शनिवार, 3 जनवरी 2015

"तुझे देखा तो यह जाना सनम..." - 1000 सप्ताह पूर्ति पर DDLJ के इस गीत से जुड़ी कुछ बातें


एक गीत सौ कहानियाँ - 49
 

तुझे देखा तो यह जाना सनम...’




'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के मंच पर प्रकाशित और प्रसारित होने वाले साप्ताहिक स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ' के सभी श्रोता-पाठकों को नये वर्ष 2015 की पहली कड़ी में सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़ी दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 49वीं कड़ी में आज जानिये 1995 की फ़िल्म 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएँगे’ के गीत "तुझे देखा तो यह जाना सनम..." के बारे में। इस फ़िल्म ने पिछले दिनों 1000 सप्ताह पूरे किये हैं, मुम्बई के ’मराठा मन्दिर’ सिनेमाघर में।



हिन्दी सिनेमा के इतिहास के सुनहरे पन्नों में जिन फ़िल्मों का शुमार होता है, उनमें से एक हैं ’दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे’, जिसे हम और आप प्यार से DDLJ कह कर बुलाते हैं। 1995 में प्रदर्शित इस फ़िल्म ने आज 1000 सप्ताह पूरे कर लिए हैं मुम्बई के ’मराठा मन्दिर’ सिनेमा घर में। पिछले 19 वर्षों से यह फ़िल्म लगातार हर रोज़ प्रदर्शित होती चली आई है इस थिएटर में जो अपने आप में एक रेकॉर्ड है। इस फ़िल्म की हर बात निराली है, हर पहलू सुपरहिट है, और उनमें संगीत भी एक ख़ास महत्व है। यूँ तो यश चोपड़ा की फ़िल्मों का संगीत हमेशा से ही सर चढ़ कर बोलता रहा है, पर DDLJ के गीतों ने तो लोकप्रियता की सारी हदें पार कर दी है। फ़िल्म के सातों गीत सूपर-डूपर हिट और एक से बढ़ कर एक। इनमें से कौन सा गीत उपर है और कौन सा नीचे, यह तय पाना आसान काम नहीं है। भले ही फ़िल्म के संगीतकार जतिन-ललित के लिए यह फ़िल्म किसी वरदान से कम नहीं थी, पर दुर्भाग्यवश उस साल का फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड ए. आर. रहमान की झोली में चला गया फ़िल्म ’रंगीला’ के लिए। DDLJ के अलावा अन्य नामांकन थे ’अकेले हम अकेले तुम’, ’राजा’ और ’करण अर्जुन’। पर जतिन-ललित को DDLJ के लिए लोगों का इतना ज़्यादा प्यार मिला कि जो हर पुरस्कार से बढ़ कर था। और हाल ही में BBC Asia ने एक मतदान करवाया जिसमें लोगों से सर्वश्रेष्ठ हिन्दी म्युज़िकल फ़िल्म के लिए अपना मत व्यक्त करने को कहा गया। इस मतदान के आख़िरी चरण में कुल 40 फ़िल्मों का चयन हुआ जिनमें ’मुग़ल-ए-आज़म’, ’तीसरी मंज़िल’, ’गाइड’, ’दिलवाले दुल्हनिआ ले जायेंगे’, ’कुछ कुछ होता है’ आदि फ़िल्में थीं, और जिस फ़िल्म को सर्वश्रेष्ठ म्युज़िकल फ़िल्म का ख़िताब मिला, वह फ़िल्म थी ’दिलवाले दुल्हनिया ले जाएँगे।

यश चोपड़ा DDLJ से पहले की फ़िल्मों में संगीतकार शिव-हरि से संगीत तैयार करवा रहे थे। ’सिलसिला’, ’फ़ासले’, ’विजय’, ’लम्हे’, ’चाँदनी’ और ’डर’ जैसी फ़िल्मों में इनके संगीत थे। इन तमाम फ़िल्मों में या तो लोक धुनों पर आधारित गीतों की गुंजाइश थी या फिर इन फ़िल्मों के नायक-नायिका थोड़े से उम्रदराज़ थे, यानी कि थोड़े से वयस्क। लेकिन DDLJ की कहानी बिल्कुल अलग थी। इसमें नायक-नायिका बिल्कुल जवान, और यूरोप में पले बढ़े हैं; ऐसे में फ़िल्म का गीत-संगीत भी उसी अंदाज़ का होना चाहिए, इस बात को ध्यान में रखते हुए यश चोपड़ा ने संगीतकार जतिन-ललित को साइन करने का फ़ैसला किया। मेलडी में विश्वास रखने वाले यश जी जतिन-ललित के संगीत को सुन चुके थे और उस समय जतिन-ललित की जुबान पर मेलडियस संगीत चारों ओर धूम मचा रही थी। ’यारा दिलदारा’, ’जो जीता वही सिकन्दर’, ’खिलाड़ी’, ’राजू बन गया जेन्टलमैन’, और ’कभी हाँ कभी ना’ जैसी फ़िल्मों में सुपरहिट संगीत देकर जतिन-ललित शीर्ष के संगीतकारों की श्रेणी में जा बैठे थे। पर जब ’यशराज फ़िल्म्स’ की तरफ़ से उन्हें DDLJ में संगीत देने का मौका मिला तो उनकी ख़ुशी का ठिकाना न रहा, जिसके दो मुख्य कारण थे। एक तो यह कि यश चोपड़ा की फ़िल्म में संगीत देना ही अपने आप में एक अहम सम्मान है, और दूसरा यह कि इस फ़िल्म में उन्हें लता मंगेशकर के साथ काम करने का मौका मिलेगा (लता जी के साथ जतिन-ललित की यह पहली फ़िल्म थी)। जतिन-ललित ने अपने एक इन्टरव्यू में यह कहा है कि इस फ़िल्म के गीतों को बनाते समय उन्होंने यह सोचा भी नहीं था कि ये गानें इतने ज़्यादा लोकप्रिय हो जायेंगे। फ़िल्म के सभी के सभी गीत कैसे इतने अच्छे बन गए यह उन्हें भी नहीं पता। ललित पंडित ने कहा है कि इस फ़िल्म के गीतों को पहले लिखा गया है और उसके बाद उनकी धुनें बनी हैं। गीतों के इन्टरल्यूड म्यूज़िक को रिचार्ड मित्र, अरेंजर बाबुल और ललित पंडित ने बनाया था।

और अब आते हैं "तुझे देखा तो यह जाना सनम..." पर। फ़िल्मी गीतों के इतिहास के सर्वश्रेष्ठ रोमान्टिक गीतों की सूची जब बनायी जाएगी तब उसमें इस गीत का ज़िक्र ज़रूर आएगा। गीतकार आनन्द बक्शी के सीधे-सच्चे शब्द लोगों के दिल में ऐसे उतर गए कि पिछले 19 सालों से निरन्तर सुनते रहने के बावजूद इस गीत से ऊबे नहीं। बक्शी साहब को इसी गीत के लिए उस साल सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फ़िल्मफेयर पुरस्कार मिला था। इससे पहले आनद बक्शी को केवल दो बार यह पुरस्कार मिला था - "आदमी मुसाफ़िर है" (अपनापन) और "तेरे मेरे बीच में" (एक दूजे के लिए) गीतों के लिए। DDLJ के लिए शाहरुख़ ख़ान के लिए उदित नारायण की आवाज़ तय हुई थी और अधिकांश गीतों में उदित की ही आवाज़ सुनाई दी है। पर दो गीत ऐसे हैं जिनमें अभिजीत और कुमार सानू की आवाज़ें हैं। "ज़रा सा झूम लूँ मैं" की मादकता को देखते हुए अभिजीत की आवाज़ ली गई, पर "तुझे देखा तो यह जाना सनम" के लिए उदित नारायण के स्थान पर कुमार सानू की आवाज़ को चुनने का निर्णय आश्चर्यपूर्ण है। दरसल बात ऐसी हुई कि इस गीत की शुरुआत "तुझे" शब्द से होती है और उदित नारायण का उच्चारण कुछ ऐसा है कि "झ" वाले शब्द कुछ-कुछ "ज्‍ह" जैसी सुनाई देती है (शायद उनके नेपाली होने की वजह से)। और क्योंकि शुरुआती मुखड़ा बिना किसी साज़ के शुरू होता है, ऐसे में उदित की आवाज़ में "तुझे" शब्द का उच्चारण ठीक ना होने की सम्भावना को ध्यान में रखते हुए यह निर्णय लिया गया कि गीत को कुमार सानू से गवा लिया जाए। वैसे उदित नारायण को "मेहन्दी लगाके रखना" गीत के लिए सर्वश्रेष्ठ गायक का फ़िल्मफ़ेअर पुरस्कार ज़रूर मिला था। अब बात इस गीत के फ़िल्मांकन की। गीत फ़िल्माया गया था पीले सरसों के खेतों में। पर फ़िल्मांकन में कन्टिन्यूइटी की गड़बड़ी ज़रूर देखी जा सकती है। गीत शुरू होने से ठीक पहले सिमरन (काजोल) हरे घाँस वाले खेत में खड़ी हैं, पर अगले ही शॉट में वो पीले फूलों के खेत से दौड़ने लग पड़ती हैं। ख़ैर, जो हिट है, वही फ़िट है। "तुझे देखा" से सम्बन्धित एक अन्तिम जानकारी यह भी है कि 1998 की फ़िल्म ’प्यार तो होना ही था’ में जतिन-ललित ने लगभग इसी धुन पर कम्पोज़ किया था "अजनबी मुझको इतना बता दिल मेरा क्यों परेशान है" जिसे आशा भोसले और उदित नारायण ने गाया था और एक बार फिर काजोल पर ही फ़िल्माया गया था। पर इस गीत को वह ख्याति नहीं मिली जो ख्याति "तुझे देखा..." को मिली। लीजिए, अब आप वही चर्चित गीत सुनिए।

फिल्म - दिलवाले दुल्हनिया ले जाएँगे : 'तुझे देखा तो ये जाना सनम...' : कुमार सानू और लता मंगेशकर : 



अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तम्भ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें cine.paheli@yahoo.com के पते पर।



खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र

शुक्रवार, 2 जनवरी 2015

2014 के कमचर्चित सुरीले गीतों की हिट परेड भाग - 2



नववर्ष विशेष

2014 के कमचर्चित सुरीले गीतों की हिट परेड  - भाग 2 

The Unsung Melodies of 2014





रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार और नववर्ष 2015 की हार्दिक शुभकामनाएँ। स्वागत है आप सभी का साल 2015 की प्रथम प्रस्तुति में। आज हम वर्ष के दूसरे दिन आपके मनोरंजन के लिए हम लेकर आए हैं इस विशेष प्रस्तुति का दूसरा भाग। साल 2014 हिन्दी फ़िल्म-संगीत के लिए अच्छा ही कहा जा सकता है; अच्छा इस दृष्टि से कि इस वर्ष जनता को बहुत सारे हिट गीत मिले, जिन पर आज की युवा पीढ़ी ख़ूब थिरकी, डान्स क्लब की शान बने, FM चैनलों पर बार-बार लगातार ये गाने बजे। "बेबी डॉल", "जुम्मे की रात है", "मुझे प्यार ना मिले तो मर जावाँ", "पलट तेरा ध्यान किधर है", "आज ब्लू है पानी पानी", "तूने मारी एन्ट्री यार", "सैटरडे सैटरडे", "दिल से नाचे इण्डिया वाले", जैसे गीत तो जैसे सर चढ़ कर बोले साल भर। लेकिन इन धमाकेदार गीतों की चमक-दमक के पीछे गुमनाम रह गए कुछ ऐसे सुरीले नग़मे जिन्हें अगर लोकप्रियता मिलती तो शायद सुनने वालों को कुछ पलों के लिए सुकून मिलता। कुछ ऐसे ही कमचर्चित पर बेहद सुरीले और अर्थपूर्ण गीतों की हिट परेड लेकर हम उपस्थित हुए हैं आज की इस विशेष प्रस्तुति में। आज के इस अंक में प्रथम सात गीत हम प्रस्तुत कर रहे हैं। हमें आशा है आपको हमारी यह प्रस्तुति पसन्द आएगी। सुनिए और अपनी राय दीजिए। 


7: "अखियाँ तिहारी..." (जल)

फ़िल्म ’जल’ पिछले साल की एक क्रिटिकली ऐक्लेम्ड फ़िल्म थी जिसे देश-विदेश के कई फ़िल्म महोत्सवों में कई पुरस्कार मिले। यहाँ राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला इस फ़िल्म को। इस फ़िल्म से फ़िल्म-संगीतकार बने गायक सोनू निगम। उनके साथ बिक्रम घोष ने इस फ़िल्म में संगीत दिया। फ़िल्म का शीर्षक गीत शुभा मुदगल की आवाज़ में है "जल दे", जिसमें सोनू और बिक्रम ने मारवा और पूरिया जैसे रागों के इस्तमाल के साथ-साथ दुर्लभ साज़ आरमेनियन डुडुक का भी प्रयोग किया जिसकी काफ़ी प्रशंसा हुई। इसी फ़िल्म में उस्ताद ग़ुलाम मुस्तफ़ा ख़ाँ साहब और सुज़ेन का गाया "अखियाँ तिहारी" गीत भी तारीफ़-ए-क़ाबिल है जिसे ख़ुद सोनू और बिक्रम ने ही लिखा भी है। यह सोचने वाली ही बात है कि क्यों नहीं चल पाते ऐसे गीत आज के बाज़ार में! ज़रा सुनिए तो इस गीत को!

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6: "तू हँसे तो लगे जैसे कोई झरणा बहता है..." (कहीं है मेरा प्यार)

’विवाह’ और ’एक विवाह ऐसा भी’ से वापसी हुई थी संगीतकार रवीन्द्र जैन की। रवीन्द्र जैन का संगीत हमेशा उत्कृष्ट रहा है। व्यावसायिक्ता के चलते उन्होंने कभी अपने संगीत से समझौता नहीं किया, फिर चाहे उनके गाने चले या ना चले। 80 के दशक में जब फ़िल्म संगीत अपने सबसे बुरे दौर से गुज़र रही थी, तब रवीन्द्र जैन उन चन्द गिने-चुने संगीतकारों में से एक थे जिन्होंने फ़िल्म संगीत के स्तर को उपर बनाये रखने की भरपूर कोशिशें की। 2014 में उनके संगीत से सजी म्युज़िकल फ़िल्म आई ’कहीं है मेरा प्यार’। फ़िल्म बॉक्स ऑफ़िस पर बुरी तरह पिट गई और फ़िल्म के गाने भी नज़रन्दाज़ हो गए। युं तो फ़िल्म के सभी गीत कर्णप्रिय हैं, पर जो गीत सबसे ज़्यादा दिलो-दिमाग़ पर हावी होता है वह है शान और श्रेया घोषाल का गाया रोमान्टिक युगल गीत "तू हँसे तो लगे जैसे कोई झरणा बहता है"। सुनिए इस गीत को और बह जाइए रवीन्द्र जैन के सुरीले धुनों में।

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https://www.youtube.com/watch?v=S4vOyzH0mkM


5: "जो दिखते हो, वह लगते नहीं..." (क्या दिल्ली क्या लाहौर)

’क्या दिल्ली क्या लाहौर’ 2014 की फ़िल्म रही जो 1948 के हालातों के पार्श्व पर लिखी एक कहानी पर आधारित है। देश-विभाजन पर बनने वाली इस फ़िल्म की ख़ास बात यह है कि फ़िल्म के प्रस्तुतकर्ता के रूप में गुलज़ार का नाम नामावली में दिखाई देता है। गुलज़ार देश के बटवारे के हालातों से गुज़रे हैं, इसलिए उनसे बेहतर इस फ़िल्म के साथ बेहतर न्याय और कौन सकता था भला! करण अरोड़ा निर्मित इस फ़िल्म को निर्देशित किया नवोदित निर्देशक विजय राज़ जो इस फ़िल्म के नायक भी हैं। फ़िल्म के फ़र्स्ट लूक को वाघा सीमा पर प्रदर्शित किया गया था और 2  मई 2014 को पूरे विश्व में यह फ़िल्म रिलीज़ हुई। फ़िल्म को लोगों ने पसन्द ज़रूर किया पर बॉक्स ऑफ़िस पर फ़िल्म पिट गई। गुलज़ार के लिखे गीत, संदेश शान्डिल्य का संगीत भी दब कर रह गया। इस फ़िल्म के जिस गीत को हमने चुना है वह है पाकिस्तानी गायक शफ़क़त अमानत अली का गाया "जो दिखते हो वह लगते नहीं"। इस गीत के बारे में और क्या कहें, यही काफ़ी है कि इसे गुलज़ार ने लिखा है, सुनिए।

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4: "शामें डूबती हैं तेरे ख़यालों में..." (ख़्वाब)

Rahat & Shreya
’ख़्वाब’ ज़ैद अली ख़ान द्वारा निर्देशित व मोराद अली ख़ान निर्मित फ़िल्म है जिसमें नवदीप सिंह और सिमर मोतियानी मुख्य भूमिकाओं में हैं। फ़िल्म में संगीत दिया है संदीप चौटा और सज्जाद अली चान्दवानी ने। 28 मार्च 2014 के दिन सलमान ख़ान के हाथों इस फ़िल्म का म्युज़िक लौन्च भी फ़िल्म को डूबने से बचा नहीं पाया। फ़िल्म में केवल तीन गीत हैं, जिसमें शीर्षक गीत सोनू निगम की आवाज़ में है और संगीतकार हैं संदीप चौटा। पर जो गीत बेहतरीन है वह है राहत फ़तेह अली ख़ान और श्रेया घोषाल की आवाज़ों में "शामेंडूबती हैं तेरे ख़यालों में"। राहत और श्रेया जब भी कभी साथ में गीत गाए हैं, वो सारे गाने कामयाब रहे हैं, और यह गीत भी कोई व्यतिक्रम नहीं है। बड़ा ही कोमल अंदाज़ में गाया हुआ यह गीत जैसे एक आस सी बंधा जाता है कि शायद फ़िल्म-संगीत का वह सुरीला दौर शायद फिर से वापस आ जाए। सुनिए यह गीत अगर आपने पहले कभी नहीं सुना है तो।

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3: "अन्धेरों में ढूंढ़ते हैं टुकड़ा टुकड़ा ज़िन्दगी..." (Children of War)

मृत्युंजय देवरत निर्देशित ’Children of War’ फ़िल्म 1971 के बांगलादेश मुक्ति युद्ध के पार्श्व पर बनी फ़िल्म है। पहले फ़िल्म का शीर्षक ’The Bastard Child' रखा गया था पर IMPPA ने इस शीर्षक को स्वीकृति नहीं दी। फ़िल्म में संगीत था सिद्धान्त माथुर का। इस फ़िल्म को क्रिटिकल अक्लेम मिला है। वरिष्ठ फ़िल्म पत्रकार सुभाष के झा ने लिखा है, "It is impossible to believe that this war epic has been directed by a first-time filmmaker. How can a virgin artiste conceive such a vivid portrait of the rape of a civilization?" गोपाल दत्त के लिखे और संगीतकार सिद्धान्त माथुर के ही गाए फ़िल्म का सबसे अच्छा गीत है "अन्धेरों में ढूंढ़ते हैं टुकड़ा टुकड़ा ज़िन्दगी", जिसे सुनना एक बेहद सुरीला अनुभव रहता है। दीपचन्दी ताल पर कम्पोज़ किया यह गीत शायद फ़िल्म की कहानी और कथन को अपने आप में समेट लेता है। सिद्धान्त की तरो-ताज़ी आवाज़ ने गीत में एक नया रंग भरा है जो शायद किसी स्थापित गायक की आवाज़ नहीं ला पाती। सुनिए और महसूस कीजिए किसी भी युद्द के दौरान बच्चों पर होने वाले शोषण और अत्याचार।

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https://www.youtube.com/watch?v=6LZmULljq4s


2: "मारे नैनवा के बान..." (बाज़ार-ए-हुस्न)

यह वाकई बहुत ही सराहनीय बात है कि 2014 में भी कुछ फ़िल्मकार मुन्शी प्रेमचन्द की कहानी पर फ़िल्म बनाने का जस्बा रखते हैं। इसके लिए निर्माता ए. के. मिश्र की जितनी प्रशंसा की जाए कम है। प्रेम्चन्द की उर्दू उपन्यास ’बाज़ार-ए-हुस्न’ पर इसी शीर्षक से फ़िल्म बनाई मिश्र जी ने जो 18 जुलाई 2014 को प्रदर्शित हुई। रेशमी घोष, जीत गोस्वामी, ओम पुरी और यशपाल शर्मा अभिनीत इस फ़िल्म की एक और ख़ास बात यह है कि इस फ़िल्म में संगीत दिया है वरिष्ठ और सुरीले संगीतकार ख़य्याम ने। ख़य्याम साहब का संगीत हमेशा ही बड़ा सुकून देता आया है। ठहराव भरे उनके गीत जैसे कुछ पलों के लिए हमारे सारे तनाव दूर कर देते हैं। ’बाज़ार-ए-हुस्न’ के गीतों में भी ख़य्याम साहब का वही जादू सुनाई देता है। सुनिधि चौहान की आवाज़ में फ़िल्म का मुजरा "मारे नैनवा के बान" अपना छाप छोड़ जाती है; चल्ताऊ किस्म के मुजरे बनाने वालों के लिए यह मुजरा एक सबक है कि 2014 में भी स्तरीय मुजरा बनाया जा सकता है। आप भी सुनिए और मस्त हो जाइए इस मुजरे को सुनते हुए...

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https://www.youtube.com/watch?v=QEhI2-8NaPk


1: "जगावे सारी रैना..." (डेढ़ इश्क़िया)

Rekha Bhardwaj
विशाल भारद्वाज की फ़िल्म ’डेढ़ इश्क़िया’ को बॉक्स ऑफ़िस पर ख़ास सफलता नहीं मिली माधुरी दीक्षित और नसीरुद्दीन शाह जैसे मँझे हुए कलाकारों के होते हुए भी। फ़िल्म के गीत संगीत की बात करें तो "हमारी अटरिया" गीत के अलावा बाक़ी सभी गीतों का संगीत विशाल भारद्वाज ने ख़ुद ही तैयार किया है और बोल लिखे हैं गुलज़ार ने। रेखा भारद्वाज के गाए "हमारी अटरिया" दरसल बेग़म अख़्तर का गाया गीत है। राहत फ़तेह अली ख़ान की आवाज़ में "दिल का मिज़ाज इश्क़िया" और "ज़बान जले है" अपनी जगह ठीक है, पर जो गीत स्तर के लिहाज़ से सबसे उपर है, वह है रेखा भार्द्वाज और बिरजु महाराज की आवाज़ों में "जगावे सारी रैना"। शास्त्रीय संगीत की छटा लिए इस गीत में बिरजु महाराज द्वारा गाया हुआ आलाप और ताल, और साथ में सितार और तबले की थाप इस गीत को निस्संदेह वर्ष का सर्वश्रेष्ठ गीतों में से एक बनाता है। क्यों नहीं आया यह गीत किसी भी काउन्ट-डाउन में? क्यों नहीं सुनाई दिया यह गीत किसी भी रेडियो चैनल पर? क्या "जुम्मे की रात है" जैसे गीतों को सुनने की ही रुचि शेष रह गई है आजकल? लीजिए इस गीत को सुनते हुए ज़रा मंथन कीजिए कि क्यों नहीं पब्लिसिटी मिल रही है इस स्तरीय गीतों को।

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https://www.youtube.com/watch?v=WpXb61GsHEU 


तो यह थी नववर्ष की हमारी विशेष प्रस्तुति, आशा है आपको पसन्द आई होगी। अपनी राय टिप्पणी में ज़रूर लिखें। चलते चलते आप सभी को नववर्ष की एक बार फिर से शुभकामनाएँ देते हुए विदा लेता हूँ, नमस्कार।



प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र

गुरुवार, 1 जनवरी 2015

2014 के कमचर्चित सुरीले गीतों की हिट परेड - भाग 1



नववर्ष विशेष

2014 के कमचर्चित सुरीले गीतों की हिट परेड  - भाग 1

The Unsung Melodies of 2014





रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार और नववर्ष 2015 की हार्दिक शुभकामनाएँ! स्वागत है आप सभी का साल 2015 की प्रथम प्रस्तुति में। आज वर्ष के पहले और दूसरे दिन आपके मनोरंजन के लिए हम लेकर आए हैं यह विशेष प्रस्तुति। साल 2014 हिन्दी फ़िल्म-संगीत के लिए अच्छा ही कहा जा सकता है; अच्छा इस दृष्टि से कि इस वर्ष जनता को बहुत सारे हिट गीत मिले, जिन पर आज की युवा पीढ़ी ख़ूब थिरकी, डान्स क्लब की शान बने, FM चैनलों पर बार-बार लगातार ये गाने बजे। "बेबी डॉल", "जुम्मे की रात है", "मुझे प्यार ना मिले तो मर जावाँ", "पलट तेरा ध्यान किधर है", "आज ब्लू है पानी पानी", "तूने मारी एन्ट्री यार", "सैटरडे सैटरडे", "दिल से नाचे इण्डिया वाले", जैसे गीत तो जैसे सर चढ़ कर बोले साल भर। लेकिन इन धमाकेदार गीतों की चमक धमक के पीछे गुमनाम रह गए कुछ ऐसे सुरीले नग़मे जिन्हें अगर लोकप्रियता मिलती तो शायद सुनने वालों को कुछ पलों के लिए सुकून मिलता। कुछ ऐसे ही कमचर्चित पर बेहद सुरीले और अर्थपूर्ण गीतों की हिट परेड लेकर हम उपस्थित हुए हैं आज की इस विशेष प्रस्तुति में। आज के इस अंक में अन्तिम सात गीत और कल के अंक में प्रथम सात गीत हम प्रस्तुत कर रहे हैं। हमें आशा है आपको हमारी यह प्रस्तुति पसन्द आएगी। सुनिए और अपनी राय दीजिए।


14: "तेरे बिन हो ना सकेगा गुज़ारा" (परांठे वाली गली)

KK
जनवरी 2014 में प्रदर्शित फ़िल्मों में ’यारियाँ’ और ’जय हो’ की तरफ़ सबका ध्यान केन्द्रित रहा। इन दो फ़िल्मों के गीत-संगीत ने भी काफ़ी धूम मचाई। इसी दौरान एक फ़िल्म आई ’परांठे वाले गली’ जो एक रोमान्टिक कॉमेडी फ़िल्म थी। सचिन गुप्ता निर्देशित तथा अनुज सक्सेना व नेहा पवार अभिनीत इस फ़िल्म में संगीत का दायित्व मिला विक्रम खजुरिआ और वसुन्धरा दास को। विक्रम द्वारा स्वरबद्ध के.के की आवाज़ में एक गीत था "तेरे बिन हो ना सकेगा गुज़ारा", जो सुनने में बेहद कर्णप्रिय है। यह गीत ना तो कभी सुनाई दिया और ना ही इसकी कोई चर्चा हुई। तो सुनिए यह गीत और आप ही निर्णय लीजिए कि आख़िर क्या कमी रह गई थी इस गीत में जो इसकी तरफ़ लोगों का ध्यान और कान नहीं गया।


 
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13: "ओ माँझी रे... आज तो भागे मनवा रे" (Strings of Passion)

संघामित्रा चौधरी निर्देशित फ़िल्म बनी ’Strings of Passion'। जैसा कि शीर्षक से ही प्रतीत होता है कि यह एक संगीत-प्रधान विषय की फ़िल्म है। फ़िल्म की कहानी तीन चरित्र - नील, अमन और अमित की कहानी है जो ’Strings of Passion' नामक एक बैण्ड चलाते हैं, पर ड्रग्स, टूटे रिश्ते और ख़राब माँ-बाप की वजह से उन पर काले बादल मण्डलाने लगते हैं। देव सिकदार इस फ़िल्म के संगीतकार हैं। इस फ़िल्म का एक गीत "ओ माँझी रे... आज तो भागे मनवा रे" ज़रूर आपके मन को मोह लेगा। सुनिए यह गीत जो आधुनिक होते हुए भी लोक-शैली को अपने आप में समाये हुए है। देव सिकदार की तरो-ताज़ी और गंभीर आवाज़ में यह गीत जानदार बन पड़ा है।


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12: "शहर मेरा" (One by Two)

'One by Two' फ़िल्म कब आई कब गई पता भी नहीं चला। शंकर-अहसान-लॉय का संगीत होने के बावजूद फ़िल्म के गीतों पर भी किसी का ध्यान नहीं गया। इस फ़िल्म में Thomas Andrews का गाया एक गीत है "शहर मेरा"। व्हिसल, वायलिन, सैक्सोफ़ोन, पियानो और जैज़ के संगम से यह गीत एक अनोखा गीत बन पड़ा है। गायक के केअर-फ़्री अंदाज़ से गीत युवा-वर्ग को लुभाने में सक्षम हो सकती थी। पर फ़िल्म की असफलता इस गीत को साथ में ले डूबी। अगर आपने यह गीत पहले नहीं सुना है तो आज कम से कम एक बार ज़रूर सुनिए।

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11: "साँसों को जीने का इशारा मिल गया" (ज़िद)

नई पीढ़ी के गायकों में आजकल अरिजीत सिंह की आवाज़ सर चढ़ कर बोल रही है। उनकी पारस आवाज़ जिस किसी भी गीत को छू रही है, वही सोने में तबदील हो रही है। 2014 में अरिजीत के गाए सबसे कामयाब गीत ’हम्प्टी शर्मा की दुल्हनिया’ में "मैं तैनु समझावाँ जी" और ’मैं तेरा हीरो’ का शीर्षक गीत रहा है। अरिजीत की आवाज़ में एक कशिश है जो उन्हें भीड से अलग करती है। सेन्सुअस गीत उनकी आवाज़ में बड़े ही प्रभावशाली सिद्ध हुए हैं। इसी बात को ध्यान में रख कर फ़िल्म ’ज़िद’ के संगीतकार शरीब-तोशी ने उनसे इस फ़िल्म का एक सेन्सुअस गीत गवाया, जिसे उन्होंने बख़ूबी निभाया। इस गीत को सुन कर महेश भट्ट और इमरान हाश्मी की वो तमाम फ़िल्में याद आने लगती हैं जिनमें इस तरह के पुरुष आवाज़ वाले सेन्सुअस गीत हुआ करते थे। तो सुनिए यह गीत और खो जाइए इस गीत की मेलडी में।

(नीचे दिये गए लिंक पर क्लिक करें और गीत का वीडियो देखें)



10: "सोनिए..." (Heartless)

Gaurav Dagaonkar
शेखर सुमन ने दूसरी बार अपने बेटे अध्ययन सुमन को लौंच करने के लिए फ़िल्म बनाई ’Heartless' पर इस बार भी क़िस्मत ने उनका साथ नहीं दिया। फ़िल्म डूब गई और साथ ही डूब गया अध्ययन सुमन के हिट फ़िल्म पाने का सपना। इस फ़िल्म के संगीतकार गौरव दगाँवकर ने अच्छा काम किया, पर उनके संगीत की तरफ़ कुछ ख़ास ध्यान नहीं दिया गया। इस फ़िल्म में के.के का गाया एक गीत है "सोनिए" जिसे तवज्जो मिलनी चाहिए थी। गीत सुन कर के.के की ही आवाज़ में फ़िल्म ’अक्सर’ का गीत "सोनिए" याद आ जाती है, पर यह गीत बिल्कुल नया और अलग अंदाज़ का है। यूथ-अपील से भरपूर यह गीत अगर सफल होती तो यंग्‍ जेनरेशन को ख़ूब भाती इसमें कोई संदेह नहीं है। आप भी सुनिए और ख़ुद निर्णय लीजिए।



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9: "मुस्कुराने के बहाने ढूंढ़ती है ज़िन्दगी..." (अनुराधा)

कविता कृष्णमूर्ति एक ऐसी गायिका हैं जिनकी आवाज़ और गायकी उत्कृष्ट होने के बावजूद फ़िल्म संगीतकारों ने उनकी आवाज़ का सही-सही उपयोग नहीं किया। इसका क्या कारण है बताना मुश्किल है। पर जब भी कविता जी को कोई "अच्छा" गीत गाने का मौका मिला, उन्होंने सिद्ध किया कि मधुरता और गायकी में उनकी आवाज़ आज भी सर्वोपरि है। 2014 में एक फ़िल्म बनी ’अनुराधा’ जिसमें उनका गाया एक दार्शनिक गीत है "मुस्कुराने के बहाने ढूंढ़ती है ज़िन्दगी"। कम से कम साज़ों के इस्तमाल की वजह से उनकी आवाज़ खुल कर सामने आयी है इस गीत में और उनकी क्लासिकल मुड़कियों को भी साफ़-साफ़ सुनने का अनुभव होता है इस गीत में। शास्त्रीय रंग होते हुए भी एक आधुनिक अंदाज़ है इस गीत में, जिस वजह से हर जेनरेशन को भा सकता है यह गीत। काश कि इस फ़िल्म और इस गीत पर लोगों का ध्यान गया होता! अफ़सोस! ख़ैर, आज आप इस गीत को सुनिए....

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8: "दिल आजकल मेरी सुनता नहीं..." (पुरानी जीन्स)

Ram Sampath
के.के की आवाज़ इस हिट परेड में बार-बार लौट कर आ रही है, इसी से यह सिद्ध होता है कि कुछ बरस पहले जिस तरह से वो एक अंडर-रेटेड गायक हुआ करते थे, आज भी आलम कुछ बदला नहीं है। के.के कभी लाइम-लाइट में नहीं आते, पर हर साल वो कुछ ऐसे सुरीले गीत गा जाते हैं जो अगर आज नहीं तो कुछ सालों बाद ज़रूर लोग याद करेंगे इनकी मेलडी के लिए। तनुज विरवानी पर फ़िल्माया "दिल आजकल मेरी सुनता नहीं" फ़िल्म ’पुरानी जीन्स’ का सबसे कर्णप्रिय गीत है। राम सम्पथ के संगीत निर्देशन में यह गीत एक बार फिर से युवा-वर्ग का गीत है जो पहले प्यार का वर्णन करने वाले गीतों की श्रेणी का गीत है। हर दौर में इस थीम पर गीत बने हैं और यह गीत इस नए दौर का प्रतिनिधि गीत बन सकता है। सुनते हैं यह गीत।


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https://www.youtube.com/watch?v=5MNyvM3_yio 


तो यह थी नववर्ष की हमारी विशेष प्रस्तुति का पहला भाग। दूसरा भाग कल के अंक में प्रस्तुत किया जाएगा। आशा है आपको हमारी यह कोशिश पसन्द आई होगी। अपनी राय टिप्पणी में ज़रूर लिखें। चलते चलते हाप सभी को नववर्ष की एक बार फिर से शुभकामनाएँ देते हुए विदा लेता हूँ, नमस्कार।



प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र

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