शनिवार, 12 दिसंबर 2015

तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी - 08: आशा भोसले


तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी - 08
 
आशा भोसले 

यंत्रणा इतनी बढ़ गई कि दोनों बच्चों और गर्भ में पल रहे तीसरे सन्तान को लेकर आशा ने अपना ससुराल हमेशा के लिए छोड़ दिया


’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी दोस्तों को सुजॉय चटर्जी का सप्रेम नमस्कार। दोस्तों, किसी ने सच ही कहा है कि यह ज़िन्दगी एक पहेली है जिसे समझ पाना नामुमकिन है। कब किसकी ज़िन्दगी में क्या घट जाए कोई नहीं कह सकता। लेकिन कभी-कभी कुछ लोगों के जीवन में ऐसी दुर्घटना घट जाती है या कोई ऐसी विपदा आन पड़ती है कि एक पल के लिए ऐसा लगता है कि जैसे सब कुछ ख़त्म हो गया। पर निरन्तर चलते रहना ही जीवन-धर्म का निचोड़ है। और जिसने इस बात को समझ लिया, उसी ने ज़िन्दगी का सही अर्थ समझा, और उसी के लिए ज़िन्दगी ख़ुद कहती है कि 'तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी'। इसी शीर्षक के अन्तर्गत इस नई श्रृंखला में हम ज़िक्र करेंगे उन फ़नकारों का जिन्होंने ज़िन्दगी के क्रूर प्रहारों को झेलते हुए जीवन में सफलता प्राप्त किये हैं, और हर किसी के लिए मिसाल बन गए हैं। आज का यह अंक केन्द्रित है फ़िल्म जगत सुप्रसिद्ध पार्श्व गायिका आशा भोसले पर।
  

आशा भोसले एक ऐसा नाम है जो किसी परिचय का मोहताज नहीं। उनकी अपार सफलता और लोकप्रियता का आलम यह है कि आज अपने आठवें दशक में भी वो बच्चों, युवाओं और बड़ों, सभी में समान रूप से प्रिय हैं। हर दौर के श्रोताओं को अब तक वो अपनी आवाज़ और गीतों की ओर आकृष्ट कर रखी हैं, ऐसे मिसाल कम ही देखने को मिलते हैं। आज आशा भोसले की अपार सफलता को देख कर शायद लोग उनके शुरुआती जीवन और संघर्ष को अक्सर भूल जाते हैं। आज की पीढ़ी को तो शायद पता भी नहीं होगा कि आशा भोसले किन अंगारों पर चल कर आशा भोसले बनी हैं। आज वही दास्तान पेश है। आशा का जन्म 8 सितंबर 1933 को हुआ था, यानी कि वो बड़ी बहन लता से चार वर्ष छोटी हैं। घर पर अपने पिता (दीनानाथ मंगेशकर) से ही संगीत से आशा का परिचय हुआ। पर पिता-पुत्री का साथ बहुत दिनों तक नहीं चल सका। आशा केवल 8 वर्ष की थीं जब पिता ने इस संसार को अलविदा कह दिया। परिवार में अकेला कमाने वाले पिता के आकस्मिक चले जाने पर पाँच भाई-बहनों और माँ समेत छह लोगों के उस मंगेशकर परिवार की आर्थिक दुर्दशा हो गई। ऐसे में सबसे बड़ी सन्तान लता को कमर कस रोज़गार के क्षेत्र में उतरना पड़ा। ना चाहते हुए भी मेक-अप लगा कर वो फ़िल्मों में अभिनय करतीं, गीत गातीं, और इस तरह से परिवार के सदस्यों को दो वक़्त की रोटी नसीब होती रही। कुछ ही समय के पश्चात आशा ने भी अपनी बड़ी बहन की राह पर चलने लगी और वो भी अभिनय और गायन से थोड़ा बहुत कमाने लगीं। उनका गाया पहला गीत था 1943 की मराठी फ़िल्म ’माझा बाल’ का जिसके बोल थे "चला चला नव बाला..."। इसके बाद छोटे-मोटे रोल और गायन करते रहने के बाद 1948 में उन्हे अपनी पहली हिन्दी फ़िल्म ’चुनरिया’ में गीत गाने का अवसर मिला। यहाँ से फिर एक नई यात्रा उनकी शुरू हुई, पर अभी उनके और दुर्दिन आने ही वाले थे।


1949 के आते-आते बड़ी बहन लता स्थापित हो चुकी थीं ’महल’, ’लाहौर’, ’ज़िद्दी’, ’बरसात’ आदि फ़िल्मों में सुपरहिट गीत गा कर। अब वो ऐसी स्थिति में थीं कि अपना पर्सोनल सेक्रेटरी रख सकती थीं। लता ने गणपतराव भोसले नामक सज्जन को अपना पर्सोनल सेक्रेटरी बनाया। और यहीं पर एक गड़बड़ हो गई। बहन आशा और गणपतराव एक दूसरे से प्रेम करने लगे। जैसे ही लता को उनके प्रेम-संबंध का पता चला तो उन्हे अच्छा नहीं लगा। आशा के गणपतराव से विवाह करने के प्रस्ताव को मंगेशकर परिवार ने विरोध किया और विवाह की अनुमति नहीं दी। ऐसे में आशा घर छोड़ कर गणपतराव से विवाह कर लिया और ससुराल चली गईं। पति और नए परिवार के साथ नए जीवन की शुरुआत हुई। आशा जी बताती हैं कि विवाह के बाद 100 रुपये की अपनी पहली कमाई को दोनों ने फ़ूटपाथ पर लगे बटाटा वडा खा कर मनाया था। आशा ने काम करना बन्द नहीं किया। बोरीवली में उनका ससुराल था; सुबह-सुबह लोकल ट्रेन से काम पर जातीं और शाम को घर लौटतीं। दिन गुज़रते गए, पर आशा को केवल या तो छोटी बजट की फ़िल्मों में या फिर खलनायिका के चरित्र पर फ़िल्माये जाने वाले गीत गाने के ही अवसर मिलने लगे। कारण, बड़ी बहन लता की अलौकिक आवाज़ जो फ़िल्मी नायिका पर बिल्कुल फ़िट बैठती थी। ऐसे में किसी अन्य नई आवाज़ का टिक पाना संभव नहीं था। आशा एक हिट गीत के लिए तरसती रहीं। दिन, महीने, साल गुज़रने लगे, पर आशा को कोई बड़ी फ़िल्म नसीब नहीं हुई। उधर अब आशा दो बच्चों की माँ भी बन चुकी थीं। एक तरफ़ बड़ी गायिका बनने की चाह, दूसरी तरफ़ घर-परिवार-बच्चे, और जो सबसे ख़तरनाक बात थी वह यह कि अब आशा के ससुराल वाले उन्हें परेशान करने लगे थे। आशा पर ससुराल में ज़ुल्म होने लगी। धीरे-धीरे यंत्रणा इतनी बढ़ गई कि दोनों बच्चों और गर्भ में पल रहे तीसरे सन्तान को लेकर आशा ने अपना ससुराल हमेशा के लिए छोड़ दिया और अपनी माँ के पास वापस आ गईं। लेकिन रिश्तों की जो दीवार आशा और मंगेशकर परिवार के बीच खड़ी हो गई थी, वह कभी पूरी तरीक़े से ढह नहीं पायी। एक तरफ़ बड़ी बहन एक के बाद एक सुपरहिट गीत गाती चली जा रही थीं, और दूसरी तरह आशा एक के बाद एक फ़्लॉप फ़िल्मों में गीत गा कर अपना और अपने बच्चों का पेट पाल रही थीं। आशा का जो संघर्ष 1943 में शुरू हुआ था, वह संघर्ष पूरे 13 वर्षों तक चला। और फिर 1957 में उनकी नई सुबह हुई जब फ़िल्म ’तुमसा नहीं देखा’ और ’नया दौर’ में उनके गाये गीतों ने बेशुमार लोकप्रियता प्राप्त की। फिर इसके बाद आशा भोसले को ज़िन्दगी में कभी पीछे मुड़ कर देखने की आवश्यक्ता नहीं पड़ी। और बाक़ी इतिहास है! ज़िन्दगी ने आशा भोसले से शुरुआती 13 सालों में कठिन परीक्षा ली, और अन्त में उन्हे गले लगा कर कहा कि आशा, तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी!


आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमे अवश्य लिखिए। हमारा यह स्तम्भ प्रत्येक माह के दूसरे शनिवार को प्रकाशित होता है। यदि आपके पास भी इस प्रकार की किसी घटना की जानकारी हो तो हमें पर अपने पूरे परिचय के साथ cine.paheli@yahoo.com मेल कर दें। हम उसे आपके नाम के साथ प्रकाशित करने का प्रयास करेंगे। आप अपने सुझाव भी ऊपर दिये गए ई-मेल पर भेज सकते हैं। आज बस इतना ही। अगले शनिवार को फिर आपसे भेंट होगी। तब तक के लिए नमस्कार। 


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी  



मंगलवार, 8 दिसंबर 2015

असगर वजाहत की जब वह बुलाएगा

लोकप्रिय स्तम्भ "बोलती कहानियाँ" के अंतर्गत हम हर सप्ताह आपको सुनवाते रहे हैं नई, पुरानी, अनजान, प्रसिद्ध, मौलिक और अनूदित, यानि के हर प्रकार की कहानियाँ। पिछली बार आपने अनुराग शर्मा के स्वर में हिन्दी के प्रसिद्ध साहित्यकार हरिशंकर परसाई की लघुकथा "समझौता" का पाठ सुना था। आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं, असगर वजाहत की लघुकथा जब वह बुलाएगा, जिसे स्वर दिया है अनुराग शर्मा ने।

इस कहानी जब वह बुलाएगा का कुल प्रसारण समय 1 मिनट 47 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं। असगर वजाहत की निम्न कहानियाँ भी रेडियो प्लेबैक इंडिया पर सुनी जा सकती हैं:
यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।


रात के वक्त़ रूहें अपने बाल-बच्चों से मिलने आती हैं।
 ~ असगर वजाहत

हर सप्ताह यहीं पर सुनें एक नयी हिन्दी कहानी

"जन्नत के दरवाजे खुल जाएँगे। हूरें मिलेंगी।”
 (असगर वजाहत की लघुकथा "जब वह बुलाएगा" से एक अंश)


नीचे के प्लेयर से सुनें.


(प्लेयर पर एक बार क्लिक करें, कंट्रोल सक्रिय करें फ़िर 'प्ले' पर क्लिक करें।)
यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें:
जब वह बुलाएगा MP3

#Twenty Sixth Story, Jab Woh Bulayega; Asghar Wajahat; Hindi Audio Book/2015/26. Voice: Anurag Sharma

रविवार, 6 दिसंबर 2015

मोहनवीणा और विश्वमोहन भट्ट : SWARGOSHTHI – 247 : MOHAN VEENA & VISHWAMOHAN BHATT




स्वरगोष्ठी – 247 में आज

संगीत के शिखर पर – 8 : पण्डित विश्वमोहन भट्ट

मोहनवीणा के अन्वेषक और वादक पण्डित विश्वमोहन भट्ट



रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी सुरीली श्रृंखला – ‘संगीत के शिखर पर’ की आठवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-रसिकों का एक बार पुनः हार्दिक स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला में हम भारतीय संगीत की विभिन्न विधाओं में शिखर पर विराजमान व्यक्तित्व और उनके कृतित्व पर चर्चा कर रहे हैं। संगीत गायन और वादन की विविध लोकप्रिय शैलियों में किसी एक शीर्षस्थ कलासाधक का चुनाव कर हम उनके व्यक्तित्व का उल्लेख और उनकी कृतियों के कुछ उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं। आज श्रृंखला की आठवीं कड़ी में हम पश्चिम के लोकप्रिय तंत्रवाद्य हवाइयन गिटार या स्लाइड गिटार के परिवर्तित भारतीय रूप ‘मोहनवीणा’ के अन्वेषक और विश्वविख्यात वादक पण्डित विश्वमोहन भट्ट के व्यक्तित्व और कृतित्व की संक्षिप्त चर्चा कर रहे हैं। इसके साथ ही इस वाद्य के मूल उद्गम पर भी चर्चा करेंगे। आज हम आपको पण्डित विश्वमोहन भट्ट द्वारा मोहनवीणा पर बजाया राग हंसध्वनि और राग किरवानी की रचनाएँ सुनवाएँगे। 



भारतीय संगीत के कई वाद्ययंत्र ऐसे हैं, जिनका उद्गम वैदिककालीन माना जाता है। एक ऐसा ही तंत्रवाद्य है “मोहनवीणा”। आज के अंक में हम तंत्रवाद्य मोहनवीणा के अन्वेषक और वादक के व्यक्तित्व पर चर्चा कर रहे हैं। यह वाद्य विश्व-संगीत-जगत की लम्बी यात्रा कर आज पुनः भारतीय संगीत का हिस्सा बन चुका है। वर्तमान में “मोहनवीणा” नाम से हम जिस वाद्ययंत्र को पहचानते हैं, वह पश्चिम के 'हवाइयन गिटार' या 'स्लाइड गिटार' का संशोधित रूप है। इस वाद्य के प्रवर्तक हैं, सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ पण्डित विश्वमोहन भट्ट, जिन्होंने अपने इस अनूठे वाद्य से समूचे विश्व को सम्मोहित किया है। श्री भट्ट इस वाद्य के सर्जक ही नहीं, बल्कि उच्चकोटि के वादक भी हैं। सुप्रसिद्ध सितार वादक पण्डित रविशंकर के शिष्य विश्वमोहन भट्ट का परिवार मुग़ल सम्राट अक़बर के दरबारी संगीतज्ञ तानसेन और उनके गुरु स्वामी हरिदास से सम्बन्धित है। प्रारम्भ में उन्होंने सितार वादन की शिक्षा प्राप्त की, किन्तु 1966 की एक रोचक घटना ने उन्हें एक नये वाद्य के सृजन की ओर प्रेरित कर दिया। एक बातचीत में श्री भट्ट ने बताया था – ‘1966 के आसपास एक जर्मन हिप्पी लड़की अपना गिटार लेकर मेरे पास आई और मुझसे आग्रह करने लगी कि मैं उसे उसके गिटार पर ही सितार बजाना सिखा दूँ। उस लड़की के इस आग्रह पर मैं गिटार को इस योग्य बनाने में जुट गया कि इसमें सितार के गुण आ जाएँ।‘ श्री भट्ट के वर्तमान 'मोहनवीणा' में केवल सितार और गिटार के ही नहीं बल्कि प्राचीन वैदिककालीन तंत्रवाद्य विचित्रवीणा और सरोद के गुण भी हैं। मोहनवीणा का मूल उद्‍गम 'विचित्रवीणा' ही है। श्री भट्ट मोहनवीणा पर सभी भारतीय संगीत शैलियों – ध्रुपद, धमार, ठुमरी आदि का वादन करने में समर्थ हैं। आइए, पहले पण्डित विश्वमोहन भट्ट से मोहनवीणा पर राग 'हंसध्वनि' की एक मोहक रचना सुनते हैं। यह रचना तीनताल में निबद्ध है। तबला-संगति पण्डित रामकुमार मिश्र ने की है।


राग हंसध्वनि : मोहन वीणा पर तीनताल में निबद्ध रचना : विश्वमोहन भट्ट




प्राचीन काल से प्रचलित वाद्य 'विचित्रवीणा' के स्वरूप में समय चक्र के अनुसार बदलाव आते रहे। पाश्चात्य संगीत का हवाइयन गिटार वैदिककालीन विचित्रवीणा का ही सरलीकृत रूप है। वीणा के तुम्बे से ध्वनि में जो गमक उत्पन्न होती है, पाश्चात्य संगीत में उसकी बहुत अधिक उपयोगिता नहीं होती। यूरोप और अमेरिका के संगीत विद्वानों ने अपनी संगीत पद्यति के अनुकूल इस वाद्य में परिवर्तन किया। विचित्रवीणा में स्वर के तारों पर काँच का एक बट्टा फेर (Slide) कर स्वर का परिवर्तन किया जाता है। तारों पर एक ही आघात से श्रुतियों के साथ स्वर परिवर्तन होने से यह वाद्य गायकी अंग में वादन के लिए उपयोगी होता है। प्राचीन ग्रन्थों में गायन के साथ वीणा की संगति का उल्लेख मिलता है। हवाइयन गिटार बन जाने के बाद भी यह गुण बरकरार रहा, इसीलिए पश्चिमी संगीत के गायक कलाकारों का भी यह प्रिय वाद्य रहा। पं. विश्वमोहन भट्ट ने गिटार के इस स्वरुप में परिवर्तन कर इसे भारतीय संगीत वादन के अनुकूल बनाया। उन्होंने एक सामान्य गिटार में 6 तारों के स्थान पर 19 तारों का प्रयोग किया। यह अतिरिक्त तार 'तरब' और 'चिकारी' के हैं जिनका उपयोग स्वरों में अनुगूँज के लिए किया जाता है। श्री भट्ट ने इसकी बनावट में भी आंशिक परिवर्तन किया है। मोहनवीणा के वर्तमान स्वरूप में भारतीय संगीत के रागों को 'गायकी' और 'तंत्रकारी' दोनों अंगों में बजाया जा सकता है। अपने आकार-प्रकार और वादन शैली के बल पर यह वाद्य पूरे विश्व में चर्चित हो चुका है। अब हम आपको मोहनवीणा पर राग किरवानी का रसास्वादन कराते हैं। राग हंसध्वनि की भाँति राग किरवानी भी मूलतः दक्षिण भारतीय राग है, जो उत्तर भारतीय संगीत में समान रूप से प्रचलित है। राग किरवानी की इस रचना में तबला संगति सुखाविन्दर सिंह नामधारी ने की है। आप पण्डित विश्वमोहन भट्ट का बजाया राग किरवानी सुनिए और मुझे इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग किरवानी : कहरवा ताल में रचना : विश्वमोहन भट्ट




संगीत पहेली


 ‘स्वरगोष्ठी’ के 247वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक स्वर-वाद्य पर संगीत रचना का अंश सुनवा रहे हैं। इस संगीतांश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली क्रमांक 250 के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की पाँचवीं श्रृंखला (सेगमेंट) के विजेताओं के साथ ही वार्षिक विजेताओं की घोषणा ‘स्वरगोष्ठी’ के 252वें अंक में की जाएगी।



1 – वाद्ययंत्र पर कौन सा राग बजाया जा रहा है? राग का नाम बताइए।

2 – प्रस्तुत रचना किस ताल में निबद्ध है? ताल का नाम बताइए।

3 – यह किस वाद्ययंत्र की आवाज़ है? वाद्य का नाम बताइए।

आप इन तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 12 दिसम्बर, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 249वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत किये गए गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस मंच पर स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।

पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ के 245वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको रुद्रवीणा के सुविख्यात वादक उस्ताद असद अली खाँ द्वारा प्रस्तुत वादन का एक अंश सुनवाया था और आपसे तीन में से किन्हीं दो प्रश्न का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – आसावरी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – चौताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- वाद्य – रुद्रवीणा

इस बार की पहेली के प्रश्नों का सही उत्तर देने वाले प्रतिभागी हैं, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात



मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी लघु श्रृंखला ‘संगीत के शिखर पर’ के आज के अंक में हमने आपको पाश्चात्य वाद्य हवाइयन गिटार के भारतीय रूपान्तरण, मोहनवीणा पर दो दक्षिण भारतीय राग सुनवाया। अगले अंक में एक अन्य विधा के शिखर पर प्रतिष्ठित व्यक्तित्व पर चर्चा करेंगे। इस श्रृंखला को हमारे अनेक पाठकों ने पसन्द किया है। हम उन सबके प्रति आभार व्यक्त करते हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के विभिन्न अंकों के बारे में हमें पाठकों, श्रोताओं और पहेली के प्रतिभागियों की अनेक प्रतिक्रियाएँ और सुझाव मिलते हैं। प्राप्त सुझाव और फरमार्इशों के अनुसार ही हम अपनी आगामी प्रस्तुतियों का निर्धारण करते हैं। आप भी यदि कोई सुझाव देना चाहते हैं तो आपका स्वागत है। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के नये अंक के साथ हम उपस्थित होंगे। हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  




 


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