शनिवार, 16 जनवरी 2016

"हम काले हैं तो क्या हुआ दिलवाले हैं....", क्या परेशानी थी मनोज कुमार को इस गीत से?


एक गीत सौ कहानियाँ - 74
 

'हम काले हैं तो क्या हुआ दिलवाले हैं...' 



रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 74-वीं कड़ी में आज जानिए 1965 की फ़िल्म ’गुमनाम’ के मशहूर गीत "हम काले हैं तो क्या हुआ दिलवाले हैं..." के बारे में जिसे मोहम्मद रफ़ी ने गाया था। बोल हसरत जयपुरी के और संगीत शंकर-जयकिशन का।

महमूद व मनोज कुमार
बात उस वक़्त की है जब महमूद इतना बड़ा नाम हो गया था कि हिन्दी सिनेमा के बड़े-बड़े स्टार महमूद के साथ काम करने से कतराने लगे थे। कहते थे कि अगर इनके साथ हमारा सीन होगा तो ये खा जाएगा हमें! इसलिए बहुत से स्टार्स तो महमूद को अपनी फ़िल्म से निकलवाने या उनके सीन कम करने के लिए निर्माता, निर्देशक और वित्तदाताओं पर दबाव भी डाल दिया करते थे। 1965 की सुपरहिट फ़िल्म ’गुमनाम’ में भी यही हुआ। राजा नवाथे द्वारा निर्देशित और एन.एन. सिप्पी द्वारा निर्मित फ़िल्म ’गुमनाम’ के शुरुआती मसौदे में महमूद वाला किरदार था ही नहीं। वह तो वित्तदाताओं की ज़िद थी कि फ़िल्म की सफलता के लिए इसमें महमूद का होना ज़रूरी है, इसलिए उनके लिए भी रोल निकाला जाए! नहीं है तो लिखो, ऐसा हुकुम था। मनोज कुमार और प्राण इस फ़िल्म के लिए फ़ाइनल हो चुके थे। दोनों ने ही फ़िल्म में महमूद को लिए जाने का विरोध किया, लेकिन वित्तदाताओं और एन.एन. सिप्पी की ज़िद के सामने उनकी चली नहीं। और फ़िल्म में महमूद के लिए रोल लिखवाया गया। फ़िल्म की शूटिंग् शुरू हुई और महमूद पर एक गाना भी फ़िल्माया गया, "हम काले हैं तो क्या हुआ दिलवाले हैं..."। गाना फ़िल्माये जाने के बाद जब देखा गया तो मनोज कुमार ने फिर एक बार एन.एन. सिप्पी से कहा कि यह गाना हटा दो, यह गाना बड़ा घटिया है, इससे फ़िल्म का स्तर गिर रहा है। एन.एन. सिप्पी जब नहीं माने तो मनोज कुमार ने अपनी बात को सिद्ध करने के लिए मशहूर निर्देशक और अपने करीबी दोस्त राज खोसला के लिए फ़िल्म का एक स्पेशल शो रखवाया। इसे देख कर राज खोसला ने भी महमूद के गाने को फ़िल्म से हटाने का सुझाव दिया। लेकिन फिर भी एन. एन. सिप्पी नहीं माने। अब सिप्पी साहब के इस रवैये के बाद मनोज कुमार ने तो यहाँ तक कह दिया कि अगर महमूद का यह गाना रहा तो यह फ़िल्म तीन हफ़्ते भी नहीं चल पाएगी। 1965 में जब यह फ़िल्म रिलीज़ हुई तो इसने कामयाबी के कई रेकॉर्ड तोड़ दिए। पूरी फ़िल्म के दौरान जिस महमूद से प्रॉबलेम थी, उसी महमूद को साल के फ़िल्मफ़ेयर में Best Supporting Actor  के लिए नामांकित किया गया, और उन पर फ़िल्माया गीत "हम काले हैं तो क्या हुआ दिलवाले हैं", इस गीत ने तो धूम मचा दी। यह गीत महमूद के साथ-साथ इस फ़िल्म की पहचान भी बन गया।


हरिन्द्रनाथ और रफ़ी
इस गीत में महमूद का जितना योगदान था, उतना ही बड़ा योगदान मोहम्मद रफ़ी साहब के गायकी की भी थी। महमूद के अंदाज़ को ध्यान में रखते हुए रफ़ी साहब ने इस गीत जिस तरह का अंजाम दिया इसमें कोई शक़ नहीं कि इस गीत की सफलता के लिए महमूद का जितना श्रेय है, उतना ही श्रेय रफ़ी साहब को भी जाता है। साथ ही श्रेय गीतकार हसरत जयपुरी और संगीतकार शंकर-जयकिशन को भी तो जाता ही है। इस गीत की लोकप्रियता का आलम यह था कि इस फ़िल्म के रिलीज़ होने के चार साल बाद 1969 में इस गीत का एक अंग्रेज़ी संस्करण बनाया गया जिसे रफ़ी साहब की ही आवाज़ में रेकॉर्ड किया गया और HMV ने 45 RPM का ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड जारी किया, जिसकी रेकॉर्ड संख्या है N79866 और रेकॉर्ड का शीर्षक है ’The She I Love'। इस अंग्रेज़ी संस्करण को लिखा था हरिन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय ने और संगीत एक बार फिर शंकर जयकिशन का ही था। ये हरिन्द्रनाथ च्ट्टोपाध्याय वो ही हैं जिन्होंने समय-समय पर हिन्दी फ़िल्मों में अभिनय के साथ-साथ कुछ अंग्रेज़ी गीत भी लिखे हैं। फ़िल्म ’जुली’ का प्रीति सागर का गाया "My heart is beating" भी उन्हीं का लिखा गीत है। अशोक कुमार अभिनीत यादगार फ़िल्म ’आशिर्वाद’ का हिट गीत "रेल गाड़ी" भी उन्हीं की रचना है। फ़िल्म ’बावर्ची’ में पिताजी की भूमिका में हरिन्द्रनाथ जी ने "भोर आई गया अन्धियारा" गीत में थोड़ा अंश गाया भी है। रफ़ी के साहब के विदेशी स्टेज शोज़ के लिए अक्सर वो उन्हें अंग्रेज़ी में गीत लिख कर दिया करते थे उनके हिन्दी गीतों की धुनों पर जिन्हें सुन कर विदेशी ऑडिएन्स ख़ुशी से झूम उठा करते। ख़ैर, हम बात कर रहे थे "हम काले हैं..." के अंग्रेज़ी संस्करण की। तो ये रहे इस संस्करण के बोल -

The she I love is a beautiful beautiful dream come true,
I love her, love her, love her, love her, so will you.
The she I love is a beautiful beautiful dream come true.

Because she thinks its pleases me,
Like a cat a rat she seizes me,
She tickles me, she teases me,
She warms me up, she freezes me.
I love her, love her, love her, love her, what shall I do?
The she I love is a beautiful beautiful dream come true.

O she is a flower lovely and rare,
Her beautiful body seems to bear,
The magical mood of morning air,
And black as night is her raven hair,
I love her, love her, love her, love her, my love is true,
The she I love is a beautiful beautiful dream come true. 


फिल्म 'गुमनाम' के इस गीत और इसी गीत की धुन पर बने अँग्रेजी गाने के वीडियो अब आप देखिए और सुनिए। पहले गीत का अँग्रेजी संस्करण और फिर फिल्म 'गुमनाम' के मूल गीत का वीडियो देखिए। 



अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें soojoi_india@yahoo.co.in के पते पर। 


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 




मंगलवार, 12 जनवरी 2016

रसिक संपादक - प्रेमचंद

इस लोकप्रिय स्तम्भ "बोलती कहानियाँ" के अंतर्गत हम हर सप्ताह आपको सुनवाते रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछली बार आपने अनुराग शर्मा के स्वर में सर्वेश तिवारी "श्रीमुख" की लघुकथा "दंगा" का वाचन सुना था।

आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं मुंशी प्रेमचंद की कहानी रसिक संपादक जिसे स्वर दिया है अनुराग शर्मा ने।

प्रस्तुत कथा का गद्य "हिन्दी समय" पर उपलब्ध है। "रसिक संपादक" का कुल प्रसारण समय 15 मिनट 55 सेकंड है। सुनिए और बताइये कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।





मैं एक निर्धन अध्यापक हूँ ... मेरे जीवन मैं ऐसा क्या ख़ास है जो मैं किसी से कहूं
 ~ मुंशी प्रेमचंद (१८८०-१९३६)


हर सप्ताह यहीं पर सुनें एक नयी हिन्दी कहानी


"क्या तुम समझते हो मुझे छोड़कर भाग जाओगे?”
 (मुंशी प्रेमचंद कृत "रसिक संपादक" से एक अंश)


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यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें:
रसिक संपादक MP3

#Second Story, Rasik Sampadak : Munshi Premchand Hindi Audio Book/2016/02. Voice: Anurag Sharma

रविवार, 10 जनवरी 2016

पहेली के महाविजेताओं की प्रस्तुतियाँ : SWARGOSHTHI – 252 : RAG NAND, MALKAUNS AND TILANG





स्वरगोष्ठी – 252 में आज

राग नन्द, सम्पूर्ण मालकौंस और तिलंग

संगीत पहेली की तीनों महिला विजेताओं क्षिति, विजया और हरिणा का अभिनन्दन






‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का नए वर्ष के दूसरे अंक में कृष्णमोहन मिश्र की ओर से हार्दिक अभिनन्दन है। पिछले अंक में हमने आपसे ‘स्वरगोष्ठी’ स्तम्भ के बीते वर्ष की कुछ विशेष गतिविधियों की चर्चा की थी। साथ ही पहेली के चौथे महाविजेता डॉ. किरीट छाया के व्यक्तित्व से परिचित कराया था और उनकी पसन्द का संगीत भी सुनवाया था। इस अंक में भी हम गत वर्ष की कुछ अन्य गतिविधियों का उल्लेख करने के साथ ही संगीत पहेली के प्रथम तीन महाविजेताओं की घोषणा करेंगे और उनका सम्मान भी करेंगे। ‘स्वरगोष्ठी’ के पाठक और श्रोता जानते हैं कि इस स्तम्भ के प्रत्येक अंक में संगीत पहेली के माध्यम से हम हर सप्ताह भारतीय संगीत से जुड़े तीन प्रश्न देकर आपसे दो प्रश्नों का उत्तर पूछते हैं। आपके दिये गये सही उत्तरों के प्राप्तांकों की गणना दो स्तरों पर की जाती है। ‘स्वरगोष्ठी’ की दस-दस कड़ियों को पाँच श्रृंखलाओं (सेगमेंट) में बाँट कर और फिर वर्ष के अन्त में सभी पाँच श्रृंखलाओं के प्रतिभागियों के प्राप्तांकों की गणना की जाती है। वर्ष 2015 की संगीत पहेली में चार प्रतिभागी नियमित रूप से भाग लेते रहे। 250वें अंक की पहेली के परिणाम आने तक शीर्ष के चार महाविजेता चुने गए। 56 अंक अर्जित कर वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया चौथे महाविजेता बने। 84 अंक पाकर हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी ने तीसरे, 90 अंक के साथ पेंसिलवानिया, अमेरिका की विजया राजकोटिया ने दूसरे और 92 अंक के साथ जबलपुर, मध्यप्रदेश की क्षिति तिवारी ने पहले महाविजेता होने का सम्मान प्राप्त किया। यह तथ्य भी रेखांकन के योग्य हैं कि सर्वाधिक अंक अर्जित करने वाली तीनों प्रतिभागी महिलाएँ हैं और संगीत की कलाकार और शिक्षिका भी है।



संगीत पहेली की तीसरी महाविजेता बनीं हैं, हैदराबाद की सुश्री डी. हरिणा माधवी। “संगीत जीवन का विज्ञान है”, इस सिद्धान्त को केवल मानने वाली ही नहीं बल्कि अपने जीवन में उतार लेने वाली हरिणा जी दो विषयों की शिक्षिका का दायित्व निभा रही हैं। हैदराबाद के श्री साईं स्नातकोत्तर महाविद्यालय में विगत 15 वर्षो से स्नातक और स्नातकोत्तर कक्षाओं को लाइफ साइन्स पढ़ा रही हैं। इसके साथ ही स्थानीय वासवी कालेज ऑफ म्यूजिक ऐंड डांस से भी उनका जुड़ाव है, जहाँ विभिन्न आयुवर्ग के विद्यार्थियों का मार्गदर्शन भी करती हैं। हरिणा जी को प्रारम्भिक संगीत शिक्षा अपनी माँ श्रीमती वाणी दुग्गराजू से मिली। आगे चल कर अमरावती, महाराष्ट्र के महिला महाविद्यालय की संगीत विभागाध्यक्ष श्रीमती कमला भोंडे से विधिवत संगीत सीखना शुरू किया। हरिणा जी के बाल्यावस्था के एक और संगीत गुरु एम.वी. प्रधान भी थे, जो एक कुशल तबला वादक भी थे। इनके अलावा हरिणा जी ने गुरु किरण घाटे और आर. डी. जी. कालेज, अकोला के संगीत विभागाध्यक्ष श्री नाथूलाल जायसवाल से भी संगीत सीखा। हरिणा जी ने मुम्बई के अखिल भारतीय गन्धर्व महाविद्यालय से संगीत अलंकार की शिक्षा प्राप्त की है। आज के इस विशेष अंक में हम आपको सुश्री डी. हरिणा माधवी की आवाज़ में राग नन्द में दो खयाल प्रस्तुत कर रहे हैं। विलम्बित खयाल एकताल में निबद्ध है, जिसके बोल हैं, ‘ढूँढ बन सइयाँ...’। द्रुत खयाल की बन्दिश तीनताल में निबद्ध है, जिसके बोल हैं, ‘धन धन भाग नन्द को...’। आप यह दोनों रचनाएँ सुनिए।

राग नन्द : विलम्बित और द्रुत खयाल : डी. हरिणा माधवी


दूसरी महाविजेता का गौरव प्राप्त किया है, पेंसिलवेनिया, अमेरिका की विजया राजकोटिया। संगीत की साधना में पूर्ण समर्पित विजया जी ने लखनऊ स्थित भातखण्डे संगीत महाविद्यालय (वर्तमान में विश्वविद्यालय) से संगीत विशारद की उपाधि प्राप्त की है। बचपन में ही उनकी प्रतिभा को पहचान कर उनके पिता, विख्यात रुद्रवीणा वादक और वीणा मन्दिर के प्राचार्य श्री पी.डी. शाह ने कई तंत्र और सुषिर वाद्यों के साथ-साथ कण्ठ संगीत की शिक्षा भी प्रदान की। श्री शाह की संगीत परम्परा को उनकी सबसे बड़ी सुपुत्री विजया जी ने आगे बढ़ाया। आगे चलकर विजया जी को अनेक संगीत गुरुओं से मार्गदर्शन मिला, जिनमें आगरा घराने के उस्ताद खादिम हुसेन खाँ की शिष्या सुश्री मिनी कापड़िया, पण्डित लक्ष्मण प्रसाद जयपुरवाले, सुश्री मीनाक्षी मुद्बिद्री और सुविख्यात गायिका श्रीमती शोभा गुर्टू प्रमुख नाम हैं। विजया जी संगीत साधना के साथ-साथ ‘क्रियायोग’ जैसी आध्यात्मिक साधना में भी संलग्न रहती हैं। उन्होने अपने गायन का प्रदर्शन मुम्बई, लन्दन, सैन फ्रांसिस्को, साउथ केरोलिना, न्यूजर्सी, और पेंसिलवानिया में किया है। सम्प्रति विजया जी पेंसिलवानिया के अपने स्वयं के संगीत विद्यालय में हर आयु के विद्यार्थियों को संगीत की शिक्षा प्रदान कर रही हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ पहेली की दूसरी महाविजेता के रूप में अब हम आपको विजया जी का गाया एक भजन सुनवाते है। यह भक्तिपद राग सम्पूर्ण मालकौंस के सुरों की चाशनी से पगा हुआ है। रूपक ताल में निबद्ध भक्तकवि सूरदास की इस रचना के बोल हैं, ‘अबके माधव मोहें उबार...’। लीजिए, सुनिए और विजया जी को बधाई दीजिए।

राग सम्पूर्ण मालकौंस : भजन : ‘अबके माधव मोहें उबार...’ : विजया राजकोटिया


संगीत पहेली के कुल 100 अंको में से 92 अंक अर्जित कर वर्ष 2015 की संगीत पहेली में प्रथम महाविजेता होने का सम्मान प्राप्त करने वाली जबलपुर, मध्यप्रदेश की श्रीमती क्षिति तिवारी की संगीत शिक्षा लखनऊ और कानपुर में सम्पन्न हुई। लखनऊ के भातखण्डे संगीत महाविद्यालय से गायन में प्रथमा से लेकर विशारद तक की परीक्षाएँ उत्तीर्ण की। बाद में इस संस्थान को विश्वविद्यालय का दर्जा प्राप्त हुआ, जहाँ से उन्होने संगीत निपुण और उसके बाद ठुमरी गायन मे तीन वर्षीय डिप्लोमा भी प्राप्त किया। इसके अलावा कानपुर के वरिष्ठ संगीतज्ञ पण्डित गंगाधर राव तेलंग जी के मार्गदर्शन में खैरागढ़, छत्तीसगढ़ के इन्दिरा संगीत कला विश्वविद्यालय की संगीत स्नातक और स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की। क्षिति जी के गुरुओं में डॉ. गंगाधर राव तेलंग के अलावा पण्डित सीताशरण सिंह, पण्डित गणेशप्रसाद मिश्र, डॉ. सुरेन्द्र शंकर अवस्थी, डॉ. विद्याधर व्यास और श्री विनीत पवइया प्रमुख हैं। क्षिति को स्नातक स्तर पर भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय से ग्वालियर घराने की गायकी के अध्ययन के लिए छात्रवृत्ति भी मिल चुकी है। कई वर्षों तक लखनऊ के महिला कालेज और जबलपुर के एक नेत्रहीन बच्चों के विद्यालय मे माध्यमिक स्तर के विद्यार्थियों को संगीत की शिक्षा देने के बाद वर्तमान में जबलपुर के ‘महाराष्ट्र संगीत महाविद्यालय’ में वह संगीत गायन की शिक्षिका के पद पर कार्यरत हैं। खयाल, ठुमरी और भजन गायन के अलावा उन्होने प्रोफेसर कमला श्रीवास्तव से गुरु-शिष्य परम्परा के अन्तर्गत लोक संगीत भी सीखा है, जिसे अब वह अपने विद्यार्थियों को बाँट रही हैं। क्षिति जी कथक नृत्य और नृत्य नाटिकाओं में गायन संगत की विशेषज्ञ हैं। सुप्रसिद्ध नृत्यांगना कुमकुम धर और नृत्यांगना विधि नागर के कई कार्यक्रमों में अपनी इस प्रतिभा का प्रदर्शन कर चुकी हैं। आज के इस विशेष अंक में श्रीमती क्षिति तिवारी राग तिलंग में बन्दिश की एक ठुमरी को अपना स्वर दे रही हैं। त्रिताल में बँधी इस ठुमरी के बोल हैं, ‘देखी देखी कान्हा झूठी तोरी बात...’। लीजिए, अब आप यह ठुमरी सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग तिलंग : ठुमरी : ‘देखी देखी कान्हा झूठी तोरी बात...’ : क्षिति तिवारी



संगीत पहेली  


‘स्वरगोष्ठी’ के 252वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक रागबद्ध फिल्म संगीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 260वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने के बाद जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की पहली श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत का यह अंश सुन कर बताइए कि आपको किस राग का आभास हो रहा है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप गीत की गायिका का नाम हमे बता सकते हैं?

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 16 जनवरी, 2016 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 254वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता  


‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 250 की संगीत पहेली में हमने आपको उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ द्वारा शहनाई पर प्रस्तुत राग भैरवी का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। इस पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग भैरवी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल तीनताल और तीसरे प्रश्न का उत्तर है- वादक उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ

सही उत्तर देने वाले प्रतिभागी हैं- जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, चेरीहिल (एन.जे.) से प्रफुल्ल पटेल और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। । पाँचो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात  


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर आज आप वर्ष 2015 के महाविजेताओं के अभिनन्दन समारोह के साक्षी बने। अगले अंक से हम ‘स्वरगोष्ठी’ पर एक नई श्रृंखला आरम्भ कर रहे हैं, जिसका शीर्षक होगा – ‘दोनों मध्यम स्वर वाले राग’। इस श्रृंखला के लिए आप अपने सुझाव और फरमाइश हमें शीघ्र भेज दें। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल अवश्य कीजिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  





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