Thursday, February 17, 2011

धीरे धीरे मचल ए दिले बेकरार कोई आता है....सन्देश दे रही हैं नायिका को पियानो की स्वरलहरियां

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 595/2010/295

पियानो के निरंतर विकास की दास्तान पिछले चार दिनों से आप पढ़ते आये हैं 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की महफ़िल में। यह दास्तान इतनी लम्बी है कि अगर हम इसके हर पहलु पर नज़र डालने जायें तो पूरे पूरे दस अंक इसी में निकल जाएँगे। इसलिए आज से हम पियानो संबंधित कुच अन्य बातें बताएँगे। दोस्तों नमस्कार, 'पियानो साज़ पर फ़िल्मी परवाज़' लघु शृंखला में आप सभी का फिर एक बार बहुत बहुत स्वागत है। आइए आज बात करें पियानो के प्रकारों की। मूलत: पियानो के दो प्रकार हैं - ग्रैण्ड पियानो तथा अप-राइट पियानो। ग्रैण्ड पियानो में फ़्रेम और स्ट्रिंग्स होरिज़ोण्टल होते हैं और स्ट्रिंग्स की-बोर्ड से बाहर की तरफ़ निकलते हुए नज़र आते हैं। ध्वनि जो उत्पन्न होती है, वह कार्य स्ट्रिंग्स के नीचे होता है और मध्याकर्षण की तकनीक से स्ट्रिंग्स अपने रेस्ट पोज़िशन पर वापस आते हैं। उधर दूसरी तरफ़ अप-राइट पियानो, जिन्हें वर्टिकल पियानो भी कहते हैं, आकार में छोटे होते हैं क्योंकि फ़्रेम और स्ट्रिंग्स वर्टिकल होते हैं। हैमर्स होरिज़ोण्टली अपनी जगह से हिलते हैं और स्प्रिंग्स के ज़रिए अपने रेस्ट पोज़िशन पर वापस आते हैं। १९-वीं सदी में पियानो में कई और अन्य प्रकार के पियानो भी बनें, जिनमे टॊय पियानो (toy piano) उल्लेखनीय है। १८६३ में हेनरी फ़ूरनेउ ने 'प्लेयर पियानो' का आविष्कार किया, जो बिना किसी पियानिस्ट के एक पियानो रोल के ज़रिए ख़ुद ब ख़ुद बज सकता है। 'साइलेण्ट पियानो' एक तरह का ऐकोस्टिक पियानो है जिसमें व्यवस्था है स्ट्रिंग्स को साइलेण्ट करने की एक इण्टरपोज़िंग हैमर बार के द्वारा। एडवार्ड राइली ने १८०१ में 'ट्रांसपोज़िंग पियानो' का आविष्कार किया, जिसके की-बोर्ड के नीचे एक लीवर है जो की-बोर्ड को अपनी जगह से हिला सकता है ताकि पियानिस्ट एक परिचित 'की' को प्ले कर उस ध्वनि को उत्पन्न कर सके जो दरअसल किसी और 'की' द्वारा उत्पन्न होती है। एक और प्रकार का पियानो है 'प्रिपेयर्ड पियानो' जिसके अंदर कुछ ऐसे सामान रखे जाते हैं जो उत्पन्न होने वाली ध्वनियों को बदल सके। रबर, कागज़, धातु या फिर वाशर के इस्तमाल से अलग अलग किस्म की ध्वनियाँ उत्पन्न की जा सकती है इस पियानो में। 'ईलेकट्रिक पियानो' में 'Electro-magnetic Pick-up' के माध्यम से स्ट्रिंग्स में उत्पन्न ध्वनियों को ऐम्प्लिफ़ाई किया जा सकता है। हाल ही में 'डिजिटल पियानो' भी आ गये हैं और आजकल तो पियानो में भी कम्प्युटर और सॊफ़्टवेयर तकनीक इस्तमाल की जाने लगी है। सी.डी और MP3 प्लेयर्स भी पियानो में जोड़ा गया है। पियानो डिस्क की मदद से पियानो ख़ुद ब ख़ुद बज सकता है। जिस तरह से औद्योगिकी के हर क्षेत्र में तकनीकी उन्नति हुई है, पियानो का इतिहास भी उतना ही दिलचस्प और उल्लेखनीय रहा है।

और अब बारी आज के गाने की। आज हम क़दम रख रहे हैं ६० के दशक में। इस दशक में बहुत सारे पियानो गीत बनें और हम सोच में पड़ गये कि किस गीत को चुनें और किसे छोड़ दें। कई दिनों तक इस असमंजस में रहने के बाद हमने इस दशक से दो गीत चुनें, जिन्हें अब हम दो अंकों में सुनवाएँगे। आज का गीत प्रस्तुत कर रही हैं लता मंगेशकर, फ़िल्म 'अनुपमा' का गीत, कैफ़ी आज़्मी के बोल, हेमन्त कुमार का संगीत, और गीत के बोल - "धीरे-धीरे मचल ऐ दिल-ए-बेक़रार, कोई आता है"। 'अनुपमा' फ़िल्म के मुख्य किरदार हैं धर्मेन्द्र और शर्मिला टैगोर। अब तक मैं यही समझता रहा कि यह गीत ज़रूर शर्मीला जी पर ही फ़िल्माया गया होगा, लेकिन आज ही इस गीत को य़ु-ट्युब में देखा तो पाया कि दरसल यह तो सुरेखा पर फ़िल्माया हुआ गाना है। इस फ़िल्म का अन्य गीत "कुछ दिल ने कहा, कुछ भी नहीं" शर्मीला जी पर फ़िल्माया गया है, जबकि दो अन्य गीत "भीगी भीगी फ़ज़ां" और "क्यों मुझे इतनी ख़ुशी दे दी" शशिकला जी पर फ़िल्माया गया है। "धीरे धीरे मचल" गीत बड़ा ही दिलचस्प गीत है अगर हम इसके एक अंतरे के बोलों पर जाएँ तो। इस गीत का एक अंतरा कुछ इस तरह का है -

"उसके दामन की ख़ुशबू हवाओं में है,
उसके क़दमों की आहट फ़ज़ाओं में है,
मुझको करने दे करने दे सोलह सिंगार, कोई आता है।"

'अनुपमा' १९६६ की फ़िल्म थी और १९५५ में आयी थी एक फ़िल्म 'मुनिमजी', जिसमें लता जी का ही गाया हुआ एक कमसुना सा गीत था "आँख खुलते ही तुम छुप गये हो कहाँ, तुम अभी थे यहाँ"। इस गीत का एक अंतरा कुछ इस तरह का था -

"अभी सांसों की ख़ुशबू हवाओं में है,
अभी क़दमों की आहट फ़िज़ाओं में है,
अभी शाख़ों में है उंगलियों के निशाँ, तुम अभी थे यहाँ।"

अब इन दोनों गीतों के इन दो अंतरों में कितनी समानता है, है न? क्या कैफ़ी साहब ने शैलेन्द्र जी के लिखे गीत से इन्स्पायर् होकर ही 'अनुपमा' के इस गीत का वह अंतरा लिखा था? ख़ैर, यह तो बस एक ऒबज़र्वेशन थी, हक़ीक़त तो यही है कि ये दोनों गीत ही अपनी अपनी जगह लाजवाब हैं। तो आइए पियानो पर रचा फ़िल्म 'अनुपमा' का यह सदाबहार गीत सुनते हैं।



क्या आप जानते हैं...
कि अमेरीकी राष्ट्रपति अब्राहम लिंकॊन व्हाइट हाउस में "चिकरिंग् ग्रैण्ड पियानो" का इसतमाल करते थे।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 06/शृंखला 10
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - बेहद आसान.

सवाल १ - किस अभिनेता पर है ये गीत फिल्माया - २ अंक
सवाल २ - गीतकार बताएं - ३ अंक
सवाल ३ - संगीतकार कौन हैं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
शृंखला का आधा पड़ाव आ चुका है और अमित जी २ अंकों से आगे हैं अंजना जी से, कल हमारे अंजाना जी जाने कैसे चुका गए, खैर विजय जी भी जमे हैं हिन्दुस्तानी जी और शरद जी से साथ मैदान में...

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
विशेष सहयोग: सुमित चक्रवर्ती


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Wednesday, February 16, 2011

जाने वो कैसे लोग थे जिनके प्यार को प्यार मिला....पूरी तरह पियानो पर रचा बुना एक अमर गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 594/2010/294

'पियानो साज़ पर फ़िल्मी परवाज़', इन दिनों 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर जारी है यह शृंखला, जिसमें हम आपको पियानो के बारे में जानकारी भी दे रहे हैं, और साथ ही साथ फ़िल्मों से चुने हुए कुछ ऐसे गानें भी सुनवा रहे हैं जिनमें मुख्य साज़ के तौर पर पियानो का इस्तमाल हुआ है। पिछली तीन कड़ियों में हमने पियानो के इतिहास और उसके विकास से संबम्धित कई बातें जानी, आइए आगे पियानो की कहानी को आगे बढ़ाया जाए। साल १८२० के आते आते पियानो पर शोध कार्य का केन्द्र पैरिस बन गया जहाँ पर प्लेयेल कंपनी उस किस्म के पियानो निर्मित करने लगी जिनका इस्तमाल फ़्रेडरिक चौपिन करते थे; और ईरार्ड कंपनी ने बनाये वो पियानो जो इस्तमाल करते थे फ़्रांज़ लिस्ज़्ट। १८२१ में सेबास्टियन ईरार्ड ने आविष्कार किया 'डबल एस्केपमेण्ट ऐक्शन' पद्धति का, जिसमें एक रिपिटेशन लीवर, जिसे बैलेन्सर भी कहा जाता है, का इस्तमाल हुआ जो किसी नोट को तब भी रिपीट कर सकता था जब कि वह 'की' अपने सर्वोच्च स्थान तक अभी वापस पहुंचा नहीं था। इससे फ़ायदा यह हुआ कि किसी नोट को बार बार और तुरंत रिपीट करना संभव हो गया, और इस साज़ के इजाद का श्रेय लिस्ज़्ट को दिया गया। जब यह आविष्कार बाहर निकला, हेनरी हर्ट्ज़ ने इसे रिवाइज़ किया, और यह 'डबल एस्केपमेण्ट ऐक्शन' सभी ग्रैण्ड पियानो का हिस्सा बन गया और अब तक यह पद्धति चली आ रही है।

कल की कड़ी में हमने ५० के दशक शुरुआती साल का एक गीत सुना था, आइए आज इसी दशक में थोड़ा और आगे बढ़ें और सुनें साल '५७ में निर्मित गुरु दत्त की यादगार फ़िल्म 'प्यासा' से हेमन्त कुमार का गाया "जाने वो कैसे लोग थे जिनके प्यार को प्यार मिला, हमने तो जब कलियाँ माँगी काँटों का हार मिला"। साहिर लुधियानवी के बोल और सचिन देव बर्मन का सगीत। और सब से जो ख़ास बात इस गीत की, वह यह कि पूरे गीत को पियानो पर खड़ा किया गया है। अब तक हमनें जितने भी गानें पियानो के बजाये, उन सभी में अभिनेता या अभिनेत्री को किसी पार्टी में पियानो बजाते हुए और गीत गाते हुए देखा गया। लेकिन प्रस्तुत गीत की ख़ासीयत यह है कि गुरु दत्त साहब भले ही एक पार्टी में इस गीत को गा रहे हैं, लेकिन कोई पियानो बजाता हुआ नज़र नहीं आता। दर्द भरे गीतों की बात करें तो यह गीत बेहद उल्लेखनीय हो जाता है। साहिर साहब के शब्द जैसे नुकीले तलवार की तरह दिल पर चोट करते हैं, और क्यों ना करे, वो अपने निजी जीवन में भी तो व्यर्थ प्रेम के दर्द से गुज़रे थे। और ना ही पिता का प्यार उन्हें मिल सका था। हेमन्त दा की गम्भीर वज़नदार आवाज़ ने गीत को ऐसा पुर-असर बनाया कि आज ६ दशक बाद भी इस गीत को सुन कर दिल कांप उठता है। गीत को सुनकर एक पल में आभास होता है कि इसका संगीत भी हेमन्त दा का है, लेकिन दूसरे ही क्षण याद आता है कि 'प्यासा' का संगीत तो दादा बर्मन ने रचा था। तो आइए इस अनमोल नग़मे को सुना जाये, फ़िल्म के पर्दे पर गुरु दत्त गा रहे हैं माला सिंहा और रहमान द्वारा आयोजित एक पार्टी में।



क्या आप जानते हैं...
कि अमरीका में पहला पियानो सन् १७७५ में जोहान बेहरेण्ट ने बनाया था 'पियानो फ़ोर्त' के नाम से।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 05/शृंखला 10
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - बेहद आसान.

सवाल १ - किस अभिनेत्री पर है ये गीत फिल्माया - 3 अंक
सवाल २ - गीतकार बताएं - १ अंक
सवाल ३ - संगीतकार कौन हैं - 2 अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
अंजना जी बधाई....३ अंक आपके....अमित जी और शरद जी को भी बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
विशेष सहयोग: सुमित चक्रवर्ती


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Tuesday, February 15, 2011

ऐ जान-ए-जिगर दिल में समाने आजा....पियानों के तार खनके और मुकेश की आवाज़ में गूंजा अनिल दा नग्मा

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 593/2010/293

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों नमस्कार और स्वागत है आप सभी का इन दिनों चल रही लघु शृंखला 'पियानो साज़ पर फ़िल्मी परवाज़' में। साल १७९० से लेकर १८६० के बीच मोज़ार्ट के दौर के पियानों में बहुत सारे बदलाव आये, पियानो का निरंतर विकास होता गया, और १८६० के आसपास जाकर पियानो ने अपना वह रूप ले लिया जो रूप आज के पियानो का है। पियानो के इस विकास को एक क्रांति की तरह माना जा सकता है, और इस क्रांति के पीछे कारण था कम्पोज़र्स और पियानिस्ट्स के बेहतर से बेहतर पियानो की माँग और उस वक़्त चल रही औद्योगिक क्रांति (industrial revolution), जिसकी वजह से उत्तम क्वालिटी के स्टील विकसित हो रहे थे और उससे पियानो वायर का निर्माण संभव हुआ जिसका इस्तमाल स्ट्रिंग्स में हुआ। लोहे के फ़्रेम्स भी बनें प्रेसिशन कास्टिंग् पद्धति से। कुल मिलाकर पियानो के टोनल रेंज में बढ़ौत्री हुई। और यह बढ़ौत्री थी मोज़ार्ट के 'फ़ाइव ऒक्टेव्स' से ७-१/४ या उससे भी ज़्यादा ऒक्टेव्स तक की, जो आज के पियानो में पायी जाती है। पियानो की शुरुआती विकास में एक और उल्लेखनीय नाम है ब्रॊडवूड कंपनी का; जॊन ब्रॊडवूड ने रॊबर्ट स्टोडर्ट और अमेरिकास बेकर्स के साथ मिलकर हार्प्सिकॊर्ड केस का इस्तमाल कर एक नये पियानो का निर्माण किया, और इसी से शुरुआत हुई 'ग्रैण्ड पियानो' की। यह सन् १७७७ की बात थी। इस टीम को जल्द ही ख्याति मिल गई क्योंकि इनके द्वारा निर्मित पियानो की ध्वनियाँ शक्तिशाली थीं, शार्प थीं। इन्होंने अपने पियानो जोसेफ़ हेडन और बीथोवेन को भेजे, और इनके पियानो में पहली बार पाँच से ज़्यादा ऒक्टेव्स की रेंज मौजूद थी। १७९० में पाँच ऒक्टेव, १८१० में छे ऒक्टेव और १८२० में सात ऒक्टेव वाले पियानो का निर्माण संभव हुआ। वियेनीज़ निर्माणकर्ताओं ने भी इस शैली को इख़्तियार कर पियानो निर्माण किया, लेकिन इन दोनों स्कूलों के पियानो में एक मूल फ़र्क था - ब्रॊडवूड पियानो ज़्यादा शक्तिशाली (robust) थे, जबकि वियेनीज़ पियानो ज़्यादा सेन्सिटिव हुआ करते थे। इस तरह से दोनों ही अपनी अपनी जगह कीमती सिद्ध हुए।

३० के दशक से सरस्वती देवी और ४० के दशक से आर. सी. बोराल के बाद आज 'पियानो साज़ पर फ़िल्मी परवाज़' शृंखला के लिए हमने चुना है ५० के दशक से संगीतकार अनिल बिस्वास की एक नायाब रचना। कल हमने आर. सी. बोराल साहब को 'फ़ादर ऒफ़ फ़िल्म म्युज़िक' कहकर संबोधित किया था। दरअसल ऐसा अनिल दा ने ही कहा था, और ख़ुद को उन्होंने 'अंकल ऒफ़ फ़िल्म म्युज़िक' कहा। तो दोस्तों, फ़ादर के बाद आज बारी अंकल की। अनिल के संगीत में हमने चुना है १९५१ की फ़िल्म 'आराम' का एक बेहद लोकप्रिय गीत मुकेश की आवाज़ में, "ऐ जान-ए-जिगर दिल में समाने आजा"। ४० के दशक के आख़िर तक फ़िल्म संगीत में पियानो का इस्तमाल बेहद लोकप्रिय हो चुका था और यह परम्परा ९० के दशक तक जारी रहा। हिंदी फ़िल्मों में पियानो पर रचे गीतों में अधिकतर गीत पार्टी गीत हुआ करते थे। अगर ख़ुशी की बात हुई तब तो कोई बात नहीं, लेकिन अक्सर ग़म में डूबा नायक भी पियानो पर कोई ग़मगीन नग़मा छेड़ देता है जिसका अर्थ केवल उसकी नायिका ही समझ सकती है और कोई नहीं। आज के प्रस्तुत गीत के फ़िल्मांकन में प्रेम नाथ साहब पियानो पर बैठे गाते हुए नज़र आते हैं। राजेन्द्र कृष्ण ने इस गीत को लिखा है। दोस्तों, अभी हाल ही में आपने संगीतकार तुषार भाटिया का साक्षात्कार पढ़ा होगा 'आवाज़' पर जो केन्द्रित था अनिल दा पर। बरसों पहले अनिल दा ने तुषार जी को एक एल.पी रेकॊर्ड उपहार में दिया था और उसके कवर पर बांगला में कुछ लिखा था, जो तुषार जी पढ़ नहीं पाये थे। अभी हाल में उनके इसी इंटरव्यु के दौरान उन्होंने वह कवर मुझे दिखाया और मुझसे उसका तर्जुमा करने को कहा। जब मैंने उन्हें बताया कि अनिल दा ने लिखा है, "तुषार को सस्नेह आशिर्वाद के साथ, अनिल दा", तो तुषार जी ने मुझे जवाब में कहा, "Dear Sujoy, You have made my day, missing dada more than ever before". और मैंने उनको जवाब दिया कि "what a privilege you have given me Tushar ji to translate something Anil da has written for you; cant ask for more!"। सच ही तो है दोस्तों, इतने सालों तक अनिल दा का लिखा वह जुम्ला अनपढ़ा रह गया और मुझे यह सौभाग्य नसीब हुआ कि उसे पढ़कर तुषार जी को बताऊँ कि अनिल दा ने उनको क्या लिखा था। तो आइए अनिल दा को समर्पित आज का यह पियानो गीत सुनते हैं मुकेश की आवाज़ में। और हाँ सब से उल्लेखनीय बात कहना तो मैं भूल ही गया; वह यह कि इस गीत में जो पियानो बजा है उसे बजाया था सनी कास्तेलीनो ने, जिनके लिए अनिल दा के दिल में बहुत सम्मान था।



क्या आप जानते हैं...
कि किसी भी पियानो को निर्माण के बाद पहले साल में चार बार ट्युन करना पड़ता है चार बार ऋतुओं के बदलाव के समय, और फिर दूसरे साल से दो बार प्रति वर्ष।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 04/शृंखला 10
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - बेहद आसान.

सवाल १ - किस अभिनेता पर है ये गीत फिल्माया - 3 अंक
सवाल २ - गीतकार बताएं - १ अंक
सवाल ३ - संगीतकार कौन हैं - 2 अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
तीनों महारथियों के स्कोर बराबर हैं....बढ़िया है मुकाबला...हिन्दुस्तानी जी भी हैं २ अंकों पर

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
विशेष सहयोग: सुमित चक्रवर्ती


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

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