एक ’सिन्गल’ (एक गीत) बनाइए, उसका एक आकर्षक विडियो शूट कीजिए, टेलीविज़न पर उसका प्रोमो डाल दीजिए और प्रार्थना कीजिए कि सोशल नेटवर्किंग् पर वन वाइरल बन जाए, उसे करोड़ों हिट्स मिले, और इस तरह से आपने ना केवल एक रचनात्मक कार्य किया बल्कि व्यावसायिक सफलता भी अर्जित की।

सिन्गल्स का सिलसिला भले विदेशों में एक लम्बे अरसे से चला आ रहा है, हमारे देश में इसकी प्रथा
हाल ही में, या यूं कहें कि 2014 से चल पड़ी है जब लोकप्रिय रैपर यो यो हनी सिंह ने ’देसी कलाकार’ सिन्गल बना कर रातों रात तहल्का मचा दिया था। इस सिन्गल के लिए उन्होंने अमरीका के लॉस ऐजेलिस में सोनाक्षी सिंहा को लेकर एक आकर्षक विडियो शूट कर इसे और भी ज़्यादा लोकप्रिय बना दिया था। इसके बाद संगीतकार व गायक शेखर रवजियानी (विशाल-शेखर वाले) ने ’हनुमान चालिसा’ का एक अपना अलग संस्करण तैयार किया जिसे भी लोगों ने सराहा। फिर आया सोनू निगम का ’त्रिनि लड़की’ जिसने सोनू निगम के शुरुआती समय के तमाम ग़ैर-फ़िल्मी ऐल्बमों की यादें ताज़ा कर दी। अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा भी पीछे नहीं रहीं और विलियम के साथ ’In My City' गा कर सभी को चकित कर दिया। लेकिन जिस सिन्गल ने सिन्गल के मान को यकायक उपर उठा दिया, वह था हृतिक रोशन जैसे सुपर स्टार का ’धीरे धीरे’ गीत। हृतिक इस दौर के न केवल सबसे आकर्षक दिखने वाले नायकों में से एक हैं बल्कि फ़िल्म जगत के सर्वकालीन श्रेष्ठ नर्तकों में उनका नाम बहुत उपर आता है। इसलिए जब उन्होंने भूषण कुमार निर्मित इस सिन्गल के लिए हामी भरी तब यह अनुमान लगाना मुश्किल नहीं था कि यह सुपरहिट होने वाला है। यो यो हनी सिंह ने ’आशिक़ी’ के इस हिट गीत को नया जामा पहनाया। इस गीत के रिलीज़ होते ही प्रथम सप्ताह में ही इसे 16 मिलियन हिट्स मिले और सिन्गल्स का यह सिलसिला आगे बढ़ता चला गया।

अभी हाल ही में, 14 जुलाई 2016 को रिलीज़ हुआ नया सिन्गल "तेरी ही लत लगी है आजकल, मौजों
तेरी ही लत लगी है आजकल...
में ज़िन्दगी है आजकल"। गायक - संतोष कुमार सिन्हा, संगीतकार - शुभांगी राठौड़, गीतकार - विकास कौशिक। गीत फ़िल्माया गया है तेज़ी से टेलीविज़न की सीढ़ियाँ चढ़ते अभिनेता राहुल चौधरी और उनकी नायिका बनी हैं गहना वशिष्ठ। पिछले पन्द्रह दिनों में इस गीत को यू-ट्युब चैनल पर करीब 27,000 हिट्स मिल चुके हैं और यह संख्या दिन-ब-दिन बढ़ती चली जा रहे है। यहाँ यह बताना ज़रूरी है कि इस गीत से पहले भी गायक संतोष कुमार सिन्हा ने एक सिन्गल बनाया था जिसका शीर्षक था ’साजना रे’ जिसे लाखों की संख्या में ’लाइक्स’ मिले थे। "तेरी लत लगी है आज..." ने इस रेकॉर्ड को तोड़ने की पूरी तैयारी की है। 90 के दशक के सॉफ़्ट मेलोडियस नंबर का अहसास लिए यह गीत एक ताज़े हवा के झोंके की तरह आया है जिसे सुन कर एक सुकून की अनुभूति हो रही है। अभिनेता राहुल चौधरी से करीबी संबंध होने की वजह से मुझे इस गीत के बारे में उनके विचार जानने को मिले - "यह नई टीम एक नया गीत बनाने की सोच रहे थे जो एक सुन्दर रोमान्टिक विडियो गीत हो। निर्देशक साहब ने मुझे बुलाया और कॉनसेप्ट बताया। मुझे कॉनसेप्ट अच्छा तो लगा पर साथ ही घबराहट भी हुई क्योंकि इस तरह का रोमान्टिक काम मैंने पहले कभी नहीं किया था। लेकिन पूरी टीम इतनी अच्छी थी कि इसमें काम करते हुए कोई परेशानी नहीं हुई, एक याराना सा माहौल था। मुझे लगा नहीं कि मैं एक नई टीम के साथ काम कर रहा हूँ, सभी बहुत टैलेन्टेड हैं। अब मुझे ख़ुशी हो रही है जब लोग इस गीत के लिए अच्छे कमेण्ट्स भेज रहे हैं। मुझे हमेशा से नए नए काम करने में अच्छा लगता है।"


सिन्गल्स एक ऐसा माध्यम है जिसके ज़रिए नए नए कलाकार अन्य कलाकारों के साथ मिल कर एक नया गीत तैयार कर सकते हैं जिससे रचनात्मक और व्यावसायिक तृप्ति, दोनों प्राप्त होती है। इस नई प्रवृत्ति को देखते हुए यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि सिन्गल्स संगीत की नई धारा है जिसका भविष्य उज्ज्वल है।



खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी  

Thursday, July 28, 2016

"है जिसकी रंगत शज़र-शज़र में, ख़ुदा वही है...", कविता सेठ ने सूफ़ियाना कलाम की रंगत ही बदल दी हैं



कहकशाँ - 15
कविता सेठ की गाई हुई एक नज़्म  
"ख़ुदा वही है..."



’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी दोस्तों को हमारा सलाम! दोस्तों, शेर-ओ-शायरी, नज़्मों, नगमों, ग़ज़लों, क़व्वालियों की रवायत सदियों की है। हर दौर में शायरों ने, गुलुकारों ने, क़व्वालों ने इस अदबी रवायत को बरकरार रखने की पूरी कोशिशें की हैं। और यही वजह है कि आज हमारे पास एक बेश-कीमती ख़ज़ाना है इन सुरीले फ़नकारों के फ़न का। यह वह कहकशाँ है जिसके सितारों की चमक कभी फ़ीकी नहीं पड़ती और ता-उम्र इनकी रोशनी इस दुनिया के लोगों के दिल-ओ-दिमाग़ को सुकून पहुँचाती चली आ रही है। पर वक्त की रफ़्तार के साथ बहुत से ऐसे नगीने मिट्टी-तले दब जाते हैं। बेशक़ उनका हक़ बनता है कि हम उन्हें जानें, पहचानें और हमारा भी हक़ बनता है कि हम उन नगीनों से नावाकिफ़ नहीं रहें। बस इसी फ़ायदे के लिए इस ख़ज़ाने में से हम चुन कर लाएँगे आपके लिए कुछ कीमती नगीने हर हफ़्ते और बताएँगे कुछ दिलचस्प बातें इन फ़नकारों के बारे में। तो पेश-ए-ख़िदमत है नगमों, नज़्मों, ग़ज़लों और क़व्वालियों की एक अदबी महफ़िल, कहकशाँ। आज पेश है गायिका कविता सेठ की गाई हुई एक नज़्म।



आज हम अपनी महफ़िल को उस गायिका की नज़र करने वाले हैं, जो यूँ तो अपनी सूफ़ियाना गायकी के लिए मक़बूल है, लेकिन लोगों ने उन्हें तब जाना, तब पहचाना जब उनका "इकतारा" सिद्दार्थ (सिड) को जगाने के लिए फिल्मी गानों के गलियारे में गूंज उठा। एकबारगी "इकतारा" क्या बजा, फिल्मी गानों और पुरस्कारों का रूख ही मुड़ गया इनकी ओर। २००९ का ऐसा कौन-सा पुरस्कार है, ऐसा कौन-सा सम्मान है, जो इन्हें न मिला हो! इन्हें सुनकर एक अलग तरह की अनुभूति होती है, ऐसा लगता है मानो आप खुद "ट्रांस" में चले गए हों और आपके आस-पास की दुनिया स्वर-विहीन हो गई हो। शांति का वातावरण-सा बुन गया हो कोई! 

आत्मा में कलम डुबोकर लिखी गई किसी कविता की तरह ही हैं ये, जिनका नाम है "कविता सेठ"। इनका जन्म उत्तर प्रदेश के बरेली में हुआ, वहीं इनका पालन-पोषण हुआ और वहीं पर स्नातक तक की शिक्षा इन्होंने ग्रहण की। शादी के बाद ये दिल्ली चली आईं और फिर ऑल इंडिया रेडिया एवं दूरदर्शन के लिए गाना शुरू कर दिया। इसी दौरान इन्होंने दिल्ली के ही "गंधर्व महाविद्यालय" से "संगीत अलंकार" (संगीत के क्षेत्र में स्नातकोत्तर) की उपाधि प्राप्त की, साथ ही साथ दिल्ली विश्वविद्यालय से "हिन्दी साहित्य" में परा-स्नातक की डिग्री भी ग्रहण की। इन्होंने हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ग्वालियर घराने के "एन डी शर्मा", गंधर्व महाविद्यालय के विनोद एवं दिल्ली घराने के उस्ताद इक़बाल अहमद ख़ान से प्राप्त की है। 

इन्होंने बरेली के "ख़ान-कहे नियाज़िया दरगाह" से अपनी हुनर का प्रदर्शन प्रारंभ किया, फिर आगे चलकर ये पब्लिक शोज़ एवं म्युज़िकल कंसर्ट्स में गाने लगीं। कविता मुख्यत: सूफ़ी गाने गाती हैं, अगरचे गीत, ग़ज़ल एवं लोकगीतों में भी महारत हासिल है। इन्होंने देश-विदेश में कई सारी जगहों पर शोज़ किए हैं। ऐसे ही एक बार मुज़फ़्फ़र अली के अंतर्राष्ट्रीय सूफ़ी महोत्सव (इंटरनेशल सूफ़ी फ़ेस्टिवल) में इनके प्रदर्शन को देखकर/सुनकर सतीश कौशिक ने इन्हें अपनी फिल्म "वादा" में "ज़िंदगी को मौला" गाने का न्यौता दिया था। आगे चलकर जब ये मुंबई आ गईं तो इन्हें २००६ में अनुराग बासु की फिल्म "गैंगस्टर" में "मुझे मत रोको" गाने का मौका मिला। इस गाने में इनकी गायकी को काफी सराहा गया, लेकिन अभी भी इनका फिल्मों में सही से आना नहीं हुआ था। ये अपने आप को प्राइवेट एलबम्स तक ही सीमित रखी हुई थीं। इन्होंने "वो एक लम्हा" और "दिल-ए-नादान" नाम के दो सूफ़ी एलबम रीलिज किए। फिर आगे चलकर एक इंडी-पॉप एलबम "हाँ यही प्यार है" और दो सूफ़ी अलबम्स "सूफ़ियाना (२००८)" (जिससे हमने आज की नज़्म ली है) एवं "हज़रत" भी इनकी नाम के साथ जुड़ गए। "सूफ़ियाना" सूफ़ी कवि "रूमी" की रूबाईयों और कलामों पर आधारित है। कविता ने इन्हें लखनऊ के ८०० साल पुराने "खमन पीर के दरगाह" पर रीलिज किया था।

कुछ समय पहले कविता "कारवां" नाम के सूफ़ी बैंड का हिस्सा बनीं हैं, जब एक अंतर्राष्ट्रीय सूफ़ी महोत्सव में इनका ईरान और राजस्थान के सूफ़ी संगीतकारों से मिलना हुआ था। तब से यह समूह सूफ़ी संगीत के प्रचार-प्रसार में पुरज़ोर तरीके से लगा हुआ है। आजकल ये अपने बेटे को भी संगीत की दुनिया में ले आई हैं। कविता से जब उनके पसंदीदा गायक, संगीतकार, गीतकार के बारे में पूछा गया, तो उनका जवाब कुछ यूँ था: (साभार: प्लैनेट बॉलीवुड)

पसंदीदा गायक: एल्टन जॉन, ए आर रहमान, सुखविंदर सिंह, शंकर महादेवन, आबिदा परवीन
पसंदीदा संगीतकार: ए आर रहमान, अमित त्रिवेदी, शंकर-एहसान-लॉय
पसंदीदा गीतकार/शायर: वसीम बरेलवी, ज़िया अल्वी, जावेद अख़्तर, गुलज़ार साहब
पसंदीदा वाद्य-यंत्र: रबाब, डफ़्फ़, बांसुरी, ईरानी डफ़्फ़
पसंदीदा सूफ़ी कवि: कबीरदास, मौलाना रूमी, हज़रत अमिर ख़ुसरो, बाबा बुल्लेशाह
पसंदीदा गीत: ख़्वाजा मेरे ख़्वाजा (जोधा-अकबर)

उनसे जब यह पूछा गया कि नए गायकों को "रियलिटी शोज़" में हिस्सा लेना चाहिए या नहीं, तो उनका जवाब था: "रियलिटी शोज़ के बारे में कभी न सोचें, बल्कि यह सोचें कि "रियलिटी" में उनकी गायकी कितनी अच्छी है। जितना हो सके शास्त्रीय संगीत सीखने की कोशिश करें। कहा भी गया है कि - नगमों से जब फूल खिलेंगे, चुनने वाले चुन लेंगे, सुनने वाले सुन लेंगे, तू अपनी धुन में गाए जा।" वाह! क्या खूब कहा है आपने! 

चलिए तो अब आज की नज़्म की ओर रूख करते हैं। कविता को यह नज़्म बेहद पसंद है और उन्हें इस बात का दु:ख भी है कि यह नज़्म बहुत ही कम लोगों ने सुनी है, लेकिन इस बात की ख़ुशी है कि जिसने भी सुनी है, वह अपने आँसूओं को रोक नहीं पाया है। आखिर नज़्म है ही कुछ ऐसी! आप यह तो मानेंगे ही कि सूफ़ियाना कलामों में ख़ुदा को जिस नज़रिये से देखा जाता है, वह नज़रिया बाकी कलामों में शायद ही नज़र आता है। कविता इसी नज़रिये को अपनी इस नज़्म के माध्यम से हम सबके बीच लेकर आई हैं। "शब को सहर" मे बदलने वाला वह ख़ुदा आखिरकार कैसा लगता है, आप खुद सुनिए:

बदल रहा है जो शब सहर में,
ख़ुदा वही है..

है जिसका जलवा नज़र-नज़र में,
ख़ुदा वही है..

जो दिल की धड़कन बना हुआ है
जो कानों में रस घोलता है
जो जान-ओ-दिल है और जिगर है
ख़ुदा वही है...

जो फूल खुशबू गुलाब में है,
ज़मीं, फ़लक, आफ़ताब में है,
है जिसकी रंगत शज़र-शज़र में,
खुदा वही है..







’कहकशाँ’ की आज की यह पेशकश आपको कैसी लगी, ज़रूर बताइएगा नीचे ’टिप्पणी’ पे जाकर। या आप हमें ई-मेल के ज़रिए भी अपनी राय बता सकते हैं। हमारा ई-मेल पता है soojoi_india@yahoo.co.in. 'कहकशाँ’ के लिए अगर आप कोई लेख लिखना चाहते हैं, तो इसी ई-मेल पते पर हम से सम्पर्क करें। आज बस इतना ही, अगले जुमे-रात को फिर हमारी और आपकी मुलाक़ात होगी इस कहकशाँ में, तब तक के लिए ख़ुदा-हाफ़िज़!


खोज और आलेख : विश्वदीपक ’तन्हा’
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र 
प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

Wednesday, July 27, 2016

"मुंबई आने के बाद मैं दस बारह साल बस युहीं भटकता रहा"- मोनीश रजा : एक मुलाकात ज़रूरी है

एक मुलाकात ज़रूरी है (21)

Monish Raza
घाटमपुर नाम के एक छोटे से कसबे से निकलकर माया नगरी मुंबई में आकर एक गीतकार बनने की जद्दो जहद से निकला एक काबिल और हुनरमंद कलमबाज़ मोनीश रजा, जो आज के हमारे ख़ास मेहमान है कार्यक्रम "एक मुलाकात ज़रूरी है" में. इमरान हाशमी अभिनीत फिल्म मिस्टर एक्स के लोकप्रिय गीत "तू जो है तो मैं हूँ" के लेखक मोनीश से हमारी इस ख़ास बातचीत का आनंद लें आज के इस एपिसोड में.... 



एक मुलाकात ज़रूरी है इस एपिसोड को आप यहाँ से डाउनलोड करके भी सुन सकते हैं, लिंक पर राईट क्लीक करें और सेव एस का विकल्प चुनें 

Saturday, July 23, 2016

"कभी तन्हाइयों में यूं हमारी याद आएगी..." जीतेजी मुबारक बेगम की याद किसी को नहीं आई, क्या उनके जाने के बाद आएगी?


एक गीत सौ कहानियाँ - 87
 

'कभी तन्हाइयों में यूं हमारी याद आएगी...' 



रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम
रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'।इसकी 87-वीं कड़ी में आज जानिए 1961 की फ़िल्म ’हमारी याद आएगी’ के लोकप्रिय शीर्षक गीत "कभी तन्हाइयों में यूं हमारी याद आएगी..." के बारे में जिसे मुबारक बेगम ने गाया था। गीत लिखा है किदार शर्मा ने और संगीत दिया है स्नेहल भाटकर ने। मुबारक बेगम का 22 जुलाई 2016 को 80 वर्ष की उम्र में निधन हो गया।


"मैंने पिछले दो दिनों से कुछ खाया नहीं है। क्या आप पहले मेरे लिए दो पीस ब्रेड और एक कप चाय मँगवा सकते हैं?", ऐसा मुबारक बेगम ने किदार शर्मा से कहा था फ़िल्म ’हमारी याद आएगी’ के अमर गीत
"कभी तन्हाइयों में यूं हमारी याद आएगी" की रेकॉर्डिंग् से पहले। गीत रेकॉर्ड हुई, गाना ख़ूब ख़ूब चला, और सिर्फ़ यही गाना नहीं, मुबारक बेगम के बहुत से गीत ख़ूब चले भले वो फ़िल्में न चली हों। पर क़िस्मत को पता नहीं उनसे क्या दुश्मनी थी, ता-उम्र यह दुश्मनी बरक़रार रही। 18 जुलाई की रात जब मुबारक बेगम इस फ़ानी दुनिया को हमेशा के लिए छोड़ गईं तब मानो अफ़सोस से ज़्यादा ख़ुशी हुई यह महसूस कर कि 80 साल की जद्दोजेहद और आर्थिक संकट के बाद अब वो बेशक़ एक बेहतर दुनिया में चली गईं हैं। और पीछे छोड़ गईं वह गीत जिसे सुनते हुए आज भी दिल रो उठता है, "कभी तन्हाइयों में यूं हमारी याद आएगी, अन्धेरे छा रहे होंगे कि बिजली कौंध जाएगी..."। आज मुबारक बेगम के जाने के बाद यह गीत और भी ज़्यादा सार्थक व रूहानी बन गया है। उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए आज ’एक गीत सौ कहानियाँ’ में इसी गीत के बनने की दासतान पेश है। बरसों पहले विविध भारती के वरिष्ठ उद्‍घोषक कमल शर्मा के साथ बातचीत के दौरान मुबारक बेगम ने इस गीत से जुड़ी उनकी यादों के उजाले को बिखेरा था; उन्हीं के शब्दों में, "शुरू में यह गाना रेकॉर्ड पर नहीं था, सिर्फ़ कुछ लाइनों को अलग अलग हिस्सों में बतौर बैकग्राउन्ड म्युज़िक लिया जाना था। मुझे याद है बी. एन. शर्मा गीतकार थे, स्नेहल और किदार शर्मा बैठे हुए थे। रेकॉर्डिंग् पूरी होने के बाद शर्मा (किदार) जी ने मुझे चार आने दिए। मैंने उनकी तरफ़ देखा तो कहने लगे कि ख़ुशनसीबी के तौर पे रख लीजिए। ये चार आने मेरे लिए वाक़ई लकी साबित हुए। जैसा कि मैं कह रही थी कि यह गाना रेकॉर्ड पर नहीं था, गाने के रूप में रेकॉर्ड भी नहीं हुआ था, पर बाद में उन सब को यह इतना पसन्द आया कि उन लोगों ने इसे गाने का रूप देना चाहा और रेकॉर्ड पर डालना चाहा। इसके लिए दोबारा रेकॉर्डिंग् नहीं हुई बल्कि उन अन्तरों और अस्थाइयों को जोड़ कर पूरा का पूरा गाना बना दिया। मैं आपको इस वक़्त नहीं बता सकती कि वो अलग अलग हिस्से कौन से थे, पर अगर आप यह गाना बजाओगे तो मैं बता दूँगी कि किन किन जगहों पर जोड़ा गया है। मुझे नहीं पता थी कि इसे एक गाना बनाया गया है, रेकॉर्ड जारी होने के बाद मुझे पता चली। मैंने इस गीत के लिए अपना हिस्सा नहीं माँगा क्योंकि मैं उस समय नई थी, इसलिए मैंने अपना मुंह बन्द रखने में ही अपनी भलाई समझी वरना जो कुछ मिल रही थी वो भी बन्द हो जाती। और ऐसा बाद में भी जारी रहा, मुझसे दो चार लाइने गवा लेते लोग और फिर उसका पूरा गाना बना देते। फ़िल्म ’जब जब फूल खिले’ का गीत "परदेसियों से ना अखियाँ मिलाना..." पहले मैंने गाया था। एक दिन कल्याणजी भाई ने अपनी गाड़ी भेज दी और मुझे उनके घर बुलवा लिया। पहुँचने पर मुझे समझाने लगे कि जो गीत मैंने गाया है उसकी जगह एक डुएट रखा जाएगा। मैंने सिर्फ़ इतना कहा कि मुझे बेवकूफ़ बनाने की ज़रूरत नहीं है, अगर आपको मेरा गीत कैन्सल करना है तो आप बेशक़ कीजिए, मुझे मेरा पैसा दे दीजिए, मैं चली जाऊँगी। तब कल्याणजी भाई कहने लगे कि मैं किसी की बद-दुआ से डरता हूँ। मैंने कहा कि बद-दुआ तो आपको लग चुकी, और वहाँ से चली आई। बद-दुआ और "कभी तन्हाइयों में..." से जुड़ा एक और क़िस्सा याद है, एक बार मैं ट्रेन से लखनऊ जा रही थी। तो एक सवारी ने मुझे पहचान लिया और पूछा कि आप बद-दुआ क्यों दे रही हैं कि ना तू जी सकेगा और ना तुझको मौत आएगी? मैंने उन्हें समझाया कि यह सिर्फ़ एक फ़िल्मी गाना है जिसे एक गीतकार ने लिखा है और मैंने तो सिर्फ़ इसे गाया है!"

’हमारी याद आएगी’ के निर्देशक किदार शर्मा ने अपनी आत्मकथा ’The One and Lonely Kidar Sharma’ में
Kidar Sharma
इस गीत के बनने की कहानी को विस्तार से लिखा है जिसका हिन्दी अनुवाद इस तरह से है: शुरू में यह गीत लता मंगेशकर से गवाया जाना था। कुछ रिहर्सल भी हो चुके थे, पर रेकॉर्डिंग् के दिन लता जी के ड्राइवर किदार जी के पास गया और कहा कि अगर लता जी से यह गीत गवाना है तो अभी मुझे 140 रुपये दीजिए। किदार शर्मा नाराज़ होते हुए पैसे देने से इनकार कर दिया। और कुछ ही समय में लता जी ने ऐलान किया कि उनका गला ख़राब है और वो रेकॉर्डिंग् नहीं कर सकती। उन्होंने आगे का एक डेट देकर चली गईं। किदार शर्मा ने साज़िन्दों और रेकॉर्डिंग् स्टुडियो की बूकिंग् के लिए 25000 रुपये देने पड़े। अगली बार फिर वही बात दोहराई गई और लता जी फिर एक बार तबीयत नासाज़ का कारण जता कर चली गईं। किदार जी ग़ुस्से से आग बबूला हो गए और लता जी से कहा कि मेरे पास इस गीत के लिए सिर्फ़ 50,000 रुपये थे जो मैं खर्च कर चुका हूँ, इसलिए अब इस गीत को भूल जाइए! पैसे ख़त्म होने पर किदार शर्मा ने कमचर्चित गायिका मुबारक बेगम से इस गीत को गवाने का फ़ैसला लिया, पर गीत की शक्ल में नहीं बल्कि बतौर बकग्राउण्ड। मुबारक बेगम आईं, गीत को सुना, और किदार जी से कहा, "किदार जी, मैं पहले आपसे कुछ बात करना चाहती हूँ"। दोनो दूसरे कमरे में गए और मुबारक जी ने उनसे कहा, "किदार जी, मैंने पिछले दो दिनों से कुछ खाया नहीं है। क्या आप पहले मेरे लिए दो पीस ब्रेड और एक कप चाय मँगवा सकते हैं?" किदार शर्मा की आँखों में आँसू आ गए। उन्होंने न सिर्फ़ मुबारक बेगम को भरपेट खाना खिलाया बल्कि उन्हें कुछ ऐडवान्स भी दिया। बस इतनी सी है इस गीत की कहानी। मुबारक बेगम इस दुनिया में तो कभी ख़ुश नहीं रह सकीं, उपरवाले से गुज़ारिश है कि उस दुनिया में उन्हें ख़ुश रखें। 




अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें soojoi_india@yahoo.co.in के पते पर। 



आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी




Thursday, July 21, 2016

तुम बोलो कुछ तो बात बने....जगजीत-चित्रा की दिली ख़्वाहिश आज ’कहकशाँ’ में

जगजीत सिंह चित्रा सिंह 
महफ़िल ए कहकशाँ 9



दोस्तों सुजोय और विश्व दीपक द्वारा संचालित "कहकशां" और "महफिले ग़ज़ल" का ऑडियो स्वरुप लेकर हम हाज़िर हैं, "महफिल ए कहकशां" के रूप में पूजा अनिल और रीतेश खरे  के साथ।  अदब और शायरी की इस महफ़िल में आज पेश है जगजीत सिंह और चित्रा सिंह की युगल आवाज़ों में शमिम करबानी का कलाम।



मुख्य स्वर - पूजा अनिल एवं रीतेश खरे 
स्क्रिप्ट - विश्व दीपक एवं सुजॉय चटर्जी


Wednesday, July 20, 2016

"मैंने जीवन के ३५-४० वर्ष लगातार १८-१८ घंटे काम किया है" -अमित खन्ना (पार्ट २) : एक मुलाकात ज़रूरी है

एक मुलाकात ज़रूरी है (20)
Amit Khanna 

दोस्तों "एक मुलाकात ज़रूरी है" के पिछले एपिसोड से हमारे साथ हैं बहुमुखी प्रतिभा के धनी और हमारे फिल्म और संगीत जगत के दिग्गज अमित खन्ना जी. और हम सुन रहे हैं खुद अमित के लिखे १० चुनिदा गीतों की लड़ी, जिसमें से ५ गीत हम पिछले अंक में सुन चुके हैं, लीजिये आज सुनिए ५ ओर बेमिसाल गीत, साथ ही जानिए कि कैसे रचनात्मकता और व्यवसायिकता के दोनों छोरों को बखूबी संभाल पाते हैं अमित जी, और सुनिए उन्हीं की जुबानी उनकी एक खूबसूरत कविता भी....



एक मुलाकात ज़रूरी है इस एपिसोड को आप यहाँ से डाउनलोड करके भी सुन सकते हैं, लिंक पर राईट क्लीक करें और सेव एस का विकल्प चुनें 

Sunday, July 17, 2016

राग अल्हैया बिलावल : SWARGOSHTHI – 279 : RAG ALHAIYA BILAWAL




स्वरगोष्ठी – 279 में आज

मदन मोहन के गीतों में राग-दर्शन – 12 : समापन कड़ी में खुशहाली का माहौल

“भोर आई गया अँधियारा सारे जग में हुआ उजियारा...”




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच जारी हमारी श्रृंखला – ‘मदन मोहन के गीतों में राग-दर्शन’ की यह समापन कड़ी है। श्रृंखला की बारहवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र अपने साथी सुजॉय चटर्जी के साथ आप सभी संगीत-प्रेमियों का एक बार फिर हार्दिक स्वागत करता हूँ। यह श्रृंखला आप तक पहुँचाने के लिए हमने फिल्म संगीत के सुपरिचित इतिहासकार और ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के स्तम्भकार सुजॉय चटर्जी का सहयोग लिया है। हमारी यह श्रृंखला फिल्म जगत के चर्चित संगीतकार मदन मोहन के राग आधारित गीतों पर केन्द्रित है। श्रृंखला के प्रत्येक अंक में हमने मदन मोहन के स्वरबद्ध किसी राग आधारित गीत की चर्चा की और फिर उस राग की उदाहरण सहित जानकारी भी दी। श्रृंखला की बारहवीं कड़ी में आज हम आपको राग अल्हैया बिलावल के स्वरों में पिरोये गए 1972 में प्रदर्शित फिल्म ‘बावर्ची’ से एक सुमधुर, उल्लास से परिपूर्ण गीत का रसास्वादन कराएँगे। इस राग आधारित गीत को स्वर दिया है, मन्ना डे, लक्ष्मी शंकर, निर्मला देवी, किशोर कुमार और हरीन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय ने। संगीतकार मदन मोहन द्वारा राग अल्हैया बिलावल के स्वरों पर आधारित इस गीत के साथ ही राग का यथार्थ स्वरूप उपस्थित करने के लिए हम सुप्रसिद्ध गायिका विदुषी किशोरी अमोनकर और उनकी शिष्याओ के स्वरों में राग अल्हैया बिलावल में निबद्ध एक सुमधुर रचना भी प्रस्तुत कर रहे हैं।


दन मोहन उन गिने-चुने संगीतकारों में से थे जो नए-नए प्रयोग करने से नहीं कतराते थे। शास्त्रीय रागों को लेकर तरह-तरह के प्रयोग मदन मोहन ने किए जो उनके गीतों में साफ़ झलकता है। उदाहरण के तौर पर फ़िल्म ’बावर्ची’ का गीत ही ले लीजिए "भोर आई गया अँधियारा..."। यह गीत आधारित है राग अल्हैया बिलावल पर। इस फ़िल्म के बनते समय तक शायद ऐसा कोई भी हिन्दी फ़िल्मी गीत नहीं था जो इस राग पर आधारित हो। अल्हैया बिलावल एक प्रात:कालीन राग (सुबह 6 से 9 बजे तक गाया जाने वाला राग) होने की वजह से मुमकिन था कि इसका प्रयोग संगीतकार अपने गीतों में करते क्योंकि प्रात:काल के बहुत से गीत फ़िल्मों में आ चुके थे। पर शायद किसी ने भी इस राग को नहीं अपनाया, या फिर यूँ कहें कि अपना नहीं सके। मदन मोहन ने इस ओर पहल किया और अल्हैया बिलावल को गले लगाया। ’बावर्ची’ फ़िल्म में एक सिचुएशन ऐसी थी कि सुबह के वक़्त संयुक्त परिवार में चहल-पहल शुरु हुई है, पिताजी के चरण-स्पर्ष हो रहे हैं, सुबह की चाय पी जा रही है, बावर्ची अपने काम पे लगा है, संगीतकार बेटा अपने सुर लगा रहा है, घर की बेटियाँ घर के काम-काज में लगी हैं। इस सिचुएशन के लिए गीत बनाना आसान काम नहीं था। पर मदन मोहन ने एक ऐसे गीत की रचना कर दी कि इस तरह का यह आजतक का एकमात्र गीत बन कर रह गया है। बावर्ची बने फ़िल्म के नायक राजेश खन्ना के लिए मन्ना डे की आवाज़ ली गई जो इस गीत के मुख्य गायक हैं, जो बिखरते हुए उस परिवार को एक डोर में बाँधे रखने के लिए इस गीत में सबको शामिल कर लेते हैं। पिता हरीन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय का पार्श्वगायन उन्होंने ख़ुद ही किया, संगीतकार बेटे (असरानी) को आवाज़ दी किशोर कुमार ने, और घर की दो बेटियों (जया भादुड़ी और उषा किरण) के लिए आवाज़ें दीं शास्त्रीय-संगीत की शीर्ष की दो गायिकाओं ने। ये हैं लक्ष्मी शंकर और निर्मला देवी। कैफ़ी आजमी ने गीत लिखा और नृत्य निर्देशन के लिए चुना गया गोपीकृष्ण को। कलाकारों के इस अद्वितीय आयोजन ने इस गीत को अमर बना दिया। और मदन मोहन ने केवल अल्हैया बिलावल ही नहीं, इस गीत के अलग-अलग अंश के लिए अलग-अलग रागों का प्रयोग किया। "भोर आई गया अंधियारा" का मूल स्थायी और अन्तरा राग अल्हैया बिलावल है। परन्तु अलग-अलग अन्तरों में राग मारु विहाग, नट भैरव, धनाश्री और हंसध्वनि की झलक भी मिलती है। हर बदले हुए राग के अन्तरे के बाद राग अल्हैया बिलावल में निबद्ध स्थायी की पंक्तियाँ वापस आती हैं।

अपने उसूलों पर चलने की वजह से 70 के दशक में मदन मोहन के साथ कई फ़िल्मकारों ने काम करना बन्द कर दिया था। हालाँकि उनके अन्तिम कुछ वर्षों में उन्होंने ॠषीकेश मुखर्जी (बावर्ची), गुलज़ार (कोशिश, मौसम), चेतन आनन्द (हँसते ज़ख़्म) और एच. एस. रवैल (लैला मजनूं) के साथ काम किया, पर उनके लिए रेकॉर्डिंग् स्टुडियो में तारीख़ मिलना भी मुश्किल हो रहा था। नए संगीतकारों की फ़ौज 60 के दशक के अन्तिम भाग से आ चुकी थी जिनके पास बहुत सी फ़िल्में थीं और वो महीनों तक अच्छे रेकॉर्डिंग् स्टुडियोज़ (जैसे कि तारदेव, फ़िल्म सेन्टर, महबूब) को बुक करवा लेते थे जिस वजह से जब मदन जी को ज़रूरत पड़ती स्टुडियो की, तो उन्हें नहीं मिल पाता। इस तरह से उनकी रेकॉर्डिंग् कई महीनों के लिए टल जाती और इस तरह से वो पिछड़ते जा रहे थे। ख़ैर, वापस आते हैं ’बावर्ची’ पर। इस फ़िल्म में कुल छह गीत थे। एक गीत की हमने चर्चा की, अन्य पाँच गीत भी रागों अथवा लोक संगीत पर आधारित थे। मन्ना डे की एकल आवाज़ में "तुम बिन जीवन कैसा जीवन..." के पहले अन्तरे में राग हेमन्त की झलक है। इसी प्रकार लक्ष्मी शंकर की आवाज़ में "काहे कान्हा करत बरजोरी...", में भी राग का स्पर्श है। कुमारी फ़ैयाज़ की आवाज़ में "पहले चोरी फिर सीनाज़ोरी..." में मराठी लोक संगीत लावणी का रंग है। मदन मोहन की फ़िल्म हो और लता मंगेशकर का कोई गीत ना हो कैसे हो सकता है भला। इस फ़िल्म में दो गीत लता जी से गवाये गए - "मोरे नैना बहाये नीर...", और दूसरा गीत है "मस्त पवन डोले रे..."। इस दूसरे गीत को फ़िल्म में नहीं शामिल किया गया, इसका मदन मोहन को अफ़सोस रहा। उनके साथ ऐसा कई बार हुआ। एडिटिंग् की कैंची उनके कई सुन्दर गीतों पर चल गई और गीत फ़िल्म से बाहर हो गया। कुछ उदाहरण - "खेलो ना मेरे दिल से..." (हक़ीक़त), "चिराग़ दिल का जलाओ बहुत अन्धेरा है..." (चिराग़), "दुनिया बनाने वाले..." (हिन्दुस्तान की क़सम), "मस्त पवन डोले रे..." (बावर्ची)। ’हीर रांझा’ में "मेरी दुनिया में तुम आयी..." शुरु-शुरु में फ़िल्म में नहीं था, कुछ सप्ताह बाद इसे जोड़ा गया था, पर साथ ही "तेरे कूचे में..." को हटा दिया गया। ’हँसते ज़ख़्म’ में "आज सोचा तो आँसू भर आए..." गीत को बहुत सप्ताह बीत जाने के बाद जोड़ा गया था। इन सारी जानकारियों के बाद अब समय है फ़िल्म ’बावर्ची’ के "भोर आई गया अँधियारा..." गीत को सुनने के साथ-साथ देखने का।


राग अल्हैया बिलावल : "भोर आई गया अँधियारा..." : मन्ना डे और साथी : फिल्म – बावर्ची


राग अल्हैया बिलावल का सम्बन्ध बिलावल थाट से माना गया है और इस थाट के आश्रय राग बिलावल का ही एक प्रकार है। इस राग के आरोह में मध्यम स्वर वर्जित होता है और अवरोह में सातो स्वर प्रयोग किये जाते हैं। इस कारण इस राग की जाति षाड़व-सम्पूर्ण होती है। आरोह में शुद्ध और अवरोह में दोनों निषाद प्रयोग किये जाते है। शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग होते हैं। राग अल्हैया बिलावल के गायन-वादन का समय दिन का प्रथम प्रहर होता है। राग के आरोह में ऋषभ और अवरोह में गान्धार स्वर का अधिकतर वक्र प्रयोग किया जाता है। शुद्ध निषाद स्वर का प्रयोग आरोह में और कोमल निषाद का अल्प प्रयोग केवल अवरोह में दो धैवत के बीच में किया जाता है। राग का वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर गान्धार होता है। यह उत्तरांग प्रधान राग है, अर्थात इसका वादी स्वर सप्तक के उत्तरांग में आता है। इस राग का चलन भी सप्तक के उत्तरांग में और तार सप्तक में अधिक किया जाता है। आजकल राग अल्हैया बिलावल का प्रचार इतना अधिक बढ़ गया है केवल बिलावल कह देने से लोग अल्हैया बिलावल ही समझते हैं, जबकि राग बिलावल और अल्हैया बिलावल दो अलग-अलग राग हैं। राग अल्हैया बिलावल के वास्तविक स्वरूप का अनुभव करने के लिए अब हम आपको 16 मात्रा में निबद्ध एक खयाल सुनवा रहे हैं। इसे प्रस्तुत कर रही हैं, जयपुर अतरौली घराने के गायकी में दक्ष विदुषी किशोरी अमोनकर। इस गायन में उनकी शिष्याओं का योगदान भी है। राग अल्हैया बिलावल की इस बन्दिश के बोल हैं – ‘कवन बतरिया गैलो माई...’। आप यह रचना सुनिए और मुझे आज के इस अंक के साथ जारी श्रृंखला को भी यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग अल्हैया बिलावल : ‘कवन बतरिया गैलो माई...’ विदुषी किशोरी अमोनकर




संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 279वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको सात दशक पुरानी फिल्म से लिये गए एक राग आधारित गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 280वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने के बाद जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के तीसरे सत्र (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत के इस अंश को सुन कर आपको किस राग का अनुभव हो रहा है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – ताल के लिए गीत में किस तालवाद्य का प्रयोग किया गया है? हमें उस तालवाद्य का नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 23 जुलाई, 2016 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 281वें अंक में प्रकाशित किया जाएगा। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 277 की संगीत पहेली में हमने आपको वर्ष 1973 में प्रदर्शित फिल्म ‘दिल की राहें’ से राग आधारित फिल्मी गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – मधुवन्ती, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – कहरवा और तीसरे प्रश्न का उत्तर है- पार्श्वगायिका – लता मंगेशकर

इस बार की संगीत पहेली में पाँच प्रतिभागियों ने तीनों प्रश्नों का सही उत्तर देकर विजेता बनने का गौरव प्राप्त किया है। ये विजेता हैं - वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। सभी पाँच विजेताओं को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ में जारी हमारी श्रृंखला ‘मदन मोहन के गीतों में राग-दर्शन’ की आज यह समापन कड़ी है। आज की कड़ी में आपने राग अल्हैया बिलावल का रसास्वादन किया। इस श्रृंखला में फिल्म संगीतकार मदन मोहन के कुछ राग आधारित गीतों को चुन कर आपके लिए हमने प्रस्तुत किया। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी, हमें लिखिए। ‘स्वरगोष्ठी’ साप्ताहिक स्तम्भ के बारे में हमारे पाठक और श्रोता नियमित रूप से हमें पत्र लिखते है। हम उनके सुझाव के अनुसार ही आगामी विषय निर्धारित करते है। हमारी अगली श्रृंखला “वर्षा ऋतु के राग” विषय पर आधारित होगी। इस श्रृंखला के लिए आप अपने सुझाव या फरमाइश ऊपर दिये गए ई-मेल पते पर शीघ्र भेजिए। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करेंगे। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 8 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


शोध व आलेख  : सुजॉय चटर्जी  
प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  




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