रविवार, 8 फ़रवरी 2015

रुद्रवीणा और पखावज : SWARGOSHTHI – 206 : RUDRA VEENA AND PAKHAWAJ RECITAL




स्वरगोष्ठी – 206 में आज

भारतीय संगीत शैलियों का परिचय : ध्रुपद – 4

रुद्रवीणा पर आसावरी के और पखावज पर चौताल के स्वर गूँजे




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर लघु श्रृंखला ‘भारतीय संगीत शैलियों का परिचय’ की चौथी कड़ी के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। पाठकों और श्रोताओं के अनुरोध पर आरम्भ की गई इस लघु श्रृंखला के अन्तर्गत हम भारतीय संगीत की उन परम्परागत शैलियों का परिचय प्रस्तुत कर रहे हैं, जो आज भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी हमारे बीच उपस्थित हैं। भारतीय संगीत की एक समृद्ध परम्परा है। वैदिक युग से लेकर वर्तमान तक इस संगीत-धारा में अनेकानेक धाराओं का संयोग हुआ। इनमें से जो भारतीय संगीत के मौलिक सिद्धांतों के अनुकूल धारा थी उसे स्वीकृति मिली और वह आज भी एक संगीत शैली के रूप स्थापित है और उनका उत्तरोत्तर विकास भी हुआ। विपरीत धाराएँ स्वतः नष्ट भी हो गईं। भारतीय संगीत की सबसे प्राचीन और वर्तमान में उपलब्ध संगीत शैली है, ध्रुपद अथवा ध्रुवपद। पिछली कड़ियों में हमने आपके लिए ध्रुपद और धमार का सोदाहरण परिचय प्रस्तुत किया है। आज के अंक में हम आपसे ध्रुपद शैली के संगीत से अभिन्न रूप से जुड़ा प्राचीन तंत्रवाद्य रुद्रवीणा और ताल के लिए उपयोगी वाद्य पखावज की चर्चा करेंगे और विश्वविख्यात रुद्रवीणा वादक उस्ताद असद अली खाँ द्वारा प्रस्तुत राग आसावरी का और राजा छत्रपति सिंह द्वारा पखावज पर प्रस्तुत चौताल का रसास्वादन भी कराएँगे।  



उस्ताद असद अली खाँ
र्तमान में भारतीय संगीत के जितने भी प्रकार की शैलियाँ प्रचलित हैं, यह सभी पारम्परिक रूप से विकसित और परिमार्जित होकर हमारे बीच उपस्थित हैं। प्राचीन ग्रन्थों और उपलब्ध पुरावशेषों का विश्लेषण करने पर यह निष्कर्ष भी निकलता है की वैदिक युग में भारतीय संगीत की समृद्ध परम्परा रही है। आधुनिक संगीत शैलियों में ध्रुपद अथवा ध्रुवपद सबसे प्राचीन संगीत शैली है। ग्वालियर नरेश मानसिंह तोमर (1486-1516) ने प्राचीन प्रबन्ध गीत शैली को परिमार्जित कर ध्रुपद संगीत को विकसित किया था। उन्हें मध्ययुगीन पदशैली का प्रवर्तक भी माना जाता है। राजा मानसिंह तोमर स्वयं संगीतज्ञ थे और प्राचीन शास्त्रों को आधार मान कर ध्रुपद शैली को स्थापित किया था। ‘स्वरगोष्ठी’ के पिछले अंकों में हमने ध्रुपद के आलाप, जोड़, झाला, निबद्ध गीत और धमार गीत पर चर्चा की है। आज हम ध्रुपद शैली के वाद्यों के विषय में चर्चा करेंगे। वैदिक युग से परम्परागत रूप में विकसित वीणा के कई प्रकार आज भी ध्रुपद संगीत से जुड़े हुए हैं। प्राचीन वीणा का एक प्रकार है, “रुद्रवीणा”। ऐसी मान्यता है की इस तंत्रवाद्य का सृजन स्वयं देवाधिदेव शिव ने माता पार्वती के रंजन के लिए किया था। यह “तत्” श्रेणी का वाद्य है। अर्थात धातु के तारों पर आघात कर स्वरोत्पत्ति की जाती है। रुद्रवीणा की बनावट में मुख्य भाग एक बेलनाकार दण्ड होता है, जिसकी लम्बाई 54 से 62 इंच तक होती है। दण्ड पर स्वर परिवर्तन के लिए 24 परदे होते हैं। दोनों सिरों पर दो तुम्बे लगे होते हैं। इस वाद्य में चार स्वर के मुख्य तार और तीन चिकारी के तार होते हैं। आज हम आपको विश्वविख्यात वीणा वादक उस्ताद असद अली खाँ का रुद्रवीणा वादन सुनवा रहे हैं। आज हम जिसे संगीत का जयपुर घराना के नाम से पहचानते हैं, उसकी स्थापना में असद अली खाँ के प्रपितामह (परदादा) उस्ताद रजब अली खाँ का योगदान रहा है। उस्ताद रजब अली खाँ जयपुर दरबार के केवल संगीतज्ञ ही नहीं; बल्कि महाराजा मानसिंह के गुरु भी थे। महाराजा ने उन्हें जागीर के साथ ही एक विशाल हवेली दे रखी थी तथा उन्हें किसी भी समय बेरोक-टोक महाराज के महल में आने के स्वतन्त्रता थी। असद अली खाँ के दादा जी उस्ताद मुशर्रफ अली खाँ ने भी जयपुर दरबार में वही प्रतिष्ठा प्राप्त की। वीणावादकों का यह घराना ध्रुवपद संगीत के खण्डहार वाणी में वादन करता रहा है; जिसका पालन उस्ताद असद अली खाँ ने किया और अपने शिष्यों को भी इसी वाणी की शिक्षा दी। ध्रुवपद संगीत में चार वाणियों का वर्गीकरण तानसेन के समय में ही हो चुका था। "संगीत रत्नाकर” ग्रन्थ में यह वर्गीकरण शुद्धगीत, भिन्नगीत, गौड़ीगीत और बेसरागीत नामों से हुआ है; जिसे आज गौड़हार वाणी, डागर वाणी, खण्डहार वाणी और नौहार वाणी के नाम से जाना जाता है। उस्ताद असद अली खाँ और उनके पूर्वजों का वादन खण्डहार वाणी का था। इसके अलावा खाँ साहब दूसरी वाणियों की विशेषताओं को प्रदर्शित करने से भी हिचकते नहीं थे। ध्रुवपद अंग में वीणावादन का चलन कम होने के बावजूद उन्होंने परम्परागत वादन शैली से कभी समझौता नहीं किया। आइए, अब हम उनकी वादन शैली की सार्थक अनुभूति करते हैं। इस प्रस्तुति में उस्ताद असद अली खाँ ने ध्रुवपद अंग से राग आसावरी के चौताल में एक बन्दिश का वादन किया है। नाथद्वारा परम्परा के पखावज वादक पण्डित डालचन्द्र शर्मा ने पखावज संगति की है।


राग आसावरी : चौताल में रुद्रवीणा वादन : उस्ताद असद अली खाँ



राजा छत्रपति सिंह 

ध्रुपद संगीत में ताल के लिए सर्वाधिक उपयुक्त वाद्य पखावज अथवा मृदंग है। यह खोखली बेलनाकार लकड़ी का बना हुआ होता है, जिसके दोनों सिरों पर चमड़े से मढ़ा होता है। यह अत्यन्त श्रमसाध्य वाद्य है। ध्रुपद संगीत में इस तालवाद्य की संगति से अनूठी गम्भीरता और भव्यता आती है। गायन और वादन में संगति के साथ-साथ शास्त्रीय नृत्य शैलियों में भए इसका उपयोग होता है। समर्थ कलासाधक पखावज का स्वतंत्र अर्थात एकल वादन भी कुशलता से करते हैं। आम तौर पर पखावज पर चौताल, तीव्रा, धमार, सूल आदि लघु तथा ब्रह्म, रुद्र, लक्ष्मी, सवारी, मत्त, शेष आदि दीर्घ ताल बजाए जाते हैं। आज के अंक में हम आपको स्वतंत्र अर्थात एकल पखावज वादन सुनवा रहे हैं। बीती शताब्दी के प्रमुख संगीतज्ञों में राजा छत्रपति सिंह (1919-1998) की गणना की जाती है। आज के उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के बीच स्थित तत्कालीन बिजना राज परिवार में उनका जन्म हुआ था। इनके पितामह राजा मुकुन्ददेव सिंह जूदेव और पिता राजा हिम्मत सिंह जूदेव का नाम भारतीय संगीत के संरक्षकों में शुमार किया जाता है। राजा छत्रपति सिंह जूदेव ने बचपन से ही पखावज सीखना आरम्भ कर दिया था। अपने युग के जाने-माने दिग्गज पखावजी कुदऊ सिंह और स्वामी रामदास से उनकी ताल शिक्षा हुई। प्रस्तुत रिकार्डिंग में विद्वान पखावजी राजा छत्रपति सिंह पखावज पर चौताल प्रस्तुत कर रहे हैं। आप इस वादन का आनन्द लीजिए और हमे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


स्वतंत्र पखावज वादन : ताल - चौताल : राजा छत्रपति सिंह





संगीत पहेली 

'स्वरगोष्ठी’ के 206वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको कण्ठ संगीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 210वें अंक की समाप्ति तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की पहली श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।



1 – संगीत का यह अंश सुन कर बताइए कि यह रचना किस राग में निबद्ध है?

2 – प्रस्तुति के इस अंश में किस ताल का प्रयोग किया गया है? ताल का नाम बताइए।



आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार 14 फरवरी, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 206वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता 


‘स्वरगोष्ठी’ की 204वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको चर्चित युगल ध्रुपद गायक गुण्डेचा बन्धुओं द्वारा प्रस्तुत धमार गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग केदार और पहेली के दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल धमार (14 मात्रा)। इस बार पहेली के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिना माधवी ने दिया है। इस बार हमारे एक नये प्रतिभागी ने भी पहेली में हिस्सा लेकर एक अंक अर्जित किया है। इन्होने उत्तर के साथ अपना नाम और स्थान का नाम नहीं लिखा है। इनके ई-मेल आई डी के आधार पर अनुमान है कि सम्भवतः प्रेषक का नाम पार्थ सोदानी है। आपसे अनुरोध है कि अपना पूरा नाम और स्थान का नाम हमे शीघ्र भेज दें। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात 


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर इन दिनों जारी है हमारी नई लघु श्रृंखला- ‘भारतीय संगीत शैलियों का परिचय’। इस श्रृंखला के अन्तर्गत वर्तमान में भारतीय संगीत की जो भी शैलियाँ प्रचलन में हैं, उनका सोदाहरण परिचय प्रस्तुत कर रहे हैं। अभी तक आप ध्रुपद शैली का परिचय प्राप्त कर रहे थे। अगले अंक से हम खयाल शैली की चर्चा करेंगे। यदि आप भी संगीत के किसी भी विषय पर हिन्दी में लेखन की इच्छा रखते हैं तो हमसे सम्पर्क करें। हम आपकी प्रतिभा को निखारने का अवसर सहर्ष देंगे। आगामी श्रृंखलाओं के बारे में आपके सुझाव सादर आमंत्रित हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ स्तम्भ के आगामी अंकों में आप क्या पढ़ना और सुनना चाहते हैं, हमे आविलम्ब लिखें। अपनी पसन्द के विषय और गीत-संगीत की फरमाइश अथवा अगली श्रृंखलाओं के लिए आप किसी नए विषय का सुझाव भी दे सकते हैं। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 

शनिवार, 7 फ़रवरी 2015

"हर कोई चाहता है एक मुट्ठी आसमाँ..." - जानिये, किस भागमभाग में रेकॉर्ड हुआ था यह गाना


एक गीत सौ कहानियाँ - 52
 

हर कोई चाहता है एक मुट्ठी आसमाँ...




'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ- 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 52वीं कड़ी में आज जानिये फ़िल्म 'एक मुट्ठी आसमाँ' के शीर्षक गीत "हर कोई चाहता है एक मुट्ठी आसमाँ..." के बारे में जिसे किशोर कुमार ने गाया था।


1973 की एक ऑफ़-बीट फ़िल्म थी 'एक मुठी आसमाँ'। निर्माता, निर्देशक व लेखक विरेन्द्र सिन्हा निर्मित व निर्देशित यह एक कम बजट की फ़िल्म थी जिसमें मुख्य कलाकार थे विजय अरोड़ा, योगिता बाली, प्राण, राधा सलूजा, महमूद आदि। वीरेन्द्र सिन्हा मूलत: एक संवाद लेखक थे जिन्होंने 'हिमालय की गोद में', 'दो बदन', 'मिलन', 'कल आज और कल' और 'ज़हरीला इन्सान' जैसी चर्चित फ़िल्मों के संवाद लिखे हैं। बतौर निर्माता उनकी केवल तीन फ़िल्में आयीं - 'बुनियाद', 'ज़हरीला इन्सान' और 'एक मुट्ठी आसमाँ'। किशोर कुमार की आवाज़ के प्रति अत्यधिक लगाव के कारण वीरेन्द्र सिन्हा ने अपनी इन तीनों फ़िल्मों में उन्हें गवाया। 1972 की फ़िल्म 'बुनियाद' के बुरी तरह असफल होने के बाद, 'एक मुट्ठी आसमाँ' के लिए उनका बजट और कम हो गया। इतनी तंग हालत थी कि सोच विचार के बाद यह निर्णय लिया गया कि फ़िल्म में केवल एक ही गीत रखा जायेगा, जो फ़िल्म का शीर्षक गीत भी होगा और किशोर कुमार की आवाज़ में ही होगा। इस गीत के अलग अलग अन्तरे पूरे फ़िल्म में कई बार आते रहेंगे तो गीत की कमी पूरी होती रहेगी। इस एक गीत के लिए गीतकार इन्दीवर और संगीतकार मदन मोहन को कार्यभार सौंपा गया। फ़िल्म की कहानी और अलग-अलग सिचुएशन के हिसाब से इन्दीवर ने गीत के सारे अन्तरे लिखे और जब सारे अन्तरे और इन्टरल्यूड म्युज़िक को जोड़ा गया तो गीत की कुल अवधि बनी करीब करीब 9 मिनट और 25 सेकण्ड। गीत का एक हिस्सा प्राण पर फ़िल्माया गया और बाक़ी नायक विजय अरोड़ा पर। यह गीत बन कर तैयार हो गया, पर इस फ़िल्म से जुड़े सभी को केवल एक गीत वाली बात खटक रही थी। सभी को कम से कम एक डुएट गीत की ज़रूरत महसूस हो रही थी क्योंकि फ़िल्म में एक नहीं दो दो नायिका मौजूद थीं। ऐसे में जब इन्दीवर और मदन मोहन ने "प्यार कभी कम ना करना सनम" जैसा एक श्योर-शॉट हिट गीत बना डाले तो वीरेन्द्र सिन्हा भी इसे रेकॉर्ड और पिक्चराइज़ेशन  करने का फ़ैसला लिया। किशोर दा तो थे ही, पर इस युगल गीत के लिए लता मंगेशकर को गवाने का बजट विरेन्द्र सिन्हा के पास नहीं था। इसलिए वाणी जयराम को इस गीत के लिए चुन लिया गया जिन्होंने हाल ही में 'गुड्डी' में गीत गा कर हिन्दी फ़िल्म इण्डस्ट्री में हलचल पैदा कर दी थी। और यह डुएट फ़िल्माया गया विजय अरोड़ा और राधा सलूजा पर। तो इस तरह से 'एक मुट्ठी आसमाँ' में दो गीत रखे गये।

किशोर कुमार और मदन मोहन
अब ज़िक्र 'एक मुट्ठी आसमाँ' के शीर्षक गीत के रेकॉर्डिंग की। मदन मोहन ने किशोर कुमार से रेकॉर्डिंग की बात की, उन्हें रेकॉर्डिंग की तारीख़ बतायी और किशोर कुमार ने उन्हें हाँ भी कर दी। जब रेकॉर्डिंग की तारीख़ करीब आयी तो किशोर कुमार बड़े धर्मसंकट में फँस गये। दरअसल बात यह थी कि रेकॉर्डिंग की जो तारीख़ तय हुई थी, उसी दिन किशोर कुमार को शाम चार बजे की फ़्लाइट से विदेश यात्रा पर जाना था। उन्हें शोज़ के लिए एक ओवरसीस ट्रिप पर जाना था। सिर्फ़ यही बात होती तो सुबह रेकॉर्डिंग ख़त्म करके वो शाम की फ़्लाइट पकड़ सकते थे, पर बात यह थी कि उसी दिन उन्होंने राहुल देव बर्मन को भी रेकॉर्डिंग के लिए सुबह का समय दे रखा था। इतनी बड़ी गड़बड़ किशोर दा ने कैसे की, यह अब बताना मुश्किल है। इतनी टाइट शिड्यूल के बावजूद उन्होंने ना तो मदन मोहन की रेकॉर्डिंग कैंसिल की और ना ही पंचम की। वो किसी को भी निराश नहीं करना चाहते थे और उन्हें पता था कि रेकॉर्डिंग कैंसिल करने का मतलब निर्माता के पैसों की बरबादी करना है, जो वो नहीं चाहते थे। ख़ैर, रेकॉर्डिंग का वह दिन आ गया। मदन मोहन के गाने की रेकॉर्डिंग 'फ़ेमस स्टुडियो' में होनी थी, और पंचम की रेकॉर्डिंग 'फ़िल्म सेन्टर' में। दोनों जगह एक दूसरे से काफ़ी दूर थे। किशोर कुमार को सुबह 11 बजे तक पंचम के साथ रेकोर्डिंग करनी थी और उसके बाद उन्हें मदन जी के रेकॉर्डिंग पर पहुँच जाना था। एयरपोर्ट पर विशेष सन्देश पहुँचाया भी गया था कि उन्हें 'चेक-इन' करने में विलम्ब हो सकता है, तो यह बात ध्यान में रखी जाये। 2 बजे तक रेकॉर्डिंग ख़त्म करके उन्हें सीधे एयरपोर्ट की तरफ़ निकलना था, ऐसी तैयारी के साथ किशोर दा घर से निकले थे। पर सब कुछ योजना के अनुसार कहाँ हो पाता है भला? पंचम की रेकॉर्डिंग शुरू तो समय पर ही हुई थी पर समय लम्बा खींच गया, और किशोर दा भी उसमें ऐसे मगन हो गए कि 11 कब बज गये उन्हें पता ही नहीं चला। नतीजा यह हुआ कि उन्हें मदन मोहन की रेकॉर्डिंग में जाने का ख़याल ही नहीं आया। उधर 'फ़ेमस स्टुडियो' में मदन मोहन रेकॉर्डिंग की सारी तैयारी कर किशोर का इन्तज़ार कर रहे थे। दो घन्टे तक इन्तज़ार करने पर जब किशोर कुमार नहीं आये तो मदन जी का पारा थोड़ा खिसकने लगा। अपने एक सहायक को बुलवाने भेजा। वो शख्स वहाँ पहुँचकर किशोर कुमार को जब बताया कि मदन साहब उनका स्टुडियो में इन्तज़ार कर रहे हैं गुस्से में, तो किशोर कुमार के होश ठिकाने आ गये। दोपहर हो चुकी थी। शाम को फ़्लाइट भी पकड़नी थी। और इधर गाने का कुछ काम बचा हुआ था। अब करें तो क्या करें! तब किशोर कुमार ने सोचा कि पंचम तो दोस्त है, उसे तो वो किसी न किसी तरह सम्भाल ही लेंगे, मगर मदन मोहन को सम्भालना भारी पड़ जायेगा। इसलिए वो पंचम के इधर-उधर होते ही चुपचाप पीछे के दरवाज़े से भागे और सीधे 'फ़ेमस स्टुडियो' पहुँच गये। वहाँ पहुँच कर मदन मोहन जी से माफ़ी माँगी, और रेकॉर्डिंग शुरू की। अब इधर जब पंचम को पता चला कि किशोर स्टुडियो में दिख नहीं रहे हैं तो उन्होंने किशोर की तलाश शुरू कर दी। काफ़ी देर खोजने के बाद पंचम को पता चला कि मदन जी का एक सहायक वहाँ आया था और उन्हें 'फ़ेमस स्टुडियो' ले गये हैं। अब पंचम भागे 'फ़ेमस स्टुडियो'। पहुँच कर देखा कि किशोर कुमार मदन जी का गाना रेकॉर्ड कर रहे थे। अब दोनो म्युज़िक डिरेक्टर्स को एक साथ देख कर किशोर कुमार डर गये। वो तुरन्त पंचम के पास आये और उनसे नुरोध किया कि उन्हें थोड़ा समय दे दो, बस इनका गाना पूरा करते ही तुम्हारे पास आता हूँ और तुम्हारा गाना पूरा करके ही मैं फ़्लाइट पकड़ूंगा। तो इस तरह किशोर ने पंचम को किसी तरह शान्त करके वापस भेज दिया, और मदन मोहन के पास जाकर बोले कि माफ़ कीजिये मैं आपकी रेकॉर्डिंग के बारे में भूल ही गया था और उधर पंचम का गाना भी अधूरा छोड़ कर आया हूँ; अगर हो सके तो थोड़ा जल्दी कर लीजिये ताकि विदेश जाने से पहले उसका गाना भी रेकॉर्ड हो जाये वरना वो अटक जायेगा। तब मदन मोहन ने फ़टाफ़ट रेकॉर्डिंग शुरू की और एक टेक में ही यह इतना लम्बा गीत रेकॉर्ड हो गया, और बन गया किशोर कुमार का एक मास्टरपीस गीत। किशोर वहाँ से फ़टाफ़ट पंचम के पास भागे और उनका गाना भी कम्प्लीट किया। और इस तरह भागमभाग में रेकॉर्ड हुए दो गीत। एक तो था "हर कोई चाहता है एक मुट्ठी आसमाँ", पर पंचम का वह कौन सा गीत था यह मैं नहीं खोज पाया। क्या आप में से किसी को पता है कि वह दूसरा गीत कौन सा था जो उस दिन पंचम के वहाँ रेकॉर्ड हुआ था? आपको यदि राहुलदेव बर्मन के उस गीत की जानकारी हो तो नीचे दिये गए ई-मेल आई.डी. पर अवश्य सूचित करें। और अब आप 'एक मुट्ठी आसमाँ' का वह गीत सुनिए।

फिल्म एक मुट्ठी आसमाँ : 'हर कोई चाहता है एक मुट्ठी आसमाँ...' : किशोर कुमार : संगीत मदन मोहन : गीत इन्दीवर 



अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तम्भ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें cine.paheli@yahoo.com के पते पर।



खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 

रविवार, 1 फ़रवरी 2015

धमार के रंग : राग केदार के संग : SWARGOSHTHI – 205 : DHAMAR



स्वरगोष्ठी – 205 में आज

भारतीय संगीत शैलियों का परिचय : ध्रुपद – 3

‘चोरी चोरी मारत हो कुमकुम सम्मुख हो क्यों न खेलो होरी...’ 




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का लघु श्रृंखला ‘भारतीय संगीत शैलियों का परिचय’ की तीसरी कड़ी मे मैं कृष्णमोहन मिश्र हार्दिक स्वागत करता हूँ। पाठकों और श्रोताओं के अनुरोध पर आरम्भ की गई इस लघु श्रृंखला के अन्तर्गत हम भारतीय संगीत की उन परम्परागत शैलियों का परिचय प्रस्तुत कर रहे हैं, जो आज भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी हमारे बीच उपस्थित हैं। भारतीय संगीत की एक समृद्ध परम्परा है। वैदिक युग से लेकर वर्तमान तक इस संगीत-धारा में अनेकानेक धाराओं का संयोग हुआ। इनमें से जो भारतीय संगीत के मौलिक सिद्धांतों के अनुकूल धारा थी उसे स्वीकृति मिली और वह आज भी एक संगीत शैली के रूप स्थापित है और उनका उत्तरोत्तर विकास भी हुआ। विपरीत धाराएँ स्वतः नष्ट भी हो गईं। भारतीय संगीत की सबसे प्राचीन और वर्तमान में उपलब्ध संगीत शैली है, ध्रुपद अथवा ध्रुवपद। पिछली कड़ी में हमने ध्रुपद बन्दिश के विषय में चर्चा की थी। आज के अंक में हम आपसे ध्रुपद शैली के अन्तर्गत धमार गीत पर चर्चा करेंगे और सुप्रसिद्ध युगल गायक गुण्डेचा बन्धुओं की आवाज़ में एक राग केदार का एक रसपूर्ण धमार प्रस्तुत कर रहे हैं। इसके अलावा पार्श्वगायक मन्ना डे का गाया एक फिल्मी ध्रुपद भी प्रस्तुत करेंगे। 


ध्रुपद अंग की गायकी में निबद्ध गीतों का महत्त्वपूर्ण स्थान है। निबद्ध गीतों के विषयवस्तु में ईश्वर की उपासना, साकार और निराकार, दोनों प्रकार से की गई है। इसके अलावा ध्रुपद गीतों में आश्रयदाता राजाओं और बादशाहों की प्रशस्ति, पौराणिक आख्यान, प्रकृति चित्रण और विविध पर्वों और सामाजिक उत्सवों का उल्लेख भी खूब मिलता है। सुप्रसिद्ध संगीत चिन्तक और दार्शनिक ठाकुर जयदेव सिंह ने ‘भारतीय संगीत के इतिहास’ विषयक पुस्तक में यह भी उल्लेख किया है कि सोलहवीं शताब्दी से लेकर उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम दशक तक ध्रुपद गीतों के साथ नृत्य और अभिनय का चलन भी था। इस उल्लेख का सीधा सा अर्थ है कि उस काल में ध्रुपद शैली लोकजीवन से गहराई तक जुड़ी हुई थी। ध्रुपद शैली के अन्तर्गत ही गीत का एक प्रकार है, जिसे आज हम ‘धमार’ के नाम से जानते हैं। धमार नाम का उल्लेख ‘संगीत शिरोमणि’ में मिलता है। इस ग्रन्थ में ‘धम्माली’ नाम का उल्लेख है। धमाल, धम्माल अथवा धम्माली शब्द से उल्लास से परिपूर्ण नृत्य का स्पष्ट आभास होता है। इस गीत शैली के साहित्य में आज भी होली पर्व के उमंग और उल्लास की अभिव्यक्ति की जाती है। लोक शैली का स्पर्श होने और पर्व विशेष के परिवेश का यथार्थ चित्रण होने के कारण ‘धमार’ या ‘धमाल’ नामकरण इस गीत शैली के लिए सार्थक है। ब्रज के गोप-गोपिकाओं के साथ कृष्ण के होली खेलने का प्रसंग धमार गीतों में प्रमुख रूप से उकेरा जाता है। यह गीत शैली चौदह मात्रा के ताल में गायी जाती है। धमार एक प्रकार की गायकी भी है और एक ताल विशेष का नाम भी है। यह पखावज पर बजने वाला १४ मात्रा का ताल है, जिसकी संगति धमार गायन में होती है। धमार की रचनाओं में अधिकतर राधा-कृष्ण की होली और फाल्गुनी परिवेश का चित्रण होता है। गम्भीर प्रवृत्ति के रागों की अपेक्षा चंचल प्रवृत्ति के रागों में धमार की प्रस्तुतियाँ मन को अधिक लुभातीं हैं। आज हम आपको चर्चित युगल गायक रमाकान्त और उमाकान्त गुण्डेचा बन्धुओं द्वारा राग केदार में प्रस्तुत धमार सुनवा रहे हैं। पखावज पर अखिलेश गुण्डेचा ने धमार ताल में संगति की है। हमारे अनुरोध पर ‘स्वरगोष्ठी’ के श्रोताओं के लिए गुण्डेचा बन्धुओं ने इस धमार गीत को स्वयं हमे उपलब्ध कराया है।


धमार राग केदार : ‘चोरी चोरी मारत हो कुमकुम...’ : रमाकान्त और उमाकान्त गुण्डेचा




धमार गीतों में उपज का काम अधिक होता है। यह लय-प्रधान शैली है। इसके विपरीत ध्रुपद बन्दिश की गायकी ध्रुपद बन्दिश में गम्भीरता होती है, जबकि धमार गायकी में चंचलता होती है। पिछले अंक में हमने आपको 1943 की फिल्म ‘तानसेन’ में शामिल किये गए एक प्राचीन ध्रुपद का गायन प्रसिद्ध गायक-अभिनेता कुन्दनलाल सहगल के स्वर मे सुनवाया था। तानसेन के गुरु और प्रसिद्ध सन्त-संगीतज्ञ स्वामी हरिदास की यह रचना 1962 में बनी फिल्म ‘संगीत सम्राट तानसेन’ में भी शामिल किया गया था। दोनों फिल्मों के इस गीत का स्थायी तो समान है, किन्तु अन्तरे के शब्दों में थोड़ा परिवर्तन किया गया है। फिल्म ‘संगीत सम्राट तानसेन’ के संगीतकार थे एस.एन. त्रिपाठी और यह गीत पार्श्वगायक मन्ना डे की आवाज़ में है। फिल्म का यह ध्रुपद गीत राग यमन कल्याण की अनुभूति कराता है। आप इस फिल्मी ध्रुपद गीत का आनन्द लीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


ध्रुपद राग यमन कल्याण : “सप्तसुरन तीन ग्राम...’ : मन्ना डे : फिल्म – संगीत सम्राट तानसेन






संगीत पहेली



‘स्वरगोष्ठी’ के 205वें अंक की पहेली में आज हम आपको एक वाद्य संगीत का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन प्रश्नों में से कोई दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली क्रमांक 210 के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की पहली श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।



1 – यह कौन सा वाद्य है? वाद्य का नाम बताइए।

2 – संगीत वाद्य पर यह कौन सा राग बजाया जा रहा है? राग का नाम बताइए।

3 – प्रस्तुत रचना किस ताल में निबद्ध है? ताल का नाम बताइए। 
 


आप उपरोक्त तीन में से किसी दो प्रश्न का उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 7 फरवरी, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 207वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत किये गए गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस मंच पर स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 203वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको गुण्डेचा बन्धुओं की आवाज़ में एक ध्रुपद बन्दिश का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग भूपाली और पहेली के दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- सूल ताल। इस बार की पहेली में पूछे गए दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी और पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात



मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर इन दिनों हमारी लघु श्रृंखला ‘भारतीय संगीत शैलियों का परिचय’ जारी है। श्रृंखला पहले हिस्से में हम ध्रुपद शैली का परिचय प्रस्तुत कर रहे हैं। इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम भारतीय संगीत की विभिन्न शैलियों का सोदाहरण परिचय प्रस्तुत कर रहे हैं। इस श्रृंखला में आप भी योगदान कर सकते हैं। भारतीय संगीत की किसी शैली पर अपना परिचयात्मक आलेख अपने नाम और परिचय के साथ हमारे ई-मेल पते पर भेज दें। आप अपनी फरमाइश या अपनी पसन्द का आडियो क्लिप भी हमें भेज सकते हैं। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के नये अंक के साथ हम उपस्थित होंगे। अगले अंक भी हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी। 



प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

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