गुरुवार, 15 नवंबर 2012

सिनेमा के सौ साल – 23 : भाई दूज पर विशेष


भूली-बिसरी यादें
भाई-बहन के सम्बन्धों पर बनी आरम्भिक दौर की फिल्में


भारतीय सिनेमा के शताब्दी वर्ष में आयोजित विशेष श्रृंखला, ‘स्मृतियों के झरोखे से : भारतीय सिनेमा के सौ साल’ के एक नये अंक के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, अपने साथी सुजॉय चटर्जी के साथ आपके बीच उपस्थित हूँ और आपका हार्दिक स्वागत करता हूँ। आज मास का तीसरा गुरुवार है और इस दिन हम आपके लिए मूक और सवाक फिल्मों की कुछ रोचक दास्तान लेकर आते हैं। आज भाई-बहनों का महत्त्वपूर्ण पर्व ‘भाईदूज’ है। इस विशेष अवसर पर आज हम आपके लिए लेकर आए हैं ‘भूली बिसरी यादें’ का एक विशेष अंक। आज हमारे साथी सुजॉय चटर्जी शुरुआती दौर की कुछ ऐसी फिल्मों का ज़िक्र कर रहे हैं जिनमें ‘भाईदूज’ पर्व का उल्लेख हुआ है।


भाई और बहन के अटूट रिश्ते को और भी अधिक मजबूत बनाने के लिए साल में दो त्योहार मनाये जाते हैं, रक्षाबन्धन और भाईदूज। वैसे तो इन दोनों त्योहारों के रस्म लगभग एक जैसे ही हैं, फिर भी रक्षाबन्धन को भाईदूज से ज़्यादा महत्त्व दिया जाता है। एक पौराणिक कथा के अनुसार भाईदूज के दिन यमराज अपनी बहन यमी के घर जाते हैं और यमी उसके माथे पर तिलक लगाती है। इसलिए लोगों का यह विश्वास है कि आज के दिन जो भाई अपनी बहन से तिलक लगवाता है, वो कभी नर्क में नहीं जाता। एक अन्य कथा के अनुसार आज के दिन भगवान कृष्ण, नरकासुर का वध करके अपनी बहन सुभद्रा के पास जाते हैं, और सुभद्रा उनका दीप, फूल और मिठाइयों से स्वागत करती हैं और उनके माथे पर तिलक लगाती हैं। हमारी हिन्दी फ़िल्मों और फ़िल्मी गीतों की अगर बात करें तो उनमें भी राखी या रक्षाबन्धन के त्योहार को ही ज़्यादा महत्त्व दिया गया है, जबकि भाईदूज का उल्लेख कम ही हुआ है। 1947 में 'भाईदूज' शीर्षक से एक फ़िल्म ज़रूर बनी थी, जिसका उल्लेख हम आगे चलकर इस लेख में करेंगे।

हिन्दी सिनेमा के शुरुआती वर्षों से ही भाई और बहन के रिश्तों को फिल्मों में स्थान मिला है। इस दौर की कई फ़िल्मों में भाई-बहन के किरदार नज़र आए, परन्तु भाई-बहन के रिश्ते के इर्द-गिर्द घूमने वाली फिल्मों में सबसे पुरानी फिल्म है, 1935 की 'बहन का प्रेम' ('बेनूर आँखें' शीर्षक से भी प्रदर्शित) बम्बई के 'प्रोस्पेरिटी फ़िल्म कम्पनी' के बैनर तले निर्मित इस फ़िल्म के निर्देशक थे, जे.के. नन्दा। डी.एच. कृपलानी की कहानी पर आधारित इस फिल्म में पद्मा देवी, ज़ोहरा बाई, अजूरी, रफ़ीक ग़ज़नवी, लक्ष्मीनारायण, एस.एफ. शाह, सादिक़ और सुल्ताना अभिनीत इस फ़िल्म के संगीतकार थे रफ़ीक़ ग़ज़नवी। ग़ज़नवी ने अभिनेता और संगीतकार के साथ-साथ गायक की भूमिका भी निभाई थी और फ़िल्म के कम से कम तीन गीत गाये। भले ही फ़िल्म भाई-बहन के प्रेम को लेकर थी, पर फ़िल्म के कुल 13 गीतों में कोई भी गीत इस सन्दर्भ का नहीं था। फ़िल्म के गीत मूलतः भक्तिरस, देशभक्ति या फिर दार्शनिक किस्म के थे।

1940 में 'बॉम्बे टॉकीज़' की सफल फ़िल्म आई 'बन्धन'। अशोक कुमार और लीला चिटनिस अभिनीत इस फ़िल्म के गीतों ने प्रदीप को एक सफल फ़िल्मी गीतकार के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया। सरस्वती देवी और रामचन्द्र पाल द्वारा स्वरबद्ध इस फ़िल्म के गीतों में सर्वाधिक लोकप्रिय गीत रहा ‘चल चल रे नौजवान...’। फिल्म में लीला चिटनिस के भाई की भूमिका में थे अभिनेता सुरेश। ‘अपने भैया को नाच नचाऊँगी...’, लीला चिटनिस और सुरेश का गाया हुआ फ़िल्म का एक हास्य गीत है जिसमें बड़ी बहन अपने छोटे भाई को चिढ़ा रही है, क्योंकि वो किसी कारण नाराज़ है और उसे हँसाने की कोशिश कर रही है। 1941 में बम्बई के 'नेशनल स्टूडियोज़' की महबूब ख़ान निर्देशित फ़िल्म आई 'बहन'। फ़िल्म में भाई-बहन के चरित्रों में नज़र आये शेख मुख्तार और नलिनी जयवन्त। संगीतकार थे अनिल बिस्वास और गीत लिखे डॉ. सफदर ‘आह’ ने। पर इस फिल्म में ‘हाय नहीं खाते हैं भैया पान...’, जो गीत था, उसे लिखा था वजाहत मिर्ज़ा ने। और यही एक गीत इस फ़िल्म का है जिसमें बहन अपने भाई का उल्लेख कर रही है। 1944 में 'कारवाँ पिक्चर्स' के बैनर से बनी फ़िल्म आई 'भाई' जिसमें मनोरमा, सतीश, राधारानी और ज़हूर राजा ने मुख्य भूमिकाएँ निभाईं, और संगीतकार थे ग़ुलाम हैदर व श्यामसुन्दर। इस बात का पता नहीं चल पाया है कि क्या फ़िल्म की कहानी भाई-बहन के सम्ब्न्ध को लेकर थी या भाई-भाई के और ना ही फ़िल्म में ऐसा कोई गीत था जिससे इस बात का पता चल सके। हाँ, एक देशभक्ति गीत ज़रूर था ‘हिन्दू मुस्लिम सिख इसाई, आपस में है भाई-भाई...’

1944 की एक महत्त्वपूर्ण फ़िल्म जिसका उल्लेख अनिवार्य है, वह है 'न्यू थिएटर्स’, कलकत्ता की 'मेरी बहन' ('My Sister' शीर्षक से भी प्रदर्शित)। कुन्दनलाल सहगल, सुमित्रा देवी, नवाब, अख्तर जहाँ, चन्द्रावती अभिनीत इस फ़िल्म के पंकज मल्लिक के स्वरबद्ध गीतों ने धूम मचा दी थी। ‘दो नैना मतवारे तिहारे...’, ‘ऐ कातिबे तक़दीर मुझे इतना बता दे...’, ‘छुपो ना छुपो ना ओ प्यारी सजनिया...’ जैसे सहगल के गाये गीत हर ज़ुबाँ पर चढ़ गए। पर फिल्म ‘बहन’ की कहानी भाई-बहन के सम्बन्धों पर केन्द्रित होने के बावजूद फ़िल्म में इस रिश्ते को उकेरने वाला कोई गीत नहीं था। 1948 में 'नवभारत पिक्चर्स' की फ़िल्म 'दीदी' आई थी जिसमें रंजना, घनश्याम, शोभारानी और चारूबाला ने अभिनय किया था पर इस फ़िल्म में भी ऐसा कोई गीत नहीं था जिससे भाई-बहन के रिश्ते को और मजबूती मिल सके। ऐसे ही 1950 में 'कृष्णा मूवीटोन' की राम दरयानी निर्देशित फ़िल्म आई ‘भाई-बहन’ जिसमें गीताबाली, प्रेम अदीब, निरुपा राय और भारत भूषण नज़र आये। फ़िल्म में कुल चार गीतकार थे, ईश्वरचन्द्र कपूर, राजा मेंहदी अली खाँ, एस.एच. बिहारी और राजेन्द्र कृष्ण, पर फिल्म में भाई-बहन रिश्ते पर कोई भी गीत नहीं रखा गया था। यह आश्चर्य की ही बात है कि इन सभी फ़िल्मों की कहानियाँ भाई-बहन के रिश्ते पर आधारित होने के बावजूद इस विषय पर कोई गीत क्यों नहीं रखा गया।

फिल्म 'बहन'  में नलिनी जयवन्त और शेख मुख्तार 
1931 से लेकर 1950 तक की फिल्म-यात्रा पर नज़र डालें तो 'भाईदूज' पर बस एक फ़िल्म आई थी, इसी शीर्षक से, वर्ष 1947 में। 'चित्रवाणी प्रोडक्शन्स', बम्बई के बैनर तले निर्मित इस फ़िल्म के निर्देशक थे नरोत्तम व्यास, जो एक अच्छे गीतकार भी थे। पर इस फ़िल्म में उन्होंने कोई गीत नहीं लिखा, फ़िल्म के गीत पंकज ने लिखे थे। 'भाईदूज' के संगीतकार थे क्षीरोदचन्द्र भट्टाचार्य और फ़िल्म में अभिनय किया निरंजन प्रकाश शर्मा, प्रदीप, डी. भोज, शारदा, शशिबाला आदि ने। फ़िल्म के लिए पार्श्वगायन किया सुमित्रा, सुनेत्रा, सुरेश और जगन्नाथ ने। शीर्षक गीत के रूप में एक समूह गीत रखा गया जिसके बोल थे ‘एक साल में भाईदूज का दिन आता है नीका...’। फिल्म के इस गीत का HMV पर रेकॉर्ड्स भी जारी हुआ था। इस समूह गीत का रेकॉर्ड नम्बर है N 35198। यह गीत तो हम उपलब्ध नहीं करा सके, पर आज के इस पवित्र अवसर पर आइए भाई-बहन के रिश्ते को सलाम करते हुए सुनते हैं नलिनी जयवन्त का गाया फ़िल्म 'बहन' का यह गीत। 


फिल्म - बहन : ‘हाय नहीं खाते हैं भैया पान...’ : स्वर – नलिनी जयवन्त 3   


इसी गीत के साथ आज हम ‘भूली-बिसरी यादें’ के इस अंक को यहीं विराम देते हैं। आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमें अवश्य लिखिएगा। आपकी प्रतिक्रिया, सुझाव और समालोचना से हम इस स्तम्भ को और भी सुरुचिपूर्ण रूप प्रदान कर सकते हैं। ‘स्मृतियों के झरोखे से : भारतीय सिनेमा के सौ साल’ के आगामी अंक में बारी है- ‘मैंने देखी पहली फिल्म’ स्तम्भ की। अगला गुरुवार मास का चौथा गुरुवार होगा। इस दिन हम प्रस्तुत करेंगे एक बेहद रोचक संस्मरण। यदि आपने ‘मैंने देखी पहली फिल्म’ प्रतियोगिता के लिए अभी तक अपना संस्मरण नहीं भेजा है तो हमें तत्काल radioplaybackindia@live.com पर हमें मेल करें।

आलेख : सुजॉय चटर्जी

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र

मंगलवार, 13 नवंबर 2012

विष्णु बैरागी की यह उजास चाहिए मुझे

'बोलती कहानियाँ' इस स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने अनुराग शर्मा की आवाज़ में आचार्य चतुरसेन की कहानी अब्बाजान का प्रसारण सुना था।

आज हम लेकर आये हैं "विष्णु बैरागी" की कहानी "यह उजास चाहिए मुझे", जिसको स्वर दिया है अनुराग शर्मा ने। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं। कहानी का कुल प्रसारण समय है: 12 मिनट 39 सेकंड।

इस कथा का मूल आलेख विष्णु जी के ब्लॉग एकोऽहम् पर पढ़ा जा सकता है|

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।


भ्रष्टाचार का लालच मनुष्य की आत्मा को मार देता है।
~ विष्णु बैरागी


हर सप्ताह यहीं पर सुनें एक नयी कहानी



“चारों के चारों, मेरे इस नकार को, घुमा-फिराकर मेरी कंजूसी साबित करना चाह रहे हैं। मुझे हँसी आती है किन्तु हँस नहीं पाता। डरता हूँ कि ये सब बुरा न मान जाएँ।”

(विष्णु बैरागी की "यह उजास चाहिए मुझे" से एक अंश)



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#38th Story, Yeh ujas chahiye mujhe: Vishu Bairagi/Hindi Audio Book/2012/38. Voice: Anurag Sharma

सोमवार, 12 नवंबर 2012

प्लेबैक वाणी - संगीत समीक्षा - जब तक है जान

प्लेबैक वाणी - संगीत समीक्षा - जब तक है जान 

“तेरी आँखों की नमकीन मस्तियाँ, तेरी हँसी की बेपरवाह गुस्ताखियाँ, तेरी जुल्फों की लहराती अंगडाईयाँ, नहीं भूलूँगा मैं...जब तक है जान...”, दोस्तों सिने प्रेमी भी यश चोपड़ा और उनकी यादगार फिल्मों को वाकई नहीं भूलेंगें...जब तक है जान...यश जी की हर फिल्म उसके बेहतरीन संगीत के लिए भी दर्शकों और श्रोताओं के दिलो जेहन में हमेशा बसी रहेगीं.

उन्होंने फिल्म और कहानी की जरुरत के मुताबिक अपने गीतकार संगीतकार चुने, मसलन आनंद बख्शी और लक्ष्मीकांत प्यारेलाल की जबरदस्त सफलता के दौर में उन्होंने एल पी के साथ साहिर की जोड़ी बनायीं “दाग” के लिए और परिणाम जाहिर है उत्कृष्ट ही रहा. वहीँ उन्होंने आनंद बख्शी को मिलाया शिव हरी से और अद्भुत गीत निकलवाये. स्क्रिप्ट लेखक जावेद अख्तर को गीतकार बनाया. खय्याम को “कभी कभी” और उत्तम सिंह को “दिल तो पागल है” के रूप में वो व्यावसयिक कामयाबी दिलवाई जिसके के वो निश्चित ही हकदार थे. मदन मोहन की बरसों पुरानी धुनों को नयी सदी में फिर से जिंदा कर मदन जी को आज के श्रोताओं से रूबरू करवाया.

ये सब सिर्फ और सिर्फ यशी जी ही कर सकते थे. वो कभी पंचम और गुलज़ार के साथ संयुक्त रूप से काम नहीं कर पाए मगर अपनी अंतिम फिल्म में उन्होंने गुलज़ार को टीम-अप किया आज के पंचम यानी ए आर रहमान के साथ. रहमान और गुलज़ार यूँ तो पहले भी मिले हैं और “दिल से”, “साथिया” और “गुरु” जैसी बेमिसाल सौगातें दे चुके हैं, मगर जब साथ हो यश जी का तो उम्मीदें और भी कई गुना बढ़ जाती हैं, आईये देखें कैसा है यश जी की अंतिम फिल्म “जब तक है जान” का संगीत. 

अल्बम रब्बी शेरगिल की रूहानी आवाज़ से खुलता है. वो जब “छल्ला गली गली रुल्दा फिरे...” गाते हैं तो सीधे दिल में उतर जाते हैं. “बुल्ला की जाणा मैं कौन...” गाकर धडकनों में गहरे समाये पंजाबी सूफी गायक रब्बी शेरगिल से बेहतर शायद ही कोई इस गीत के साथ न्याय कर पाता. गिटार की स्वरलहरियों पर थिरकते गुलज़ार के शब्द श्रोताओं को एक अलग ही यात्रा में ले चलते हैं. रहमान की धुन और संगीत संयोजन भी कमाल का है. सुन सुनकर भी मन न भरने वाला है ‘छल्ला’ गीत.

गुलज़ार लिखते हैं “रात तेरी बाहों में कटे तो सुबहें हल्की हल्की लगती है, आँख में रहने लगे हो क्या तुम, क्यों छलकी छलकी लगती हैं...” श्रेया और मोहित की मधुरतम आवाजों में अगला गीत “साँस” वाकई साँसों में बसने वाला है. यश जी रोमांस के बादशाह माने जाते हैं और उनकी फिल्मों ने हमें कई यादगार रोमांटिक गीत दिए हैं, जिनकी धुनें और संयोजन में श्रोताओं की प्रेम के महक गुंथी मिलती है अपनी मिटटी की खुश्बू में, निश्चित ही ‘साँस’ उसी श्रृंखला में एक और खूबसूरत इजाफा करती है.

अगला गीत “इश्क शावा” एक कदम थिरकाने वाला स्ट्रीट डांस सरीखा गीत है. धुवें से भरी मेंडोलिन की सुरंगिनियों को ताल देते राघव माथुर और शिल्पा राव की युगल आवाजें. गीत का अरेबिक फ्लेवर झुमाने वाला है. वैसे तो ऐसे गीत अपने नृत्य संयोजन के कारण अधिक लोकप्रिय होते हैं पर ‘इश्क शावा’ केवल सुनने के लिहाज से भी बेहतरीन है.

अगला गीत मेरा सबसे पसंदीदा है. यूँ भी हर्षदीप कौर की आवाज़ गजब की है उस पर धुन में मिठास के साथ साथ गहरा दर्द भी है जो गुलज़ार के शब्दों में और भी मुखर होकर बिखरता है. गीत के आरंभ में हर्षदीप का आलाप गीत पर यश जी की मोहर साफ़ दर्शाती है. रहमान –गुलज़ार की जोड़ी का एक और यादगार नगमा.

एक नयी उर्जा का संचार है अगले गीत में जिसे गाया है नीति मोहन ने. “जिया रे” खुद से प्यार करने को मजबूर कर देगा आपको. स्वार्थी होने में कोई बुराई बिल्कुल नहीं है, दरअसल जो खुद से प्यार नहीं कर सकता और किसी और और से भी भला कैसे प्यार कर सकता है. गीत के इसी भाव को बहुत खूब शब्द दिए हैं गुलज़ार ने, गीत मधुर है और दिलचस्प भी.

जावेद अली का गाया शीर्षक गीत शुरू में सुनने में कुछ अजीब लगता है पर यकीन मानिये एक दो बार सुनने के बाद ये आपकी जुबाँ पे अवश्य चढ जायेगा. दरअसल ये फिल्म की शीर्षक कविता का ही संगीतमय रूप है. मूल कविता को आवाज़ दी है शाहरुख खान ने. कविता बेहद सुन्दर है पर चूँकि कवि कोई और नहीं गुलज़ार हैं तो थोड़ी सी उम्मीदें और बढ़ जाती है. शाहरुख का अंदाज़ बेमिसाल है और परदे पर इसे देखने के बाद श्रोताओं के ये और अधिक पसंद आएगा यक़ीनन.

‘जब तक है जान’ इस साल की बहतरीन एल्बमों में से एक है. हर गीत एक लाजवाब नगीने जैसा. रेडियो प्लेबैक दे रहा है इस अल्बम को ४.८ की रेटिंग. दिवाली की रोशनियों को जगमगायिये, सुनिए सुनाईये रेडियो प्लेबैक इंडिया. दीपावली मुबारक       




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