Sunday, November 4, 2012

फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी – ६


स्वरगोष्ठी – ९५ में आज

श्रृंगार रस से अभिसिंचित ठुमरी- ‘बाजूबन्द खुल खुल जाय...’



‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी लघु श्रृंखला ‘फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’ की कड़ियों में आप सुन रहे हैं, कुछ ऐसी पारम्परिक ठुमरियाँ, जिन्हें फिल्मों में पूरे आन, बान और शान के साथ शामिल किया गया। इस श्रृंखला में आप कुछ ऐसी ही पारम्परिक ठुमरियाँ उनके फिल्मी रूप के साथ सुन रहे हैं। आज के अंक में हम प्रस्तुत करने जा रहे हैं, भैरवी की एक बेहद लोकप्रिय ठुमरी- ‘बाजूबन्द खुल खुल जाय...’। आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक अभिनन्दन करते हुए, मैं कृष्णमोहन मिश्र, आरम्भ करता हूँ, ‘फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’ श्रृंखला का नया अंक।



ठुमरी भारतीय संगीत की वह रसपूर्ण शैली है, जिसमें स्वर और साहित्य का समान महत्त्व होता है। यह भावप्रधान और चपल चाल वाला गीत है। मुख्यतः यह श्रृंगार प्रधान गीत होता है; जिसमें लौकिक और आध्यात्मिक दोनों प्रकार का श्रृंगार उपस्थित होता है। इसीलिए ठुमरी में लोकगीत जैसी कोमल शब्दावली और अपेक्षाकृत हलके रागों का ही प्रयोग होता है। अधिकतर ठुमरियों के बोल अवधी, भोजपुरी अथवा ब्रजभाषा में होते हैं। कथक नृत्य में प्रयोग की जाने वाली अधिकतर ठुमरियाँ कृष्णलीला प्रधान होती हैं। शान्त, गम्भीर अथवा वैराग्य भावों की सृष्टि करने वाले रागों के बजाय चंचल रागों; जैसे पीलू, काफी, जोगिया, खमाज, भैरवी, तिलक कामोद, गारा, पहाड़ी, तिलंग आदि में ठुमरी गीतों को निबद्ध किया जाता है। ठुमरी गायन में त्रिताल, चाँचर, दीपचन्दी, जत, दादरा, कहरवा आदि तालों का प्रयोग होता है।

आज प्रस्तुत की जाने वाली भैरवी की श्रृंगार रस प्रधान ठुमरी है- ‘साँवरिया ने जादू डारा, बाजूबन्द खुल खुल जाय...’। इस ठुमरी के बोल लोक साहित्य से प्रेरित है। अन्तरे की पंक्तियाँ हैं- ‘जादू की पुड़िया भर भर मारे, का करेगा वैद्य बेचारा...’। इस ठुमरी को अनेक गायक-गायिकाओं ने अपने स्वरों से सँवारा है। आज के अंक में हम आपको सबसे पहले यह ठुमरी उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ की आवाज़ में सुनवाएँगे। पटियाला कसूर घराने के सिरमौर, उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ पिछली शताब्दी के बेमिसाल गायक थे। अपनी बुलन्द गायकी के बल पर संगीत के मंचों पर लगभग आधी शताब्दी तक उन्होने अपनी बादशाहत को कायम रखा। पंजाब अंग की ठुमरियों के वे अप्रतिम गायक थे। लीजिए सुनिए, उनके स्वरों में प्रस्तुत श्रृंगार रस में डूबी यह ठुमरी। 


ठुमरी भैरवी : ‘बाजूबन्द खुल खुल जाय...’ : उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ



इस ठुमरी में लोकतत्व प्रमुख रूप से उभरता है। नायिका पर साँवरिया का ऐसा जादू सवार है कि वह सुध-बुध खो बैठी है। हर समय नायक की चिन्ता में डूबी रहने वाली नायिका इतनी दुबली हो गई है कि बाजूबन्द बार-बार स्वतः गिर पड़ता है। ठुमरी के इस भाव को एक नये ढंग से परिभाषित किया है, पण्डित भीमसेन जोशी ने। भारतीय संगीत की विविध विधाओं ध्रुवपद, खयाल, ख़याल, तराना, भजन, अभंग आदि शैलियों के माध्यम से सात दशकों तक उन्होंने संगीत प्रेमियों को अपने स्वर के सम्मोहन में बाँधे रखा। पण्डित जी की खरज भरी आवाज का वैशिष्ट्य जादुई रहा है। बन्दिश को वे जिस माधुर्य के साथ बदल देते थे, वह अनुभव करने की चीज है। 'तान' को वे अपनी चेरी बनाकर अपने कण्ठ में नचाते रहे। उन्हें खयाल गायन के साथ-साथ ठुमरी, भजन और अभंग गायन में भी महारथ हासिल थी। आइए उनके कण्ठ-स्वर में सुनते हैं यही ठुमरी।


ठुमरी भैरवी : ‘बाजूबन्द खुल खुल जाय...’ : पण्डित भीमसेन जोशी



आज हम जिस गायन शैली को ठुमरी गीत के रूप में जानते हैं, उसे एक शैली के रूप में पहचान मिली, अवध के नवाबी दरबार में। उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में अवध के नवाब वाजिद अली शाह के दरबार में ठुमरी को नई पहचान तो मिली किन्तु इसका विकास बनारस के समृद्ध सांगीतिक परिवेश में हुआ। ठुमरी के इस प्रमुख केन्द्र के वर्तमान गायक-गायिकाओं में विदुषी गिरिजा देवी का नाम शीर्षस्थ है। गिरिजा देवी आधुनिक और स्वतन्त्रता से पूर्व काल की पूरब अंग की बोल बनाव ठुमरियों की विशेषज्ञ और संवाहिका हैं। आधुनिक उपशास्त्रीय संगीत के भण्डार को उन्होंने समृद्ध किया है। अब हम आपको भैरवी की यही ठुमरी विदुषी गिरिजा देवी के स्वरों में सुनवाते हैं। इस प्रस्तुति में सुप्रसिद्ध सरोद वादक उस्ताद अमजद अली खाँ ने गायन के साथ जुगलबन्दी की है। गिरिजा देवी की अनूठी गायकी और सरोद के गमकयुक्त योगदान से ठुमरी का एक अलग रंग किस प्रकार निखरता है, इसका रसास्वादन आप स्वयं करें।

ठुमरी भैरवी : ‘बाजूबन्द खुल खुल जाय...’ : गायन और सरोद जुगलबन्दी : विदुषी गिरिजा देवी और उस्ताद अमजद अली खाँ



‘फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’ शीर्षक से जारी इस लघु श्रृंखला में आप पारम्परिक ठुमरियों के साथ उनके फिल्मी प्रयोग का भी रसास्वादन कर रहे हैं। आज की ठुमरी ‘बाजूबन्द खुल खुल जाय...’ का उपयोग १९५४ में ‘बाजूबन्द’ नाम से ही प्रदर्शित फिल्म में किया गया था। इस फिल्म के संगीतकार मोहम्मद शफ़ी थे। फिल्म के एक नृत्य प्रसंग में इस ठुमरी का प्रयोग किया गया था। रामानन्द सागर निर्देशित फिल्म ‘बाजूबन्द’ में मोहम्मद शफ़ी ने भैरवी की इस ठुमरी को लता मंगेशकर से गवाया था। आप लता मंगेशकर के मधुर स्वरों में यह ठुमरी सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


ठुमरी भैरवी : ‘बाजूबन्द खुल खुल जाय...’ : फिल्म बाजूबन्द : लता मंगेशकर




आज की पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ पर आज की संगीत पहेली में एक बार फिर हम आपको एक बेहद लोकप्रिय ठुमरी का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली के सौवें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।



१ - संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह ठुमरी किस राग में निबद्ध है?

२ – इस पारम्परिक ठुमरी के रचनाकार का नाम बताइए। 

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के ९७वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।

पिछली पहेली के विजेता 

‘स्वरगोष्ठी’ के ९३वें अंक में हमने आपको सुप्रसिद्ध गायिका विदुषी डॉ. प्रभा अत्रे के स्वरों में गायी राग मिश्र खमाज की ठुमरी का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग खमाज अथवा मिश्र खमाज और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायिका परवीन सुलताना। दोनों प्रश्नो के सही उत्तर लखनऊ के प्रकाश गोविन्द और जबलपुर की क्षिति तिवारी ने दिया है। अहमदाबाद, गुजरात के डॉ. कश्यप दवे ने पहले प्रश्न का तो सही उत्तर दिया है, किन्तु दूसरे प्रश्न को समझने में भूल की। दरअसल हमने सुनवाए गए ठुमरी अंश की गायिका (डॉ. प्रभा अत्रे) का नहीं बल्कि इस ठुमरी के फिल्मी प्रयोग (पाकीज़ा) की गायिका (परवीन सुलताना) का नाम पूछा था। डॉ. कश्यप दवे सहित अन्य सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि वे प्रश्न को खूब ध्यान से पढ़ कर ही उत्तर दें। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से बधाई।

झरोखा अगले अंक का  

मित्रों, ‘स्वरगोष्ठी’ के आगामी अंक में हम लघु श्रृंखला ‘फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’ को एक सप्ताह के लिए विराम दे रहे हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ का अगला अंक एक विशेष अंक होगा। इस अंक में हम शास्त्रीय संगीत के कुछ नवोदित बाल, किशोर और युवा प्रतिभाओं से आपका परिचय कराएँगे। इन दिनों ‘संगीत मिलन’ नामक संस्था सम्पूर्ण उत्तर प्रदेश से संगीत प्रतिभाओ का चयन कर रही है। तीनों वर्गों में अन्तिम रूप चुनी गई प्रतिभाओं का हम आपसे परिचय भी कराएँगे और साथ ही उनकी प्रस्तुतियों को भी सुनवाएँगे। उत्तर प्रदेश की इन नवोदित प्रतिभाओं को जानने और सुनने के लिए ‘स्वरगोष्ठी’ के आगामी अंक में अवश्य पधारिएगा। अगले रविवार को प्रातः ९-३० पर आयोजित अपनी इस गोष्ठी में आप अवश्य पधारिए। हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।


 कृष्णमोहन मिश्र


“मैंने देखी पहली फिल्म” : आपके लिए एक रोचक प्रतियोगिता
दोस्तों, भारतीय सिनेमा अपने उदगम के 100 वर्ष पूरा करने जा रहा है। फ़िल्में हमारे जीवन में बेहद खास महत्त्व रखती हैं, शायद ही हम में से कोई अपनी पहली देखी हुई फिल्म को भूल सकता है। वो पहली बार थियेटर जाना, वो संगी-साथी, वो सुरीले लम्हें। आपकी इन्हीं सब यादों को हम समेटेगें एक प्रतियोगिता के माध्यम से। 100 से 500 शब्दों में लिख भेजिए अपनी पहली देखी फिल्म का अनुभव radioplaybackindia@live.com पर। मेल के शीर्षक में लिखियेगा ‘मैंने देखी पहली फिल्म’। सर्वश्रेष्ठ तीन आलेखों को 500 रूपए मूल्य की पुस्तकें पुरस्कारस्वरुप प्रदान की जायेगीं। तो देर किस बात की, यादों की खिड़कियों को खोलिए, कीबोर्ड पर उँगलियाँ जमाइए और लिख डालिए अपनी देखी हुई पहली फिल्म का दिलचस्प अनुभव। प्रतियोगिता में आलेख भेजने की अन्तिम तिथि 30 नवम्बर, 2012 है।

Saturday, November 3, 2012

नये खिलाड़ियों के लिए भी मौका है महाविजेता बनने का सिने पहेली में...


(3 नवम्बर, 2012)
सिने-पहेली # 44


'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी पाठकों और श्रोताओं को सुजॉय चटर्जी का सप्रेम नमस्कार। दोस्तों, आज सबसे पहले इस अंक में हम दो नये खिलाड़ियों का स्वागत करना चाहेंगे। पिछले सप्ताह इस प्रतियोगिता में जुड़े हैं बीकानेर के गणेश एस. पालीवाल और इस सप्ताह हमारे साथ जुड़े हैं जयपुर के पुनीत झा। वाकई आश्चर्य की बात है कि 'सिने पहेली' के लगभग 50% प्रतियोगी राजस्थान के रहने वाले हैं। बीकानेर, जयपुर, कोटा और चित्तौड़गढ़ को मिलाकर कुल 8 प्रतियोगी रंगीले राजस्थान से ताल्लुख रखते हैं। आप सब भी अपने मित्रों को इस प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए कह कर अपने राज्य के प्रतियोगियों की संख्या को बढ़ा सकते हैं। क्या पता हम प्रतियोगिता के अंत में सर्वाधिक प्रतियोगी वाले राज्य के नाम भी कोई इनाम घोषित कर दें!!!

ख़ैर, आइए आगे बढ़ते हैं हमारे नये खिलाड़ियों के आह्वान के साथ...

नये प्रतियोगियों का आह्वान


नये प्रतियोगी, जो इस मज़ेदार खेल से जुड़ना चाहते हैं, उनके लिए हम यह बता दें कि अभी भी देर नहीं हुई है। इस प्रतियोगिता के नियम कुछ ऐसे हैं कि किसी भी समय जुड़ने वाले प्रतियोगी के लिए भी पूरा-पूरा मौका है महाविजेता बनने का। अगले सप्ताह से नया सेगमेण्ट शुरू हो रहा है, इसलिए नये खिलाड़ियों का आज हम एक बार फिर आह्वान करते हैं। अपने मित्रों, दफ़्तर के कलीग, और रिश्तेदारों को 'सिने पहेली' के बारे में बतायें और इसमें भाग लेने का परामर्श दें। नियमित रूप से इस प्रतियोगिता में भाग लेकर महाविजेता बनने पर आपके नाम हो सकता है 5000 रुपये का नगद इनाम। अब महाविजेता कैसे बना जाये, आइए इस बारे में आपको बतायें।

कैसे बना जाए 'सिने पहेली महाविजेता?


1. सिने पहेली प्रतियोगिता में होंगे कुल 100 एपिसोड्स। इन 100 एपिसोड्स को 10 सेगमेण्ट्स में बाँटा गया है। अर्थात्, हर सेगमेण्ट में होंगे 10 एपिसोड्स।

2. प्रत्येक सेगमेण्ट में प्रत्येक खिलाड़ी के 10 एपिसोड्स के अंक जुड़े जायेंगे, और सर्वाधिक अंक पाने वाले तीन खिलाड़ियों को सेगमेण्ट विजेताओं के रूप में चुन लिया जाएगा। 

3. इन तीन विजेताओं के नाम दर्ज हो जायेंगे 'महाविजेता स्कोरकार्ड' में। सेगमेण्ट में प्रथम स्थान पाने वाले को 'महाविजेता स्कोरकार्ड' में 3 अंक, द्वितीय स्थान पाने वाले को 2 अंक, और तृतीय स्थान पाने वाले को 1 अंक दिया जायेगा। चौथे सेगमेण्ट की समाप्ति तक 'महाविजेता स्कोरकार्ड' यह रहा...



4. 10 सेगमेण्ट पूरे होने पर 'महाविजेता स्कोरकार्ड' में दर्ज खिलाड़ियों में सर्वोच्च पाँच खिलाड़ियों में होगा एक ही एपिसोड का एक महा-मुकाबला, यानी 'सिने पहेली' का फ़ाइनल मैच। इसमें पूछे जायेंगे कुछ बेहद मुश्किल सवाल, और इसी फ़ाइनल मैच के आधार पर घोषित होगा 'सिने पहेली महाविजेता' का नाम। महाविजेता को पुरस्कार स्वरूप नकद 5000 रुपये दिए जायेंगे, तथा द्वितीय व तृतीय स्थान पाने वालों को दिए जायेंगे सांत्वना पुरस्कार।

और अब आज की पहेली....

आज की पहेली : तोल मोल के बोल

आज हम आप से पूछ रहे हैं पाँच सवाल, हर सवाल के 2 अंक। सुलझाइये और पाइए 10 अंक।

सवाल # 1


इनमें से किस अभिनेता ने एक ही शीर्षक के दो फ़िल्मों में अभिनय किया है?

1. धर्मेद्र
2. सनी देओल
3. बॉबी देओल
4. अभय देओल

सवाल # 2


इनमें से किस गायिका ने लता मंगेशकर और शब्बीर कुमार के गाये एक गीत की शुरुआती पंक्ति गाई हैं?

1. अनुराधा पौडवाल
2. अनुपमा देशपाण्डे
3. देवकी पण्डित
4. इला अरुण

सवाल # 3


नीचे दिये गये फ़िल्मी दृश्य को देख कर बताइए कि ये तीन अभिनेता कौन-कौन हैं? तीनों नाम सही बताने पर ही अंक दिये जायेंगे।



सवाल # 4


लता मंगेशकर और अलिशा चिनॉय - दो बिल्कुल ही अलग जौनर की गायिकाएँ। इनमें कोई भी समानता खोज पाना नामुमकिन सा लगता है। फिर भी दिमाग़ पे ज़ोर लगाइए और बताइए कि किस गीत के ज़रिये इन दो गायिकाओं को आपस में मिलाया जा सकता है?

सवाल # 5


पाँच शब्दों में (न इससे कम न इससे ज़्यादा) बताइये कि ॠतिक रोशन - अमीशा पटेल और जीतेन्द्र - तनुजा की जोड़ियों को कैसे आपस में मिलाया जा सकता है?

जवाब भेजने का तरीका


उपर पूछे गए सवालों के जवाब एक ही ई-मेल में टाइप करके cine.paheli@yahoo.com के पते पर भेजें। 'टिप्पणी' में जवाब न कतई न लिखें, वो मान्य नहीं होंगे। ईमेल के सब्जेक्ट लाइन में "Cine Paheli # 44" अवश्य लिखें, और अंत में अपना नाम व स्थान अवश्य लिखें। आपका ईमेल हमें बृहस्पतिवार 8 नवंबर शाम 5 बजे तक अवश्य मिल जाने चाहिए। इसके बाद प्राप्त होने वाली प्रविष्टियों को शामिल नहीं किया जाएगा।

पिछली पहेली के सही जवाब


1. फ़िल्म - सवाल
2. फ़िल्म - धर्मपुत्र, गीत - मैं जब भी अकेली होती हूँ
3. फ़िल्म - परम्परा, गीत - तू सावन मैं प्यास पिया
4. गीत - सर से सरके सर की चुनरिया
5. फ़िल्म - जानम समझा करो

पिछली पहेली के परिणाम


'सिने पहेली - 43' के परिणाम इस प्रकार हैं...

1. पुनीत झा, जयपुर --- 10 अंक

2. महेश बसंतनी, पिट्सबर्ग --- 10 अंक

3. गौतम केवलिया, बीकानेर --- 10 अंक

4. प्रकाश गोविन्द, लखनऊ --- 10 अंक

5. पंकज मुकेश, बेंगलुरु --- 10 अंक

6. क्षिति तिवारी, जबलपुर --- 10 अंक

7. चन्द्रकान्त दीक्षित, लखनऊ --- 10 अंक

8. जीवन दास व्यास, बीकानेर --- 10 अंक

9. विजय कुमार व्यास, बीकानेर --- 10 अंक

10. महेन्द्र कुमार रंगा, बीकानेर --- 10 अंक

11. तरुशिखा सुरजन, उत्तराखण्ड --- 6 अंक

12. इंदु पुरी गोस्वामी, चित्तौड़गढ़ --- 4 अंक


पाँचवें सेगमेण्ट का सम्मिलित स्कोरकार्ड यह रहा...



'सिने पहेली' को और भी ज़्यादा मज़ेदार बनाने के लिए अगर आपके पास भी कोई सुझाव है तो 'सिने पहेली' के ईमेल आइडी पर अवश्य लिखें। आप सब भाग लेते रहिए, इस प्रतियोगिता का आनन्द लेते रहिए, क्योंकि महाविजेता बनने की लड़ाई अभी बहुत लम्बी है। आज के एपिसोड से जुड़ने वाले प्रतियोगियों के लिए भी 100% सम्भावना है महाविजेता बनने का। इसलिए मन लगाकर और नियमित रूप से (बिना किसी एपिसोड को मिस किए) सुलझाते रहिए हमारी सिने-पहेली, करते रहिए यह सिने मंथन, और अनुमति दीजिए अपने इस ई-दोस्त सुजॉय चटर्जी को, नमस्कार!

Thursday, November 1, 2012

स्मृतियों के झरोखे से : पहली महिला संगीतकार


भूली-बिसरी यादें

भारतीय सिनेमा के शताब्दी वर्ष में आयोजित विशेष श्रृंखला ‘स्मृतियों के झरोखे से’ के एक नये अंक के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र अपने साथी सुजॉय चटर्जी के साथ आपके बीच उपस्थित हूँ और आपका हार्दिक स्वागत करता हूँ। आज मास का पहला गुरुवार है और इस दिन हम आपके लिए मूक और सवाक फिल्मों की कुछ रोचक दास्तान लेकर आते हैं। तो आइए पलटते हैं, भारतीय फिल्म-इतिहास के कुछ सुनहरे पृष्ठों को।


यादें मूक फिल्मों की : बम्बई, नासिक और मद्रास फिल्म निर्माण के शुरुआती केन्द्र बने 


 र्ष 1913 में दादा फालके द्वारा निर्मित और प्रदर्शित मूक फिल्म ‘राजा हरिश्चन्द्र’ का नाम भारत के पहले कथा फिल्म के रूप में इतिहास में दर्ज़ हो ही चुका था, इसी वर्ष दादा फालके की दूसरी फिल्म ‘भष्मासुर मोहिनी’ का प्रदर्शन हुआ। अगले वर्ष, अर्थात 1914 में भी दादा फलके का ही वर्चस्व कायम रहा, जब उनकी तीसरी फिल्म ‘सावित्री सत्यवान’ का प्रदर्शन हुआ। इन दो वर्षों में कुल तीन फिल्मों का प्रदर्शन हुआ और ये तीनों फिल्म फालके ऐंड कम्पनी द्वारा निर्मित थी। पहली फिल्म ‘राजा हरिश्चन्द्र’ के निर्माण के समय कम्पनी का स्टूडिओ और कार्यालय मुम्बई में स्थापित था, किन्तु बाद की फिल्मों के निर्माण के समय दादा फालके ने अपना स्टुडियो और कार्यालय नासिक स्थानान्तरित कर दिया था। कम्पनी की स्थापना स्वयं फालके ने की थी, किन्तु नासिक स्थानान्तरित कर देने के बाद कम्पनी से कुछ साझीदार भी जुड़े। इनमें प्रमुख थे, वामन श्रीधर आप्टे, एल.बी. पाठक, गोकुलदास दामोदर, मायाशंकर भट्ट और माधवजी जयसिंह।

आर. नटराजा मुदालियर 
इसी बीच 1915 में एस.एन. पाटनकर नामक एक फ़िल्मकार ने भारत की दूसरी फिल्म कम्पनी, ‘पाटनकर यूनियन’ की स्थापना की। उन्होने इस कम्पनी की पहली और भारत की चौथी मूक फिल्म ‘मर्डर ऑफ नारायणराव पेशवा’ नामक ऐतिहासिक फिल्म का निर्माण किया। 6000 फीट लम्बाई की इस ऐतिहासिक फिल्म में जी. रानाडे, डी. जोशी और के.जी. गोखले मुख्य भूमिकाओं में थे। पाटनकर ने अपनी इस कम्पनी से दो फिल्मों का निर्माण करने के बाद 1917 में कम्पनी का नाम बदल कर ‘पाटनकर फ्रेंड्स ऐंड कम्पनी’ रख दिया।

मूक फिल्मों के निर्माण की श्रृंखला 1916 में जारी रही। इस वर्ष एक ही फिल्म ‘कीचक वध’ बनी, किन्तु यह बम्बई या नासिक में नहीं, बल्कि तत्कालीन मद्रास में बनी थी। वेल्लोर के रहने वाले आर. नटराजा मुदालियर ने ब्रिटिश कैमरामैन स्टीवर्ट से प्रशिक्षण लेकर मद्रास में ‘इण्डियन फिल्म कम्पनी’ स्थापित की और फिल्म ‘कीचक वध’ का निर्माण किया। 6000 फीट लम्बाई की यह फिल्म महाभारत के अज्ञातवास से सम्बन्धित एक प्रसंग पर आधारित थी। फिल्म का निर्देशन स्वयं आर. नटराजा मुदालियर ने किया था और मुख्य अभिनेता थे, राजा मुदालियर तथा जीवरत्नम। इस फिल्म ने भारतीय फिल्म निर्माण के क्षेत्र का विस्तार दक्षिण भारत में किया।

सवाक युग के धरोहर : पहली महिला संगीतकार कौन?

जद्दनबाई
ह 1934 का साल था जिसने पहली महिला संगीतकार देखा। इशरत सुल्ताना ने ‘अदले जहाँगीर’ में संगीत देकर यह ख़िताब अपने नाम कर लिया। लेकिन अफ़सोस की बात है कि इस फ़िल्म के गीतों को रेकॉर्ड नहीं किया गया था, और अब इस फ़िल्म की प्रिण्ट मिल पाना भी असम्भव ही है। वैसे प्रथम महिला संगीतकार कौन हैं, इस बात में कुछ संशय है। पहली महिला संगीतकार के रूप में आज हर जगह सरस्वती देवी का नाम सुनाई देता है, जिन्होंने 1935 में फ़िल्म ‘जवानी की हवा’ में संगीत दिया था, पर साथ ही साथ यह सवाल भी तर्कसंगत है कि क्या सरस्वती देवी को ही भारत की पहली महिला संगीतकार कहा जाना चाहिए? इशरत सुलताना का ज़िक्र हम कर चुके हैं, साथ ही मुनीरबाई और जद्दनबाई ने भी संगीत तो दिया पर फ़िल्मों में नहीं। आगे चलकर जद्दनबाई ने 1935 की एक फ़िल्म 'तलाश-ए-हक़' में संगीत तो दिया पर वो गाने रेकॉर्ड पर नहीं उतर सके। रेकॉर्ड पर न उतर पाने की वजह से ज़्यादा लोगों को इनके गीत सुनने को नहीं मिले, और इनकी तरफ़ किसी का ध्यान नहीं गया। सरस्वती देवी वह प्रथम संगीतकार थीं जिनके गीत न केवल रेकॉर्ड हुए बल्कि एक चर्चित बैनर 'बॉम्बे टाकीज़' के साथ जुड़ने और फ़िल्मों के चलने से वो मशहूर हो गईं और जनता और इतिहास ने उन्हें ही प्रथम महिला संगीतकार होने का गौरव प्रदान कर दिया।

फ़िल्म ‘जवानी की हवा’ का दृश्य 
1934 में हिमांशु राय व देविका रानी द्वारा गठित ‘बॉम्बे टाकीज़’ 1935 में अपनी पहली फ़िल्म ‘जवानी की हवा’ के साथ उपस्थित हुई। यह एक मर्डर-मिस्ट्री थी। बोराल, मल्लिक, तिमिर बरन न्यू थिएटर्स में थे। उधर प्रभात में गोविन्दराव और केशवराव भोले जैसे संगीतकार थे। इन दिग्गजों से टक्कर लेने के लिए और ‘बॉम्बे टाकीज़’ के गीत-संगीत में अलग पहचान लाने के लिए हिमांशु राय को तलाश थी एक नए संगीतकार की। उनकी यह खोज उन्हें ले आई सरस्वती देवी के पास, जो बनीं भारतीय सिनेमा की पहली महिला संगीतकार। उनका असली नाम था ख़ुर्शीद मिनोचर होमजी, जिनका जन्म एक पारसी परिवार में हुआ था। संगीत के प्रति लगाव को देखते हुए उनके पिता ने उन्हें संगीत सीखने की अनुमति दी और वो विष्णु नारायण भातखण्डे की शिष्या बन गईं। मैट्रिक पास करने के बाद लखनऊ के प्रसिद्ध मॉरिस कॉलेज ऑफ हिन्दुस्तानी म्यूजिक (वर्तमान भातखण्डे संगीत विश्वविद्यालय) से शिक्षा प्राप्त की और वहीं अध्यापन भी किया। 1927 में रेडिओ की शुरुआत के बाद बम्बई में अपनी बहनों के साथ ‘होमजी सिस्टर्स’ के नाम से अपनी ऑरकेस्ट्रा पार्टी बनाई जो काफ़ी लोकप्रिय बन गई।

सरस्वती देवी
1933-34 में वो बम्बई में किसी जलसे में गाने गई थीं जहाँ पर हिमांशु राय से उनकी मुलाक़ात हुई। राय ने उन्हें ‘बॉम्बे टाकीज़’ में संगीतकार बनने और उनकी बहन माणिक को अभिनय और गायन करने का निमंत्रण दिया। कुछ हिचकिचाहट के बाद दोनों बहने राज़ी तो हो गईं, पर पारसी समाज ने इसका विरोध किया क्योंकि पारसी महिलाओं का फ़िल्मों में काम करना अच्छा नहीं माना जाता था। इस विरोध के चलते हिमांशु राय ने ही दोनों बहनों का नाम बदल कर एक को सरस्वती देवी तो दूसरी को चन्द्रप्रभा बना दिया। सरस्वती देवी को शुरु में देविका रानी को संगीत सिखाने का काम सौंपा गया, और इसी दौरान वो ‘जवानी की हवा’ के लिए भी धुने बनाने लगीं। फ़िल्म के गीत तैयार होने पर देविका रानी, चन्द्रप्रभा और नजमुल हसन से गवाये गये। केवल नाम बदलने से दोनों बहनों की मुसीबत नहीं टली। पारसी समाज के लोगों ने इनके ख़िलाफ़ मोर्चा निकाल कर इस फ़िल्म के प्रदर्शन में बाधा उत्पन्न करने की कोशिश की। पुलिस फ़ोर्स की निगरानी में इम्पीरियल सिनेमा में फ़िल्म को रिलीज़ किया गया। इस तरह के विरोध के मद्देनज़र ‘बॉम्बे टाकीज़’ के ‘बोर्ड ऑफ़ डिरेक्टर्स’ के चार सदस्य, जो पारसी थे, इन बहनों को कम्पनी से अलग कर देने का सुझाव दिया, पर हिमांशु राय अपने फ़ैसले में अटल थे। बहरहाल ‘जवानी की हवा’ के गाने लिखे थे जमुनास्वरूप कश्यप ‘नातवाँ’, बड़े आग़ा, नजमुल हुसैन और डी. के. मेहता ने। गीतों में आवाज़ें थीं देविका रानी, नजमुल हुसैन, मिस रिख मसीह और कश्यप की।

और अब हम आपको सरस्वती देवी का संगीतबद्ध और उन्हीं का गाया एक गीत सुनवाते हैं। गीत के बोल हैं- “कित गए हो खेवनहार...”। यह गीत फिल्म ‘अछूत कन्या’ में पर्दे पर उनकी बहन चन्द्रप्रभा पर फ़िल्माया जाना था। लेकिन शूटिंग के दिन चन्द्रप्रभा के गले में ख़राश आ गई और वो गाने की स्थिति में नहीं थीं। ऐसे में अपनी छोटी बहन के लिए सरस्वती देवी ने गीत को गाया जिस पर चन्द्रप्रभा ने केवल होंठ ही हिलाये।

फिल्म अछूत कन्या : “कित गए हो खेवनहार...” : सरस्वती देवी 




सरस्वती देवी का गाया और संगीतबद्ध किया एक और गीत सुनिए। इसे हमने 1936 की ही फिल्म ‘जन्मभूमि’ से लिया है।

फिल्म जन्मभूमि : “दुनिया कहती मुझको पागल... : सरस्वती देवी 



 इसी गीत के साथ आज हम ‘भूली-बिसरी यादें’ के इस अंक को यहीं विराम देते हैं। आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमें अवश्य लिखिएगा। आपकी प्रतिक्रिया, सुझाव और समालोचना से हम इस स्तम्भ को और भी सुरुचिपूर्ण रूप प्रदान कर सकते हैं। ‘स्मृतियों के झरोखे से : भारतीय सिनेमा के सौ साल’ के आगामी अंक में बारी है- ‘मैंने देखी पहली फिल्म’ स्तम्भ की। अगला गुरुवार मास का दूसरा गुरुवार होगा। इस दिन हम प्रस्तुत करेंगे एक बेहद रोचक संस्मरण। यदि आपने ‘मैंने देखी पहली फिल्म’ प्रतियोगिता के लिए अभी तक अपना संस्मरण नहीं भेजा है तो हमें तत्काल radioplaybackindia@live.com पर मेल करें।

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र


“मैंने देखी पहली फिल्म” : आपके लिए एक रोचक प्रतियोगिता
दोस्तों, भारतीय सिनेमा अपने उदगम के 100 वर्ष पूरा करने जा रहा है। फ़िल्में हमारे जीवन में बेहद खास महत्त्व रखती हैं, शायद ही हम में से कोई अपनी पहली देखी हुई फिल्म को भूल सकता है। वो पहली बार थियेटर जाना, वो संगी-साथी, वो सुरीले लम्हें। आपकी इन्हीं सब यादों को हम समेटेगें एक प्रतियोगिता के माध्यम से। 100 से 500 शब्दों में लिख भेजिए अपनी पहली देखी फिल्म का अनुभव radioplaybackindia@live.com पर। मेल के शीर्षक में लिखियेगा ‘मैंने देखी पहली फिल्म’। सर्वश्रेष्ठ तीन आलेखों को 500 रूपए मूल्य की पुस्तकें पुरस्कारस्वरुप प्रदान की जायेगीं। तो देर किस बात की, यादों की खिड़कियों को खोलिए, कीबोर्ड पर उँगलियाँ जमाइए और लिख डालिए अपनी देखी हुई पहली फिल्म का दिलचस्प अनुभव। प्रतियोगिता में आलेख भेजने की अन्तिम तिथि 30 नवम्बर, 2012 है।

The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



Popular Posts सर्वप्रिय रचनाएँ