शुक्रवार, 20 जुलाई 2012

कहानी पॉडकास्ट - बिखरते रिश्ते - सुधा ओम ढींगरा - शेफाली गुप्ता

'बोलती कहानियाँ' इस स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने अर्चना चावजी की आवाज़ में प्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार हरिशंकर परसाई की कथा "चौबे जी" का पॉडकास्ट सुना था। आवाज़ की ओर से आज हम लेकर आये हैं सुधा ओम ढींगरा द्वारा लिखित हृदयस्पर्शी कहानी "बिखरते रिश्ते", जिसको स्वर दिया है शेफाली गुप्ता ने।

बिखरते रिश्ते का पाठ्य रचनाकार ब्लॉग पर उपलब्ध है।

इस कहानी का कुल प्रसारण समय 19 मिनट 38 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं। यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।

यहाँ तो बच्चे तीन-चार भाषाएँ सीखते हैं, पर बोलते अपनी मातृभाषा हैं। इसके लिए माँ-बाप को कोशिश करने की बहुत जरूरत है। हिंदी को लेकर कुंठित न हों।~ सुधा ओम ढींगरा

सुधा ओम ढींगरा अमेरिका में हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए जुटीं हैं। वे नार्थ कैरोलाईना में रहती हैं।

हर शुक्रवार को "बोलती कहानियाँ" पर सुनें एक नयी कहानी

"आकाश मुस्करा कर रुक गए ...। जब भी वह तनाव में होती है, वे बस मुस्करा देते हैं, कहते कुछ नहीं।" (सुधा ओम ढींगरा की "बिखरते रिश्ते" से एक अंश)

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#26th Story, Bikharate Rishte: Sudha Om Dhingra/Hindi Audio Book/2012/26. Voice: Shaifali Gupta

गुरुवार, 19 जुलाई 2012

स्मृतियों के झरोखे से : भारतीय सिनेमा के सौ साल – 6



भूली-बिसरी यादें


भारतीय सिनेमा-निर्माण के शताब्दी वर्ष में आयोजित हमारे इस विशेष अनुष्ठान- ‘स्मृतियों के झरोखे से’ के एक नए अंक में आपका स्वागत है। विगत एक सौ वर्षों में भारतीय जनमानस को सर्वाधिक प्रभावित करने वाला और सर्वसुलभ कोई माध्यम रहा है तो वह है, सिनेमा। 3मई, 1913 को मूक सिनेमा से आरम्भ इस यात्रा का पहला पड़ाव 1931 में आया, जब हमारा सिनेमा सवाक हुआ। इस स्तम्भ में हम आपसे मूक और सवाक युग के कुछ विस्मृत ऐतिहासिक क्षणों को साझा कर रहे हैं।

‘राजा हरिश्चन्द्र’ से पहले

पिछले अंकों में हम आपसे यह चर्चा कर चुके हैं कि 3मई, 1913 को विदेशी उपकरणों की सहायता से किन्तु भारतीय कथानक पर भारतीय कलाकारों द्वारा पहले कथा-चलचित्र ‘राजा हरिश्चन्द्र’ का निर्माण और प्रदर्शन हुआ था। इस पहली मूक फिल्म का प्रदर्शन 1913 में हुआ था, किन्तु इस सुअवसर के लिए भारतीयों ने 1896 से ही प्रयास करना शुरू कर दिया था। पिछले अंक में हमने ऐसे ही कुछ प्रयासों की चर्चा की थी। आज ऐसे कुछ और प्रयासों की हम चर्चा करेंगे।

वर्ष 1900 में मुम्बई के एक विद्युत इंजीनियर एफ.बी. थानावाला ने एक वृत्तचित्र ‘स्प्लेंडिड न्यू व्यू आफ़ बाम्बे’ का निर्माण किया था। इस फिल्म का प्रदर्शन कुछ अन्य विदेशी फिल्म के साथ किया गया था। इस समय तक सिनेमा माध्यम का उपयोग किसी रोचक विषय के फिल्मांकन तक सीमित था। किसी निर्धारित कथानक पर फिल्म निर्माण की सोच का विकास नहीं हो सका था। कथाचित्र निर्माण का प्रयास सर्वप्रथम कलकत्ता के सेन बन्धुओं (हीरालाल और मोतीलाल) ने किया। सेन बन्धुओं ने 1898 में लंदन से एक ‘बाइस्कोप
हीरालाल सेन
सिनेमेट्रोग्राफिक मशीन’ खरीदा था और इसके माध्यम से कुछ विदेशी वृत्तचित्रों का प्रदर्शन कर रहे थे। 1901 में उनके मन में फिल्म निर्माण का विचार आया। उन दिनों कलकत्ता में मंच-नाटक अत्यन्त लोकप्रिय थे। उन्होने प्रयोग के तौर पर एक चर्चित बांग्ला नाटक की प्रस्तुति के दौरान फिल्मांकन किया। इस प्रयोग को आंशिक सफलता मिली। मंच-नाटकों का दर्शक संवादों को सुन सकता था, किन्तु उसका फिल्मांकन तो वाणीविहीन था। फलतः यह प्रयोग नाट्य-प्रेमी दर्शकों के बीच ही आंशिक रूप से सफल हुआ।

सेन बन्धुओं ने अपना यह प्रयास जारी रखा। 1903 में उन्होने बांग्ला के सुविख्यात रंगकर्मी अमरनाथ दत्त के सहयोग से कुछ ऐसे मंच-नाटकों का फिल्मांकन किया, जिनके कथानक जन-जन में लोकप्रिय थे। 6जून, 1903 को कलकत्ता के क्लासिक थियेटर में एक पूर्णकालिक बांग्ला नाटक के फिल्मांकन का सफल प्रदर्शन हुआ था। बांग्ला के चर्चित साहित्यकार बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय कृत सीताराम, अलीबाबा, भ्रमर, हरिराज, सरला और बुद्धदेव जैसे नाटकों का फिल्मांकन कर सेन बन्धुओं ने मूक फिल्मों की सफलता का एक नया द्वार खोला। सेन बन्धुओं को किसी उत्पाद के प्रचार के लिए पहली फिल्म बनाने का श्रेय भी दिया जाएगा। उन्होने 1903 में ही ‘जावाकुसुम केश तेल’ के प्रचार के लिए विज्ञापन-फिल्म का निर्माण भी किया था।

सवाक युग के धरोहर
विनायक राव पटवर्धन 

सवाक फिल्मों के आरम्भिक दौर में 1जनवरी, 1932 को एक बेहद सफल फिल्म ‘माधुरी’ का प्रदर्शन हुआ था। चौथी शताब्दी में गुप्तवंश शासन के एक ऐतिहासिक कथानक पर आधारित इस फिल्म में युद्ध के रोमांचक दृश्य थे। मोहनलाल इस फिल्म के पटकथा लेखक थे। मालवा और कन्नौज राज्यों के बीच की शत्रुता और उनके बीच हुए युद्ध का प्रसंग फिल्म का केन्द्रविन्दु था। एक ऐसे ही प्रसंग में नायिका माधुरी पुरुष वेष धारण कर कन्नौज के महासामन्त से युद्ध कर मालवा के राजकुमार को मुक्त कराती है। फिल्म के संगीतकार प्राणसुख नायक थे, जिन्होने तत्कालीन शास्त्रीय गायक विनायक राव पटवर्धन से कई मधुर गीत गवाए, जिसके बल पर फिल्म को आशातीत सफलता मिली। विनायक राव पटवर्धन फिल्म के नायक और सुलोचना नायिका थीं।

इसी फिल्म में विनायक राव के गाये गीत- ‘सरिता सुगन्ध शोभे बसन्त...’ का ग्रामोफोन रेकार्ड भी बना था। ग्रामोफोन कम्पनी ने पहली बार किसी भारतीय फिल्म के संगीत का रेकार्ड बनाया था। ‘धुनों की यात्रा’ पुस्तक के लेखक पंकज राग के अनुसार- ‘फिल्म संगीत का पहला रेकार्ड जारी होने का यह तथ्य अकेले ही प्राणसुख नायक को एक ऐतिहासिक महत्त्व दे जाता है’। 1932 में प्रदर्शित फिल्म ‘माधुरी’ के दो दुर्लभ गीत आज हम आपके लिए प्रस्तुत कर रहे है। पहला गीत- ‘अहंकार करके हमेशा...’ तीनताल में और दूसरा गीत- ‘परमुख वाली तू कमला...’ द्रुत एकताल में निबद्ध किया गया है। प्राणसुख नायक के संगीतबद्ध किये दोनों गीतों को विनायक राव पटवर्धन ने स्वर दिया है।

फिल्म माधुरी : ‘अहंकार करके हमेशा...’ विनायक राव पटवर्धन


फिल्म माधुरी : ‘परमुख वाली तू कमला...’ विनायक राव पटवर्धन



इसी गीत के साथ इस अंक से हम विराम लेते हैं। आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, अवश्य लिखिएगा। आपकी प्रतिक्रिया, सुझाव और समालोचना से हम इस स्तम्भ को और भी सुरुचिपूर्ण रूप प्रदान कर सकते हैं। ‘स्मृतियों के झरोखे से : भारतीय सिनेमा के सौ साल’ के आगामी अंक में बारी है- ‘मैंने देखी पहली फिल्म’ प्रतियोगिता की। हमारे अगले अंक में जो आलेख शामिल होगा वह प्रतियोगी वर्ग से होगा। आपके आलेख हमें जिस क्रम से प्राप्त हुए हैं, उनका प्रकाशन हम उसी क्रम से कर रहे हैं। यदि आपने ‘मैंने देखी पहली फिल्म’ प्रतियोगिता के लिए अभी तक अपना संस्मरण नहीं भेजा है तो हमें तत्काल radioplaybackindia@live.com पर मेल करें।

कृष्णमोहन मिश्र

बुधवार, 18 जुलाई 2012

10 गज़लों गीतों के माध्यम से याद करें महान मेहदी हसन साहब को

तालियों की गडगडाहट से गूँजता सभागार और सुरों को अपने तान में समेटती मेहदी हसन साहब की आवाज़. दोस्तों शायद अब ये समां कभी किसी संगीत प्रेमी को देखना नसीब नहीं हो सकेगा क्योंकि खुदा ने उन्हें हम सब से छीनकर अपने पास बुला लिया है ताकि जन्नतें भी उनकी महफिलों से रोशन हो सके. पर उनकी आवाज़ का बेशकीमती खज़ाना तो आज भी हमारे पास सुरक्षित है और ये जादू, कभी कम नहीं हो सकेगा इस बात को हर संगीत प्रेमी स्वीकार करेगा.

दोस्तों सुनिए हमारा ये खास कार्यक्रम, जिसके माध्यम से हम श्रद्धान्जली दे रहे हैं शहंशाह-ए-ग़ज़ल मेहदी हसन साहब को, स्क्रिप्ट है विश्व दीपक की और स्वर है सजीव सारथी का. लगभग ढेढ घंटे के इस पोडकास्ट में आपको मिलेंगें मेहदी साहब के गायन के कई मुक्तलिफ़ अंदाज़. तो दोस्तों कुछ समय के लिए अपने रोजमर्रा के काम से मुक्त होकर डूब जाईये सुरों के इस अथाह समुन्दर में जिसका नाम है मेहदी हसन. 




आपकी सुविधा के लिए हम लिखित स्क्रिप्ट यहाँ संलग्न कर रहे हैं 

स्वर-साम्राज्ञी लता मंगेशकर ने जिनके वो सबसे प्रिय गायक थे, उनके इन्तेकाल की खबर सुनकर कहा -"आज बहुत बड़े ग़ज़ल गायक कलाकार मेहदी हसन साहब हमारे बीच नहीं रहे, मुझे इस बात का बहुत दु:ख है, ग़ज़ल-गायकी के क्षेत्र में उन्होंने बहुत बड़ा परिवर्तन लाया, आज उनके जाने से ग़ज़ल की बहुत बड़ी हानि हुई है, अब उन जैसा कलाकार फिर से आना मुश्किल है, वो बहुत बड़े शास्त्रीय संगीत के गायक भी थे, और उनके गाने में राजस्थान के संगीत की खुशबू भी थी, उन्होंने मेरे लिए कुछ गाने बनाए थे उनमें से हीं एक ग़ज़ल मैंने जो उन्होंने मुझे गाके भेजी थी, उसका मैंने डुएट रिकार्ड किया था, उनके साथ मेरा ये एक हीं गाना है, मैं ईश्वर से प्रार्थना करती हूँ कि मेहदी साहब की आत्मा को वो शांति प्रदान करें" यहाँ पर बताते चलें कि लता दी "सरहदें" एलबम के "तेरा मिलना बड़ा अच्छा लगे" गाने की बात कर रही हैं, जिसकी आधी रिकार्डिंग पाकिस्तान में और आधी हिन्दुस्तान में हुई थी, क्योंकि मेहदी हसन साहब चाह कर भी हिन्दुस्तान नहीं आ पड़े थे। यह ग़म उन्हें आखिर तक कचोटता रहा था। 

मेहदी हसन यानि कि हमारे खां साहब का जन्म राजस्थान के झुंझुनू जिले के लूणा गांव में १८ जुलाई १९२७ को हुआ था। खां साहब के हिसाब से उनका जन्म "कलावंत" घराने की १६वीं पीढी में हुआ था। "कलावंत" नाम से हीं मालूम चलता है कि इस घराने में "कला" की कैसी काबिलियत थी। मौशिकी की शुरूआती तालीम उन्होंने अपने अब्बाजान उस्ताद अजीम खान और चचाजान उस्ताद ईस्माइल खान से ली। दोनों में हीं ध्रुपद के अच्छे जानकार थे। सुनते है ये ठुमरी खान साहब की आवाज़ में खां साहब ने अपनी ग़ज़लों को राग यमन और राग ध्रुपद की बारीकियों से नवाज़ा था। इन्होंने ग़ज़ल-गायिकी को उस दौर में अलग पहचान दी, जब ग़ज़लों का मतलब उस्ताद बरकत अली खान, बेगम अख्तर और मुबारक बेगम हुआ करते थे। हिन्दुस्तान के बंटवारे से पहले फाजिल्का बंगला यानि कि अविभाजित पंजाब में उन्होंने अपना पहला पर्फोमेंश दिया। वह परफोर्मेंश ध्रुपद-खयाल पर आधारित था। खां साहब दर-असल ध्रुपद-गायक हीं बनना चाहते थे, ग़ज़ल तो पंजाबी में कहें तो "ऐं वैं" हीं हो गया। 

दोस्तों, खां साहब शहंशाह-ए-ग़ज़ल के नाम से जाने जाते थे। कहा जाता है कि ग़ज़लों में उनके जैसा सुर किसी और का नहीं लगा अब तक। हैरत होती है यह सोचकर कि ऐसा इंसान जो एक हुनर में इस कदर माहिर हो, उसकी शुरूआत किसी और हीं हुनर से हुई थी। जी हाँ, मौशिकी की पहली सीढी जो उन्होंने रेडियो पाकिस्तान के मार्फ़त १९५७ में चढी, वहाँ उनका कार्यक्रम ठुमरी का था। कहते हैं कि खां साहब ठुमरी और ध्रुपद के हीं होकर रह गए होते अगर रेडियो पाकिस्तान के दो अधिकारियों जेड ए बुखारी और रफ़ीक़ अनवर साहब ने उर्दू में उनकी खासी दिलचस्पी और साफ़ तलफ़्फ़ुज़ को देखकर उन्हें ग़ज़ल गाने के लिए प्रेरित न किया होता। हम शुक्रिया करते हैं उन दोनों का, जिनकी वजह से ग़ज़लों को खां साहब नसीब हुए। १९४७ में जब हिन्दुस्तान तक़्सीम हुआ तो मेहदी हसन साहब पूरे परिवार के साथ पाकिस्तान चले गए। हिन्दुस्तान छोड़ने का सबसे बड़ा नुकसान उन्हें यह हुआ कि पाकिस्तान में न रहने को घर, न खाने को रोटी.... पैसों की तंगहाली ने उन्हें मौशिकी से लगभग जुदा हीं कर दिया। पूरे परिवार का पेट पालने के लिए पहले वे एक साईकिल की दुकान में काम करने लगे। वहाँ से फारिग हुए तो उन्हें कार और डीजल ट्रैक्टर का मैकेनिक बनना पड़ा। सब ऐसा हीं चलता रहता अगर पाकिस्तान रेडियो ने उन्हें मौका न दिया होता। बस राह दिखाने की देर थी, मंज़िल ने तो खुद अपने राहगीर को चुन रखा था। 

मेहदी साहब ने जो चलना शुरू किया तो क्या फिल्मी मोड़, क्या गैर-फिल्मी मोड़.. हर जगह मील के पत्थर उन्हीं के नाम के थे। ग़ज़ल-गायिकी में अपना नाम सोने में दर्ज़ कर लेने के बाद उन्होंने पाकिस्तानी फिल्म-संगीत को आजमाना चाहा। उनका यह प्रयोग भी काबिल-ए-तारीफ़ रहा। १९६९ में रीलिज हुई फिल्म "तुम मिले प्यार मिला" में मल्लिका-ए-तरन्नुम नूरजहाँ के साथ उनका गाना "आपको भूल जाएँ हम, इतने तो बेवफा नहीं" उतना हीं मशहूर है, जितना कि १९७५ की "मेरा नाम है मोहब्बत" फिल्म का नाहीद अख्तर के साथ गाया हुआ "ये दुनिया रहे न रहे मेरे हमदम" या फिर १९६७ की "ज़िंदगी कितनी हसीं है" फिल्म का "जब कोई प्यार से बुलाएगा"। फिल्म "दर्द" का "तेरी महफ़िल से ये दीवाना चला जाएगा" तो रूलाने में इतना कामयाब हुआ कि हिन्दुस्तान ने इसे "आज की रात मेरे दिल की सलामी ले ले" नाम से अपने इमोशन्स, अपनी भावनाओं में शामिल कर लिया।

बंटवारे के बाद अपना गाँव छूटने का दर्द उन्हें हमेशा सालता रहता था। १९७७ में जब वे पहली बार अपने गाँव लूणा आए तो इस कदर भाव-विभोर हो गए कि मिट्टी में लोट-लोट कर रोने लगे। उस समय वे जयपुर आए हुए थे सरकारी मेहमान बनकर। और उन्हीं के कहने पर सारा जत्था लूणा गया था। कहते हैं कि काफ़िला जब एक मंदिर के सामने से गुजर रहा था तो उन्होंने गाड़ी रूकवा दी और मंदिर की सीढियो के नीचे रेत में पलटियाँ खाने लगे। इस दृश्य के गवाह रहे कवि कृष्ण कल्पित बताते हैं कि उस वक़्त मेहदी साहब का बेटा डर गया कि वालिद साहब को क्या हो गया। बाद में जब मेहदी साहब से पूछा गया तो उन्होंने कहा कि यहीं बैठकर वे भजन गाया करते थे। सालों बाद माँ से बेटा मिले तो आखिर यही होता है।

२००० में खां साहब पैरलाइसिस के शिकार हुए और तब से मौशिकी से दुर हो गए। उनकी आवाज़ चली गई। कई सालों तक उन्होंने कुछ न कहा। एक शख्स हैं..अफज़ल सुभानी ,जो अपने बारे में कहते हैं कि "पाकिस्तान से बाहर का मैं पहला शागिर्द हूं, जिसे मेहदी हसन साहब ने गंडा बांध कर विधिवत शिष्य बनाया था"। मेहदी साहब की आवाज़ जाने के बाद वे हमेशा उनकी खबर लिया करते थे। एक बार जब उन्होंने टेलीफोन किया तो मेहदी साहब ने खुद उठाया और पूरे जोश के साथ घोषणा की कि "मेरी आवाज़ वापस आ गई है।" अफ़ज़ल सुभानी की मानें तो मेहदी साहब को उन्होंने इससे ज्यादा खुश कभी नहीं पाया था। दु:ख है कि यह खुशी ज्यादा दिनों तक रह नहीं पाई। 

"अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख्वाबों में मिलें, जैसे सूखे हुए फूल किताबों में मिलें"... तुम बिछड़ गए खां साहब हम सबसे... अब तो बस यही दरख्वास्त है कि "रंजिश हीं सही दिल हीं दुखाने के लिए आ, आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ"। जिस शख्स के लिए मन्ना दा ने कहा था कि उनकी एक हीं तमन्ना है कि वे कभी मेहदी हसन की तरह गा सकें, मरहूम जगजीत सिंह जी ने कहा था कि जो ग़ज़ल गाना चाहता है वह पहले मेहदी साहब की तरह शास्त्रीय संगीत में पारंगत हो ले.... आज उस शख्स ने इस दुनिया से अपनी आवाज़ हटा ली है और भेंट कर दी है दूसरी दुनिया को.. जहाँ पहले से हीं कई फ़नकार उनका इंतज़ार कर रहे थे। १३ जून को वह आवाज़ हमेशा के लिए शांत हो गई। अल्लाह उनकी रूह को बरकत दे... आमीन!!


फुटनोट

दोस्तों जैसा कि आप वाकिफ हैं कि प्रस्तुत पोडकास्ट को हम किश्तों में प्रकाशित कर रहे हैं पिछले ढेढ दो हफ़्तों से, इन कड़ियों को निरंतर सुनते हुए हमारे नियमित श्रोता दिलीप कवठेकर जो खुद भी एक गायक हैं, अपनी तरफ से मेहदी साहब की एक ग़ज़ल को गाकर हमारे लिए भेजा है, क्यों न उनके इस श्रद्धा पुष्प को भी हम अपनी श्रद्धान्जली का हिस्सा बनायें...लीजिए सुनिए दिलीप जी की आवाज़ में मेहदी साहब की ये गज़ल

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