रविवार, 2 जनवरी 2011

शाम ढले, खिडकी तले तुम सीटी बजाना छोड़ दो....हिंदी फिल्म संगीत जगत के एक क्रान्तिकारी संगीतकार को समर्पित एक नयी शृंखला

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 561/2010/261

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों, नमस्कार, और आप सभी को एक बार फिर से नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ! साल २०११ आपके जीवन में अपार सफलता, यश, सुख और शांति लेकर आये, यही हमारी ईश्वर से कामना है। और एक कामना यह भी है कि हम 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के माध्यम से फ़िल्म संगीत के सुनहरे दौर के अनमोल मोतियों को इसी तरह आप सब की ख़िदमत में पेश करते रहें। तो आइए नये साल में नये जोश के साथ 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के कारवाँ को आगे बढ़ाया जाये। दोस्तों, फ़िल्म संगीत के इतिहास में कुछ संगीतकार ऐसे हुए हैं जिनके संगीत ने उस समय की प्रचलित धारा को मोड़ कर रख दिया था, यानी दूसरे शब्दों में जिन्होंने फ़िल्म संगीत में क्रांति ला दी थी। जिन पाँच संगीतकारों को क्रांतिकारी संगीतकारों के रूप में चिन्हित किया गया है, उनके नाम हैं मास्टर ग़ुलाम हैदर, सी. रामचन्द्र, ओ. पी. नय्यर, राहुल देव बर्मन और ए. आर. रहमान। इनमें से एक क्रांतिकारी संगीतकार को समर्पित है 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की आज से शुरु होने वाली लघु शृंखला। ये वो संगीतकार हैं, जो फ़िल्म जगत में आये तो थे नायक बनने, कुछ फ़िल्मों में अभिनय भी किया, पर उनकी क़िस्मत में लिखा था संगीतकार बनना, सो बन गये एक क्रांतिकारी संगीतकार। इसके साथ साथ उन्होंने अपनी गायकी के जलवे भी दिखाये समय समय पर। जी हाँ, जिस फ़नकार पर केन्द्रित है यह लघु शृंखला, उन्हें हम संगीतकार के रूप में सी. रामचन्द्र के नाम से और गायक के रूप में चितलकर के नाम से जानते हैं। प्रस्तुत है अन्ना साहब, अर्थात् चितलकर नरहर रामचन्द्र, यानी सी. रामचन्द्र के स्वरबद्ध किए और गाये गीतों से सजी 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की नई लघु शृंखला 'कितना हसीं है मौसम'। इस शृंखला में हम ना केवल उनके गाये व संगीतबद्ध किए गीत सुनवाएँगे, बल्कि उनके जीवन और करीयर से जुड़े महत्वपूर्ण पहलुओं से भी आपका परिचय करवाएँगे।

आइए इस शृंखला की पहली कड़ी में हम आपको सुनवाते हैं फ़िल्म 'अलबेला' से चितलकर और लता मंगेशकर की युगल आवाज़ों में "शाम ढले खिड़की तले तुम सीटी बजाना छोड़ दो"। 'अलबेला' १९५१ की फ़िल्म थी और यह साल सी. रामचन्द्र के करीयर का एक महत्वपूर्ण साल साबित हुआ था। १९४२ में सी. रामचन्द्र ने हिंदी फ़िल्मों में बतौर संगीतकार पदार्पण किया था मास्टर भगवान की फ़िल्म 'सुखी जीवन' में। और इसके करीब १० साल बाद १९५१ में भगवान दादा की ही फ़िल्म 'अलबेला' में संगीत देकर सफलता के नये झंडे गाढ़े। मास्टर भगवान शकल सूरत से बहुत ही साधारण थे जहाँ तक फ़िल्म में नायक बनने की बात थी। लेकिन उन्होंने इतिहास कायम किया ना केवल इस फ़िल्म को प्रोड्युस व डिरेक्ट कर के, बल्कि फ़िल्म में गीता बाली के विपरीत नायक बन कर उन्होंने सब को चौंका दिया। इसमें कोई शक़ नहीं कि इस फ़िल्म की सफलता का एक मुख्य कारण इसका संगीत रहा। गीतकार राजेन्द्र कृष्ण और संगीतकार सी. रामचन्द्र ने सर्वसाधारण के नब्ज़ को सटीक पकड़ा और हल्के फुल्के बोलों से तथा पाश्चात्य व शास्त्रीय संगीत के मिश्रण से लोकप्रिय गीत संगीत की रचना की। ये गानें थोड़े से पारम्परिक भी थे, थोड़े आधुनिक भी, थोड़े शास्त्रीयता लिये हुए भी और थोड़े पाश्चात्य भी। फ़िल्म का हर गीत हिट हुआ और ऐसा सुना गया कि जब यह फ़िल्म थिएटर में चलती थी तो जब जब कोई गाना शुरु होता, लोग खड़े हो जाते और डान्स करने लग पड़ते। अन्य गीतों के अलावा लता और चितलकर की आवाज़ों में इस फ़िल्म में कुछ युगल गीत थे जैसे कि "शोला जो भड़के दिल मेरा धड़के", "भोली सूरत दिल के खोटे", "मेरे दिल की घड़ी करे टिक टिक टिक" तथा राग पहाड़ी पर आधारित आज का प्रस्तुत गीत "शाम ढले खिड़की तले"। रोमांटिक कॊमेडी पर आधारित यह गीत ५० वर्ष बाद आज भी हमें गुदगुदा जाता है और यकायक हमारे होठों पर मुस्कान खिल उठता है। तो आइए आप भी मुस्कुराइए और सुनिए 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर साल २०११ का पहला गोल्डन गीत।



क्या आप जानते हैं...
कि १९ नवंबर १९४२ को सी. रामचन्द्र ने अपनी मकान-मालकिन की बेटी रतन ठाकुर से प्रेम-विवाह कर लिया था।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 02/शृंखला 07
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - खुद अन्ना ने गाया है इस गीत को.

सवाल १ - गीतकार बताएं - २ अंक
सवाल २ - फिल्म का नाम क्या है - १ अंक
सवाल ३ - गाने के शुरूआती बोल किस मुहावरे पर हैं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
शरद जी को २ अंक और श्याम जी को १ अंक की बधाई. इंदु जी जरा ध्यान से खेलिए

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

सुर संगम में आज - गायन -उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली ख़ान, राग - गुनकली

सुर संगम - 01

अगर हर घर में एक बच्चे को हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत सिखाया गया होता तो इस देश का कभी भी बंटवारा नहीं होता

सुप्रभात! दोस्तों, नये साल के इस पहले रविवार की इस सुहानी सुबह में मैं, सुजॊय चटर्जी, आप सभी का 'आवाज़' पर स्वागत करता हूँ। युं तो हमारी मुलाक़ात नियमित रूप से 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर होती रहती है, लेकिन अब से मैं 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के अलावा भी हर रविवार की सुबह आपसे मुख़ातिब हो‍ऊँगा इस नये स्तंभ में जिसकी हम आज से शुरुआत कर रहे हैं। दोस्तों, प्राचीनतम संगीत की अगर हम बात करें तो वो है हमारा शास्त्रीय संगीत, जिसका उल्लेख हमें वेदों में मिलता है। चार वेदों में सामवेद में संगीत का व्यापक वर्णन मिलता है। सामवेद ऋगवेद से निकला है और उसके जो श्लोक हैं उन्हे सामगान के रूप में गाया जाता था। फिर उससे 'जाती' बनी और फिर आगे चलकर 'राग' बनें। ऐसी मान्यता है कि ये अलग अलग राग हमारे अलग अलग 'चक्र' (उर्जाबिंदू) को प्रभावित करते हैं। ये अलग अलग राग आधार बनें शास्त्रीय संगीत का और युगों युगों से इस देश के सुरसाधक इस परम्परा को निरंतर आगे बढ़ाते चले जा रहे हैं, हमारी संस्कृति को सहेजते हुए बढ़े जा रहे हैं। संगीत की तमाम धाराओं में सब से महत्वपूर्ण धारा है शास्त्रीय संगीत। बाकी जितनी भी तरह का संगीत है, उन सब से उपर है शास्त्रीय संगीत, और तभी तो संगीत की शिक्षा का अर्थ ही है शास्त्रीय संगीत की शिक्षा। अक्सर साक्षात्कारों में कलाकार इस बात का ज़िक्र करते हैं कि एक अच्छा गायक या संगीतकार बनने के लिए शास्त्रीय संगीत का सीखना बेहद ज़रूरी है। तो दोस्तों, आज से 'आवाज़' पर पहली बार एक ऐसा साप्ताहिक स्तंभ शुरु हो रहा है जो समर्पित है शुद्ध शास्त्रीय संगीत को। गायन और वादन, यानी साज़ और आवाज़, दोनों को ही बारी बारी से इसमें शामिल किया जाएगा। भारतीय शास्त्रीय संगीत से इस स्तंभ की हम शुरुआत कर रहे हैं, लेकिन आगे चलकर दूसरे देशों के शास्त्रीय संगीत और साज़ों को भी शामिल करने की उम्मीद रखते हैं। तो लीजिए प्रस्तुत है 'आवाज़' का नया साप्ताहिक स्तंभ - 'सुर संगम'।

'सुर संगम' के इस पहले अंक को हम समर्पित कर रहे हैं शास्त्रीय गायन के सशक्त स्तंभ उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ साहब को। उनसे हम आज की कड़ी में सुनेंगे राग गुनकली। इस राग पर हम अभी आते हैं, उससे पहले आइए ख़ाँ साहब के बारे में आपको कुछ दिलचस्प जानकारियाँ दी जाए! बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ साहब का जन्म सन् १९०२ को पराधीन भारत के पंजाब के कसूर में हुआ था जो अब पाक़िस्तान में है। उनके पिता अली बक्श ख़ान पश्चिम पंजाब प्रोविन्स के एक संगीत परिवार से ताल्लुख़ रखते थे और ख़ुद भी एक जाने माने गायक थे। बड़े ग़ुलाम अली जब ७ वर्ष के थे, तभी उन्होंने सारंगी वादन और गायन सीखना शुरु किया अपने चाचा काले ख़ान साहब से, जो एक गायक थे। काले ख़ाँ साहब के निधन के बाद बड़े ग़ुलाम अली अपने पिता से संगीत सीखते रहे। बड़े ग़ुलाम अली ने अपना करीयर बतौर सारंगी वादक शुरु किया और कलकत्ता में आयोजित अपने पहले ही कॊन्सर्ट में उन्होंने लोकप्रियता हासिल कर ली। ख़ाँ साहब ने चार धाराओं - पटियाला-कसूर, ध्रुपद के बहराम ख़ानी तत्व, जयपुर घराने की हरकतें और ग्वालियर घराने के बहलावे का मिश्रण कर एक नई परम्परा की शुरुआत की। उनके गले की मिठास, गायकी का अंदाज़, हरकतें, सबकुछ मिलकर उन्हें शीर्ष स्थान पर बिठा दिया। सन् ४७ में बटवारे के बाद वो पाक़िस्तान चले गए, लेकिन बाद में भारत वापस आ गए और आजीवन यहीं पर रहे। ख़ाँ साहब ने बटवारे को कभी स्वीकार नहीं किया, उनके अनुसार, "अगर हर घर में एक बच्चे को हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत सिखाया गया होता तो इस देश का कभी भी बंटवारा नहीं होता"। कितनी बड़ी बात उन्होंने कही थी!

आज उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ साहब की आवाज़ में हम आपको सुनवा रहे हैं राग गुनकली। यह एक प्रात:कालीन राग है जो ६ से ९ बजे के बीच गाया जाता है, ठाट है भैरव। स्वरों की जहाँ तक बात है, इस राग में गंधार और निशाद का प्रयोग नहीं होता, रिशभ और धैवत कोमल होते हैं। बाकी के सभी स्वर शुद्ध है। हर राग से किसी ना किसी मूड का रिश्ता होता है, गुनकली का रिश्ता है दर्द, ख़ालीपन और सूनेपन से। लीजिए उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ साहब से सुनिए यह राग, उसके बाद इसी राग पर आधारित एक फ़िल्मी गीत भी हम सुनेंगे।

राग गुनकली (उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली ख़ाँ)


फ़िल्मी गीतों का जहाँ तक सवाल है, बहुत ही कम गीतों में राग गुनकली का इस्तेमाल हमारे संगीतकारों ने किया है। कुछ गीतों की तरफ़ आपका ध्यान आकर्षित करते हैं। पंकज मल्लिक का गाया "ये कौन आज आया सवेरे सवेरे" (नर्तकी), परवीन सुल्ताना का गाया "बिछुरत मोसे कान्हा" (विजेयता) और लता-किशोर के युगल स्वरों में फ़िल्म 'महबूबा' का लोकप्रिय गीत "पर्बत के पीछे चम्बे दा गाँव" जैसे गानें इसी राग पर आधारित है। तो इनमें से लीजिए फ़िल्म 'महबूबा' का गीत आज यहाँ सुनिए। आनंद बक्शी के बोल, राहुल देव बर्मन का संगीत।

गीत - पर्बत के पीछे चम्बे दा गाँव (महबूबा)


तो दोस्तों, यह था 'सुर संगम' स्तंभ का पहला अंक। अगले रविवार फिर किसी कलाकार और फिर किसी राग के साथ हम हाज़िर होंगे, यह अंक आपको कैसा लगा ज़रूर बताइएगा टिप्पणी में। चाहें तो oig@hindyugm.com पर भी आप मुझसे सम्पर्क कर सकते हैं। तो अब इजाज़त दीजिए, मस्ती के मूड में सण्डे बिताइए, और शाम को ज़रूर वापस पधारिएगा 'आवाज़' पर क्योंकि आज शाम से 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर शुरु हो रही है एक नई लघु शृंखला। तो मिलते हैं शाम ६:३० बजे। तब तक के लिए नमस्कार!

आप बताएं
फिल्म "गूँज उठी शहनाई" में भी रफ़ी साहब का गाया एक गीत है इस राग पर आधारित, क्या याद है आपको ?

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



आवाज़ की कोशिश है कि हम इस माध्यम से न सिर्फ नए कलाकारों को एक विश्वव्यापी मंच प्रदान करें बल्कि संगीत की हर विधा पर जानकारियों को समेटें और सहेजें ताकि आज की पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी हमारे संगीत धरोहरों के बारे में अधिक जान पायें. "ओल्ड इस गोल्ड" के जरिये फिल्म संगीत और "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" के माध्यम से गैर फ़िल्मी संगीत की दुनिया से जानकारियाँ बटोरने के बाद अब शास्त्रीय संगीत के कुछ सूक्ष्म पक्षों को एक तार में पिरोने की एक कोशिश है शृंखला "सुर संगम". होस्ट हैं एक बार फिर आपके प्रिय सुजॉय जी.

शनिवार, 1 जनवरी 2011

ई मेल के बहाने यादों के खजाने (23), फिर एक बार साल की शुरूआत हो रही है मन्ना दा की स्वर साधना से

नमस्कार! पूरे 'आवाज़' और 'हिंद-युग्म' परिवार की तरफ़ से आप सभी को नववर्ष की बहुत बहुत शुभकामनाएँ। २०११ का यह नया साल आप सब के जीवन में ढेरों ख़ुशियाँ व सफलताएँ लेकर आए, यह हमारी शुभेच्छा है आप सब के लिए। 'ओल्ड इज़ गोल्ड' शनिवार की विशेष प्रस्तुति 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने' में आप सभी का स्वागत है। इस साप्ताहिक स्तंभ के ज़रिए आप अपनी खट्टी मीठी यादों को पूरी दुनिया के साथ बाँट सकते हैं, या फिर कोई ख़ास गीत अगर आप सुनवाना चाहें, या 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के लिए अपनी राय और सुझाव भेजना चाहें, उनकी भी व्यवस्था है इस साप्ताहिक पेशकश में। किसी दायरे में हमने इस विशेषांक को नहीं बांधा है, इसलिए आप अपने तरीके से कुछ भी इसमें भेज सकते हैं जो आपको लगे कि सब से साथ बांटा जा सकता है। आज हम हमारे जिन दोस्त का ईमेल शामिल कर रहे हैं, वो हैं कृष्णमोहन मिश्र, जिनके मनपसंद गायक हैं मन्ना डे। तो चलिए आज का यह अंक कृष्णमोहन जी और मन्ना दा के नाम करते हैं।

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प्रिय सजीव सारथी एवं सुजॉय चटर्जी,

आप दोनों को मेरी हार्दिक शुभकामनाएँ; इसलिए कि आप फिल्म संगीत के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य कर रहे हैं। 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की यह शृंखला भावी शोधार्थियों के लिए तो उपयोगी है ही, नई पीढ़ी के लिए धरोहर भी है।

मैं, कृष्णमोहन मिश्र, लखनऊ-वासी, ६३ वर्षीय संगीत-प्रेमी हूँ। विगत ३८ वर्षों से संगीत की मंच-प्रस्तुतियों की समीक्षा-कार्य करता रहा हूँ। 'ओल्ड इज़ गोल्ड' का अभी कुछ मास पूर्व ही सदस्य बना हूँ। 'फ्लेशबैक एपिसोड' (सफ़र अब तक) पढ़ने के बाद लगा कि आपने फिल्म-संगीत के खजाने को टटोलने का प्रयास किया तो है, किन्तु अभी बहुतेरे कोण टटोलने शेष हैं।

फिल्म एवं सुगम संगीत क्षेत्र में आदरणीय मन्ना डे का योगदान अविस्मरणीय है। एक शृंखला तो उनके जन्मदिवस या किसी अन्य अवसर पर प्रस्तुत की जा सकती है। मैं इस हेतु आपका सहयोग कर सकता हूँ। मैंने शास्त्रीय तथा उपशास्त्रीय रागों पर आधारित पुराने फिल्मी गीतों को सूचीबद्ध किया है। आपने राग आधारित १० गीतों की शृंखला प्रस्तुत किया ही है, मेरी इस सूची से कुछ और श्रृंखलाएँ भी बन सकती हैं। कृपया इस दिशा में मेरा मार्गदर्शन कर मेरे अल्पज्ञान का उपयोग करें।

कृष्णमोहन मिश्र

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कृष्णमोहन जी, सब से पहले तो बहुत बहुत धन्यवाद आपके इस ईमेल के लिए। बहुत अच्छा लगा आपके बारे में जानकर। आपने जिन शब्दों में 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की तारीफ़ की है, हमारा हौसला बढ़ाया है, उसके लिए हम आपके आभारी हैं। इसमें कोई शक़ या दोराय नहीं कि मन्ना डे का संगीत जगत में अद्वितीय योगदान रहा है। वो एक सुर-गंधर्व हैं जिन्होंने फ़िल्म संगीत को शास्त्रीयता से समृद्ध करने में उल्लेखनीय योगदान दिया है। १ मई को मन्ना दा का जन्मदिवस है, उस समय हम उन पर १० अंकों की एक लघु शृंखला अवश्य प्रस्तुत करेंगे, ऐसा हम आपसे वादा करते हैं। आप ने शास्त्रीय रागों को सूचीबद्ध करने की जो बात लिखी है, आप बेशक़ हमें इसे भेज सकते हैं हमारे oig@hindyugm.com के पते पर। वैसे आपको यह बता दें कि कल, यानी २ जनवरी से हर रविवार सुबह हम शास्त्रीय संगीत पर आधारित एक नया स्तंभ शुरु कर रहे हैं, जिसमें भी आपके इस सूची में से गानें चुनने की गुंजाइश रहेगी। ज़रूर भेजिएगा अपनी सूची।

आइए अब आज के गीत पर आते हैं। क्योंकि ज़िक्र मन्ना डे का आया है इस अंक में, तो क्यों ना उनका गाया एक दुर्लभ गीत सुना जाए। दुर्लभ इसलिए कहा क्योंकि इस गीत में मन्ना दा के साथ और भी दो गायकों की आवाज़ें शामिल हैं - किशोर कुमार और मोहम्मद रफ़ी। १९८१ में किशोर कुमार की एक फ़िल्म आयी थी 'चलती का नाम ज़िंदगी' जिसमें उन्होंने अभिनय और गायन तो किया ही था, फ़िल्म को निर्देशित भी किया था। अशोक कुमार, अनूप कुमार और अमित कुमार ने भी अभिनय किया था इस फ़िल्म में। इस फ़िल्म में किशोर दा ने एक ऐसा गीत बनाया जिसे उन्होंने मन्ना दा और रफ़ी साहब के साथ मिलकर गाया, जिसके बोल थे "बंद मुट्ठी लाख की"। आपको शायद याद हो 'चलती का नाम गाड़ी' में "बाबू समझो इशारे" गीत में "बंद मुट्ठी लाख की" का इस्तेमाल हुआ था। शायद वहीं से आज के इस प्रस्तुत गीत का आइडिया आया होगा। और दोस्तों, इत्तेफ़ाक़ देखिए, पिछले साल, इसी दिन, यानी १ जनवरी २०१० को 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर मन्ना डे साहब का ही गाया गीत बजा था फ़िल्म 'जुर्माना' का - "ए सखी राधिके बावरी हो गई"। याद है न? और इस साल के 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की शुरुआत भी इस सुर-गंधर्व की आवाज़ के साथ हो रही है। एक नहीं, बल्कि तीन तीन सुरसाधकों की आवाज़ों से। तो लीजिए नये साल के जश्न को और भी शानदार और जानदार बनाते हुए सुनते हैं मन्ना डे, किशोर कुमार और मोहम्मद रफ़ी का गाया 'चलती का नाम ज़िंदगी' फ़िल्म का यह गीत।



सुजॉय चट्टर्जी

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