Sunday, June 24, 2012

११५वीं जयन्ती पर संगीत-मार्तण्ड ओंकारनाथ ठाकुर का स्मरण


स्वरगोष्ठी – ७६ में आज

‘मैं नहीं माखन खायो, मैया मोरी...’

 २० वर्ष की आयु में ही वे इतने पारंगत हो गए कि उन्हें लाहौर के गन्धर्व संगीत विद्यालय का प्रधानाचार्य नियुक्त कर दिया गया। १९३४ में उन्होने मुम्बई में ‘संगीत निकेतन’ की स्थापना की। १९४० में महामना मदनमोहन मालवीय उन्हें काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के संगीत संकाय के प्रमुख के रूप में बुलाना चाहते थे किन्तु अर्थाभाव के कारण न बुला सके।
‘स्वरगोष्ठी’ के एक नये अंक में, मैं कृष्णमोहन मिश्र अपने सभी संगीत-प्रेमी पाठकों-श्रोताओं का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। आज २४ जून है और आज के ही दिन वर्ष १८९७ में तत्कालीन बड़ौदा राज्य के जहाज नामक गाँव में एक ऐसे महापुरुष का जन्म हुआ था जिसने आगे चल कर भारतीय संगीत जगत को ऐसी गरिमा प्रदान की, जिससे सारा विश्व चकित रह गया। आज हम आपके साथ संगीत-मार्तण्ड पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर के व्यक्तित्व पर चर्चा करेंगे और उनकी कुछ विशिष्ट रचनाएँ आपके लिए प्रस्तुत भी करेंगे।

ओंकारनाथ के दादा महाशंकर जी और पिता गौरीशंकर जी नाना साहब पेशवा की सेना के वीर योद्धा थे। एक बार उनके पिता का सम्पर्क अलोनीबाबा के नाम से विख्यात एक योगी से हुआ। इन महात्मा से दीक्षा लेने के बाद से गौरीशंकर के परिवार की दिशा ही बदल गई। वे प्रणव-साधना अर्थात ओंकार के ध्यान में रहने लगे। तभी २४ जून, १८९७ को उनकी चौथी सन्तान ने जन्म लिया। ओंकार-भक्त पिता ने पुत्र का नाम ओंकारनाथ रखा। जन्म के कुछ ही समय बाद यह परिवार बड़ौदा राज्य के जहाज ग्राम से नर्मदा तट पर भड़ौच नामक स्थान पर आकर बस गया। ओंकारनाथ जी का लालन-पालन और प्राथमिक शिक्षा यहीं सम्पन्न हुई। इनका बचपन अभावों में बीता। यहाँ तक कि किशोरावस्था में ओंकारनाथ जी को अपने पिता और परिवार के सदस्यों के भरण-पोषण के लिए एक मिल में नौकरी करनी पड़ी। ओंकारनाथ की आयु जब १४ वर्ष थी, तभी उनके पिता का देहान्त हो गया। उनके जीवन में एक निर्णायक मोड़ तब आया, जब भड़ौच के एक संगीत-प्रेमी सेठ ने किशोर ओंकार की प्रतिभा को पहचाना और उनके बड़े भाई को बुला कर संगीत-शिक्षा के लिए बम्बई के विष्णु दिगम्बर संगीत महाविद्यालय भेजने को कहा। पण्डित विष्णु दिगम्बर पलुस्कर के मार्गदर्शन में उनकी संगीत-शिक्षा आरम्भ हुई।

पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर के जीवन-वृत्त को आगे बढ़ाने से पहले आइए, थोड़ा विराम लेकर उनकी एक प्रिय रचना- राग नीलाम्बरी का रसास्वादन करते हैं। सुप्रसिद्ध संगीत-लेखिका डॉ. सुशीला मिश्रा ने एक अवसर पर बताया था कि राग नीलाम्बरी पण्डित जी द्वारा रचित ऐसा राग है जो कर्नाटक संगीत के राग नीलाम्बरी से भिन्न है। इस राग में काफी और सिंदूरा का ऐसा मेल है, जो मिलने के बाद एक अलग रस-भाव की सृष्टि करता है। यह राग उनकी धर्मपत्नी को बेहद प्रिय था। आइए, हम सब भी सुनते हैं पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर के स्वर में राग नीलाम्बरी की रचना का एक अंश-

राग – नीलाम्बरी : ‘मितवा बालमवा...’ : पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर



विष्णु दिगम्बर संगीत महाविद्यालय, बम्बई (अब मुम्बई) में प्रवेश लेने के बाद ओंकारनाथ जी ने वहाँ के पाँच वर्ष के पाठ्यक्रम को तीन वर्ष में ही पूरा कर लिया और इसके बाद गुरु जी के चरणों में बैठ कर गुरु-शिष्य परम्परा के अन्तर्गत संगीत की गहन शिक्षा अर्जित की। २० वर्ष की आयु में ही वे इतने पारंगत हो गए कि उन्हें लाहौर के गन्धर्व संगीत विद्यालय का प्रधानाचार्य नियुक्त कर दिया गया। १९३४ में उन्होने मुम्बई में ‘संगीत निकेतन’ की स्थापना की। १९४० में महामना मदनमोहन मालवीय उन्हें काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के संगीत संकाय के प्रमुख के रूप में बुलाना चाहते थे किन्तु अर्थाभाव के कारण न बुला सके। बाद में विश्वविद्यालय के एक दीक्षान्त समारोह में शामिल होने जब पण्डित जी आए तो उन्हें वहाँ का वातावरण इतना अच्छा लगा कि वे काशी में ही बस गए। १९५० में उन्होने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के गन्धर्व महाविद्यालय के प्रधानाचार्य का पद-भार ग्रहण किया और १९५७ में सेवानिवृत्त होने तक वहीं रहे।

पण्डित जी के व्यक्तित्व-कृतित्व पर यह चर्चा जारी रहेगी, किन्तु यहाँ थोड़ा विराम लेकर हम आपको उनकी गायकी के कुछ उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करेंगे। ‘स्वरगोष्ठी’ के पिछले अंक में प्रस्तुत ‘झरोखा अगले अंक का’ पढ़ कर हमारे कई पाठको ने हमें उलाहना दिया कि हम उन्हें सुबह का राग नहीं सुनवाते। इन पाठकों ने पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर के स्वर में सुबह के राग सुनवाने का अनुरोध किया है। आप सब का आदेश सिरोधार्य है। लीजिए प्रस्तुत है, पहले राग ललित की और उसके बाद राग तोड़ी में क्रमशः दो रचनाएँ।

राग – ललित : ‘पिउ पिउ रटत पपीहरा...’ : पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर



राग – तोड़ी : ‘गरवा में हरवा डारूँ...’ : पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर



पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर का जितना प्रभावशाली व्यक्तित्व था उतना ही असरदार उनका संगीत भी था। एक बार महात्मा गाँधी ने उनका गायन सुन कर टिप्पणी की थी- “पण्डित जी अपनी मात्र एक रचना से जन-समूह को इतना प्रभावित कर सकते हैं, जितना मैं अपने अनेक भाषणों से भी नहीं कर सकता।” उन्होने एक बार सर जगदीशचन्द्र बसु की प्रयोगशाला में पेड़-पौधों पर संगीत के स्वरों के प्रभाव विषय पर अभिनव और सफल प्रयोग किया था। इसके अलावा १९३३ जब वे इटली की यात्रा पर थे, उन्हें ज्ञात हुआ की वहाँ के शासक मुसोलिनी को पिछले छः मास से नींद नहीं आई है। पण्डित जी मुसोलिनी से मिले और उनके गायन से उसे तत्काल नींद आ गई। उनके संगीत में ऐसा जादू था कि आम से लेकर खास व्यक्ति भी सम्मोहित हुए बिना नहीं रह सकता था। अपने बचपन में मैंने भी सुना था कि जब वे सूरदास का पद- ‘मैं नहीं माखन खायो, मैया मोरी...’ गाते थे तो पूरे श्रोता समुदाय की आँखेँ आँसुओं से भींग जाती थी। इस पद को गाते समय पण्डित जी साहित्य के सभी रसों से साक्षात्कार कराते थे। लीजिए आप भी सुनिए, पण्डित जी के स्वर में, सूरदास का यह पद-

सूरदास का पद : ‘मैं नहीं माखन खायो, मैया मोरी...’ : पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर



पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर की कालजयी रचनाओं में एक महत्त्वपूर्ण रचना है, ‘वन्देमातरम्...’। बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय की यह अमर रचना, स्वतंत्र भारत के प्रथम सूर्योदय पर पण्डित जी के स्वरों से अलंकृत होकर रेडियो से प्रसारित हुई थी। आगे चल कर ‘वन्देमातरम्...’ गीत के आरम्भिक दो अन्तरों को भारत की संविधान सभा ने राष्ट्रगीत के समकक्ष मान्यता प्रदान की थी। आइए, अब हम आपको यह गीत सुनवाते हैं, जो राग देस के स्वरों में ढल कर अपूर्व परिवेश रचता है। पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर के स्वर में आप यह गीत सुनिए और आज के अंक से मुझे यहीं विराम लेने की अनुमति दीजिए।

‘वन्देमातरम्...’ : पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर



आज की पहेली

आज की ‘संगीत-पहेली’ में हम आपको सुनवा रहे हैं, पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया के बांसुरी वादन का एक अंश। इसे सुन कर आपको दो आसान सवालों के जवाब देना है। ‘स्वरगोष्ठी’ के ८०वें अंक तक सर्वाधिक अंक अर्जित करने वाले पाठक-श्रोता हमारी तीसरी श्रृंखला के ‘विजेता’ होंगे।



१ – बांसुरी वादन का यह अंश किस राग में प्रस्तुत किया गया है?

२ – यह रचना किस ताल में निबद्ध है?


आप अपने उत्तर हमें तत्काल swargoshthi@gmail.com पर भेजें। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के ७८वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं। हमसे सीधे सम्पर्क के लिए swargoshthi@gmail.com पर अपना सन्देश भेज सकते हैं।

पिछली पहेली के उत्तर

‘स्वरगोष्ठी’ के ७४वें अंक की पहेली में हमने आपको फिल्म पाकीज़ा में शामिल एक ठुमरी सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग पहाड़ी और दूसरे का सही उत्तर है- गायिका परवीन सुलताना। इस बार की पहेली के दोनों प्रश्नों का सही उत्तर जबलपुर की क्षिति तिवारी ने दिया है। मीरजापुर (उ.प्र.) के डॉ. पी.के. त्रिपाठी ने दूसरे प्रश्न का सही उत्तर दिया किन्तु राग पहचानने में उन्होने भूल कर दी। उन्हें इस बार एक अंक से ही सन्तोष करना होगा। दोनों प्रतियोगियों को रेडियो प्लेबैक इण्डिया की ओर से हार्दिक बधाई।

झरोखा अगले अंक का

मित्रों, ‘स्वरगोष्ठी’ के अगले अंक में हम आपको विश्वविख्यात बांसुरी वादक पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया के व्यक्तित्व और कृतित्व पर चर्चा करेंगे। आपको याद दिया दूँ, अगले रविवार को इन महान संगीतज्ञ का जन्म-दिन है। तो भूलियेगा नहीं, अगले रविवार को प्रातः ९-३० पर आयोजित अपनी इस गोष्ठी में आप भी हमारे सहभागी बनिए।



अमित तिवारी के साथ आपकी बात

मित्रों, अब हमने आपकी प्रतिक्रियाओं, सन्देशों और सुझावों के लिए एक अलग साप्ताहिक स्तम्भ ‘आपकी बात’’ आरम्भ किया है। अब प्रत्येक शुक्रवार को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया ’ पर आपके भेजे संदेशों को हम अपने सजीव कार्यक्रम में शामिल करते हैं। आप हमें radioplaybackindia@live.co, swargoshthi@gmail.com अथवा cine.paheli@yahoo.com के पते पर अपनी टिप्पणियाँ, सुझाव और सन्देश आज ही लिखें।


“मैंने देखी पहली फिल्म” : आपके लिए एक रोचक प्रतियोगिता

दोस्तों, भारतीय सिनेमा अपने उदगम के 100 वर्ष पूर्ण करने जा रहा है। फ़िल्में हमारे जीवन में बेहद खास महत्त्व रखती हैं, शायद ही हम में से कोई अपनी पहली देखी हुई फिल्म को भूल सकता है। वो पहली बार थियेटर जाना, वो संगी-साथी, वो सुरीले लम्हें। आपकी इन्हीं सब यादों को हम समेटेगें एक प्रतियोगिता के माध्यम से। 100 से 500 शब्दों में लिख भेजिए अपनी पहली देखी फिल्म का अनुभव swargoshthi@gmail.com पर। मेल के शीर्षक में लिखियेगा “मैंने देखी पहली फिल्म”। सर्वश्रेष्ठ 3 आलेखों को 500 रूपए मूल्य की पुस्तकें पुरस्कार-स्वरुप प्रदान की जायेगीं। तो देर किस बात की, यादों की खिड़कियों को खोलिए, कीबोर्ड पर उँगलियाँ जमाइए और लिख डालिए अपनी देखी हुई पहली फिल्म का दिलचस्प अनुभव, प्रतियोगिता में आलेख भेजने की अन्तिम तिथि 31 अक्टूबर 2012 है।


कृष्णमोहन मिश्र

Saturday, June 23, 2012

प्लेबैक इंडिया वाणी (4) गैंग्स ऑफ वासेपुर, एक कप चाय और आपकी बात

संगीत समीक्षा - गैंग्स ऑफ वासेपुर



दोस्तों कभी कभी कोई ऐसी एल्बम आती है जिस पर चर्चा करना बेहद सुखद लगता है. गैंग्स ऑफ वासेपुर जैसा शीर्षक हो और अनुराग कश्यप का नाम उससे जुड़ा हो तो एक इमेज बनती है बेहद गंभीर किस्म के फिल्म की, जहाँ संगीत की गुंजाईश न के बराबर हो. मगर कांस फिल्म समारोह में अधिकारिक रूप से प्रदर्शित इस अनूठी फिल्म में लगभग १५ गीत हैं. संगीत है स्नेहा कंवालकर का, जो खुद पहचान है "वोमनिया" की, जैसा कि अल्बम का एक गीत भी है. संगीतकारों की पुरुष प्रधान दुनिया में एक अलग ही पहचान लेकर आयीं हैं स्नेहा. अल्बम की एक और बड़ी खासियत ये है कि इसके सभी गीत किसी स्थापित बॉलीवुड गायक/गायिकाओं ने नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश, बिहार और वेस्ट बंगाल के स्थानीय गायकों ने गाये हैं. ठेठ देसी अंदाज़ के इस अल्बम में एक मात्र स्टार हैं भोजपुरी गायक मनोज तिवारी, जिनकी आवाज़ से सजे "जिया हो" गीत से अल्बम की शुरुआत होती है. कोई ताम झाम नहीं सिर्फ और सिर्फ भोजपुरिया रंग में रंग ये गीत अल्बम की सटीक शुरुआत कर देता है. जिसके बाद आता है एक मस्त अंदाज़ का, हल्का फुल्का द्विअर्थी, और थोड़ी सी छेड छाड भरा गीत "हम हैं शिकारी". हंटर नाम का ये लोक गीत कैरिबियन में बसे उत्तर भारतियों में ख़ासा लोकप्रिय है. अंग्रेजी और हिंदी शब्दों का अनूठा अंदाज़ वाकई में दिलचस्प है. आप एक बार सुनकर इसे गुनगुनाये बिना नहीं रह पायेंगें. और जब भी गुनगुनायेंगे एक शरारत भरी मुस्कराहट आपके होंठों पे भी अवश्य होगी...खुशबू राज और रेखा झा जो कि बनारस की गायिकाएं हैं, की आवाजों में वुमनिया की चर्चा हम कर ही चुके है, कुछ रेट्रो अंदाज़ का ये गीत सही मायनों में नारी शक्ति को पुरुष प्रधान समाज में निर्भयता के साथ खड़े का एलान करती है, मगर इतने हलके फुल्के अंदाज़ में कि कोई भी पुरुष इस गीत को मजे से सुनना चाहेगा, और नारियों की जुबान पे ये चढ जाए तो हैरानी बिलकुल नहीं हो.

चूँकि बात गैंग्स की है तो ललकारों की धमकियों की बात भी लाजमी है. "कह के लूँगा" एक इसी अंदाज़ का गीत है. गीतकार ने "कह के लूँगा" फ्रेस को बखूबी अपनी कमान में चढाया है जो अमूमन लड़ाई झगडों के दौरान इस्तेमाल होता है. संगीतकार अमित त्रिवेदी यहाँ एक गायक के रूप में है स्नेहा के साथ. मनीष टीपू और भूपेश सिंह की आवाजों में "भूस" शब्द, संगीत और गायिकी हर लिहाज से देसी गीत है....जहाँ दार्शनिकता किनारे से गुजरती है और मस्त मलंग वाला ठाठ सर चढ कर बोलता है. जिन्हें भी तीसरी कसम का चलत मुसाफिर गीत भाया होगा उनके लिए पेश है ये नए दौर की चौपाल और वहाँ बैठी गायकों की टोली...एक बगल में चाँद होगा एक बगल में रोटियाँ, ये सदा है गीतकार गायक पियूष मिश्रा की. पियूष यहाँ एक दम उसी रूप में है जिस रूप में उनके चाहने वालों ने उन्हें एकल नाटकों में देखा होगा. गीत में एक अजीब सी कशिश है और पियूष के शब्द गहरी चोट करते हैं. आपको राज कपूर की फ़िल्में याद आ सकती हैं इसे सुनकर. आज के दौर में ऐसा गीत संभव करने के लिए एक बार फिर टीम बधाई की हकदार है. भैयासूना करके, ऐ जवानों, और हमको छोड़ी के जैसे छोटे छोटे कुछ गीत हैं जिन्हें लोक गायकों ने अंजाम दिया है, मुज़फ्फर पुर के दीपक का गाया "हमको छोड़ी के" में सिर्फ हारमोनियम का इस्तेमाल हुआ है. मगर मजाल है जो आप एक सेकंड के लिए भी बोर हो जाएँ. एक और गीत है बांग्ला लोक रंग का "मन मौजी" जिसे बहुत खूब गाया है उर्मी बनर्जी ने. गैंग ऑफ वासेपुर से वापसी हुई है, तबला, हारमोनियम, मंजीरा, जैसे लोक वाद्यों की, लोक कलाकारों ने यहाँ मायिक संभाला है और ठेठ भारतीय अंदाज़ को दुनिया के सामने परोसा है. एक जैसे सुनाई देने वाले बहुत से फ़िल्मी गीतों की भीड़ में ये अल्बम एक अनूठा प्रयास है. रेडियो प्लेबैक इंडिया इस अल्बम को ४.३ की रेटिंग दे रही है ५ में से. अवश्य सुनें   



पुस्तक चर्चा - एक कप चाय  




एक कप चाय, विश्व प्रसिद्ध कहानियों का एक संकलन है जिसमें कैथरीन मैस्फील्ड, अर्नेस्ट हेम्न्ग्वे, लियो तोल्स्तोय, खुश्वंती सिंह, ओस्कर वाईल्ड, आर के नारायण, जिम कोर्बेट, और ७ अन्य विश्व प्रसिद्ध कथाकारों की एक एक कहानी संकलित है जिसका संपादन किया है मंजुला ने.
वी के पब्लिशिंग की इस प्रस्तुति में जहाँ एक कप चाय, बरसात में बिल्ली, और दही वाली जैसी भावप्रधान कहानियां है, तो बच्चों के लिए वीर कुम्हार, स्वार्थी राक्षस और विष्णु का चिन्ह जैसी कहानियां भी है जिनसे हम में से अधिकतर अपने स्कूल कॉलेज के दिनों से ही परिचित हैं. विल एफ जैकिंस की "एक डरी हुई वापसी" लियो तोल्स्तोय की "दो बूढ़े आदमी" और जय निम्बकर की "एक नायक की मौत" क्लास्सिकल लेखन के उत्कृष्ट नमूने के रूप में पाठकों को बाधें रखती है. हालाँकि अनुवाद का स्टार बहुत अच्छा नहीं है और कहानियों के चयन में भी एकरूपता का अभाव है मगर फिर भी इस तरह के संकलन वर्तमान और आने वाली पीढ़ियों के मार्गदर्शन के लिए सहेज कर रखे जा सकते हैं. पुस्तक की कीमत है २०० रूपए मात्र   
 


और अंत में आपकी बात- अमित तिवारी के साथ

 

Friday, June 22, 2012

कहानी पॉडकास्ट - संकठा प्रसाद लौट आये हैं - रीता पाण्डेय

'बोलती कहानियाँ' इस स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने अर्चना चावजी की आवाज़ में प्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार हरिशंकर परसाई की कथा "सुशीला" का पॉडकास्ट सुना था। आवाज़ की ओर से आज हम लेकर आये हैं श्रीमती रीता पाण्डेय की रचना "संकठा प्रसाद लौट आये हैं", जिसको स्वर दिया है शेफाली गुप्ता ने।

संकठा प्रसाद लौट आये हैं का टेक्स्ट श्री ज्ञानदत्त पाण्डेय के प्रसिद्ध ब्लॉग मानसिक हलचल पर अतिथि पोस्ट के रूप में उपलब्ध है।

इस कहानी का कुल प्रसारण समय 4 मिनट 24 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं। यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।

जब तक कसा न जाये, तब तक कोई सक्रिय नहीं होता, न व्यक्ति न तन्त्र।
~ श्रीमती रीता पाण्डेय
श्रीमती रीता पाण्डेय गाँव विक्रमपुर, जिला भदोही से हैं। वे सपरिवार शिवकुटी (उ.प्र.) में रहती हैं।

हर शनिवार को "बोलती कहानियाँ" पर सुनें एक नयी कहानी

"संकठा प्रेम नगर की सीढ़ियां चढ़ते गये। लड़की को समोसा – लौंगलता खिलाये। फिर मोटरसाइकल पर बैठा कर प्रेम गली में फर्राटा भरने लगे।" (श्रीमती रीता पाण्डेय की "संकठा प्रसाद लौट आये हैं" से एक अंश)

नीचे के प्लेयर से सुनें.
(प्लेयर पर एक बार क्लिक करें, कंट्रोल सक्रिय करें फ़िर 'प्ले' पर क्लिक करें।)
 यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें:
VBR MP3
(लिंक पर राइट्क्लिक करके सेव ऐज़ का विकल्प चुनें)

#22nd Story, Susheela: Rita Pandey/Hindi Audio Book/2012/22. Voice: Shaifali Gupta

Thursday, June 21, 2012

स्मृतियों के झरोखे से : भारतीय सिनेमा के सौ साल – 2


भूली बिसरी यादें

पिछले सप्ताह से हमने एक नया साप्ताहिक स्तम्भ- ‘स्मृतियों के झरोखे से : भारतीय सिनेमा के सौ साल’ आरम्भ किया है। इस श्रृंखला की दूसरी कड़ी में आज हम आपके लिए लाए हैं- ‘भूली बिसरी यादें’ शीर्षक के अन्तर्गत मूक और सवाक फिल्मों के दौर की कुछ यादें। इसके साथ-साथ आज के अंक में हम आपको 1932 में बनी फिल्म ‘मायामछिन्द्र’ का एक दुर्लभ गीत भी सुनवाएँगे।

‘भूली बिसरी यादें’ के पहले अंक में आप सभी सिनेमा-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत है। पिछले अंक में ‘मैंने देखी पहली फिल्म’ के अन्तर्गत हमने आपको अपने साथी सुजॉय चटर्जी का संस्मरण प्रस्तुत किया था और आपसे भारत में निर्मित पहले मूक-कथा-चलचित्र ‘राजा हरिश्चन्द्र’ के प्रदर्शन की संक्षिप्त चर्चा भी की थी। 3 मई, 1913 को मुम्बई में प्रदर्शित इस मूक फिल्म से पहले भारत में फिल्म-निर्माण के तथा भारतीय जनमानस को इस नई विधा से परिचित कराने के जो भी प्रयास किए गए थे, आज हम आपसे इसी विषय पर थोड़ी चर्चा करेंगे।

‘राजा हरिश्चन्द्र’ से पहले
फिल्म 'राजा हरिश्चन्द्र' का विज्ञापन 

टाइम्स ऑफ इण्डिया, मुम्बई (तब बम्बई) के 7 जुलाई, 1896 के अंक में एक विदेशी फिल्म के प्रदर्शन का विज्ञापन प्रकाशित हुआ था। सार्वजनिक रूप किसी फिल्म के प्रदर्शन की सूचना देने वाला यह भारत का प्रथम विज्ञापन था। उसी दिन स्थानीय वाटसन होटल में लुईस और ऑगस्ट लुमियरे नामक फ्रांसीसी बन्धुओं की बनाई फिल्म- ‘मारवेल ऑफ दि सेंचुरी’ का प्रदर्शन हुआ था। यह भारत में प्रदर्शित प्रथम विदेशी फिल्म थी, बाद में 14 जुलाई, 1896 से मुम्बई के नावेल्टी थियेटर में इस फिल्म का नियमित प्रदर्शन हुआ। इस घटना के लगभग डेढ़ वर्ष बाद कोलकाता (तब कलकत्ता) में भी सिनेमाई हलचल का सूत्रपात हुआ। 9 फरवरी, 1898 के दिन कलकत्ता के स्टार थियेटर में एक लघु मूक फिल्म ‘दि फ्लावर ऑफ पर्सिया’ से लोगों को इस नई चमत्कारी विधा का परिचय मिला। इसी वर्ष तत्कालीन कलकत्ता के दो व्यवसायी बन्धु हीरालाल सेन और मोतीलाल सेन ने लन्दन से एक बाइस्कोप सिनेमेट्रोग्राफिक मशीन खरीदी। 4 अप्रैल को प्रयोग का तौर पर स्थानीय क्लासिक थियेटर में तीन-चार छोटी-छोटी आयातित फिल्मों का प्रदर्शन किया गया। सेन बन्धुओं की बड़ी मस्जिद स्ट्रीट में एच.एल. सेन ऐंड ब्रदर्स नामक कम्पनी थी। उन्होने अपनी इस कम्पनी के नियंत्रण में ‘रॉयल बाइस्कोप कम्पनी’ का निर्माण किया और व्यावसायिक टूरिंग (घुमन्तू) सिनेमा के रूप में बंगाल, ओडिसा और बिहार के नगरों-कस्बों तक के लोगों को विदेश में बनी कुछ छोटी-छोटी फिल्में दिखाने लगे। लोगों के लिए परदे पर चलती-फिरती ये तस्वीरें एक चमत्कार से कम नहीं थी।

सवाक युग के धरोहर

मूक फिल्मों के युग की तमाम दिलचस्प बातें हम इस श्रृंखला की अगली कड़ियों में भी जारी रखेंगे। मूक फिल्मों के निर्माण का जो सिलसिला ‘राजा हरिश्चन्द्र’ फिल्म से आरम्भ हुआ था, वह 1931 में बनी पहली सवाक फिल्म ‘आलमआरा’ से टूटा। इस पहली सवाक फिल्म से ही भारतीय फिल्मों का संगीत के साथ प्रगाढ़ सम्बन्ध भी स्थापित हो गया। इस श्रृंखला के लिए जब हम तथ्यों की खोज कर रहे थे तब हमें 1932 में बनी कुछ फिल्मों के संगीत का अनमोल खजाना मिला। आपको याद होगा कि ‘स्वरगोष्ठी’ के 74वें अंक में हमने 1932 में बनी फिल्म ‘लाल-ए-यमन’ में फिरोज दस्तूर (यहाँ देखें) के गाये गीतों से आपका परिचय कराया था। आज के अंक में हम आपके लिए 1932 की ही एक और फिल्म ‘मायामछिन्द्र’ का एक बेहद मधुर और दुर्लभ गीत लेकर उपस्थित हुए हैं।
गोविन्दराव तेम्बे 

मूक फिल्मों के दौर में कोल्हापुर की प्रभात फिल्म कम्पनी कई सफल फिल्मों का निर्माण किया था। व्ही. शान्ताराम, एस. फत्तेलाल, विष्णुपन्त दामले और केशवराव ढेबर द्वारा संचालित यह फिल्म कम्पनी 1931 से पहले गोपाल कृष्ण, खूनी खंजर, चन्द्रसेना सहित 6 सफल फिल्मों का निर्माण कर चुकी थी। सवाक फिल्मों के दौर में 1932 में निर्मित ‘मायामछिन्द्र’, प्रभात फिल्म कम्पनी की दूसरी बोलती फिल्म थी। यह हिन्दी और मराठी दोनों भाषाओं में बनी चमत्कारपूर्ण दृश्यों से भरपूर एक रोचक फिल्म थी। अपने समय के विख्यात नाटककार मणिशंकर त्रिवेदी के नाटक ‘सिद्ध संसार’ का यह फिल्म-रूपान्तरण था। 84 महासिद्धों की कथाओं में तांत्रिक गुरु मत्स्येन्द्रनाथ (अपभ्रंश- मछिन्द्रनाथ) की कथा, चमत्कारों से परिपूर्ण है। फिल्म के निर्देशक व्ही. शान्ताराम ने तत्कालीन सीमित तकनीकी संसाधनों से फिल्म को ऐसा भव्य और रोचक स्वरूप प्रदान किया कि दर्शक मुग्ध रह गए। फिल्म में गोविन्दराव तेम्बे ने मछिन्द्रनाथ, दुर्गा खोटे ने महारानी और मास्टर विनायक (अभिनेत्री नन्दा के पिता) ने गोरखनाथ की भूमिकाएँ अदा की थी। गोविन्दराव तेम्बे ही इस फिल्म के संगीतकार थे। ‘धुनों की यात्रा’ पुस्तक के लेखक पंकज राग, गोविन्दराव तेम्बे की प्रतिभा के बारे में लिखते हैं- ‘वे एक साथ संगीतकार, गायक, अभिनेता, नाटककार – सभी कुछ थे। हारमोनियम बजाने में तेम्बे को महारथ हासिल थी। शास्त्रीय संगीत के अपने विराट ज्ञान के लिए वे भास्करबुआ बखले और उस्ताद अल्लादिया खाँ को श्रेय देते थे।’ आइए, सवाक फिल्मों के आरम्भिक दौर की फिल्म ‘मायामछिन्द्र’ का एक दुर्लभ गीत सुनते हैं, जिसे अपने समय के महान संगीतकार गोविन्दराव तेम्बे ने गाया और स्वरबद्ध किया था।

फिल्म – मायामछिन्द्र : ‘छोड़ आकाश को सितारे जमीं पर आए...’ : संगीत और स्वर – गोविन्दराव तेम्बे




गीत के बोल यहाँ देखें

इसी गीत की प्रस्तुति के साथ ही अपने मित्र कृष्णमोहन मिश्र को आज यहीं विराम लेने की अनुमति दीजिए। आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमें अवश्य लिखिएगा। आपकी प्रतिक्रिया, सुझाव और समालोचना से हम अपने इस स्तम्भ को और भी सुरुचिपूर्ण रूप प्रदान कर सकते हैं। हमें आप radioplaybackindia@live.com पर अवश्य लिखें।

‘स्मृतियों के झरोखे से : भारतीय सिनेमा के सौ साल’ का अगला अंक ‘मैंने देखी पहली फिल्म’ पर केन्द्रित होगा। गैर-प्रतियोगी रूप में इस श्रृंखला का अगला संस्मरण हमारे संचालक मण्डल के ही किसी सदस्य का होगा। क्या आप अनुमान लगा सकते हैं कि अगला संस्मरण किसका होगा? 

प्रस्तुति – कृष्णमोहन मिश्र

Tuesday, June 19, 2012

मानसून की आहटें और कवि मन की छटपटाहटें

शब्दों की चाक पर - एपिसोड 03

शब्दों की चाक पर निरंतर सज रही हैं कवितायेँ...इस बार हमने थीम दिया था अपने कवियों को "मानसून की आहटें", इससे पहले कि आप ग्रीष्म ऋतु में मानसून की आहटों पर कान धरे हमारे कवियों के मनो भाव सुनें आईये एक बार फिर समझ लें इस कार्यक्रम की रूप रेखा -


1. कार्यक्रम की क्रिएटिव हेड रश्मि प्रभा के संचालन में शब्दों का एक दिलचस्प खेल खेला जायेगा. इसमें कवियों को कोई एक थीम शब्द या चित्र दिया जायेगा जिस पर उन्हें कविता रचनी होगी...ये सिलसिला सोमवार सुबह से शुरू होगा और गुरूवार शाम तक चलेगा, जो भी कवि इसमें हिस्सा लेना चाहें वो रश्मि जी से संपर्क कर उनके फेसबुक ग्रुप में जुड सकते हैं, रश्मि जी का प्रोफाईल यहाँ है.


2. सोमवार से गुरूवार तक आई कविताओं को संकलित कर हमारे पोडकास्ट टीम के हेड पिट्सबर्ग से अनुराग शर्मा जी अपने साथी पोडकास्टरों के साथ इन कविताओं में अपनी आवाज़ भरेंगें. और अपने दिलचस्प अंदाज़ में इसे पेश करेगें.

3. हर मंगलवार सुबह ९ से १० के बीच हम इसे अपलोड करेंगें आपके इस प्रिय जाल स्थल पर. अब शुरू होता है कार्यक्रम का दूसरा चरण. मंगलवार को इस पोडकास्ट के प्रसारण के तुरंत बाद से हमारे प्रिय श्रोता सुनी हुई कविताओं में से अपनी पसंद की कविता को वोट दे सकेंगें. सिर्फ कवियों का नाम न लिखें बल्कि ये भी बताएं कि अमुख कविता आपको क्यों सबसे बेहतर लगी. आपके वोट और हमारी टीम का निर्णय मिलकर फैसला करेंगें इस बात का कि कौन है हमारे सप्ताह का सरताज कवि. 

चलिए अब लौटे हैं अनुराग शर्मा और अभिषेक ओझा की तरफ और आनंद लें मानसून की ठंडी ठंडी फुहारों का , और साथ में जानिये कि कौन है इस सप्ताह का सरताज कवि. सुनिए सुनाईये और छा जाईये...

(नीचे दिए गए किसी भी प्लेयेर से सुनें)



या फिर यहाँ से डाउनलोड कर सुने

Monday, June 18, 2012

सिने पहेली # 25 कुछ आसानियाँ कुछ दुश्वारियाँ


सिने-पहेली # 25 (18 जून, 2012) 


नमस्कार! 'सिने पहेली' के सफ़र को तय करते हुए हम सब आज आ पहुँचे हैं इस प्रतियोगिता के रूपक जयन्ती एपिसोड पर। जी हाँ, आज है 'सिने पहेली' की २५-वीं कड़ी, और इस सफ़र के इस मुकाम तक पहुँचने में हमारे हमसफ़र बने रहने के लिए मैं, सुजॉय चटर्जी, आप सभी प्रतियोगियों को हार्दिक धन्यवाद देता हूँ और आपसे आशा रखता हूँ कि आगे भी इसी तरह का साथ बना रहेगा। 'सिने पहेली' को और भी ज़्यादा मज़ेदार बनाने के लिए अगर आपके पास कोई सुझाव है तो 'सिने पहेली' के ईमेल आइडी cine.paheli@yahoo.com पर अवश्य लिखें। 

और अब पिछले सप्ताह 'सिने पहेली' परिवार से जुड़ने वाले नए साथियों का स्वागत करना चाहेंगे। आप हैं लखनऊ के चन्द्रकान्त दीक्षित, सिद्धार्थ नगर, यू.पी के ओमकार सिंह, और बीकानेर, राजस्थान के विजय कुमार व्यास। आप सभी का बहुत बहुत स्वागत है इस प्रतियोगिता में। आपसे निवेदन है कि हर सप्ताह इस प्रतियोगिता में हिस्सा लें और महाविजेता बन कर 5000 रुपये का नकद इनाम अपने नाम कर लें। महाविजेता बनने के लिए क्या नियम हैं, आइए उस बारे में आपको बताएँ। 'सिने पहेली' को १० सेगमेण्ट्स में बाँटा गया है। हर सेहमेण्ट होता है १० एपिसोड्स का। इन दिनों तीसरा सेगमेण्ट चल रहा है। हर सेगमेण्ट का एक विजेयता घोषित होता। पहले दोनों सेगमेण्ट्स के विजेता बने हैं लखनऊ के प्रकाश गोविंद। १० सेगमेण्ट्स के समाप्त होने पर जो प्रतियोगी सर्वाधिक सेगमेण्ट विजेता बना होगा, वही होगा महाविजेता और उन्हीं को मिलेगा 5000 रुपये का इनाम। अभी भी कुछ देर नहीं हुई है, आज से ही जुट जाइए इस प्रतियोगिता में, आनन्द लीजिए इस खेल का, और खेल ही खेल में कर लीजिए इनाम अपने नाम।

और अब आज की पहेलियाँ। नीचे दिए गए पायदान पहेली को सुलझाते हुए नीचे से उपर तक पहुँचना है। 




1. (बायें से दायें): 80 के दशक की एक अभिनेत्री। इसी नाम से आज के दौर में भी एक अभिनेत्री हैं जिनके पिता भी अभिनेता हैं।

2. (उपर से नीचे): शर्मीला टैगोर की एक फ़िल्म का शीर्षक। इस शीर्षक को अगर दो भागों में बाँटा जाये तो दो फ़िल्मों के शीर्षक बन सकते हैं।

3. (उपर से नीचे): एक अभिनेत्री जिनका असली नाम सरोज था। इन्होंने १९३५ में फ़िल्मों में बतौर अभिनेत्री काम करना शुरू किया। आगे चलकर इन्होंने फ़िल्म निर्माण व निर्देशन भी किया।

4. (उपर से नीचे): यह उस फ़िल्म का शीर्षक है जिसमें नीरज का लिखा एक गीत उस शब्द से शुरू होता है जो एक अन्य ऐसे फ़िल्म का शीर्षक है जिसमें जैकी श्रोफ़ सह-नायक हैं।

5. (उपर से नीचे): इसी फ़िल्म से इसकी अभिनेत्री ने हिन्दी फ़िल्म जगत में कदम रखा। इस फ़िल्म के संगीतकार को उस साल के सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार मिला। यह फ़िल्म एक तेलुगू हिट फ़िल्म का रीमेक था।

6. (उपर से नीचे): एक गायक का गायक पुत्र

6. (बायें से दायें): सनी देओल अभिनीत एक फ़िल्म

उपर दिए गए 7 सवालों के लिए आपको मिलेंगे 7 अंक। लेकिन यहीं पर सवाल समाप्त नहीं हो जाते। कुछ और सवाल ये रहे...

2. (बायें से दायें): अगर आपने उपर वर्ग पहेली के 2 और 3 का जवाब दिया है, तो आपको यह शब्द पता ही होगा। यह शब्द एक फ़िल्म का शीर्षक है, बताइए इस फ़िल्म के संगीतकार का नाम।

3. (बायें से दायें):  अगर आपने उपर वर्ग पहेली के 3 और 4 का जवाब दिया है, तो आपको यह शब्द पता ही होगा। यह शब्द एक फ़िल्मकार की उपाधि है। बताइए उस फ़िल्मकार का नाम।

4. (बायें से दायें): अगर आपने उपर वर्ग पहेली के 4 और 5 का जवाब दिया है, तो आपको यह शब्द पता ही होगा। यह शब्द एक फ़िल्म का शीर्षक है, बताइए इस फ़िल्म की नायिका का नाम।

5. (बायें से दायें): अगर आपने उपर वर्ग पहेली के 5 और 6 का जवाब दिया है, तो आपको यह शब्द पता ही होगा। यह शब्द एक फ़िल्म का शीर्षक है, बताइए इस फ़िल्म के निर्देशक का नाम।

तो दोस्तों, इस तरह से आपके लिए कुल 7+4 = 11 अंकों के सवाल हमने पूछ लिए। लेकिन यहीं पर आज की पहेलियाँ समाप्त नहीं होती। चलिए एक और सवाल पूछ लेते हैं। नीचे दिखाये गए चित्र को ध्यान से देखिए। आपको इस चित्र को एक शीर्षक देनी है, और वह भी किसी हिन्दी फ़िल्मी गीत का मुखड़ा। ज़रा सोचिए और बताइए कि कौन सा गीत इस चित्र के लिए सबसे ज़्यादा सार्थक है। आपके जवाब अलग-अलग हो सकते हैं। अगर आप अपने जवाब को सार्थक सिद्ध कर सके तो आपको 1 अंक दिए जायेंगे।




इस तरह से 12 अंकों के सवाल हमने पूछ लिए।

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और अब ये रहे इस प्रतियोगिता में भाग लेने के कुछ आसान से नियम....

१. जवाब भेजने के लिए आपको करना होगा एक ई-मेल cine.paheli@yahoo.com के ईमेल पते पर। 'टिप्पणी' में जवाब न कतई न लिखें, वो मान्य नहीं होंगे।

२. ईमेल के सब्जेक्ट लाइन में "Cine Paheli # 25" अवश्य लिखें, और जवाबों के नीचे अपना नाम व स्थान लिखें।

३. आपका ईमेल हमें शुक्रवार 22 जून तक मिल जाने चाहिए।

४. आप अपने जवाब एक ही ईमेल में लिखें। किसी प्रतियोगी का पहला ईमेल ही मान्य होगा। इसलिए सारे जवाब प्राप्त हो जाने के बाद ही अपना ईमेल भेजें।

है न बेहद आसान! तो अब देर किस बात की, लगाइए अपने दिमाग़ पे ज़ोर और जल्द से जल्द लिख भेजिए अपने जवाब। जैसा कि हमने शुरु में ही कहा है कि हर सप्ताह हम सही जवाब भेजने वालों के नाम घोषित किया करेंगे, और पचासवे अंक के बाद "महाविजेता" का नाम घोषित किया जाएगा। 

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और अब 11 जून को पूछे गए 'सिने-पहेली # 24' के सवालों के जवाब ये रहे...


1. वह कौन सी चीज़ है जो मन में है, दिल में है, पर धड़कन में नहीं। सही जवाब है आमिर ख़ान। कुछ लोगों ने इसके जवाब में "प्रेम" या "ईर्श्या" भी लिखा है। पर क्योंकि यह सिने पहेली है, इसलिए ज़ाहिर है कि जवाब भी सिनेमा से जुड़े हुए ही होंगे।

2. दिखाये गए चित्र में और फ़िल्म 'बीवी हो तो ऐसी', दोनों में बिन्दु और रेखा हैं।

3. राज कपूर निर्मित यह फ़िल्म है 'राम तेरी गंगा मैली'। कोडिंग्‍ स्कीम: R की जगह S, A की जगह B, M की जगह N..... इस तरह से हर अक्षर के लिए उसके बाद का जो अक्षर है उसका इस्तमाल किया गया है। इस तरह से RAM TERI GANGA MAILI बन गया है SBN UFSJ HBOHB NBJMJ

4. जुगल हंसराज और इमरान ख़ान

5. संजय कपूर

और अब 'सिने पहेली # 24' के विजेताओं के नाम ये रहे -----

1. शरद तैलंग, कोटा --- 5 अंक
2. प्रकाश गोविन्द, लखनऊ --- 5 अंक
3. गौतम केवलिया, बीकानेर --- 5 अंक
4. चन्द्रकान्त दीक्षित, लखनऊ --- 5 अंक
5. रीतेश खरे, मुंबई --- 5 अंक
6. विजय कुमार व्यास, बीकानेर --- 5 अंक
7. सलमन ख़ान, अलीगढ़ --- 5 अंक
8. राजेश प्रिया, पटना --- 5 अंक
9. क्षिति तिवारी, इंदौर --- 5 अंक
10. अमित चावला, दिल्ली --- 4 अंक
11. सुमित चक्रवर्ती, चण्डीगढ़ --- 4 अंक
12. अवध लाल, लखनऊ --- 4 अंक
13. शुभ्रा शर्मा, नयी दिल्ली --- 4 अंक
14. शिल्पि जैन, नोएडा --- 4 अंक
15. पंकज मुकेश, बेंगलुरू --- 4 अंक
16. सागर चंद नाहर, हैदराबाद -- 4 अंक
17. निशान्त अहलावत, गुड़गाँव --- 3 अंक
18. ओमकार सिंह, सिद्धार्थनगर, यू.पी --- 2 अंक

सभी विजेताओं को हार्दिक बधाई। अंक सम्बंधित अगर आपको किसी तरह की कोई शिकायत हो, तो cine.paheli@yahoo.com के पते पर हमें अवश्य सूचित करें। आप सब भाग लेते रहिए, इस प्रतियोगिता का आनन्द लेते रहिए, क्योंकि महाविजेता बनने की लड़ाई अभी बहुत लम्बी है। आज के एपिसोड से जुड़ने वाले प्रतियोगियों के लिए भी १००% सम्भावना है महाविजेता बने। इसलिए मन लगाकर और नियमित रूप से (बिना किसी एपिसोड को मिस किए) सुलझाते रहिए हमारी सिने-पहेली, करते रहिए यह सिने मंथन, और अनुमति दीजिए अपने इस ई-दोस्त सुजॉय चटर्जी को, आपकी और मेरी दोबारा मुलाक़ात होगी अगले सोमवार इसी स्तंभ में, नमस्कार!

Sunday, June 17, 2012

हारमोनियम बनाया अंग्रेजों ने, पर बजाया भैया गणपत राव ने


स्वरगोष्ठी – ७५ में आज

ठुमरी गायन और हारमोनियम वादन के एक अप्रतिम साधक : भैया गणपत राव 

हारमोनियम एक ऐसा सुषिर वाद्य है जिसका प्रयोग आज देश में प्रचलित हर संगीत शैलियों में किया जा रहा है, किन्तु एक समय ऐसा भी था जब शास्त्रीय संगीत के मंचों पर यह वाद्य प्रतिबन्धित रहा। उन्नीसवीं शताब्दी के ऐसे ही सांगीतिक परिवेश में एक संगीत-पुरुष अवतरित हुआ जिसने हारमोनियम वाद्य को इतनी ऊँचाइयों पर पहुँचा दिया कि आज इसे विदेशी वाद्य मानने में अविश्वास होता है। हारमोनियम वादन और ठुमरी गायन में सिद्ध इस संगीत-पुरुष का नाम है- भैया गणपत राव।
भैया गणपत राव 

‘स्वरगोष्ठी’ के एक नए अंक में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। आज के अंक में हम आपसे एक ऐसे संगीत-साधक की चर्चा करेंगे, जिसके कृतित्व को जानबूझ कर उपेक्षित किया गया। ग्वालियर राज-परिवार से जुड़े भैया गणपत राव एक ऐसे ही साधक थे जिन्होने हारमोनियम वादन और ठुमरी-दादरा गायन को उन ऊँचाइयों पर पहुँचाया जिसे स्पर्श करना हर संगीतकार का स्वप्न होता है। उन्नीसवीं शताब्दी के लगभग मध्य-काल में तत्कालीन ग्वालियर नरेश महाराज जयाजीराव सिंधिया के पुत्र के रूप में उनका जन्म हुआ था, किन्तु राजपुत्र होने का गौरव तो दूर, दरबारी संगीतकार के रूप में समुचित स्थान उन्हें कभी नहीं मिला। केवल इसलिए कि गणपत राव महारानी के गर्भ से नहीं, बल्कि राज दरबार की सुप्रसिद्ध गायिका चन्द्रभागा देवी के गर्भ से उत्पन्न हुए थे। यह उपेक्षा केवल गणपत राव को ही नहीं उनके अग्रज भैया बलवन्त राव को भी झेलनी पड़ी, जबकि वे श्रीकृष्ण के अनन्य भक्त और कुशल वीणा-वादक थे।

पिछले वर्ष मार्च-अप्रैल में मेरे सम्पादक सजीव सारथी ने ‘फिल्मों में ठुमरी’ के प्रयोग विषयक २० कड़ियों की एक लम्बी श्रृंखला लिखने का दायित्व सौंपा था। लगभग तीन-साढ़े तीन सौ फिल्मी ठुमरियों में से काल-क्रम के अनुसार २० फिल्मी ठुमरियों को चुनना तो सरल था किन्तु ठुमरी शैली के इतिहास की बारी आई तो दिग्भ्रमित हो गया। ठुमरी शैली को प्रतिष्ठित स्थान दिलाने और उसके प्रचार-प्रसार में भैया गणपत राव की भूमिका के बारे में बचपन से लेकर युवावस्था तक वाराणसी के कई संगीतज्ञों, विशेष रूप से पण्डित महादेवप्रसाद मिश्र से सुन चुका था। लखनऊ की डॉ. सुशीला मिश्रा और डॉ. श्रीक़ृष्ण नारायण रतञ्जंकर के शिष्य और संगीत-शिक्षक पण्डित सीताशरण सिंह भी ठुमरी की चर्चा छिड़ने पर भैया गणपत राव और उनके शिष्य मौजुद्दीन खाँ के गुणों का उल्लेख अवश्य करते थे। परन्तु ‘फिल्मों में ठुमरी’ विषयक श्रृंखला तैयार करते समय मैंने भैया जी के सांगीतिक योगदान का उल्लेख करने में इतिहासकारों को प्रायः मौन पाया। और यदि उनके बारे में चर्चा की भी गई तो वह भ्रमपूर्ण और अप्रामाणिक। सच तो यही है कि भैया गणपत राव के कृतित्व का सही मूल्यांकन हम नहीं कर सके। बहरहाल, बुजुर्गों से सुनी बातों और भैया जी के विषय में पुस्तकों में उल्लिखित आधे-अधूरे
भैया जी के शिष्य मौजूद्दीन खाँ
तथ्यों के सहारे मैंने अपनी श्रृंखला तो किसी तरह पूरी कर ली थी, परन्तु एक महान संगीतज्ञ के कृतित्व से अपने पाठकों का पूरा परिचय न करा पाने की विवशता से ग्रसित भी था। अचानक पिछले दिनों भैया गणपत राव पर प्रकाशित ‘संगीत’ मासिक पत्रिका के विशेषांक के कारण भैया जी के बारे में बुजुर्गों से प्राप्त अधिकतर जानकारी की पुष्टि हुई। अपने सुने हुए तथ्यों की पुष्टि किसी पुस्तक या पत्र-पत्रिका द्वारा न होने से मैं अपने ठुमरी-श्रृंखला के आलेखों में इन तथ्यों का उल्लेख नहीं कर सका था।

आइए यहाँ थोड़ा रुक कर पहले आपको भैया गणपत राव के प्रमुख शिष्य मौजुद्दीन खाँ के स्वर में एक अत्यन्त प्रसिद्ध ठुमरी- ‘बाजूबन्द खुल खुल जाए....’ सुनवाते हैं। यह दुर्लभ ठुमरी ग्रामोफोन कम्पनी ने १९०८ में रिकार्ड की थी। भैया जी के पूरे जीवन-काल में उनके गायन या हारमोनिया वादन का कोई रिकार्ड नहीं बना था।

मौजुद्दीन खाँ : ठुमरी – “बाजूबन्द खुल खुल जाए...”



अब आइए, थोड़ी चर्चा ‘संगीत’ मासिक के उस विशेषांक की करते हैं, जो भैया गणपत राव के व्यक्तित्व और कृतित्व पर केन्द्रित है। भारतीय संगीत विषयक यह पत्रिका विगत ७७ वर्षों से प्रकाशित हो रही है। पत्रिका के अंकों में शास्त्रीय गायन-वादन विषय पर विद्वानो के लेख, नवीन सांगीतिक रचनाओं का उल्लेख, स्वरलिपियाँ तथा सुगम और फिल्म संगीत पर भी चर्चा होती है। प्रत्येक वर्ष का पहला अंक एक समृद्ध विशेषांक के रूप में प्रकाशित होता है। इस वर्ष ‘संगीत’ का विशेषांक भैया गणपत राव पर है। सम्पादक मण्डल ने विशेषांक की सामग्री के लिए दतिया के प्रसिद्ध संगीतज्ञ महेशकुमार मिश्र ‘मधुकर’ को दायित्व दिया। यह उचित भी था, क्योंकि ग्वालियर में भैया जी सदा उपेक्षित ही रहे और दतिया-नरेश ने उन्हें सर-आँखों पर बैठाया था। मधुकर जी ने अपने से पहले की पीढ़ी के उन संगीत-साधकों से प्राप्त जानकारियों को आधार बनाया है, जो भैया जी के शिष्य थे। दतिया के रामप्रसाद पंडा से मधुकर जी को पर्याप्त सामाग्री प्राप्त हुई। श्री पंडा और उनके पिता भी भैया जी के शिष्य रहे। इनके अलावा दतिया के कई और संगीत-साधकों का उल्लेख भी मधुकर जी ने किया है। विशेषांक में मधुकर जी की पूरी शोध-सामग्री को अलग-अलग शीर्षकों में बाँटा गया है। जैसे- एक विस्मृत कलाकार, भैया गणपत राव की शिक्षण-पद्यति, उनकी गुरु-शिष्य परम्परा, ग्वालियर में स्थिति और परिस्थितियाँ, भैया जी का जन्म और निधन वर्ष, उनकी प्रिय चीजें और उनकी स्वरलिपियाँ आदि कुछ उल्लेखनीय शीर्षक हैं। मधुकर जी के अनुसार भैया जी की गायी कुछ रचनाएँ, जो संगीत जगत आज भी लोकप्रिय हैं, उन रचनाओं में से एक का रसास्वादन हम आपको भी कराते हैं।

मधुकर जी ने उल्लेख किया है कि राग तिलक कामोद की ठुमरी- ‘कंकर मार जगा गयो रे बम्हना के छोरा....’ भैया जी की एक प्रिय ठुमरी है, जिसे उन्होने भैया जी के शिष्य पंडा जी से प्रत्यक्ष सुनी थी। अब हम आपको यही ठुमरी उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ के स्वरों में सुनवाते हैं, किन्तु खाँ साहब ने यह ठुमरी राग पीलू में गाया है।

उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ : ठुमरी - ‘कंकर मार जगा गयो रे बम्हना के छोरा....’



भैया गणपत राव पर केन्द्रित ‘संगीत’ मासिक के विशेषांक में सम्पादकीय आलेख पत्रिका के विद्वान प्रधान सम्पादक डॉ. लक्ष्मीनारायण गर्ग का है। डॉ. गर्ग ने अपने सम्पादकीय में मधुकर जी द्वारा विभिन्न शीर्षकों में बाँटी गई शोध-सामग्री का एक प्रकार से सारांश प्रस्तुत कर दिया है। यह हमारा दुर्भाग्य है कि विशेषांक की सामग्री सौंपने के बाद भैया जी की स्मृतियों को समेटने वाले विद्वान मधुकर जी का स्वर्गवास हो गया था। विशेषांक के अन्त में उनके पुत्र विनोद मिश्र ‘सुरमणि’ ने दतिया के समाज गायन का उल्लेख करते हुए पत्रिका के सम्पादक के प्रति आभार व्यक्त किया है।

मधुकर जी ने भैया जी की जिन प्रिय चीजों का उल्लेख किया है, उनमें राग खमाज की एक रचना है- ‘कौन गली गयो श्याम....’, जिसका गायन अनेक प्रतिष्ठित संगीत-साधकों ने किया है। अब हम आपको विदुषी प्रभा अत्रे के स्वरों में यही ठुमरी राग मिश्र खमाज, दीपचंदी ताल में सुनवाते हैं।

विदुषी प्रभा अत्रे : ठुमरी - ‘कौन गली गयो श्याम....’



भैया गणपत राव की प्रिय यह ठुमरी कई फिल्मों में भी गायी गई है। १९७२ में प्रदर्शित फिल्म ‘पाकीज़ा’ में विदुषी परवीन सुलताना ने यही ठुमरी राग पहाड़ी में गाया है। इसी प्रकार १९५९ की फिल्म ‘मधु’ में संगीतकार रोशन ने अन्तरों में परिवर्तन कर यह ठुमरी लता मंगेशकर और मन्ना डे से अलग-अलग गवाया था। हम आपको पहले परवीन सुलताना और फिर लता जी की आवाज़ में यह ठुमरी सुनवाते हैं। आप इन गीतों का रसास्वादन कीजिये और इस अंक को यहीं विराम देने की हमें अनुमति दीजिए। ‘संगीत’ मासिक के सम्पादक-मण्डल को एक उपयोगी विशेषांक प्रकाशित करने के लिए सभी संगीत-प्रेमियों की ओर से आभार और भारतीय संगीत के अप्रतिम साधक भैया गणपत राव की स्मृतियों को रेडियो प्लेबैक इण्डिया की ओर से नमन!

फिल्म – पाकीज़ा : परवीन सुलताना - ‘कौन गली गयो श्याम....’



फिल्म – मधु : लता मंगेशकर - ‘बता दो कोई कौन गली गयो श्याम....’



आज की पहेली

आज की संगीत-पहेली में हम आपको सुनवा रहे हैं, संगीत-मार्तण्ड ओमकारनाथ ठाकुर के बुलन्द स्वर में स्वतंत्र भारत के प्रथम सूर्योदय पर रेडियो से सजीव रूप से प्रसारित ‘वन्देमातरम’ गीत का एक अंश। इसे सुन कर आपको हमारे दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ८०वें अंक तक सर्वाधिक अंक अर्जित करने वाले पाठक/श्रोता हमारी तीसरी पहेली श्रृंखला के ‘विजेता’ होंगे।



१ - संगीत के इस अंश को सुन कर राग पहचानिए और हमें राग का नाम बताइए।

२ – संविधान द्वारा राष्ट्रगीत के समतुल्य मान्य इस गीत के रचनाकार (लेखक) कौन हैं?

आप अपने उत्तर हमें तत्काल swargoshthi@gmail.com पर भेजें। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के ७७वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अथवा swargoshthi@gmail.com पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं। इस अंक में ‘संगीत’ मासिक पत्रिका के ‘भैया गणपत राव विशेषांक’ की चर्चा की गई है। इस पत्रिका के विषय में यदि आपको कोई जानकारी प्राप्त करनी हो या कोई टिप्पणी करनी हो तो अपना सन्देश sangeetkaryalaya101@gmail.com पर भेजें।

पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के ७३वें अंक में हमने आपको पण्डित फिरोज दस्तूर के स्वर में राग यमन की एक रचना का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। हमारे पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग यमन और दूसरे का उत्तर है- पण्डित भीमसेन जोशी। दोनों प्रश्नों के सही उत्तर मीरजापुर (उ.प्र.) के डॉ. पी.के. त्रिपाठी, जबलपुर की क्षिति तिवारी तथा पटना की अर्चना टण्डन ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को रेडियो प्लेबैक इण्डिया की ओर से हार्दिक बधाई।

मित्रों, अब हमने आपकी प्रतिक्रियाओं, सन्देशों और सुझावों के लिए एक अलग साप्ताहिक स्तम्भ ‘आपकी बात’ आरम्भ किया है। अब प्रत्येक शुक्रवार को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’पर आपके भेजे सन्देश को आपके साथी अमित तिवारी और दीपा तिवारी अपने सजीव कार्यक्रम में शामिल किया करेंगे। आप हमें swargoshthi@gmail.com के पते पर आज ही लिखें।

झरोखा अगले अंक का

मित्रों, अगले रविवार यानी २४ जून को संगीत-मार्तण्ड पण्डित ओमकारनाथ ठाकुर की जयन्ती है। इस पुनीत अवसर पर हम आपको उनके सांगीतिक जीवन के बारे में चर्चा करेंगे। इसके साथ ही उनकी कुछ चुनी हुई श्रेष्ठ रचनाएँ भी आपको सुनवाएँगे। आगामी रविवार को प्रातः ९-३० बजे आप और हम ‘स्वरगोष्ठी’ के अगले अंक में पुनः मिलेंगे। तब तक के लिए हमें विराम लेने की अनुमति दीजिए। 


कृष्णमोहन मिश्र

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