रविवार, 23 जनवरी 2011

ए मेरे दिले नादाँ तू गम से न घबराना....एक एक बढ़कर एक गीत हुए हैं इन सस्पेंस थ्रिल्लर फिल्मों में

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 576/2010/276

मस्कार! 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की इस नई सप्ताह में आप सभी का फिर एक बार हम हार्दिक स्वागत करते हैं। इन दिनों 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर जारी है लघु शृंखला 'मानो या ना मानो', जिसमें हम चर्चा कर रहे हैं अजीब-ओ-ग़रीब घटनाओं की जिनका ताल्लुख़ आत्मा, भूत-प्रेत और पुनर्जनम से है। हालाँकि विज्ञान कुछ और ही कहता है, लेकिन कभी कभी कुछ ऐसी घटनाएँ हो जाती हैं जिसकी व्याख्या विज्ञान भी नहीं कर पाता। पिछली दो कड़ियों में ऐसे ही कुछ पुनर्जनम के किस्से हमने पढ़े। आइए आज वापस लौटते हैं 'हौण्टिंग् हाउसेस' पर। हमने आपसे वादा किया था कि एक कड़ी हम ऐसी रखेंगे जिसमें हम आपको इंगलैण्ड के कुछ भौतिक जगहों के बारे में बताएँगे, क्योंकि पूरे विश्व के अंदर इंगलैण्ड में भूत-प्रेत की कहानियाँ सब से ज़्यादा मात्रा में पायी जाती है। द्वितीय विश्वयुद्ध में बहुत से वायुसैनिक मारे गये थे। कहा जाता है कि कई एयरफ़ील्ड्स में आज भी अजीब-ओ-गरीब चीज़ें महसूस की जा सकती हैं। इन एयरफ़ील्ड्स में शामिल हैं RAF Bircham Newton Norfolk, RAF East Kirkby Lincolnshire, और RAF East Elsham Wolds North Lincolnshire। इंगलैण्ड कैसेल्स (castles) के लिए प्रसिद्ध है, और बहुत से पुराने कैसेल्स ऐसे हैं जिन्हें आत्माओं के निवास-स्थान होने का गौरव प्राप्त है। ससेक्स का अरुण्डेल कैसेल एक विख्यात कैसेल है जिसमें एक नहीं बल्कि चार चार आत्माओं के मौजूदगी मानी जाती है। इनमें पहला नाम है इस कैसेल के निर्माता का (the spirit of the first Earl of Arundel); दूसरे नंबर पे है उस औरत की आत्मा जिसने प्यार में असफल होने के बाद इस कैसेल की एक टावर से कूद कर अपनी जान दे दी थी। कुछ लोग कहते हैं कि आज भी चांदनी रातों में सफ़ेद लिबास में उस औरत को कैसेल के इर्द-गिर्द घूमते हुए देखा जा सकता है। तीसरी आत्मा है उस 'Blue Man' का जिसे इस कैसेल की लाइब्रेरी में १६३० से लेकर अब तक घूमते हुए देखा जाता है। अनुमान लगाया जाता है इसका ताल्लुख़ King Charles-I के ज़माने से है। और चौथे नंबर पे है उल्लू की तरह दिखने वाला एक पक्षी की आत्मा; ऐसी मान्यता है कि अगर इस पक्षी को इस कैसेल की खिड़की पर पंख फड़फड़ाते हुए देखा जाये तो कैसेल के किसी सदस्य की मौत निश्चित है। आगे बढते हैं और पहुँचते हैं लेइसेस्टर के बेल्ग्रेव हॊल में जो सुर्ख़ियों में आ गया था १९९९ में जब वहाँ के CCTV के कैमरे में एक सफ़ेद आकृति कैद हुई थी। कुछ लोगों ने कहा कि यह इस स्थान के पूर्व-मालिक के बेटी की आत्मा है। लंदन की बात करें तो 50 Berkeley Square यहाँ का सब से विख्यात हौण्टेड हाउस है। एसेक्स के बोर्ले नामक गाँव के बोर्ले रेक्टरी में १८८५ से लेकर बहुत से भौतिक नज़ारे लोगों ने देखे हैं। १९३९ में इस घर को आग लग गई और आज तक यह एक वितर्कित जगह है। ब्रिस्लिंगटन, जो किसी समय ब्रिस्टोल के नज़दीक एक आकर्षक समरसेट विलेज हुआ करता था, आज जाना जाता है भूत-प्रेतों के उपद्रवों की वजह से। पब, होटल और घरों में आये दिन अजीब-ओ-गरीब घटनाओं के घटने के किस्से सुने जाते हैं। उत्तरी लंदन के टोटेन्हैम के ब्रुस कैसेल में एक औरत की आत्मा रहती है जो हर साल ३ नवंबर के दिन दिखाई देती है। कहा जाता है कि यह लेडी कोलरैन की आत्मा है जिसे उस कैसेल के एक चेम्बर में उसके पति ने क़ैद कर रखा था और वहीं उसकी मौत हो गयी थी। इस तरह से हौण्टेड कैसेल्स की फ़ेहरिस्त बहुत बहुत लम्बी है और अगर उन सब का ज़िक्र करने बैठे तो शायद एक किताब लिखनी पड़ जाये।

आज के अंक के लिए हमने जिस सस्पेन्स थ्रिलर फ़िल्म को चुना है, वह है 'टावर हाउस'। १९६२ में बनी इस फ़िल्म में संगीत दिया था रवि ने और गीत लिखे थे असद भोपाली ने। निसार अहमद अंसारी निर्देशित इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे अजीत और शकीला। फ़िल्म की कहानी एक पुरानी परित्यक्त टावर हाउस के इर्द-गिर्द घूमती है, जहाँ पर निश्चित रातों में एक औरत गीत गाती हुई घूमती दिखाई देती है और उन्ही रातों में कोई ना कोई उस टावर पर से कूद कर आत्महत्या कर लेता है। पुलिस जाँचपड़ताल करती है लेकिन उन्हें कुछ नहीं सूझता और यह रहस्य एक रहस्य ही बना रहता है। और रहस्य यह भी है कि वह औरत सेठ दुर्गादास की स्वर्गीय पत्नी है। पुलिस दुर्गादास को पूछताछ करते हैं लेकिन किसी निश्कर्ष तक नहीं पहूँच पाते। ऐसे में एक बार रणजीत (एन. ए. अंसारी) सबीता (शकीला) को शेर के पंजों से बचाता है। सबिता सेठ दुर्गादास की ही बेटी है। शेर से बचाते हुए रणजीत ख़ुद बुरी तरह ज़ख्मी हो जाता है और उसके चेहरे पर हमेशा के लिए गंदे निशान बैठ जाते हैं। सहानुभूतिपूर्वक दुर्गादास रणजीत को अपनी कंपनी में मैनेजर रख लेते हैं, लेकिन जल्द ही रणजीत लालच का शिकार होने लगता है और वह अपने असली रंग दिखाने पर उतर आता है, जिसका अंजाम होता है दुर्गादास की मौत। मुख्य आरोपी के रूप में सुरेश कुमार (अजीत) निश्चित होता है जो सबीता का प्रेमी था। सबीता भी सुरेश को ख़ूनी समझ बैठती है और उसे ठुकरा देती है। सुरेश भी उन सब की ज़िंदगी से दूर चला जाता है, जिसकी पुलिस को तलाश है। रणजीत अब कोशिश करता है कि किसी तरह से सबीता को पागल बना दिया जाये ताकि पूरे जायदाद का वो अकेला मालिक बन सके। एक तरफ़ टावर हाउस में घूमती वो लड़की और दूसरी तरफ़ दुर्गादास की मर्डर मिस्ट्री; क्या कोई समानता है इन दोनों में? यही थी 'टावर हाउस' की कहानी। और दोस्तों, उपर जो हमने लिखा है कि उस टावर हाउस में जो लड़की गीत गाती हुई घूमती है, तो आपको बता दें कि वह गीत कौन सा था। जी हाँ, आज का प्रस्तुत गीत, लता जी की हौण्टिग् वॊयस में, "ऐ मेरे दिल-ए-नादाँ, तू ग़म से ना घबराना, एक दिन तो समझ लेगी दुनिया तेरा अफ़साना..."। एक और रूहानी गीत, एक और सस्पेन्स थ्रिलर, आइए सुनते हैं।



क्या आप जानते हैं...
कि असद भोपाली ने पहली बार फ़ज़ली ब्रदर्स की फ़िल्म 'दुनिया' में गीत लिखने के लिए भोपाल से बम्बई आये थे।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 07/शृंखला 08
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - एक और शानदार सस्पेंस थ्रिल्लर.

सवाल १ - गीतकार बताएं - 2 अंक
सवाल २ - फिल्म के निर्देशक बताएं - 1 अंक
सवाल ३ - फिल्म की प्रमुख अभिनेत्री का नाम बताएं - 1 अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
अमित जी आपको बेनिफिट ऑफ डाउट देते हुए २ अंक देते हैं. शरद जी और विजय दुआ जी भी सही जवाब लाये हैं...शृंखला आधी बीत चुकी है, एक बार फिर अमित जी ५ अंकों की बढ़त ले कर चल रहे हैं....क्या शरद जी उन्हें मात दे पायेंगें....पिछली शृंखला में हमें देखा था अमित जी ने कैसे दूसरी पारी में शरद जी को पराजित कर दिया था....क्या इतिहास खुद को दोहराएगा.....लगता है कुछ कुछ न्यूस चैनल वालों जसी बातें कर रहा हूँ मैं :) चलिए देखते हैं. एक बात और अच्छा लगा कि आप सब ने अंसारी साहब के बारे में इतनी बातें शेयर की. ऐसे ही करते रहिएगा.

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

सुर संगम में आज - पंडित बृज नारायण का सरोद वादन - राग श्री

सुर संगम - 04

राग श्री, एक प्राचीन उत्तर भारतीय राग है पूर्वी ठाट का। इसे भगवान शिव से जोड़ा जाता है। यह राग सिख धर्म में गाया जाता है गुरु ग्रंथ साहिब के तहत। गुरु ग्रंथ साहिब में कुल ३१ राग हैं और उसमें राग श्री सब से पहले आता है। गुरु ग्रंथ साहिब के १४ से लेकर ९४ पृष्ठों में जो कम्पोज़िशन है, वो इसी राग में है।


सुप्रभात! सुर-संगम स्तंभ के सभी पाठकों व श्रोताओं का स्वागत है आज के इस अंक में। आज इसमें हम चर्चा करेंगे सुप्रसिद्ध सरोद वादक पंडित बृज नारायण की, जिनका बजाया हुआ राग श्री आपको सुनवाएँगे। साथ ही एक ऐसी फ़िल्मी रचना भी सुनवाएँगे जिसमें पंडित जी ने सरोद बजाया है और उस गीत में सरोद का बड़ा ही प्रॊमिनेण्ट प्रयोग हुआ है। बृज नारायण सुप्रसिद्ध सारंगी वादक पंडित राम नारायण के बड़े बेटे हैं। उनका जन्म २५ अप्रैल १९५२ को राजस्थान के उदयपुर में हुआ था। वैसे तो पिता के ज़रिये वो सारंगी भी बजा लेते थे, लेकिन धीरे धीरे उनकी रुचि सरोद में हो गई। बहुत ही कम उम्र से सीखने की वजह से उन्होंने इस विधा में महारथ हासिल की और एक नामचीन सरोद वादक के रूप में जाने गये। बृज नारायण कुछ समय तक अपने चाचा चतुर लाल, जो एक प्रसिद्ध तबला नवाज़ थे, से संगीत सीखा, और फिर सरोद नवाज़ उस्ताद अली अकबर ख़ान साहब से भी उन्हें दिल्ली में सीखने का मौका मिला। लेकिन १९६५ में चतुर लाल के निधन हो जाने की वजह से वो अपने पिता के पास वापस चले गये और उनसे सीखने लगे। इसके दो साल बाद, यानी १९६७ में ही बृज नारायण ने राष्ट्रपति द्वारा पदत्त स्वर्णपदक अपने नाम कर लिया आकाशवाणी के सर्वश्रेषठ वादक प्रतियोगिता के ज़रिये। ६० के दशक के ही आख़िर में वो एक फ़िल्म के विषय भी बने, १९६९ में अपने पिता के साथ अफ़ग़ानिस्तान में एक सांस्कृतिक सम्मेलन में हिस्सा लेने गये, और भारत संगीत सभा के स्कॊलर भी बनें। १९७२ में नारायण बम्बई विश्वविद्यालय से स्नातक की डिग्री प्राप्त की। इसी साल म्युनिक ऒलीम्पिक्स में उन्होंने अपना वादन प्रस्तुत किया। ७० और ८० के दशकों में उन्होंने अफ़्रीका, यूरोप और अमेरिका के बहुत सारे टूर किए और उनके कई ऐल्बम्स भी रेकॊर्ड हुए। तबला नवाज़ उस्ताद ज़ाकिर हुसैन के साथ भी उनका एक ऐल्बम बना है।

और अब थोड़ी बातें आज के राग की। जैसा कि हमने बताया आज हम पंडित बृज नारायण से सुनेंगे राग श्री, यह राग एक प्राचीन उत्तर भारतीय राग है पूर्वी ठाट का। इसे भगवान शिव से जोड़ा जाता है। यह राग सिख धर्म में गाया जाता है गुरु ग्रंथ साहिब के तहत। गुरु ग्रंथ साहिब में कुल ३१ राग हैं और उसमें राग श्री सब से पहले आता है। गुरु ग्रंथ साहिब के १४ से लेकर ९४ पृष्ठों में जो कम्पोज़िशन है, वो इसी राग में है। राग श्री को मुख्यत: धार्मिक अनुष्ठानों के लिए इस्तेमाल में लाया जाता है और संगीत के प्राचीन लेखों में इस राग का उल्लेख हमें मिलता है। श्री एक दुर्लभ राग है और रोज़ मर्रा की ज़िंदगी में इस राग का ज़िक्र सुनने को नहीं मिलता। लेकिन उत्तरी भारत के शास्त्रीय संगीत का यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण राग है। पारम्परिक तौर पर इस राग को सूर्यास्त के समय गाया जाना चाहिए। राग श्री का मूड तेजस्वी अंदाज़ और प्रार्थना का मिश्रण है। गुरु नानक, गुरु अमर दास, गुरु राम दास और गुरु अर्जन ने इसी राग को आधार बनाकर कई शबद कम्पोज़ किये हैं। लगभग १४२ शबद इस राग पर गाये जाते हैं। यह अफ़सोस की ही बात है कि हमारे फ़िल्मी संगीतकारों ने इस राग पर गानें कम्पोज़ नहीं किए। तो लीजिए प्रस्तुत है सरोद पर पंडित बृज नारायण का बजाया राग श्री।

सरोद वादन - राग श्री - पंडित बृज नारायण


पंडित बृज नारायण ने १९७८ की फ़िल्म 'मैं तुलसी तेरे आंगन की' में सरोद बजाया था और १९८८ की फ़िल्म 'दि बेंगॊली नाइट' में संगीत भी दिया था जिसका निर्माण किया था निकोलास क्लोट्ज़ ने और जिसमें मुख्य भूमिका ह्यु ग्राण्ट ने निभाया था। फ़िल्म 'मैं तुलसी तेरे आंगन की' का जो शीर्षक गीत है लता जी की आवाज़ में, उसकी शुरुआत ही बृज नारायण के बजाये सरोद से होती है और इंटरल्युड्स में भी सरोद के ख़ूबसूरत पीसेस सुनने को मिलते हैं। आज जब हम बृज जी पर सुर संगम का यह अंक प्रस्तुत कर रहे हैं, ऐसे में इस गीत को सुनवाये बग़ैर अगर हम यह अंक समाप्त कर देंगे तो शायद यह अधूरा ही रह जायेगा। इस गीत को सुनवाने से पहले आपको बता दें कि इस फ़िल्म में संगीत है लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल का और गीतकार हैं आनंद बक्शी। जब यह फ़िल्म बन रही थी तो इसका शीर्षक 'मैं तुलसी तेरे आंगन की' फ़ाइनल हो चुका था, और संगीतकार जोड़ी एल.पी एक बहुत प्यारे धुन पर इस शीर्षक को बिठा भी चुके थे। लेकिन "मैं तुलसी तेरे आंगन की', इस शीर्षक के लिए दूसरी पंक्ति नहीं मिल रही थी। इस समस्या के निदान के लिए फ़िल्म के निर्देशक राज खोसला और एल.पी पहुँच गये आनंद बक्शी साहब के पास और उन्हें अपनी समस्या बतायी। पहली पंक्ति सुनते ही बक्शी साहब ने झट से दूसरी पंक्ति कह दी "कोई नहीं मैं तेरे साजन की"; और खोसला तथा एल.पी, चमत्कृत हो गये। तो आइए इस ख़ूबसूरत गीत को सुनते हैं, जिसमें सरोद के साथ साथ आपको शहनाई और सितार के भी सुरीली तानें सुनने को मिलेंगी। फ़िल्म में यह गीत अलग अलग भागों में आता है। तो आइए सुनते हैं राग पहाड़ी पर आधारित इस गीत को।

गीत - मैं तुलसी तेरे आंगन की


तो ये था आज का सुर-संगम जिसमें हमने आपको सरोद नवाज़ पंडित बृज नारायण का बजाया राग श्री सुनवाया, और साथ ही फ़िल्म 'मैं तुलसी तेरे आंगन की' का शीर्षक गीत भी सुनवाया जिसमें पंडित जी ने सरोद बजाया था। अगले सप्ताह फिर किसी नामचीन शास्त्रीय कलाकार के साथ हम उपस्थित होंगे, अब आज्ञा दीजिए, और शाम को ठीक ६:३० बजे वापस आइएगा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की महफ़िल में। नमस्कार!

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



आवाज़ की कोशिश है कि हम इस माध्यम से न सिर्फ नए कलाकारों को एक विश्वव्यापी मंच प्रदान करें बल्कि संगीत की हर विधा पर जानकारियों को समेटें और सहेजें ताकि आज की पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी हमारे संगीत धरोहरों के बारे में अधिक जान पायें. "ओल्ड इस गोल्ड" के जरिये फिल्म संगीत और "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" के माध्यम से गैर फ़िल्मी संगीत की दुनिया से जानकारियाँ बटोरने के बाद अब शास्त्रीय संगीत के कुछ सूक्ष्म पक्षों को एक तार में पिरोने की एक कोशिश है शृंखला "सुर संगम". होस्ट हैं एक बार फिर आपके प्रिय सुजॉय जी.

शनिवार, 22 जनवरी 2011

ई मेल के बहाने यादों के खजाने (२६)- प्रदीप चटर्जी नाम से कोई गीतकार नहीं -हरमंदिर सिंह 'हमराज़'

नमस्कार! 'ओल्ड इज़ गोल्ड शनिवार विशेष' में एक बार फिर आप सभी का हम स्वागत करते हैं। इस साप्ताहिक स्तंभ में हम साधारणतः 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने' पेश किया करते हैं। कई बार यादों के ख़ज़ानें तो नहीं शामिल हो पाते, लेकिन जो भी पेश होता है वो ईमेल के बहाने से ही होता है। हर बार की तरह इस बार भी हम आप सभी से गुज़ारिश करते हैं कि इस शीर्षक को सार्थक करने के लिए आप अपने जीवन से जुड़ी किसी यादगार घटना या संस्मरण हमारे साथ बांटिये जिसे हम इस मंच के माध्यम से पूरी दुनिया के साथ बांट सके। ईमेल भेजने के लिए हमारा आइ.डी है oig@hindyugm.com।

दोस्तों, इसमें कोई शक़ नहीं कि इंटरनेट ने तथ्य तकनीकी और दूरसंचार के क्षेत्र में क्रांति ला दी है, और ऐसी क्रांति आई है, ऐसा बदलाव लाया है कि अब इंटरनेट के बिना सब काम काज जैसे ठप्प सा हो जाता है। लेकिन जिस तरह से हर अच्छे चीज़ के साथ कुछ बुरी चीज़ें भी समा जाती हैं, ऐसा ही कुछ इंटरनेट के साथ भी है। जी नहीं, हम अश्लील वेबसाइटों की बात नहीं कर रहे; हम तो बात कर रहे हैं ग़लत जानकारियों की जो इंटरनेट पर अपलोड होते रहते हैं। दरअसल बात यह है कि इंटरनेट पर हर कोई अपना तथ्य अपलोड कर सकता है, अपने ब्लॊग या वेबसाइट या किसी सोशल नेटवर्किंग् साइट के ज़रिए। ऐसे में किसी भी दी जा रही जानकारी की सत्यता पर प्रश्न-चिन्ह लग जाता है। अब कैसे हर बात पर यकीन करें कि जो बात हम किसी वेबसाइट पर पढ़ रहे हैं, वह सच भी है या नहीं! तभी तो 'रिसर्च-पेपर्स' या डाक्टरेट की थीसिस में इंटरनेट से प्राप्त तथ्यों का रेफ़रेन्स मान्य नहीं होता। हम भी 'ओल्ड इज़ गोल्ड' का आलेख लिखते वक़्त जब इंटरनेट पर शोध करते हैं किसी गीत या फ़िल्म पर, तब हमें भी कुछ गड़बड़ी वाले तथ्य नज़र आ जाते हैं, और ऐसा नहीं है कि हम ख़ुद कभी ग़लतियाँ नहीं करते, हमसे भी कई बार जाने-अंजाने ग़लतियाँ हो जाती हैं, और वही बात हम पर भी लागू हो जाती है।

दोस्तों, पिछले दिनों 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर चितलकर रामचन्द्र पर केन्द्रित लघु शृंखला 'कितना हसीं है मौसम' आयोजित की गई थी, जिसमें फ़िल्म 'पैग़ाम' का गीत शामिल हुआ था, जिसके बोल थे "दौलत ने पसीने को आज लात है मारी", जिसके गीतकार का नाम हमने बताया था कवि प्रदीप। अब क्योंकि कुछ वेबसाइटों पर इस फ़िल्म के गीतकार का नाम प्रदीप चटर्जी दिया गया है, तो हमारे कुछ मित्रों ने भी पहेली का जवाब देते वक़्त प्रदीप चटर्जी का नाम लिखा, जिस वजह से काफ़ी संशय पैदा हो गया गीतकार के नाम का। हम भी यकीन के साथ नहीं कर पाये कि क्या कवि प्रदीप और प्रदीप चटर्जी एक ही इंसान हैं या दो अलग। इंटरनेट पर काफ़ी खोजबीन करने के बाद भी जब मेरे हाथ कुछ ठोस ना लगा, तो मैंने सोचा कि क्यों ना उस इंसान से मदद माँगी जाये जिन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी हिंदी फ़िल्म गीत कोष तैयार करने में लगा दी है! जी हाँ, ठीक समझे आप, मैं हरमंदिर सिंह 'हमराज़' साहब की ही बात कर रहा हूँ। उन्होंने १९३१ से लेकर शायद १९९० तक के सभी फ़िल्मों के सभी गीतों को 'गीत-कोष' के रूप में प्रकाशित किया है और दशकों से 'लिस्नर्स बुलेटिन' नामक पत्रिका भी चला रहे हैं कानपुर से। तो मैंने जब हमराज़ जी को ईमेल भेजकर जानना चाहा कि आख़िर कवि प्रदीप और प्रदीप चटर्जी का क्या माजरा है और 'नास्तिक' और 'पैग़ाम' जैसी फ़िल्मों के गीतकार कौन हैं, तो उन्होंने तुरंत मेरे ईमेल का जवाब देते हुए कुछ ऐसा लिखा ---

"प्रदीप चटर्जी के नाम से कोई गीतकार १९३१ से लेकर अब तक इस फ़िल्म इण्डस्ट्री में नहीं हुए हैं। वो कवि प्रदीप ही थे, दादा साहब फाल्के सम्मानित, जिन्होंने 'नास्तिक' और 'पैग़ाम' में गीत लिखे हैं। यहाँ हर कोई आज़ाद है इंटरनेट पर लोगों को गुमराह करने के लिए। लखनऊ में एक डॊ. डी. सी. अवस्थी रहते हैं जिन्हें कवि प्रदीप पर शोध करने के लिए डाक्टरेट की डिग्री दी गई है।"

तो दोस्तों, आशा है आप सभी का संशय अब दूर हो गया होगा, प्रदीप चटर्जी नामक कोई गीतकार नहीं है, प्रदीप के नाम से जितने भी गीत आते हैं, वो सब कवि प्रदीप के ही लिखे हुए हैं, जिनका जन्म मध्य प्रदेश में हुआ है और जो बंगाली तो बिल्कुल नहीं हैं, इसलिए चटर्जी होने का सवाल ही नहीं। हाँ, आपकी जानकारी के लिए यह बता दूँ कि पंडित प्रदीप चटर्जी एक शास्त्रीय गायक ज़रूर हैं और यूट्युब में आप उनका गायन सुन सकते हैं। ख़ैर, अब आपको एक गीत सुनवाने की बारी है। कवि प्रदीप का लिखा एक ऐसा गीत आज सुनिए जिसे आप ने बहुत दिनों से नहीं सुना होगा, ऐसा हम दावा करते हैं। क्योंकि कवि प्रदीप का उल्लेख सी. रामचन्द्र पर केन्द्रित शृंखला में आयी है, इसलिए आज जिस गीत को हमने चुना है, उसे कवि प्रदीप ने लिखा और सी. रामचन्द्र ने ही स्वरबद्ध किया है। यह साल १९६० की फ़िल्म 'आँचल' का गीत है जिसे आशा भोसले, सुमन कल्याणपुर और सखियों ने गाया है। "नाचे रे राधा", यह एक नृत्य गीत है, बड़ा ही मीठा गाना है, हमें उम्मीद है कि गीत सुनते वक़्त आपके क़दम भी थिरक उठेगे, मचल उठेंगे। गीत की एक और खासियत है कि इसके दो वर्ज़न हैं, दोनों में वही आवाज़ें हैं लेकिन बोल अलग हैं। आइए ये दोनों वर्ज़न सुना जाये एक एक करके। गीत का संगीत संयोजन भी कमाल का है, बेहद सुरीला है। 'आँचल' वसंत जोगलेकर निर्देशित फ़िल्म थी जिसमें मुख्य कलाकार थे अशोक कुमार, नंदा, निरुपा रॊय और ललिता पवार। नंदा को इस फ़िल्म के लिए फ़िल्मफ़ेयर के सर्वश्रेष्ठ सह-अभिनेत्री का पुरस्कार मिला था और ललिता पवार भी इसी पुरस्कार के लिए नामांकित हुई थीं।

गीत - नाचे रे राधा -१ (आँचल)


गीत - नाचे रे राधा -२ (आँचल)


तो दोस्तों, ये था इस हफ़्ते का 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने', आपको यह गीत सुनकर कैसा लगा ज़रूर बताइएगा, और हमें ईमेल ज़रुर कीजिएगा अपने सुझावों और अपने जीवन की किसी यादगार घटना के साथ, oig@hindyugm.com के पते पर।

The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



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