Wednesday, March 7, 2012

७ मार्च- आज का गाना


गाना: आये हैं दूर से, मिलने हज़ूर से


चित्रपट:तुमसा नहीं देखा
संगीतकार:ओ. पी. नय्यर
गीतकार:मजरूह सुलतान पुरी
स्वर: रफ़ी, आशा





आशा: आए हैं दूर से, मिलने हज़ूर से
ऐसे भी चुप न रहिये, कहिये जी कुछ तो कहिये
दिन है के रात है
रफ़ी: हाय ...
तुमसे मेहमान क्या, मुझपे अहसान क्या
लाखों ही ज़ुल्फ़ों वाले, आती हैं घेरा डाले
मेरी क्या बात है
आशा: आये हैं दूर से ...

उठ के तो देखिये, कैसी फ़िज़ा है
शरमाना छोड़िये, ये क्या अदा है
रफ़ी: तौबा ये क्या फ़रमाया
मैं तो यूँ ही शरमाया
मेरी क्या बात है
आशा: आये हैं दूर से ...
रफ़ी: ओ ओ ओ ...
तुमसे मेहमान का ...

दिखती है रोज़ ही, ऐसी फ़िज़ाएं
मुखड़े के सामने, काली घटाएं
आशा: कोई चल जाए जादू, फिर हम पूछेंगे बाबू
दिन है के रात है ...
रफ़ी: ओ ओ ओ ...
तुमसे मेहमान का ...
आशा: आ आ आ ...
आये हैं दूर से ...




Tuesday, March 6, 2012

मिलिए सागर से जिन्हें लायीं है रश्मि जी ब्लोग्गेर्स चोईस में


सागर को जानना हो तो उसकी लहरों से पूछो, हिम्मत हो तो उसकी गहराई में जाओ - असली सीप असली मोती वहीँ मिलते हैं. चलिए यह जब होगा तब होगा ..... मैंने सागर से उसकी पसंद के ५ गाने मांगे.... सागर ने ४ दिए और कहा - एक पसंद आपकी शामिल हो तो एक सीप और पूर्ण हो.' क्योंकि सागर को ऐतबार है मेरी पसंद पर ('जी' लगाने से सागर की लहरें खो जातीं तो सागर ही लिखा है) तो ४ गाने सागर के, यह कहते हुए कि - 'सुनो और जानो इसमें क्या है !', और साथ में एक गीत मेरी पसंद का.

तो सुना जाए -

१. दिल ढूंढ़ता है फिर वही फुर्सत के रात दिन - दिल्ली में मशीन बना रहता हूँ, सर पर सलीब लटकती रहती है और ख्यालों को खेत में छोड़ आया हूँ इसलिए...


२. तेरे खुशबू में बसे ख़त मैं जलाता कैसे - गंगा, पुल, प्रेम और कोहरे में स्पष्ट दीखता धुंधला सा चेहरा...


३. माई री मैं का से कहूँ पीर अपने जिया की - इसके कुछ शब्द बेहद मौलिक और आत्मीय लगते हैं.


४. वहां कौन है तेरा मुसाफिर जाएगा कहाँ - एस. डी. बर्मन की भटियाली आवाज़... जैसे खाई में कूद जाने का मन होता है.


५. अंत में
एक जो आपको सबसे ज्यादा पसंद हो - अबकी कारण बताने की जरुरत नहीं, आप बेहतर जानती होंगी.
तो आपके साथ मेरी पसंद.

६ मार्च- आज का गाना


गाना: अंधे जहान के अंधे रास्ते


चित्रपट:पतिता
संगीतकार:शंकर - जयकिशन
गीतकार:शैलेन्द्र
स्वर: तलत महमूद





अंधे जहान के अंधे रास्ते, जाएं तो जाएं कहाँ
दुनिया तो दुनिया, तू भी पराया, हम यहाँ ना वहाँ

जीने की चाहत नहीं, मर के भी राहत नहीं
इस पार आँसू, उस पार आहें, दिल मेरा बेज़ुबां
अंधे जहान के ...

हम को न कोई बुलाए, ना कोई पलकें बिछाए
ऐ ग़म के मारों, मंज़िल वहीं है, दम ये टूटे जहाँ
अंधे जहान के ...

आग़ाज़ के दिन तेरा अंजाम तय हो चुका
जलते रहें हैं, जलते रहेंगे, ये ज़मीं आसमां
अंधे जहान के ...



Monday, March 5, 2012

सिने-पहेली # 10

जाँचिए अपना फिल्म संगीत ज्ञान 


रेडियो प्लेबैक इण्डिया के सभी श्रोता-पाठकों को कृष्णमोहन मिश्र का रंगोत्सव के शुभ पर्व पर शत-शत बधाई। दोस्तों, 'सिने-पहेली' की दसवीं कड़ी लेकर आज मैं उपस्थित हूँ। आपको अवगत करा दूँ कि हम सबके प्रिय सुजॉय जी अगले दो सप्ताह तक अवकाश पर होंगे, इसलिए इस अवधि में मैं ही आपके सम्मुख प्रश्न-चिह्न उपस्थित करूँगा। आप यह भी जानते हैं कि सिने-पहेली की यह 10वीं कड़ी है और इस कड़ी का परिणाम ही पहले सेगमेण्ट के विजेता का निर्धारण करेगा। पहेली आरम्भ करने से पहले, आइए पिछले अंक तक शीर्ष चार प्रतियोगियों के नाम और उनके द्वारा अर्जित अंकों पर नज़र दौड़ा ली जाए।

प्रकाश गोविन्द, लखनऊ – 35 अंक 
पंकज मुकेश, बेंगलुरु – 30 अंक 
क्षिति तिवारी, इन्दौर – 25 अंक 
रीतेश खरे, मुंबई  --- 24 अंक

अब देर किस बात की, आप सब जुट जाइए इन पाँच प्रश्नो को हल करने में और मैं भी पूरी एकाग्रता से आपके उत्तरों की प्रतीक्षा में बैठ जाता हूँ। विजेता की प्रतीक्षा में मेरी भी धड़कनें अब बढ़ने लगीं है। तो आइए अब देर किस बात की, आरम्भ करता हूँ, आज की पहेली के प्रश्नों का सिलसिला-

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सवाल-1: गोल्डन वॉयस

गोल्डन वॉयस में आज हम आपको सुनवाने जा रहे हैं छठें दशक की एक चर्चित फिल्म के गीत का एक अंश। इस अंश को सुन कर बताइए कि इस गीत की गायिका कौन हैं?   



सवाल-2: पहचान कौन


दूसरे सवाल के रूप में आपको हल करने हैं एक चित्र पहेली का। नीचे दिए गए चित्र को ध्यान से देखिए। छठें दशक की एक बेहद चर्चित फिल्म के होली गीत का दृश्य है यह। आपको यह दृश्य देख कर फिल्माए गए गीत का मुखड़ा अर्थात गीत की प्रथम पंक्ति बताना है।



सवाल-3: सुनिये तो...

'सुनिये तो' में आज हम आपको सुनवा रहे हैं बांग्ला उपन्यासकार शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय के चर्चित उपन्यास पर बनी फिल्मों के कई संस्करणों में सबसे नवीनतम संस्करण के एक नृत्य गीत का अंश। इसे सुन कर क्या आप हमें गीत के केवल इस अंश के मुख्य गायक कलाकार का नाम बता सकते हैं

सवाल-4: बताइये ना!

और अब चौथा सवाल। अपने समय की अत्यन्त भव्य और सफल फिल्म ‘मुगल-ए-आजम’ में लता मंगेशकर का गाया और नौशाद का संगीतबद्ध किया यह मधुर गीत सुनिए और पहचानिए कि यह गीत किस राग पर आधारित है? 

सवाल-5: गीत अपना धुन पराई

और अब पाँचवा और आख़िरी सवाल। सुनिये इस विदेशी गीत को और बताइए कि वह कौन सा हिन्दी फ़िल्मी गीत है जिसकी धुन इस विदेशी गीत की धुन से प्रेरित है? गीत की आरम्भिक पंक्ति और फिल्म का नाम बताने पर ही अंक मिलेंगे। 


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तो दोस्तों, हमने पूछ लिए हैं आज के पाँचो सवाल, और अब ये रहे इस प्रतियोगिता में भाग लेने के कुछ आसान से नियम-

1. अगर आपको सभी पाँच सवालों के जवाब मालूम है, फिर तो बहुत अच्छी बात है, पर सभी जवाब अगर मालूम न भी हों, तो भी आप भाग ले सकते हैं, और जितने भी जवाब आप जानते हों, वो हमें लिख भेज सकते हैं।

2. जवाब भेजने के लिए आपको करना होगा एक ई-मेल cine.paheli@yahoo.com के ईमेल पते पर। 'टिप्पणी' में जवाब कतई न लिखें, वो मान्य नहीं होंगे।

3. ईमेल के सब्जेक्ट लाइन में "Cine Paheli # 10" अवश्य लिखें, और जवाब के नीचे अपना नाम, स्थान और पेशा लिखें।

4. आपका ईमेल हमें शुक्रवार 9 मार्च तक मिल जाने चाहिए। है न बेहद आसान! तो अब देर किस बात की, लगाइए अपने दिमाग़ पे ज़ोर और जल्द से जल्द लिख भेजिए अपने जवाब। जैसा कि आप जानते ही हैं कि हर सप्ताह हम सही जवाब भेजने वालों के नाम घोषित करते हैं और अगले अंक में तो हम पहले दस अंकों के ‘विजेता’ का नाम घोषित करने वाले हैं। पचासवें अंक के बाद "महाविजेता" का नाम घोषित किया जाएगा।

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 और अब 27 फ़रवरी को पूछे गए 'सिने-पहेली # 9' के सवालों के सही जवाब-

1. पहले सवाल 'गोल्डन वॉयस' में हमने आपको जो आवाज़ सुनवाई थी, वह आवाज़ थी गायक शंकर दासगुप्ता की।

2. 'चित्र-पहेली' में दिखाए गए चित्र में जिस गीत का दृश्य था, वह 1936 की फिल्म ‘अछूत कन्या’ का था और गीत का मुखड़ा है- ‘मैं वन की चिड़िया बन के वन-वन बोलूँ रे...’।

3. 'सुनिये तो' में आपको हमने जो संवाद सुनवाया था वह फिल्म ‘नमक हलाल’ से अमिताभ बच्चन की आवाज़ में था।

4. ‘बताइये ना’ सवाल का सही उत्तर है- ऐश्वर्या राय बच्चन।

5. 'गीत अपना धुन पराई' में जो विदेशी गीत सुनवाया था, उससे प्रेरित हिन्दी गीत है फ़िल्म 'सी.आई.डी.' का "ऐ दिल है मुश्किल जीना यहाँ..."।


और अब 'सिने पहेली # 9' के विजेताओं के नाम ये रहे -

1. प्रकाश गोविन्द, लखनऊ --- 5 अंक 
2. क्षिति तिवारी, इन्दौर --- 5 अंक 
3. पंकज मुकेश, बेंगलुरू --- 4 अंक 
4. रीतेश खरे, मुंबई --- 4 अंक 
5. इन्दु पुरी गोस्वामी, राजस्थान --- 3 अंक 
6. अमित चावला, दिल्ली --- 2 अंक

आप सभी विजेताओं को हार्दिक बधाई। यदि आपको अंक सम्बन्धी कोई शिकायत हो, तो cine.paheli@yahoo.com के पते पर हमें अवश्य सूचित करें। जिन पाठकों नें इसमें भाग लिया, पर सही जवाब न दे सके, उनका भी हम शुक्रिया अदा करते हैं और अनुरोध करते हैं कि अगली पहेली में भी ज़रूर भाग लीजिएगा। तो आज बस इतना ही, अगले सप्ताह आपसे इसी स्तम्भ में दोबारा मुलाक़ात होगी, तब तक के लिए सुलझाते रहिए, हमारी सिने-पहेली और करते रहिए यह सिने-मंथन, और अनुमति दीजिए अपने इस मित्र कृष्णमोहन मिश्र को।

५ मार्च- आज का गाना


गाना: प्यार कर ले नहीं तो फांसी चढ़ जाएगा


चित्रपट:जिस देश में गंगा बहती है
संगीतकार:शंकर जयकिशन
गीतकार:शैलेन्द्र
स्वर: मुकेश





( प्यार कर ले ) -२ नहीं तो फांसी चढ़ जाएगा
प्यार कर ले नहीं तो फांसी चढ़ जाएगा -३
( यार कर ले ) -२ नहीं तो यूँ ही मर जाएगा
प्यार कर ले ...

जीते हारे सैकड़ों तीर से तलवार से -२
मेरे साथ मुस्करा दिल तो जीत प्यार से
विचार कर ले नहीं तो पीछे पछताएगा
प्यार कर ले ...

चोरी करी चोर बना रोज़ कोई घात है
आज तेरी ज़िन्दगी जैसे काली रात है -२
प्यार कर ले नहीं तो चक्कर पड़ जाएगा
प्यार कर ले ...



Sunday, March 4, 2012

राग काफी और होली के इन्द्रधनुषी रंग

SWARGOSHTHI – 60

स्वरगोष्ठी – ६० में आज

‘होरी खेलत नन्दलाल बिरज में...’


भारतीय समाज में अधिकतर उत्सव और पर्वों का निर्धारण ऋतु परिवर्तन के साथ किया गया है। शीत और ग्रीष्म ऋतु की सन्धिबेला में मनाया जाने वाला पर्व- होलिकोत्सव, प्रकारान्तर से पूरे देश में आयोजित होता है। यह उल्लास और उमंग का, रस और रंगों का, गायन-वादन और नर्तन का पर्व है। आइए, इन्हीं भावों को साथ लेकर हम सब शामिल होते हैं, इस रंगोत्सव में।

बीर-गुलाल के उड़ते बादलों और पिचकारियों से निकलती इन्द्रधनुषी फुहारों के बीच ‘स्वरगोष्ठी’ के साठवें अंक के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, आपकी संगोष्ठी में पुनः उपस्थित हूँ। आज के अंक में और अगले अंक में भी हम फागुन की सतरंगी छटा से सराबोर होंगे। संगीत के सात स्वर, इन्द्रधनुष के सात रंग बन कर हमारे तन-मन पर छा जाएँगे। भारतीय संगीत की सभी शैलियों- शास्त्रीय, उपशास्त्रीय, सुगम, लोक और फिल्म संगीत में फाल्गुनी रस-रंग में पगी असंख्य रचनाएँ हैं, जो हमारा मन मोह लेती हैं। इस श्रृंखला में हमने संगीत की इन सभी शैलियों में से रचनाएँ चुनी हैं।

हमारे संगीत का एक अत्यन्त मनमोहक राग है- काफी। इस राग में होली विषयक रचनाएँ खूब मुखर हो जातीं हैं। राग काफी पर चर्चा हम बाद में करेंगे, उससे पहले आपको सुनवाते है एक फिल्मी गीत। १९६३ में एक फिल्म- ‘गोदान’ प्रदर्शित हुई थी। उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचन्द की कालजयी कृति ‘गोदान’ पर आधारित थी यह फिल्म, जिसके संगीतकार थे विश्वविख्यात सितार-वादक पण्डित रविशंकर। फिल्म के प्रायः सभी गीत रागों और विभिन्न लोक संगीत शैलियों पर आधारित थे। इन्हीं में एक होली गीत भी था, जिसे गीतकार अनजान ने लिखा और मोहम्मद रफी और साथियों ने स्वर दिया था। यह होली गीत फिल्म में गोबर की भूमिका निभाने वाले अभिनेता महमूद और उनके साथियों पर फिल्माया गया था। इस गीत के माध्यम से परदे पर ग्रामीण होली का परिवेश साकार हुआ था। लोकगीत के स्वरूप में होते हुए भी राग काफी के स्वर-समूह स्पष्ट रूप से परिलक्षित होते हैं। आइए, हम सब आनन्द लेते है, फिल्म- ‘गोदान’ के इस होली गीत का-

फिल्म – गोदान : ‘होली खेलत नन्दलाल बिरज में...’ : संगीत – पं. रविशंकर


होली, उल्लास, उत्साह और मस्ती का प्रतीक-पर्व होता है। इस अनूठे परिवेश का चित्रण भारतीय संगीत की सभी शैलियों में मिलता है। उपशास्त्रीय संगीत में तो होली गीतों का सौन्दर्य खूब निखरता है। ठुमरी-दादरा, विशेष रूप से पूरब अंग की ठुमरियों में होली का मोहक चित्रण मिलता है। उपशास्त्रीय संगीत की वरिष्ठ गायिका विदुषी गिरिजा देवी की गायी अनेक होरी हैं, जिनमे राग काफी के साथ-साथ होली के परिवेश का आनन्द भी प्राप्त होता है। बोल-बनाव से गिरिजा देवी जी गीत के शब्दों में अनूठा भाव भर देतीं हैं। आम तौर पर होली गीतों में ब्रज की होली का जीवन्त चित्रण होता है। अब हम आपको विदुषी गिरिजा देवी के स्वरों में जो काफी होरी सुनवा रहे हैं, उसमें राधा-कृष्ण की होली का अत्यन्त भावपूर्ण चित्रण है। लीजिए, आप भी सुनिए, यह मनमोहक काफी होरी-

काफी होरी : ‘तुम तो करत बरजोरी...’ : स्वर – गिरिजा देवी


अभी आपने जो होरी सुनी, वह स्पष्ट रूप से राग काफी में निबद्ध थी। आइए, अब थोड़ी चर्चा राग काफी की संरचना पर करते हैं। राग काफी, काफी थाट का आश्रय राग है और इसकी जाति है सम्पूर्ण-सम्पूर्ण, अर्थात आरोह-अवरोह में सात-सात स्वर प्रयोग किए जाते हैं। आरोह में सा रे ग(कोमल) म प ध नि(कोमल) सां तथा अवरोह में सां नि(कोमल) ध प म ग(कोमल) रे सा स्वरों का प्रयोग किया जाता है। इस राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर षडज होता है। कभी-कभी वादी कोमल गांधार और संवादी कोमल निषाद का प्रयोग भी मिलता है। दक्षिण भारतीय संगीत का राग खरहरप्रिय राग काफी के समतुल्य राग है। राग काफी, ध्रुवपद और खयाल की अपेक्षा उपशास्त्रीय संगीत में अधिक प्रयोग किया जाता है। ठुमरियों में प्रायः दोनों गांधार और दोनों धैवत का प्रयोग भी मिलता है। टप्पा गायन में शुद्ध गांधार और शुद्ध निषाद का प्रयोग वक्र गति से किया जाता है। इस राग का गायन-वादन रात्रि के दूसरे प्रहर में किए जाने की परम्परा है, किन्तु फाल्गुन में इसे किसी भी समय गाया-बजाया जा सकता है।

लोक, फिल्म और सुगम संगीत की रचनाओं में शब्दों का महत्त्व अधिक होता है, किन्तु जैसे-जैसे हम शास्त्रीयता की ओर बढ़ते है शब्दों की अपेक्षा स्वरों का महत्त्व बढ़ता जाता है। हमारे संगीत की एक विधा है, तराना, जिसमें शब्दों की अपेक्षा स्वर बेहद महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं। सुप्रसिद्ध गायिका मालिनी राजुरकर ने राग काफी में एक मोहक तराना गाया है। अब हम आपके लिए द्रुत तीनताल में निबद्ध वही काफी का तराना प्रस्तुत कर रहे हैं। लीजिए सुनिए यह तराना और शब्दों के स्थान पर काफी के स्वरों में होली के परिवेश का अनुभव कीजिए-

तराना – राग काफी : स्वर – मालिनी राजुरकर : द्रुत तीनताल


गायन की सभी विधाओं में तराना एक ऐसी विधा है जिसमें स्पष्ट सार्थक शब्द नहीं होते। इसलिए रागानुकूल परिवेश रचने में स्वर महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं। वाद्य संगीत में तो सार्थक या निरर्थक, शब्द होते ही नहीं, किन्तु कुशल वादक ऐसा रागानुकूल परिवेश रच देते हैं कि जहाँ शब्द महत्त्वहीन हो जाते हैं। अब हम आपको सरोद पर राग काफी का वादन सुनवाते हैं। उस्ताद अली अकबर खाँ, भारतीय संगीत के जाने-माने सरोद वादक रहे हैं। उनका बजाया राग काफी का एक अत्यन्त मोहक रिकार्ड है, जिसमें तबला संगति उस्ताद ज़ाकिर हुसेन ने की है। अपनी आज की संगीत-बैठक का समापन हम इसी रिकार्ड के प्रथम भाग के साथ करेंगे। इस वादन में राग काफी के स्वर तो हैं, किन्तु शब्द नहीं हैं। आप सरोद पर राग काफी के स्वरों में होली के परिवेश का अनुभव कीजिए और ‘स्वरगोष्ठी’ के इस अंक को यहीं विराम देने की हमें अनुमति दीजिए।

राग – काफी : सरोद वादक – उस्ताद अली अकबर खाँ : तबला - उस्ताद ज़ाकिर हुसेन


आज की पहेली


अभी हमने आपको ठुमरी अंग में एक फिल्मी गीत का अंश सुनवाया है। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं।

१ – गीत की पंक्तियों को ध्यान से सुनिए और बताइए कि कौन हैं यह गायिका?

२ – किस राग पर आधारित है यह गीत? राग का नाम बताइए।


आप अपने उत्तर हमें तत्काल swargoshthi@gmail.com पर भेजें। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के ६२वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं। हमसे सीधे सम्पर्क के लिए swargoshthi@gmail.com अथवा admin@radioplaybackindia.com पर भी अपना सन्देश भेज सकते हैं।

आपकी बात

‘स्वरगोष्ठी’ के ५८वें अंक में हमने आपको एक भोजपुरी लोकगीत का अंश सुनवाया था और आपसे गायिका का नाम और गीत प्रस्तुत किये जाने का अवसर पूछा था। दोनों प्रश्नों के क्रमशः सही उत्तर है- गायिका शारदा सिन्हा और कन्या पक्ष द्वारा वर को लग्न चढ़ाने हेतु प्रस्थान का अवसर। दोनों प्रश्न का सही उत्तर एकमात्र पटना की अर्चना टण्डन ने दिया है। मीरजापुर के डॉ. पी.के. त्रिपाठी केवल पहले प्रश्न का ही उत्तर दे सके। दोनों पाठकों को रेडियो प्लेबैक इण्डिया की ओर से बधाई।
मध्यप्रदेश की उस्ताद अलाउद्दीन खाँ संगीत कला अकादमी के सेवानिवृत्त निदेशक अरुण पलनीतकर और वाराणसी से अभिषेक मिश्र ने सामान्य पाठकों और श्रोताओं को सरल ढंग से रागों की पहचान कराने के हमारे प्रयास की सराहना की है। झारखण्ड के एक पाठक यू.पी. ओझा ने लोक-कला-गौरव भिखारी ठाकुर के गीतों को सुनवाने का आग्रह किया है। ओझा जी के साथ सभी पाठकों को विश्वास दिलाते हैं कि निकट भविष्य में हम इस विषय पर ‘स्वरगोष्ठी’ का पूरा एक अंक समर्पित करेंगे। इन पाठकों/श्रोताओं के साथ-साथ फेसबुक के सभी मित्रों का हम आभार व्यक्त करते हैं, जिन्होने ‘स्वरगोष्ठी’ को पसन्द किया।

झरोखा अगले अंक का

‘स्वरगोष्ठी’ के इस अंक में हमने संगीत की विविध शैलियों में राग काफी के माध्यम से कुछ फागुनी रंग बिखेरने का प्रयास किया है। अगले अंक में भी हम उमंग और उल्लास के इस परिवेश को जारी रखेंगे। अगले अंक में राग काफी के अलावा अन्य रागों में भी होली की सतरंगी छटा का दर्शन करेंगे। हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।



कृष्णमोहन मिश्र

४ मार्च - आज का गाना


गाना: हाँ दीवाना हूँ मैं


चित्रपट:सारंगा
संगीतकार:सरदार मलिक
गीतकार:भरत व्यास
स्वर: मुकेश






हाँ दीवाना हूँ मैं - 2
गम का मारा हुआ
इक बेगाना हूँ मैं
हाँ दीवाना हूँ मैं

मांगी खुशियाँ मगर गम प्यार मिला में
दर्द ही भर दिया दिल के हर तार में
आज कोई नहीं मेरा संसार में
छोड़ कर चल दिए मुझको मझदार में
हाय तीर - ए - नज़र का निशाना हूँ मैं
हाँ दीवाना हूँ मैं

मैं किसी का नहीं कोई मेरा नहीं
इस जहाँ में कहीं भी बसेरा नहीं
मेरे दिल का कहीं भी अँधेरा नहीं
मेरे इस शाम का है सवेरा नहीं
हाय भुला हुआ एक फ़साना हूँ मैं
हाँ दीवाना हूँ मैं



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