Saturday, July 21, 2012

पार्श्वगायक मुकेश के जन्मदिवस पर विशेष प्रस्तुति


सावन का महीना और मुकेश का अवतरण


हिन्दी फिल्मों में १९४१ से १९७६ तक सक्रिय रहने वाले मशहूर पार्श्वगायक स्वर्गीय मुकेश फिल्म-संगीत-क्षेत्र में अपनी उत्कृष्ठ स्तर की गायकी के लिए हमेशा याद किये जाते रहे हैं। हिन्दी फिल्मों में उन्हें सर्वाधिक ख्याति उनके गाये दर्द भरे नगमों से मिली। इसके अलावा उन्होने कई ऐसे गीत भी गाये हैं, जो राग आधारित गीतों की श्रेणी में आते हैं। २२ जुलाई, २०१२ को मुकेश जी का ८८-वां सालगिरह है। आज उनके जन्मदिवस की पूर्वसंध्या पर रेडियो प्लेबैक इंडिया के नियमित पाठक और मुकेश के अनन्य भक्त पंकज मुकेश, इस विशेष आलेख के माध्यम से मुकेश के गाये गीतों की चर्चा कर रहे हैं। साथ ही आपको सुनवा रहे हैं उनके गाये कुछ सुमधुर गीत।


मित्रों, मानसून के आने से ऋतुओं की रानी वर्षा, अपने पूरे चरम पर विराजमान है। दरअसल सावन के महीने और पार्श्वगायक मुकेश के बीच सम्बन्ध बहुत ही गहरा है। मुकेश जी की बहन चाँद रानी के अनुसार २२जुलाई, १९२३ को रविवार का दिन था, धूप खिली थी और मुकेश के जन्म के साथ ही अचानक सावन की रिमझिम बूँदें बरस पड़ीं और पूरा माहौल खुशनुमा हो गया। आइये शुरुआत करते हैं उन्हीं के गाये एक गीत से जो अक्सर घर पर किसी बच्चे के जन्म पर गया जाता है और हर माता-पिता अपने नवजात शिशु से ऐसी ही आशाएं लगाते होंगे जो इस गीत में विद्यमान है।

फिल्म ‘मन मन्दिर’ : "ऐ मेरे आँखों के पहले सपने..." : सहगायिका लता मंगेशकर 


आज पूरे भारतवर्ष में मुकेश को "दर्द भरे गीतों का जादूगर" कहा जाता है मगर राग आधारित गीतों से भी उनका लगाव रहा है। जब किसी एक साक्षात्कार में मुकेश जी से पूछा गया कि- "आप ने यूं तो सैकड़ों गाने गाये हैं मगर आप को किस तरह के गीत सबसे ज्यादा पसंद हैं?" इस पर उनका जवाब था- "अगर मुझे दस लाइट सॉंग (हलके फुल्के गाने) मिले और एक सैड (दर्द भरा गीत) मिले तो मैं दस लाइट छोड़कर एक सैड पसंद करूँगा और अगर मुझे दस सैड गाने मिले और एक क्लासिकल (शास्त्रीय), तो मैं दस सैड छोड़ कर एक क्लासिकल पसंद करूँगा!" तो आइये उन्ही का गाया एक राग आधारित गीत सुनवाते हैं। १९४८ में नौशाद के संगीत निर्देशन की एक फिल्म थी ‘अनोखी अदा’। इस फिल्म में मुकेश ने राग दरबारी कान्हड़ा पर आधारित एक बेहद सुरीला गाना गाया था- ‘कभी दिल दिल से टकराता तो होगा...’। इस राग पर आधारित जो भी स्तरीय गीत अब तक बने हैं, उनमें यह गीत भी शामिल है। फिल्म में मुकेश के गाये इस गीत का एक दूसरा संस्करण भी है, जिसे शमशाद बेगम ने गाया है। कहने की जरूरत नहीं है कि गीत के दोनों संस्करण में दरबारी के सुर स्पष्ट उभर कर आते हैं।

फिल्म ‘अनोखी अदा’ : ‘कभी दिल दिल से टकराता तो होगा...’ : राग दरबारी कान्हड़ा पर आधारित



यह भी एक विचित्र संयोग है कि मुकेश ने राग तिलक कामोद पर आधारित लगभग ७-८ गाने गाये हैं और ये सभी गाने बहुत लोकप्रिय हुए है। अब आइये आपको सुनवाते हैं, राग तिलक कामोद पर आधारित उनके प्रारंभिक दौर का एक सुमधुर गीत, जो उनके जीवन का पहला हिट गीत- "दिल जलता है तो जलने दे" (पहली नज़र) के आने से कुछ महीने पहले का है। फ़िल्म 'मूर्ति' का यह गीत राग तिलक कामोद पर आधारित है और इस गीत में उनकी सह-गायिकाएँ है- खुर्शीद और हमीदा बानो। संगीत बुलो सी रानी का है।

फिल्म ‘मूर्ति’ : "बदरिया बरस गई उस पार..." : राग तिलक कामोद पर आधारित



दोस्तों, समय सावन के महीने का है और मुकेश जी का जन्म भी इसी महीने में हुआ था, तो क्यूँ न सावन के मौसम पर उनका कोई गीत सुन लें। ऐसे अवसर के लिए सबसे पहला गीत जो हर किसी संगीत-प्रेमी या मुकेश-प्रेमी के मन में आता होगा, वह है फ़िल्म 'मिलन' का गीत "सावन का महीना पवन करे सोर..."। इस गीत के शुरुआत में आपने मुकेश और लता के बीच का संवाद जरूर पसंद किया होगा। कितने आश्चर्य की बात है कि लता जी "शोर" शब्द का सही उच्चारण कर रही हैं, मगर मुकेश हैं कि उन्हें "शोर" के बजाय "सोर" कहने के लिए आग्रह कर रहे हैं। दरअसल फिल्म की कहानी के अनुसार ही ऐसा संवाद रखा गया है, जिसमें नायक गाँव का एक भोला-भाला, अनपढ़ इंसान है जो नायिका को गाने की शिक्षा दे रहा है, और पूरे उत्तर भारत के गाँवों के लोग 'श' को 'स' उच्चारण करते है, जिसको परदे पर और परदे के पीछे बखूबी प्रस्तुत किया गया है। इस गीत से जुड़ी परदे के पीछे की एक और बात मैं आप सब को बताना चाहता हूँ। हमारे साथी राजीव श्रीवास्तव (लेखक, कवि, गीतकार और फिल्मकार) जब संगीतकार-जोड़ी लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के प्यारेलाल जी से पूछा तो पता चला कि जब ये गीत रिकॉर्ड होना था, उसी दौरान मुकेश जी को दिल का दौरा पड़ गया। अस्पताल से उपचार के बाद गाना रिकॉर्ड होना था, सभी तैयारियां हो गई। लता और मुकेश दोनों ने अभ्यास कर लिया। मगर आज हम इस गीत को जिस प्रकार सुनते हैं, शायद उसका प्रारूप ऐसा न होता, अगर मुकेश जी न होते। असल में जब नायक, नायिका को गाने का अभ्यास करा रहा था, उस समय आलाप, नायक को अर्थात्‍ मुकेश जी को लेना था। मगर उनकी बीमारी को ध्यान में रखते हुए संगीतकार लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल जी में यह हिम्मत नहीं हुई कि आलाप के लिए उनसे आग्रह करें, जो मुकेश के लिए कष्टदायक हो सकता था। मगर मुकेश जी संगीत के प्रति समर्पित जीवट के गायक थे। वो इस बात को भली-भांति जान गए और अभ्यास के दौरान लता से शर्त भी रख ली कि अगर मेरा आलाप उपयुक्त नहीं हुआ तो वो लता को १०० रुपये देंगे, नहीं तो लता देंगी। संगीतकार लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल जी को इस बात की बिलकुल भनक भी नहीं हुई कि कुछ बदलाव भी होने वाला है। गाना रिकॉर्ड होने से ठीक पहले वायदे के मुताबिक मुकेश जी ने अपने बटुवे से १०० रुपये का एक नोट निकाल कर, लता को चुपके से इशारा करते हुए शर्ट की जेब में डाल लिया। गाना शुरू हुआ, दोनों लोग गाने लगे, पहला अंतरा अपने अनुसार हुआ मगर जैसे ही दूसरा अंतरा पूरा हुआ, मुकेश जी ने आलाप लेना शुरू कर दिया। यह निश्चित किया गया था कि आलाप के स्थान पर वाद्य यंत्रों से भर दिया जाएगा। मुकेश के आलाप करते ही सब चौंक गए, किन्तु रेकार्डिंग जारी रहा। गाने की रेकॉर्डिंग समाप्त होने पर पता चला कि संगीतकार लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल यही चाहते भी थे। राग पहाड़ी पर आधारित यह गीत आप भी सुनिए।

फिल्म ‘मिलन’ : "सावन का महीना पवन करे सोर..." राग पहाड़ी पर आधारित

दोस्तों, मुकेश जी को जहाँ हम दर्द भरे गीतों का गायक मानते हैं, वहीँ संगीतकार कल्याणजी-आनंदजी उन्हें "अपने गीतों का सही गवैया" मानते हैं। जब फिल्म सरस्वती चन्द्र का गीत "चन्दन सा बदन चंचल चितवन..." मुकेश की आवाज़ में रिकॉर्ड होना तय हुआ तो किसी शास्त्रीय गायक ने कल्याणजी से कहा- "हम जैसे सुरों के साधक बसों में धक्के खाते फिरते है और मुकेश एक फिल्मी पार्श्वगायक होकर मर्सिडीज़ में कैसे चलते हैं? उस वक्त तो कल्याणजी चुप रहे, मगर गाना रिकॉर्ड होने के बाद जब उन्हें सुनाया तो बोले "अब समझ में आया मुकेश मर्सिडीज़ में क्यों चलते हैं”? मुकेश बिना किसी ट्रेनिंग (प्रशिक्षण) के राग आधारित गीत खूब गा लेते थे। दरअसल ये मुकेश जी का शास्त्रीय संगीत के प्रति लगाव ही था जो ऐसे गीत उनके होंठ लगते ही सुसज्जित हो उठते हैं। गायन की जो कुछ भी शिक्षा उन्होंने पायी, वो शुरुआती दिनों (१९४०-१९४५) में पंडित जगन्नाथ जी से मिली। अब आपको जो गीत सुनाया जा रहा है, वह राग कल्याण पर आधारित है।

फिल्म ‘सरस्वती चन्द्र’ : "चन्दन सा बदन चंचल चितवन..." : राग कल्याण पर आधारित



संगीतकार रोशन और गायक मुकेश न केवल फ़िल्मी दुनिया में एक दूसरे के व्यावसायिक तौर पर मित्र थे अपितु दोनों बचपन में एक ही विद्यालय के सहपाठी भी थे। जब भी कभी कोई विद्यालय में संगीत, नाटक इत्यादि कार्यक्रम का आयोजन होता, दोनों लोग ज़रूर शरीक होते। जहाँ मुकेश गीत गाते वहीँ रोशन संगीत की बागडोर सँभालते, उनका बखूबी साथ निभाते थे। तो आइये क्यूँ न एक बहुत ही लोकप्रिय गीत सुना जाये जो इन दो कलाकारों द्वारा सृजित किया गया है। इस गीत के बनने का किस्सा बड़ा ही दिलचस्प है। इन्दीवर के लिखे इस गीत के लिए रोशन ने कुछ धुन तैयार की थी मगर उन्हें कुछ पसंद नहीं आ रहा था। यूँ लगता था मानो कुछ कमी है, कुछ नया होना चाहिए जो उस समय के माझी, नाव, नदी आदि गीतों की धुनों से अलग हो। करीब पूरा महीना बीत गया मगर कुछ बात नहीं बनी। ऐसे में अचानक एक दिन रोशन, मुकेश और इन्दीवर के साथ अपना हारमोनियम लेकर कार से सैर पर निकले। एक जगह तालाब दिखा तो बैठ कर कुछ क्षण बिताने का मन हुआ। रोशन ने जैसे ही अपना पांव तालाब के शीतल जल में डाला, अचानक दोनों साथियों से बोल पड़े- "धुन बन रही है", जल्दी से कार से हारमोनियम लाये और वहीँ बैठे तीनों ने मिल कर गीत के संगीत की रचना कर डाली। अगले ही दिन स्टूडियो में जाकर यह गीत रिकॉर्ड हो गया। यह गीत लोक-धुन की सोंधी खुशबू से सराबोर है।

फिल्म ‘अनोखी रात’ : “ओह रे ताल मिले नदी के जल में..." : लोक संगीत पर आधारित

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मुकेश के गाये गीतों में राग-आधारित अनेक गीत लोकप्रिय हुए। इन गीतों में राग भैरवी और तिलक कामोद के स्वरों में गाये गीतों की संख्या अधिक हैं। ये दोनों राग उनकी आवाज़ में बहुत अच्छे भी लगते हैं। अब चलते-चलते राग भैरवी के सुरों पर आधारित एक प्यारा सा गीत आपको सुनाते हैं। यह गीत 1966 की फिल्म तीसरी कसम का है, जिसे मुकेश ने अपना स्वर दिया था। बीच-बीच में राज कपूर की आवाज भी है। इस गीत में लोक संगीत का स्पर्श है और भैरवी के स्वर भी मौजूद हैं।

फिल्म ‘तीसरी कसम’ : “दुनिया बनाने वाले..." : राग भैरवी पर आधारित

शोध व आलेख- पंकज मुकेश

इसी गीत के साथ हम सब गायक मुकेश को अपनी भावांजलि अर्पित करते है। अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करने के लिए radioplaybackindia@live.com पर मेल भेजें।

Friday, July 20, 2012

कहानी पॉडकास्ट - बिखरते रिश्ते - सुधा ओम ढींगरा - शेफाली गुप्ता

'बोलती कहानियाँ' इस स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने अर्चना चावजी की आवाज़ में प्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार हरिशंकर परसाई की कथा "चौबे जी" का पॉडकास्ट सुना था। आवाज़ की ओर से आज हम लेकर आये हैं सुधा ओम ढींगरा द्वारा लिखित हृदयस्पर्शी कहानी "बिखरते रिश्ते", जिसको स्वर दिया है शेफाली गुप्ता ने।

बिखरते रिश्ते का पाठ्य रचनाकार ब्लॉग पर उपलब्ध है।

इस कहानी का कुल प्रसारण समय 19 मिनट 38 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं। यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।

यहाँ तो बच्चे तीन-चार भाषाएँ सीखते हैं, पर बोलते अपनी मातृभाषा हैं। इसके लिए माँ-बाप को कोशिश करने की बहुत जरूरत है। हिंदी को लेकर कुंठित न हों।~ सुधा ओम ढींगरा

सुधा ओम ढींगरा अमेरिका में हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए जुटीं हैं। वे नार्थ कैरोलाईना में रहती हैं।

हर शुक्रवार को "बोलती कहानियाँ" पर सुनें एक नयी कहानी

"आकाश मुस्करा कर रुक गए ...। जब भी वह तनाव में होती है, वे बस मुस्करा देते हैं, कहते कुछ नहीं।" (सुधा ओम ढींगरा की "बिखरते रिश्ते" से एक अंश)

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#26th Story, Bikharate Rishte: Sudha Om Dhingra/Hindi Audio Book/2012/26. Voice: Shaifali Gupta

Thursday, July 19, 2012

स्मृतियों के झरोखे से : भारतीय सिनेमा के सौ साल – 6



भूली-बिसरी यादें


भारतीय सिनेमा-निर्माण के शताब्दी वर्ष में आयोजित हमारे इस विशेष अनुष्ठान- ‘स्मृतियों के झरोखे से’ के एक नए अंक में आपका स्वागत है। विगत एक सौ वर्षों में भारतीय जनमानस को सर्वाधिक प्रभावित करने वाला और सर्वसुलभ कोई माध्यम रहा है तो वह है, सिनेमा। 3मई, 1913 को मूक सिनेमा से आरम्भ इस यात्रा का पहला पड़ाव 1931 में आया, जब हमारा सिनेमा सवाक हुआ। इस स्तम्भ में हम आपसे मूक और सवाक युग के कुछ विस्मृत ऐतिहासिक क्षणों को साझा कर रहे हैं।

‘राजा हरिश्चन्द्र’ से पहले

पिछले अंकों में हम आपसे यह चर्चा कर चुके हैं कि 3मई, 1913 को विदेशी उपकरणों की सहायता से किन्तु भारतीय कथानक पर भारतीय कलाकारों द्वारा पहले कथा-चलचित्र ‘राजा हरिश्चन्द्र’ का निर्माण और प्रदर्शन हुआ था। इस पहली मूक फिल्म का प्रदर्शन 1913 में हुआ था, किन्तु इस सुअवसर के लिए भारतीयों ने 1896 से ही प्रयास करना शुरू कर दिया था। पिछले अंक में हमने ऐसे ही कुछ प्रयासों की चर्चा की थी। आज ऐसे कुछ और प्रयासों की हम चर्चा करेंगे।

वर्ष 1900 में मुम्बई के एक विद्युत इंजीनियर एफ.बी. थानावाला ने एक वृत्तचित्र ‘स्प्लेंडिड न्यू व्यू आफ़ बाम्बे’ का निर्माण किया था। इस फिल्म का प्रदर्शन कुछ अन्य विदेशी फिल्म के साथ किया गया था। इस समय तक सिनेमा माध्यम का उपयोग किसी रोचक विषय के फिल्मांकन तक सीमित था। किसी निर्धारित कथानक पर फिल्म निर्माण की सोच का विकास नहीं हो सका था। कथाचित्र निर्माण का प्रयास सर्वप्रथम कलकत्ता के सेन बन्धुओं (हीरालाल और मोतीलाल) ने किया। सेन बन्धुओं ने 1898 में लंदन से एक ‘बाइस्कोप
हीरालाल सेन
सिनेमेट्रोग्राफिक मशीन’ खरीदा था और इसके माध्यम से कुछ विदेशी वृत्तचित्रों का प्रदर्शन कर रहे थे। 1901 में उनके मन में फिल्म निर्माण का विचार आया। उन दिनों कलकत्ता में मंच-नाटक अत्यन्त लोकप्रिय थे। उन्होने प्रयोग के तौर पर एक चर्चित बांग्ला नाटक की प्रस्तुति के दौरान फिल्मांकन किया। इस प्रयोग को आंशिक सफलता मिली। मंच-नाटकों का दर्शक संवादों को सुन सकता था, किन्तु उसका फिल्मांकन तो वाणीविहीन था। फलतः यह प्रयोग नाट्य-प्रेमी दर्शकों के बीच ही आंशिक रूप से सफल हुआ।

सेन बन्धुओं ने अपना यह प्रयास जारी रखा। 1903 में उन्होने बांग्ला के सुविख्यात रंगकर्मी अमरनाथ दत्त के सहयोग से कुछ ऐसे मंच-नाटकों का फिल्मांकन किया, जिनके कथानक जन-जन में लोकप्रिय थे। 6जून, 1903 को कलकत्ता के क्लासिक थियेटर में एक पूर्णकालिक बांग्ला नाटक के फिल्मांकन का सफल प्रदर्शन हुआ था। बांग्ला के चर्चित साहित्यकार बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय कृत सीताराम, अलीबाबा, भ्रमर, हरिराज, सरला और बुद्धदेव जैसे नाटकों का फिल्मांकन कर सेन बन्धुओं ने मूक फिल्मों की सफलता का एक नया द्वार खोला। सेन बन्धुओं को किसी उत्पाद के प्रचार के लिए पहली फिल्म बनाने का श्रेय भी दिया जाएगा। उन्होने 1903 में ही ‘जावाकुसुम केश तेल’ के प्रचार के लिए विज्ञापन-फिल्म का निर्माण भी किया था।

सवाक युग के धरोहर
विनायक राव पटवर्धन 

सवाक फिल्मों के आरम्भिक दौर में 1जनवरी, 1932 को एक बेहद सफल फिल्म ‘माधुरी’ का प्रदर्शन हुआ था। चौथी शताब्दी में गुप्तवंश शासन के एक ऐतिहासिक कथानक पर आधारित इस फिल्म में युद्ध के रोमांचक दृश्य थे। मोहनलाल इस फिल्म के पटकथा लेखक थे। मालवा और कन्नौज राज्यों के बीच की शत्रुता और उनके बीच हुए युद्ध का प्रसंग फिल्म का केन्द्रविन्दु था। एक ऐसे ही प्रसंग में नायिका माधुरी पुरुष वेष धारण कर कन्नौज के महासामन्त से युद्ध कर मालवा के राजकुमार को मुक्त कराती है। फिल्म के संगीतकार प्राणसुख नायक थे, जिन्होने तत्कालीन शास्त्रीय गायक विनायक राव पटवर्धन से कई मधुर गीत गवाए, जिसके बल पर फिल्म को आशातीत सफलता मिली। विनायक राव पटवर्धन फिल्म के नायक और सुलोचना नायिका थीं।

इसी फिल्म में विनायक राव के गाये गीत- ‘सरिता सुगन्ध शोभे बसन्त...’ का ग्रामोफोन रेकार्ड भी बना था। ग्रामोफोन कम्पनी ने पहली बार किसी भारतीय फिल्म के संगीत का रेकार्ड बनाया था। ‘धुनों की यात्रा’ पुस्तक के लेखक पंकज राग के अनुसार- ‘फिल्म संगीत का पहला रेकार्ड जारी होने का यह तथ्य अकेले ही प्राणसुख नायक को एक ऐतिहासिक महत्त्व दे जाता है’। 1932 में प्रदर्शित फिल्म ‘माधुरी’ के दो दुर्लभ गीत आज हम आपके लिए प्रस्तुत कर रहे है। पहला गीत- ‘अहंकार करके हमेशा...’ तीनताल में और दूसरा गीत- ‘परमुख वाली तू कमला...’ द्रुत एकताल में निबद्ध किया गया है। प्राणसुख नायक के संगीतबद्ध किये दोनों गीतों को विनायक राव पटवर्धन ने स्वर दिया है।

फिल्म माधुरी : ‘अहंकार करके हमेशा...’ विनायक राव पटवर्धन


फिल्म माधुरी : ‘परमुख वाली तू कमला...’ विनायक राव पटवर्धन



इसी गीत के साथ इस अंक से हम विराम लेते हैं। आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, अवश्य लिखिएगा। आपकी प्रतिक्रिया, सुझाव और समालोचना से हम इस स्तम्भ को और भी सुरुचिपूर्ण रूप प्रदान कर सकते हैं। ‘स्मृतियों के झरोखे से : भारतीय सिनेमा के सौ साल’ के आगामी अंक में बारी है- ‘मैंने देखी पहली फिल्म’ प्रतियोगिता की। हमारे अगले अंक में जो आलेख शामिल होगा वह प्रतियोगी वर्ग से होगा। आपके आलेख हमें जिस क्रम से प्राप्त हुए हैं, उनका प्रकाशन हम उसी क्रम से कर रहे हैं। यदि आपने ‘मैंने देखी पहली फिल्म’ प्रतियोगिता के लिए अभी तक अपना संस्मरण नहीं भेजा है तो हमें तत्काल radioplaybackindia@live.com पर मेल करें।

कृष्णमोहन मिश्र

Wednesday, July 18, 2012

10 गज़लों गीतों के माध्यम से याद करें महान मेहदी हसन साहब को

तालियों की गडगडाहट से गूँजता सभागार और सुरों को अपने तान में समेटती मेहदी हसन साहब की आवाज़. दोस्तों शायद अब ये समां कभी किसी संगीत प्रेमी को देखना नसीब नहीं हो सकेगा क्योंकि खुदा ने उन्हें हम सब से छीनकर अपने पास बुला लिया है ताकि जन्नतें भी उनकी महफिलों से रोशन हो सके. पर उनकी आवाज़ का बेशकीमती खज़ाना तो आज भी हमारे पास सुरक्षित है और ये जादू, कभी कम नहीं हो सकेगा इस बात को हर संगीत प्रेमी स्वीकार करेगा.

दोस्तों सुनिए हमारा ये खास कार्यक्रम, जिसके माध्यम से हम श्रद्धान्जली दे रहे हैं शहंशाह-ए-ग़ज़ल मेहदी हसन साहब को, स्क्रिप्ट है विश्व दीपक की और स्वर है सजीव सारथी का. लगभग ढेढ घंटे के इस पोडकास्ट में आपको मिलेंगें मेहदी साहब के गायन के कई मुक्तलिफ़ अंदाज़. तो दोस्तों कुछ समय के लिए अपने रोजमर्रा के काम से मुक्त होकर डूब जाईये सुरों के इस अथाह समुन्दर में जिसका नाम है मेहदी हसन. 




आपकी सुविधा के लिए हम लिखित स्क्रिप्ट यहाँ संलग्न कर रहे हैं 

स्वर-साम्राज्ञी लता मंगेशकर ने जिनके वो सबसे प्रिय गायक थे, उनके इन्तेकाल की खबर सुनकर कहा -"आज बहुत बड़े ग़ज़ल गायक कलाकार मेहदी हसन साहब हमारे बीच नहीं रहे, मुझे इस बात का बहुत दु:ख है, ग़ज़ल-गायकी के क्षेत्र में उन्होंने बहुत बड़ा परिवर्तन लाया, आज उनके जाने से ग़ज़ल की बहुत बड़ी हानि हुई है, अब उन जैसा कलाकार फिर से आना मुश्किल है, वो बहुत बड़े शास्त्रीय संगीत के गायक भी थे, और उनके गाने में राजस्थान के संगीत की खुशबू भी थी, उन्होंने मेरे लिए कुछ गाने बनाए थे उनमें से हीं एक ग़ज़ल मैंने जो उन्होंने मुझे गाके भेजी थी, उसका मैंने डुएट रिकार्ड किया था, उनके साथ मेरा ये एक हीं गाना है, मैं ईश्वर से प्रार्थना करती हूँ कि मेहदी साहब की आत्मा को वो शांति प्रदान करें" यहाँ पर बताते चलें कि लता दी "सरहदें" एलबम के "तेरा मिलना बड़ा अच्छा लगे" गाने की बात कर रही हैं, जिसकी आधी रिकार्डिंग पाकिस्तान में और आधी हिन्दुस्तान में हुई थी, क्योंकि मेहदी हसन साहब चाह कर भी हिन्दुस्तान नहीं आ पड़े थे। यह ग़म उन्हें आखिर तक कचोटता रहा था। 

मेहदी हसन यानि कि हमारे खां साहब का जन्म राजस्थान के झुंझुनू जिले के लूणा गांव में १८ जुलाई १९२७ को हुआ था। खां साहब के हिसाब से उनका जन्म "कलावंत" घराने की १६वीं पीढी में हुआ था। "कलावंत" नाम से हीं मालूम चलता है कि इस घराने में "कला" की कैसी काबिलियत थी। मौशिकी की शुरूआती तालीम उन्होंने अपने अब्बाजान उस्ताद अजीम खान और चचाजान उस्ताद ईस्माइल खान से ली। दोनों में हीं ध्रुपद के अच्छे जानकार थे। सुनते है ये ठुमरी खान साहब की आवाज़ में खां साहब ने अपनी ग़ज़लों को राग यमन और राग ध्रुपद की बारीकियों से नवाज़ा था। इन्होंने ग़ज़ल-गायिकी को उस दौर में अलग पहचान दी, जब ग़ज़लों का मतलब उस्ताद बरकत अली खान, बेगम अख्तर और मुबारक बेगम हुआ करते थे। हिन्दुस्तान के बंटवारे से पहले फाजिल्का बंगला यानि कि अविभाजित पंजाब में उन्होंने अपना पहला पर्फोमेंश दिया। वह परफोर्मेंश ध्रुपद-खयाल पर आधारित था। खां साहब दर-असल ध्रुपद-गायक हीं बनना चाहते थे, ग़ज़ल तो पंजाबी में कहें तो "ऐं वैं" हीं हो गया। 

दोस्तों, खां साहब शहंशाह-ए-ग़ज़ल के नाम से जाने जाते थे। कहा जाता है कि ग़ज़लों में उनके जैसा सुर किसी और का नहीं लगा अब तक। हैरत होती है यह सोचकर कि ऐसा इंसान जो एक हुनर में इस कदर माहिर हो, उसकी शुरूआत किसी और हीं हुनर से हुई थी। जी हाँ, मौशिकी की पहली सीढी जो उन्होंने रेडियो पाकिस्तान के मार्फ़त १९५७ में चढी, वहाँ उनका कार्यक्रम ठुमरी का था। कहते हैं कि खां साहब ठुमरी और ध्रुपद के हीं होकर रह गए होते अगर रेडियो पाकिस्तान के दो अधिकारियों जेड ए बुखारी और रफ़ीक़ अनवर साहब ने उर्दू में उनकी खासी दिलचस्पी और साफ़ तलफ़्फ़ुज़ को देखकर उन्हें ग़ज़ल गाने के लिए प्रेरित न किया होता। हम शुक्रिया करते हैं उन दोनों का, जिनकी वजह से ग़ज़लों को खां साहब नसीब हुए। १९४७ में जब हिन्दुस्तान तक़्सीम हुआ तो मेहदी हसन साहब पूरे परिवार के साथ पाकिस्तान चले गए। हिन्दुस्तान छोड़ने का सबसे बड़ा नुकसान उन्हें यह हुआ कि पाकिस्तान में न रहने को घर, न खाने को रोटी.... पैसों की तंगहाली ने उन्हें मौशिकी से लगभग जुदा हीं कर दिया। पूरे परिवार का पेट पालने के लिए पहले वे एक साईकिल की दुकान में काम करने लगे। वहाँ से फारिग हुए तो उन्हें कार और डीजल ट्रैक्टर का मैकेनिक बनना पड़ा। सब ऐसा हीं चलता रहता अगर पाकिस्तान रेडियो ने उन्हें मौका न दिया होता। बस राह दिखाने की देर थी, मंज़िल ने तो खुद अपने राहगीर को चुन रखा था। 

मेहदी साहब ने जो चलना शुरू किया तो क्या फिल्मी मोड़, क्या गैर-फिल्मी मोड़.. हर जगह मील के पत्थर उन्हीं के नाम के थे। ग़ज़ल-गायिकी में अपना नाम सोने में दर्ज़ कर लेने के बाद उन्होंने पाकिस्तानी फिल्म-संगीत को आजमाना चाहा। उनका यह प्रयोग भी काबिल-ए-तारीफ़ रहा। १९६९ में रीलिज हुई फिल्म "तुम मिले प्यार मिला" में मल्लिका-ए-तरन्नुम नूरजहाँ के साथ उनका गाना "आपको भूल जाएँ हम, इतने तो बेवफा नहीं" उतना हीं मशहूर है, जितना कि १९७५ की "मेरा नाम है मोहब्बत" फिल्म का नाहीद अख्तर के साथ गाया हुआ "ये दुनिया रहे न रहे मेरे हमदम" या फिर १९६७ की "ज़िंदगी कितनी हसीं है" फिल्म का "जब कोई प्यार से बुलाएगा"। फिल्म "दर्द" का "तेरी महफ़िल से ये दीवाना चला जाएगा" तो रूलाने में इतना कामयाब हुआ कि हिन्दुस्तान ने इसे "आज की रात मेरे दिल की सलामी ले ले" नाम से अपने इमोशन्स, अपनी भावनाओं में शामिल कर लिया।

बंटवारे के बाद अपना गाँव छूटने का दर्द उन्हें हमेशा सालता रहता था। १९७७ में जब वे पहली बार अपने गाँव लूणा आए तो इस कदर भाव-विभोर हो गए कि मिट्टी में लोट-लोट कर रोने लगे। उस समय वे जयपुर आए हुए थे सरकारी मेहमान बनकर। और उन्हीं के कहने पर सारा जत्था लूणा गया था। कहते हैं कि काफ़िला जब एक मंदिर के सामने से गुजर रहा था तो उन्होंने गाड़ी रूकवा दी और मंदिर की सीढियो के नीचे रेत में पलटियाँ खाने लगे। इस दृश्य के गवाह रहे कवि कृष्ण कल्पित बताते हैं कि उस वक़्त मेहदी साहब का बेटा डर गया कि वालिद साहब को क्या हो गया। बाद में जब मेहदी साहब से पूछा गया तो उन्होंने कहा कि यहीं बैठकर वे भजन गाया करते थे। सालों बाद माँ से बेटा मिले तो आखिर यही होता है।

२००० में खां साहब पैरलाइसिस के शिकार हुए और तब से मौशिकी से दुर हो गए। उनकी आवाज़ चली गई। कई सालों तक उन्होंने कुछ न कहा। एक शख्स हैं..अफज़ल सुभानी ,जो अपने बारे में कहते हैं कि "पाकिस्तान से बाहर का मैं पहला शागिर्द हूं, जिसे मेहदी हसन साहब ने गंडा बांध कर विधिवत शिष्य बनाया था"। मेहदी साहब की आवाज़ जाने के बाद वे हमेशा उनकी खबर लिया करते थे। एक बार जब उन्होंने टेलीफोन किया तो मेहदी साहब ने खुद उठाया और पूरे जोश के साथ घोषणा की कि "मेरी आवाज़ वापस आ गई है।" अफ़ज़ल सुभानी की मानें तो मेहदी साहब को उन्होंने इससे ज्यादा खुश कभी नहीं पाया था। दु:ख है कि यह खुशी ज्यादा दिनों तक रह नहीं पाई। 

"अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख्वाबों में मिलें, जैसे सूखे हुए फूल किताबों में मिलें"... तुम बिछड़ गए खां साहब हम सबसे... अब तो बस यही दरख्वास्त है कि "रंजिश हीं सही दिल हीं दुखाने के लिए आ, आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ"। जिस शख्स के लिए मन्ना दा ने कहा था कि उनकी एक हीं तमन्ना है कि वे कभी मेहदी हसन की तरह गा सकें, मरहूम जगजीत सिंह जी ने कहा था कि जो ग़ज़ल गाना चाहता है वह पहले मेहदी साहब की तरह शास्त्रीय संगीत में पारंगत हो ले.... आज उस शख्स ने इस दुनिया से अपनी आवाज़ हटा ली है और भेंट कर दी है दूसरी दुनिया को.. जहाँ पहले से हीं कई फ़नकार उनका इंतज़ार कर रहे थे। १३ जून को वह आवाज़ हमेशा के लिए शांत हो गई। अल्लाह उनकी रूह को बरकत दे... आमीन!!


फुटनोट

दोस्तों जैसा कि आप वाकिफ हैं कि प्रस्तुत पोडकास्ट को हम किश्तों में प्रकाशित कर रहे हैं पिछले ढेढ दो हफ़्तों से, इन कड़ियों को निरंतर सुनते हुए हमारे नियमित श्रोता दिलीप कवठेकर जो खुद भी एक गायक हैं, अपनी तरफ से मेहदी साहब की एक ग़ज़ल को गाकर हमारे लिए भेजा है, क्यों न उनके इस श्रद्धा पुष्प को भी हम अपनी श्रद्धान्जली का हिस्सा बनायें...लीजिए सुनिए दिलीप जी की आवाज़ में मेहदी साहब की ये गज़ल

Tuesday, July 17, 2012

ख्वाब क्यों ???...कविताओं में जवाब तलाशता एक सवाल

शब्दों की चाक पर - एपिसोड 07

शब्दों की चाक पर हमारे कवि मित्रों के लिए हर हफ्ते होती है एक नयी चुनौती, रचनात्मकता को संवारने  के लिए मौजूद होती है नयी संभावनाएँ और खुद को परखने और साबित करने के लिए तैयार मिलता है एक और रण का मैदान. यहाँ श्रोताओं के लिए भी हैं कवि मन की कोमल भावनाओं उमड़ता घुमड़ता मेघ समूह जो जब आवाज़ में ढलकर बरसता है तो ह्रदय की सूक्ष्म इन्द्रियों को ठडक से भर जाता है. तो दोस्तों, इससे पहले कि  हम पिछले हफ्ते की कविताओं को आत्मसात करें, आईये जान लें इस दिलचस्प खेल के नियम - 


1. कार्यक्रम की क्रिएटिव हेड रश्मि प्रभा के संचालन में शब्दों का एक दिलचस्प खेल खेला जायेगा. इसमें कवियों को कोई एक थीम शब्द या चित्र दिया जायेगा जिस पर उन्हें कविता रचनी होगी...ये सिलसिला सोमवार सुबह से शुरू होगा और गुरूवार शाम तक चलेगा, जो भी कवि इसमें हिस्सा लेना चाहें वो रश्मि जी से संपर्क कर उनके फेसबुक ग्रुप में जुड सकते हैं, रश्मि जी का प्रोफाईल यहाँ है.


2. सोमवार से गुरूवार तक आई कविताओं को संकलित कर हमारे पोडकास्ट टीम के हेड पिट्सबर्ग से अनुराग शर्मा जी अपने साथी पोडकास्टरों के साथ इन कविताओं में अपनी आवाज़ भरेंगें. और अपने दिलचस्प अंदाज़ में इसे पेश करेगें.

3. हमारी टीम अपने विवेक से सभी प्रतिभागी कवियों में से किसी एक कवि को उनकी किसी खास कविता के लिए सरताज कवि चुनेगें. आपने अपनी टिप्पणियों के माध्यम से ये बताना है कि क्या आपको हमारा निर्णय सटीक लगा, अगर नहीं तो वो कौन सी कविता जिसके कवि को आप सरताज कवि चुनते. 

चलिए अब लौटते हैं अनुराग शर्मा और अभिषेक ओझा की तरफ जो आज आपके लिए लेकर आये हैं एक सवाल और उसके कुछ उलझे सुलझे जवाब. आज के कार्यक्रम की स्क्रिप्ट लिखी है हमारे प्लेबैक इंडिया के प्यारे सदस्य विश्व दीपक ने. तो दोस्तों सुनिए सुनाईये और छा जाईये...

(नीचे दिए गए किसी भी प्लेयेर से सुनें)





या फिर यहाँ से डाउनलोड करें 

Monday, July 16, 2012

जारी है जंग तीसरे सेगमेन्ट का, जुड़िये इस मज़ेदार खेल से...


सिने-पहेली # 29 (16 जुलाई, 2012) 


रेडियो प्लेबैक इण्डिया के साप्ताहिक स्तंभ 'सिने पहेली' के सभी पाठकों और प्रतियोगियों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! जैसा कि पिछली कड़ी में हमने घोषणा की है, आज एक बार फिर से दोहरा देते हैं कि 'सिने पहेली महाविजेता' कैसे बना जा सकता है। इस प्रतियोगिता को हमने 10 सेगमेण्ट्स में बाँटा है, और हर सेगमेण्ट में होते हैं 10 एपिसोड्स। हर सेगमेण्ट के अंत में प्रथम स्थान पाने वाले प्रतियोगी को 3 अंक, दूसरा स्थान पाने वाले प्रतियोगी को 2 अंक और तीसरा स्थान पाने वाले प्रतियोगी को 1 अंक दिया जा रहा है, और ये अंक महाविजेता की लड़ाई में जुड़ते चले जायेंगे। 10 सेगमेण्ट्स पूरे होने पर जिस प्रतियोगी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें महाविजेता का खिताब दिया जाएगा। नए प्रतियोगियों से हम यही कहना चाहेंगे कि अब भी कुछ नहीं बिगड़ा है, आज से शुरू करके भी आप महाविजेता बन सकते हैं। फ़िल्हाल आपको बता दें कि महाविजेता स्कोर-कार्ड क्या कहता है...



अब एक और महत्वपूर्ण सूचना...

'सिने पहेली' अब शनिवार के दिन

दोस्तों, आपको यह जानकर ख़ुशी होगी कि 'सिने पहेली' के 31-वीं कड़ी से यह स्तंभ सोमवार के स्थान पर शनिवार सुबह 9:30 पर पोस्ट हुआ करेगा। इस तरह से पहेलियों को सुलझाने के लिए आपको शनिवार और रविवार, दोनों छुट्टियों के दिन मिल जाया करेंगे। आपको शनिवार पूछे गए पहेलियों के जवाब अगले सप्ताह के बृहस्पतिवार शाम 5 बजे तक लिख भेजने होंगे। इस बदले हुए स्वरूप से हमें उम्मीद है कि पहेलियों को सुलझाने में आपको सुविधा होगी।

और अब आज की पहेलियाँ...

आज की पहेलियाँ: चित्र-गीत

नीचे हम चार चित्र दिखा रहे हैं। हर चित्र में कुछ वस्तुएँ, कुछ चीज़ें दिखाई गई हैं। हर चित्र के लिए आपको एक ऐसा फ़िल्मी गीत सुझाना होगा जिस गीत में चित्र में दिखाए वस्तुओं या विषयों का "शाब्दिक" उल्लेख हो। फ़िल्मांकन में चाहे इन वस्तुओं का उल्लेख हो या न हो कोई बात नहीं, पर शब्दों में (गीत के बोलों में) उल्लेख ज़रूर होना चाहिए। ये शब्द गीत के अंतरों में भी हो सकते हैं। अगर किसी चित्र में अंग्रेज़ी में कुछ लिखा गया है तो उसका हिन्दी में शब्द ढूंढ़ने की कोशिश करें। हर चित्र के लिए सही गीत सुझाने पर आपको मिलेंगे 4 अंक। अर्थात्, आज की कड़ी के कुल अंक हैं 16। तो ये रहे चार चित्र; इन्हें ध्यान से देखिए, सोचिए और बताइए कि ये चार चित्र कौन से चार गीतों की तरफ़ इशारा करते हैं।

1.




2.




3.



4.

*********************************************

और अब ये रहे इस प्रतियोगिता में भाग लेने के कुछ आसान से नियम....

१. जवाब भेजने के लिए आपको करना होगा एक ई-मेल cine.paheli@yahoo.com के ईमेल पते पर। 'टिप्पणी' में जवाब न कतई न लिखें, वो मान्य नहीं होंगे।

२. ईमेल के सब्जेक्ट लाइन में "Cine Paheli # 29" अवश्य लिखें, और जवाबों के नीचे अपना नाम व स्थान लिखें।

३. आपका ईमेल हमें शनिवार 21 जुलाई शाम 5 बजे तक अवश्य मिल जाने चाहिए। इसके बाद की प्रविष्टियों को शामिल कर पाना हमारे लिए संभव न होगा। अगर किसी महत्वपूर्ण कारण से आप जवाब समय पर नहीं भेज सके, तो इस स्थिति में हमें +919878034427 मोबाइल नंबर पर SMS के माध्यम से अवश्य सूचित करें।

४. आप अपने जवाब एक ही ईमेल में लिखें। किसी प्रतियोगी का पहला ईमेल ही मान्य होगा। इसलिए सारे जवाब प्राप्त हो जाने के बाद ही अपना ईमेल भेजें।

है न बेहद आसान! तो अब देर किस बात की, लगाइए अपने दिमाग़ पे ज़ोर और जल्द से जल्द लिख भेजिए अपने जवाब। महाविजेता बन कर 5000 रुपये के नकद इनाम पर लगाइए अपने नाम का मोहर!


'सिने पहेली - 28' के सही जवाब


१. "बिन साजन झूला झूलूँ (दामिनी) - आमिर ख़ान व मीनाक्षी शेशाद्री।

२. "पतझड़ सावन बसन्त बहार" (सिंदूर); "दिल में आग लगाए सावन का महीना" (अलग-अलग), "सावन का महीना पवन करे सोर" (मिलन); "मधुबन ख़ुशबू देता है, सागन सावन देता है" (साजन बिना सुहागन); "आशाओं के सावन में" (आशा); "सावन का महीना, शादी बिना मुश्किल है जीना" (हलचल)

नोट: "गरजत बरसत सावन आयो रे" (बरसात की रात) गीत सही जवाब नहीं है क्योंकि इसका फ़िल्मांकन स्टेज पर नहीं बल्कि कमरे में हुआ है। जिन प्रतियोगियों ने यह गीत सुझाया है, उन्हें अंक नहीं दिया है।

३. फ़िल्म 'सबक' के गीत "बरखा रानी ज़रा जमके बरसो" (मुकेश) और "बरखा बैरन ज़रा थम के बरसो" (सुमन कल्याणपुर)

४. गायिका शमशाद बेगम, फ़िल्म 'ख़ज़ांची'

५. आशा पारेख पर फ़िल्माया यह गीत है "छायी बरखा बहार पड़े अंगना फुहार" (चिराग)

६. चौथा गीत "गरजत बरसत भीजत अ‍इलो" (मल्हार) राग गौड़ मल्हार पर आधारित है, बल्कि बाकी तीन गीत आधारित है रार मियाँ की मल्हार पर।


'सिने पहेली - 28' के विजेता


1. अल्पना वर्मा, अल-आइन, यू.ए.ई --- 12 अंक

2. क्षिति तिवारी, इंदौर --- 12 अंक

3. प्रकाश गोविन्द, लखनऊ --- 12 अंक

4. सलमन ख़ान, अलीगढ़ --- 12 अंक

5. रीतेश खरे, मुंबई --- 12 अंक

6. विजय कुमार व्यास, बीकानेर --- 12 अंक

7. गौतम केवलिया, बीकानेर --- 12 अंक

8. पंकज मुकेश, बेंगलुरू --- 10 अंक 

9. अमित चावला, दिल्ली --- 8 अंक

10. चन्द्रकान्त दीक्षित, लखनऊ --- 4 अंक


सभी प्रतियोगियों को हार्दिक बधाई। अंक सम्बंधित अगर आपको किसी तरह की कोई शिकायत हो, तो cine.paheli@yahoo.com के पते पर हमें अवश्य सूचित करें। 

'सिने पहेली' प्रतियोगिता के तीसरे सेगमेण्ट में अब तक का सम्मिलित स्कोर-कार्ड यह रहा...



शुभ्रा शर्मा जी के इस सप्ताह प्रतियोगिता में भाग न लेने की वजह से वो दूसरे स्थान से लुढ़क कर उतर गईं हैं चौथे स्थान पर, जबकि इस मौके का फ़ायदा उठाते हुए रीतेश खरे चढ़ गए हैं दूसरे पायदान पर, जबकि गौतम केवलिया चढ़ गए हैं तीसरे पायदान पर। शुभ्रा जी के साथ पंकज मुकेश भी चौथे स्थान पर विराजमान हैं। बड़ा मज़ेदार हो गया है यह सेगमेण्ट; और इसे और भी ज़्यादा मज़ेदार करने के लिए एक मज़ेदार ऐलान यह रहा...

'सिने पहेली - 30' में होंगे 100 अंकों के सवाल


दोस्तों, 'सिने पहेली' की अगली कड़ी को कतई मिस न कीजिएगा क्योंकि अगली कड़ी में हम पूछने जा रहे हैं 10 सवाल और हर सवाल के होंगे 10 अंक। अर्थात्, आप जीत सकते हैं पूरे 100 अंक।

'सिने पहेली' को और भी ज़्यादा मज़ेदार बनाने के लिए अगर आपके पास भी कोई सुझाव है तो 'सिने पहेली' के ईमेल आइडी पर अवश्य लिखें। आप सब भाग लेते रहिए, इस प्रतियोगिता का आनन्द लेते रहिए, क्योंकि महाविजेता बनने की लड़ाई अभी बहुत लम्बी है। आज के एपिसोड से जुड़ने वाले प्रतियोगियों के लिए भी 100% सम्भावना है महाविजेता बनने का। इसलिए मन लगाकर और नियमित रूप से (बिना किसी एपिसोड को मिस किए) सुलझाते रहिए हमारी सिने-पहेली, करते रहिए यह सिने मंथन, और अनुमति दीजिए अपने इस ई-दोस्त सुजॉय चटर्जी को, आपकी और मेरी दोबारा मुलाक़ात होगी अगले सोमवार इसी स्तंभ में, नमस्कार!

Sunday, July 15, 2012

वर्षा ऋतु के रंग : मल्हार अंग के रागों का संग- 2


स्वरगोष्ठी – ७९ में आज

मियाँ की मल्हार : ‘बोले रे पपीहरा...’


‘स्वरगोष्ठी’ के अन्तर्गत जारी लघु श्रृंखला ‘वर्षा ऋतु के रंग : मल्हार अंग के रागों का संग’ के दूसरे अंक में, मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का स्वागत, आज राग ‘मियाँ की मल्हार’ की स्वर-वर्षा के साथ करता हूँ। मल्हार अंग के रागों में राग मेघ मल्हार, मेघों का आह्वान करने, मेघाच्छन्न आकाश का चित्रण करने और वर्षा ऋतु की आहट देने में सक्षम राग माना जाता है। वहीं दूसरी ओर राग मियाँ की मल्हार, वर्षा ऋतु की चरम अवस्था के सौन्दर्य की अनुभूति कराने पूर्ण समर्थ है। यह राग वर्तमान में वर्षा ऋतु के रागों में सर्वाधिक प्रचलित और लोकप्रिय है। सुप्रसिद्ध इसराज और मयूरी वीणा वादक पण्डित श्रीकुमार मिश्र के अनुसार- राग मियाँ की मल्हार की सशक्त स्वरात्मक परमाणु शक्ति, बादलों के परमाणुओं को झकझोरने में समर्थ है।

राग मियाँ की मल्हार तानसेन के प्रिय रागों में से एक है। कुछ विद्वानों का मत है कि तानसेन ने कोमल गान्धार तथा शुद्ध और कोमल निषाद का प्रयोग कर इस राग का सृजन किया था। अकबर के दरबार में तानसेन को सम्मान देने के लिए उन्हें ‘मियाँ तानसेन’ नाम से सम्बोधित किया जाता था। इस राग से उनके जुड़ाव के कारण ही मल्हार के इस प्रकार को ‘मियाँ की मल्हार’ कहा जाने लगा। इस राग के बारे में चर्चा को आगे बढ़ाने से पहले आइए सुनते हैं, राग मियाँ की मल्हार में एक भावपूर्ण रचना। आपके लिए हम प्रस्तुत कर रहे हैं, विदुषी किशोरी अमोनकर के स्वर में द्रुत एक ताल में निबद्ध, मियाँ की मल्हार की एक रचना-

मियाँ की मल्हार : ‘उमड़ घुमड़ गरज गरज...’ : किशोरी अमोनकर



राग मियाँ की मल्हार के बारे में हमें जानकारी देते हुए जाने-माने इसराज और मयूरी वीणा वादक पण्डित श्रीकुमार मिश्र ने हमें बताया कि यह राग काफी थाट के अन्तर्गत माना जाता है। आरोह और अवरोह में दोनों निषाद का प्रयोग किया जाता है। राग मियाँ की मल्हार के स्वरों का ढाँचा कुछ इस प्रकार बनता है कि कोमल निषाद एक श्रुति ऊपर लगने लगता है। इसी प्रकार कोमल गान्धार, ऋषभ से लगभग ढाई श्रुति ऊपर की अनुभूति कराता है। इस राग में गान्धार स्वर का प्रयोग अत्यन्त सावधानी से करना पड़ता है। राग की कुछ अन्य विशेषताओं पर हम चर्चा जारी रखेंगे, परन्तु आइए, पहले सुनते हैं, सारंगी पर उस्ताद अब्दुल लतीफ़ खाँ का बजाया राग मियाँ की मल्हार का एक अंश।

मियाँ की मल्हार : सारंगी वादन : उस्ताद अब्दुल लतीफ़ खाँ



राग मियाँ की मल्हार को गाते-बजाते समय राग बहार से बचाना पड़ता है। परन्तु कोमल गान्धार का सही प्रयोग किया जाए तो इस दुविधा से मुक्त हुआ जा सकता है। इन दोनों रागों को एक के बाद दूसरे का गायन-वादन कठिन होता है, किन्तु उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ ने एक बार यह प्रयोग कर श्रोताओं को चमत्कृत कर दिया था। इस राग में गमक की तानें बहुत अच्छी लगती है। आइए यहाँ थोड़ा विराम लेकर राग मियाँ के मल्हार का एक और उदाहरण सुनते हैं। विश्वविख्यात फ़िल्मकार सत्यजीत रे ने १९५९ में भारतीय संगीत की दशा-दिशा को रेखांकित करती बांग्ला फिल्म ‘जलसाघर’ का निर्माण किया था। इस फिल्म में गायन, वादन और नर्तन के कई उत्कृष्ट कलासाधकों की प्रस्तुतियाँ शामिल की गईं थीं। इन्हीं में एक थे, उस्ताद सलामत अली खाँ, जिन्होने फिल्म में राग मियाँ की मल्हार की एक रचना तीनताल में निबद्ध कर प्रस्तुत की थी। लीजिए, आप भी सुनिए-

मियाँ की मल्हार : ‘जलरस बूँदन बरसे...’ : फिल्म – जलसाघर : उस्ताद सलामत अली खाँ



वर्षा ऋतु के प्राकृतिक सौन्दर्य को स्वरों के माध्यम से अभिव्यक्त करने की अनूठी क्षमता राग मियाँ की मल्हार में होती है। इसके साथ ही इस राग का स्वर-संयोजन, पावस के उमड़ते-घुमड़ते मेघ द्वारा विरहिणी नायिका के हृदय में मिलन की आशा जागृत होने की अनुभूति भी कराते हैं। कई फिल्म- संगीतकारों ने इस राग पर आधारित कुछ यादगार गीत तैयार किये हैं। इन्हीं में से आज हम आपके लिए दो गीत प्रस्तुत कर रहे हैं। ये गीत राग मियाँ की मल्हार के स्वरों पर आधारित तो हैं ही, इन गीतों के बोल में वर्षा ऋतु का सार्थक चित्रण भी हुआ है। पहले प्रस्तुत है- १९९८ में प्रदर्शित फिल्म ‘साज’ का गीत, जिसे कविता कृष्णमूर्ति ने तीनताल में गाया है। इसके बाद सुनिए- १९७१ की फिल्म ‘गुड्डी’ का बेहद लोकप्रिय गीत, जिसे बसन्त देसाई ने स्वरबद्ध किया है और वाणी जयराम ने कहरवा ताल में गाया है। आप ये दोनों गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक से यहीं विराम लेने की अनुमति दीजिए।

मियाँ की मल्हार : ‘बादल घुमड़ घिर आए...’ : फिल्म – साज : कविता कृष्णमूर्ति



मियाँ की मल्हार : ‘बोले रे पपीहरा...’ : फिल्म – गुड्डी : वाणी जयराम



आज की पहेली

आज की संगीत-पहेली में हम आपको सुनवा रहे हैं, कण्ठ-संगीत का एक अंश। इसे सुन कर आपको हमारे दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ८०वें अंक तक सर्वाधिक अंक अर्जित करने वाले पाठक/श्रोता हमारी तीसरी पहेली श्रृंखला के ‘विजेता’ होंगे।



१ - संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह गीत किस राग पर आधारित है?

२ – इस गीत की गायिका कौन हैं?


आप अपने उत्तर हमें तत्काल swargoshthi@gmail.com पर भेजें। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के ८१वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अथवा swargoshthi@gmail.com पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।

पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के ७७वें अंक में हमने आपको फिल्म चश्मेबद्दूर का गीत- ‘कहाँ से आए बदरा...’ का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग मेघ मल्हार और दूसरे का उत्तर है- गायिका हेमन्ती शुक्ला। दोनों प्रश्नों के सही उत्तर मीरजापुर (उ.प्र.) के डॉ. पी.के. त्रिपाठी, जबलपुर की क्षिति तिवारी और लखनऊ के प्रकाश गोविन्द ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को रेडियो प्लेबैक इण्डिया की ओर से हार्दिक बधाई।

झरोखा अगले अंक का

मित्रों, इस वर्ष मानसून का आगमन कुछ विलम्ब से हुआ है, किन्तु देश के अधिकतर भागों में अच्छी वर्षा हो रही है। इधर आपके प्रिय स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ में भी मल्हार अंग के रागों की स्वर-वर्षा जारी है। अब तक आपने मेघ मल्हार और मियाँ की मल्हार का आनन्द प्राप्त किया है। अगले अंक से हम मल्हार का एक और प्रकार लेकर आपकी महफिल में उपस्थित होंगे। रविवार को प्रातः ९-३० बजे आप और हम ‘स्वरगोष्ठी’ के अगले अंक में पुनः मिलेंगे। तब तक के लिए हमें विराम लेने की अनुमति दीजिए।

कृष्णमोहन मिश्र

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