रविवार, 10 मार्च 2013

रागमाला के रंग एस एन त्रिपाठी के सुरों के संग



स्वरगोष्ठी – 111 में आज

रागमाला – 1

‘मधुर मधुर संगीत सुनाओ...’ : संगीतकार एस.एन. त्रिपाठी जन्मशती पूर्णता पर विशेष



‘स्वरगोष्ठी’ की एक नई श्रृंखला- ‘रागमाला’ के नए अंक के साथ आज एक बार फिर मैं कृष्णमोहन मिश्र संगीत-प्रेमियों की इस गोष्ठी में उपस्थित हूँ। इस लघु श्रृंखला के लिए हमें अनेक संगीत-प्रेमियों के, विशेष रूप से संगीत की शिक्षा प्राप्त कर रहे विद्यार्थियों की कई फरमाइशें प्राप्त हुई हैं। कुछ संगीत-प्रेमियों ने तो रागमाला के कुछ अपनी पसन्द के गीत भी भेजे हैं। उन सभी संगीत-प्रेमियों के प्रति आभार प्रदर्शित करते हुए हम यह आश्वासन देते हैं कि इस श्रृंखला में हम इन्हें उनके नाम के साथ प्रकाशित/प्रसारित करेंगे। श्रृंखला का आज के पहले अंक का रागमाला गीत लखनऊ के चार संगीत के विद्यार्थियों- गुंजा सिंह, आरती खत्री, यश शुक्ला और सैयद आमिर अली ने उपलब्ध कराया है और रागमाला श्रृंखला में शामिल करने का अनुरोध किया है। इनके अनुरोध पर आज के अंक में हम प्रस्तुत कर रहे हैं, 1962 में प्रदर्शित फिल्म ‘संगीत सम्राट तानसेन’ का बेहद चर्चित रागमाला गीत।


फिल्म संगीत में मेलोडी से परिपूर्ण और राग आधारित गीतों की दृष्टि से पाँचवें दशक के उत्तरार्द्ध से लेकर सातवें दशक के पूर्वार्द्ध की अवधि महत्त्वपूर्ण है। इस अवधि में हजारों मधुर और कालजयी गीतों की रचना हुई। इसी अवधि में एक सफल संगीतकार के रूप में श्रीनाथ त्रिपाठी (एस.एन. त्रिपाठी) का नाम तेजी से उभरा। ऐतिहासिक और और पौराणिक फिल्मों के सर्वाधिक सफल संगीतकार एस.एन. त्रिपाठी ने फिल्मों में संगीतकार के अलावा अभिनेता, निर्माता और निर्देशक के रूप में भी अपना योगदान किया था। 14 मार्च, 1913 को कला और संस्कृति की राजधानी काशी नगरी (वाराणसी) में जन्मे श्री त्रिपाठी का जन्मशती वर्ष आज से तीन दिन बाद ही पूर्ण हो रहा है। इस महान संगीतकार को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से स्वरांजलि अर्पित करने के उद्देश्य से ही हमने आज की ‘स्वरगोष्ठी’ में उन्हीं का स्वरबद्ध किया गीत चुना है। एस.एन. त्रिपाठी के फिल्म जगत में प्रवेश के प्रसंग का उल्लेख फिल्म संगीत के इतिहासकार सुजॉय चटर्जी ने अपनी पुस्तक ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ में करते हुए लिखते हैं- “जीवन नैया’ में श्रीनाथ त्रिपाठी (जो बाद में एस.एन. त्रिपाठी के नाम से मशहूर संगीतकार हुए) को पहला मौका मिला गायक के रूप में। उन्होंने इस फ़िल्म में अभिनय भी किया और “ए री दैया लचक लचक चलत मोहन आवे, मन भावे...” गीत गाया। त्रिपाठी ने इलाहाबाद से बी.एससी की डिग्री पूरी करने के बाद मॉरिस म्यूजिक कॉलेज, लखनऊ (वर्तमान, भातखण्डे संगीत विश्वविद्यालय) से भारतीय शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ली। लखनऊ की ही मैना देवी से उन्होंने उपशास्त्रीय संगीत और लोक-संगीत की तालीम भी ली थी। मॉरिस कॉलेज से ‘संगीत विशारद’ और प्रयाग संगीत समीति से ‘संगीत प्रवीण’ की उपाधि प्राप्त करने के बाद त्रिपाठी बॉम्बे टॉकीज़ में वायलिन वादक के रूप में सरस्वती देवी के ऑरकेस्ट्रा में भर्ती हो गए और 1938 तक यहाँ रहे। इसके बाद उन्होंने अपनी स्वतंत्र संगीतकार की पारी शुरु की”। स्वतंत्र संगीत-निर्देशक के रूप में उनकी पहली फिल्म ‘चन्दन’ (1939) थी। लघु श्रृंखला ‘रागमाला’ के आज पहले अंक के लिए हमने एस.एन. त्रिपाठी के संगीत-निर्देशन में 1962 में बनी संगीत प्रधान फिल्म ‘संगीत सम्राट तानसेन’ का एक गीत चुना है।

शीर्षक के अनुरूप यह फिल्म संगीत सम्राट की उपाधि से अलंकृत तानसेन के जीवन पर आधारित इस फिल्म में एस.एन. त्रिपाठी ने रागों के विविध स्वरूप से प्रसंगों को सुसज्जित किया था। फिल्म का एक प्रसंग ऐसा है जिसमे तानसेन को उनके गुरु स्वामी हरिदास के आश्रम में संगीत का अभ्यास करते दिखाया गया है। एक के बाद एक कुल छह रागों के मेल से बने लगभग आठ मिनट के इस रागमाला गीत के माध्यम से तानसेन की बाल्यावस्था से लेकर युवावस्था तक के विकास को दिखाया गया है। प्रसंगों के क्रमशः उल्लेख में सरलता के लिए पूरे गीत को तीन भागों में बाँट कर हम प्रस्तुत कर रहे हैं। सबसे पहले हम आपके लिए रागमाला गीत का पहला दो अन्तरा प्रस्तुत कर रहे हैं। गीत का आरम्भ राग बहार के स्वरों में गूँथे गीत- ‘टूट गई मेरे मन की वीणा...’ से होता है। इन पंक्तियों के दौरान बालक तन्ना (तानसेन) को संगीत का अभ्यास करते दिखाया गया है। राग बहार की पंक्तियाँ समाप्त होते ही राग बागेश्वरी अथवा बागेश्री का आलाप आरम्भ हो जाता है। गीत का अगला भाग- ‘मधुर मधुर संगीत सुनाओ...’ है, जिसके लिए संगीतकार ने राग बागेश्री के स्वरों का उपयोग किया है। गीत का यह हिस्सा आरम्भ होते ही बालक तन्ना किशोर हो जाता है। लीजिए, रागमाला गीत के इन आरम्भिक दो हिस्सों का आनन्द लीजिए।


राग बहार और बागेश्वरी : ‘टूट गई मेरे मन की वीणा...’ और ‘मधुर मधुर संगीत सुनाओ...’ : पूर्णिमा सेठ और पंढारीनाथ कोल्हापुरे




गीत के अगले भाग में राग यमन कल्याण का स्पर्श है। दरअसल रागमाला गीत का यह भाग एक प्राचीन ध्रुवपद रचना है। यह मान्यता है कि इस ध्रुवपद की रचना स्वामी हरिदास ने की थी। इस रचना में संगीत के प्राचीन सिद्धान्तों का उल्लेख किया गया है। फिल्म में गीत के इस भाग के आरम्भ में किशोर आयु के तानसेन को अपने गुरु स्वामी हरिदास के सम्मुख अभ्यास करते दिखाया गया है। इस ध्रुवपद के अन्तरे में ही किशोर तानसेन युवा (भारतभूषण) रूप में परिवर्तित होते हैं। वयस्क तानसेन की भूमिका अभिनेता भारतभूषण निभाई है, जिनके लिए पार्श्वगायन किया, सुप्रसिद्ध गायक मन्ना डे ने। गीत का अगला अर्थात चौथा भाग पारम्परिक गुरुवन्दना है, जो राग केदार के स्वरों पर आधारित है। फिल्म ‘संगीत सम्राट तानसेन’ के इस रागमाला गीत के तीसरे और चौथे भाग को अब हम आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं।



राग यमन कल्याण और केदार : ‘सप्तसुरन तीन ग्राम...’ और गुरुवन्दना : मन्ना डे और साथी


रागमाला गीत के अगले तीन अन्तरों में राग भैरव और मेघ मल्हार के स्वरों का प्रयोग किया गया है। इस प्रसंग में स्वामी हरिदास, तानसेन को विभिन्न रागों के लक्षण बताने का आदेश देते हैं। तानसेन पहले राग भैरव और फिर मेघ मल्हार की प्रकृति का वर्णन करते हैं। तानसेन की इन प्रस्तुतियों से स्वामी हरिदास सन्तुष्ट हो जाते हैं राधाकृष्ण की प्रतिमा को नमन करने का आदेश देते हैं। गुरु और गोविन्द दोनों को एक साथ सम्मुख देख कर कुछ क्षणों तक तानसेन थोड़ा विचलित होते हैं, किन्तु गुरु के महत्त्व को सर्वोपरि रखते हुए अत्यन्त प्रचलित दोहा- ‘गुरु गोविन्द दोनों खड़े...’ का गायन करते हुए स्वामी हरिदास के चरणों में नतमस्तक हो जाते हैं। यह दोहा भी राग मेघ मल्हार के स्वरों में पिरोया गया है। आइए इस रागमाला गीत अन्तिम भाग भी सुनते हैं। इस रागमाला गीत में पारम्परिक रचनाओं के अलावा अन्य सभी गीतों की रचना गीतकार शैलेन्द्र ने की थी।



राग भैरव और मेघ मल्हार : लक्षण गीत और दोहा ‘गुरु गोविन्द दोनों खड़े...’ : मन्ना डे 

 


आज की पहेली 

‘स्वरगोष्ठी’ की 111वीं संगीत पहेली में हम आपको एक रागमाला फिल्मी गीत का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 120वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 - संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह अंश किस राग पर आधारित है?

2 – प्रस्तुत संगीत के अंश के उत्तरार्द्ध में गायन के साथ एक वाद्य की जुगलबन्दी भी की गई है। आपको उस वाद्य का नाम बताना है।

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 113वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता 

‘स्वरगोष्ठी’ के 109वें अंक में हमने आपको फिल्म ‘चाचा ज़िन्दाबाद’ से मन्ना डे और लता मंगेशकर के गाये एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग ललित और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल तीनताल। दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर की क्षिति तिवारी, बैंगलुरु के पंकज मुकेश और लखनऊ के प्रकाश गोविन्द ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक शुभकामनाएँ।


झरोखा अगले अंक का 


मित्रों, ‘स्वरगोष्ठी’ पर आज से आरम्भ यह श्रृंखला हमने अपने कई नियमित पाठकों के अनुरोध पर प्रस्तुत किया है। आज के अंक में प्रस्तुत किया गया रागमाला गीत का आडियो हमें लखनऊ के संगीत-विद्यार्थियों- गुंजा सिंह, आरती खत्री, यश शुक्ला और सैयद आमिर अली ने भेजा था। आगामी अंक में भी हम आपको एक फिल्मी रागमाला गीत सुनवाएँगे और उसमें सम्मिलित रागों पर आपसे चर्चा करेंगे। आप भी हमारे आगामी अंकों के लिए भारतीय शास्त्रीय संगीत से जुड़े नये विषयों, रागों और अपनी प्रिय रचनाओं की फरमाइश कर सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों को पूरा सम्मान देंगे। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9-30 ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सभी संगीत-प्रेमियों की हमें प्रतीक्षा रहेगी।


कृष्णमोहन मिश्र


शनिवार, 9 मार्च 2013

स्वाधीनता संग्राम और फ़िल्मी गीत (भाग-1)


भारत के स्वाधीनता संग्राम में फ़िल्म-संगीत की भूमिका

(भाग-1)

'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी पाठकों को सुजॉय चटर्जी का नमस्कार! मित्रों, आज 'सिने पहेली' के स्थान पर प्रस्तुत है विशेषालेख 'भारत के स्वाधीनता संग्राम में फ़िल्म-संगीत की भूमिका' का प्रथम भाग।                                                                              

1930 के दशक के आते-आते पराधीनता के ज़ंजीरों में जकड़ा हुआ देश आज़ादी के लिए ज़ोर शोर से कोशिशें करने लगा। 14 मार्च 1931 को पहली बोलती फ़िल्म ‘आलम-आरा’ प्रदर्शित हुई तो इसके ठीक नौ दिन बाद, 23 मार्च को भगत सिंह की फाँसी हो गई। समूचे देश का ख़ून खौल उठा। राष्ट्रीयता और देश-प्रेम की भावनाओं को जगाने के लिए फ़िल्म और फ़िल्मी गीत-संगीत मुख्य भूमिकाएँ निभा सकती थीं। पर ब्रिटिश सरकार ने इस तरफ़ भी अपना शिकंजा कसा और समय-समय पर ऐसी फ़िल्मों और गीतों पर पाबंदियाँ लगाई जो देश की जनता को ग़ुलामी के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने के लिए प्रोत्साहित करती थीं। ग़ैर फ़िल्मी गीतों और कविताओं पर भले प्रतिबंध लगा पाना मुश्किल था, पर सेन्सर बोर्ड के माध्यम से फ़िल्मों और फ़िल्मी गीतों पर प्रतिबंध लगाना ज़्यादा मुश्किल कार्य नहीं था। और यही कारण है कि स्वाधीनता से पहले कोई भी फ़िल्म निर्माता शहीद भगत सिंह के जीवन पर फ़िल्म बनाने में असमर्थ रहे। देश आज़ाद होने के बाद उन पर बहुत सी फ़िल्में ज़रूर बनीं।

ब्रिटिश सरकार की लाख पाबंदियों के बावजूद फ़िल्मकारों ने बार-बार अपनी फ़िल्मों के माध्यम से देश की जनता को देश-भक्ति का पाठ पढ़ाया है। स्वाधीनता संग्रामियों की ही तरह ये फ़िल्मकार भी अपनी फ़िल्मों के माध्यम से हमारी स्वाधीनता संग्राम में अंशग्रहण किया और इस दिशा में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। बोलती फ़िल्मों के शुरुआती दो-तीन वर्षों में देश-भक्ति रचनाएँ फ़िल्मों में सुनने को भले न मिली हों, पर 1935 में संगीतकार नागरदास नायक ने प्रफ़ुल्ल राय निर्देशित ‘भारत लक्ष्मी पिक्चर्स’ की फ़िल्म ‘बलिदान’ में “जागो जागो भारतवासी, एक दिन तुम थे जगद्‍गुरू, जग था उन्नत अभिलाषी” स्वरबद्ध कर जनता को स्वाधीनता की ओर उत्तेजित करने की कोशिश की थी। इस गीत के बाद इसी वर्ष नागरदास की ही धुन पर पंडित सुदर्शन का लिखा हुआ एक और देशभक्ति भाव से ओत-प्रोत गीत आया “भारत की दीन दशा का तुम्हें भारतवालों, कुछ ध्यान नहीं”; फ़िल्म थी ‘कुँवारी या विधवा’। इन दोनो गीतों के गायकों का पता तो नहीं चल सका है पर स्वाधीनता संग्राम के शुरुआती देशभक्ति फ़िल्मी गीतों के रूप में इनका उल्लेख अत्यावश्यक हो जाता है। चन्दुलाल शाह निर्देशित देश-भक्ति फ़िल्म ‘देश दासी’ भी इसी वर्ष आई पर इसके संगीतकार/गीतकार की जानकारी उपलब्ध नहीं है; हाँ इतना ज़रूर बताया जा सकता है कि इस फ़िल्म में भी एक देशभक्ति गीत था “सेवा ख़ुशी से करो देश की रे जीवन हो जाए फूलबगिया”, जिसमें देश-सेवा के ज़रिये देश को एक महकता बगीचा बनाने का सपना देखा गया है। देश सेवा को ईश्वर सेवा बताता हुआ इसी फ़िल्म का एक अन्य गीत था “यही है पूजा यही इबादत, यही है भगवत भजन हमारा, वतन की ख़िदमत…”। ‘वाडिआ मूवीटोन’ की 1935 की फ़िल्मों में ‘देश दीपक’ (‘जोश-ए-वतन’ शीर्षक से भी प्रदर्शित) उल्लेखनीय है जिसमें संगीत दिया था मास्टर मोहम्मद ने और गीत लिखे थे जोसेफ़ डेविड ने। सरदार मन्सूर की आवाज़ में फ़िल्म का एक देशभक्ति गीत “हमको है जाँ से प्यारा, प्यारा वतन हमारा, हम बागबाँ हैं इसके…” लोकप्रिय हुआ था। इन बोलों को पढ़ कर इससे "सारे जहाँ से अच्छा" गीत के साथ समानता नज़र आती है। 1936 में 'वाडिआ मूवीटोन' की ही एक फ़िल्म आई ‘जय भारत’, जिसमें सरदार मंसूर और प्यारू क़व्वाल के अलावा मास्टर मोहम्मद ने भी कुछ गीत गाये थे। मास्टर मोहम्मद का गाया इसमें एक देश भक्ति गीत था “हम वतन के वतन हमारा, भारत माता जय जय जय”। इस तरह से 1935-36 में हिन्दी फ़िल्मों में देशभक्ति गीत गूंजने लग पड़े थे और जैसे ये गीत स्वाधीनता संग्राम की अग्नि में घी का काम किया।

कवि प्रदीप
1939 में 'बॉम्बे टॉकीज़' की फ़िल्म ‘कंगन’ में कवि प्रदीप ने गीत भी लिखे और तीन गीत भी गाए। यह वह दौर था जब द्वितीय विश्वयुद्ध रफ़्तार पकड़ रहा था। 1 सितम्बर 1939 को जर्मनी ने पोलैण्ड पर आक्रमण कर दिया, और चारों तरफ़ राजनैतिक अस्थिरता बढ़ने लगी। इधर हमारे देश में भी स्वाधीनता के लिए सरगर्मियाँ तेज़ होने लगीं थीं। ऐसे में फ़िल्म ‘कंगन’ में प्रदीप ने एक गीत लिखा “राधा राधा प्यारी राधा, किसने हम आज़ाद परिंदों को बंधन में बांधा”। अशोक कुमार और लीला चिटनिस ने इस गीत को गाया था। ब्रिटिश राज में राष्ट्रीयता वाले गीत लिखने और उसका प्रचार करने पर सज़ा मिलती थी, ऐसे में प्रदीप ने कितनी चतुराई से इस गीत में राष्ट्रीयता के विचार भरे हैं। प्रदीप की राष्ट्रप्रेम की कविताओं और गीतों का असर कुछ ऐसा हुआ कि बाद में वो ‘राष्ट्रकवि’ की उपाधि से सम्मानित हुए। यह भी स्मरण में लाने योग्य है कि अमर देश-भक्ति गीत “ऐ मेरे वतन के लोगों, ज़रा आँख में भर लो पानी” भी उन्हीं के कलम से निकला था। अगर प्रदीप एक देशभक्त गीतकार थे तो उनकी ही तरह एक देश-भक्त संगीतकार हुए अनिल बिस्वास, जिन्होंने संगीत क्षेत्र में आने से पहले कई बार जेल जा चुके थे अपनी राजनैतिक गतिविधियों की वजह से। 1939 में ही ‘सागर मूवीटोन’ की एक फ़िल्म आई ‘कॉमरेड्स’ (हिन्दी में ‘जीवन साथी’ शीर्षक से) जिसमें अनिल दा का संगीत था। सुरेन्द्र, माया बनर्जी, हरीश और ज्योति अभिनीत इस फ़िल्म में सरहदी और कन्हैयालाल के साथ साथ आह सीतापुरी ने भी कुछ गीत लिखे थे। फ़िल्म में एक देशभक्ति गीत “कर दे तू बलिदान बावरे कर दे तू बलिदान, हँसते-हँसते तू दे दे अपने प्राण” स्वयं अनिल बिस्वास ने ही गाया था और इस गीत का फ़िल्मांकन पृष्ठभूमि में हुआ था। देश पर न्योछावर होने का पाठ पढ़ाता यह जोशिला गीत उस ज़माने में काफ़ी चर्चित हुआ था।


चर्चित फ़िल्मों के अलावा कई ऐसी फ़िल्में भी बनीं जो व्यावसायिक दृष्टि से असफल रहीं, पर ये फ़िल्में इस बात के लिए महत्वपूर्ण थीं कि इनमें देश-भक्ति के गीत थे। और उस दौर में जब कि देश पराधीन था, निस्संदेह ऐसे गीतों का महत्व और भी बढ़ जाता है। 1939 की स्टण्ट फ़िल्म ‘पंजाब मेल’ में नाडिया, सरिता देवी, शहज़ादी, जॉन कावस आदि कलाकार थे। पंडित ‘ज्ञान’ के लिखे गीतों को सरिता, सरदार मन्सूर और मोहम्मद ने स्वर दिया । फ़िल्म में दो देशभक्ति गीत थे - “इस खादी में देश आज़ादी दो कौड़ी में बेड़ा पार, देश भक्त ने…” (सरिता, मोहम्मद, साथी) और “क़ैद में आए नन्ददुलारे, दुलारे भारत के रखवारे” (सरिता, सरदार मन्सूर)। संगीतकार एस. पी. राणे का संगीत इस दशक के आरम्भिक वर्षों में ख़ूब गूंजा था और 30 के दशक के आख़िर तक कम होता दिखाई दे रहा था। 1939 में उनकी धुनों से सजी एक ही फ़िल्म आई ‘इन्द्र मूवीटोन’ की ‘इम्पीरियल मेल’ (संगीतकार प्रेम कुमार के साथ)। सफ़दर मिर्ज़ा के लिखे इस फ़िल्म के गीत आज विस्मृत हो चुके हैं, पर इस फ़िल्म में दो देशभक्ति गीत थे “सुनो सुनो हे भाई, भारत माता की दुहाई, ग़ैरों की ग़ुलामी करते…” और “करेंगे देश को आज़ाद, ज़र्रे-ज़र्रे की है ज़बाँ पर भारत की फ़रियाद”। देश को आज़ाद कराने की चाहत देश के हर नागरिक के दिल में तो थी ही, फ़िल्मी देश-भक्ति गीतों में भी यही विचार उभरने लगी। “करेंगे देश को आज़ाद” गीत पर ब्रिटिश राज की प्रतिबंध लगी जो कोई हैरानी की बात नहीं थी। पर जब समूचा देश अपने आप को आज़ाद कराने के सपने देख रहा हो तो ऐसे में कोई भी प्रतिबंध इस जोश को दबा नहीं सकती थी। किसी गीत या फ़िल्म को दबाया जा सकता है पर उस जोश को कैसे दबायें जो हर भारतवासी के दिल में उमड़ रहा था!

क्रमश:

शोध, आलेख व प्रस्तुति: सुजॉय चटर्जी

बुधवार, 6 मार्च 2013

मंगलवार, 5 मार्च 2013

शोभा रस्तोगी "शोभा" की लघुकथा कत्ल किसका

'बोलती कहानियाँ' स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने अनुराग शर्मा की आवाज़ में तपन शर्मा की लघुकथा "शवयात्रा" का पॉडकास्ट सुना था। आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं शोभा रस्तोगी "शोभा" की लघुकथा "कत्ल किसका", जिसका वाचन किया है अनुराग शर्मा ने।

इस लघुकथा का गद्य जनगाथा पर उपलब्ध है। इसका कुल प्रसारण समय 1 मिनट 41 सेकंड है। आप भी सुनें और अपने मित्रों और परिचितों को भी सुनाएँ और हमें यह भी बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

 यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।

शोभा जी दिल्ली में अध्यापन करती हैं। उनकी रचनाएँ प्रतिष्ठित हिन्दी पत्रिकाओं में छपती रही हैं।

हर सप्ताह यहीं पर सुनें एक नयी कहानी

"बी एस एफ की गाडियाँ दनादन रौंदाई गईं।"
(शोभा रस्तोगी "शोभा" की लघुकथा "कत्ल किसका" से एक अंश)

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#Eighth Story, Qatl Kiska, Shobha Rastogi/Hindi Audio Book/2013/8. Voice: Anurag Sharma

रविवार, 3 मार्च 2013

26/11 की दर्दनाक यादो को मधुर और भावपूर्ण संगीत का मरहम

प्लेबैक वाणी -36 - संगीत समीक्षा - The Attacks of 26/11


राम गोपाल वर्मा की फिल्मों का अपने दर्शकों के साथ धूप छांव का रिश्ता रहा है, या तो उनकी फ़िल्में ताबड तोड़ व्यवसाय करेंगीं या फिर बॉक्स ऑफिस पर औधें मुँह गिर पड़ेंगीं. पर मज़े की बात ये है कि कोई भी कभी भी RGV को सस्ते में लेने की जुर्रत नहीं कर सकता. ‘नॉट अ लव स्टोरी’ से अपनी फॉर्म में वापस आये RGV अब लाये हैं एक ऐसी फिल्म जिस पर मुझे यकीन है हर किसी की नज़र रहेगी, क्योंकि ये फिल्म एक ऐसे कुख्यात आतंकी हमले का बयान है जिसने देश के हर बाशिंदे को हिलाकर रख दिया था और जिससे हर भारतीय की भावनाएं बेहद गहरे रूप में जुडी हुई है. यूँ तो RGV की फिल्मों में गीतों की बहुत अधिक गुन्जायिश नहीं रहती और अमूमन RGV उन्हें एक व्यावसायिक मजबूरी समझ कर ही अपने स्क्रिप्ट का हिस्सा बनाते हैं, पर चूँकि ये फिल्म एक महत्वपूर्ण फिल्म है इसके संगीत की चर्चा भी लाजमी हो जाती है, तो चलिए आज आपसे बांटे कि कैसा है THE ATTACKS OF 26/11 का संगीत.

एल्बम की शुरुआत एक नौ मिनट लंबी ग़ज़ल के साथ होता है – हमें रंजों गम से फुर्सत न कभी थी न है न होगी. मधुश्री की सुरीली आवाज़ में आरंभिक आलाप पर नाना पाटेकर की सशक्त मगर भावपूर्ण आवाज़ का असर जादूई है और ये जादू अगले नौ मिनट तक बरकरार रहता है. हर मिसरे को पहले नाना की आवाज़ का आधार मिलता है जिसके बाद मधुश्री उसे अपने अंदाज़ में दोहराती है. ग़ज़लों का वापस फिल्मों में आना एक सुखद संकेत है. शब्द संगीत और अदायगी हर बात खूबसूरत है इस नगमें की. इसे लूप में लगाकर आप बार बार सुने बिना आप नहीं रह पायेंगें.

अगला गीत तेज बेस गिटार से खुलता है. मौला मौला देवा देवा फिल्म में तेज रफ़्तार एक्शन को सशक्त पार्श्व प्रदान करेगा. सुखविंदर की दमदार आवाज़ और कोरस का सुन्दर इस्तेमाल गीत को एक तांडव गीत में तब्दील कर देते हैं. रोशन दलाल का संगीत संयोजन जबरदस्त है, और कलगी टक्कर के शब्द सटीक.

जसप्रीत जैज की आवाज़ में ‘आतंकी आये’ आज के दौर का गीत है. हर दौर के संगीत में उस दौर की झलक हम देख सकते हैं, ठीक वैसे ही जैसे ए मेरे वतन के लोगों में आप भारत चीन युद्ध के कड़वाहट को महसूस कर पायेंगें, आतंकी आये में आप आज के दौर का खौफ जी पायेंगें. अभी हाल में प्रकाशित एल्बम ‘बीट ऑफ इंडियन यूथ’ में भी एक गीत है मानव बम्ब जो इसी गीत की तरह इस दौर की घातक सच्चाईयों का बयान है, याद रहे जब ऐसे गीत रचे जाते हैं तो रचेताओं के आगे कोई पूर्व सन्दर्भ नहीं होता, जाहिर है नई ज़मीन खोदने के ये प्रयास सराहनीय हैं.

अगला गीत ‘खून खराबा तबाही’ में सूरज जगन की आवाज़ है. सूरज जगन के अब तक के अधिकतर गीत हार्ड रोक्क् किस्म के रहें हैं, पर ये कुछ अलग है. उस खूंखार आतंकी हमले के परिणामों पर कुछ स्वाभाविक सवाल हैं गीत में. पूछ रहा है वो खुदा क्या सच में है ये इंसान....इस एक पंक्ति में गीत का सार है.


रघुपति राघव राजाराम का जिक्र आते ही आपके जेहन में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का चेहरा उभर कर आता है और गांधी जी के जिक्र के साथ आता है अहिंसा का सिद्धांत. पर ये आतंकी इन सिद्धांतों से कोसों दूर नज़र आते हैं. इस भजन को बहुत ही सुन्दर रूप में इस्तेमाल किया है संगीतकार विशाल और सुशील खोसला ने. भजन का एक और संस्करण भी है जो उतना ही दमदार है.

फिल्म के साउंड ट्रेक को सुनकर इसे देखने की ललक और बढ़ जाती है. एल्बम में हमें रंजों गम से जैसी खूबसूरत ग़ज़ल है तो मौला मौला, आतंकी आये और रघुपति राघव जैसे कुछ अच्छे प्रयोग भी है. रेडियो प्लेबैक दे रहा है इस एल्बम को ३.९ की रेटिंग.     

यदि आप इस समीक्षा को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें:

भोर की लाली का आह्वान करते आठवें प्रहर के राग


स्वरगोष्ठी – 110 में आज


राग और प्रहर – 8 / समापन कड़ी

‘देख वेख मन ललचाय...’ : सोहनी, भटियार, ललित और कलिंगड़ा रागों के रंग



आज एक बार फिर मैं कृष्णमोहन मिश्र ‘स्वरगोष्ठी’ के एक नए अंक के साथ संगीत-प्रेमियों की इस गोष्ठी में उपस्थित हूँ। पिछली सात कड़ियों में हमने दिन और रात के सात प्रहरों में गाये-बजाये जाने वाले रागों पर चर्चा की है। आज इस श्रृंखला की समापन कड़ी है और इस कड़ी में हम आपसे आठवें प्रहर अर्थात रात्रि के चौथे प्रहर के कुछ रागों की चर्चा करेंगे। आठवाँ प्रहर रात्रि के लगभग तीन बजे से लेकर सूर्योदय की लाली फूटने तक की अवधि को माना जाता है। इस अवधि में प्रस्तुत किये जाने वाले रागों में उजाले का आह्वान, रात की कालिमा व्यतीत होने की कामना और कुछ अलसाए भावों की अभिव्यक्ति होती है। श्रृंखला की समापन कड़ी में आज हम आपसे राग सोहनी, भटियार, ललित और कलिंगड़ा की संक्षिप्त चर्चा करेंगे और इन रागों में कुछ चुनी हुई रचनाएँ भी प्रस्तुत करेंगे। 




ठवें प्रहर अर्थात रात्रि के अन्तिम प्रहर में गाये-बजाये जाने वाले रागों में आज सबसे पहले हम आपको राग सोहनी सुनवाएँगे और उसका संक्षिप्त परिचय भी प्रस्तुत करेंगे। राग सोहनी का नामोल्लेख कहीं-कहीं शोभिनी या शोभनी भी किया गया है। यह कर्नाटक संगीत के राग हंसनंदिनी के समतुल्य है। यह राग मारवा थाट के अन्तर्गत माना जाता है। औड़व-षाड़व जाति के इस राग के आरोह और अवरोह, दोनों में पंचम स्वर प्रयोग नहीं किया जाता। धैवत स्वर इस राग का वादी और गान्धार स्वर संवादी होता है। यद्यपि सोहनी रात्रि के अन्तिम प्रहर में खूब निखरता है, तथापि विद्वान रात्रि के तीसरे प्रहर में भी इसका गायन-वादन करते हैं। उत्तरांग प्रधान राग सोहनी चंचल प्रकृति का राग है, जिसके गायन-वादन से श्रृंगार का विरह भाव भलीभाँति सम्प्रेषित होता है। इस राग में ठुमरी और खयाल दोनों की प्रस्तुति का प्रचलन है। आज की गोष्ठी में हम आपको उस्ताद राशिद खान के स्वरों में राग सोहनी में निबद्ध, खयाल अंग की, श्रृंगार रस की चाशनी में पगी, द्रुत तीनताल की, एक रचना सुनवाते हैं।


राग सोहनी : ‘देख वेख मन ललचाय...’ : उस्ताद राशिद खाँ 


रात्रि के अन्तिम प्रहर में प्रस्तुत किये जाने वाले रागों में अब हम आपसे राग भटियार की चर्चा कर रहे हैं। उत्तर भारतीय संगीत के कई राग ऐसे हैं, जिनके बारे में यह माना जाता है कि इनकी उत्पत्ति लोकधुनों से हुई है। राग भटियार के बारे में ऐसा ही माना जाता है। एक दूसरी मान्यता के अनुसार पाँचवीं शताब्दी में उज्जैन के राजा भर्तृहरि ने इस राग का सृजन किया था। इस राग के स्वर-समूह ऐसे हैं कि इसे किसी एक थाट से सम्बद्ध करना कठिन है। कुछ विद्वान इसे विलावल थाट से कुछ इसे खमाज थाट का राग मानते हैं। विदुषी पद्मा तलवलकर के अनुसार इसे मारवा थाट से सम्बद्ध किया जा सकता है, जबकि सुप्रसिद्ध इसराज और मयूर वीणा वादक पण्डित श्रीकुमार मिश्र का मत है कि यह थाटविहीन राग है। राग भटियार में शुद्ध मध्यम का प्रयोग अधिकतर और तीव्र मध्यम का प्रयोग कभी-कभी किया जाता है। इस राग में कोमल ऋषभ और शेष सभी शुद्ध स्वरों का प्रयोग किया जाता है। अवरोह के स्वर वक्रगति से लगाए जाते हैं। इस राग का वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर निषाद होता है। उत्तरांग प्रधान इस राग को सुनते समय कहीं-कहीं राग माँड की झलक भी मिलती है। आइए, अब सुनते हैं, राग भटियार में एक छोटा खयाल- ‘पिया मिलन को जाऊँ सखी री...’। द्रुत तीनताल में यह रचना प्रस्तुत कर रहे है, विश्वविख्यात गायक पण्डित जसराज के शिष्य पण्डित संजीव अभ्यंकर। इस प्रस्तुति में हारमोनियम संगति प्रमोद मराठे ने और तबला संगति भरत कामत ने की है।


राग भटियार : ‘पिया मिलन को जाऊँ सखी री...’ ; पण्डित संजीव अभ्यंकर


आज ‘राग और प्रहर’ श्रृंखला की समापन कड़ी में हम आपके साथ आठवें प्रहर के कुछ रागों पर चर्चा कर रहे हैं। इस प्रहर का एक अत्यन्त लोकप्रिय राग है, ललित। पूर्वी थाट के अन्तर्गत माना जाने वाला यह राग षाड़व-षाड़व जाति का होता है। राग ललित में पंचम स्वर का प्रयोग नहीं किया जाता। गान्धार इस राग का प्रमुख स्वर होता है। आलाप और तान में शुद्ध मध्यम स्वर पर न्यास किया जाता है। राग का वादी स्वर शुद्ध मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। पंचम स्वर की अनुपस्थिति सूर्य के प्रकाश की अनुपस्थिति का भाव भलीभाँति स्पष्ट करता है। आइए, अब हम आपको राग ललित पर आधारित एक फिल्मी रचना सुनवाते हैं। 1959 में एक फिल्म ‘चाचा जिन्दाबाद’, प्रदर्शित हुई थी, जिसके संगीतकार मदनमोहन थे। उन्होने फिल्म का एक गीत- ‘प्रीतम दरस दिखाओ...’ राग ललित के स्वरों का आधार बना कर स्वरबद्ध किया था। तीनताल के ठेके पर यह गीत मन्ना डे और लता मंगेशकर ने गाया है। लीजिए, यह गीत आप भी सुनिए।


फिल्म चाचा जिन्दाबाद : ‘प्रीतम दरस दिखाओ...’ : राग ललित : मन्ना डे और लता मंगेशकर


‘राग और प्रहर’ श्रृंखला की आज की कड़ी के अन्त में अब हम आपसे राग कलिंगड़ा के विषय में थोड़ी चर्चा करेंगे। राग कलिंगड़ा, भैरव थाट के स्वरों के अनुकूल होता है। प्राचीन काल में इस राग का प्रयोग सम्पूर्ण-सम्पूर्ण जाति के रूप में होता था, किन्तु वर्तमान में षाड़व-सम्पूर्ण जाति के रूप में प्रयोग किया जाता है। इस राग के आरोह में ऋषभ स्वर नहीं लगता। कोमल ऋषभ और कोमल धैवत स्वरॉ का आन्दोलन न करने से यह राग भैरव से भिन्न हो जाता है। शुद्ध गान्धार और शुद्ध निषाद पर न्यास, इस राग का प्रमुख गुण है। राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर षडज होता है। सूर्योदय से ठीक पहले राग कलिंगड़ा, ठुमरी अंग में खूब निखरता है। इस राग के उदाहरणस्वरूप अब हम आपको एक ठुमरी ही सुनवाते हैं। पटियाला, कसूर गायकी के सिद्ध कलासाधक उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ के अनुज उस्ताद बरकत अली खाँ के स्वरों में राग कलिंगड़ा की यह ठुमरी प्रस्तुत है।


राग कलिंगड़ा : ठुमरी- ‘पिया मन मन्दिर में आन बसो...’ : उस्ताद बरकत अली खाँ 


आज की पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 110वें अंक की पहेली में आज हम आपको एक राग आधारित फिल्मी गीत का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली के इस अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 - संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह गीत किस राग पर आधारित है?

2 – यह गीत किस फिल्म से लिया गया है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 112वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से या swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।

पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के 108वें अंक में हमने आपको 1955 में बनी फिल्म ‘झनक झनक पायल बाजे’ के राग आधारित शीर्षक गीत का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग अड़ाना और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायक उस्ताद अमीर खाँ। दोनों प्रश्नो के सही उत्तर बैंगलुरु के पंकज मुकेश, जौनपुर के डॉ. पी.के. त्रिपाठी, लखनऊ के प्रकाश गोविन्द और जबलपुर से क्षिति तिवारी ने दिया है। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।

झरोखा अगले अंक का


मित्रों, ‘स्वरगोष्ठी’ पर पिछले आठ अंकों की इस लघु श्रृंखला ‘राग और प्रहर’ के अन्तर्गत आपने दिन और रात के आठो प्रहरों में प्रस्तुत किए जाने वाले कुछ प्रमुख रागों का संक्षिप्त परिचय प्राप्त किया और इन रागों के उदाहरण भी सुने। आज के अंक में प्रस्तुत किये गए रागों के साथ ही हम इस लघु श्रृंखला को यहीं विराम देते हैं। अगले अंक के लिए हमने एक अनोखा विषय चुना है जिसका विषय है, ‘रागमाला’। आगामी अंक में हम आपके साथ होंगे। प्रत्येक रविवार को प्रातः साढ़े नौ बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के एक नए अंक के साथ उपस्थित होते हैं। आप सब संगीत-प्रेमियों से अनुरोध है कि इस सांगीतिक अनुष्ठान में आप भी हमारे सहभागी बनें। आपके सुझाव और सहयोग से हम इस स्तम्भ को और अधिक उपयोगी स्वरूप प्रदान कर सकते हैं। 

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र

'सिने पहेली' को हम आज दे रहे हैं अल्प-विराम!



सिने-पहेली में आज 

छठे सेगमेण्ट के विजेताओं की घोषणा


'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी पाठकों और श्रोताओं को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, 'सिने पहेली' के सफ़र को तय करते हुए हम और आप, साथ-साथ आज आ पहुँचे हैं छठे सेगमेण्ट के नतीजे पर। अर्तात्‍ हमने पूरे कर लिए इस प्रतियोगिता के 60 अंक। कुछ असुविधाओं के कारण हमें 'सिने पहेली' प्रतियोगिता को कुछ दिनों के लिए स्थगित करना पड़ रहा है, जिसका हमें बेहद अफ़सोस है। पर 6 अप्रैल से इस यात्रा को दोबारा शुरू किया जाएगा 61-वें अंक के साथ।

आइए आज के इस अंक में आपको सबसे पहले बतायें पिछले अंक में पूछे गए सवालों के सही जवाब।

पिछली पहेली का हल


1. जीतेन्द्र

2. राजकुमार

3. कैफी आज़मी

4. लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल

5. राग बहार

6. तीनताल और दादरा

7. शबाब 1954

8. सलिल चौधरी

9. पण्डित भीमसेन जोशी और मन्ना डे

10. पंडित इन्द्र



पिछली पहेली का परिणाम

इस बार 'सिने पहेली' में कुल 4 प्रतियोगियों ने भाग लिया। सबसे पहली 100% सही जवाब भेज कर इस बार 'सरताज प्रतियोगी' बने हैं बीकानेर के श्री विजय कुमार व्यास। विजय जी, बहुत बहुत बधाई आपको। पंकज मुकेश (१० अंक), क्षिति तिवारी (९ अंक) और चन्द्रकान्त दीक्षित (५ अंक) पाने वाले अन्य तीन प्रतियोगी हैं।

छठे सेगमेण्ट का परिणाम


'सिने पहेली' के छठे सेगमेण्ट के तीन विजेता ये रहे...

प्रथम स्थान -- विजय कुमार व्यास (बीकानेर)


द्वितीय स्थान -- पंकज मुकेश (बेंगलुरू)


तृतीय स्थान -- क्षिति तिवारी (जबलपुर)


चन्द्रकान्त दीक्षित और महेश बसन्तनी ने भी अच्छी लड़ाई लड़ी। आइए अब नज़र डालते हैं इस सेगमेण्ट के सम्मिलित स्कोरकार्ड पर।








छठे सेगमेण्ट की समाप्ति तक 'महाविजेता स्कोरकार्ड' यह रहा...



सभी प्रतियोगियों और विजेताओं को हार्दिक बधाई! 6 अप्रैल से 'सिने पहेली' के सफ़र को हम यहीं से आगे बढ़ायेंगे, इसी उम्मीद के साथ अपने इस ई-दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिये, नमस्कार!

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