शनिवार, 2 जुलाई 2011

ओल्ड इज़ गोल्ड - शनिवार विशेष - 48 - "मेरे पास मेरा प्रेम है"

पंडित नरेन्द्र शर्मा की सुपुत्री लावण्या शाह से लम्बी बातचीत
पहले पढ़ें ये पुराने एपिसोड्स
भाग ०१
भाग ०२
भाग ०३
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'ओल्ड इज़ गोल्ड' के सभी दोस्तों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार, और स्वागत है आप सभी का इस 'शनिवार विशेषांक' में। इस साप्ताहिक स्तंभ में पिछले तीन सप्ताह से हम सुप्रसिद्ध कवि, साहित्यकार, दार्शनिक व फ़िल्मी व ग़ैर-फ़िल्मी गीतकार पंडित नरेन्द्र शर्मा की सुपुत्री श्रीमती लावण्या शाह से बातचीत कर रहे हैं। पिछली कड़ी में आपनें जाना कि स्वर-साम्राज्ञी लता मंगेशकर के साथ पंडित जी का किस तरह का पिता-पुत्री जैसा सम्बंध था और उनके परिवार के साथ किस तरह लता जी जुड़ी हुई थीं। आइए बातचीत को आगे बढ़ाते हैं। प्रस्तुत है लघु शृंखला 'मेरे पास मेरा प्रेम है' की चौथी व अंतिम कड़ी।

सुजॉय - लावण्या जी, पिछले तीन सप्ताह से हम आपसे बातचीत कर रहे हैं, आज फिर एक बार आपका बहुत बहुत स्वागत है 'हिंद-युग्म आवाज़' के इस मंच पर, नमस्कार!

लावण्या जी - नमस्ते!

सुजॉय - लावण्या जी, एक पिता के रूप में आपनें अपने जीवन के अलग अलग पड़ावों में अपने पिताजी को कैसा कैसा पाया? यानी कि बचपन में, यौवन में, आपने उन्हें कैसा महसूस किया? क्या एक आदर्श पिता के रूप में आप उनका परिचय करवाना चाहेंगी?

लावण्या जी - पापा जी को जब भारत सरकार ने अमरीका भेजा था तब पापा ने सूट पहना था, पर हमेशा भारत मे और घर या बाहर जाते वे बहुत सादा लिबास पहनते धोती - कुर्ता और जाकेट, गर्मियों मे खादी और सर्दीयों मे सिल्क का कुर्ता! बचपन मे, हम हमेशा रात को अगर तबीयत ठीक न हो तो पापा जी को ही उठाया करते थे पापा जी ने मुझे 'सजयति सिंदुर वदनो देवो' ये गणेश पूजा सीखलायी थी जब मैं ३ साल की थी। वे हमे बहुत सुन्दर कहानियां सुनाते, गुजराती कविता भी भावार्थ के साथ सिखलाते। आगे आप इस लिंक में जाकर विस्तृत पढ़ सकते हैं।

http://antarman-antarman.blogspot.com/2007/03/blog-post_16.html

सुजॉय - पंडित जी से सम्बंधित कुछ यादगार घटनाओं के बारे में बताइए। वो घटनाएँ या संस्मरण जो भुलाये नहीं भूलते।

लावण्या जी - ( अ ) हम बच्चे दोपहरी मेँ जब सारे बड़े सो रहे थे, पड़ोस के माणिक दादा के घर से कच्चे पक्के आम तोड कर किलकारियाँ भर रहे थे कि अचानक, पापाजी वहाँ आ पहुँचे, गरज कर कहा, "अरे! यह आम पूछे बिना क्योँ तोड़े? जाओ, जाकर माफी माँगो और फल लौटा दो"। एक तो चोरी करते पकड़े गए और उपर से माफी माँगनी पडी!!! पर अपने और पराये का भेद आज तक भूल नही पाए, यही उनकी शिक्षा थी।
( ब ) मेरी उम्र होगी कोई ८ या ९ साल की। पापाजी ने, कवि शिरोमणि कवि कालिदास की कृति " मेघदूत " से पढ़ने को कहा। संस्कृत कठिन थी परँतु, जहीँ कहीँ , मैँ लड़खड़ाती, वे मेरा उच्चारण शुद्ध कर देते। आज, पूजा करते समय, हर श्लोक के साथ ये पल याद आते हैँ।
( स ) मेरी बिटिया, सिंदूर के जन्म के बाद जब भी रात को उठती, पापा, मेरे पास सहारा देते, मिल जाते, मुझसे कहते, "बेटा, मैँ हूँ , यहाँ"। आज मेरी बिटिया की प्रसूति के बाद, यही वात्सल्य उड़ेलते समय, पापाजी की निश्छल, प्रेम-मय वाणी और स्पर्श का अनुभव हो जाता है। जीवन अतित के गर्भ से उदित होकर, भविष्य को संजोता आगे बढ रहा है।


सुजॉय - वाह, बहुत सुंदर! पंडित जी का 'आकाशवाणी' और 'विविध भारती' में ख़ासा योगदान है। किस तरह से उनके कंधों पर 'विविध भारती' के निर्माण का दायित्व सौंपा गया था, किस तरह से यह कारगर हुआ, इस बारे में कुछ बतायें।

लावण्या जी - ये कुछ लिंक अवश्य देखिएगा...

http://www.lavanyashah.com/2008/10/blog-post_03.html

http://www.lavanyashah.com/2009/04/blog-post_25.html

http://antarman-antarman.blogspot.com/2006/09/prasaargeet-from-aakashvani-


सुजॉय - पंडित जी नें जहाँ एक तरफ़ कविताएँ, साहित्य, और फ़िल्मी गीत लिखे हैं, वहीं दूसरी तरफ़ ग़ैर फ़िल्मी भक्ति रचनाएं, ख़ास कर माता को समर्पित बहुत से गीत लिखे हैं, जिन्हें हमनें पिछले साल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर 'नवरात्रि' में शामिल भी किया था। उनके लेखनी के इस पक्ष के बारे में भी बताइए। क्या वो अंदर से भी उतने ही धार्मिक थे? आध्यात्मिक थे? कैसी शख्सियत थी उनकी?

लावण्या जी - पापा जी दार्शनिक, विचारशील, तरुण व्यक्ति और प्रखर बुद्धिजीवी रहे। धार्मिक तो वे थे ही पर भारतीय वांग्मय, पुराण, वेद, धर्म ग्रन्थ के अध्येता थे। कईयों का अनुभव है और लोग कहते थे 'नरेंद्र शर्मा चलता फिरता विश्व कोष है'। 'राम चरित मानस' को पढ़ते और आंसू बहाते भी देखा है। उनका धर्म , सच्ची मानवता थी। सभी को एक समान आदर दिया करते चाहे वो आनेवाला महाराणा मेवाड़ हो या हमारे घर कपड़े लेने आनेवाला हमारा इस्त्रीवाला हो। हमारी बाई को चिट्ठी बांच कर सुनाते और घंटों existansilism इस गूढ़ विषय पे वे बोलते। बी.बी.सी सुनते और मारग्रेट थेचर को चुनाव लड़ने की शुभ तारीख भी उन्होंने बतलाई थी, हाँ सच! और मैडम जीती थीं! वे पूरी बंबई, पैदल या लोकल ट्रेन से या बस से घूम आते। दूरदर्शन पे संगीत का प्रोग्राम रेकॉर्ड करवा के सहजता से घर पर बतियाते। कभी कोई पर्चा या नोट नहीं रखते। किसी भी विषय पे साधिकार, सुन्दर बोलते। पंडित नेहरू के निधन पर भी 'रनिंग्‍ कमेंट्री' की थी। भारत माता के प्रति अगाध प्रेम व श्रद्धा थी जो उनकी कविताओं मे स्पष्ट है। उन्होँने "कदली वन " काव्य -सँग्रह की "देश मेरे " शीर्षक कविता मे कहा है - "दीर्घ जीवी देश मेरे, तू, विषद वट वृक्ष है"। देखें लिंक :

"नरेन्द्र शर्मा के काव्योँ मेँ राष्ट्रीय चेतना :डा. अमरनाथ दुबे- -- भाग -- १"

पापा जी का धर्म आडम्बरहीन और मानवतावादी था सर्वोदय और ' सर्वे भवन्तु सुखिन ' का उद्घोष लिये था।

सुजॉय - अपने पापाजी के लिखे फ़िल्मी रचनाओं में अगर पाँच गीत हम चुनने के लिए कहें, तो आप कौन कौन से गीतों को चुनेंगी?

लावण्या जी - यूं तो मुझे उनके लिखे सभी गीत बहुत पसंद हैं, पर आपने ५ के लिये कहा है तो मैं इन्हें चुनती हूँ

१ ) ' ज्योति कलश छलके ' -

गायिका लतादीदी , संगीत सुधीर फडके जी , शब्द पं. नरेंद्र शर्मा

२ ) ' सत्यम शिवम् सुंदरम ' -

गायिका लतादीदी , लक्ष्मीकांत प्यारे लाल जी का संगीत , शब्द पापा के

३ ) ' नाच रे मयूरा ' -

विविध भारती का सर्व प्रथम प्रसार - गीत

स्वर श्री मन्ना डे , संगीत अनिल बिस्वास जी और शब्द - पंडित नरेंद्र शर्मा के ये गीत नॉन फिल्म केटेगरी मे आएगा

http://www.lavanyashah.com/2009/04/blog-post_25.html

लिंक : http://antarman-antarman.blogspot.com/2006/09/prasaargeet-from-aakashvani-air.html

४ ) "स्वागतम शुभ स्वागतम" - स्वागत गान एशियाड खेलों के उदघाटन पर संगीत पंडित रवि शंकर जी , शब्द - पापा जी पंडित नरेंद्र शर्मा के

http://www.lavanyashah.com/2009/05/blog-post_22.html

५ ) नैना दीवाने, एक नहीं माने, करे मन मानी माने ना -

गायिका सुरैया जी और संगीत श्री एस डी बर्मन तथा शब्द नरेंद्र शर्मा फिल्म "अफसर" जो देवानन्द जी के " नवकेतन बेनर " की प्रथम पेशकश थी ..लिंक :

http://www.lavanyashah.com/2008/04/blog-post_28.html


सुजॉय - और अब अंतिम सवाल, पंडित नरेन्द्र शर्मा एक ऐसी शख्सियत का नाम है जिनके व्यक्तित्व और उपलब्धियों का मूल्यांकन शब्दों में संभव नहीं। लेकिन फिर भी हम आपसे जानना चाहेंगे कि अगर केवल एक वाक्य में आपको अपने पापाजी के बारे में कुछ कहना हो तो आप किस तरह से उनकी शख़्सीयत का व्याख्यान करेंगी?

लावण्या जी - मैं मानती हूँ कि हर एक इंसान ईश्वर की अप्रतिम कृति है। हम ईश्वर के अंश हैं शायद , ईश्वर को कविता, गीत व संगीत बेहद प्रिय हैं! सबसे अलग, सबसे विशिष्ट हैं हम सभी। जैसे हमारे फिंगर प्रिंट सब से अलग होते हैं। पर पापा जी, पंडित नरेंद्र शर्मा के लिये एक वाक्य मे कहूं तो यही कहूंगी - ' न भूतो न भविष्यति ' ! एक अद्वितीय व्यक्तित्व के धनी, जो आजीवन सर्वथा साधारण और सहज बने रहे शायद यही उनकी तपस्या का फल था और उनकी आत्मा का अंतिम चरण ...अंतिम सोपान ...

सुजॉय - बहुत बहुत धन्यवाद लावण्या जी आपका, 'हिंद-युग्म' की तरफ़ से मैं आपको धन्यवाद देता हूँ, अपनी व्यस्त जीवन से समय निकालकर आपनें हमें समय दिया, और पंडित जी के बारे में न केवल इतनी जानकारी दी, अपने तमाम ब्लॉग्स में उनसे सम्बंधित लेखों के लिंक्स भी दिये, जिन्हें हम समय निकालकर ज़रूर पढ़ेंगे। बहुत बहुत धन्यवाद, नमस्कार!

लावण्या जी - सुजॉय भाई, आपके अनेक इंटरव्यू पढ़ कर खुश हुई हूँ और 'हिन्द-युग्म' हिन्दी भाषा के प्रति समर्पित होकर महत्वपूर्ण कार्य कर रहा है। समग्र सम्पादक मंडल व पूरी टीम को मेरे सस्नेह आशिष। आपको मेरे सच्चे मन से कहे धन्यवाद, बड़ी लम्बी बातचीत हो गयी। आप सब को समय देने के लिये भी शुक्रिया, फिर मिलेंगें, नमस्ते!

गीत - ईश्वर सत्य है, सत्य ही शिव है, शिव ही सुंदर है (सत्यम् शिवम् सुंदरम्)


तो प्रिय श्रोता-पाठकों, ये था सुप्रसिद्ध कवि, साहित्यकार, दार्शनिक व फ़िल्मी व ग़ैर-फ़िल्मी गीतकार पंडित नरेन्द्र शर्मा की सुपुत्री श्रीमती लावण्या शाह से की गई लम्बी बातचीत का चौथा व अंतिम भाग। आशा आपको यह शृंखला पसंद आई होगी। अपने विचार और सुझाव टिप्पणी के अलावा आप oig@hindyugm.com के ईमेल आइडी पर लिख भेज सकते हैं। अब आज बस इतना ही, फिर मुलाक़ात होगी। हाँ दोस्तों, क्या बात है, 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने' को तो आप सब भुला ही बैठे हैं? अपने जीवन की कोई स्मरणीय घटना को हमें आप लिख भेज सकते हैं उसी ईमेल आइडी पर, जिसे हम इसी साप्ताहिक स्तंभ में शामिल करेंगे। इसी उम्मीद के साथ कि आपके ईमेल हमें जल्द ही प्राप्त होंगे, अब मुझे अनुमति दीजिये, कल सुबह सुमित के साथ 'सुर-संगम' में और शाम को कृष्णमोहन जी के साथ 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की नियमित कड़ी में पधारना न भूलियेगा, नमस्कार!

सुनो कहानी: जयशंकर प्रसाद की कला

जयशंकर प्रसाद की कहानी कला

'सुनो कहानी' इस स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने अर्चना चावजी और अनुराग शर्मा की आवाज़ में अनुराग शर्मा की कथा 'बेमेल विवाह' का पॉडकास्ट सुना था। आवाज़ की ओर से आज हम लेकर आये हैं जयशंकर प्रसाद की कहानी "कला", जिसको स्वर दिया है अनुराग शर्मा ने। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं। कहानी का कुल प्रसारण समय है: 9 मिनट 26 सेकंड।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं हमसे संपर्क करें। अधिक जानकारी के लिए कृपया यहाँ देखें।



झुक जाती है मन की डाली, अपनी फलभरता के डर में।
~ जयशंकर प्रसाद (30-1-1889 - 14-1-1937)

हर शनिवार को आवाज़ पर सुनिए एक नयी कहानी

अब मैं घर जाऊंगी, अब मेरी शिक्षा समाप्त हो चुकी।
(जयशंकर प्रसाद की "कला" से एक अंश)


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(प्लेयर पर एक बार क्लिक करें, कंट्रोल सक्रिय करें फ़िर 'प्ले' पर क्लिक करें।)


यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंकों से डाऊनलोड कर लें (ऑडियो फ़ाइल तीन अलग-अलग फ़ॉरमेट में है, अपनी सुविधानुसार कोई एक फ़ॉरमेट चुनें)
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#135th Story, Kala: Jaishankar Prasad/Hindi Audio Book/2011/16. Voice: Anurag Sharma

शुक्रवार, 1 जुलाई 2011

कुछ अनजाने अफ़साने सुना रही है आवाज़ की संगीत टीम अपनी नयी अल्बम "मन जाने" में

Taaza Sur Taal (TST) - 19/2011 - Mann Jaane

दोस्तों, संगीत की विविधताओं से भरे इस देश में ये दुर्भाग्य ही है कि आज कल हमें संगीत के नाम पर केवल फिल्म संगीत ही सुनने को मिल रहा है. और बहुत से कारणों के चलते इसमें भी कोई विविधता नज़र नहीं आ रही है. यहाँ तक कि फिल्म संगीत के सबसे बुरे माने जाने वाले ८० के दशक में भी गैर फ़िल्मी ग़ज़लों की अल्बम्स एक अलग तरह के श्रोताओं की जरूरतें पूरी कर रहीं थी, और उस दौर के युवा श्रोताओं के लिए भी बहुत सी गैर फ़िल्मी अल्बम्स जो रोक्क्, पॉप, डिस्को, आदि जोनर का प्रतिनिधित्व कर रहीं थी, उपलब्ध थी. पर आज के इस दौर में तो लगता है, गैर फ़िल्मी संगीत लगभग गायब हो चुका है क्योंकि सबपर फिल्म संगीत हावी हो चुका है. ढेरों टेलंट की खोजों के नाम पर बहुत से नए कलाकारों को एक मंच तो दिया जा रहा है पर कितने इंडियन आइडल्स को हम आज सुन पा रहे हैं कुछ नया करते हुए. संगीत के इस सूखे दौर में फिल्मों से इतर जो संगीत की कोशिशें हो रही है उनको पर्याप्त प्रोत्साहन मिलना चाहिए, ताकि सचमुच ये तथाकथित नया टेलंट वाकई में कुछ नया करने की गुन्जायिश पैदा कर सके और श्रोताओं को भी कुछ अलग, कुछ नया सुनने को मिल सके.

पिछले दिनों मैंने दो अल्बम्स का जिक्र किया था. आमिर खान प्रोडक्शन की "डेल्ही बेल्ली" जिसमें राम संपंथ ने बहुत ही अनूठा संगीत रचा है, पर विडम्बना देखिये कि अमिताभ भट्टाचार्य जैसे अच्छे गीतकार को भी इसमें "डी के बॉस" जैसे गीत लिखने पड़े (नाम डी के बॉस ही क्यों चुना गया इसे समझने के लिए आपको बहुत अधिक मशक्कत नहीं करनी पड़ेगी). कहने का तात्पर्य ये है फिल्म संगीत में हमेशा ही कलाकारों को बंध कर ही काम करना पड़ता रहा है, इसी बंदिश को तोड़ने का एक प्रयास का जिक्र हमने किया था पिछले हफ्ते निलेश मिश्रा और उनके "बैंड कोल्ल्ड नाईन" की पेशकश "रिवाईंड" का जिक्र करते हुए. आज भी हम एक ऐसी ही अल्बम का जिक्र कर रहे हैं जो फ़िल्मी धारा की लीक को तोड़ने का ही एक प्रयास है. आज कि अल्बम का जिक्र करते हुए हमें इसलिए भी अधिक खुशी हो रही है, कि इसके सभी कलाकार यहीं अपने आवाज़ मंच से जुड़े हुए हैं और इस अल्बम को आवाज़ समर्थित संगीत लेबल "सोनोरे यूनिसन" ने जारी किया है. अल्बम का नाम है "मन जाने", आईये जरा तफ्तीश करें इस अल्बम में शामिल गीतों की.

अल्बम का पहला और शीर्षक गीत "मन जाने", आवाज़ के तीसरे संगीत सत्र का दूसरा गीत था, जिसे आपार लोकप्रियता मिली थी. आवाज़ पर गायिका कुहू का भी ये दूसरा गीत था, इससे पहले वो "काव्यनाद' अल्बम के लिए श्रीनिवास द्वारा स्वरबद्ध महादेवी वर्मा रचित "जो तुम आ जाते एक बार" गा चुकी थी. "मन जाने" में आवाज़ के सबसे पुराने और चर्चित संगीतकार ऋषि एस एकदम नए रूप में दिखे थे. ऋषि की अपनी आवाज़ में कुछ बोल हैं जो इस गीत को एक नया अंदाज़ देते हैं. कुहू की मधुर आवाज़ ने विश्व दीपक के सरल बोलों को बेहद अच्छे से उभारा है खास कर इन शब्दों में –

आगे जाके साँसें उसकी पी लूँ, मन बता
बैठे बैठे मर लूँ या कि जी लूँ, मन बता


"मन जाने" का एक "अनप्लग्ड" संस्करण भी है अल्बम में. जिसमें मुझे लगता है कि यदि ऋषि की आवाज़ वाला हिस्सा हटा दिया जाता तो और शानदार बन सकता था.

"चम्बल का दंगल" बताते हैं विश्व दीपक अगले गीत में इश्क को. "सैयां" एक पंजाबी अंदाज़ का गीत है जिसका नाम पहले "ढोल फॉर पीस" रखा गया था, बाद में जब इसी विरोधाभास को वी डी ने शब्द दिए तो नाम बदल कर "सैयां" रखा गया. कुहू की तरह एक और बहुत ही प्रतिभाशाली गायक हैं श्रीराम ईमनी, जिन्होंने इसे गाया है, खासकर इस गीत में जिस अंदाज़ से "इशक" बोला गया है कमाल है. ढोल का एफ्फेक्ट देकर एक अलग ही कलेवर रचा है ऋषि ने, जो हर बार कुछ नया करने में विश्वास रखते हैं. "सैयां" अपने बोल-संगीत और आवाज़ से आपको झुमा देगा निश्चित ही.

अगला गीत है "सुपारी" जिसकी शुरुआत बेहद शानदार सुनाई पड़ती है, कुहू एक गायिका के रूप में एक बिलकुल अलग रंग में मिलती है यहाँ. इस गीत में भी एक बार फिर वी डी इश्क को परिभाषित करते मिलते हैं. बैक अप आवाज़ देते हुए ऋषि कुछ कमाल सा कर जाते हैं जो गीत में समां सा बांध देते हैं. बोल देखिये –

अब मैं
छिल-छिल मरूँ…
या घट-घट जिऊँ
तिल-तिल मरूँ
या कट-कट जिऊँ

जिद्दी आँखें….
आँके है कम जो इसे,
फाँके बिन तोड़े पिसे,
काहे फिर रोए, रिसे…

वाह....ठेठ देसी शब्दों का इस्तेमाल गीत को और मुखरित करता है, एक और उदाहरण देखिये –

होठों के कोठों पे
जूठे इन खोटों पे
हर लम्हा सजती है
हर लम्हा रजती है…

टुकड़ों की गठरी ये
पलकों की पटरी पे
जब से उतारी है
…… नींदें उड़ीं!!


मैं हमेशा वी डी से कहता हूँ कि ये मुझे उनके लिखे गीतों में सबसे पसंद है, और जाहिर है इस अल्बम में भी ये मेरा सबसे पसंदीदा गीत है. हाँ गीत का नाम "कड़वी सुपारी" अधिक सटीक होता.

उभरते हुए गायक "पियूष कुमार" की आवाज़ में एक बहुत संक्षित गीत है –'दिल की दराजें". मर्ज़ हर ले मेरी.. रख ले मेरी मर्जी….इस गीत में ऋषि की आवाज़ उतनी प्रभावी नहीं हो पायी है. पियूष से यदि बोले गए शब्द कहलाये जाते तो शायद बेहतर परिणाम मिल सकते थे. एलबम का अंतिम गीत है "इलाही" जिसमें श्रीराम का साथ दिया है गायिका श्रीविध्या कस्तूरी ने, यहाँ वी डी ने जिगर मुरादाबादी के शेर को आगे बढाते हुए गीत की रचना की है –

हम कहीं जाने वाले हैं दामन-ए-इश्क़ छोड़कर,
ज़ीस्त तेरे हुज़ूर में, मौत तेरे दयार में.....


आगे वी डी लिखते हैं – "हमने जिगर की बातें सुनी है, मीलों आखें रखके रातें सुनी है....", गुलज़ार साहब याद आ गए न. खैर वी डी के आदर्श हैं गुलज़ार साहब तो कहीं न कहीं उनका प्रभाव आना लाजमी भी है. हालांकि इस शांत प्रार्थना सरीखे सूफी गीत में वी डी कुछ नए तो कुछ बेहद कम इस्तेमाल होने वाले शब्दों से भी खेलते हैं जैसे शाहे-खुबां, कासा-कलगी, सूफ़ी- साकी, हर्फ़े-हस्ती आदि. ऋषि को सूफी में डुबो देने वाली कशिश पैदा करने के लिए शायद अभी थोड़ी और मेहनत करनी पड़ेगी. श्रीविध्या की आवाज़ में ताजगी है वहीँ श्रीराम कुछ छोटी छोटी कमियों के बावजूद गीत को अच्छा निभा पाए हैं. अल्बम के अंत में वी डी का ये शेर आपको अवश्य प्रभावित कर पायेगा –

एक तेरे इश्क़ में डूबकर हमें मौत की कमी न थी,
पर जी गए तुझे देखकर, हमें ज़िंदगी अच्छी लगी।


तो दोस्तों जिंदगी यक़ीनन अच्छी लगेगी अगर आप भी नए नए संगीत का यूहीं आनंद लेते रहें, और जो वाकई अच्छा है उसे न सिर्फ सुनें सराहें बल्कि अपने मित्रों को भी सुझाएँ, सुनाएँ. फिलहाल हम आपको छोड़ते हैं सोनोरे यूनिसन की इस पहली अल्बम "मन जाने" के गीतों के साथ.

आवाज़ रेटिंग - 8.5/10





अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं। "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है। आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रूरत है उन्हें ज़रा खंगालने की। हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं।

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