मंगलवार, 10 नवंबर 2015

सलिल वर्मा की लघुकथा "बेटी पढ़ाओ"

लोकप्रिय स्तम्भ "बोलती कहानियाँ" के अंतर्गत हम हर सप्ताह आपको सुनवाते रहे हैं नई, पुरानी, अनजान, प्रसिद्ध, मौलिक और अनूदित, यानि के हर प्रकार की कहानियाँ। पिछली बार आपने अनुराग शर्मा के स्वर में काजल कुमार की लघुकथा "आढ़तिया" का पाठ सुना था।

आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं सलिल वर्मा के व्यक्तिगत अनुभव पर आधारित लघुकथा बेटी पढ़ाओ, जिसे स्वर दिया है अनुराग शर्मा ने।

इस कहानी बेटी पढ़ाओ का कुल प्रसारण समय 1 मिनट 52 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।

ज़मीन से जुड़े कवि, कथाकार और व्यंग्यकार सलिल वर्मा एक राष्ट्रीयकृत बैंक में उच्चाधिकारी हैं। वे आजकल भावनगर, गुजरात में रहते हैं। आप उनसे उनके हिन्दी ब्लॉग "चला बिहारी ब्लॉगर बनने" पर मिल सकते हैं।

हर सप्ताह यहीं पर सुनें एक नयी हिन्दी कहानी

"मैंने रुक कर ग़ौर से देखा, तो एक कमाल का नज़ारा दिखाई दिया।”
 (सलिल वर्मा की लघुकथा "बेटी पढ़ाओ" से एक अंश)


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बेटी पढ़ाओ MP3

#Twenty Third Story, Beti Padhao; Salil Varma; Hindi Audio Book/2015/23. Voice: Anurag Sharma

रविवार, 8 नवंबर 2015

उस्ताद अब्दुल करीम खाँ की गायकी : SWARGOSHTHI – 243 : USTAD ABDUL KARIM KHAN








स्वरगोष्ठी – 243 में आज

संगीत के शिखर पर – 4 : उस्ताद अब्दुल करीम खाँ

खाँ साहब सम्पूर्ण भारतीय संगीत के प्रतिनिधि संगीतज्ञ थे





रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी सुरीली श्रृंखला – ‘संगीत के शिखर पर’ की चौथी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-रसिकों का एक बार पुनः स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला में हम भारतीय संगीत की विभिन्न विधाओं में शिखर पर विराजमान व्यक्तित्व और उनके कृतित्व पर चर्चा कर रहे हैं। संगीत गायन और वादन की विविध लोकप्रिय शैलियों में किसी एक शीर्षस्थ कलासाधक का चुनाव कर हम उनके व्यक्तित्व का उल्लेख और उनकी कृतियों के उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं। आज श्रृंखला की चौथी कड़ी में हम उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम दशक और बीसवीं शताब्दी के आरम्भिक दशकों में अत्यन्त लोकप्रिय संगीतज्ञ उस्ताद अब्दुल करीम खाँ की गायकी पर चर्चा करेंगे। आज के अंक में हम खाँ साहब का गाया राग बसन्त में दो खयाल और राग झिंझोटी तथा राग भैरवी की दो ठुमरियाँ प्रस्तुत करेंगे।


ज हम एक ऐसे संगीत-साधक के व्यक्तित्व और कृतित्व पर चर्चा करेंगे जिसने उत्तर और दक्षिण भारतीय संगीत के बीच एक सेतु बनाने का महान सफल किया था। किराना घराने के इस महान कलासाधक का नाम है, उस्ताद अब्दुल करीम खाँ। इस महान संगीतज्ञ का जन्म उत्तर प्रदेश के वर्तमान मुजफ्फरनगर जिले में स्थित कैराना नामक कस्बे में वर्ष 1884 में हुआ था। आज जिसे हम संगीत के किराना घराने के नाम से जानते हैं वह इसी कस्बे के नाम पर पड़ा था। एक संगीतकार परिवार में जन्में अब्दुल करीम खाँ के पिता का नाम काले खाँ था। खाँ साहब के तीन भाई क्रमशः अब्दुल लतीफ़ खाँ, अब्दुल मजीद खाँ और अब्दुल हक़ खाँ थे। सुप्रसिद्ध गायिका रोशन आरा बेग़म उनके सबसे छोटे भाई अब्दुल हक़ की सुपुत्री थीं। स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद रोशन आरा बेग़म का गायन लखनऊ रेडियो के माध्यम से अत्यन्त लोकप्रिय था। जन्म से ही सुरीले कण्ठ के धनी अब्दुल करीम खाँ की सीखने की रफ्तार इतनी तेज थी कि मात्र छः वर्ष की आयु में ही संगीत-सभाओं में गाने लगे थे। उनकी प्रतिभा इतनी विलक्षण थी कि पन्द्रह वर्ष की आयु में बड़ौदा दरबार में गायक के रूप में नियुक्त हो गए थे। वहाँ वे 1899 से 1902 तक रहे और उसके बाद मिरज चले गए। अब आप उस्ताद अब्दुल करीम खाँ के स्वरों में राग बसन्त में निबद्ध दो खयाल सुनिए। विलम्बित एकताल के खयाल के बोल हैं- ‘अब मैंने देखे...’ तथा द्रुत तीनताल की बन्दिश के बोल हैं- ‘फगुआ ब्रज देखन को चलो री...’


राग – बसन्त : खयाल – ‘अब मैंने देखे...’ और ‘फगुआ ब्रज देखन...’ : उस्ताद अब्दुल करीम खाँ





खाँ साहब के स्वरों में जैसी मधुरता, जैसा विस्तार और जैसी शुद्धता थी वैसी अन्य किसी गायक को नसीब नहीं हुई। वे विलम्बित खयाल में लयकारी और बोल तान की अपेक्षा आलाप पर अधिक ध्यान रखते थे। उनके गायन में वीणा की मींड़, सारंगी के कण और गमक का मधुर स्पर्श होता था। रचना के स्थायी और एक अन्तरे में ही खयाल गायन के सभी गुणो का प्रदर्शन कर देते थे। अपने गायन की प्रस्तुति के समय वे अपने तानपूरे में पंचम के स्थान पर निषाद स्वर में मिला कर गायन करते थे। वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। उत्कृष्ट खयाल गायकी के साथ ठुमरी, दादरा, भजन और मराठी नाट्य संगीत-गायन में भी दक्ष थे। वर्ष 1925-26 में उनकी गायी राग झिंझोटी की ठुमरी- ‘पिया बिन नाहीं आवत चैन....’ अत्यन्त लोकप्रिय हुई थी। लगभग दस वर्षों के बाद 1936 में पी.सी. (प्रथमेश चन्द्र) बरुआ के निर्देशन में शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास, ‘देवदास’ पर इसी नाम से एक फिल्म का निर्माण हुआ था। फिल्म के संगीत निर्देशक तिमिर वरन ने उस्ताद अब्दुल करीम खाँ की गायी इसी ठुमरी को फिल्म में शामिल किया था, जिसे कुन्दनलाल सहगल ने स्वर दिया था। सहगल के स्वरों में इस ठुमरी को सुन कर खाँ साहब बड़े प्रसन्न हुए थे और उन्हें बधाई भी दी थी। आइए, आज हम आपको खाँ साहब के स्वरों में वही लोकप्रिय ठुमरी सुनवाते हैं।


ठुमरी राग झिंझोटी : ‘पिया बिन नाहीं आवत चैन...’ : उस्ताद अब्दुल करीम खाँ




उस्ताद अब्दुल करीम खाँ जैसे संगीतज्ञ सदियों में जन्म लेते हैं। अनेक प्राचीन संगीतज्ञों के बारे कहा जाता है कि उनके संगीत से पशु-पक्षी खिंचे चले आते थे। खाँ साहब के साथ भी ऐसी ही एक सत्य घटना जुड़ी हुई है। उनका एक कुत्ता था, जो अपने स्वामी, खाँ साहब के स्वरों से इतना सुपरिचित हो गया था कि उनकी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष आवाज़ सुन कर खिंचा चला आता था। इस तथ्य से प्रभावित होकर लन्दन की ग्रामोफोन कम्पनी ने अपना नामकरण और प्रतीक चिह्न, अपने स्वामी के स्वरों के प्रेमी उस कुत्ते को ही बनाया। यह माना जाता है कि हिज मास्टर्स वायस (HMV) के ग्रामोफोन रिकार्ड पर चित्रित कुत्ता उस्ताद अब्दुल करीम खाँ का ही है। आइए, अब चलते-चलते उस्ताद अब्दुल करीम खाँ के स्वरों में प्रस्तुत है, अत्यन्त लोकप्रिय, भैरवी की ठुमरी। आप यह रसपूर्ण ठुमरी सुनिए और मुझे इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


ठुमरी राग भैरवी : ‘जमुना के तीर...’ : उस्ताद अब्दुल करीम खाँ






संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 243वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक वाद्य संगीत रचना का अंश सुनवा रहे हैं। इस संगीतांश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली क्रमांक 250 के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की पाँचवीं श्रृंखला (सेगमेंट) के विजेताओं के साथ ही वार्षिक विजेताओं की घोषणा भी की जाएगी।


1 – वाद्ययंत्र पर कौन सा राग बजाया जा रहा है? राग का नाम बताइए।

2 – प्रस्तुत रचना किस ताल में निबद्ध है? ताल का नाम बताइए।

3 – यह किस वाद्ययंत्र की आवाज़ है? वाद्य का नाम बताइए।

आप इन तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 14 अक्टूबर, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 245वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत किये गए गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस मंच पर स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।



पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ के 241वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको सुविख्यात गजल गायक जगजीत सिंह की आवाज़ में द्रुत खयाल की एक रचना का अंश सुनवाया था और आपसे तीन में से किसी दो प्रश्न का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – दरबारी कान्हड़ा, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – द्रुत एकताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायक – जगजीत सिंह

इस बार की पहेली के प्रश्नों का सही उत्तर देने वाले प्रतिभागी हैं, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और जबलपुर से क्षिति तिवारी। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।



पिछली श्रृंखला के विजेता 


‘स्वरगोष्ठी’ की चौथी श्रृंखला (पहेली क्रमांक 231 से 241 तक) के प्रतिभागियों के प्राप्तांकों की गणना के अनुसार निम्नलिखित प्रतिभागियों ने पहले तीन स्थानो पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है। वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया और जबलपुर से क्षिति तिवारी ने 20-20 अंक अर्जित कर श्रृंखला में प्रथम स्थान प्राप्त किया है। दूसरे स्थान पर 16 अंक के साथ हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी हैं और पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया ने 10 अंक अर्जित कर तीसरा स्थान प्राप्त किया है। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।



अपनी बात 


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी लघु श्रृंखला ‘संगीत के शिखर पर’ के आज के अंक में हमने आपसे खयाल, ठुमरी, दादरा और नाट्य संगीत गायकी के शिखर पर प्रतिष्ठित उस्ताद अब्दुल करीम खाँ के व्यक्तित्व और कृतित्व पर संक्षिप्त चर्चा की है। अगले अंक में एक अन्य विधा के शिखर पर प्रतिष्ठित व्यक्तित्व पर चर्चा करेंगे। इस श्रृंखला को हमारे अनेक पाठकों ने पसन्द किया है। हम उन सबके प्रति आभार व्यक्त करते हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के विभिन्न अंकों के बारे में हमें पाठकों, श्रोताओं और पहेली के प्रतिभागियों की अनेक प्रतिक्रियाएँ और सुझाव मिलते हैं। प्राप्त सुझाव और फरमार्इशों के अनुसार ही हम अपनी आगामी प्रस्तुतियों का निर्धारण करते हैं। आप भी यदि कोई सुझाव देना चाहते हैं तो आपका स्वागत है। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के नये अंक के साथ हम उपस्थित होंगे। हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।



प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 





शनिवार, 7 नवंबर 2015

"एक ही ख़्वाब कई बार देखा है मैंने..." - जानिए गुलज़ार और पंचम के नोक-झोक की बातें इस गीत के बनने के दौरान


एक गीत सौ कहानियाँ - 69
 

'एक ही ख़्वाब कई बार देखा है मैंने...' 




रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 69-वीं कड़ी में आज जानिए 1977 की फ़िल्म ’किनारा’ के गीत "एक ही ख़्वाब कई बार देखा है मैंने..." के बारे में जिसे भूपेन्द्र और हेमा मालिनी ने गाया था। बोल गुलज़ार के और संगीत राहुल देव बर्मन का।


गुलज़ार उन गीतकारों में से हैं जो अपने गीतों का फ़िल्म की कहानी का हिस्सा बनाते हैं। दूसरे शब्दों में, उनके गीत फ़िल्म की कहानी को आगे बढ़ाते हैं। आम तौर पर फ़िल्मी गीतों को आइटम नम्बर्स के तौर पर फ़िल्मों में डाला जाता है। कहानी गीत के लिए रुक जाती है, और गीत समाप्त पर फिर से चल पड़ती है और अगले गीत पे जाकर दोबारा रुक जाती है। पर गुलज़ार जैसे गीतकार हमेशा लीक से अलग रहे हैं। इस तरह के कहानी को आगे बढ़ाने वाले गीतों में एक गीत है फ़िल्म ’किनारा’ का, "एक ही ख़्वाब कई बार देखा है मैंने..."। हालाँकि यह गीत कोई ट्रेन्ड-सेटर गीत नहीं सिद्ध हुआ, पर इस गीत की ख़ूब सराहना ज़रूर हुई थी। गुलज़ार के शब्दों में यह गीत एक गीत नहीं था, बल्कि एक दृश्य (सीन) था जिसे संगीत की दृष्टि से फ़िल्माया गया था। इस गीत में "टिकू की बच्ची, will you shut up?" जैसे बोल हैं। जब गुलज़ार इस गीत को पंचम के पास ले गए तो पंचम की पहली प्रतिक्रिया थी "क्या है यह... गाना है या सीन है?" गुलज़ार का जवाब था, "यह सीन है, पर इसे गाना है।" यह सुनने के बाद पंचम अपना हाथ अपने माथे पे मारते हुए कहा, "कोई काम सीधा नहीं करता है"। काफ़ी देर तक बड़बड़ाने के बाद पंचम पूरा पढ़ने के लिए तैयार हुए। पर दूसरी ही पंक्ति पे जा कर उनके माथे का शिकन गहराया क्योंकि पंक्ति थी "तूने साड़ी में उड़स ली हैं मेरी चाबियाँ घर की"। पंचम हारमोनियम को पीछे धकेलते हुए फिर से शुरू हो गए, "यह कोई गीत है? चाबियाँ कोई पोएट्री है?" मुखड़े की धुन को गुनगुनाते हुए हर बार पंचम "चाबियाँ" पे रुक जाया करते, थोड़ा बड़बड़ाते और गुलज़ार से इस शब्द को बदलने के लिए कहते। पर गुलज़ार भी अपने निर्णय पे अटल थे। पंचम के लाख चिल्लाने पर भी गुलज़ार इस शब्द को हटाने के लिए राज़ी नहीं हुए। आलम यह हुआ कि इसके बाद एक लम्बे समय तक पंचम गुलज़ार को ’चाबियाँ’ कह कर बुलाया करते थे। जब भी गुलज़ार म्युज़िक रूम में घुसते, पंचम कह उठते, "लो चाबियाँ आ गईं"। और इसके बाद जब भी गुलज़ार कोई इस तरह का शब्द अपने गीतों में इस्तेमाल करते, पंचम उनके पीछे पड़ जाते।



"एक ही ख़्वाब..." भूपेन्द्र और हेमा मालिनी ने गाया था। हेमा मालिनी ने इस गीत को बहुत ही अच्छी और सुरीली तरीके से निभाया जिससे यह हुआ कि भूपेन्द्र को थोड़ी परेशानी होने लगी। गुलज़ार साहब बताते हैं कि एक बार तो भूपेन्द्र अपने आप को रोक नहीं सके और बोल ही पड़े कि "She's too good, yaar!" ऐसा ही हुआ था मन्ना डे और मीना कुमारी के बीच फ़िल्म ’पिंजरे के पंछी’ फ़िल्म के गीत में। मन्ना दा मीना जी से तो कुछ नहीं बोले, पर गुलज़ार और साउन्ड्र रेकॉर्डिस्ट के पास जाकर शिकायत करने लगे कि "यार उनके सामने खड़े होकर गाना बहुत मुश्किल है। मैं उनको देखूँ, या उनसे बात करूँ, या गाना गाऊँ?" ख़ैर, वापस आते हैं ’एक ही ख़्वाब..." पर। गाना रेकॉर्ड होने के बाद पंचम को लगा कि गाने में कुछ कमी सी है, थोड़ा डल लग रहा है। इसलिए उन्होंने भूपेन्द्र को हेडफ़ोन दिया और उनसे अपने गीटार को अनायास बजाते रहने को कहा। सब को हैरान करते हुए भूपेन्द्र ने एक ही टेक में यह काम कर डाला। भूपेन्द्र एक और टेक देना चाहते थे पर पंचम को लगा कि पहला टेक ही उत्तम है। अन्तिम निर्णय हमेशा पंचम का ही होता था। हर किसी को पता था कि उन्हें अपना काम अच्छी तरह से पता है और इस पर उनसे कोई सवाल नहीं कर सकता। इस गीत से पहले हेमा मालिनी ने 1974 की फ़िल्म ’हाथ की सफ़ाई’ में किशोर कुमार के साथ "पीने वालों को पीने का बहाना चाहिए..." गीत गा चुकी थीं। इसलिए इस गीत में उनकी आवाज़ को लेने का निर्णय लेने में कोई परेशानी नहीं हुई। इन दो गीतों के अलावा एक तीसरा गीत भी है जिसमें हेमा मालिनी की आवाज़ सुनाई दी है, वह है फ़िल्म ’शोले’ का "कोई हसीना जब रूठ जाती है तो...", जिसमें उनकी गाती हुई आवाज़ तो नहीं पर गाली देती हुई आवाज़ ("चल हट साले") सुनाई दी है।


अब आते हैं गीत के फ़िल्मांकन पर। इस गीत का एक फ़्लैशबैक गीत के रूप में प्रयोग में लाया जाने वाला था जिसके लिए एक स्टार कलाकार की तलाश चल रही थी। गुलज़ार हेमा मालिनी से इस रोल के लिए धर्मेद्र से बात करने के लिए कहने से थोड़ा हिचहिचा रहे थे। हालाँकि हेमा और धर्मेन्द्र के प्यार की ख़ुशबू उन दिनों हवाओँ में सुगन्ध फैला रही थी, पर औपचारिक रूप से दोनों ने इसे स्वीकारा नहीं था और एक-दूसरे को बस "अच्छा दोस्त" कहते थे। पर जब वहाँ इस रोल के लिए अलग-अलग नायकों के नाम लिए जा रहे थे तब गुलज़ार को चौंकाते हुए हेमा मालिनी ने शर्माते हुए उनसे पूछा, "मेरा दोस्त क्यों नहीं इस रोल को निभा सकता?" हेमा मालिनी ने अपनी ज़बान से धर्मेन्द्र का नाम नहीं लिया पर उनके पूरे चेहरे पर सिर्फ़ उन्हीं का नाम लिखा हुआ था। इसके बाद गुलज़ार ने धर्मेन्द्र को फ़ोन किया और उसी फ़ोन-कॉल में धर्मेन्द्र ने यह रोल अदा करने के लिए हामी भर दिया। धर्मेन्द्र को गुलज़ार की फ़िल्में अच्छी लगती थी और वो उनके साथ आगे भी काम करना चाहते थे, तभी एक दिन वो गुलज़ार से कहने लगे कि "क्या गेस्ट रोल ही करवाओगे मुझसे?" गुलज़ार ने जब ’देवदास’ बनाने का निर्णय लिया तो देवदास के रूप में धर्मेन्द्र का ही विचार उनके मन में आया। यह किरदार धर्मेन्द्र के करीयर का सबसे महत्वपूर्ण किरदार साबित हो सकता था, पर दुर्भाग्यवश दो शेड्युल के बाद इस फ़िल्म का निर्माण बन्द हो गया। फिर इसके बाद गुलज़ार और धर्मेन्द्र कभी साथ में काम नहीं कर सके और दोनों की एक दूसरे के साथ काम करने की ख़्वाहिश अधूरी ही रह गई, बस एक ही ख़्वाब कई बार देखा है मैंने...। लीजिए अब आप फिल्म 'किनारा' का यही गीत सुनिए। 


फिल्म - किनारा : 'एक ही ख्वाब कई बार देखा है मैंने...' : भूपेन्द्र और हेमा मालिनी : संगीत - राहुलदेव बर्मन



अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें soojoi_india@yahoo.co.in के पते पर। 


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 




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