शनिवार, 13 सितंबर 2014

अनजान की पुण्यतिथि पर बेटे समीर की बाल्य-स्मृति



स्मृतियों के स्वर - 09




अनजान की पुण्यतिथि पर बेटे समीर की बाल्य-स्मृति





'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! दोस्तों, एक ज़माना था जब घर बैठे प्राप्त होने वाले मनोरंजन का एकमात्र साधन रेडियो हुआ करता था। गीत-संगीत सुनने के साथ-साथ बहुत से कार्यक्रम ऐसे हुआ करते थे जिनमें कलाकारों से साक्षात्कार करवाये जाते थे और जिनके ज़रिये फ़िल्म और संगीत जगत के इन हस्तियों की ज़िन्दगी से जुड़ी बहुत सी बातें जानने को मिलती थी। गुज़रे ज़माने के इन अमर फ़नकारों की आवाज़ें आज केवल आकाशवाणी और दूरदर्शन के संग्रहालय में ही सुरक्षित हैं। मैं ख़ुशक़िस्मत हूँ कि शौकीया तौर पर मैंने पिछले बीस वर्षों में बहुत से ऐसे कार्यक्रमों को लिपिबद्ध कर अपने पास एक ख़ज़ाने के रूप में समेट रखा है। 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' पर, महीने के हर दूसरे और चौथे शनिवार को इसी ख़ज़ाने में से मैं निकाल लाता हूँ कुछ अनमोल मोतियाँ हमारे इस स्तंभ में, जिसका शीर्षक है - स्मृतियों के स्वर, जिसमें हम और आप साथ मिल कर गुज़रते हैं स्मृतियों के इन हसीन गलियारों से। आज 13 सितंबर है। आज ही के दिन गीतकार अंजान इस दुनिया को छोड़ गये थे। उनके बेटे और इस दौर के गीतकार समीर की स्मृति में कैसे थे पिता अंजान, आइये आज के इस अंक में हम जाने...




सूत्र: सरगम के सितारे - अंजान की कहानी समीर की ज़ुबानी (विविध भारती)


समीर
"बात यह है कि जब मैं पैदा हुआ, वो (अनजान) तब बम्बई आ गये थे। इसलिए बचपन में मेरी और उनकी बहुत ज़्यादा मुलाक़ातें नहीं हो पायी। मेरी उनसे पहली मुलाक़ात हुई जब मैं 8 या 9 साल का था। वह रिश्ता जो डेवलप होता है, अजीब तरह से पनपता है, अजीब तरह से बड़ा होता है। पहली बार जब मैंने उनको देखा तो मुझे अच्छा लगा कि मैंने अच्छे आदमी को देखा और जब मैं उनके पास गया तो मुझे अच्छी तरह याद है कि उन्होंने मुझे गोद में लिया और मेरे सर पे हाथ रखा और दुआ दी मुझे, और कहा कि क्या करते हो? तो मैं शर्माके भाग गया, मैं यह भी नहीं कहा कि मैं पढ़ता हूँ। मुझे कुछ अजीब सा लगा, गाँव के बच्चे हुआ करते थे कि कोई सवाल करे तो शर्माके भाग जाते थे। उसके बाद जो दूसरी मुलाक़ात हुई उनसे वह भी तकरीबन 8 या 9 साल के बाद हुई। मुझे लगता है कि बचपन से और जवानी की दहलीज़ तक मेरी उनसे मुलाक़ात मुश्किल से 2 या 3 बार ही हुई। अब आप समझ सकते हो कि पिता और पुत्र का जो यह रिश्ता था और दोनो के दर्मियाँ जो एक रिश्ता होना चाहिये, वह कितना अजनबीयत लिए हुए था और कितना डिस्टैन्स लिए हुए था।

यह मैं जानता था कि पापा गीतकार हैं, मगर गीतकार किसे कहते हैं यह मुझे पता नहीं था। हमारे यहाँ, मुझे याद है कि हमारे दादाजी को जब लोग पूछते थे कि आपका बेटा क्या करता है, तो वो कहते थे कि फ़िल्म में गाने लिखता है। हमारे गाँव में यह पापुलर कहावत थी कि नचनिया पगनिया। वो कहते थे कि एक गीतकार को नचनिया पगनिया कहने का मतलब समझ में नहीं आया। बड़े गिरे स्तर का काम करना जिसे कहते हैं, ऐसा लोग मानते थे। पहले फ़िल्मों में काम करने को लोग अच्छा नहीं समझते थे, उनको लगता था कि कहीं जाकर गाने लिखते हैं मेरे पिताजी। और जब मैं बड़ा हुआ और समझने लगा और जब मेरी पहली बार मैंने उनका गाना सुना, मुझे याद है वह गाना, एक तो 'गोदान' के गाने, उसके बाद जो 'गोलकोन्डा के क़ैदी' जो फ़िल्म उन्होंने की थी, उसका गाना, फिर 'लम्बे हाथ' का वह गाना जो, पूरी तरह से अगर मैं कहूँ जो मुझे याद है, वह गाना था "प्यार की राह दिखा दुनिया को, रोके जो नफ़रत की आंधी"। यह गाना मुझे पूरी-पूरी तरह से याद आती है और यह गाना कई बार मैंने बचपन में सुना। मगर यह तमाम गाने कभी आते थे, सालों गुज़र जाये मगर सुनाई नहीं पड़ते थे। और बाक़ी गीतकारों के बहुत सारे गाने आते-जाते रहते थे। तो मुझे ऐसा लगा कि पापा कैसे गाने लिखते हैं कि एक बार सुना तो फिर कई साल तक सुनाई नहीं पड़ते। फिर वह फ़िल्म आयी जिसका मैं कहूँ कि गाना मैंने बहुत बार सुना, तब जाके लगा कि सही मायने में पिताजी एक गीतकार हैं और उन्होंने एक अच्छी फ़िल्म लिखी है। और उस फ़िल्म का नाम था 'बंधन' और गाना था "बिना बदरा के बिजुरिया कैसी चमकी"। और उसके बाद मुझे जहाँ तक याद है, धीरे धीरे उनके बाद जो फ़िल्में आयीं, 'अपने रंग हज़ार', 'डॉन', 'मुक़द्दर का सिकन्दर', ऐसी फ़िल्में।

अंजान
बताना ज़रूरी है कि कितना गर्व का बोध होता था मुझे अपने पिता के बारे में सबको बताते हुए। एक अजीब सी कहानी सुनाऊँगा, एक बहुत मज़ेदार कहानी है कि एक बार स्कूल में मुझसे किसी ने पूछा कि तुम्हारे पिताजी क्या करते हैं? मैंने बोला कि वो गीतकार हैं। पहले तो उसको गीतकार का मतलब ही नहीं समझ में आया। तो बोला कि यह क्या काम होता है? मैंने बोला कि गाने लिखते हैं। तो बोले 'अच्छा अच्छा, कवि हैं'। यह गीतकार क्या होता है, यह मुझे भी नहीं मालूम था। तो एक बात मैंने ध्यान में रख ली कि जब भी बोलूँगा तो यह कि मेरे पिताजी कवि हैं, गीतकार कहूँ तो कोई समझता ही नहीं कि गीतकार क्या होता है। गर्व की बात करते हो तुम तो मैं यह कहूँगा कि जब मैं लोगों से जाके कहता था कि पिताजी गीतकार अंजान हैं तो हँसने लगते थे, कि यह आदमी पागल है, तुम्हारे पिताजी और गीतकार अंजान? हो ही नहीं सकता। क्यों कि हम लोग एक बहुत ही मध्यम श्रेणी के परिवार में रहते थे, ग़रीबी का एक दौर देखा था, और पापा का नाम बहुत बड़ा हो गया था। तो पापा ने कहा कि तुम अपनी बात तो छोड़ो, मैं, जब मीडिया नहीं था, एक्सप्लॉएटेशन नहीं थी, पापा जब जाके कहते थे कि मैं गीतकार अंजान हूँ, बहुत लोगों को संदेह होता था कि यह आदमी कोई और है। आदमी का नाम जो है, उसकी शख़्सियत से बड़ा हो जाता है। जैसे कि अभी मीडिया है, हमको एक्सपोज़र मिलता है, पहचानते हैं, वरना अगर मैं किसी से कहूँ, रास्ते में चलते हुए किसी से कहूँ कि मैं गीतकार समीर हूँ, तो लोगों को लगता है कि यह समीर नहीं हो सकता, क्योंकि उनको समीर नाम से बहुत सारी चीज़ें जुड़ी नज़र आती हैं - मरसीडीस होनी चाहिये, दो-चार लोग आगे-पीछे होने चाहिये, बॉडी-गार्ड होने चाहिए - तब जाकर उनको लगता है कि यह कोई सक्सेसफ़ुल आदमी है, पापुलर है। फिर ऐसा एक दौर आया कि मैंणे उनका नाम ही बताना बन्द कर दिया। भाई यह तो बड़ी अजीब सी बात होती है कि मैं कहता हूँ कि मैं अंजान का बेटा हूँ और सामने वाला उसको यकीन करने के लिए तैयार नहीं है तो बहतर है कि मैं बताऊँ ही नहीं कि मैं गीतकार अंजान का बेटा हूँ। और हर बड़े बाप के बेटे के साथ ऐसी ही स्थिति होती है, बशर्ते यह कि आप बचपन से लेके, जैसा कि मैंने कहा, जवानी तक हमारा उनका सान्निध्य नहीं रहा, हम एक दूसरे के पास नहीं रहे, वो किसी और दुनिया में जीते थे, मैं किसी और दुनिया में जीता था, तो इस दुराव के कारण, दूरी की वजह से हर चीज़ में एक फ़र्क सा होता गया। और इस दूरी की वजह से एक हीनता भी आती थी अन्दर, एक अजीब दौर से हम गुज़रते रहे। फिर भी, ये चीज़ें चलती रहीं, और मैं कहूँ कि इसी वजह से मैं यहाँ तक पहुँचा हूँ, क्योंकि अगर मुझे वो प्लैटफ़ार्म उस वक़्त मिल गया होता जहाँ पापा थे, बड़ी गाड़ियाँ, बड़ा फ़्लैट, पैसा, सब कुछ अगर मिल गया होता, तो शायद आज मैं गीतकार समीर नहीं बन पाया होता। वह दर्द था कहीं ना कहीं, वह जो हीनता की भावना थी, वह जो दूरी थी, वह जो मिलने की प्यास थी, उन तमाम चीज़ों ने मुझे, तमाम बातों ने मुझे यहाँ तक पहुँचाया।"


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ज़रूरी सूचना:: उपर्युक्त लेख 'विविध भारती' के कार्यक्रम का अंश है। इसके सभी अधिकार 'विविध भारती' के पास सुरक्षित हैं। किसी भी व्यक्ति या संस्था द्वारा इस प्रस्तुति का इस्तमाल व्यावसायिक रूप में करना कॉपीराइट कानून के ख़िलाफ़ होगा, जिसके लिए 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' ज़िम्मेदार नहीं होगा।



तो दोस्तों, आज बस इतना ही। आशा है आपको यह प्रस्तुति पसन्द आयी होगी। अगली बार ऐसे ही किसी स्मृतियों की गलियारों से आपको लिए चलेंगे उस स्वर्णिम युग में। तब तक के लिए अपने इस दोस्त, सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिये, नमस्कार! इस स्तम्भ के लिए आप अपने विचार और प्रतिक्रिया नीचे टिप्पणी में व्यक्त कर सकते हैं, हमें अत्यन्त ख़ुशी होगी।


प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

रविवार, 7 सितंबर 2014

‘फूलगेंदवा न मारो...’ : SWARGOSHTHI –184 : THUMARI BHAIRAVI



स्वरगोष्ठी – 184 में आज

फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी – 3 : भैरवी ठुमरी

श्रृंगार रस की ठुमरी को गायक मन्ना डे और संगीतकार रोशन ने हास्य रस में रूपान्तरित किया




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी लघु श्रृंखला ‘फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’ के तीसरे अंक में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत और अभिनन्दन करता हूँ। यह पूर्व में प्रकाशित / प्रसारित श्रृंखला का परिमार्जित रूप है। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के कुछ स्तम्भ केवल श्रव्य माध्यम से प्रस्तुत किये जाते हैं तो कुछ स्तम्भ आलेख और चित्र दृश्य के साथ गीत-संगीत श्रव्य माध्यम से तो कुछ स्तम्भ केवल श्रव्य माध्यम से प्रस्तुत किये जाते हैं। इस श्रृंखला से हम एक नया प्रयोग कर रहे हैं। श्रृंखला के अंकों को हम प्रायोगिक रूप से दोनों माध्यमों में प्रस्तुत कर रहे हैं। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की प्रमुख सहयोगी संज्ञा टण्डन की आवाज़ में पूरा आलेख और गीत-संगीत श्रव्य माध्यम से भी प्रस्तुत किया जा रहा है। हमारे इस प्रयोग पर आप अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दीजिएगा। आज के अंक में हम आपसे पूरब अंग की एक विख्यात ठुमरी गायिका रसूलन बाई के व्यक्तित्व पर और उन्हीं की गायी एक अत्यन्त प्रसिद्ध ठुमरी- ‘फूलगेंदवा न मारो, लगत करेजवा में जाय...’ पर चर्चा करेंगे। इसके साथ ही इस ठुमरी के फिल्म ‘दूज का चाँद’ में संगीतकार रोशन और पार्श्वगायक मन्ना डे द्वारा किये प्रयोग पर भी आपसे चर्चा करेंगे। 
 



रसूलन बाई
बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में पूरब अंग की ठुमरी गायिकाओं में विदुषी रसूलन बाई का नाम शीर्ष पर था। पूरब अंग की उपशास्त्रीय गायकी- ठुमरी, दादरा, होरी, चैती, कजरी आदि शैलियों की अविस्मरणीय गायिका रसूलन बाई बनारस के निकट स्थित कछवाँ बाज़ार (वर्तमान मीरजापुर ज़िला) की रहने वाली थीं और उनकी संगीत शिक्षा बनारस (अब वाराणसी) में हुई थी। संगीत का संस्कार इन्हें अपनी नानी से विरासत में मिला था। रसूलन बाई के संगीत को निखारने में उस्ताद आशिक खाँ, नज्जू मियाँ और टप्पा गायकी के अन्वेषक मियाँ शोरी के खानदान के शम्मू खाँ का बहुत बड़ा योगदान था। पूरब अंग की भावभीनी गायकी की चैनदारी, बोल-बनाव के लहजे, कहन के खास ढंग और ठहराव, यह सारे गुण रसूलन बाई की गायकी में था। टप्पा तो जैसे रसूलन बाई के लिए ही बना था। बारीक मुरकियाँ और मोतियों की लड़ियों जैसी तानों पर उन्हें कमाल हासिल था। उपशास्त्रीय संगीत की आजीवन साधनारत रहने वाली इस स्वरसाधिका को खयाल गायन पर भी कमाल का अधिकार प्राप्त था, परन्तु उन्होने स्वयं को उपशास्त्रीय शैलियों तक ही सीमित रखा और इन्हीं शैलियों में उन्हें भरपूर यश भी प्राप्त हुआ। ग्रामोफोन कम्पनी ने रसूलन बाई के अनेक लोकप्रिय रिकार्ड बनाए। 1935 में उनकी गायी ठुमरी- ‘फूलगेंदवा न मारो, लगत करेजवा में जाय...’ उनके सर्वाधिक लोकप्रिय रिकार्ड में से एक है। आइए, रसूलन बाई के स्वर में राग भैरवी के स्वरों से अनुगूंजित यह ठुमरी सुनते हैं-


ठुमरी भैरवी : ‘फूलगेंदवा न मारो, लगत करेजवा में जाय...’ : रसूलन बाई




रोशन
इसी परम्परागत ठुमरी को 1964 में प्रदर्शित फिल्म ‘दूज का चाँद’ में संगीतकार रोशन ने शामिल किया था, जिसे बहुआयामी गायक मन्ना डे ने अपने स्वरों से एक अलग रंग दिया था। दरअसल संगीतकार रोशन की संगीत शिक्षा लखनऊ के तत्कालीन मैरिस म्यूजिक कॉलेज (वर्तमान भातखण्डे संगीत विश्वविद्यालय) में हुई थी। वे तत्कालीन प्रधानाचार्य डॉ. श्रीकृष्ण नारायण रातंजनकर के प्रिय शिष्यों में रहे। लखनऊ में रह कर रोशन ने पूरब अंग की ठुमरियों का गहराई से अध्ययन किया था। फिल्म ‘दूज का चाँद’ के निर्देशक नितिन बोस एक हास्य प्रसंग में ठुमरी का प्रयोग करना चाहते थे। मूल ठुमरी श्रृंगार रस प्रधान है, किन्तु मन्ना डे ने अपने बोल-बनाव के कौशल से इसे कैसे हास्यरस में अभिमंत्रित कर दिया है, इसका सहज अनुभव आपको ठुमरी सुन कर हो सकेगा। यह ठुमरी हास्य अभिनेता आगा पर फिल्माया गया है। फिल्म के इस दृश्य में आगा अपनी प्रेमिका को रिझाने के लिए गीत के बोल पर ओंठ चलाते हैं और उनके दो साथी पेड़ के पीछे छिप कर इस ठुमरी का रिकार्ड बजाते हैं। बीच में दो बार रिकार्ड पर सुई अटकती भी है। इन क्षणों में मन्ना डे के गायन कौशल का परिचय मिलता है। सुनिए, इस परम्परागत ठुमरी का फिल्मी संस्करण और इसी के साथ आज के इस अंक को यहीं विराम देने की हमें अनुमति दीजिए।


फिल्म – दूज का चाँद : ‘फूलगेंदवा न मारो, लगत करेजवा में चोट...’ : मन्ना डे : संगीत – रोशन




अब आप ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ परिवार की सदस्य संज्ञा टण्डन की आवाज़ में ‘स्वरगोष्ठी’ के इस पूरे अंक के आलेख और संगीत को श्रव्य माध्यम में सुनिए और हमें आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए। आपको हमारा यह प्रयोग कैसा लगा, हमें अवश्य बताइए।


ठुमरी भैरवी : 'फूलगेंदवा ना मारो...' : फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी : वाचक स्वर - संज्ञा टण्डन





आज की पहेली 


‘स्वरगोष्ठी’ के 184वें अंक की पहेली में आज हम आपको एक मशहूर गायिका की आवाज़ में गायी पारम्परिक ठुमरी का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। 190वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।




1 – ठुमरी गायन की इस रचना का अंश सुन कर बताइए कि यह रचना किस राग में निबद्ध है?

2 – यह किस विख्यात गायिका की आवाज़ है? (एक संकेत सूत्र है- ‘इस गायिका की तानें तीनों सप्तकों में फर्राटेदार चलती है।’)

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 186वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 182वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ द्वारा प्रस्तुत राग भैरवी के दादरा का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग भैरवी तथा पहेली के दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल दादरा। इस अंक के दोनों प्रश्नों के सही उत्तर पेंसिलवानिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर से क्षिति तिवारी, चण्डीगढ़ के हरकीरत सिंह, और हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी ने दिया है। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात



मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी है हमारी नई लघु श्रृंखला ‘फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’। इस श्रृंखला में हमने एक नया प्रयोग किया है। ‘स्वरगोष्ठी’ के परम्परागत आलेख, चित्र और गीत-संगीत के आडियो रूप के साथ-साथ सम्पूर्ण आलेख, गीतों के साथ श्रव्य माध्यम से भी प्रस्तुत किया जा रहा है। आपको हमारा यह प्रयोग कैसा लगा? हमें अवश्य लिखिएगा। आगामी अंक में हम एक और परम्परागत ठुमरी और उसके फिल्मी रूप पर चर्चा करेंगे। आप भी अपनी पसन्द के विषय और गीत-संगीत की फरमाइश हमें भेज सकते हैं। हमारी अगली श्रृंखलाओं के लिए आप किसी नए विषय का सुझाव भी दे सकते हैं। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीतानुरागियों की हम प्रतीक्षा करेंगे।


 वाचक स्वर - संज्ञा टण्डन    
आलेख व प्रस्तुति - कृष्णमोहन मिश्र    

शनिवार, 6 सितंबर 2014

"तुम जियो हज़ारों साल...", आशा जी के जन्मदिन पर यही कह कर उन्हें शुभकामनाएँ देते हैं


एक गीत सौ कहानियाँ - 40
 

‘तुम जियो हज़ारों साल...





'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्युटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़ी दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 40वीं कड़ी में आज जानिये फ़िल्म 'सुजाता' के गीत "तुम जियो हज़ारों साल..." के बारे में। 

फ़िल्म-संगीत की एक ख़ास बात यह रही है कि इसमें मानव जीवन के हर रंग को, हर मूड को, हर त्योहार-पर्व को, और रोज़-मर्रा के जीवन के हर पहलू को दर्शाने वाले गीत मौजूद हैं। ये गीत हमारे पारिवारिक, सामाजिक, और धार्मिक जीवन से इस तरह से जुड़े हुए हैं कि अगर इन गीतों को हमारे जीवन से निकाल दिया जाये तो ये पर्व, ये त्योहार बड़े ही बदरंग, बड़े ही सूने से लगने लगेंगे। जन्मदिन पर बजाये या गाये जाने वाले गीत भी बहुत सारे बने हैं समय-समय पर। लेकिन जिन दो गीतों की गिनती सबसे पहले होती रही है, वो हैं फ़िल्म 'फ़र्ज़' का "बार-बार दिन यह आये, बार-बार दिन यह गाये" और दूसरा गीत है फ़िल्म 'सुजाता' का "तुम जियो हज़ारों साल, साल के दिन हों पचास हज़ार"। ये गीत फ़िल्मी गीत होते हुए भी फ़िल्म की कहानी के बाहर भी उतने ही सार्थक हैं। दूसरे शब्दों में यूँ कह सकते हैं कि ये यूनिवर्सल गीत हैं जो हर दौर में, हर समाज में, हर उम्र में समान अर्थ रखते हैं। 'सुजाता' को हिन्दी सिनेमा का एक माइलस्टोन फ़िल्म कहा जा सकता सकता है। इसमें बिमल राय ने नायक सुनील दत्त के एक निम्न जाति की लड़की सुजाता (नूतन द्वारा अभिनीत) से प्यार को दिखाया गया है। 'सुजाता' नाम का चुनाव भी बड़े सोच-समझ कर रखा गया था क्योंकि 'सुजाता' शब्द का अर्थ है 'अच्छी जाति का'। इस फ़िल्म में नूतन के जानदार और दिल को छू लेनेवाले अभिनय ने उन्हें जितवाया उस वर्ष की सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार। गीत-संगीत की बात करें तो सचिनदेव बर्मन के सुरीले संगीत और मजरूह सुल्तानपुरी के अर्थपूर्ण बोलों ने इस फ़िल्म के गीतों को अमर बना दिया है। "जलते हैं जिसके लिए मेरी आँखों के दीये" को न केवल तलत महमूद के सर्वोत्तम गीतों में माना जाता है, बल्कि रोमांटिक गीतों की श्रेणी में भी बहुत ऊपर स्थान दिया जाता है। दादा बर्मन की आवाज़ में "सुन मेरे बन्धु रे" हमें बंगाल के भटियाली जगत में ले जाता है तो रफ़ी साहब का गाया "वाह भई वाह" हमें गुदगुदा जाता है। गीता दत्त और आशा भोसले की आवाज़ों में "बचपन के दिन भी क्या दिन थे", गीता जी की एकल आवाज़ में "नन्ही कली सोने चली हवा धीरे आना", तथा आशा जी की एकल आवाज़ में "काली घटा छाये मोरा जिया तड़पाये" को सुनना जैसे एक स्वर्गिक अनुभूति है।

अगर आप यह सोच रहे हैं कि उपर इस फ़िल्म के गीतों और गायक कलाकारों का उल्लेख करते हुए "तुम जियो हज़ारों साल" का उल्लेख क्यों नहीं किया गया, तो उसके पीछे एक कारण है। और वह कारण यह कि एक लम्बे समय तक इस बात पर संशय बना रहा कि आख़िर इस गीत को गाया किसने है - गीता दत्त या फिर आशा भोसले। और यही है इस गीत से जुड़ा हुआ सबसे मज़ेदार किस्सा। हुआ यूँ कि सचिनदेव बर्मन ने शुरू शुरू में इस फ़िल्म के चार फ़ीमेल सोलो गीतों में से दो गीत गीता दत्त के लिए और दो गीत आशा भोसले के लिए विभाजित कर रखे थे। (लता मंगेशकर से हुए मन-मुटाव के कारण उन दिनों लता और उनका आपस में काम बन्द था)। "तुम जियो हज़ारों साल" गीत को दादा ने गीता दत्त की झोली में डाल रखा था और उनकी ही आवाज़ में इसे रेकॉर्ड भी कर लिया। गाना बहुत अच्छा बना, गीता दत्त ने भी बहुत ख़ूब गाया, दादा बर्मन को किसी भी शिकायत का मौका नहीं दिया। पर बर्मन दादा को पता नहीं क्यों इस गीत में कुछ कमी सी महसूस होने लगी। सब कुछ ठीक-ठाक होने के बावजूद उन्हें ऐसा लग रहा था कि कुछ तो कमी है इस गीत में। जब कुछ समझ नहीं आया तो उन्होंने यह निर्णय लिया कि वो इस गीत को दोबारा आशा भोसले की आवाज़ में रेकॉर्ड करेंगे। इस बात का पता न गीता जी को चला और ना ही आशा जी को यह किसी ने बताया कि गीता जी यह गीत रेकॉर्ड करवा चुकी हैं। नतीजा, आशा जी की आवाज़ में भी यह गीत रेकॉर्ड हो गया। और इस बार सचिन दा को गीत पसन्द आ गया और उन्होंने इसे ही फ़िल्म में और साउण्डट्रैक में रखने का फ़ैसला किया। और इसी फेर-बदल के चलते 'बिमल राय प्रोडक्शन्स' ने गलती से आशा जी के गाये इस गीत के लिए गीता जी का नाम डाल कर HMV को भेज दिया। इस तरह से ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड के कवर पर गीता दत्त का नाम प्रकाशित हो गया। अब आशा जी और गीता जी की आवाज़ों में और अंदाज़ में थोड़ी-बहुत समानता तो थी ही, जिस वजह से जनता तो क्या फ़िल्म-संगीत के बड़े से बड़े समीक्षक भी धोखा खा गए। सालों तक इस गीत के रेकॉर्ड पर गीता जी का नाम छपता चला गया। यहाँ तक कि गीता दत्त के देहान्त के बाद जब HMV ने उन पर एक LP जारी किया 'In Memorium Geeta Dutt' के शीर्षक से, उसमें आशा भोसले के गाये इस गीत को शामिल कर दिया गया। यह अपने आप में बहुत बड़ी गड़बड़ी थी। राहुलदेव बर्मन, जो इस गीत के निर्माण के समय अपने पिता के सहायक के रूप में कार्य कर रहे थे, ने यह कन्फ़र्म किया कि गीता जी के गाये गीत को उनके पिता ने दोबारा आशा जी से गवाया। HMV ने इस ग़लती का इल्ज़ाम अपने सर लेने से यह कहते हुए मना कर दिया कि उन्होंने वही छापा है जो उन्हें 'बिमल राय प्रोडक्शन्स' के तरफ़ से मिला था। लेकिन यह वाक़ई आश्चर्य में डालने वाली बात है कि बिमल राय, सचिन देव बर्मन, आशा भोसले और गीता दत्त में से किसी ने भी कभी इस बात का उल्लेख कभी नहीं किया! इस गीत के बनने के 27 साल बाद, 1986 में आशा भोसले ने यह स्वीकारा कि उन्होंने इस गीत को गाया था, पर उन्हें इस बात का पता ही नहीं चला कि रेकॉर्ड पर गीता दत्त का नाम दिया गया है क्योंकि न तो वो कभी रेडियो सुनती थी और न ही अपने गाये हुए गीतों को। गीत एक बार रेकॉर्ड हो गया तो वो अगले दिन से अगले गीत के पीछे लग जाती। आशा जी के इस खुलासे के बाद HMV ने इस ग़लती को सुधारा और आशा भोसले के गाये गीतों के अगले कलेक्शन में इस गीत को शामिल करवा दिया, तथा गीता जी के कलेक्शन से हटा दिया। आशा जी ने बड़प्पन का परिचय देते हुए और इस विवाद को ख़त्म करते हुए अन्त में कहा - "अगर इस गीत के लिए गीता जी को क्रेडिट दिया भी गया है, तो इससे न उनके नाम को कोई फ़र्क पड़ता है और न ही मेरे नाम को। यह बहुत ही छोटी सी बात है। और मैं उनकी बहुत इज़्ज़त करती हूँ।"
और अब आप यही गीत सुनिए-

फिल्म - सुजाता : 'तुम जियो हजारों साल, साल के दिन हों पचास हजार...' : आशा भोसले : संगीत - सचिनदेव बर्मन : गीत - मजरूह सुल्तानपुरी 




अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें cine.paheli@yahoo.com के पते पर।



खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

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