सोमवार, 20 दिसंबर 2010

हाथ सीने पे जो रख दो तो क़रार आ जाये....और धीरे धीरे प्रेम में गुजारिशों का दौर शुरू हुआ

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 552/2010/252

'एक मैं और एक तू' - फ़िल्म संगीत के सुनहरे दशकों से चुने हुए युगल गीतों से सजी 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की इस लघु शृंखला की शुरुआत कल हमने की थी 'अछूत कन्या' फ़िल्म के उस युगल गीत से जो फ़िल्म संगीत इतिहास का पहला सुपरहिट युगल गीत रहा है। आज आइए इस शृंखला की दूसरी कड़ी में पाँव रखें ४० के दशक में। सन् १९४७ में देश के बंटवारे के बाद बहुत से कलाकार भारत से पाक़िस्तान चले गये, बहुत से कलाकार वहाँ से यहाँ आ गये, और बहुत से कलाकार अपने अपने जगहों पर कायम रहे। ए. आर. कारदार और महबूब ख़ान यहीं रह जाने वालों में से थे। लेकिन नूरजहाँ जैसी गायिका अभिनेत्री को जाना पड़ा। लेकिन जाते जाते १९४७ में वो दो फ़िल्में हमें ऐसी दे गईं जिनकी यादें आज धुंधली ज़रूर हुई हैं, लेकिन आज भी इनका ज़िक्र छिड़ते ही हमें ऐसा करार मिलता है कि जैसे किसी बहुत ही प्यारे और दिलअज़ीज़ ने अपना हाथ हमारे सीने पर रख दिया हो! शायद आप समझ रहे होंगे कि आज हम आपको कौन सा गाना सुनवाने जा रहे हैं। जी हाँ, नूरजहाँ और जी. एम. दुर्रानी की युगल आवाज़ों में १९४७ की फ़िल्म 'मिर्ज़ा साहिबाँ' का "हाथ सीने पे जो रख दो तो क़रार आ जाये, दिल के उजड़े हुए गुलशन में बहार आ जाये"। एक फ़िल्म 'मिर्ज़ा साहिबाँ' का ज़िक्र तो हमने किया, दूसरी फ़िल्म थी 'जुगनु'। ये दोनों ही फ़िल्में बेहद मक़बूल हुईं थी। 'मधुकर पिक्चर्स' के बैनर तले निर्मित और के. अमरनाथ निर्देशित 'मिर्ज़ा साहिबाँ' फ़िल्म में नूरजहाँ के नायक बने थे त्रिलोक कपूर। संगीतकार पंडित अमरनाथ की यह अंतिम फ़िल्म थी। उनकी असामयिक मृत्यु के बाद उन्हीं के संगीतकार भाइयों की जोड़ी हुस्नलाल और भगतराम ने इस फ़िल्म के गीतों को पूरा किया। अज़ीज़ कशमीरी और क़मर जलालाबादी ने इस फ़िल्म के गानें लिखे जो उस ज़माने में बेहद चर्चित हुए। ख़ास कर आज का प्रस्तुत गीत तो गली गली गूंजा करता था। इसी गायक-गायिका जोड़ी ने इस फ़िल्म में एक और युगल गीत भी गाया था, जिसके बोल थे "तुम आँखों से दूर हो, हुई नींद आँखों से दूर", हालाँकि यह एक ग़मज़दा डुएट था। नूरजहाँ के गाये एकल गीतों में शामिल थे "आजा तुझे अफ़साना जुदाई का सुनाएँ, जो दिल पे गुज़रती है वह आँखों से बतायें" और "क्या यही तेरा प्यार था, मुझको तो इंतज़ार था"। ज़ोहराबाई ने अपनी पंजाबी अंदाज़ में "सामने गली में मेरा घर है, पता मेरा भूल ना जाना" गाया जो चरित्र अभिनेत्री कुक्कू पर फ़िल्माया गया था। नूरजहाँ, शम्शाद बेग़म और ज़ोहराबाई ने भी दो अनूठे गीत गाये थे, "हाये रे उड उड़ जाये मोरा रेशमी दुपट्टा" और "रुत रंगीली आई चांदनी छायी चांद मेरे आजा"।

दोस्तों, नूरजहाँ की बातें तो हमने बहुत की है पहले भी, हाल में भी, और आगे भी करेंगे, क्यों ना आज दुर्रानी साहब की बातें की जाए। हम क्या बातें करेंगे उनकी, लीजिए उन्हीं से सुनिए उनकी दास्तान जो उन्होंने कहे थे अमीन सायानी साहब के एक इंटरव्यु में। "उस वक़्त प्लेबैक सिस्टेम नहीं था। ऐक्टर को ख़ुद ही गाना पड़ता था। बात यह हुई कि जब मैंने अपने आप को फ़िल्म के पर्दे पर हीरो हीरोइन और लड़कियों के आगे पीछे दौड़ते भागते देखा तो मुझे यह बिल्कुल अच्छा नहीं लगा। और दो एक फ़िल्मों में काम करने के बाद मैंने फ़िल्मों में काम करने से मना कर दिया, भई हम काम नहीं करेंगे। मतलब यह हुआ कि काम ठुकराने का मतलब भूखों मरना हुआ। अब अपने साथ भी यही मामला हुआ। ख़ैर, मरता क्या ना करता! घर वापस लौटकर जा नहीं सकते, क्योंकि घरवाले बहुत ही पुराने ख़यालात के थे, और फिर नाचाकी भी थी, वो सब इस तरह के काम करने वालों को कंजर कहा करते थे, यानी कि कंजर, 'अरे यार, फ़लाने आदमी का लड़का कंजर हो गया, फ़िल्म-लाइन में काम करता है'। ख़ैर साहब, हम ऐक्टर तो नहीं बन सके, पर गाना हमें बहुत भाया। और हम किसी भी सूरत हाथ पैर मारकर बम्बई रेडियो स्टेशन में ड्रामा आर्टिस्ट की हैसियत से नौकर हो गये"। फिर इसके बाद रेडियो से प्लेबैक सिंगर कैसे बने जी. एम. दुर्रानी साहब, यह कहानी हम फिर किसी रोज़ आपको बताएँगे, आइए फ़िल्हाल सुनते हैं दुर्रानी साहब के साथ नूरजहाँ का गाया फ़िल्म 'मिर्ज़ा साहिबाँ' का यह युगल गीत। आगामी २३ दिसंबर को नूरजहाँ जी की पुण्यतिथि के अवसर पर यह 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की श्रद्धांजली भी है उनके नाम।



क्या आप जानते हैं...
कि जी. एम. दुर्रानी का पूरा नाम ग़ुलाम मुस्तफ़ा दुर्रानी था। १९३५ में ३० रुपय महीने पर सोहराब मोदी की कंपनी 'मिनर्वा' में उन्हें नौकरी मिल गई। उनका गाया हुआ पहला मशहूर गाना था "नींद हमारी ख़्वाब तुम्हारे" (नई कहानी, १९४३)।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 3/शृंखला 06
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र -संगीतकार हैं नाशाद.

सवाल १ - किस किस की आवाजें हैं गीत में - १ अंक
सवाल २ - अजीत और गीता बाली पर फिल्माए इस गीत के गीतकार बताएं - २ अंक
सवाल ३ - फिल्म का नाम बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
वाह श्याम जी, कुछ मुश्किल थी कल की पहेली, पर आपके क्या कहने.....शरद जी और अमित जी भी सही जवाब लाये, इंदु जी और दादी की हजारी सलामत

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

रविवार, 19 दिसंबर 2010

मैं बन की चिड़िया बन के.....ये गीत है उन दिनों का जब भारतीय रुपहले पर्दे पर प्रेम ने पहली करवट ली थी

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 551/2010/251

मस्कार दोस्तों! स्वागत है बहुत बहुत आप सभी का 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की इस सुरीली महफ़िल में। पिछली कड़ी के साथ ही पिछले बीस अंकों से चली आ रही लघु शृंखला 'हिंदी सिनेमा के लौह स्तंभ' सम्पन्न हो गई, और आज से एक नई लघु शृंखला का आग़ाज़ हम कर रहे हैं। और यहाँ पर आपको इस बात की याद दिला दूँ कि यह साल २०१० की आख़िरी लघु शृंखला होगी 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर। जी हाँ, देखते ही देखते यह साल भी अब विदाई के मूड में आ गया है। तो कहिए साल के आख़िरी 'ओल्ड इज़ गोल्ड' लघु शृंखला को कैसे यादगार बनाया जाए? क्योंकि साल के इन आख़िरी कुछ दिनों में हम सभी छुट्टी के मूड में होते हैं, हमारा मिज़ाज हल्का फुल्का होता है, मौसम भी बड़ा ख़ुशरंग होता है, इसलिए हमने सोचा कि इस लघु शृंखला को कुछ बेहद सुरीले प्यार भरे युगल गीतों से सजायी जाये। जब से फ़िल्म संगीत की शुरुआत हुई है, तभी से प्यार भरे युगल गीतों का भी रिवाज़ चला आ रहा है, और उस ज़माने से लेकर आज तक ये प्रेम गीत ना केवल फ़िल्मों की शान हैं, बल्कि फ़िल्म के बाहर भी सुनें तो एक अलग ही अनुभूति प्रदान करते हैं। और जो लोग प्यार करते हैं, उनके लिए तो जैसे दिल के तराने बन जाया करते हैं ऐसे गीत। तो आइए आज से अगले दस अंकों में हम सुनें ३० के दशक से लेकर ८० के दशक तक में बनने वाली कुछ बेहद लोकप्रिय फ़िल्मी युगल रचनाएँ, जिन्हें हमने आज तक अपने सीने से लगाये रखा है। वैसे तो इनके अलावा भी बेशुमार सुमधुर युगल गीत हैं, बस युं समझ लीजिए कि आँखें बंद करके समुंदर से एक मुट्ठी मोतियाँ हम निकाल लाये हैं, और आँखें खोलने पर ही देखा कि ये मोती कौन कौन से हैं। पेश-ए-ख़िदमत है साल २०१० के 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की अंतिम लघु शृंखला 'एक मैं और एक तू'। जैसा कि हमने कहा कि हम युगल गीतों का यह सफ़र ३० के दशक से शुरु करेंगे, तो फिर ऐसे में फ़िल्म 'अछूत कन्या' के उस यादगार गीत से ही क्यों ना शुभारम्भ की जाए! "मैं बन की चिड़िया बनके बन बन बोलूँ रे, मैं बन का पंछी बनके संग संग डोलूँ रे"। अशोक कुमार और देविका रानी के गाये इस गीत का उल्लेख आज भी कई जगहों पर चल पड़ता है। और इस गीत को सुनते ही आज भी पेड़ की टहनी पर बैठीं देविका रानी और उनके पीछे खड़े दादामुनि अशोक कुमार का वह दृष्य जैसे आँखों के सामने आ जाता है।

'अछूत कन्या' १९३६ की फ़िल्म थी जो बनी थी 'बॊम्बे टॊकीज़' के बैनर तले। संगीतकार थीं सरस्वती देवी। यह वह दौर था जब गांधीजी ने अस्पृश्यता को दूर करने के लिए एक मिशन चला रखी थी। निरंजन पाल की लिखी कहानी पर आधारित इस फ़िल्म में भी अछूतप्रथा के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाया गया था। पंडित नेहरु और सरोजिनी नायडू 'बॊम्बे टॊकीज़' में जाकर यह फ़िल्म देखी थी। 'अछूत कन्या' पहली बोलती फ़िल्म है जिसके गानें सर्वसाधारण में बहुत ज़्यादा लोकप्रिय हुए। सिर्फ़ हमारे देश में ही नहीं, बल्कि इसके गीतों के ग्रामोफ़ोन रेकॊर्ड्स इंगलैण्ड तक भेजे गये। कहा जाता है कि सरस्वती देवी घण्टों तक अशोक कुमार और देविका रानी को गाना सिखाती थीं, ठीक वैसे जैसे कोई स्कूल टीचर बच्चों को नर्सरी राइम सिखाती है। उस ज़मानें में प्लेबैक का चलन शुरु नहीं हुआ था, इसलिए अभिनेता अशोक कुमार और देविका रानी को अपने गानें ख़ुद ही गाने थे। ऐसे में संगीतकार के लिए बहुत मुश्किल हुआ करता था कम्पोज़ करना और जहाँ तक हो सके वो धुनें ऐसी बनाते थे जो अभिनेता आसानी से गा सके। इसलिए बहुत ज़्यादा उन्नत कम्पोज़िशन करना सम्भव नहीं होता था। फिर भी आज का प्रस्तुत गीत उस ज़माने में ऐसी लोकप्रियता हासिल की कि उससे पहले किसी फ़िल्मी गीत ने नहीं की थी। उस समय के प्रचलित नाट्य संगीत और शास्त्रीय संगीत के बंधनों से बाहर निकलकर सरस्वती देवी ने हल्के फुल्के अंदाज़ में इस फ़िल्म के गानें बनाये जो बहुत सराहे गये। इस फ़िल्म के संगीत की एक और महत्वपूर्ण बात आपको बताना चाहूँगा। फ़िल्म में एक गीत है "कित गये हो खेवनहार"। कहा जाता है कि इस गीत को सरस्वती देवी की बहन चन्द्रप्रभा द्वारा गाया जाना था जो उस फ़िल्म में अभिनय कर रही थीं। लेकिन जिस दिन इस गाने की शूटिंग् थी, उस दिन उनका गला ख़राब हो गया और गाने की हालत में नहीं थीं। ऐसे में सरस्वती देवी ने पर्दे के पीछे खड़े होकर ख़ुद गीत को गाया जब कि चन्द्रप्रभा ने केवल होंठ हिलाये। इस तरह से सरस्वती देवी ने प्लेबैक की नींव रखी। वैसे पहले प्लेबैक का श्रेय न्यु थिएटर्स के आर. सी. बोराल को जाता है जिन्होंने १९३५ की फ़िल्म 'धूप-छाँव' में इसकी शुरुआत की थी, लेकिन उस फ़िल्म में उस अभिनेता ने अपने लिए ही प्लेबैक किया। "प्योर प्लेबैक" की बात करे तो सरस्वती देवी ने अपनी बहन चन्द्रप्रभा के लिए प्लेबैक कर 'प्लेबैक' के असली अर्थ को साकार किया। तो लीजिए दोस्तों, आज 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर प्रस्तुत है हिंदी सिने संगीत का ना केवल पहला मशहूर युगल गीत, बल्कि यु कहें कि पहला मशहूर गीत। अशोक कुमार और देविका रानी के साथ साथ सरस्वती देवी को भी 'आवाज़' का सलाम।



क्या आप जानते हैं...
कि सरस्वती देवी का असली नाम था ख़ुरशीद मंचशेर मिनोचा होमजी (Khursheed Manchersher Minocher Homji)। उस समय पारसी महिलाओं को फ़िल्म और संगीत में जाने की अनुमति नहीं थी। इसलिए उन्हें अपना नाम बदल कर इस क्षेत्र में उतरना पड़ा।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 2/शृंखला 06
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र -इस युगल गीत की गायिका हैं नूरजहाँ.

सवाल १ - गायक बताएं - १ अंक
सवाल २ - एक अमर प्रेम कहानी पर आधारित थी फिल्म, नाम बताएं - १ अंक
सवाल ३ - किस संगीतकार की अंतिम फिल्म थी ये - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
एक बार फिर पहले सवाल के साथ शरद जी ने बढ़त बनाई है, पर क्या वो पिछली बार की तरह इस बार भी श्याम जी से पिछड़ जायेगें आगे चल कर या वो और अमित जी मिलकर ४ बार के विजेता श्याम जी को पछाड पायेंगें, देखना दिलचस्प होगा, बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

शनिवार, 18 दिसंबर 2010

ई मेल के बहाने यादों के खजाने (२१), जब नूरजहाँ की पुण्यतिथि पर उन्हें याद किया पार्श्वगायिका शारदा ने

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों, नमस्कार, और बहुत बहुत स्वागत है इस साप्ताहिक विशेषांक में। आज फिर एक बार बारी 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने' की। और आज का ईमेल भी बहुत ही ख़ास है। दोस्तों, २३ दिसम्बर २००० को मलिका-ए-तरन्नुम नूरजहाँ इस दुनिया-ए-फ़ानी को छोड़ कर अपनी अनंत यात्रा पर निकल गईं और पीछे छोड़ गईं अपने गाये गीतों के अनमोल ख़ज़ाने को। आज पूरी दुनिया में नूरजहाँ जी के असंख्य चाहनेवाले हैं। और उनके इन तमाम चाहनेवालों में से एक उल्लेखनीय नाम पार्श्वगायिका शारदा का भी है। जी हाँ, वो ही शारदा जिन्होंने "तितली उड़ी", "दुनिया की सैर कर लो", "चले जाना ज़रा ठहरो", "वो परी कहाँ से लाऊँ", "जानेचमन शोला बदन", "जब भी ये दिल उदास होता है", "देखो मेरा दिल मचल गया" और ऐसे ही बहुत से कामयाब गीतों को गाकर ६० के दशक में फ़िल्म संगीत जगत पर छा गईं थीं। हमें जब उनकी किसी इंटरव्यु से पता चला कि उनकी मनपसंद गायिका नूरजहाँ रहीं हैं, हमने सोचा कि क्यों ना उनसे ईमेल के ज़रिए सम्पर्क स्थापित कर इस बारे में पूछा जाए। तो लीजिए आज 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने' में पढ़िए शारदा जी द्वारा नूरजहाँ जी के बारे में कही हुई बातें। २३ दिसंबर को नूरजहाँ जी की पुण्यतिथि पर यह 'आवाज़' मंच की श्रद्धांजली है।

सुजॊय - शारदा जी, आशा है आप सकुशल हैं। २३ दिसंबर को मलिका-ए-तरन्नुम नूरजहाँ की बरसी है। हम 'हिंद-युग्म' के 'आवाज़' मंच की तरफ़ से उन्हें श्रद्धांजली अर्पित करने की कामना रखते हैं। हमें पता चला है कि नूरजहाँ जी आपकी मनपसंद गायिका रही हैं। इसलिए हम आपसे इस बारे में जानना चाहेंगे। आप हमें और हमारे पाठकों को बताएँ कि आपके दिल में उनके लिए किस तरह के विचार हैं, उनकी गायकी में क्या ख़ास बात आपको नज़र आती है जो उन्हें औरों से अलग करती है?

शारदा - नूरजहाँ जी को मैं एक बेहतरीन गायिका के रूप में याद करती हूँ। मैंने अपने जीवन में जो पहला हिंदी गीत सुना था, वह नूरजहाँ जी का ही गाया हुआ था और उस सुहाने याद को मैं अब तक महसूस करती हूँ और बार बार जीती हूँ। उसके बाद हर बार जब भी मैं उनके गाये हुए गीत सुनती हूँ, मैं यही पता लगाने की कोशिश करती हूँ कि बोल, संगीत और आवाज़ के अलावा वह कौन सी "एक्स्ट्रा" चीज़ वो गाने में डालती हैं कि जिससे उनका गाया हर गीत एक अद्‍भुत अनुभव बन कर रह जाता है, जो दिल को इतना छू जाता है। मेरी ओर से नूरजहाँ जी को भावभीनी श्रद्धांजली।

सुजॊय - उनके कौन से गानें आपको सब से ज़्यादा पसंद हैं?

शारदा - नूरजहाँ और रफ़ी साहब की, वह "यहाँ बदला वफ़ा का बेवफ़ाई के सिवा क्या है" सुनने के लिए मरती थी, क्योंकि वहाँ ना रेडियो था, ना कुछ था सुनने के लिए, और हमारे गली के पीछे चाय की दुकान थी। तो उधर बजाते थे। एक दिन मैं खाना खा रही थी, तो खाना छोड़ कर उपर टेरेस पर भागी सुनने के लिए, और पूरा सुन कर ही नीचे आयी। माँ ने कहा कि क्या हो गया तुमको? मैं खाने के जूठे हाथ से ही खड़ी रही और पूरा सुनकर ही वापस आयी। नूरजहाँ जी से कभी मुलाक़ात नहीं हो पायी। फिर एक और गाना है "आजा मेरी बरबाद मोहब्बत के सहारे"। रेडियो पर जब गाना आता था तो भाग भाग कर लिखती थी, समझ में भी नहीं आता था तब, हिंदी भी बोलना नहीं आता था।

तो दोस्तों, शारदा जी के बताये इन दो गीतों में से दूसरा जो गीत है, "आजा मेरी बरबाद मोहब्बत के सहारे", आइए आज इस गीत के ज़रिए नूरजहाँ जी को हम अपनी श्रद्धा सुमन अर्पित करें। फ़िल्म 'अनमोल घड़ी', संगीत नौशाद साहब का, और गीतकार हैं तनवीर नक़वी।

गीत - आजा मेरी बरबाद मोहब्बत के सहारे (अनमोल घड़ी)


तो ये था इस सप्ताह का 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने', जो रोशन हो रही थी पार्श्वगायिका शारदा के यादों के उजालों से। २३ दिसंबर को मलिका-ए-तरन्नुम नूरजहाँ की पुण्यतिथि पर यह अंक उन्हें श्रद्धांजली स्वरूप प्रस्तुत किया गया। अब आज बस इतना ही, कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नियमित अंक के साथ हम पुन: उपस्थित होंगे, इजाज़त दीजिए, नमस्कार!

The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



Popular Posts सर्वप्रिय रचनाएँ