रविवार, 14 दिसंबर 2014

‘कैसे कटे रजनी अब सजनी...’ : SWARGOSHTHI – 198 : RAG BAGESHRI


 
स्वरगोष्ठी – 198 में आज


शास्त्रीय संगीतज्ञों के फिल्मी गीत – 7 : राग बागेश्री


उस्ताद अमीर खाँ ने गाया बाँग्ला फिल्म में राग बागेश्री के स्वरों में खयाल- ‘कैसे कटे रजनी...’







‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी है, हमारी लघु श्रृंखला, ‘शास्त्रीय संगीतज्ञों के फिल्मी गीत’। फिल्म संगीत के क्षेत्र में चौथे से लेकर आठवें दशक के बीच शास्त्रीय संगीत के कई विद्वानों और विदुषियों ने अपना योगदान किया है। छठें दशक के फिल्म संगीत में इस प्रकार के गीतों की संख्या अधिक थी। इस श्रृंखला में हमने कुछ ऐसे ही फिल्मी गीतों का चुनाव किया है, जिन्हें रागदारी संगीत के प्रयोक्ताओं और विशेषज्ञों ने रचा है। इन रचनाओं में राग के स्पष्ट स्वरूप की उपस्थिति मिलती है। श्रृंखला के सातवें अंक में आज हम आपसे 1960 में प्रदर्शित बाँग्ला फिल्म ‘क्षुधित पाषाण’ के एक गीत पर चर्चा करेंगे। फिल्म का यह गीत राग बागेश्री कामोद के स्वरों में पिरोया गया है। सुविख्यात गायक उस्ताद अमीर खाँ और बाँग्ला गीतों की सुप्रसिद्ध गायिका प्रतिमा बनर्जी ने इस गीत को स्वर दिया है। फिल्म के संगीतकार मैहर घराने के संवाहक उस्ताद अली अकबर खाँ थे। राग बागेश्री के स्वरूप का एक अलग रंग का अनुभव कराने के लिए सुप्रसिद्ध गायक उस्ताद राशिद खाँ के स्वरों में द्रुत खयाल की एक रचना भी प्रस्तुत कर रहे हैं।



उस्ताद अमीर खाँ 
विगुरु रवीन्द्रनाथ ठाकुर की कथाओं पर कई नाटकों और फिल्मों की रचना हुई है। वर्ष 1960 में उनकी एक कथा पर विख्यात फिल्म-शिल्पी तपन सिन्हा के निर्देशन में फिल्म ‘क्षुधित पाषाण’ का निर्माण किया गया था। फिल्म की मुख्य भूमिका में सौमित्र चटर्जी और अरुन्धति देवी ने अभिनय किया था। फिल्म की कहानी के केन्द्र में एक शापित हवेली है, जिसमें एक सरकारी कारिन्दा उलझ जाता है। इस फिल्म का सर्वाधिक उललीखनीय पक्ष इसका संगीत है। मैहर परम्परा के उस्ताद अली अकबर खाँ फिल्म के संगीतकार थे। फिल्मी संगीत-नृत्य से अलग हटकर संगीत के मौलिक शास्त्रीय स्वरूप को बनाए रखा गया था। इससे पूर्व विश्वविख्यात फ़िल्मकार सत्यजीत रॉय 1958 की बाँग्ला फिल्म ‘जलसाघर’ में भी ऐसा ही प्रयोग कर चुके थे, जिसके संगीतकार सुप्रसिद्ध सितारवादक उस्ताद विलायत खाँ थे।

उस्ताद अली अकबर खाँ 
तपन सिन्हा के निर्देशन में बनी फिल्म ‘क्षुधित पाषाण’ के संगीतकार उस्ताद अली अकबर खाँ बाबा अलाउद्दीन खाँ के सुपुत्र थे। उनका जन्म तो हुआ था त्रिपुरा में, किन्तु जब वे एक वर्ष के हुए तब बाबा अलाउद्दीन खाँ सपरिवार मैहर जाकर बस गए। उनके संगीत की पूरी शिक्षा-दीक्षा मैहर में हुई थी। बाबा के कठोर अनुशासन में ध्रुवपद, धमार, खयाल, तराना और अपने चाचा फकीर आफताबउद्दीन से अली अकबर को पखावज और तबला वादन की शिक्षा मिली। नौ वर्ष की आयु में उन्होने सरोद वाद्य को अपना मुख्य लक्ष्य बनाया और साधनारत हो गए। एक दिन अली अकबर बिना किसी को कुछ बताए मुम्बई (तत्कालीन बम्बई) चले गए। बाबा से उन्हें सरोद वादन की ऐसी उच्चकोटि की शिक्षा मिली थी कि एक दिन रेडियो से उनके सरोद वादन का कार्यक्रम प्रसारित हुआ, जिसे मैहर के महाराजा ने सुना और उन्हें वापस मैहर बुलवा लिया। 1936 के प्रयाग संगीत सम्मेलन में अली अकबर खाँ ने भाग लिया। इस सम्मेलन में उनके द्वारा प्रस्तुत राग ‘गौरी मंजरी’ को विद्वानों ने खूब सराहा। इसमें राग नट, मंजरी और गौरी का अनूठा मेल था। कुछ समय तक आप आकाशवाणी के लखनऊ केन्द्र पर भी कार्यरत रहे। इसके अलावा कई वर्षों तक महाराजा जोधपुर के दरबार में भी रहे। उस्ताद अली अकबर खाँ ने राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भरपूर ख्याति अर्जित की। उदयशंकर की नृत्य-मण्डली के साथ उन्होने पूरे भारत के साथ-साथ पश्चिमी देशों का भ्रमण किया। 1956 में उन्होने ‘अली अकबर खाँ कॉलेज ऑफ म्यूजिक’ की स्थापना की थी, जिसकी शाखाएँ विदेशों में आज भी सक्रिय हैं। खाँ साहब की भागीदारी फिल्म संगीत के क्षेत्र में भी रही। कई हिन्दी और बांग्ला फिल्मों में उन्होने संगीत रचनाएँ की, जिनमें 1952 की हिन्दी फिल्म ‘आँधियाँ’ और 1960 की बांग्ला फिल्म ‘क्षुधित पाषाण’ संगीत की दृष्टि से बेहद सफल फिल्में थीं। फिल्म ‘क्षुधित पाषाण’ में उन्होने एक गीत छोटा खयाल के रूप में शामिल किया था, जिसे उस्ताद अमीर खाँ और प्रतिमा बनर्जी ने राग बागेश्री में गाया था। आइए, पहले वही गीत सुनते है-


राग – बागेश्री : ‘कैसे कटे रजनी अब सजनी...’ : उस्ताद अमीर खाँ और प्रतिमा बनर्जी : फिल्म - क्षुधित पाषाण





उस्ताद राशिद खाँ 
राग बागेश्री भारतीय संगीत का अत्यन्त मोहक राग है। कुछ लोग इस राग को बागेश्वरी नाम से भी पुकारते हैं, किन्तु सुप्रसिद्ध गायिका विदुषी गंगूबाई हंगल के मतानुसार इस राग का नाम बागेश्री अधिक उपयुक्त होना चाहिए। इस राग को काफी थाट से अन्तर्गत माना जाता है। राग के वर्तमान प्रचलित स्वरूप के आरोह में ऋषभ स्वर वर्जित होता है और पंचम स्वर का अल्पत्व प्रयोग किया जाता है। अवरोह में सातों स्वर प्रयोग होते हैं। इस प्रकार यह राग षाड़व-सम्पूर्ण जाति का होता है। कुछ विद्वान आरोह में ऋषभ के साथ पंचम स्वर भी वर्जित करते हैं। इस राग में गान्धार और निषाद स्वर कोमल तथा शेष स्वर शुद्ध प्रयोग किए जाते हैं। कर्नाटक पद्यति में इस राग के समतुल्य राग नटकुरंजी है, जिसमें पंचम स्वर का प्रयोग नहीं किया जाता। राग बागेश्री में यदि पंचम और कोमल निषाद का प्रयोग न किया जाए तो यह राग आभोगी की अनुभूति कराता है। राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। रात्रि के दूसरे प्रहर विशेष रूप से मध्यरात्रि में इस राग का सौन्दर्य खूब निखरता है। इस राग में भक्ति और श्रृंगार रस की रचनाएँ भली लगती है। अब हम आपको राग बागेश्री की एक मोहक बन्दिश का रसास्वादन कराते हैं। इसे प्रस्तुत कर रहे हैं, सुप्रसिद्ध गायक उस्ताद राशिद खाँ। संगीतज्ञ उस्ताद राशिद खाँ रामपुर सहसवान घराने की गायकी के संवाहक हैं और इस घराने के संस्थापक उस्ताद इनायत हुसैन खाँ के प्रपौत्र हैं। उन्होने अपने नाना उस्ताद निसार हुसैन खाँ से गुरु-शिष्य परम्परा के अन्तर्गत संगीत की विधिवत शिक्षा ग्रहण की है। आइए, प्रतिभा के धनी गायक उस्ताद राशिद खाँ से सुनते हैं, राग बागेश्री की यह श्रृंगार रस से अभिमंत्रित, आकर्षक रचना। द्रुत एकताल में निबद्ध इस खयाल रचना के बोल हैं- ‘अपनी गरज पकर लीन्ह बइयाँ मोरी....’। आप राग बागेश्री का आनन्द लीजिए और मुझे आज इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग – बागेश्री : ‘अपनी गरज पकर लीन्ह बइयाँ मोरी....’ : उस्ताद राशिद खाँ : द्रुत एकताल






आज की पहेली 


‘स्वरगोष्ठी’ के 198वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको अस्सी के दशक में बनी एक फिल्म के राग आधारित युगलगीत का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 200वें अंक की समाप्ति तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा तथा वर्ष 2014 में सर्वाधिक अंक अर्जित करने वाले प्रतिभागी को वार्षिक विजेता घोषित किया जाएगा।



1 – गीत का यह अंश सुन कर बताइए कि इस अंश में आपको किस राग की झलक मिल रही है?

2 – यह गीत किस ताल में निबद्ध है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार 20 दिसम्बर, 2014 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 200वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता 


‘स्वरगोष्ठी’ की 196वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपकोफिल्म ‘रागिनी’ के लिए उस्ताद अमानत अली खाँ और फतेह अली खाँ के युगल स्वरों में एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग कामोद और पहेली के दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल द्रुत तीनताल। पहेली के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी, जबलपुर से क्षिति तिवारी और पेंसिलवानिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात 


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी लघु श्रृंखला ‘शास्त्रीय संगीतज्ञों के फिल्मों गीत’ के माध्यम से हम भारतीय संगीत जगत के मूर्धन्य कलासाधकों के द्वारा उनके फिल्म संगीत के क्षेत्र में किये गए योगदान को रेखांकित कर रहे हैं। इस श्रृंखला के बारे में आपके सुझाव सादर आमंत्रित हैं। नए वर्ष से ‘स्वरगोष्ठी’ स्तम्भ के अन्तर्गत आप क्या पढ़ना और सुनना चाहते हैं, हमे आविलम्ब लिखें। अपनी पसन्द के विषय और गीत-संगीत की फरमाइश अथवा अगली श्रृंखलाओं के लिए आप किसी नए विषय का सुझाव भी दे सकते हैं। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 

शनिवार, 13 दिसंबर 2014

गायिका अनुराधा पौडवाल के बचपन और शुरुआती दौर की स्मृतियाँ


स्मृतियों के स्वर - 13

गायिका अनुराधा पौडवाल के बचपन और शुरुआती दौर की स्मृतियाँ





'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! दोस्तों, एक ज़माना था जब घर बैठे प्राप्त होने वाले मनोरंजन का एकमात्र साधन रेडियो हुआ करता था। गीत-संगीत सुनने के साथ-साथ बहुत से कार्यक्रम ऐसे हुआ करते थे जिनमें कलाकारों से साक्षात्कार करवाये जाते थे और जिनके ज़रिये फ़िल्म और संगीत जगत के इन हस्तियों की ज़िन्दगी से जुड़ी बहुत सी बातें जानने को मिलती थी। गुज़रे ज़माने के इन अमर फ़नकारों की आवाज़ें आज केवल आकाशवाणी और दूरदर्शन के संग्रहालय में ही सुरक्षित हैं। मैं ख़ुशक़िस्मत हूँ कि शौकिया तौर पर मैंने पिछले बीस वर्षों में बहुत से ऐसे कार्यक्रमों को लिपिबद्ध कर अपने पास एक ख़ज़ाने के रूप में समेट रखा है। 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' पर, महीने के हर दूसरे शनिवार को इसी ख़ज़ाने में से मैं निकाल लाता हूँ कुछ अनमोल मोतियाँ, हमारे इस स्तम्भ में, जिसका शीर्षक है - 'स्मृतियों के स्वर', जिसमें हम और आप साथ मिल कर गुज़रते हैं स्मृतियों के इन हसीन गलियारों से। आज की कड़ी में प्रस्तुत है पार्श्वगायिका अनुराधा पौडवाल से एक मुलाक़ात के अंश जिसमें वो बता रही हैं अपने बचपन और करीयर के शुरुआती दिनों के बारे में।




सूत्र: 'सरगम के सितारे', विविध भारती

प्रसारण तिथि: 18 अगस्त 2007


सबसे पहले तो हम यह जानना चाहते हैं कि अनुराधा जी को कब पता चला कि वो इतना सुन्दर गाती हैं। परिवार में गाने का माहौल था?  कैसे इतना सुरीला गला आपने पाया?

मुझे गाने का तो बचपन से ही शौक रहा है, और बहुत ही छुटपन से, मतलब, मुझे याद भी नहीं है कि किस उम्र से मुझे गाना अच्छा लगने लगा, लेकिन हमेशा से मुझे, मतलब, म्युज़िक की मुझे, बहुत पसन्द था और विशेष रूप से मेरी माताजी जो हैं, मिसेस नादकर्नी, तो वो हमेशा से उनको गाने का बहुत शौक था और वो ओमकारनाथ जी की शिष्या थीं। लेकिन जैसा कि आप जानते हैं कि उन दिनों में वो म्युज़िक करीयर को परस्यू नहीं कर पायीं, तो जब उन्होंने देखा कि मुझे बहुत शौक है गाने का तो उनकी बहुत तमन्ना थी कि मैं सिंगर बनूँ। वो कोशिश करके कहीं मुझे प्रोग्राम में ले जाना, तो उनकी हमेशा तमन्ना यही रही कि मैं एक सिंगर बनूँ। और क्योंकि जिस फ़ैमिली को मैं बिलांग करती हूँ, मतलब, मेरे फ़ादर के साइड से, मतलब, उन्हें किसी को गाने का शौक नहीं था। उनका बहुत ज़्यादा ध्यान एजुकेशन का था, वो हमेशा कहते थे कि ठीक है, एक शौकिया गाने तक ठीक है, लेकिन मेन एडुकेशन होना चाहिये। लेकिन जहाँ-जहाँ पे मौके मिलते थे, वहाँ-वहाँ पे मैं स्टेज प्रोग्राम्स करती थी।


तो पहले आपने स्कूल में गाया?

नहीं, पहली बार जो मैंने गाया, मतलब, महिला-मंडल होती है न, तो मेरी मासी, वो एक मेम्बर थीं महिला-मंडल की, तो जब मैं पाँच साल की थी तो पहला परफ़ॉर्मैन्स वहाँ किया था। फिर जैसे गणपति उत्सव जैसे होते हैं, उस तरह के प्रोग्राम्स मैंने काफ़ी किये।


अच्छा आपको वह गीत याद होगा जो पाँच साल की उम्र में आपने गाया था महिला-मंडल के उस शो में?

एक मराठी गीत था, "आलो शरण तुला भगवन्ता घेइ कुशित तुऴ्या भगवन्ता..."


अच्छा जब इतनी प्रशंसा मिली होगी, आप इतनी छोटी थीं कि आपको तो पता नहीं होगा कि माँ ने कहा कि गाना गाओ तो गा दिया होगा, लेकिन कभी दिल में यह नहीं आया होगा कि आगे मैं यही बनूंगी, यानी गायिका?

जी, वही मैं कहने जा रही थी, कि वैसे तो हमने, मतलब मैंने कभी मन में ऐसा नहीं सोचा था कि मुझे सिंगर ही बनना है क्योंकि आज आप देखेंगे कि, almost if not all, हर दूसरे घर का कोई न कोई फ़िल्म से या टेलीविज़न से या रेडियो से जुड़ा हुआ है, नहीं तो DJ है या कम्पेयरर है, किसी न किसी रूप में है। तो उस वक़्त ऐसा नहीं था। तो हमेशा हम लोगों को ऐसा लगता कि अच्छे घर के लोग फ़िल्म इंडस्ट्री में नहीं जाते हैं वगेरह। शादी तक तो सवाल ही नहीं उठता कि इस बारे में सोचूँ लेकिन जब मेरी शादी अरुण पौडवाल जी से हुई और वो इसी इंडस्ट्री के थे और he was a musician, music director भी थे, तो उसके बाद फिर भी नैचरली और बिल्कुल बाइ चान्स मैं इस इंडस्ट्री में आयी हूँ। उनको पसन्द तो था लेकिन उन्होंने भी ऐसे नहीं सोचा था कि पत्नी कोई प्लेबैक सिंगर बने। लेकिन उनके पिताजी जो थे, यानी मेरे ससुर जी, उनको बहुत ज़्यादा शौक था। मैं तो यह कहूंगी कि उनको शौक क्या, उनका तो सपना था कि मैं प्लेबैक सिंगर बनूँ। और यह बड़ी रेयर चीज़ है क्योंकि माता-पिता के तो बहुत ज़्यादा सपने होते हैं कि उनकी बेटी कुछ बने लेकिन यह बहुत रेअर केस होती है कि सास-ससुर इनको यह तमन्ना हो कि मेरी बहु एक दिन एक सिंगर बने।


जो कि बहुत सौभाग्य की बात है!

बिल्कुल बिल्कुल! और मुझे लगता है कि आज जो भी कुछ मैं हूँ तो मेरी माँ की तो ब्लेसिंग्स है ही, लेकिन साथ-साथ मेरे ससुर जी, सासु माँ, मेरे गुरु, उनकी जो तमन्ना थी उसकी वजह से यह सच हुआ है।


बड़ों का आशिर्वाद तो हमेशा साथ देता है!

बिल्कुल बिल्कुल!


अनुराधा जी, यह पूछना चाहूंगी कि आपने सीखना कब शुरू किया शास्त्रीय संगीत?

बचपन से जेनरली महाराष्ट्रियन घरों में आपने तो देखा होगा कि संगीत सिखाते हैं, तो इससे मुझे लगता है कि शायद 6-7 साल की थी, तब से मैंने गाना सीखना शुरु किया, सीखना मतलब क्या, वह क्लास में जाते थे और उस तरह का। ऐसे कि गुरु करके, ऐसा तो था नहीं, ऐट नो स्टेज।


ऐसा कहा जाता है कि हमने कई लोगों से बात भी की है जो गायक हैं, कि वो कहते हैं कि पूरी तरह ध्यान लगाते हैं, जो गायक होते हैं, गायिका होते हैं, सब कुछ भूल के अपने गुरु के साथ संगीत, और आपके साथ ऐसा नहीं हुआ?

ऐसा ऐक्चुअली होना चाहिये, लेकिन मेरे साथ ऐसा संभव इसलिए नहीं हुआ क्योंकि मैं हमेशा, मतलब पहले मैं फ़मिली में आयी, मेरी अपनी फ़ैमिली, मेरे बच्चे, पति, हमारी जॉयन्ट फ़ैमिली थी, तो उस वजह से थोड़ा जितना मैं रियाज़ कर सकती थी, उतना मैंने किया। लेकिन यह देखते हुए मुझे लगता है कि ईश्वर ने मुझे संगीत से नवाज़ा है और मुझे अपने आप को बहुत लकी समझती हूँ कि बहुत बड़ी कृपा है परमात्मा की। as a house wife, as a daughter, as a mother, मेरी responsibilities बहुत ज़्यादा हैं। पर जैसे जैसे गाने मिलते गये, मैं गाती गयी, लेकिन I was lucky enough कि गाने मिलते भी गये। अच्छा एक बात और! आजकल जो लोग करीयर को प्रायरिटी देते हैं, इसमें डेफ़िनिटली यह बात है लेकिन इतना मैं इतना ज़रूर कहना चाहूंगी इसमें कि पर्सनली, यह पर्सनली as a working woman मुझे लगता है कि profession important है लेकिन family is more important।


यह बहुत अच्छी बात कही आपने क्योंकि प्रेफ़ेशन की भी अपनी एक सीमा होती है।

जी, प्रोफ़ेशन, मैं उन लोगों के लिए यह नहीं बोलती हूँ जिनके लिए प्रोफ़ेशन एक ज़रूरत है, जैसे कि आप देखते हैं कि जिनके लिए यह रोज़ी-रोटी का ज़रिया है, you have no option, अगर रोटी का सवाल नहीं है then I think we should keep the family at first।


कैसी थीं अनुराधा पौडवाल जब वो छोटी थीं? बहुत शैतान थीं? पडः़आई में मन लगता था या गाने गुनगुनाती हुई इधर उधर लगी रहती थीं?

पढ़ाई का exactly शौक तो मैं नहीं खऊंगी लेकिन ऐसा भी नहीं था कि पढ़ाई को अन्देखा करती थी, normal, natural जैसे होता है, more inclined towards artistic, जैसे कि कोई artistic चीज़ें बनाना, जैसे crafts है या संगीत है। कला के तरफ़ झुकाव था।


शैतानी नहीं करती थीं? 

नहीं (हँसते हुए)।


पढ़ाई में आप, क्योंकि मुंबई में ही आप रहती थीं, तो आपको गाने का मौका आपको और अच्छा मिला, क्योंकि बहुत छोटी-छोटी जगहों पर लोग रहते हैं, उस समय मुंबई में रहने से और संगीत जानने से आपको कितना फ़ायदा मिला, आपको यहाँ मौके कितने मिले?

उस वक़्त मैंने, शादी के बाद सबसे पहले फ़िल्म 'अभिमान' के लिए गाया। उसके बाद फिर, लेकिन उससे पहले एक वाक्या आपको बता देना चाहती हूँ कि आज जब हम यहाँ AIR पे हैं, और एक तरीके से मेरा जो करीयर है वह रेडियो से शुरु हुआ, वह किस तरह से मैं बताती हूँ आपको। 'युवा-वाणी' करके एक प्रोग्राम आता था, जो बहुत ज़्यादा पॉपुलर था और उसके बाद एक और मराठी 'आपली आवड' करके एक प्रोग्राम होता था, which was very popular। तो मैंने 'युवा-वाणी' में एक गीत गाया जो उन्होंने 'युवा-वाणी' और 'आपली आवड' के बिल्कुल जंक्शन पे रखा था। 10 को 5 मिनट कम तो मेरा गाना, उन्होंने प्ले किया था जो मैंने रेडियो के लिए गाया था, और उस गीत को काफ़ी सारे म्युज़िक डिरेक्टर्स ने, जैसे लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल हैं, हृदयनाथ मंगेशकर जी हैं, फिर और काफ़ी सारे लोगों ने, बप्पी लाहिड़ी जी हैं, तो उन्होंने वह गीत सुना और उन्होंने मुझे फ़ोन करके बुलाया लेकिन मैं उस वक़्त प्रोफ़ेशनली नहीं गाती थी। तन उन्होंने मुझे कहा कि जिस वक़्त आप प्रोफ़ेशनली शुरु करो तो आप बताइये, we would like to record you।


अच्छा तो फिर यह प्रोफ़ेशनली आप कैसे आयीं? पहला मौका किसने दिया?

पहला मौका मुझे इस तरह मिला कि अरुण जी, मेरे पति म्युज़िक डिरेक्टर थे और वो एस. डी. बर्मन के लिए असिस्टैण्ट भी थे। उन्हें बहुत शौक था कि वो जब भी कुछ कम्पोज़ करते थे, पहले मेरी आवाज़ में वो घर के टेप-रेकॉर्डर पे वो टेप करते थे कि कैसा लगता है। उन दिनों में 'अभिमान' फ़िल्म का बैकग्राउण्ड चल रहा था। इसके लिए बर्मन दादा ने इनको कुछ कम्पोज़ करने के लिए बोला था। एक शिव जी की स्तुति थी जो उन्हें रेकॉर्ड करनी थी। शिव जी की स्तुति उन्होंने रेकॉर्ड की उनके टेप-रेकॉर्डर पे, जिस वक़्त उन्होंने बर्मन दादा को सुनाया, तो बर्मन दादा ने कहा कि तुमने इसके पहले क्यों नहीं बताया कि तुम्हारी बीवी गाती है? तो उसी की आवाज़ में हम इसको रेकॉर्ड करते हैं, और इस तरह से हृषी दा की फ़िल्म 'अभिमान; में मैंने वह शोल्क गाया।


ज़रा गा कर सुनायेंगी वह श्लोक?

(गाती हुईं) "ओम्कारम्‍ बिन्दु संयुक्तम्‍ नित्यम्‍ ध्यायन्ती योगिन:, कामनदम्‍ मोक्षदम्‍ कैव ओम्काराय नमो नम:"। तो इसको सुन के उस वक़्त फ़िल्म इंडस्ट्री छोटी थी, दो तीन ही स्टुडियोस थे, 'फ़ेमस', 'फ़िल्म सेन्टर', तो जयदेव जी को पता चला, उन्होंने बुलाया। केवल तीन दिन बाद ही जयदेव जी ने मुझे बुलाया और मुझे एक पूरा गाना गाने का मौका दिया। वह मेरा पहला फ़िल्मी गीत था और वह भी महान गायक मुकेश जी के साथ। मुकेश जी ने मेरा हौसला बढ़ाया और उनके साथ मेरा पहला गाना रेकॉर्ड हुआ।



कॉपीराइट: विविध भारती



तो दोस्तों, आज बस इतना ही। आशा है आपको यह प्रस्तुति पसन्द आयी होगी। अगली बार ऐसे ही किसी स्मृतियों की गलियारों से आपको लिए चलेंगे उस स्वर्णिम युग में। तब तक के लिए अपने इस दोस्त, सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिये, नमस्कार! इस स्तम्भ के लिए आप अपने विचार और प्रतिक्रिया नीचे टिप्पणी में व्यक्त कर सकते हैं, हमें अत्यन्त ख़ुशी होगी।



प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

रविवार, 7 दिसंबर 2014

‘छेड़ दिये मेरे दिल के तार क्यों...’ : SWARGOSHTHI – 197 : RAG KAMOD



स्वरगोष्ठी – 197 में आज

शास्त्रीय संगीतज्ञों के फिल्मी गीत – 6 : राग कामोद


पार्श्वगायक किशोर कुमार के लिए जब उस्ताद अमानत अली खाँ ने स्वर दिया




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी है, हमारी लघु श्रृंखला, ‘शास्त्रीय संगीतज्ञों के फिल्मी गीत’। फिल्म संगीत के क्षेत्र में चौथे से लेकर आठवें दशक के बीच शास्त्रीय संगीत के कई विद्वानों और विदुषियों ने अपना योगदान किया है। छठें दशक के फिल्म संगीत में इस प्रकार के गीतों की संख्या अधिक थी। इस श्रृंखला में हमने कुछ ऐसे ही फिल्मी गीतों का चुनाव किया है, जिन्हें रागदारी संगीत के प्रयोक्ताओं और विशेषज्ञों ने रचा है। इन रचनाओं में राग के स्पष्ट स्वरूप की उपस्थिति मिलती है। श्रृंखला के छठें अंक में आज हम आपसे 1958 में प्रदर्शित नृत्य प्रधान फिल्म ‘रागिनी’ के एक गीत पर चर्चा करेंगे। फिल्म का यह गीत राग कामोद के स्वरों में गूँथा गया है। पटियाला घराने के युगल गायक उस्ताद अमानत अली खाँ और फतेह अली खाँ ने इस गीत को स्वर दिया है। फिल्म के संगीतकार ओ.पी. नैयर ने इस गीत का प्रयोग मंच पर अभिनेत्री-नृत्यांगना पद्मिनी द्वारा प्रदर्शित किये जाने वाले नृत्य के लिए किया था। इस गीत के साथ ही राग कामोद के स्वरूप को स्पष्ट करने के लिए सुप्रसिद्ध युगल गायक पण्डित राजन और साजन मिश्र के स्वरों में इस राग की एक मोहक बन्दिश भी प्रस्तुत कर रहे हैं।



उस्ताद अमानत अली व फतेह अली खाँ
ओ.पी. नैयर 
फिल्म संगीत के क्षेत्र में सफलतम संगीतकारों की सूची ओ.पी. नैयर के नाम के बिना अधूरी रहेगी। उनके सांगीतिक जीवन से जुड़े कई अनोखे तथ्य रहे हैं, जिनकी चर्चा समय-समय पर होती रही है। इनमें सर्वाधिक उल्लेखनीय तथ्य यह है कि नैयर साहब ने अपने लम्बे सांगीतिक जीवन में लता मंगेशकर से कभी भी, कोई भी गीत नहीं गवाया। उनके अधिकतर गीतों को शमशाद बेगम, गीता दत्त और आशा भोसले ने अपना स्वर देकर लोकप्रिय बनाया। नैयर के स्वरबद्ध अधिकतर गीत पंजाब के लोक संगीत की धुनों और तालों पर ही आधारित रहे हैं। ओ.पी. नैयर का जन्म 16 जनवरी 1926 को लाहौर में हुआ था। उन्हें विधिवत संगीत शिक्षा प्राप्त नहीं हुई थी, परन्तु अपनी सीखने-समझने की अनूठी क्षमता के कारण बचपन से ही रेडियो पर बाल कार्यक्रमों में गाने लगे थे। फिल्मों में उनका प्रवेश पंजाबी फिल्म ‘दूल्हा भट्ठी’ से हुआ, जिसमें उन्होने संगीतकार गोविन्दराम के निर्देशन में गीत गाये थे। कुछ समय के लिए उन्होने एच.एम.वी. के लिए गायन भी किया और संगीत भी रचे। इस दौर का सबसे लोकप्रिय गीत प्रसिद्ध गायक सी.एच. आत्मा की आवाज़ मे गैर फिल्मी गीत ‘प्रीतम आन मिलो...’ था। इस गीत की संगीत रचना ओ.पी. नैयर ने की थी। विभाजन के बाद नैयर लाहौर छोड़ कर पहले पटियाला और फिर तत्कालीन बम्बई आ गए। 1952 में प्रदर्शित फिल्म ‘आसमान’ में उन्हें अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर मिला। इसी फिल्म के एक गीत को गाने के प्रश्न पर उनका लता मंगेशकर से मतभेद हुआ और आजीवन उन्होने लता से कोई गीत नहीं गवाया।

1958 में नैयर के संगीत निर्देशन में फिल्म ‘रागिनी’ का निर्माण हुआ था। फिल्म में किशोर कुमार शास्त्रीय गायक और अभिनेत्री पद्मिनी शास्त्रीय नृत्यांगना के चरित्र में प्रस्तुत किये गए थे। ऐसे चरित्रों के लिए संगीत में रागों का आधार अनिवार्य था। फिल्म के लिए ओ.पी. नैयर ने लीक से हट कर संगीत तैयार किया। एक प्रसंग में अभिनेत्री पद्मिनी को मंच पर भाव प्रदर्शन के साथ शुद्ध नृत्य के कुछ टुकड़े प्रस्तुत करने थे। गायन संगतकार के रूप में किशोर कुमार अपने एक सहयोगी गायक के साथ थे। नैयर ने इस प्रसंग के लिए राग कामोद का सहारा लेकर गीत रचा था। किशोर कुमार स्वयं एक पार्श्वगायक थे, किन्तु यह गीत उनसे न गवा कर पटियाला घराने के सुप्रसिद्ध गायक उस्ताद अमानत अली खाँ और फतेह अली खाँ से गवाया गया। फिल्म का यह गीत तीनताल में निबद्ध है। लीजिए, पहले आप यह गीत सुनिए।


राग कामोद : ‘छेड़ दिये मेरे दिल के तार क्यों...’ : उस्ताद अमानत अली खाँ और फतेह अली खाँ : फिल्म – रागिनी : संगीत - ओ.पी. नैयर




कल्याणहिं के थाट में दोनों मध्यम लाय,

प-रि वादी-संवादि कर, तब कामोद सुहाय।

पण्डित राजन व साजन मिश्र 
संगीत के विद्यार्थियों को राग के ढाँचे का परिचय देने के उद्देश्य से उपरोक्त दोहे का प्रयोग किया जाता है। इसके साथ ही राग के स्वरों की जानकारी ‘लक्षण गीत’ के माध्यम से भी दी जाती है। आज के अंक में हम आपसे राग कामोद पर चर्चा करेंगे। कल्याण थाट और कल्याण अंग से संचालित होने वाले इस राग को कुछ विद्वान काफी थाट के अन्तर्गत भी मानते हैं। औड़व-सम्पूर्ण जाति के इस राग के आरोह में गान्धार और निषाद स्वर का प्रयोग नहीं किया जाता। अवरोह में दोनों मध्यम का प्रयोग और शेष सभी शुद्ध स्वरों का प्रयोग किया जाता है। इस राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर ऋषभ होता है। राग कामोद के आरोह के स्वर हैं- सा रे प म(तीव्र) प ध प नि ध सां तथा अवरोह के स्वर हैं- सां नि ध प म(तीव्र) प ध प ग म(शुद्ध) रे सा। राग वर्गीकरण के प्राचीन सिद्धान्तों के अनुसार राग कामोद को राग दीपक की पत्नी माना जाता है। इस राग का गायन-वादन पाँचवें प्रहर अर्थात रात्रि के प्रथम प्रहर में किया जाता है। अब आपको इस राग की एक बन्दिश सुप्रसिद्ध युगल गायक पण्डित राजन मिश्र और साजन मिश्र की आवाज़ में प्रस्तुत कर रहे हैं। राग कामोद की यह अत्यन्त प्रचलित परम्परागत रचना है, जिसके बोल हैं- ‘एरी जाने न दूँगी...’। श्रृंगार रस की अभिव्यक्ति के लिए यह आदर्श राग है। इस बन्दिश का उपयोग फिल्म में भी हुआ है। सुप्रसिद्ध साहित्यकार भगवतीचरण वर्मा के चर्चित कथानक ‘चित्रलेखा’ पर आधारित 1964 में इसी नाम से फिल्म बनी थी, जिसमें यह बन्दिश शामिल की गई थी। फिल्म में यह गीत लता मंगेशकर ने रोशन के संगीत निर्देशन में गाया था। यह गीत हम किसी अन्य अवसर पर आपको सुनवाएँगे। अभी आप पण्डित राजन मिश्र और साजन मिश्र के स्वरों में आप राग कामोद की यह खयाल रचना सुनिए और हमे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग – कामोद : ‘एरी जाने न दूँगी...’ : पण्डित राजन मिश्र और साजन मिश्र : तबला संगति – सुधीर पाण्डेय : हारमोनियम संगति – महमूद धौलपुरी





आज की पहेली


 ‘स्वरगोष्ठी’ के 197वें अंक की पहेली में आज हम आपको एक गैर हिन्दी भाषा की भारतीय फिल्म का गीतांश सुनवा रहे हैं। फिल्म में उत्तर भारतीय संगीत शैली में रचे-बसे गीत-संगीत का वर्चस्व था। इस राग रचना को सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। 200वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला (सेगमेंट) का और सभी पाँच श्रृंखलाओं में सर्वाधिक अंक पाने वाले प्रतिभागी को वर्ष 2014 का विजेता घोषित किया जाएगा।




1 – गीत के इस अंश को सुन कर बताइए कि आपको किस राग का अनुभव हो रहा है?

2 – यह रचना किस ताल में निबद्ध है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 13 दिसम्बर, 2014 को मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 199वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत किये गए गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस मंच पर स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 195वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको 1955 में प्रदर्शित फिल्म ‘झनक झनक पायल बाजे’ के एक राग आधारित गीत का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग अड़ाना और पहेली के दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल द्रुत तीनताल। इस बार की पहेली में पूछे गए दोनों प्रश्नो के सही उत्तर पूर्व की भाँति जबलपुर से क्षिति तिवारी, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी और पेंसिलवानिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर इन दिनों हम भारतीय शास्त्रीय संगीत के विद्वानों द्वारा फिल्मों के लिए गाये गए गीतों पर चर्चा कर रहे हैं। वर्ष 2015 से ‘स्वरगोष्ठी’ की श्रृंखलाओं के बारे में हमे अनेक पाठकों और श्रोताओ के बहुमूल्य सुझाव प्राप्त हो रहे हैं। इन सभी सुझाव पर विचार-विमर्श कर हम नये वर्ष से अपनी प्रस्तुतियों में आवश्यक संशोधन करने जा रहे हैं। यदि आपने अभी तक अपने सुझाव और फरमाइश नहीं भेजी हैं तो आविलम्ब हमें भेज दें। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के नये अंक के साथ हम उपस्थित होंगे। अगले अंक भी हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 


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