शनिवार, 4 अप्रैल 2015

पलट, तेरा ध्यान किधर है


एक गीत सौ कहानियाँ - 56
 

पलट, तेरा ध्यान किधर है...’




'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़ी दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 56वीं कड़ी में आज जानिये 1943 की फ़िल्म 'संजोग' के गीत "पलट तेरा ध्यान किधर है..." के बारे में, जिसे चार्ली ने गाया था। 


'पलट तेरा ध्यान किधर है!' इस जुमले को देख कर हमारे नौजवान पाठक शायद यह समझ रहे होंगे कि आज हम डेविड धवन की हाल की फ़िल्म 'मैं तेरा हीरो' के अरिजीत सिंह के गाये गीत "पलट, तेरा ध्यान किधर है, ये तेरा हीरो इधर है" की चर्चा करने जा रहे हैं; पर हमारे उम्रदराज पाठक ज़रूर समझ गये होंगे कि गुज़रे ज़माने के किस हास्य अभिनेता-गायक की चर्चा आज हो रही है। भारतीय सिनेमा के प्रथम सुपरस्टार अगर कुन्दनलाल सहगल थे तो प्रथम स्टार कॉमेडियन माना गया है चार्ली को। नूर मोहम्मद के नाम से उन्होंने जन्म तो लिया पर चार्ली चैपलिन के दीवाने थे और इसलिए अभिनेता बनने के बाद अपने नाम के साथ चार्ली जोड़ लिया और बन गये नूर मोहम्मद 'चार्ली'। और मज़े की बात यह है कि आगे चलकर उनका नाम केवल "चार्ली" बन कर रह गया। 30 और 40 के दशकों में चार्ली ने ख़ूब नाम कमाया और कई बार तो फ़िल्म के नायक से ज़्यादा उनकी फ़ीस हुआ करती थी। और कई फ़िल्में उन्हीं को ध्यान में रख कर बनायी गई। हास्य अभिनेता होते हुए भी वो कई फ़िल्मों के नायक बने और कई गीत भी गाये। ऐसा ही एक गीत था "पलट, तेरा ध्यान किधर है भाई...", जिसे अरशद गुजराती ने लिखा था और नौशाद साहब ने स्वरबद्ध किया था 1943 की फ़िल्म 'संजोग' के लिए, जो नौशाद की शुरुआती फ़िल्मों में से एक थी। इस गीत को सुन कर आश्चर्य होता है कि हमेशा शास्त्रीय संगीत को आधार बना कर गीत रचने वाले नौशाद साहब ने ही इस गीत की रचना की थी। वरिष्ठ ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड कलेक्टर वी. एस. दत्ता ने 'विविध भारती' को दिये एक साक्षात्कार में कहा था - "एक मैं आपको दिलचस्प बात बताता हूँ। नौशाद साहब के बारे में कहा जाता है कि वो क्लासिकल म्युज़िक दिया करते थे, जो बिल्कुल सही बात है। मगर नौशाद साहब ने आपके स्टेशन पर जो कार्यक्रम किया था, फ़िल्म 'शारदा' (1942) के बाद वो सीधे 'बैजु बावरा' (1952-53) पर आ गये थे, उन्होंने बीच का पोर्शन बिल्कुल गोल कर दिया था। अब मैं आप से कहना चाहूंगा कि उस बीच के पोर्शन में उन्होंने ऐसे गाने बनाये जो बहुत सस्ते थे। एक मेरे पास है, जो आप चाहें तो लेकर श्रोताओं को सुना सकते हैं। एक चार्ली होता था कॉमेडियन, तो उन्होंने चार्ली से यह गाना गवाया था, "अरे पलट तेरा ध्यान किधर है भाई...", और यह फ़िल्म शायद 'संजोग' थी।" नौशाद के शुरुआती दौर के सस्ते गीतों की बात करें तो कुछ और गीत जो याद आते हैं, वो हैं "हाँ हाँ तू मेरा चेला..." (प्रेम नगर, 1940), "सासूजी सासूजी मेरे सैयाँ बुलाये रे..." (माला, 1941), "माइ डियर आइ लव यू..." (जीवन, 1944), "बूढ़ा-बूढ़ा पुरानी-पुरानी ढीली-ढीली कमर की कमानी..." (ऐलान, 1947) आदि।

'पलट तेरा ध्यान किधर है', यह जुमला काफ़ी पुराना है और इसकी उत्पत्ति कहाँ से हुई थी यह बताना मुश्किल है। किसी का ध्यान आकर्षित करने के लिए प्रयोग होने वाला यह जुमला फ़िल्मी गीतों में भी कई बार थोड़े फेर-बदल के साथ सुनाई देता रहा है। चार्ली के गाये फ़िल्म 'संजोग' के इस गीत के अलावा 1957 की फ़िल्म 'नाग पद्मिनी' में गीतकार प्रेम धवन का लिखा और सन्मुख बाबू का स्वरबद्ध किया सुधा मल्होत्रा और एस. बलबीर का गाया गीत "पलट के ज़रा देख तेरा ध्यान किधर है..." की तरफ़ लोगों का ध्यान नहीं गया क्योंकि यह फ़िल्म कम बजट की फ़िल्म थी और चली भी नहीं। उसके बाद 1960 की हास्य फ़िल्म 'बेवकूफ़' में आशा भोसले का गाया एक हास्य गीत था "देख इधर देख तेरा ध्यान कहाँ है..."। मजरूह के लिखे और सचिन देव बर्मन के संगीत से सजे इस गीत की ख़ास बात यह है कि यह गीत आइ. एस. जोहर पर फ़िल्माया गया है जो एक विधवा औरत के रूप में सज कर यह गीत गा रहे हैं तथा मुकरी और उल्हास उनको रिझाने की कोशिशें कर रहे हैं। इस गीत में दो पुरुष स्वर सुनाई देते हैं पर ये आवाज़ें किनकी हैं इसमें थोड़ा संशय है। एक आवाज़ तो मन्ना डे की लगती है पर दूसरी आवाज़ का पता नहीं चल पाया। आशा भोसले ने इस फिल्म के कई गीत गाये हैं। 'बेवकूफ़' के बाद 1970 की फ़िल्म 'आन मिलो सजना' का वह गीत तो सभी को याद ही होगा, "पलट मेरी जान, तेरे कुर्बान, ओ तेरा ध्यान किधर है...", जिसमें आशा पारेख राजेश खन्ना को छेड़ रही हैं। इस जुमले के तमाम गीतों में शायद यही गीत सबसे ज़्यादा लोकप्रिय रहा है। साल 1979 में आशा भोसने ने फ़िल्म 'सरकारी मेहमान' में फिर एक बार गाया "ऐ सरकारी मेहमान, पलट किधर है तेरा ध्यान..."। इसे रवीन्द्र जैन ने लिखा व स्वरबद्ध किया था। इस फ़िल्म के अन्य दो गीतों ("बम्बई शाम के बाद" और "पर्चा मोहब्बत का") की तरह यह गीत उतना लोकप्रिय नहीं हुआ था।

1981 की अमिताभ बच्चन अभिनीत फ़िल्म 'कालिया' में किशोर कुमार का गाया गीत था "जहाँ तेरी ये नज़र है, मेरी जाँ मुझे ख़बर है, देख इधर यार, ध्यान किधर है़..."। और फिर हाल में आया हुआ अरिजीत सिंह का गाया, कौसर मुनीर का लिखा और साजिद-वाजिद का स्वरबद्ध डान्स नंबर "पलट, तेरा ध्यान किधर है, यह तेरा हीरो इधर है...", जिसकी ताल पर आज सारे रेडियो चैनल्स झूम रहे हैं। डेविड धवन ने इस गीत के बारे में बताया कि इस जुमले को साजिद-वाजिद ने उन्हें जैसे ही गा कर सुनाया तो उन्होंने फ़ौरन कह दिया कि यह मेरा गाना है, यह मुझे चाहिये इस फ़िल्म में। कॉलेज कैम्पस में नायक अपनी नायिका को मनाने के लिए यह गीत गा रहा है। वरुण धवन पर फ़िल्माया यह गीत चल पड़ा और चार्ट-बस्टर सिद्ध हुआ। वैसे इस गीत को ग़ौर से सुनने पर अहसास होता है कि इसकी धुन कुछ-कुछ "जहाँ तेरी ये नज़र है मेरी जाँ मुझे ख़बर है" से मिलती है, और कई जगहों पर तो डेविड धवन की ही पुरानी फ़िल्म 'हीरो नंबर वन' के गीत "मैने पैदल से जा रहा था, उन्हें साइकिल से आ रही थी" से काफ़ी मेल खाता है। तो इस तरह से "पलट तेरा ध्यान किधर है" फ़िल्मी गीतों में दशकों से आता-जाता रहा है और शायद आगे भी इसका चलन जारी रहे, देखते हैं। लीजिए, अब आप 1943 में बनी फिल्म 'संजोग' में चार्ली का गाया वह गीत सुनिए।

फिल्म - संजोग : 'पलट तेरा ध्यान किधर है...' : नूर मोहम्मद 'चार्ली' : संगीत - नौशाद



अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तम्भ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें cine.paheli@yahoo.com के पते पर।



खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 

मंगलवार, 31 मार्च 2015

गिरिजेश राव लिखित लघुकथा मुक्ति

लोकप्रिय स्तम्भ "बोलती कहानियाँ" के अंतर्गत हम हर सप्ताह आपको सुनवाते रहे हैं नई, पुरानी, अनजान, प्रसिद्ध, मौलिक और अनूदित, यानि के हर प्रकार की कहानियाँ। पिछली बार आपने अनुराग शर्मा के स्वर में अनुराग शर्मा की लघुकथा "व्यवस्था" का पाठ सुना था।

आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं गिरिजेश राव लिखित लघुकथा मुक्ति, जिसे स्वर दिया है अनुराग शर्मा ने।

बोलती कहानियाँ के पाठकों के लिए गिरिजेश राव का नाम नया नहीं है। उनकी कुछ अन्य रोचक कथाओं कों यहाँ सुना जा सकता है। इस कहानी मुक्तिका कुल प्रसारण समय 2 मिनट 7 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।


प्रतिमाओं को गढ़ा जाता है उस अनुभव को मूर्त करने के लिये, मूर्ति इसीलिये कहते हैं। सूक्ष्म स्तर तक सभी नहीं जा सकते इसलिये स्थूल विग्रह का आधार दिया जाता है कि उसी बहाने जीवन सत्त्व से कुछ जुड़ाव बना रहे।
 ~ गिरिजेश राव "सनातन कालयात्री"

हर सप्ताह यहीं पर सुनें एक नयी हिन्दी कहानी

"प्रात और साँझ की तरह, ऋतुओं की तरह, सृष्टि के लयबद्ध नृत्य की तरह, उपद्रवों में संतुलन की तरह, युद्ध के पश्चात शांति और शांति के पश्चात क्षरण की तरह।”
 (गिरिजेश राव की लघुकथा "मुक्ति" से एक अंश)


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मुक्ति MP3

#Sixth Story, Vyavastha; Girijesh Rao; Hindi Audio Book/2015/06. Voice: Anurag Sharma

रविवार, 29 मार्च 2015

ठुमरी महफिलों की : SWARGOSHTHI – 212 : THUMARI



स्वरगोष्ठी – 212 में आज

भारतीय संगीत शैलियों का परिचय : 10 : ठुमरी

‘कौन गली गयो श्याम...’ और ‘आयो कहाँ से घनश्याम...’



‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर लघु श्रृंखला ‘भारतीय संगीत शैलियों का परिचय’ की एक और नवीन कड़ी के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। पाठकों और श्रोताओं के अनुरोध पर आरम्भ की गई इस लघु श्रृंखला के अन्तर्गत हम भारतीय संगीत की उन परम्परागत शैलियों का परिचय प्रस्तुत कर रहे हैं, जो आज भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी हमारे बीच उपस्थित हैं। भारतीय संगीत की एक समृद्ध परम्परा है। वैदिक युग से लेकर वर्तमान तक इस संगीत-धारा में अनेकानेक धाराओं का संयोग हुआ। इनमें से भारतीय संगीत के मौलिक सिद्धान्तों के अनुकूल जो धाराएँ थीं उन्हें स्वीकृति मिली और वह आज भी एक संगीत शैली के रूप स्थापित है और उनका उत्तरोत्तर विकास भी हुआ। विपरीत धाराएँ स्वतः नष्ट भी हो गईं। पिछली पिछली दो कड़ियों में हमने भारतीय संगीत की सर्वाधिक लोकप्रिय ‘ठुमरी’ शैली पर चर्चा की थी। आज के अंक में हम आपको बीसवीं शताब्दी तक महफिलों की प्रचलित ठुमरी का रसास्वादन कराते हैं। आज हम अपने समय की विख्यात गायिका रसूलन बाई की गायी राग जोगिया की ठुमरी प्रस्तुत करेंगे। इसके अलावा पार्श्वगायक मन्ना डे की आवाज़ में राग खमाज की एक फिल्मी ठुमरी भी आप सुनेगे।  




नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में लखनऊ में बोलबाँट और बोलबनाव दोनों प्रकार की ठुमरियों का प्रचलन था। 1856 में अँग्रेजों द्वारा अवध के नवाब वाजिद अली शाह को बन्दी बनाए जाने और उन्हें तत्कालीन कलकत्ता के मटियाबुर्ज नामक स्थान पर नज़रबन्द किये जाने के बाद बंगाल में भी ठुमरी का प्रचार-प्रसार हुआ। उस्ताद अलीबख्श खाँ और उस्ताद सादिक़ अली खाँ जैसे उच्चकोटि के संगीतज्ञ भी नवाब के साथ लखनऊ से कलकत्ता जा बसे थे। कुछ समय बाद उस्ताद सादिक़ अली खाँ वापस लखनऊ लौट आए। इसी अवधि में ग्वालियर के भैया गणपत राव, जो स्वयं ध्रुपद और खयाल के गायक और वीणा के कुशल वादक थे, ने भी उस्ताद सादिक़ अली खाँ से ठुमरी सीखी। भैया गणपत राव ने ठुमरी को एक नवीन स्वरूप प्रदान किया। उन्होने तत्कालीन सांगीतिक परिवेश में विदेशी वाद्य हारमोनियम को ठुमरी से जोड़ कर उल्लेखनीय प्रयोग किया। अपने लगन और परिश्रम से उन्होने हारमोनियम वादन में उल्लेखनीय दक्षता प्राप्त की। भैया गणपत राव ठुमरी के प्रभावी गायक ही नहीं बल्कि एक श्रेष्ठ ठुमरी रचनाकार भी थे। उन्होने ‘सुघरपिया’ उपनाम से अनेक ठुमरियों की रचनाएँ की थी। पूरब अंग की ठुमरी के इस अंदाज के प्रचार-प्रसार के लिए उन्होने लखनऊ, बानारस, गया, पटना, कलकत्ता आदि स्थानों का भ्रमण किया और अनेक शागिर्द तैयार किये। ठुमरी के इस स्वरूप को तत्कालीन राजाओं और नवाबों के दरबार में समुजित सम्मान मिला। आगे चलकर ब्रिटिश शासन की उपेक्षात्मक नीति के कारण राज दारबारों से संगीत की परम्परा टूटने लगी तब यह ठुमरी रईसों की व्यक्तिगत महफिलों में और तवायफ़ों के कोठों पर सुरक्षित रही। ‘स्वरगोष्ठी’ के आज के अंक में हम ठुमरी के इसी महफिली स्वरूप का आभास कराने का प्रयत्न कर रहे हैं।

बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में पूरब अंग की ठुमरी गायिकाओं में विदुषी रसूलन बाई का नाम शीर्ष पर था। पूरब अंग की उपशास्त्रीय गायकी- ठुमरी, दादरा, होरी, चैती, कजरी आदि शैलियों की अविस्मरणीय गायिका रसूलन बाई बनारस के निकट स्थित कछवाँ बाज़ार (वर्तमान मीरजापुर ज़िला) की रहने वाली थीं और उनकी संगीत शिक्षा बनारस (अब वाराणसी) में हुई थी। संगीत का संस्कार इन्हें अपनी नानी से विरासत में मिला था। रसूलन बाई के संगीत को निखारने में उस्ताद आशिक खाँ, नज्जू मियाँ और टप्पा गायकी के अन्वेषक मियाँ शोरी के खानदान के शम्मू खाँ का बहुत बड़ा योगदान था। पूरब अंग की भावभीनी गायकी की चैनदारी, बोल-बनाव के लहजे, कहन के खास ढंग और ठहराव, यह सारे गुण रसूलन बाई की गायकी में था। टप्पा तो जैसे रसूलन बाई के लिए ही बना था। बारीक मुरकियाँ और मोतियों की लड़ियों जैसी तानों पर उन्हें कमाल हासिल था। उनका पहला सार्वजनिक प्रदर्शन तत्कालीन धनंजयगढ़ के राज दरबार में हुआ था, जहाँ उपस्थित राजाओं ने उनकी गायकी को भरपूर सराहा था। इस प्रदर्शन के बाद उन्हें अनेक राजाओं और जमींदारो की माफ़िलों में आमंत्रित किया जाने लगा। उपशास्त्रीय संगीत की आजीवन साधनारत रहने वाली इस स्वरसाधिका को खयाल गायन पर भी कमाल का अधिकार प्राप्त था, परन्तु उन्होने स्वयं को उपशास्त्रीय शैलियों तक ही सीमित रखा और इन्हीं शैलियों में उन्हें भरपूर यश भी प्राप्त हुआ। ग्रामोफोन कम्पनी ने रसूलन बाई के अनेक लोकप्रिय रिकार्ड बनाए। उन्हीं की आवाज में अब आप ठुमरी गायकी का यह अंदाज सुनिए। यह ठुमरी राग जोगिया और दीपचंदी ताल में निबद्ध है।


ठुमरी राग जोगिया : ‘कौन गली गयो श्याम...’ : रसूलन बाई




कैशिकी दृश्यात्मक गीत भेद होने के कारण ठुमरी गीतों में स्त्रियोचित और श्रृंगारिक भावनाओं की अभिव्यंजना मुख्य रूप से होती है। ऐसे ही भावों की अभिव्यक्ति के लिए ठुमरी गीतों की शब्द-योजना अधिकतर श्रृंगारपरक होती है। श्रृंगार के दोनों पक्ष, संयोग और वियोग का चित्रण ठुमरी में पाया जाता है। भावनाओं की दृष्टि से विभिन्न ठुमरी गीतों में प्रेम, भक्ति, अनुराग, हर्ष, शोक, मान, उपालम्भ, आशा, निराशा आदि अनेक स्थायी और अस्थायी मनोभावों की अभिव्यक्ति की जाती है। अधिकतर ठुमरियाँ कृष्णलीला प्रधान रची गई हैं। कृष्ण, राधा और गोपियों के प्रति ईश्वरीय भाव भी होता है तथा नायक या नायिका के रूप में लक्ष्य करके लौकिक भाव भी होता है। रसूलन बाई की गायी उपरोक्त ठुमरी में कृष्ण की बाँसुरी पर मोहित नायिका के वियोग का चित्रण है। यह भाव ईश्वरीय और मानवीय दोनों चरित्र के प्रति उद्गार हो सकता है। आज की दूसरी ठुमरी में लक्ष्य तो ‘घनश्याम’ को किया गया है किन्तु यह भी मानवीय चरित्र के प्रति ही अभिव्यक्ति है। यह भी महफ़िली ठुमरी का एक प्रकार है और बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में प्रचलित ठुमरी गायकी का प्रतिनिधित्व करती है। 1971 में ऋषिकेश मुखर्जी द्वारा निर्देशित फिल्म ‘बुड्ढा मिल गया’ प्रदर्शित हुई थी। इस फिल्म के संगीतकार राहुलदेव बर्मन थे। राग खमाज और सितारखानी ताल में निबद्ध इस ठुमरी को पार्श्वगायक मन्ना डे ने अनूठे अंदाज में गाया है। आप यह ठुमरी सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


ठुमरी राग खमाज : ‘आयो कहाँ ते घनश्याम...’ : मन्ना डे : फिल्म – बुड्ढा मिल गया

 


संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 212वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक वरिष्ठ गायिका की आवाज़ में कण्ठ संगीत की रचना का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 220वें अंक की समाप्ति तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की दूसरी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – संगीत का यह अंश सुन कर बताइए कि यह रचना किस राग में निबद्ध है?

2 – प्रस्तुति के इस अंश में किस ताल का प्रयोग किया गया है? ताल का नाम बताइए।

3 – यह रचना किस शैली में है? हमे उस शैली का नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 4 अप्रैल, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 214वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 210वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको महान गायक उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ के स्वरों में प्रस्तुत ठुमरी का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन में से किसी दो प्रश्न का उत्तर पूछा गया था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग भिन्न षडज, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल कहरवा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ। इस बार पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी ने दिये हैं। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।

अपनी बात

मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी जारी श्रृंखला ‘भारतीय संगीत शैलियों का परिचय’ के अन्तर्गत हम ठुमरी गायकी पर चर्चा कर रहे हैं। आपको यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें अवश्य लिखिएगा। अगले अंक में हम आपका परिचय भारतीय संगीत की एक अन्य शैली से परिचित कराएंगे। यदि आप भी भारतीय संगीत के किसी भी विषय पर हिन्दी में लेखन की इच्छा रखते हैं तो हमसे सम्पर्क करें। हम आपकी प्रतिभा का सदुपयोग करेने। ‘स्वरगोष्ठी’ स्तम्भ के आगामी अंकों में आप क्या पढ़ना और सुनना चाहते हैं, हमे आविलम्ब लिखें। अपनी पसन्द के विषय और गीत-संगीत की फरमाइश अथवा अगली श्रृंखलाओं के लिए आप किसी नए विषय का सुझाव भी दे सकते हैं। आज बस इतना ही, अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  
 


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