बुधवार, 6 जुलाई 2016

"संगीत से जुड़े सभी लोग एक बड़े परिवार के जैसे हैं" -श्रध्दा भिलावे : एक मुलाकात ज़रूरी है

एक मुलाकात ज़रूरी है (18)

फिल्म संगीत जगत में महिलाओं का दखल अधिकतर पार्श्व गायन तक ही सीमित है. गीतकार और संगीतकार श्रेणी में मात्र गिनती की इतनी ही महिलायें हैं, जितनी हम उँगलियों पे गिन सके. ऐसे में एक युवा कवियित्री का गीत लेखन की दुनिया में आना एक शुभ संकेत है. लीजिये आज मिलिए गीतकारा श्रध्दा भिलावे से, जिन्होंने हाल ही में प्रदर्शित फिल्म "सेवन अवर्स टू गो" से गीत लेखन की शुरुआत की है. मिलिए श्रध्दा भिलावे से और जानिये उनकी इस पहली फिल्म का अनुभव. 


एक मुलाकात ज़रूरी है इस एपिसोड को आप यहाँ से डाउनलोड करके भी सुन सकते हैं, लिंक पर राईट क्लीक करें और सेव एस का विकल्प चुनें 

रविवार, 3 जुलाई 2016

राग केदार : SWARGOSHTHI – 277 : RAG KEDAR और विदुषी वीणा सहस्त्रबुद्धे को श्रद्धांजलि




स्वरगोष्ठी – 277 में आज

मदन मोहन के गीतों में राग-दर्शन – 10 : जब राज कपूर की आवाज़ बने तलत साहब

‘मैं पागल मेरा मनवा पागल, पागल मेरी प्रीत रे...’




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर इन दिनों हमारी श्रृंखला – ‘मदन मोहन के गीतों में राग-दर्शन’ जारी है। श्रृंखला की दसवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र अपने साथी सुजॉय चटर्जी के साथ आप सभी संगीत-प्रेमियों का एक बार फिर हार्दिक स्वागत करता हूँ। यह श्रृंखला आप तक पहुँचाने के लिए हमने फिल्म संगीत के सुपरिचित इतिहासकार और ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के स्तम्भकार सुजॉय चटर्जी का सहयोग लिया है। हमारी यह श्रृंखला फिल्म जगत के चर्चित संगीतकार मदन मोहन के राग आधारित गीतों पर केन्द्रित है। श्रृंखला के प्रत्येक अंक में हम मदन मोहन के स्वरबद्ध किसी राग आधारित गीत की चर्चा और फिर उस राग की उदाहरण सहित जानकारी दे रहे हैं। गत 25 जून को हमने मदन मोहन का 93वाँ जन्मदिन मनाया। श्रृंखला की दसवीं कड़ी में आज हम आपको राग केदार के स्वरों में पिरोये गए 1952 में प्रदर्शित फिल्म ‘आशियाना’ से एक सुमधुर गीत का रसास्वादन कराएँगे। इस राग आधारित गीत को स्वर दिया है, तलत महमूद ने। संगीतकार मदन मोहन द्वारा राग केदार स्वरों पर आधारित इस गीत के साथ ही राग का यथार्थ स्वरूप उपस्थित करने के लिए हम सुप्रसिद्ध गायिका विदुषी शुभा मुद्गल के स्वरों में राग केदार में निबद्ध तीनताल की एक सुमधुर बन्दिश भी प्रस्तुत कर रहे हैं।


मदन मोहन और तलत महमूद
"हालाँकि संगीत के सिद्धान्तों का ज्ञान और बुनियादी नियमों के बारे में जानना बहुत ज़रूरी है, पर यह ज़रूरी नहीं कि जिस किसी ने भी ये बातें सीख ली वो संगीत में मास्टर बन गया। संगीत को परम्परागत तरीके से किसी गुरु के चरणों में बैठ कर सीखा जाए यह ज़रूरी नहीं। मेरा ख़याल है कि संगीत कानों से भी सीखा जा सकता है अगर किसी में सीखने की मन से आकांक्षा हो तो। संगीत एक ऐसी कला है जिसे अनिच्छुक छात्रों के अन्दर ज़बरदस्ती प्रवेश नहीं कराया जा सकता किसी पाठ्यक्रम के माध्यम से। जो संगीत के लिए पागल है, वही इसमें महारथ हासिल कर सकता है। संगीत के दिग्गजों के साथ काम करने की वजह से मुझे संगीत शिक्षा को करीब से ग्रहण करने और इसे समझने का मौक़ा मिला। बहुत आसानी पर स्पष्ट तरीके से संगीत ने मुझे चारों ओर से जकड़ लिया। मुझे नहीं मालूम कब और कैसे मेरी कानों में संगीत की लहरियाँ प्रतिध्वनित होने लगी जो मैं रोज़ सुना करता था। और इसी तरीक़े से मैंने वास्तव में संगीत सीखा।" मदन मोहन के इन शब्दों का सार हम सब की समझ में आ गया होगा। आइए अब आते हैं आज के गीत पर। आज हमने चुना है तलत महमूद की आवाज़ में राग केदार पर आधारित और ताल कहरवा में निबद्ध फ़िल्म ’आशियाना’ का मशहूर गीत "मैं पागल मेरा मनवा पागल..."। मदन मोहन तलत साहब के ग़ज़ल गायकी से वाक़िफ़ थे और लखनऊ के अपने शुरुआती दिनों से ही एक दूसरे को जानते-पहचानते थे। मदन मोहन के फ़िल्म-संगीत सफ़र के शुरुआती सालों में तलत महमूद ने उनके लिए कई गीत गाए। यह सच है कि जब बाद के वर्षों में रफ़ी साहब की इण्डस्ट्री में बहुत ज़्यादा डिमाण्ड हो गई थी तब तलत साहब को उनकी तुलना में कम गाने मिलने लगे थे, तब फ़िल्म ’जहाँआरा’ के निर्देशक ने फ़िल्म के सभी गीत रफ़ी साहब की आवाज़ में रेकॉर्ड करने का सुझाव मदन मोहन को दिया। पर मदन मोहन इस बात पर अन्त तक अड़े रहे कि तलत इस फ़िल्म में कम से कम तीन गीत ज़रूर गाएँगे और बाक़ी गीत रफ़ी गाएँगे। इस बात पर उन्होंने स्वेच्छा से फ़िल्म छोड़ने का प्रस्ताव तक दे दिया निर्माता को। तब जाकर निर्माता ओम प्रकाश जी ने मदन जी को आश्वस्त किया, और मदन जी ने तलत साहब से "फिर वही शाम...", "तेरी आँख के आँसू..." और "मैं तेरी नज़र का सुरूर हूँ..." गवाया जो तलत साहब के करीअर में भी मील के पत्थर सिद्ध हुए।

तलत महमूद
अब बातें ’आशियाना’ की। 1951 में फ़िल्म ’आँखें’ के संगीत की सफलता ने उसी साल मदन मोहन को जे. बी. एच. वाडिया की एक फ़िल्म दिला दी। फ़िल्म थी ’मदहोश’। इस फ़िल्म ने उनके सामने एक नई चुनौती खड़ी कर दी। मदन जी के ही शब्दों में - "जब मैं ’मदहोश’ पर काम कर रहा था, एक दिन वाडिया साहब हाज़िर हुए एक सिचुएशन के साथ जिसके लिए वो एक प्रभावशाली गीत चाहते थे जो एक धोखा देने वाले प्रेमी के जज़्बात बयाँ करे। राजा मेंहदी अली ख़ाँ फ़िल्म ’मदहोश’ के गीत लिख रहे थे। इस सिचुएशन को सुनते ही उन्होंने कहा कि इस तरह के भाव पर उन्होंने कुछ समय पहले एक गीत लिखा है, अगर सबको ठीक लगे तो यह गीत लिया जा सकता है। उन्होंने अपनी नोटबूक निकाली और गीत पढ़ने लगे। पाँच मिनट में मैंने गीत की धुन तैयार कर दी और वाडिया साहब को सुनाया। वो बहुत ख़ुश हुए और गीत भी बड़ा पॉपुलर हुआ। वह गीत था "मेरी याद में तुम ना आँसू बहाना..."। यह मदन मोहन और तलत महमूद की जोड़ी का पहला सुपरहिट गीत था। इसके बाद "आँसू" शब्द वाले कई तलत-मदन गीत बने। ‘मदहोश’ बनने के अगले ही साल 1952 में बनी फिल्म ’आशियाना’ जिसमें राज कपूर और नरगिस की जोड़ी थी। इस फ़िल्म के संगीत ने मदन मोहन को अव्वल दर्जे के संगीतकारों की श्रेणी में ला खड़ा किया। मदन मोहन के अनुसार यह उनकी सर्वश्रेष्ठ फ़िल्मों में से एक है और ख़ास तौर से तलत महमूद का गाया "मैं पागल मेरा मनवा पागल..." उनके दिल के बहुत क़रीब है जिसे कम्पोज़ करने में उन्हें पूरा एक महीना लग गया था। संगीत की समझ रखने वाले राज कपूर भी ’आशियाना’ के गीत-संगीत से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने कहा, "अगर मेरी फ़िल्मों में सिर्फ़ इस तरह का संगीत हो तो मैं अपनी फ़िल्मों को अनन्तकाल तक थिएटरों में चला सकता हूँ।" भले इस फ़िल्म के संगीत की बहुत तारीफ हुई, पर फ़िल्म बुरी तरह से पिट गई। बहुत वर्षों के बाद जब मदन मोहन की कुछ फ़िल्में दोबारा प्रद्रशित हुईं और अब की बार हिट हुईं, तब उन्हें शीर्ष के संगीतकार का दर्जा लोगों ने दिया। लीजिए, अब आप यही गीत सुनिए।


राग केदार : “मैं पागल मेरा मनवा पागल...” : तलत महमूद : फिल्म – आशियाना


शुभा मुद्गल
भक्तिरस की अभिव्यक्ति के लिए केदार एक समर्थ राग है। कर्नाटक संगीत पद्यति में राग हमीर कल्याणी, राग केदार के समतुल्य है। औड़व-षाड़व जाति, अर्थात आरोह में पाँच और अवरोह में छह स्वरों का प्रयोग होने वाला यह राग कल्याण थाट के अन्तर्गत माना जाता है। प्राचीन ग्रन्थकार राग केदार को बिलावल थाट के अन्तर्गत मानते थे, आजकल अधिकतर गुणिजन इसे कल्याण थाट के अन्तर्गत मानते हैं। इस राग में दोनों मध्यम का प्रयोग होता है। शुद्ध मध्यम का प्रयोग आरोह और अवरोह दोनों में तथा तीव्र मध्यम का प्रयोग केवल अवरोह में किया जाता है। आरोह में ऋषभ और गान्धार स्वर और अवरोह में गान्धार स्वर वर्जित होता है। कभी-कभी अवरोह में गान्धार स्वर का अनुलगन कण का प्रयोग कर लिया जाता है। राग केदार में तीव्र मध्यम आरोह में पंचम के साथ और शुद्ध मध्यम आरोह और अवरोह दोनों में प्रयोग किया जाता है। कभी-कभी अवरोह में धैवत से मध्यम को जाते समय मींड़ के साथ दोनों मध्यम एक साथ प्रयोग किया जाता है। यह प्रयोग रंजकता से परिपूर्ण होता है। राग हमीर के समान राग केदार में कभी-कभी अवरोह में मधुरता बढ़ाने के लिए कोमल निषाद विवादी स्वर के रूप में प्रयोग किया जाता है। राग का चलन वक्र होता है, किन्तु तानों में वक्रता का नियम शिथिल हो जाता है। राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। इस दृष्टि से यह उत्तरांग प्रधान राग होगा, क्योंकि मध्यम स्वर उत्तरांग का और षडज स्वर पूर्वांग का स्वर होता है। मध्यम स्वर का समावेश सप्तक के पूर्वांग में नहीं हो सकता। राग का एक नियम यह भी है कि वादी-संवादी दोनों स्वर सप्तक के एक अंग में नहीं हो सकते। इस दृष्टि से यह राग उत्तरांग प्रधान तथा दिन के उत्तर अंग में अर्थात रात्रि 12 बजे से दिन के 12 बजे के बीच गाया-बजाया जाना चाहिए। परन्तु राग केदार प्रचलन में इसके ठीक विपरीत रात्रि के पहले प्रहर में ही गाया-बजाया जाता है। राग केदार उपरोक्त नियम का अपवाद है। इस राग का गायन-वादन रात्रि के पहले प्रहर में किया जाता है। राग केदार का स्पष्ट अनुभव करने के लिए अब हम आपको इस राग के स्वरों से अभिसिंचित एक सुमधुर बन्दिश सुनवा रहे हैं। यह खयाल रचना विख्यात गायिका विदुषी शुभा मुद्गल ने प्रस्तुत किया है। शुभा जी से आप तीनताल में निबद्ध राग केदार की यह रचना सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग केदार : “काहे सुन्दरवा बोलो नाहिं...” : विदुषी शुभा मुद्गल




संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 277वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक बार पुनः मदन मोहन के राग आधारित फिल्मी गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 280वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने के बाद जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के तीसरे सत्र (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत के इस अंश को सुन कर आपको किस राग का अनुभव हो रहा है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप गीत की गायिका की आवाज़ को पहचान रहे हैं? हमें उनका नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 9 जुलाई, 2016 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 279वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 275 की संगीत पहेली में हमने आपको वर्ष 1970 में प्रदर्शित फिल्म ‘दस्तक’ से राग आधारित फिल्मी गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – चारुकेशी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – कहरवा और सितारखानी तीसरे प्रश्न का उत्तर है- पार्श्वगायिका – लता मंगेशकर

इस बार की संगीत पहेली में पाँच प्रतिभागियों ने तीनों प्रश्नों का सही उत्तर देकर विजेता बनने का गौरव प्राप्त किया है। ये विजेता हैं - वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। सभी पाँच विजेताओं को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

हार्दिक श्रद्धांजलि : विदुषी वीणा सहस्त्रबुद्धे


खयाल, टप्पा और भजन की सुप्रसिद्ध गायिका विदुषी वीणा सहस्त्रबुद्धे का गत 29 जून को निधन हो गया। उनके निधन से ग्वालियर धराने की गायकी का एक सितारा अस्त हो गया। उनकी गायकी में ग्वालियर घराने के साथ-साथ जयपुर और किराना घराने की गायकी की झलक भी मिलती थी। उनका जन्म 14 सितम्बर 1948 को संगीतज्ञों के परिवार में हुआ था। उनके पिता पण्डित शंकर श्रीपाद बोड़स ग्वालियर घराने के विख्यात संगीतज्ञ और पण्डित विष्णु दिगम्बर पलुस्कर के शिष्य थे। वीणा जी की संगीत-शिक्षा पहले अपने पिता से और बाद में अपने अग्रज पण्डित काशीनाथ बोड़स से प्राप्त हुई। आगे चल कर उन्हें वरिष्ठ संगीतज्ञों, पण्डित बलवन्तराव भट्ट, पण्डित वसन्त ठकार और पण्डित गजाननराव जोशी का मार्गदर्शन भी प्राप्त हुआ। वर्ष 1968 में वीणा जी ने कानपुर विश्वविद्यालय से संगीत, संस्कृत और अँग्रेजी विषय से स्नातक, 1969 में अखिल भारतीय गन्धर्व मण्डल से संगीत में स्नातकोत्तर परीक्षा उत्तीर्ण की। आगे चल कर 1979 में उन्होने कानपुर विश्वविद्यालय से संस्कृत में स्नातकोत्तर और 1988 में अखिल भारतीय गन्धर्व मण्डल से डॉक्ट्रेट की उपाधि अर्जित की। 1968 में उनका विवाह श्री हरि सहस्त्रबुद्धे से हुआ। वर्ष 1972 में वीणा जी को आकाशवाणी का राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हुआ। 1993 में उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से अलंकृत किया गया। 2013 का केन्द्रीय संगीत नाटक अकादमी का पुरस्कार जब भारत के राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने उन्हें प्रदान किया, उसी वर्ष वह एक असाध्य रोग से ग्रसित हो गई थीं। उन्हे पुरस्कार समारोह में व्हील चेयर पर ले जाया गया था। इसी रोग से ग्रसित होकर गत 29 जून को उनका निधन हो गया। निधन से लगभग दस दिन पूर्व ‘स्वरगोष्ठी’ के 275वें अंक का प्रकाशन 19 जून को किया गया था, जिसमें वीणा जी के स्वर में राग छायानट में निबद्ध खयाल प्रस्तुत किया गया था। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ परिवार विदुषी वीणा सहस्त्रबुद्धे की स्मृतियों को नमन करता है और उन्हे अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करता है।
अगले रविवार को श्रृंखला की एक एक नई कड़ी के साथ प्रातः 8 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।  

शोध एवं आलेख : सुजॉय चटर्जी 
 प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  



शनिवार, 2 जुलाई 2016

"तू मेरा कौन लागे?" क्या सम्बन्ध है इस गीत का किशोर कुमार से?


एक गीत सौ कहानियाँ - 85
 

'तू मेरा कौन लागे...' 



रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना
रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'।इसकी 85-वीं कड़ी में आज जानिए 1989 की फ़िल्म ’बटवारा’ के लोकप्रिय गीत "तू मेरा कौन लागे..." के बारे में जिसे अनुराधा पौडवाल, अलका याज्ञनिक और कविता कृष्णमूर्ति ने गाया था। गीत लिखा है हसन कमाल ने और संगीत दिया है लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल ने।  


 मारी फ़िल्मों में एकल और युगल गीतों की कोई कमी नहीं है। तीन, चार या उससे अधिक गायकों के गाये
गीतों की भी फ़ेहरिस्त काफ़ी लम्बी है। लेकिन अगर ऐसे गानें छाँटने के लिए कहा जाए जिनमें कुल तीन गायिकाओं की आवाज़ें हैं तो शायद गिनती उंगलियों पर ही की जा सकती है। दूसरे शब्दों में ऐसे गीत बहुत कम संख्या में बने हैं। आज हम एक ऐसे ही गीत की चर्चा कर रहे हैं जो बनी थी 1989 की फ़िल्म ’बटवारा’ के लिए। अलका याज्ञनिक, अनुराधा पौडवाल और कविता कृष्णमूर्ति का गाया "तू मेरा कौन लागे" गीत अपने ज़माने में काफ़ी लोकप्रिय हुआ था। इस गीत की चर्चा शुरू करने से पहले जल्दी जल्दी एक नज़र डाल लेते हैं तीन गायिकाओं के गाए फ़िल्मी गीतों के इतिहास पर। पहला गीत तो वही है जो फ़िल्म संगीत इतिहास का पहला पार्श्वगायन युक्त गीत है। 1935 की फ़िल्म ’धूप छाँव’ के गीत "मैं ख़ुश होना चाहूँ..." में संगीतकार रायचन्द बोराल ने तीन गायिकाओं - पारुल घोष, सुप्रभा सरकार और हरिमति दुआ को एक साथ गवाया था। 40 के दशक में 1945 की फ़िल्म ’ज़ीनत’ में एक ऐसी क़व्वाली बनी जिसमें केवल महिलाओं की आवाज़ें थीं, फ़िल्म संगीत के इतिहास में यह पहली बार था। मीर साहब और हाफ़िज़ ख़ाँ के संगीत में "आहें ना भरी शिकवे ना किए...", इस क़वाली में आवाज़ें थीं नूरजहाँ, ज़ोहराबाई अम्बालेवाली और कल्याणीबाई की। 50 के दशक में नौशाद साहब ने तीन गायिकाओं को गवाया महबूब ख़ान की बड़ी फ़िल्म ’मदर इण्डिया’ में। तीन मंगेशकर बहनों - लता, उषा और मीना ने इस गीत को गाया, बोल थे "दुनिया में हम आये हैं तो जीना ही पड़ेगा..."। 60 के दशक में पहली बार संगीतकार रवि ने लता, आशा और उषा को एक साथ गवाकर इतिहास रचा, फ़िल्म थी ’गृहस्थी’ और गाना था "खिले हैं सखी आज..."। इसके पाँच साल बाद 1968 में कल्याणजी-आनन्दजी ने फिर एक बार इन तीन बहनों को गवाया ’तीन बहूरानियाँ’ फ़िल्म के गीत "हमरे आंगन बगिया..." में। इसी साल कल्याणजी-आनन्दजी भाइयों ने मुबारक़ बेगम, सुमन कल्याणपुर और कृष्णा बोस की आवाज़ों में ’जुआरी’ फ़िल्म में एक गीत गवाया "नींद उड़ जाए तेरी चैन से सोने वाले" जो काफ़ी लोकप्रिय हुआ था। 70 के दशक में शंकर-जयकिशन ने एक कमचर्चित फ़िल्म ’दिल दौलत दुनिया’ के लिए एक दीपावली गीत रेकॉर्ड किया आशा भोसले, उषा मंगेशकर और रेखा जयकर की आवाज़ों में, "दीप जले देखो..."। और 80 के दशक में लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल ने 1982 की फ़िल्म ’जीवन धारा’ में पहली बार अनुराधा-अलका-कविता की तिकड़ी को पहली बार साथ में माइक के सामने ला खड़ा किया, गीत था "जल्दी से आ मेरे परदेसी बाबुल..."। और जब 1989 में ’बटवारा’ में एक ऐसे तीन गायिकाओं वाले गीत की ज़रूरत आन पड़ी तब लक्ष्मी-प्यारे ने फिर एक बार इसी तिकड़ी को गवाने का निर्णय लिया। 90 के दशक में इस तिकड़ी को राम लक्ष्मण ने ’हम साथ साथ हैं’ फ़िल्म के कई गीतों में गवाया जैसे कि "मय्या यशोदा...", "मारे हिवड़ा में नाचे मोर...", "हम साथ साथ हैं..."। इसी दशक में यश चोपड़ा की फ़िल्म ’डर’ में शिव-हरि ने लता मंगेशकर के साथ कविता कृष्णमूर्ति और पामेला चोपड़ा को गवाकर एक अद्‍भुत गीत की रचना की, बोल थे "मेरी माँ ने लगा दिये सोलह बटन मेरी चोली में..."। 2000 के दशक में भी तीन गायिकाओं के गाए गीतों की परम्परा जारी रही, अनु मलिक ने ’यादें’ फ़िल्म में अलका याज्ञनिक, कविता कृष्णमूर्ति और हेमा सरदेसाई से गवाया "एली रे एली कैसी है पहेली..."।

"तू मेरा कौन लागे" गीत में डिम्पल कपाडिया के लिए अलका याज्ञनिक, अम्रीता सिंह के लिए कविता
किशोर के साथ अनुराधा की दुर्लभ तसवीर, साथ में अमित कुमार और आशा
कृष्णमूर्ति और पूनम ढिल्लों के लिए अनुराधा पौडवाल की आवाज़ निर्धारित हुई। गाना रेकॉर्ड होकर सेट पर पहुँच गया शूटिंग् के लिए। पर फ़िल्मांकन में हो गई गड़बड़। अभिनेत्री-गायिका की जोड़ियों में गड़बड़ हो गई। शुरुआती मुखड़े में अम्रीता सिंह ने अनुराधा पौडवाल के गाए हिस्से में होंठ मिला दी जबकि अनुराधा को पूनम के लिए गाना था। गीत का अन्त तो और गड़बड़ी वाला है। डिम्पल गीत को ख़त्म करती हैं "तू मारो कोण लागे" पंक्ति को चार बार गाते हुए। पर पहली दो लाइनें अलका की आवाज़ में है और अगली दो लाइनें अनुराधा की आवाज़ में। और तो और अनुराधा जो पूनम के लिए "तू मेरा कौन लागे" गा रही थीं, अब डिम्पल के लिए "तू मारो कोण लागे" गाती हैं। ऐसा क्यों है, पता नहीं! ख़ैर, अब ज़िक्र करते हैं कि इस गीत का किशोर कुमार के साथ क्या सम्बन्ध है। गीत के रेकॉर्डिंग् के दिन की बात है। तीनों गायिकाएँ तैयार थीं, दवाब भी था उन पर क्योंकि तीनों में उन दिनों प्रतियोगिता थी। इसलिए इस दवाब में थीं कि कहीं मुझसे इस गीत में कोई ग़लती ना हो जाए! गीत रेकॉर्ड हो गया, तीनों गायिकाएँ काँच के कमरे से बाहर आ गईं। लक्ष्मी-प्यारे भी उनकी तरफ़ चले आ रहे थे कन्डक्टिंग् रूम की तरफ़ से, पर किसी के चेहरे पर कोई मुस्कुराहट नहीं थी जो आम तौर पर होता है अगर गीत अच्छा रेकॉर्ड हो जाए तो। लक्ष्मी-प्यारे के उतरे हुए चेहरे देख कर तीनों गायिकाएँ घबरा गईं यह सोच कर कि कहीं उनसे कोई ग़लती तो नहीं हो गई इस गीत में? पास आने पर अलका याज्ञनिक ने प्यारेलाल जी से पूछा कि क्या बात है? प्यारेलाल जी ने बताया, "किशोर दा नहीं रहे!" दिन था 13 अक्टुबर 1987। इसी दिन किशोर दा चले गए और इसी दिन रेकॉर्ड हुआ था ’बटवारा’ का यह गीत, हालाँकि फ़िल्म 1989 में रिलीज़ हुई थी। 



फिल्म - बँटवारा : "तू मेरा कौन लागे..." : अनुराधा पौडवाल, अलका याज्ञिक, कविता कृष्णमूर्ति



अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें soojoi_india@yahoo.co.in के पते पर। 



आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 




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