मंगलवार, 5 अप्रैल 2016

बस कुछ प्रतियाँ शेष हैं प्रथम संस्करण के - ’कारवाँ सिने संगीत का - 1931-1947'

प्रिय पाठकों,

सुजॉय चटर्जी लिखित पुस्तक ’कारवाँ सिने संगीत का - उत्पत्ति से स्वराज के बिहान तक (1931-1947)' के प्रथम संस्करण के अब बस कुछ ही प्रतियाँ शेष हैं।

द्वितीय संस्करण जल्द ही प्रकाशित होगी, पर संभव है कि प्रकाशक इसमें मूल्य वृद्धि करेंगे। अत: आपको यह सूचित किया जाता है कि अगर आप इस पुस्तक के प्रथम संस्करण को प्राप्त करने के इच्छुक हैं तो शीघ्रातिशीघ्र सुजॉय चटर्जी से ईमेल आइडी soojoi_india@yahoo.co.in सम्पर्क करें और इस पुस्तक की प्रति अपने लिए सुरक्षित करें।

पुस्तक मूल्य: INR 595.00 (पोस्टल चार्ज सहित)




रविवार, 3 अप्रैल 2016

विविध शैलियों में होली : SWARGOSHTHI – 264 : HOLI SONGS




स्वरगोष्ठी – 264 में आज

होली और चैती के रंग – 2 : विविध शैलियों और रागों में होली

धमार, ठुमरी और फिल्मी गीत में फागुनी रचनाएँ





‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर हमारी नई श्रृंखला – ‘होली और चैती के रंग’ की दूसरी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत और अभिनन्दन करता हूँ। इस श्रृंखला में हम ऋतु के अनुकूल भारतीय संगीत के कुछ ऐसे रागों और रचनाओं की चर्चा कर रहे हैं, जिन्हें ग्रीष्मऋतु के शुरुआती परिवेश में गाने-बजाने की परम्परा है। भारतीय समाज में अधिकतर उत्सव और पर्वों का निर्धारण ऋतु परिवर्तन के साथ होता है। शीत और ग्रीष्म ऋतु की सन्धिबेला में मनाया जाने वाला पर्व- होलिकोत्सव, प्रकारान्तर से पूरे देश में आयोजित होता है। यह उल्लास और उमंग का, रस और रंगों का, गायन-वादन और नर्तन का पर्व है। अबीर-गुलाल के उड़ते बादलों और पिचकारियों से निकलती इन्द्रधनुषी फुहारों के बीच हम ‘स्वरगोष्ठी’ की इन प्रस्तुतियों के माध्यम से फागुन की सतरंगी छटा से सराबोर हो रहे हैं। संगीत के सात स्वर, इन्द्रधनुष के सात रंग बन कर हमारे तन-मन पर छा जाते हैं। भारतीय संगीत की सभी शैलियों- शास्त्रीय, उपशास्त्रीय, सुगम, लोक और फिल्म संगीत में फाल्गुनी रस-रंग में पगी असंख्य रचनाएँ हैं, जो हमारा मन मोह लेती हैं। पिछले अंक में हमने आपको राग काफी के स्वरों पर तैरती कुछ फागुनी रचनाओं का रसास्वादन कराया था, आज के अंक में हम आपको धमार, ठुमरी और फिल्म शैली की कुछ रचनाएँ सुनवा रहे हैं।



गुंडेचा बन्धु
भारतीय पर्वों में होली एक ऐसा पर्व है, जिसमें संगीत-नृत्य की प्रमुख भूमिका होती है। जनसामान्य अपने उल्लास को व्यक्त करने के लिए मुख्य रूप से देशज संगीत का सहारा लेता है। इस अवसर पर प्रस्तुत की जाने वाली रचनाओं में लोक-संगीत की प्रधानता के बावजूद सभी भारतीय संगीत शैलियों में होली की रचनाएँ प्रमुख रूप से उपलब्ध हैं। आज के अंक में हम आपके लिए कुछ संगीत शैलियों में रंगोत्सव के चुनिन्दा गीतों पर चर्चा करेंगे। भारतीय संगीत की प्राचीन और शास्त्र-सम्मत शैली है- ध्रुपद अथवा ध्रुवपद। इस शैली के अन्तर्गत धमार गायकी तो पूरी तरह रंगों के पर्व पर ही केन्द्रित रहती है। धमार एक प्रकार की गायकी भी है और एक ताल विशेष का नाम भी है। यह पखावज पर बजने वाला 14 मात्रा का ताल है, जिसकी संगति धमार गायन में होती है। धमार की रचनाओं में अधिकतर राधा-कृष्ण की होली का वर्णन मिलता है। कुछ धमार रचनाओं में फाल्गुनी परिवेश का चित्रण भी होता है। गम्भीर प्रवृत्ति के रागों की अपेक्षा चंचल प्रवृत्ति के रागों में धमार की प्रस्तुतियाँ मन को अधिक लुभातीं हैं। आज हम आपको धमार गायकी के माध्यम से रंगोत्सव का एक अलग रंग दिखाने का प्रयास करेंगे।

ध्रुवपद-धमार गायकी में एक युगल गायक हैं- गुंडेचा बन्धु (रमाकान्त और उमाकान्त गुंडेचा), जिन्हें देश-विदेश में भरपूर यश प्राप्त हुआ है। इनकी संगीत-शिक्षा उस्ताद जिया फरीदउद्दीन डागर और विख्यात रुद्रवीणा वादक उस्ताद जिया मोहिउद्दीन डागर द्वारा हुई है। ध्रुवपद के ‘डागुरवाणी’ गायन में दीक्षित इन कलासाधकों से ‘स्वरगोष्ठी’ के होली अंकों के लिए हमने एक धमार अपने पाठकों/श्रोताओं को सुनवाने का अनुरोध किया था। हमारे अनुरोध का मान रखते हुए रमाकान्त गुंडेचा ने हमें तत्काल राग केदार का यह मनमोहक धमार, आपको सुनवाने के लिए उपलब्ध कराया। गुंडेचा बन्धु के प्रति आभार व्यक्त करते हुए, राग केदार का यह धमार प्रस्तुत है।


धमार- केदार : ‘चोरी चोरी मारत हो कुमकुम...’ : स्वर – रमाकान्त और उमाकान्त गुंडेचा


पं. छन्नूलाल मिश्र
इस अंक के आरम्भ में हमने इस तथ्य को रेखांकित किया था की भारतीय संगीत की सभी शैलियों में होली के गीत मिलते हैं। परन्तु लोक शैली में होली गीतों का सौन्दर्य निराला होता है। वह भी तब, जब ऐसी रचना किसी शास्त्रीय गायक द्वारा प्रस्तुत की गई हो। मेरे मित्र, संगीत समीक्षक और हाथरस से प्रकाशित प्रतिष्ठित मासिक पत्रिका- ‘संगीत’ के परामर्शदाता मुकेश गर्ग ने इस तथ्य को इन शब्दों में रेखांकित किया है- "हिन्दुस्तानी संगीत में होली की जगह कुछ अलग ही है. ध्रुपद शैली की धमार गायकी से लेकर ख़याल और ठुमरी गायकी तक इस रंग-बिरंगे त्योहार का उल्लास देखते ही बनता है। इन गायन-शैलियों में संयोग श्रृंगार के ढेरों चित्र तो मिलते ही हैं, वियोग की पीड़ा को दर्शाने वाली ठुमरियों की भी कोई कमी नहीं। यहाँ तक कि ठुमरी का एक प्रकार तो 'होरी' या 'होली' नाम से ही जाना जाता है।" इन ठुमरियों ने शब्द और स्वर दोनों स्तरों पर बहुत कुछ लोक-संगीत से ग्रहण किया है।’ लोक संगीत की इस महत्ता को स्वीकारती हुई लखनऊ स्थित भातखण्डे संगीत महाविद्यालय (अब विश्वविद्यालय) की सेवानिवृत्त प्रोफेसर कमला श्रीवास्तव का मत है कि भारतीय संगीत के कई राग, लोक संगीत की धुनों पर ही निर्मित है। राग पीलू, पहाड़ी, माँड़ आदि का उदगम लोक संगीत से ही हुआ है। आइए अब आपको होली की एक लोक संगीत की रचना उपशास्त्रीय दादरा अंग में सुनवाते हैं, वरिष्ठ शास्त्रीय गायक पण्डित छन्नूलाल मिश्र से।


शिव की होली : ‘खेले मसाने की होली दिगम्बर...’ : स्वर – पं. छन्नूलाल मिश्र


आरती अंकलीकर
रंगोत्सव के उल्लासपूर्ण परिवेश में फाल्गुनी संगीत-रचनाओं का सिलसिला जारी रखते हुए अब हम आपको एक फिल्मी गीत सुनवाते हैं। यह फिल्मी गीत होते हुए भी ठुमरी अंग में प्रस्तुत की गई है। 1996 में एक संगीत-प्रधान फिल्म, ‘सरदारी बेगम’ का प्रदर्शन हुआ था। इस फिल्म में ठुमरी अंग की एक अत्यन्त मोहक गीत शामिल था। यूँ तो राग काफी में होली की रचनाएँ खूब मुखर होती हैं, परन्तु कुछ अन्य राग भी हैं जिनमें रंगों के इस पर्व के परिवेश का अनूठा चित्रण मिलता है। उपशास्त्रीय रचनाओं में प्रायः होली का चित्रण राग देस, खमाज, तिलंग, पीलू आदि में भी मिलता है। 1996 में एक संगीतप्रधान फिल्म ‘सरदारी बेगम’ का प्रदर्शन हुआ था। इस फिल्म में ठुमरी अंग का एक अत्यन्त मोहक गीत शामिल था। संगीतकार वनराज भाटिया ने गीतकार जावेद अख्तर के शब्दों को राग पीलू के स्वरों की चाशनी में डुबो कर और ठुमरी अंग से अलंकृत कर फिल्म में प्रस्तुत किया था। इस गीत में होली के उमंग और उल्लास के साथ-साथ सौम्य भाव भी परिलक्षित होता है। फिल्म में यह गीत आशा भोसले और आरती अंकलीकर की आवाज़ में दो अलग-अलग प्रसंगों में फिल्माया गया है। उपशास्त्रीय गायिका आरती अंकलीकर के स्वरों में आप यह फिल्मी ठुमरी सुनिए और अनुभव कीजिये कि राग पीलू में भी होली का रंग किस खूबी से निखरता हैं।


राग - पीलू : फिल्म – सरदारी बेगम : ‘मोरे कान्हा जो आए पलट के...’ : आरती अंकलीकर




संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 264वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको राग पर आधारित फिल्मी गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 270वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने के बाद तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की दूसरी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत का यह अंश सुन कर बताइए कि इस गीत में किस राग का स्पर्श है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप गीत की गायिका का नाम हमे बता सकते हैं?

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 9 अप्रैल, 2016 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 266वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता 


‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 262 की संगीत पहेली में हमने आपको 1963 में प्रदर्शित फिल्म ‘गोदान’ से राग आधारित गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। इस पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – काफी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – कहरवा और तीसरे प्रश्न का उत्तर है- मुख्य गायक – मोहम्मद रफी

इस बार की पहेली में कुल छः प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया है। हमारी नई प्रतिभागी मुम्बई, महाराष्ट्र से मीरा ठाकुर हैं, जिन्होने ‘स्वरगोष्ठी’ की पहेली में पहली बार भाग लिया है और पहेली का एकदम सही उत्तर दिया है। संगीत-प्रेमियों के इस परिवार में मीरा जी को शामिल करते हुए उनका हार्दिक स्वागत है। हमारे अन्य नियमित प्रतिभागी विजेता हैं- चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी और वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया। सभी छः प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात 


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ में आप हमारी श्रृंखला ‘होली और चैती के रंग’ का रसास्वादन कर रहे हैं। श्रृंखला के इस अंक में हमने आपसे विविध शैलियों में होली गीतों पर चर्चा की। ‘स्वरगोष्ठी’ साप्ताहिक स्तम्भ के बारे में हमारे पाठक और श्रोता नियमित रूप से हमें पत्र लिखते है। हम उनके सुझाव के अनुसार ही आगामी विषय निर्धारित करते है। ‘स्वरगोष्ठी’ पर आप भी अपने सुझाव और फरमाइश हमें भेज सकते है। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करेंगे। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल अवश्य कीजिए। अगले रविवार को एक नई श्रृंखला के नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  




शनिवार, 2 अप्रैल 2016

"चिट्ठी आई है वतन से...", कैसे मिला था पंकज उधास को यह गीत?


एक गीत सौ कहानियाँ - 79
 

'चिट्ठी आई है वतन से...' 



रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'।इसकी 79-वीं कड़ी में आज जानिए 1986 की फ़िल्म ’नाम’ के मशहूर गीत "चिट्ठी आई है वतन से चिट्ठी आई है..." के बारे में जिसे पंकज उधास ने गाया था। बोल आनन्द बक्शी के और संगीत लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल का।  

पंकज उधास को सबसे पहले फ़िल्म-संगीत जगत में उनके जिस गाने की वजह से लोकप्रियता मिली, वह गाना
था 1986 में आई फ़िल्म ’नाम’ का, "चिट्ठी आई है वतन से चिट्ठी आई है..."। पंकज उधास को यह फ़िल्म तब मिली जब वो बहुत संघर्ष करने के बाद मायूसी से घिर कर, हार कर, भारत से बाहर स्थानान्तरित हो गए थे। बात 70 के दशक की है, गायक बनने की ख़्वाहिश में पंकज बम्बई में संघर्ष कर रहे थे। जगह जगह धक्के खाने के बाद उन्हें पहला मौक़ा दिया संगीत निर्देशिका उषा खन्ना ने। उषा जी ने 1972 की फ़िल्म ’कामना’ में पंकज उधास को ब्रेक दिया। जो पहला गाना उन्हें गाने को मिला उसे लिखा था नक्श ल्यालपुरी ने - "तुम कभी सामने आ जाओ तो पूछूँ तुमसे किस तरह दर्द-ए-मोहब्बत में जीया जाता है"। ब्रेक तो मिल गया, गाना भी आ गया, मगर सिंगिंग् करीयर में ख़ास फ़ायदा नहीं हुआ। अगले चार साल तक पंकज को फिर से निर्माताओं और संगीतकारों के दफ़्तरों के चक्कर लगाने पड़े। हालाँकि अब तक उनके बड़े भाई मनहर उधास भी फ़िल्मों में गाना गाने लगे थे, लेकिन पंकज को इससे भी कोई फ़ायदा नहीं हुआ। चारों तरफ़ से निराश होने के बाद पंकज ने अपने भाई मनहर के साथ स्टेज शोज़ में गाना शुरू कर दिया। और उसके कुछ समय के बाद ही वो हिन्दुस्तान छोड़ कर विदेश चले गए। पंकज बम्बई इन्डस्ट्री से हार कर विदेश जा पहुँचे।

जब राजेन्द्र कुमार ’नाम’ फ़िल्म बना रहे थे, तब उनका किसी वजह से विदेश जाना हुआ। और वहाँ उन्होंने
पंकज का गाना स्टेज शो में सुना। पंकज की लोकप्रियता विदेश में तब तक बहुत बढ़ गई थी। इसी लोकप्रियता को देख कर राजेन्द्र कुमार ने पंकज उधास की एक ग़ज़ल को अपनी फ़िल्म में रखने का मन बना लिया। राजेन्द्र कुमार ने अपने ऐसिस्टैण्ट को पंकज से फ़ोन पर बात करके एक मीटिंग् तय करने को कहा। जब ऐसिस्टैण्ट ने पंकज को फ़ोन करके बताया कि राजेन्द्र कुमार साहब अपनी फ़िल्म में उन्हें एक special appearance के तौर पर लेना चाहते हैं तो पंकज को इस special appearance वाले सीन में कुछ दम नहीं दिखा। उन्होंने इस बात को, इस न्योते को तवज्जु नहीं दी, कोई जवाब नहीं दिया। वक़्त गुज़रता चला गया, राजेन्द्र कुमार को पंकज उधास का कोई जवाब नहीं आया। एक दिन राजेन्द्र कुमार ने इस बात का ज़िक्र (कुछ हद तक शिकायत के तौर पर) बड़े भाई मनहर उधास से किया। तब मनहर ने छोटे भाई पंकज से बात की और उन्हें समझाया। मनहर के कहने पर पंकज को समझ में आया कि उन्होंने राजेन्द्र कुमार जैसे सीनियर फ़िल्मकार को जवाब ना देकर ग़लती की है। उन्होंने राजेन्द्र कुमार से बात की, माफ़ी माँगी और उनके ऑफ़र को मान लिया। क़िस्मत देखिये कि पंकज के इस special appearance वाला गाना वाक़ई पंकज के करीयर में स्पेशल बन गया। और जब स्क्रीन पर आकर उन्होंने यह गाना गाया "चिट्ठी आई है...", इस फ़िल्म को देख कर, इस गीत को सुन कर, पंकज उधास रातों रात स्टार बन गए। आज जहाँ भी भारत के लोग विदेश की धरती पर बसे हैं, ऐसा शायद ही कोई मिले जिसने पंकज उधास का यह गाना ना सुना हो।

यह पंकज उधास का दुर्भाग्य ही है कि 1986-87 में फ़िल्म इन्डस्ट्री में स्ट्राइक चलने की वजह से फ़िल्मफ़ेयर
पुरस्कारों का वितरण समारोह आयोजित नहीं हुआ, और इन दो सालों में कोई भी पुरस्कार किसी को नहीं दिया गया। अन्यथा इस गीत के लिए पंकज उधास को सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायक का पुरस्कार ज़रूर मिलता। उधर अमीन सायानी द्वारा प्रस्तुत प्रायोजित कार्यक्रम ’सिबाका गीत माला’ में इस गीत ने अन्य सभी गीतों को पछारते हुए उस वर्ष के सर्वोच्च गीत का ख़िताब हासिल किया। इस दौड़ में शामिल थे "हवा हवाई" (मिस्टर इण्डिया), "मैं तेरी दुश्मन" (नगीना), "और इस दिल में क्या रखा है" (इमानदार), "पतझड़ सावन बसन्त बहार" (सिन्दूर), "ना तुमने किया ना मैंने किया" (नाचे मयूरी) जैसे लोकप्रिय गीत। लेकिन "चिट्ठी आई है" के बोलों, संगीत और गायकी के आगे कोई गीत टिक ना सकी। वैसे उस साल ’सिबाका गीत माल” में फ़िल्म ’नाम’ का एक और गीत भी शामिल था। मोहम्मद अज़ीज़ की आवाज़ में "अमीरों की शाम ग़रीबों के नाम" गीत को वार्षिक कार्यक्रम में आठवाँ पायदान मिला था। मनहर उधास के ज़रिये पंकज उधास तक पहुँचने की वजह से राजेन्द्र कुमार ने मनहर उधास को भी इस फ़िल्म में एक गीत गाने का मौक़ा दिया था। मोहम्मद अज़ीज़ के साथ मनहर उधास का गाया यह युगल गीत था "तू कल चला जाएगा तो मैं क्या करूँगा", जिसमें मनहर ने फ़िल्म के मुख्य नायक संजय दत्त का पार्श्वगायन किया था। फ़िल्म ’नाम’ में दो नायक और दो नायिकाएँ थीं; संजय दत्त के लिए मनहर उधास की आवाज़ ली गई तो कुमार गौरव के लिए चुनी गई मोहम्मद अज़ीज़ की आवाज़। दो नायिकाओं में अम्रीता सिंह के लिए लता मंगेशकर की आवाज़ ली गई और पूनम ढिल्लों के लिए कविता कृष्णमूर्ति की आवाज़। लेकिन आइटम गीत "चिट्ठी आई है" ने लोकप्रियता के जो झंडे गाढ़े, इस फ़िल्म के दूसरे गीत उसके दूर दूर तक भी नज़र नहीं आए। आज भी लोग "चिट्ठी आई है" को सम्मान के साथ सुनते हैं।



अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें soojoi_india@yahoo.co.in के पते पर।  





आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 




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